आदि पर्व · अध्याय 98
दुष्यन्त के सामने शकुन्तला की याचना
जब दुष्यन्त उससे कभी मिलने की बात से ही मुकर जाते हैं, तब क्रोध से जलती शकुन्तला उन्हें याद दिलाती है कि उनका अपना हृदय और देवता सत्य के साक्षी हैं, और पत्नी की पवित्रता तथा पुत्र के महत्त्व पर विस्तार से बोलती है — पुत्र पिता का ही आत्मा है जो फिर से जन्म लेता है। वह विश्वामित्र और अप्सरा मेनका से अपने जन्म, पक्षियों द्वारा अपनी रक्षा, कण्व द्वारा अपने पालन और दोनों के गान्धर्व विवाह का वृत्तान्त सुनाकर उनसे अपने पुत्र को न त्यागने की विनती करती है। दुष्यन्त उसकी बात पर विश्वास नहीं करते, उसके माता-पिता और उसके चरित्र का अपमान करते हैं, और कहते हैं कि जो धन चाहिए ले लो और चली जाओ।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (1.98.1)
एवमुक्ता वरारोहा व्रीडितेव मनस्विनी । विसंज्ञेव च दुःखेन तस्थौ स्थूणेव निश्चला ॥
evamuktā varārohā vrīḍiteva manasvinī | visaṃjñeva ca duḥkhena tasthau sthūṇeva niścalā
ऐसा कहे जाने पर वह सुन्दरी, मनस्विनी स्त्री मानो लज्जित-सी और दुःख से मानो संज्ञाहीन-सी होकर खम्भे की भाँति निश्चल खड़ी रह गई।
श्लोक 2 (1.98.2)
संरम्भामर्षताम्राक्षी स्फुरमाणोष्ठसंपुटा । कटाक्षैर्निर्दहन्तीव तिर्यग्राजानमैक्षत ॥
saṃrambhāmarṣatāmrākṣī sphuramāṇoṣṭhasaṃpuṭā | kaṭākṣairnirdahantīva tiryagrājānamaikṣata
क्रोध और अमर्ष से उसकी आँखें लाल हो गईं, होंठ फड़कने लगे, और वह राजा को तिरछी दृष्टि से ऐसे देखने लगी मानो अपने कटाक्षों से उसे भस्म कर देगी।
श्लोक 3 (1.98.3)
आकारं गूहमाना च मन्युना च समीरितम् । तपसा संभृतं तेजो धारयामास वै तदा ॥
ākāraṃ gūhamānā ca manyunā ca samīritam | tapasā saṃbhṛtaṃ tejo dhārayāmāsa vai tadā
अपने मनोभावों को छिपाते हुए उसने तप से संचित उस तेज को रोके रखा, जिसे क्रोध ने उभार दिया था।
श्लोक 4 (1.98.4)
सा मुहूर्तमिव ध्यात्वा दुःखामर्षसमन्विता । भर्तारमभिसंप्रेक्ष्य यथान्यायं वचोऽब्रवीत् ॥
sā muhūrtamiva dhyātvā duḥkhāmarṣasamanvitā | bhartāramabhisaṃprekṣya yathānyāyaṃ vaco'bravīt
दुःख और अमर्ष से भरी वह क्षण-भर सोचती-सी रही, फिर अपने पति की ओर देखकर उचित रीति से बोली।
शकुन्तलोवाच
श्लोक 5 (1.98.5)
जानन्नपि महाराज कस्मादेवं प्रभाषसे । न जानामीति निःशङ्कं यथान्यः प्राकृतस्तथा ॥
jānannapi mahārāja kasmādevaṃ prabhāṣase | na jānāmīti niḥśaṅkaṃ yathānyaḥ prākṛtastathā
महाराज, सब जानते हुए भी आप ऐसा क्यों कहते हैं? किसी साधारण मनुष्य की भाँति निःशंक होकर कहते हैं कि "मैं नहीं जानता"!
श्लोक 6 (1.98.6)
तस्य ते हृदयं वेद सत्यस्यैवानृतस्य च । साक्षिणं बत कल्याणमात्मानमवमन्यसे ॥
tasya te hṛdayaṃ veda satyasyaivānṛtasya ca | sākṣiṇaṃ bata kalyāṇamātmānamavamanyase
इस विषय में क्या सत्य है और क्या असत्य, यह आपका हृदय जानता है। खेद है कि आप अपनी ही आत्मा का, जो आपकी कल्याणकारी साक्षी है, अपमान कर रहे हैं।
श्लोक 7 (1.98.7)
योऽन्यथा सन्तमात्मानमन्यथा प्रतिपद्यते । किं तेन न कृतं पापं चोरेणात्मापहारिणा ॥
yo'nyathā santamātmānamanyathā pratipadyate | kiṃ tena na kṛtaṃ pāpaṃ coreṇātmāpahāriṇā
जो अपने वास्तविक स्वरूप को छिपाकर स्वयं को कुछ और प्रकट करता है, अपनी ही आत्मा को चुराने वाले उस चोर ने कौन-सा पाप नहीं किया?
