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आदि पर्व · अध्याय 99

शकुन्तला का दुष्यन्त को उत्तर

शकुन्तला दुष्यन्त के अपमानजनक वचनों का उत्तर देती है। वह मेनका से हुए अपने जन्म का पक्ष रखती है, दूसरों में केवल दोष देखने वाले मूर्खों की चर्चा करती है, और पुत्र की महिमा तथा उसे कभी न त्यागने के धर्म का वर्णन करती है। सबसे बढ़कर वह सत्य की प्रशंसा करती है, जो सहस्र अश्वमेध यज्ञों से भी भारी है, और राजा से कहती है कि उसके बिना भी उसका पुत्र पृथ्वी पर राज करेगा। अपने पक्ष में बोलने वाला कोई साक्षी न पाकर वह पुत्र के साथ लौट चलती है; उसके क्रोध से उत्पन्न धुएँ वाली अग्नि उसके सिर के ऊपर दिखाई देती है।

अध्याय 98अध्याय-सूचीअध्याय 100

शकुन्तलोवाच

श्लोक 1 (1.99.1)

राजन्सर्षपमात्राणि परच्छिद्राणि पश्यसि । आत्मनो बिल्वमात्राणि पश्यन्नपि न पश्यसि ॥

rājansarṣapamātrāṇi paracchidrāṇi paśyasi | ātmano bilvamātrāṇi paśyannapi na paśyasi

हे राजन्, आप दूसरों के सरसों के दाने जितने छोटे दोष भी देख लेते हैं, किन्तु अपने बेल के फल जितने बड़े दोषों को देखते हुए भी नहीं देखते।

श्लोक 2 (1.99.2)

मेनका त्रिदशेष्वेव त्रिदशाश्चानु मेनकाम् । ममैवोद्रिच्यते जन्म दुष्यन्त तव जन्मतः ॥

menakā tridaśeṣveva tridaśāścānu menakām | mamaivodricyate janma duṣyanta tava janmataḥ

मेनका देवताओं में गिनी जाती है और देवता मेनका का आदर करते हैं। इसलिए हे दुष्यन्त, मेरा जन्म आपके जन्म से कहीं ऊँचा है।

श्लोक 3 (1.99.3)

क्षितौ चरसि राजंस्त्वमन्तरिक्षे चराम्यहम् । आवयोरन्तरं पश्य मेरुसर्षपयोरिव ॥

kṣitau carasi rājaṃstvamantarikṣe carāmyaham | āvayorantaraṃ paśya merusarṣapayoriva

हे राजन्, आप पृथ्वी पर विचरते हैं और मैं आकाश में विचरती हूँ। हम दोनों का अंतर देखिए — वह मेरु पर्वत और सरसों के दाने जैसा है।

श्लोक 4 (1.99.4)

महेन्द्रस्य कुबेरस्य यमस्य वरुणस्य च । भवनान्यनुसंयामि प्रभावं पश्य मे नृप ॥

mahendrasya kuberasya yamasya varuṇasya ca | bhavanānyanusaṃyāmi prabhāvaṃ paśya me nṛpa

मैं महेन्द्र, कुबेर, यम और वरुण के भवनों में आती-जाती हूँ। हे नृप, मेरा प्रभाव देखिए।

श्लोक 5 (1.99.5)

पुरा नरवरः पुत्र उर्वश्यां जनितस्तदा । आयुर्नाम महाराज तव पूर्वपितामहः ॥

purā naravaraḥ putra urvaśyāṃ janitastadā | āyurnāma mahārāja tava pūrvapitāmahaḥ

बहुत पहले उर्वशी से आयु नामक श्रेष्ठ पुत्र उत्पन्न हुआ था; हे महाराज, वही आपके पूर्व-पितामह हैं।

श्लोक 6 (1.99.6)

महर्षयश्च बहवः क्षत्रियाश्च परन्तपाः । अप्सरःसु ऋषीणां च मातृदोषो न विद्यते ॥

maharṣayaśca bahavaḥ kṣatriyāśca parantapāḥ | apsaraḥsu ṛṣīṇāṃ ca mātṛdoṣo na vidyate

