आदि पर्व · अध्याय 90
दुष्यन्त का आखेट
जनमेजय भरत के जन्म, शकुन्तला की उत्पत्ति और दुष्यन्त द्वारा उसे पाने की कथा विस्तार से सुनना चाहते हैं। वैशम्पायन बताते हैं कि दुष्यन्त विशाल सेना के साथ एक घने वन की ओर निकले; नगर की स्त्रियों ने उन्हें देखकर उनकी प्रशंसा की और सब वर्णों के लोग उनके पीछे चले। एक बीहड़, जलहीन वन में उन्होंने बाण, तलवार, शक्ति और गदा से बाघों, हिरनों और अन्य पशुओं का संहार किया; पशुओं के झुंड भय से भागे, थके पशु गिर पड़े और घायल हाथियों ने बहुत से मनुष्यों को कुचल डाला।
जनमेजय उवाच
श्लोक 1 (1.90.1)
संभवं भरतस्याहं चरितं च महामतेः । शकुन्तलायाश्चोत्पत्तिं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥
saṃbhavaṃ bharatasyāhaṃ caritaṃ ca mahāmateḥ | śakuntalāyāścotpattiṃ śrotumicchāmi tattvataḥ
मैं परम बुद्धिमान भरत के जन्म और चरित्र को तथा शकुन्तला की उत्पत्ति को यथार्थ रूप से सुनना चाहता हूँ,
श्लोक 2 (1.90.2)
दुष्यन्तेन च वीरेण यथा प्राप्ता शकुन्तला । तं वै पुरुषसिंहस्य भगवन्विस्तरं त्वहम् ॥
duṣyantena ca vīreṇa yathā prāptā śakuntalā | taṃ vai puruṣasiṃhasya bhagavanvistaraṃ tvaham
और यह भी कि वीर दुष्यन्त ने शकुन्तला को कैसे प्राप्त किया। भगवन्, उस पुरुषसिंह का वह वृत्तान्त मैं विस्तार से,
श्लोक 3 (1.90.3)
श्रोतुमिच्छामि तत्त्वज्ञ सर्वं मतिमतां वर ॥
śrotumicchāmi tattvajña sarvaṃ matimatāṃ vara
पूरा-पूरा सुनना चाहता हूँ, हे तत्त्वज्ञ, हे बुद्धिमानों में श्रेष्ठ!
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 4 (1.90.4)
स कदाचिन्महाबाहुः प्रभूतबलवाहनः । वनं जगाम गहनं हयनागशतैर्वृतः । बलेन चतुरङ्गेण वृतः परमवल्गुना ॥
sa kadācinmahābāhuḥ prabhūtabalavāhanaḥ | vanaṃ jagāma gahanaṃ hayanāgaśatairvṛtaḥ | balena caturaṅgeṇa vṛtaḥ paramavalgunā
एक बार वह महाबाहु राजा, विपुल सेना और वाहनों के साथ, सैकड़ों घोड़ों और हाथियों से घिरा हुआ तथा अत्यन्त शोभायमान चतुरंगिणी सेना के साथ एक घने वन में गया।
श्लोक 5 (1.90.5)
खड्गशक्तिधरैर्वीरैर्गदामुसलपाणिभिः । प्रासतोमरहस्तैश्च ययौ योधशतैर्वृतः ॥
khaḍgaśaktidharairvīrairgadāmusalapāṇibhiḥ | prāsatomarahastaiśca yayau yodhaśatairvṛtaḥ
वह सैकड़ों योद्धाओं से घिरा हुआ चला — तलवार और शक्ति धारण किए वीर, हाथों में गदा और मूसल लिए, प्रास और तोमर थामे हुए।
श्लोक 6 (1.90.6)
सिंहनादैश्च योधानां शङ्खदुन्दुभिनिःस्वनैः । रथनेमिस्वनैश्चैव सनागवरबृंहितैः ॥
siṃhanādaiśca yodhānāṃ śaṅkhadundubhiniḥsvanaiḥ | rathanemisvanaiścaiva sanāgavarabṛṃhitaiḥ
योद्धाओं के सिंहनादों से, शंखों और दुन्दुभियों की ध्वनि से, रथों के पहियों की घरघराहट से और श्रेष्ठ हाथियों की चिंघाड़ से,
श्लोक 7 (1.90.7)
नानायुधधरैश्चापि नानावेषधरैस्तथा । ह्रेषितस्वनमिश्रैश्च क्ष्वेडितास्फोटितस्वनैः ॥
nānāyudhadharaiścāpi nānāveṣadharaistathā | hreṣitasvanamiśraiśca kṣveḍitāsphoṭitasvanaiḥ