श्लोक 8 (1.98.8)
एकोऽहमस्मीति च मन्यसे त्वं । न हृच्छयं वेत्सि मुनिं पुराणम् । यो वेदिता कर्मणः पापकस्य । तस्यान्तिके त्वं वृजिनं करोषि ॥
eko'hamasmīti ca manyase tvaṃ | na hṛcchayaṃ vetsi muniṃ purāṇam | yo veditā karmaṇaḥ pāpakasya | tasyāntike tvaṃ vṛjinaṃ karoṣi
आप सोचते हैं कि "मैं अकेला हूँ", पर हृदय में बसे उस पुरातन मुनि को आप नहीं जानते। वह हर पापकर्म को जानता है, और उसी के सामने आप यह पाप कर रहे हैं।
श्लोक 9 (1.98.9)
धर्म एव हि साधूनां सर्वेषां हितकारणम् । नित्यं मिथ्याविहीनानां न च दुःखावहो भवेत् ॥
dharma eva hi sādhūnāṃ sarveṣāṃ hitakāraṇam | nityaṃ mithyāvihīnānāṃ na ca duḥkhāvaho bhavet
सभी सत्पुरुषों के लिए धर्म ही हित का कारण है; जो सदा असत्य से दूर रहते हैं, उन्हें वह कभी दुःख नहीं देता।
श्लोक 10 (1.98.10)
मन्यते पापकं कृत्वा न कश्चिद्वेत्ति मामिति । विदन्ति चैनं देवाश्च यश्चैवान्तरपूरुषः ॥
manyate pāpakaṃ kṛtvā na kaścidvetti māmiti | vidanti cainaṃ devāśca yaścaivāntarapūruṣaḥ
पाप करके मनुष्य सोचता है कि "मुझे कोई नहीं जानता", पर देवता उसे जानते हैं और भीतर बसा अन्तर्यामी पुरुष भी जानता है।
श्लोक 11 (1.98.11)
आदित्यचन्द्रावनिलोऽनलश्च । द्यौर्भूमिरापो हृदयं यमश्च । अहश्च रात्रिश्च उभे च सन्ध्ये । धर्मश्च जानाति नरस्य वृत्तम् ॥
ādityacandrāvanilo'nalaśca | dyaurbhūmirāpo hṛdayaṃ yamaśca | ahaśca rātriśca ubhe ca sandhye | dharmaśca jānāti narasya vṛttam
सूर्य और चन्द्रमा, वायु और अग्नि, आकाश, पृथ्वी और जल, हृदय और यम, दिन और रात, दोनों संध्याएँ और धर्म — ये सब मनुष्य के आचरण को जानते हैं।
श्लोक 12 (1.98.12)
यमो वैवस्वतस्तस्य निर्यातयति दुष्कृतम् । हृदि स्थितः कर्मसाक्षी क्षेत्रज्ञो यस्य तुष्यति ॥
yamo vaivasvatastasya niryātayati duṣkṛtam | hṛdi sthitaḥ karmasākṣī kṣetrajño yasya tuṣyati
हृदय में स्थित, कर्मों का साक्षी क्षेत्रज्ञ जिस पर प्रसन्न रहता है, उसके दुष्कर्मों को विवस्वान् के पुत्र यम मिटा देते हैं।
श्लोक 13 (1.98.13)
न तुष्यति च यस्यैष पुरुषस्य दुरात्मनः । तं यमः पापकर्माणं निर्भर्त्सयति दुष्कृतम् ॥
na tuṣyati ca yasyaiṣa puruṣasya durātmanaḥ | taṃ yamaḥ pāpakarmāṇaṃ nirbhartsayati duṣkṛtam
किन्तु जिस दुष्टात्मा पुरुष पर यह अन्तःसाक्षी प्रसन्न नहीं रहता, उस पापकर्मी को यम उसके दुष्कर्मों के लिए धिक्कारते हैं।
श्लोक 14 (1.98.14)
योऽवमत्यात्मनात्मानमन्यथा प्रतिपद्यते । न तस्य देवाः श्रेयांसो यस्यात्मापि न कारणम् ॥
yo'vamatyātmanātmānamanyathā pratipadyate | na tasya devāḥ śreyāṃso yasyātmāpi na kāraṇam
जो अपनी ही आत्मा की अवहेलना करके स्वयं को कुछ और प्रकट करता है, देवता भी उसका भला नहीं करते, क्योंकि उसकी अपनी आत्मा भी उसका साथ नहीं देती।
श्लोक 15 (1.98.15)
स्वयं प्राप्तेति मामेवं मावमंस्था पतिव्रताम् । अर्चार्हां नार्चयसि मां स्वयं भार्यामुपस्थिताम् ॥
svayaṃ prāpteti māmevaṃ māvamaṃsthā pativratām | arcārhāṃ nārcayasi māṃ svayaṃ bhāryāmupasthitām
मैं स्वयं चली आई हूँ, इसलिए मुझ पतिव्रता का इस प्रकार अपमान न कीजिए। मैं आदर के योग्य हूँ, आपकी पत्नी हूँ और स्वयं आपके पास आई हूँ, फिर भी आप मेरा सत्कार नहीं करते।
श्लोक 16 (1.98.16)
किमर्थं मां प्राकृतवदुपप्रेक्षसि संसदि । नखल्वहमिदं शून्ये रौमि किं न शृणोषि मे ॥
kimarthaṃ māṃ prākṛtavadupaprekṣasi saṃsadi | nakhalvahamidaṃ śūnye raumi kiṃ na śṛṇoṣi me
इस सभा में आप मुझे किसी साधारण स्त्री की भाँति क्यों अनदेखा कर रहे हैं? मैं किसी सूने वन में तो विलाप नहीं कर रही हूँ। क्या आप मेरी बात नहीं सुनते?
श्लोक 17 (1.98.17)
यदि मे याचमानाया वचनं न करिष्यसि । दुष्यन्त शतधा त्वद्य मूर्धा ते विफलिष्यति ॥
yadi me yācamānāyā vacanaṃ na kariṣyasi | duṣyanta śatadhā tvadya mūrdhā te viphaliṣyati
दुष्यन्त, यदि आप मेरी याचना सुनकर भी मेरी बात नहीं मानेंगे, तो आज ही आपके सिर के सौ टुकड़े हो जाएँगे।
श्लोक 18 (1.98.18)
जायां पतिः संप्रविश्य यदस्यां जायते पुनः । जायायास्तद्धि जायात्वं पौराणाः कवयो विदुः ॥
jāyāṃ patiḥ saṃpraviśya yadasyāṃ jāyate punaḥ | jāyāyāstaddhi jāyātvaṃ paurāṇāḥ kavayo viduḥ
पति पत्नी में प्रवेश करके उसी से फिर जन्म लेता है। प्राचीन कवि जानते हैं कि इसी कारण पत्नी "जाया" कहलाती है।
श्लोक 19 (1.98.19)
यदागमवतः पुंसस्तदपत्यं प्रजायते । तत्तारयति संतत्या पूर्वप्रेतान्पितामहान् ॥
yadāgamavataḥ puṃsastadapatyaṃ prajāyate | tattārayati saṃtatyā pūrvapretānpitāmahān