इसी प्रकार अनेक महर्षि और शत्रुओं को संतप्त करने वाले क्षत्रिय भी जन्मे हैं। अप्सराओं और ऋषियों के विषय में माता का कोई दोष नहीं माना जाता।

श्लोक 7 (1.99.7)

सत्यश्चापि प्रवादोऽयं प्रवक्ष्यामि च ते नृप । निदर्शनार्थं न द्वेषाच्छ्रुत्वा तत्क्षन्तुमर्हसि ॥

satyaścāpi pravādo'yaṃ pravakṣyāmi ca te nṛpa | nidarśanārthaṃ na dveṣācchrutvā tatkṣantumarhasi

हे नृप, एक सच्ची कहावत भी है, जिसे मैं आपको उदाहरण के लिए सुनाती हूँ, द्वेष से नहीं। उसे सुनकर आप मुझे क्षमा करें।

श्लोक 8 (1.99.8)

विरूपो यावदादर्शे नात्मनो वीक्षते मुखम् । मन्यते तावदात्मानमन्येभ्यो रूपवत्तरम् ॥

virūpo yāvadādarśe nātmano vīkṣate mukham | manyate tāvadātmānamanyebhyo rūpavattaram

कुरूप मनुष्य जब तक दर्पण में अपना मुँह नहीं देखता, तब तक वह स्वयं को दूसरों से अधिक रूपवान समझता है।

श्लोक 9 (1.99.9)

यदा तु रूपमादर्शे विरूपं सोऽभिवीक्षते । तदा ह्रीमांस्तु जानीयादन्तरं नेतरं जनम् ॥

yadā tu rūpamādarśe virūpaṃ so'bhivīkṣate | tadā hrīmāṃstu jānīyādantaraṃ netaraṃ janam

किन्तु जब वह दर्पण में अपना विकृत रूप देख लेता है, तब यदि उसमें लज्जा हो तो वह अंतर को अपने भीतर पहचानता है, दूसरों में नहीं।

श्लोक 10 (1.99.10)

अतीव रूपसंपन्नो न कंचिदवमन्यते । अतीव जल्पन्दुर्वाचो भवतीह विहेतुकः ॥

atīva rūpasaṃpanno na kaṃcidavamanyate | atīva jalpandurvāco bhavatīha vihetukaḥ

जो सचमुच रूपवान होता है, वह किसी का तिरस्कार नहीं करता; पर जो बहुत बकवाद करता है और कटु बोलता है, वह इस संसार में अकारण निन्दा करने वाला बन जाता है।

श्लोक 11 (1.99.11)

पांसुपातेन हृष्यन्ति कुञ्जरा मदशालिनः । तथा परिवदन्नन्यान्हृष्टो भवति दुर्मतिः ॥

pāṃsupātena hṛṣyanti kuñjarā madaśālinaḥ | tathā parivadannanyānhṛṣṭo bhavati durmatiḥ

जैसे मदमत्त हाथी अपने ऊपर धूल डालकर प्रसन्न होते हैं, वैसे ही दुर्बुद्धि मनुष्य दूसरों की निन्दा करके प्रसन्न होता है।

श्लोक 12 (1.99.12)

सत्यधर्मच्युतात्पुंसः क्रुद्धादाशीविषादिव । सुनास्तिकोऽप्युद्विजते जनः किं पुनरास्तिकः ॥

satyadharmacyutātpuṃsaḥ kruddhādāśīviṣādiva | sunāstiko'pyudvijate janaḥ kiṃ punarāstikaḥ

सत्य और धर्म से गिरे हुए मनुष्य से तो पक्का नास्तिक भी ऐसे डरता है जैसे क्रुद्ध विषैले सर्प से; फिर आस्तिक का तो कहना ही क्या!