अनेक प्रकार के आयुध और अनेक प्रकार के वेश धारण किए योद्धाओं से, घोड़ों की हिनहिनाहट में मिली गर्जनाओं और भुजाओं पर ताल ठोकने की ध्वनियों से,
श्लोक 8 (1.90.8)
आसीत्किलकिलाशब्दस्तस्मिन्गच्छति पार्थिवे । प्रासादवरशृङ्गस्थाः परया नृपशोभया ॥
āsītkilakilāśabdastasmingacchati pārthive | prāsādavaraśṛṅgasthāḥ parayā nṛpaśobhayā
राजा के प्रस्थान करते समय भारी कोलाहल मच गया। श्रेष्ठ महलों के शिखरों पर खड़ी स्त्रियों ने
श्लोक 9 (1.90.9)
ददृशुस्तं स्त्रियस्तत्र शूरमात्मयशस्करम् । शक्रोपमममित्रघ्नं परवारणवारणम् ॥
dadṛśustaṃ striyastatra śūramātmayaśaskaram | śakropamamamitraghnaṃ paravāraṇavāraṇam
वहाँ परम राजशोभा से युक्त उस शूरवीर को देखा, जो अपने यश को बढ़ाने वाला, इन्द्र के समान, शत्रुओं का नाशक और शत्रुओं के हाथियों को रोक देने वाला था।
श्लोक 10 (1.90.10)
पश्यन्तः स्त्रीगणास्तत्र वज्रपाणिं स्म मेनिरे । अयं स पुरुषव्याघ्रो रणे वसुपराक्रमः ॥
paśyantaḥ strīgaṇāstatra vajrapāṇiṃ sma menire | ayaṃ sa puruṣavyāghro raṇe vasuparākramaḥ
उसे देखती हुई स्त्रियों की टोलियों ने उसे वज्रधारी इन्द्र ही मान लिया। 'यही वह पुरुषव्याघ्र है, जो रण में वसुओं के समान पराक्रमी है,'
श्लोक 11 (1.90.11)
यस्य बाहुबलं प्राप्य न भवन्त्यसुहृद्गणाः । इति वाचो ब्रुवन्त्यस्ताः स्त्रियः प्रेम्णा नराधिपम् ॥
yasya bāhubalaṃ prāpya na bhavantyasuhṛdgaṇāḥ | iti vāco bruvantyastāḥ striyaḥ premṇā narādhipam
'जिसके बाहुबल से टकराकर शत्रुओं के दल शेष नहीं रहते।' ऐसी बातें कहती हुई उन स्त्रियों ने प्रेमपूर्वक राजा की
श्लोक 12 (1.90.12)
तुष्टुवुः पुष्पवृष्टीश्च ससृजुस्तस्य मूर्धनि । तत्रतत्र च विप्रेन्द्रैः स्तूयमानः समन्ततः ॥
tuṣṭuvuḥ puṣpavṛṣṭīśca sasṛjustasya mūrdhani | tatratatra ca viprendraiḥ stūyamānaḥ samantataḥ
स्तुति की और उसके मस्तक पर फूल बरसाए। जगह-जगह श्रेष्ठ ब्राह्मणों द्वारा सब ओर से प्रशंसित होता हुआ
श्लोक 13 (1.90.13)
निर्ययौ परमप्रीत्या वनं मृगजिघांसया । तं देवराजप्रतिमं मत्तवारणधूर्गतम् ॥
niryayau paramaprītyā vanaṃ mṛgajighāṃsayā | taṃ devarājapratimaṃ mattavāraṇadhūrgatam
वह मृगया की इच्छा से अत्यन्त प्रसन्न होकर वन की ओर निकला। देवराज इन्द्र के समान, मतवाले हाथी पर आरूढ़ होकर निकलते हुए उस राजा के
श्लोक 14 (1.90.14)
द्विजक्षत्रियविट्शूद्रा निर्यान्तमनुजग्मिरे । ददृशुर्वर्धमानास्ते आशीर्भिश्च जयेन च ॥
dvijakṣatriyaviṭśūdrā niryāntamanujagmire | dadṛśurvardhamānāste āśīrbhiśca jayena ca
पीछे-पीछे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र चले; उन्होंने उसे देखा और आशीर्वादों तथा जयघोष से उसका उत्साह बढ़ाया।
श्लोक 15 (1.90.15)
सुदूरमनुजग्मुस्तं पौरजानपदास्तथा । न्यवर्तन्त ततः पश्चादनुज्ञाता नृपेण ह ॥
sudūramanujagmustaṃ paurajānapadāstathā | nyavartanta tataḥ paścādanujñātā nṛpeṇa ha