शास्त्रज्ञ पुरुष की जो संतान उत्पन्न होती है, वह वंश को आगे बढ़ाकर पहले मर चुके पितरों और पितामहों का उद्धार करती है।
श्लोक 20 (1.98.20)
पुन्नाम्नो नरकाद्यस्मात्पितरं त्रायते सुतः । तस्मात्पुत्र इति प्रोक्तः पूर्वमेव स्वयंभुवा ॥
punnāmno narakādyasmātpitaraṃ trāyate sutaḥ | tasmātputra iti proktaḥ pūrvameva svayaṃbhuvā
क्योंकि पुत्र पिता को "पुत्" नामक नरक से बचाता है, इसलिए स्वयम्भू ने पहले ही उसे "पुत्र" कहा।
श्लोक 21 (1.98.21)
पुत्रेण लोकाञ्जयन्ति पौत्रेणानन्त्यमश्नुते । अथ पौत्रस्य पुत्रेण मोदन्ते प्रपितामहाः ॥
putreṇa lokāñjayanti pautreṇānantyamaśnute | atha pautrasya putreṇa modante prapitāmahāḥ
पुत्र से मनुष्य लोकों को जीतते हैं, पौत्र से अनन्त गति प्राप्त होती है, और पौत्र के पुत्र से प्रपितामह आनन्दित होते हैं।
श्लोक 22 (1.98.22)
सा भार्या या गृहे दक्षा सा भार्या या प्रजावती । सा भार्या या पतिप्राणा सा भार्या या पतिव्रता ॥
sā bhāryā yā gṛhe dakṣā sā bhāryā yā prajāvatī | sā bhāryā yā patiprāṇā sā bhāryā yā pativratā
पत्नी वही है जो घर के कामों में दक्ष हो, पत्नी वही है जो संतानवती हो, पत्नी वही है जिसके प्राण पति में बसते हों, पत्नी वही है जो पतिव्रता हो।
श्लोक 23 (1.98.23)
अर्धं भार्या मनुष्यस्य भार्या श्रेष्ठतमः सखा । भार्या मूलं त्रिवर्गस्य यः सभार्यः स बन्धुमान् ॥
ardhaṃ bhāryā manuṣyasya bhāryā śreṣṭhatamaḥ sakhā | bhāryā mūlaṃ trivargasya yaḥ sabhāryaḥ sa bandhumān
पत्नी पुरुष का आधा अंग है, पत्नी उसकी सबसे श्रेष्ठ सखा है, पत्नी धर्म, अर्थ और काम — तीनों की जड़ है; जिसके पत्नी है, वही बन्धुओं वाला है।
श्लोक 24 (1.98.24)
भार्यावन्तः क्रियावन्तः सभार्या गृहमेधिनः । भार्यावन्तः प्रमोदन्ते भार्यावन्तः श्रियावृताः ॥
bhāryāvantaḥ kriyāvantaḥ sabhāryā gṛhamedhinaḥ | bhāryāvantaḥ pramodante bhāryāvantaḥ śriyāvṛtāḥ
पत्नी वाले ही यज्ञ आदि कर्म कर पाते हैं, पत्नी वाले ही गृहस्थ हैं, पत्नी वाले ही आनन्द पाते हैं और पत्नी वाले ही लक्ष्मी से सम्पन्न होते हैं।
श्लोक 25 (1.98.25)
सखायः प्रविविक्तेषु भवन्त्येताः प्रियंवदाः । पितरो धर्मकार्येषु भवन्त्यार्तस्य मातरः ॥
sakhāyaḥ pravivikteṣu bhavantyetāḥ priyaṃvadāḥ | pitaro dharmakāryeṣu bhavantyārtasya mātaraḥ
एकान्त में ये मधुरभाषिणी स्त्रियाँ सखा होती हैं, धर्म-कार्यों में पिता के समान और दुःखी के लिए माता के समान होती हैं।
श्लोक 26 (1.98.26)
कान्तारेष्वपि विश्रामो जनस्याध्वनिकस्य वै । यः सदारः स विश्वास्यस्तस्माद्दाराः परा गतिः ॥
kāntāreṣvapi viśrāmo janasyādhvanikasya vai | yaḥ sadāraḥ sa viśvāsyastasmāddārāḥ parā gatiḥ
बीहड़ वन में भी राह चलते मनुष्य के लिए वह विश्राम है। जिसके साथ पत्नी हो, उस पर लोग विश्वास करते हैं; इसलिए पत्नी ही परम आश्रय है।
श्लोक 27 (1.98.27)
संसरन्तमभिप्रेतं विषमेष्वेकपातिनम् । भार्यैवान्वेति भर्तारं सततं या पतिव्रता ॥
saṃsarantamabhipretaṃ viṣameṣvekapātinam | bhāryaivānveti bhartāraṃ satataṃ yā pativratā
जब प्रिय पति संसार में भटकता है और अकेला ही विषम स्थितियों में गिरता है, तब सदा पतिव्रता रहने वाली पत्नी ही उसके पीछे-पीछे जाती है।
श्लोक 28 (1.98.28)
प्रथमं संस्थिता भार्या पतिं प्रेत्य प्रतीक्षते । पूर्वप्रेतं तु भर्तारं पश्चात्साप्यनुगच्छति ॥
prathamaṃ saṃsthitā bhāryā patiṃ pretya pratīkṣate | pūrvapretaṃ tu bhartāraṃ paścātsāpyanugacchati
यदि पत्नी पहले मर जाए तो वह परलोक में पति की प्रतीक्षा करती है, और यदि पति पहले मरे तो वह बाद में उसके पीछे जाती है।
श्लोक 29 (1.98.29)
एतस्मात्कारणाद्राजन्पाणिग्रहणमिष्यते । यदाप्नोति पतिर्भार्यामिह लोके परत्र च ॥
etasmātkāraṇādrājanpāṇigrahaṇamiṣyate | yadāpnoti patirbhāryāmiha loke paratra ca
राजन्, इसी कारण विवाह की कामना की जाती है, क्योंकि पति इस लोक में और परलोक में भी पत्नी को पाता है।
श्लोक 30 (1.98.30)
पोषणार्थं शरीरस्य पाथेयं स्वर्गतस्य वै । आत्माऽऽत्मनैव जनितः पुत्र इत्युच्यते बुधैः ॥
poṣaṇārthaṃ śarīrasya pātheyaṃ svargatasya vai | ātmā''tmanaiva janitaḥ putra ityucyate budhaiḥ
वह शरीर का पोषण है और स्वर्ग जाने वाले के लिए मार्ग का पाथेय है। विद्वान कहते हैं कि अपने से अपना ही आत्मा जो जन्म लेता है, वही पुत्र कहलाता है।
श्लोक 31 (1.98.31)
तस्माद्भार्यां पतिः पश्येन्मातृवत्पुत्रमातरम् । अन्तरात्मैव सर्वस्य पुत्रो नामोच्यते सदा ॥
tasmādbhāryāṃ patiḥ paśyenmātṛvatputramātaram | antarātmaiva sarvasya putro nāmocyate sadā