श्लोक 13 (1.99.13)

स्वयमुत्पाद्य पुत्रं वै सदृशं योऽवमन्यते । तस्य देवाः श्रियं घ्नन्ति तत्रैनं कलिराविशेत् ॥

svayamutpādya putraṃ vai sadṛśaṃ yo'vamanyate | tasya devāḥ śriyaṃ ghnanti tatrainaṃ kalirāviśet

जो स्वयं अपने समान पुत्र उत्पन्न करके फिर उसका तिरस्कार करता है, देवता उसकी लक्ष्मी नष्ट कर देते हैं और उसमें कलि प्रवेश कर जाता है।

श्लोक 14 (1.99.14)

अभव्येऽप्यनृतेऽशुद्धे नास्तिके पापकर्मणि । दुराचारे कलिर्ह्याशु न कलिर्धर्मचारिषु ॥

abhavye'pyanṛte'śuddhe nāstike pāpakarmaṇi | durācāre kalirhyāśu na kalirdharmacāriṣu

अभागे, असत्यवादी, अपवित्र, नास्तिक, पापकर्मी और दुराचारी मनुष्य को कलि शीघ्र पकड़ लेता है; धर्म का आचरण करने वालों पर कलि का वश नहीं चलता।

श्लोक 15 (1.99.15)

मूर्खो हि जल्पतां पुंसां श्रुत्वा वाचः शुभाशुभाः । अशुभं वाक्यमादत्ते पुरीषमिव सूकरः ॥

mūrkho hi jalpatāṃ puṃsāṃ śrutvā vācaḥ śubhāśubhāḥ | aśubhaṃ vākyamādatte purīṣamiva sūkaraḥ

मूर्ख मनुष्य लोगों की भली-बुरी बातें सुनकर उनमें से बुरी बात को ही ग्रहण करता है, जैसे सूअर मल को।

श्लोक 16 (1.99.16)

प्राज्ञस्तु जल्पतां पुंसां श्रुत्वा वाचः शुभाशुभाः । गुणवद्वाक्यमादत्ते हंसः क्षीरमिवाम्भसि ॥

prājñastu jalpatāṃ puṃsāṃ śrutvā vācaḥ śubhāśubhāḥ | guṇavadvākyamādatte haṃsaḥ kṣīramivāmbhasi

पर बुद्धिमान मनुष्य लोगों की भली-बुरी बातें सुनकर उनमें से गुणयुक्त बात को ही ग्रहण करता है, जैसे हंस जल में से दूध को।

श्लोक 17 (1.99.17)

आत्मनो दुष्टभावत्वं जानन्नीचोऽप्रसन्नधीः । परेषामपि जानाति स्वधर्मसदृशान्गुणान् ॥

ātmano duṣṭabhāvatvaṃ jānannīco'prasannadhīḥ | pareṣāmapi jānāti svadharmasadṛśānguṇān

अशान्त चित्त वाला नीच मनुष्य अपनी दुष्टता को जानता है, इसलिए दूसरों में भी वह अपने ही स्वभाव जैसे गुणों की कल्पना करता है।

श्लोक 18 (1.99.18)

दह्यमानास्तु तीव्रेण नीचाः परयशोऽग्निना । अशक्तास्तद्गतिं गन्तुं ततो निन्दां प्रकुर्वते ॥

dahyamānāstu tīvreṇa nīcāḥ parayaśo'gninā | aśaktāstadgatiṃ gantuṃ tato nindāṃ prakurvate

दूसरे के यश की तीव्र अग्नि में जलते हुए और स्वयं उस ऊँचाई तक पहुँचने में असमर्थ होकर नीच लोग तब निन्दा करने लगते हैं।

श्लोक 19 (1.99.19)

अन्यान्परिवदन्साधुर्यथा हि परितप्यते । तथा परिवदन्नन्यान्हृष्टो भवति दुर्जनः ॥

anyānparivadansādhuryathā hi paritapyate | tathā parivadannanyānhṛṣṭo bhavati durjanaḥ

जैसे सज्जन दूसरों की निन्दा करके दुखी होता है, वैसे ही दुर्जन दूसरों की निन्दा करके प्रसन्न होता है।

श्लोक 20 (1.99.20)

अपवादरता मूर्खा भवन्ति हि विशेषतः । नापवादरताः सन्तो भवन्ति स्म विशेषतः ॥

apavādaratā mūrkhā bhavanti hi viśeṣataḥ | nāpavādaratāḥ santo bhavanti sma viśeṣataḥ