नगर और जनपद के लोग बहुत दूर तक उसके पीछे गए, फिर राजा की अनुमति पाकर लौट आए।
श्लोक 16 (1.90.16)
सुपर्णप्रतिमेनाथ रथेन वसुधाधिपः । महीमापूरयामास घोषेण त्रिदिवं तथा ॥
suparṇapratimenātha rathena vasudhādhipaḥ | mahīmāpūrayāmāsa ghoṣeṇa tridivaṃ tathā
तब वह पृथ्वीपति गरुड़ के समान रथ पर सवार होकर उसके घोष से पृथ्वी और स्वर्ग को भी भरता हुआ चला।
श्लोक 17 (1.90.17)
स गच्छन्ददृशे धीमान्नन्दनप्रतिमं वनम् । बिल्वार्कखदिराकीर्णं कपित्थधवसंकुलम् ॥
sa gacchandadṛśe dhīmānnandanapratimaṃ vanam | bilvārkakhadirākīrṇaṃ kapitthadhavasaṃkulam
जाते हुए उस बुद्धिमान राजा ने नन्दन वन के समान एक वन देखा, जो बेल, आक और खैर के वृक्षों से भरा तथा कैथ और धव के पेड़ों से घना था।
श्लोक 18 (1.90.18)
विषमं पर्वतस्रस्तैरश्मभिश्च समावृतम् । निर्जलं निर्मनुष्यं च बहुयोजनमायतम् ॥
viṣamaṃ parvatasrastairaśmabhiśca samāvṛtam | nirjalaṃ nirmanuṣyaṃ ca bahuyojanamāyatam
वह ऊबड़-खाबड़ था, पर्वतों से गिरी चट्टानों से भरा, जलहीन और निर्जन था, और अनेक योजनों तक फैला हुआ था।
श्लोक 19 (1.90.19)
मृगसिंहैर्वृतं घोरैरन्यैश्चापि वनेचरैः । तद्वनं मनुजव्याघ्रः सभृत्यबलवाहनः ॥
mṛgasiṃhairvṛtaṃ ghorairanyaiścāpi vanecaraiḥ | tadvanaṃ manujavyāghraḥ sabhṛtyabalavāhanaḥ
वह भयंकर मृगों, सिंहों और अन्य वनचरों से भरा था। मनुष्यों में व्याघ्र के समान उस राजा ने अपने सेवकों, सेना और वाहनों के साथ
श्लोक 20 (1.90.20)
लोडयामास दुष्यन्तः सूदयन्विविधान्मृगान् । बाणगोचरसंप्राप्तांस्तत्र व्याघ्रगणान्बहून् ॥
loḍayāmāsa duṣyantaḥ sūdayanvividhānmṛgān | bāṇagocarasaṃprāptāṃstatra vyāghragaṇānbahūn
उस वन को मथ डाला; दुष्यन्त अनेक प्रकार के पशुओं का संहार करता गया। बाणों की पहुँच में आए बाघों के बहुत से झुंडों को
श्लोक 21 (1.90.21)
पातयामास दुष्यन्तो निर्बिभेद च सायकैः । दूरस्थान्सायकैः कांश्चिदभिनत्स नराधिपः ॥
pātayāmāsa duṣyanto nirbibheda ca sāyakaiḥ | dūrasthānsāyakaiḥ kāṃścidabhinatsa narādhipaḥ
दुष्यन्त ने अपने बाणों से बेधकर गिरा दिया। कुछ दूर खड़े पशुओं को उस नरेश ने बाणों से भेद डाला;
श्लोक 22 (1.90.22)
अभ्याशमागतांश्चान्यान्खड्गेन निरकृन्तत । कांश्चिदेणान्समाजघ्ने शक्त्या शक्तिमतां वरः ॥
abhyāśamāgatāṃścānyānkhaḍgena nirakṛntata | kāṃścideṇānsamājaghne śaktyā śaktimatāṃ varaḥ
और पास आ गए दूसरों को तलवार से काट डाला। शक्ति चलाने वालों में श्रेष्ठ उस राजा ने कुछ हिरनों को शक्ति से मार गिराया।
श्लोक 23 (1.90.23)
गदामण्डलतत्त्वज्ञश्चचारामितविक्रमः । तोमरैरसिभिश्चापि गदामुसलकम्पनैः ॥
gadāmaṇḍalatattvajñaścacārāmitavikramaḥ | tomarairasibhiścāpi gadāmusalakampanaiḥ
गदा घुमाने की कला का मर्मज्ञ, अपार पराक्रमी वह वन में विचरता रहा। तोमरों, तलवारों, गदाओं, मूसलों और कम्पनों से
श्लोक 24 (1.90.24)