इसलिए पति को अपने पुत्र की माता को माता के समान देखना चाहिए। सबका अन्तरात्मा ही सदा पुत्र नाम से कहा जाता है।
श्लोक 32 (1.98.32)
गती रूपं च चेष्टा च आवर्ता लक्षणानि च । पितॄणां यानि दृश्यन्ते पुत्राणां सन्ति तानि च ॥
gatī rūpaṃ ca ceṣṭā ca āvartā lakṣaṇāni ca | pitṝṇāṃ yāni dṛśyante putrāṇāṃ santi tāni ca
पिताओं में जो चाल, रूप, चेष्टाएँ, भँवरियाँ और शारीरिक लक्षण दिखाई देते हैं, वे पुत्रों में भी होते हैं।
श्लोक 33 (1.98.33)
तेषां शीलगुणाचारास्तत्संपर्काच्छुभाशुभात् । भार्यायां जनितं पुत्रमादर्शे स्वमिवाननम् ॥
teṣāṃ śīlaguṇācārāstatsaṃparkācchubhāśubhāt | bhāryāyāṃ janitaṃ putramādarśe svamivānanam
उनका शील, गुण और आचार भी उसी संसर्ग से, शुभ या अशुभ, आता है। पत्नी से उत्पन्न पुत्र को, दर्पण में अपने ही मुख की भाँति,
श्लोक 34 (1.98.34)
जनिता मोदते प्रेक्ष्य स्वर्गं प्राप्येव पुण्यकृत् । पतिव्रतारूपधराः परबीजस्य संग्रहात् ॥
janitā modate prekṣya svargaṃ prāpyeva puṇyakṛt | pativratārūpadharāḥ parabījasya saṃgrahāt
देखकर पिता वैसे ही आनन्दित होता है जैसे पुण्यात्मा स्वर्ग पाकर। जो स्त्रियाँ पतिव्रता का रूप धारण करके पराए पुरुष का बीज ग्रहण करती हैं,
श्लोक 35 (1.98.35)
कुलं विनाश्य भर्तॄणां नरकं यान्ति दारुणम् । परेण जनिताः पुत्राः स्वभार्यायां यथेष्टतः ॥
kulaṃ vināśya bhartṝṇāṃ narakaṃ yānti dāruṇam | pareṇa janitāḥ putrāḥ svabhāryāyāṃ yatheṣṭataḥ
वे पतियों के कुल का नाश करके भयंकर नरक में जाती हैं। दूसरे पुरुष के द्वारा अपनी पत्नी से मनमाने ढंग से उत्पन्न किए गए पुत्र,
श्लोक 36 (1.98.36)
मम पुत्रा इति मतास्ते पुत्रा अपि शत्रवः । द्विषन्ति प्रतिकुर्वन्ति न ते वचनंकारिणः ॥
mama putrā iti matāste putrā api śatravaḥ | dviṣanti pratikurvanti na te vacanaṃkāriṇaḥ
भले ही "मेरे पुत्र" माने जाएँ, पुत्र होकर भी शत्रु होते हैं। वे उससे द्वेष करते हैं, उसका विरोध करते हैं और उसकी बात नहीं मानते।
श्लोक 37 (1.98.37)
द्वेष्टि तांश्च पिता चापि स्वबीजे न तथा नृप । न द्वेष्टि पितरं पुत्रो जनितारमथापि वा ॥
dveṣṭi tāṃśca pitā cāpi svabīje na tathā nṛpa | na dveṣṭi pitaraṃ putro janitāramathāpi vā
राजन्, पिता भी उनसे द्वेष करता है, जैसा वह अपने बीज से उत्पन्न संतान से नहीं करता। पुत्र अपने पिता से, अपने जन्मदाता से द्वेष नहीं करता,
श्लोक 38 (1.98.38)
न द्वेष्टि जनिता पुत्रं तस्मादात्मा सुतो भवेत् । दह्यमाना मनोदुःखैर्व्याधिभिस्तुमुलैर्जनः ॥
na dveṣṭi janitā putraṃ tasmādātmā suto bhavet | dahyamānā manoduḥkhairvyādhibhistumulairjanaḥ
और न जन्मदाता पुत्र से द्वेष करता है; इसलिए पुत्र अपना ही आत्मा है। मन के दुःखों और भीषण रोगों से जलते हुए मनुष्य
श्लोक 39 (1.98.39)
ह्लादन्ते स्वेषु दारेषु घर्मार्ताः सलिलेष्विव । विप्रवासकृशा दीना नरा मलिनवाससः ॥
hlādante sveṣu dāreṣu gharmārtāḥ salileṣviva | vipravāsakṛśā dīnā narā malinavāsasaḥ
अपनी पत्नियों के पास वैसे ही सुख पाते हैं जैसे धूप से तपे लोग जल में। परदेस में रहकर दुबले, दीन और मैले वस्त्रों वाले मनुष्य भी
श्लोक 40 (1.98.40)
तेऽपि स्वदारांस्तुष्यन्ति दरिद्रा धनलाभवत् । अप्रियोक्तोऽपि दाराणां न ब्रूयादप्रियं बुधः ॥
te'pi svadārāṃstuṣyanti daridrā dhanalābhavat | apriyokto'pi dārāṇāṃ na brūyādapriyaṃ budhaḥ
अपनी पत्नियों को पाकर वैसे ही सन्तुष्ट होते हैं जैसे दरिद्र धन पाकर। बुद्धिमान पुरुष पत्नी के अप्रिय बोलने पर भी उससे अप्रिय न बोले,
श्लोक 41 (1.98.41)
रतिं प्रीतिं च धर्मं च तदायत्तमवेक्ष्य च । आत्मनोऽर्धमिति श्रौतं सा रक्षति धनं प्रजाः ॥
ratiṃ prītiṃ ca dharmaṃ ca tadāyattamavekṣya ca | ātmano'rdhamiti śrautaṃ sā rakṣati dhanaṃ prajāḥ
यह देखकर कि रति, प्रीति और धर्म उसी के अधीन हैं। श्रुति कहती है कि पत्नी अपना ही आधा भाग है; वह धन और संतान की रक्षा करती है,
श्लोक 42 (1.98.42)
शरीरं लोकयात्रां वै धर्मं स्वर्गमृषीन्पितॄन् । आत्मनो जन्मनः क्षेत्रं पुण्या रामाः सनातनाः ॥
śarīraṃ lokayātrāṃ vai dharmaṃ svargamṛṣīnpitṝn | ātmano janmanaḥ kṣetraṃ puṇyā rāmāḥ sanātanāḥ
शरीर, लोक-व्यवहार, धर्म, स्वर्ग, ऋषियों और पितरों की भी। स्त्रियाँ अपने ही जन्म का पवित्र, सनातन क्षेत्र हैं।
श्लोक 43 (1.98.43)
ऋषीणामपि का शक्तिः स्रष्टुं रामामृते प्रजाः । देवानामपि का शक्तिः कर्तुं संभवमात्मनः ॥
ṛṣīṇāmapi kā śaktiḥ sraṣṭuṃ rāmāmṛte prajāḥ | devānāmapi kā śaktiḥ kartuṃ saṃbhavamātmanaḥ
स्त्री के बिना संतान उत्पन्न करने की शक्ति ऋषियों में भी कहाँ है? अपना जन्म कराने की शक्ति देवताओं में भी कहाँ है?