मूर्ख विशेष रूप से निन्दा में रस लेते हैं, और सज्जन विशेष रूप से निन्दा से दूर रहते हैं।

श्लोक 21 (1.99.21)

अभिवाद्य यथा वृद्धान्साधुर्गच्छति निर्वृतिम् । एवं सज्जनमाक्रुश्य मूर्खो भवति निर्वृतः ॥

abhivādya yathā vṛddhānsādhurgacchati nirvṛtim | evaṃ sajjanamākruśya mūrkho bhavati nirvṛtaḥ

जैसे सज्जन बड़ों को प्रणाम करके संतोष पाता है, वैसे ही मूर्ख सज्जन को गाली देकर संतोष पाता है।

श्लोक 22 (1.99.22)

सुखं जीवन्त्यदोषज्ञा मूर्खा दोषानुदर्शिनः । यथा वाच्याः परैः सन्तः परानाहुस्तथाविधान् ॥

sukhaṃ jīvantyadoṣajñā mūrkhā doṣānudarśinaḥ | yathā vācyāḥ paraiḥ santaḥ parānāhustathāvidhān

जो दोष नहीं खोजते वे सुख से जीते हैं, जबकि मूर्ख सदा दोष ही देखते रहते हैं। सज्जन दूसरों के विषय में वैसा ही कहते हैं जैसा दूसरों द्वारा स्वयं उनके विषय में कहा जाना उचित है।

श्लोक 23 (1.99.23)

अतो हास्यतरं लोके किंचिदन्यन्न विद्यते । यदि दुर्जन इत्याहुः सज्जनं दुर्जनाः स्वयम् ॥

ato hāsyataraṃ loke kiṃcidanyanna vidyate | yadi durjana ityāhuḥ sajjanaṃ durjanāḥ svayam

संसार में इससे बढ़कर हास्यास्पद बात और कोई नहीं कि दुर्जन स्वयं किसी सज्जन को दुर्जन कहें।

श्लोक 24 (1.99.24)

दारुणाल्लोकसंक्लेशाद्दुःखमाप्नोत्यसंशयम् । कुलवंशप्रतिष्ठां हि पितरः पुत्रमब्रुवन् ॥

dāruṇāllokasaṃkleśādduḥkhamāpnotyasaṃśayam | kulavaṃśapratiṣṭhāṃ hi pitaraḥ putramabruvan

संसार के ऐसे कठोर क्लेश से मनुष्य निःसंदेह दुःख पाता है। पितरों ने कहा है कि पुत्र कुल और वंश की प्रतिष्ठा है,

श्लोक 25 (1.99.25)

उत्तमं सर्वधर्माणां तस्मात्पुत्रं तु न त्यजेत् । स्वपत्नीप्रभवाँल्लब्धान्कृतान्समयवर्धितान् ॥

uttamaṃ sarvadharmāṇāṃ tasmātputraṃ tu na tyajet | svapatnīprabhavām̐llabdhānkṛtānsamayavardhitān

सब धर्मों में उत्तम है; इसलिए पुत्र का त्याग कभी नहीं करना चाहिए। अपनी पत्नी से उत्पन्न, प्राप्त किए हुए, बनाए हुए, समझौते से पाले हुए,

श्लोक 26 (1.99.26)

क्रीतान्कन्यासु चोत्पन्नान्पुत्रान्वै मनुरब्रवीत् । ते च षड्बन्धुदायादाः षडदायादबान्धवाः ॥

krītānkanyāsu cotpannānputrānvai manurabravīt | te ca ṣaḍbandhudāyādāḥ ṣaḍadāyādabāndhavāḥ

खरीदे हुए, और कुमारी कन्याओं से उत्पन्न — इन सबको मनु ने पुत्र कहा है। इनमें छह बन्धु भी हैं और दायाद (उत्तराधिकारी) भी, और छह बन्धु तो हैं पर दायाद नहीं।

श्लोक 27 (1.99.27)