चचार स विनिघ्नन्वै वन्यांस्तत्र मृगद्विजान् । राज्ञा चाद्भुतवीर्येण योधैश्च समरप्रियैः ॥
cacāra sa vinighnanvai vanyāṃstatra mṛgadvijān | rājñā cādbhutavīryeṇa yodhaiśca samarapriyaiḥ
वह वहाँ वन के पशु-पक्षियों का संहार करता हुआ घूमता रहा। अद्भुत पराक्रमी राजा और युद्धप्रिय योद्धाओं द्वारा
श्लोक 25 (1.90.25)
लोड्यमानं महारण्यं तत्यजुः स्म मृगाधिपाः । तत्र विद्रुतयूथानि हतयूथपतीनि च ॥
loḍyamānaṃ mahāraṇyaṃ tatyajuḥ sma mṛgādhipāḥ | tatra vidrutayūthāni hatayūthapatīni ca
मथे जाते उस महावन को सिंहों ने छोड़ दिया। जिनके झुंड बिखरकर भाग रहे थे और जिनके यूथपति मारे जा चुके थे, वे
श्लोक 26 (1.90.26)
मृगयूथान्यथौत्सुक्याच्छब्दं चक्रुस्ततस्ततः । शुष्काश्चापि नदीर्गत्वा जलनैराश्यकर्शिताः ॥
mṛgayūthānyathautsukyācchabdaṃ cakrustatastataḥ | śuṣkāścāpi nadīrgatvā jalanairāśyakarśitāḥ
मृगों के झुंड व्याकुल होकर इधर-उधर चीत्कार करने लगे। सूखी नदियों तक पहुँचकर, जल न पाने की निराशा से दुर्बल,
श्लोक 27 (1.90.27)
व्यायामक्लान्तहृदयाः पतन्ति स्म विचेतसः । क्षुत्पिपासापरीताश्च श्रान्ताश्च पतिता भुवि ॥
vyāyāmaklāntahṛdayāḥ patanti sma vicetasaḥ | kṣutpipāsāparītāśca śrāntāśca patitā bhuvi
थकान से टूटे हृदय वाले वे पशु अचेत होकर गिर पड़ते थे। भूख-प्यास से घिरे और थके हुए वे धरती पर गिरे पड़े थे।
श्लोक 28 (1.90.28)
केचित्तत्र नरव्याघ्रैरभक्ष्यन्त बुभुक्षितैः । केचिदग्निमथोत्पाद्य संसाध्य च वनेचराः ॥
kecittatra naravyāghrairabhakṣyanta bubhukṣitaiḥ | kecidagnimathotpādya saṃsādhya ca vanecarāḥ
उनमें से कुछ को वहाँ भूखे, व्याघ्र-जैसे वीर पुरुषों ने खा लिया। कुछ वनवासियों ने आग जलाकर मांस पकाया
श्लोक 29 (1.90.29)
भक्षयन्ति स्म मांसानि प्रकुट्य विधिवत्तदा । तत्र केचिद्गजा मत्ता बलिनः शस्त्रविक्षताः ॥
bhakṣayanti sma māṃsāni prakuṭya vidhivattadā | tatra kecidgajā mattā balinaḥ śastravikṣatāḥ
और उसे विधिपूर्वक काटकर खाया। वहाँ कुछ मतवाले, बलवान हाथी शस्त्रों से घायल होकर
श्लोक 30 (1.90.30)
संकोच्याग्रकरान्भीताः प्राद्रवन्ति स्म वेगिताः । शकृन्मूत्रं सृजन्तश्च क्षरन्तः शोणितं बहु ॥
saṃkocyāgrakarānbhītāḥ prādravanti sma vegitāḥ | śakṛnmūtraṃ sṛjantaśca kṣarantaḥ śoṇitaṃ bahu
भय से अपनी सूँड़ों के अगले सिरे सिकोड़कर बड़े वेग से भागने लगे; वे मल-मूत्र त्यागते और बहुत सा रक्त बहाते जा रहे थे।
श्लोक 31 (1.90.31)
वन्या गजवरास्तत्र ममृदुर्मनुजान्बहून् । तद्वनं बलमेघेन शरधारेण संवृतम् । व्यरोचत मृगाकीर्णं राज्ञा हतमृगाधिपम् ॥
vanyā gajavarāstatra mamṛdurmanujānbahūn | tadvanaṃ balameghena śaradhāreṇa saṃvṛtam | vyarocata mṛgākīrṇaṃ rājñā hatamṛgādhipam
वहाँ वन के बड़े-बड़े हाथियों ने बहुत से मनुष्यों को कुचल डाला। सेना-रूपी मेघ और बाणों की धारा से ढका, मृगों से भरा और राजा द्वारा मारे गए सिंहों वाला वह वन शोभा पा रहा था।