श्लोक 44 (1.98.44)
पण्डितस्यापि लोकेषु स्त्रीषु सृष्टिः प्रतिष्ठिता । ऋषिभ्यो ह्यृषयः केचिच्चण्डालीष्वपि जज्ञिरे ॥
paṇḍitasyāpi lokeṣu strīṣu sṛṣṭiḥ pratiṣṭhitā | ṛṣibhyo hyṛṣayaḥ keciccaṇḍālīṣvapi jajñire
विद्वानों के लिए भी संसार में सृष्टि स्त्रियों पर ही टिकी है। कुछ ऋषि तो ऋषियों से चाण्डाल स्त्रियों के गर्भ में भी उत्पन्न हुए।
श्लोक 45 (1.98.45)
परिसृत्य यथा सूनुर्धरणीरेणुकुण्ठितः । पितुरालिङ्गतेऽङ्गानि किमस्त्यभ्यधिकं ततः ॥
parisṛtya yathā sūnurdharaṇīreṇukuṇṭhitaḥ | piturāliṅgate'ṅgāni kimastyabhyadhikaṃ tataḥ
जब पुत्र धरती की धूल से सना हुआ सरकता हुआ आकर पिता के अंगों से लिपट जाता है, तो उससे बढ़कर और क्या हो सकता है?
श्लोक 46 (1.98.46)
स त्वं सूनुमनुप्राप्तं साभिलाषं मनस्विनम् । प्रेक्षमाणं कटाक्षेण किमर्थमवमन्यसे ॥
sa tvaṃ sūnumanuprāptaṃ sābhilāṣaṃ manasvinam | prekṣamāṇaṃ kaṭākṣeṇa kimarthamavamanyase
तो फिर आप अपने पास आए इस तेजस्वी पुत्र का, जो लालसा से आपको कनखियों से निहार रहा है, अपमान क्यों कर रहे हैं?
श्लोक 47 (1.98.47)
अण्डानि बिभ्रति स्वानि न त्यजन्ति पिपीलिकाः । किं पुनस्त्वं न मन्येथाः सर्वथा पुत्रमीदृशम् ॥
aṇḍāni bibhrati svāni na tyajanti pipīlikāḥ | kiṃ punastvaṃ na manyethāḥ sarvathā putramīdṛśam
चींटियाँ भी अपने अंडों को उठाए फिरती हैं, उन्हें छोड़ती नहीं; फिर आप ऐसे पुत्र को हर प्रकार से क्यों नहीं अपनाते?
श्लोक 48 (1.98.48)
न भरेथाः कथं नु त्वं मयि जातं स्वमात्मजम् । ममाण्डानीति वर्धन्ते कोकिलाण्डानि वायसाः ॥
na bharethāḥ kathaṃ nu tvaṃ mayi jātaṃ svamātmajam | mamāṇḍānīti vardhante kokilāṇḍāni vāyasāḥ
मुझसे उत्पन्न अपने ही पुत्र का भरण-पोषण आप कैसे नहीं करेंगे? कौए भी "ये मेरे अंडे हैं" यह मानकर कोयल के अंडों को पालते हैं;
श्लोक 49 (1.98.49)
किं पुनस्त्वं न मन्येथाः सर्वज्ञः पुत्रमीदृशम् । मलयाच्चन्दनं जातमतिशीतं वदन्ति वै ॥
kiṃ punastvaṃ na manyethāḥ sarvajñaḥ putramīdṛśam | malayāccandanaṃ jātamatiśītaṃ vadanti vai
फिर आप तो सर्वज्ञ हैं, ऐसे पुत्र को क्यों नहीं अपनाते? कहते हैं कि मलय पर्वत पर उत्पन्न चन्दन अत्यन्त शीतल होता है,
श्लोक 50 (1.98.50)
शिशोरालिङ्गनं तस्माच्चन्दनादधिकं भवेत् । न वाससां न रामाणां नापां स्पर्शस्तथाविधः ॥
śiśorāliṅganaṃ tasmāccandanādadhikaṃ bhavet | na vāsasāṃ na rāmāṇāṃ nāpāṃ sparśastathāvidhaḥ
पर शिशु का आलिंगन उस चन्दन से भी अधिक शीतल है। वस्त्रों का, स्त्रियों का या जल का स्पर्श भी वैसा सुखद नहीं होता
श्लोक 51 (1.98.51)
शिशुनालिङ्ग्यमानस्य स्पर्शः सूनोर्यथा सुखः । पुत्रस्पर्शात्प्रियतरः स्पर्शो लोके न विद्यते ॥
śiśunāliṅgyamānasya sparśaḥ sūnoryathā sukhaḥ | putrasparśātpriyataraḥ sparśo loke na vidyate
जैसा शिशु के आलिंगन में बँधे पिता को अपने पुत्र का स्पर्श सुख देता है। पुत्र के स्पर्श से अधिक प्रिय स्पर्श संसार में कोई नहीं।
श्लोक 52 (1.98.52)
स्पृशतु त्वां समालिङ्ग्य पुत्रोऽयं प्रियदर्शनः । ब्राह्मणो द्विपदां श्रेष्ठो गौर्वरिष्ठा चतुष्पदाम् ॥
spṛśatu tvāṃ samāliṅgya putro'yaṃ priyadarśanaḥ | brāhmaṇo dvipadāṃ śreṣṭho gaurvariṣṭhā catuṣpadām
यह प्रियदर्शन पुत्र आपको गले लगाकर आपका स्पर्श करे। दो पैरों वालों में ब्राह्मण श्रेष्ठ है, चार पैरों वालों में गाय,
श्लोक 53 (1.98.53)
गुरुर्गरीयसां श्रेष्ठः पुत्रः स्पर्शवतां वरः । त्रिषु वर्षेषु पूर्णेषु प्रजातोऽयमरिन्दमः ॥
gururgarīyasāṃ śreṣṭhaḥ putraḥ sparśavatāṃ varaḥ | triṣu varṣeṣu pūrṇeṣu prajāto'yamarindamaḥ
पूज्यों में गुरु श्रेष्ठ है और स्पर्श के योग्य वस्तुओं में पुत्र। पूरे तीन वर्ष बीतने पर यह शत्रुदमन बालक उत्पन्न हुआ था।
श्लोक 54 (1.98.54)
अद्यायं मन्नियोगात्तु तवाह्वानं प्रतीक्षते । कुमारो राजशार्दूल तव शोकप्रणाशनः ॥
adyāyaṃ manniyogāttu tavāhvānaṃ pratīkṣate | kumāro rājaśārdūla tava śokapraṇāśanaḥ
हे राजश्रेष्ठ, आज मेरी आज्ञा से यह कुमार, जो आपके शोक का नाश करने वाला है, आपके बुलावे की प्रतीक्षा कर रहा है।
श्लोक 55 (1.98.55)
आहर्ता वाजिमेधस्य शतसङ्ख्यस्य पौरवः । राजसूयादिकानन्यान्क्रतूनमितदक्षिणान् ॥
āhartā vājimedhasya śatasaṅkhyasya pauravaḥ | rājasūyādikānanyānkratūnamitadakṣiṇān
"यह पौरव सौ अश्वमेध यज्ञ करेगा, और राजसूय आदि अन्य यज्ञ भी, जिनमें अपार दक्षिणा दी जाएगी" —
श्लोक 56 (1.98.56)
इति गौरन्तरिक्षे मां सूतके ह्यवदत्पुरा । हन्त स्वमङ्कमारोप्य स्नेहाद्ग्रामान्तरं गताः ॥
iti gaurantarikṣe māṃ sūtake hyavadatpurā | hanta svamaṅkamāropya snehādgrāmāntaraṃ gatāḥ