धर्मकृत्यवहा नॄणां मनसः प्रीतिवर्धनाः । त्रायन्ते नरकाज्जाताः पुत्रा धर्मप्लवाः पितॄन् ॥

dharmakṛtyavahā nṝṇāṃ manasaḥ prītivardhanāḥ | trāyante narakājjātāḥ putrā dharmaplavāḥ pitṝn

पुत्र मनुष्यों के धर्म-कार्यों का निर्वाह करते हैं और मन की प्रसन्नता बढ़ाते हैं। जन्म लेकर वे धर्म की नौका बनकर पितरों को नरक से तार देते हैं।

श्लोक 28 (1.99.28)

स त्वं नृपतिशार्दूल न पुत्रं त्यक्तुमर्हसि । तस्मात्पुत्रं च सत्यं च पालयस्व महीपते ॥

sa tvaṃ nṛpatiśārdūla na putraṃ tyaktumarhasi | tasmātputraṃ ca satyaṃ ca pālayasva mahīpate

इसलिए हे नृपश्रेष्ठ, आपको अपने पुत्र का त्याग नहीं करना चाहिए। हे पृथ्वीपति, अपने पुत्र और सत्य दोनों की रक्षा कीजिए।

श्लोक 29 (1.99.29)

उभयं पालयस्वैतन्नानृतं वक्तुमर्हसि । आत्मानं सत्यधर्मौ च पालयेथा महीपते । नरेन्द्रसिंह कपटं न हि वोढुं त्वमर्हसि ॥

ubhayaṃ pālayasvaitannānṛtaṃ vaktumarhasi | ātmānaṃ satyadharmau ca pālayethā mahīpate | narendrasiṃha kapaṭaṃ na hi voḍhuṃ tvamarhasi

इन दोनों की रक्षा कीजिए; आपको असत्य नहीं बोलना चाहिए। हे महीपति, अपनी, सत्य की और धर्म की रक्षा कीजिए। हे नरेन्द्रसिंह, आपको कपट का भार नहीं उठाना चाहिए।

श्लोक 30 (1.99.30)

वरं कूपशताद्वापी वरं वापीशतात्क्रतुः । वरं क्रतुशतात्पुत्रः सत्यं पुत्रशताद्वरम् ॥

varaṃ kūpaśatādvāpī varaṃ vāpīśatātkratuḥ | varaṃ kratuśatātputraḥ satyaṃ putraśatādvaram

सौ कुओं से एक बावड़ी श्रेष्ठ है, सौ बावड़ियों से एक यज्ञ, सौ यज्ञों से एक पुत्र, और सौ पुत्रों से सत्य श्रेष्ठ है।

श्लोक 31 (1.99.31)

अश्वमेधसहस्रं च सत्यं च तुलया धृतम् । अश्वमेधसहस्राद्धि सत्यमेव विशिष्यते ॥

aśvamedhasahasraṃ ca satyaṃ ca tulayā dhṛtam | aśvamedhasahasrāddhi satyameva viśiṣyate

सहस्र अश्वमेध यज्ञ और सत्य को तराज़ू पर तौला गया, तो सहस्र अश्वमेधों से सत्य ही भारी निकला।

श्लोक 32 (1.99.32)

सर्ववेदाधिगमनं सर्वतीर्थावगाहनम् । सत्यस्यैव च राजेन्द्र कलां नार्हति षोडशीम् ॥

sarvavedādhigamanaṃ sarvatīrthāvagāhanam | satyasyaiva ca rājendra kalāṃ nārhati ṣoḍaśīm

हे राजेन्द्र, समस्त वेदों का अध्ययन और सभी तीर्थों में स्नान भी सत्य के सोलहवें अंश के बराबर नहीं है।

श्लोक 33 (1.99.33)

नास्ति सत्यसमो धर्मो न सत्याद्विद्यते परम् । न हि तीव्रतरं पापमनृतादिह विद्यते ॥

nāsti satyasamo dharmo na satyādvidyate param | na hi tīvrataraṃ pāpamanṛtādiha vidyate

सत्य के समान कोई धर्म नहीं, सत्य से बढ़कर कुछ भी नहीं; और इस संसार में असत्य से अधिक भयंकर कोई पाप नहीं।

श्लोक 34 (1.99.34)

राजन्सत्यं परो धर्मः सत्याच्च समयः परः । मात्याक्षीः समयं राजन्सत्यं सङ्गतमस्तु ते ॥

rājansatyaṃ paro dharmaḥ satyācca samayaḥ paraḥ | mātyākṣīḥ samayaṃ rājansatyaṃ saṅgatamastu te

हे राजन्, सत्य परम धर्म है और सत्य से ही श्रेष्ठ प्रतिज्ञा उत्पन्न होती है। हे राजन्, अपनी प्रतिज्ञा मत छोड़िए; सत्य सदा आपके साथ रहे।

श्लोक 35 (1.99.35)

यः पापो न विजानीयात्कर्म कृत्वा नराधिप । न हि तादृक्परं पापमनृतादिह विद्यते ॥

yaḥ pāpo na vijānīyātkarma kṛtvā narādhipa | na hi tādṛkparaṃ pāpamanṛtādiha vidyate

हे नराधिप, जो पापी कोई कर्म करके फिर उसे स्वीकार नहीं करता — ऐसे असत्य से बढ़कर इस संसार में कोई पाप नहीं।

श्लोक 36 (1.99.36)

यस्य ते हृदयं वेद सत्यस्यैवानृतस्य च । कल्याणावेक्षणं तस्मात्कर्तुमर्हसि धर्मतः ॥

yasya te hṛdayaṃ veda satyasyaivānṛtasya ca | kalyāṇāvekṣaṇaṃ tasmātkartumarhasi dharmataḥ

आपका हृदय जानता है कि क्या सत्य है और क्या असत्य। इसलिए आपको धर्म के अनुसार कल्याणकारी मार्ग पर ही दृष्टि रखनी चाहिए।

श्लोक 37 (1.99.37)

यो न कामान्न च क्रोधान्न द्रोहादतिवर्तते । अमित्रं वापि मित्रं वा स एवोत्तमपूरुषः ॥

yo na kāmānna ca krodhānna drohādativartate | amitraṃ vāpi mitraṃ vā sa evottamapūruṣaḥ

जो काम, क्रोध या द्रोह के कारण मर्यादा का उल्लंघन नहीं करता, चाहे सामने शत्रु हो या मित्र — वही उत्तम पुरुष है।

श्लोक 38 (1.99.38)

अनृतश्चेत्प्रसङ्गस्ते श्रद्दधासि न चेत्स्वयम् । आश्रमं गन्तुमिच्छामि त्वादृशो नास्ति सङ्गतम् ॥

anṛtaścetprasaṅgaste śraddadhāsi na cetsvayam | āśramaṃ gantumicchāmi tvādṛśo nāsti saṅgatam

यदि आप असत्य पर ही अड़े हैं और स्वयं मेरी बात पर विश्वास नहीं करते, तो मैं आश्रम लौट जाना चाहती हूँ; आप जैसे व्यक्ति के साथ कोई संबंध नहीं निभ सकता।

श्लोक 39 (1.99.39)

पुत्रत्वे शङ्कमानस्य त्वं बुद्ध्या निश्चयं कुरु । गतिः स्वरः स्मृतिः सत्त्वं शीलं विद्या च विक्रमः ॥

putratve śaṅkamānasya tvaṃ buddhyā niścayaṃ kuru | gatiḥ svaraḥ smṛtiḥ sattvaṃ śīlaṃ vidyā ca vikramaḥ

यदि आपको इसके पुत्र होने में संदेह है, तो अपनी बुद्धि से निर्णय कीजिए। चाल, स्वर, स्मृति, स्वभाव का बल, शील, विद्या और पराक्रम,

श्लोक 40 (1.99.40)

धृष्णुप्रकृतिभावौ च आवर्ता रोमराजयः । समा यस्य यदा स्युस्ते तस्य पुत्रो न संशयः ॥

dhṛṣṇuprakṛtibhāvau ca āvartā romarājayaḥ | samā yasya yadā syuste tasya putro na saṃśayaḥ

साहसी प्रकृति और भाव, बालों के भँवर और रोमावलियाँ — जब ये किसी में समान हों, तो वह निःसंदेह उसी का पुत्र है।