यह बात बहुत पहले, प्रसव के समय, आकाशवाणी ने मुझसे कही थी। अहो, दूसरे गाँव से लौटकर मनुष्य स्नेह से अपने पुत्रों को गोद में उठाते हैं,
श्लोक 57 (1.98.57)
मूर्ध्नि पुत्रानुपाघ्राय प्रतिनन्दन्ति मानवाः । वेदेष्वपि वदन्तीमं मन्त्रग्रामं द्विजातयः ॥
mūrdhni putrānupāghrāya pratinandanti mānavāḥ | vedeṣvapi vadantīmaṃ mantragrāmaṃ dvijātayaḥ
उनका सिर सूँघते हैं और आनन्दित होते हैं। द्विज भी वेदों का यह मन्त्र-समूह पढ़ते हैं,
श्लोक 58 (1.98.58)
जातकर्मणि पुत्राणां तवापि विदितं ध्रुवम् । अङ्गादङ्गात्संभवसि हृदयादधिजायसे ॥
jātakarmaṇi putrāṇāṃ tavāpi viditaṃ dhruvam | aṅgādaṅgātsaṃbhavasi hṛdayādadhijāyase
पुत्रों के जातकर्म संस्कार में — यह आपको भी निश्चय ही विदित है: "तुम अंग-अंग से उत्पन्न होते हो, हृदय से जन्म लेते हो;
श्लोक 59 (1.98.59)
आत्मा वै पुत्रनामासि स जीव शरदः शतम् । उपजिघ्रन्ति पितरो मन्त्रेणानेन मूर्धनि ॥
ātmā vai putranāmāsi sa jīva śaradaḥ śatam | upajighranti pitaro mantreṇānena mūrdhani
तुम पुत्र नाम वाले मेरे ही आत्मा हो, सौ शरद् ऋतुओं तक जियो।" इसी मन्त्र से पिता पुत्रों का सिर सूँघते हैं।
श्लोक 60 (1.98.60)
पोषणं त्वदधीनं मे सन्तानमपि चाक्षयम् । तस्मात्त्वं जीव मे पुत्र स सुखी शरदां शतम् ॥
poṣaṇaṃ tvadadhīnaṃ me santānamapi cākṣayam | tasmāttvaṃ jīva me putra sa sukhī śaradāṃ śatam
"मेरा पोषण तुम्हारे अधीन है और मेरी अक्षय संतति भी; इसलिए हे पुत्र, तुम सुखी रहकर सौ वर्ष जियो।"
श्लोक 61 (1.98.61)
एको भूत्वा द्विधा भूत इति वादः प्रवर्तते । त्वदङ्गेभ्यः प्रसूतोऽयं पुरुषात्पुरुषः परः ॥
eko bhūtvā dvidhā bhūta iti vādaḥ pravartate | tvadaṅgebhyaḥ prasūto'yaṃ puruṣātpuruṣaḥ paraḥ
"एक होकर वह दो हो गया" — ऐसी उक्ति प्रचलित है। यह बालक आपके अंगों से उत्पन्न हुआ है, पुरुष से दूसरा पुरुष।
श्लोक 62 (1.98.62)
सरसीवामलेऽऽत्मानं द्वितीयं पश्य ते सुतम् । सरसीवामले सोमं प्रेक्षात्मानं त्वमात्मनि ॥
sarasīvāmale''tmānaṃ dvitīyaṃ paśya te sutam | sarasīvāmale somaṃ prekṣātmānaṃ tvamātmani
निर्मल सरोवर में अपने प्रतिबिम्ब की भाँति अपने पुत्र को अपना दूसरा आत्मा जानकर देखिए। जैसे निर्मल सरोवर में चन्द्रमा दिखता है, वैसे ही अपने में अपने आप को देखिए।
श्लोक 63 (1.98.63)
यथाचाहवनीयोऽग्निर्गार्हपत्यात्प्रणीयते । एवं त्वत्तः प्रणीतोऽयं त्वमेकः सन्द्विधा कृतः ॥
yathācāhavanīyo'gnirgārhapatyātpraṇīyate | evaṃ tvattaḥ praṇīto'yaṃ tvamekaḥ sandvidhā kṛtaḥ
जैसे आहवनीय अग्नि गार्हपत्य अग्नि से निकालकर ले जाई जाती है, वैसे ही यह आपसे उत्पन्न हुआ है; आप एक होकर भी दो हो गए हैं।
श्लोक 64 (1.98.64)
मृगापकृष्टेन हि वै मृगयां परिधावता । अहमासादिता राजन्कुमारी पितुराश्रमे ॥
mṛgāpakṛṣṭena hi vai mṛgayāṃ paridhāvatā | ahamāsāditā rājankumārī piturāśrame
राजन्, जब आप मृग के पीछे खिंचे हुए शिकार में दौड़ रहे थे, तब आपने मुझ कुमारी को मेरे पिता के आश्रम में पाया था।
श्लोक 65 (1.98.65)
उर्वशी पूर्वचित्तिश्च सहजन्या च मेनका । विश्वाची च घृताची च षडेवाप्सरसां वराः ॥
urvaśī pūrvacittiśca sahajanyā ca menakā | viśvācī ca ghṛtācī ca ṣaḍevāpsarasāṃ varāḥ
उर्वशी, पूर्वचित्ति, सहजन्या, मेनका, विश्वाची और घृताची — ये छह अप्सराओं में श्रेष्ठ हैं।
श्लोक 66 (1.98.66)
तासां वै मेनका नाम ब्रह्मयोनिर्वराप्सराः । दिवः संप्राप्य जगतीं विश्वामित्रादजीजनत् ॥
tāsāṃ vai menakā nāma brahmayonirvarāpsarāḥ | divaḥ saṃprāpya jagatīṃ viśvāmitrādajījanat
उनमें मेनका नाम की श्रेष्ठ अप्सरा, जो ब्रह्मा से उत्पन्न है, स्वर्ग से पृथ्वी पर आई और उसने विश्वामित्र से संतान को जन्म दिया।
श्लोक 67 (1.98.67)
श्रीमानृषिर्धर्मपरो वैश्वानर इवापरः । ब्रह्मयोनिः कुशो नाम विश्वामित्रपितामहः ॥
śrīmānṛṣirdharmaparo vaiśvānara ivāparaḥ | brahmayoniḥ kuśo nāma viśvāmitrapitāmahaḥ
कुश नाम के एक श्रीमान, धर्मपरायण ऋषि थे, जो दूसरे वैश्वानर (अग्नि) के समान तेजस्वी और ब्रह्मा से उत्पन्न थे; वे विश्वामित्र के पितामह थे।
श्लोक 68 (1.98.68)
कुशस्य पुत्रो बलवान्कुशनाभश्च धार्मिकः । गाधिस्तस्य सुतो राजन्विश्वामित्रस्तु गाधिजः ॥
kuśasya putro balavānkuśanābhaśca dhārmikaḥ | gādhistasya suto rājanviśvāmitrastu gādhijaḥ
कुश के पुत्र बलवान और धर्मात्मा कुशनाभ थे; राजन्, उनके पुत्र गाधि हुए, और विश्वामित्र गाधि के पुत्र हैं।
श्लोक 69 (1.98.69)
एवंविधो मम पिता मेनका जननी वरा । सा मां हिमवतः पृष्ठे सुषुवे मेनकाऽप्सराः ॥
evaṃvidho mama pitā menakā jananī varā | sā māṃ himavataḥ pṛṣṭhe suṣuve menakā'psarāḥ
ऐसे हैं मेरे पिता, और मेरी माता श्रेष्ठ मेनका हैं। उस अप्सरा मेनका ने मुझे हिमालय के एक शिखर पर जन्म दिया,
श्लोक 70 (1.98.70)
परित्यज्य च मां याता परात्मजमिवासती । पक्षिणः पुण्यवन्तस्ते सहिता धर्मतस्तदा ॥
parityajya ca māṃ yātā parātmajamivāsatī | pakṣiṇaḥ puṇyavantaste sahitā dharmatastadā
और जैसे कोई निष्ठुर स्त्री पराए बच्चे को छोड़ जाती है, वैसे ही मुझे छोड़कर चली गई। तब पुण्यात्मा पक्षियों ने मिलकर धर्मपूर्वक
श्लोक 71 (1.98.71)
पक्षैस्तैरभिगुप्ता च तस्मादस्मि शकुन्तला । ततोऽहमृषिणा दृष्टा काश्यपेन महात्मना ॥
pakṣaistairabhiguptā ca tasmādasmi śakuntalā | tato'hamṛṣiṇā dṛṣṭā kāśyapena mahātmanā
अपने पंखों से मेरी रक्षा की; इसी से मैं शकुन्तला हूँ। फिर कश्यप-वंशी महात्मा ऋषि ने मुझे देखा,
श्लोक 72 (1.98.72)
जलार्थमग्निहोत्रस्य गतं दृष्ट्वा तु पक्षिणः । न्यासभूतामिव मुनेः प्रददुर्मां दयावतः ॥
jalārthamagnihotrasya gataṃ dṛṣṭvā tu pakṣiṇaḥ | nyāsabhūtāmiva muneḥ pradadurmāṃ dayāvataḥ
जब वे अग्निहोत्र के लिए जल लेने गए थे। उन्हें देखकर दयालु पक्षियों ने मुझे धरोहर की भाँति मुनि को सौंप दिया।
श्लोक 73 (1.98.73)
कण्वस्त्वालोक्य मां प्रीतो हसन्तीति हविर्भुजः । स माऽरणिमिवादाय स्वमाश्रममुपागमत् ॥
kaṇvastvālokya māṃ prīto hasantīti havirbhujaḥ | sa mā'raṇimivādāya svamāśramamupāgamat
कण्व मुझे देखकर प्रसन्न हुए और बोले, "यज्ञ की अग्नियाँ मुस्करा रही हैं।" वे मुझे अरणि की भाँति उठाकर अपने आश्रम में ले गए।
श्लोक 74 (1.98.74)
सा वै संभाविता राजन्ननुक्रोशान्महर्षिणा । तेनैव स्वसुतेवाहं राजन्वै वरवर्णिनी ॥
sā vai saṃbhāvitā rājannanukrośānmaharṣiṇā | tenaiva svasutevāhaṃ rājanvai varavarṇinī
राजन्, उन महर्षि ने करुणावश मेरा आदर से पालन किया; उन्हीं के यहाँ मैं, सुन्दर वर्ण वाली कन्या, उनकी अपनी पुत्री की तरह पली।
श्लोक 75 (1.98.75)
विश्वामित्रसुता चाहं वर्धिता मुनिना नृप । यौवने वर्तमानां च दृष्टवानसि मां नृप ॥
viśvāmitrasutā cāhaṃ vardhitā muninā nṛpa | yauvane vartamānāṃ ca dṛṣṭavānasi māṃ nṛpa
राजन्, मैं विश्वामित्र की पुत्री हूँ, जिसे मुनि ने पाला-पोसा; और जब मैं यौवन में थी, तब आपने मुझे देखा,
श्लोक 76 (1.98.76)
आश्रमे पर्णशालायां कुमारीं विजने तदा । धात्रा प्रचोदितां शून्ये पित्रा विरहितां मिथः ॥
āśrame parṇaśālāyāṃ kumārīṃ vijane tadā | dhātrā pracoditāṃ śūnye pitrā virahitāṃ mithaḥ
आश्रम की पर्णकुटी में, उस समय एकान्त में अकेली कुमारी को, जिसे विधाता ने प्रेरित किया था और जो सूने स्थान में पिता से दूर थी।
श्लोक 77 (1.98.77)
वाग्भिस्त्वं सूनृताभिर्मामपत्यार्थमचूचुदः । अकार्षीस्त्वाश्रमे वासं धर्मकामार्थनिश्चितम् ॥
vāgbhistvaṃ sūnṛtābhirmāmapatyārthamacūcudaḥ | akārṣīstvāśrame vāsaṃ dharmakāmārthaniścitam
आपने संतान के लिए मधुर और सच्चे वचनों से मुझे प्रेरित किया। आपने धर्म, काम और अर्थ का निश्चय करके आश्रम में निवास किया,
श्लोक 78 (1.98.78)
गान्धर्वेण विवाहेन विधिना पाणिमग्रहीः । साऽहं कुलं च शीलं च सत्यवादित्वमात्मनः ॥
gāndharveṇa vivāhena vidhinā pāṇimagrahīḥ | sā'haṃ kulaṃ ca śīlaṃ ca satyavāditvamātmanaḥ
और गान्धर्व विवाह की विधि से मेरा पाणिग्रहण किया। मैं अपने कुल, अपने शील, अपनी सत्यवादिता
श्लोक 79 (1.98.79)
स्वधर्मं च पुरस्कृत्य त्वामद्य शरणं गता । तस्मान्नार्हसि संश्रुत्य तथेति वितथं वचः ॥
svadharmaṃ ca puraskṛtya tvāmadya śaraṇaṃ gatā | tasmānnārhasi saṃśrutya tatheti vitathaṃ vacaḥ
और अपने धर्म को आगे रखकर आज आपकी शरण में आई हूँ। इसलिए "ऐसा ही होगा" कहकर अपना वचन झूठा करना आपको उचित नहीं,
श्लोक 80 (1.98.80)
स्वधर्मं पृष्ठतः कृत्वा परित्यक्तुमुपस्थिताम् । त्वन्नाथां लोकनाथस्त्वं नार्हसि त्वमनागसम् ॥
svadharmaṃ pṛṣṭhataḥ kṛtvā parityaktumupasthitām | tvannāthāṃ lokanāthastvaṃ nārhasi tvamanāgasam
अपने धर्म को पीछे छोड़कर, अपने पास आई हुई, आपको ही अपना स्वामी मानने वाली निर्दोष स्त्री को त्याग देना आपको उचित नहीं; आप तो लोक के रक्षक हैं।
श्लोक 81 (1.98.81)
किं नु कर्माशुभं पूर्वं कृतवत्यस्मि पार्थिव । यदहं बान्धवैस्त्यक्ता बाल्ये संप्रति वै त्वया ॥
kiṃ nu karmāśubhaṃ pūrvaṃ kṛtavatyasmi pārthiva | yadahaṃ bāndhavaistyaktā bālye saṃprati vai tvayā
राजन्, मैंने पहले ऐसा कौन-सा अशुभ कर्म किया था कि बचपन में बन्धुओं ने मुझे त्याग दिया और अब आप भी त्याग रहे हैं?