श्लोक 41 (1.99.41)

सादृश्येनोद्धृतं बिम्बं तव देहाद्विशांपते । तातेति भाषमाणं वै मा स्म राजन्वृथा कृथाः ॥

sādṛśyenoddhṛtaṃ bimbaṃ tava dehādviśāṃpate | tāteti bhāṣamāṇaṃ vai mā sma rājanvṛthā kṛthāḥ

हे प्रजापालक, यह आपके ही शरीर से निकला हुआ आपका प्रतिबिम्ब है, जो आपको "तात" कहकर पुकार रहा है। हे राजन्, इसे व्यर्थ मत कीजिए।

श्लोक 42 (1.99.42)

ऋते च गर्दभीक्षीरात्पयः पास्यति मे सुतः । ऋतेऽपि त्वां च दुष्यन्त शैलराजावतंसिकाम् । चतुरन्तामिमामुर्वीं पुत्रो मे पालयिष्यति ॥

ṛte ca gardabhīkṣīrātpayaḥ pāsyati me sutaḥ | ṛte'pi tvāṃ ca duṣyanta śailarājāvataṃsikām | caturantāmimāmurvīṃ putro me pālayiṣyati

गधी के दूध के बिना भी मेरा पुत्र दूध पी लेगा। और हे दुष्यन्त, आपके बिना भी मेरा पुत्र पर्वतराज जिसके मुकुट हैं, उस चारों दिशाओं तक फैली पृथ्वी का पालन करेगा।

श्लोक 43 (1.99.43)

शकुन्तले तव सुतश्चक्रवर्ती भविष्यति । एवमुक्तं महेन्द्रेण भविष्यति न चान्यथा ॥

śakuntale tava sutaścakravartī bhaviṣyati | evamuktaṃ mahendreṇa bhaviṣyati na cānyathā

"शकुन्तले, तुम्हारा पुत्र चक्रवर्ती सम्राट होगा" — ऐसा महेन्द्र ने कहा है; वैसा ही होगा, अन्यथा नहीं।

श्लोक 44 (1.99.44)

साक्षित्वे बहवो ह्युक्ता देवदूतादयो मया । न ब्रुवन्ति तथा सत्यमुताहो नानृतं किल ॥

sākṣitve bahavo hyuktā devadūtādayo mayā | na bruvanti tathā satyamutāho nānṛtaṃ kila

मैंने देवदूतों और अन्य अनेक को साक्षी बनने के लिए पुकारा है, पर वे कुछ नहीं बोलते — न सत्य, न असत्य।

श्लोक 45 (1.99.45)

असाक्षिणी मन्दभाग्या गमिष्यामि यथागतम् ॥

asākṣiṇī mandabhāgyā gamiṣyāmi yathāgatam

बिना किसी साक्षी के, मैं अभागिन जैसे आई थी वैसे ही लौट जाऊँगी।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 46 (1.99.46)

एतावदुक्त्वा वचनं प्रातिष्ठत शकुन्तला । तस्याः क्रोधसमुत्थोऽग्निः सधूमो मूर्ध्न्यदृश्यत ॥

etāvaduktvā vacanaṃ prātiṣṭhata śakuntalā | tasyāḥ krodhasamuttho'gniḥ sadhūmo mūrdhnyadṛśyata

इतना कहकर शकुन्तला चल पड़ी। उसके क्रोध से उत्पन्न धुएँ से युक्त अग्नि उसके सिर के ऊपर दिखाई दी।

श्लोक 47 (1.99.47)

संनियम्यात्मनोऽङ्गेषु ततः क्रोधाग्निमात्मजम् । प्रस्थितैवानवद्याङ्गी सह पुत्रेण वै वनम् ॥

saṃniyamyātmano'ṅgeṣu tataḥ krodhāgnimātmajam | prasthitaivānavadyāṅgī saha putreṇa vai vanam

फिर अपने ही भीतर से उठी क्रोधाग्नि को अपने अंगों में रोककर वह निर्दोष अंगों वाली स्त्री अपने पुत्र के साथ वन की ओर चल दी।

अध्याय 98अध्याय-सूचीअध्याय 100