श्लोक 82 (1.98.82)
कामं त्वया परित्यक्ता गमिष्याम्यहमाश्रमम् । इमं बालं तु संत्यक्तुं नार्हस्यात्मजमात्मना ॥
kāmaṃ tvayā parityaktā gamiṣyāmyahamāśramam | imaṃ bālaṃ tu saṃtyaktuṃ nārhasyātmajamātmanā
ठीक है, आपके द्वारा त्यागी जाकर मैं आश्रम लौट जाऊँगी; परन्तु इस बालक को, अपने ही पुत्र को, आपको नहीं त्यागना चाहिए।
दुष्यन्त उवाच
श्लोक 83 (1.98.83)
न पुत्रमभिजानामि त्वयि जातं शकुन्तले । असत्यवचना नार्यः कस्ते श्रद्धास्यते वचः ॥
na putramabhijānāmi tvayi jātaṃ śakuntale | asatyavacanā nāryaḥ kaste śraddhāsyate vacaḥ
शकुन्तला, मैं तुमसे उत्पन्न किसी पुत्र को अपना नहीं जानता। स्त्रियाँ झूठ बोलती हैं; तुम्हारी बात पर कौन विश्वास करेगा?
श्लोक 84 (1.98.84)
अश्रद्धेयमिदं वाक्यं कथयन्ती न लज्जसे । विशेषतो मत्सकाशे दुष्टतापसि गम्यताम् ॥
aśraddheyamidaṃ vākyaṃ kathayantī na lajjase | viśeṣato matsakāśe duṣṭatāpasi gamyatām
ऐसी अविश्वसनीय बात कहते हुए तुम्हें लज्जा नहीं आती, और वह भी विशेषकर मेरे सामने? दुष्ट तपस्विनी, चली जाओ!
श्लोक 85 (1.98.85)
क्व महर्षिस्तपस्युग्रः क्वाप्सराः सा च मेनका । क्व च त्वमेवं कृपणा तापसीवेषधारिणी ॥
kva maharṣistapasyugraḥ kvāpsarāḥ sā ca menakā | kva ca tvamevaṃ kṛpaṇā tāpasīveṣadhāriṇī
कहाँ उग्र तपस्वी महर्षि, कहाँ वह अप्सरा मेनका, और कहाँ तपस्विनी का वेश धारण किए तुम जैसी दीन स्त्री!
श्लोक 86 (1.98.86)
अतिकायश्च पुत्रस्ते बालोऽतिबलवानयम् । कथमल्पेन कालेन सालस्कन्ध इवोद्गतः ॥
atikāyaśca putraste bālo'tibalavānayam | kathamalpena kālena sālaskandha ivodgataḥ
और तुम्हारा यह पुत्र तो बहुत बड़े शरीर वाला है — बालक होकर भी अत्यन्त बलवान। इतने थोड़े समय में यह साल के तने की तरह इतना ऊँचा कैसे हो गया?
श्लोक 87 (1.98.87)
सुनिकृष्टा च योनिस्ते पुंश्चली प्रतिभासि मे । यदृच्छया कामरागाज्जाता मेनकया ह्यसि ॥
sunikṛṣṭā ca yoniste puṃścalī pratibhāsi me | yadṛcchayā kāmarāgājjātā menakayā hyasi
तुम्हारी उत्पत्ति अत्यन्त नीच है; तुम मुझे कुलटा जान पड़ती हो। तुम मेनका से संयोगवश, काम और राग के कारण उत्पन्न हुई हो।
श्लोक 88 (1.98.88)
सर्वमेव परोक्षं मे यत्त्वं वदसि तापसि । सर्वा वामाः स्त्रियो लोके सर्वाः कामपरायणाः ॥
sarvameva parokṣaṃ me yattvaṃ vadasi tāpasi | sarvā vāmāḥ striyo loke sarvāḥ kāmaparāyaṇāḥ
तपस्विनी, तुम जो कुछ कहती हो, वह सब मेरी जानकारी से परे है। संसार में सभी स्त्रियाँ कुटिल होती हैं, सभी काम-परायण होती हैं;
श्लोक 89 (1.98.89)
सर्वाः स्त्रियः परवशाः सर्वाः क्रोधसमाकुलाः । असत्योक्ताः स्त्रियः सर्वा न कण्वं वक्तुमर्हसि ॥
sarvāḥ striyaḥ paravaśāḥ sarvāḥ krodhasamākulāḥ | asatyoktāḥ striyaḥ sarvā na kaṇvaṃ vaktumarhasi
सभी स्त्रियाँ पराधीन होती हैं, सभी क्रोध से भरी रहती हैं, सभी स्त्रियाँ झूठ बोलती हैं। तुम्हें कण्व का नाम नहीं लेना चाहिए।
श्लोक 90 (1.98.90)
मेनका निरनुक्रोशा बन्धकी जननी तव । यया हिमवतः पादे निर्माल्यवदुपेक्षिता ॥
menakā niranukrośā bandhakī jananī tava | yayā himavataḥ pāde nirmālyavadupekṣitā
तुम्हारी माता मेनका निर्दयी कुलटा थी, जिसने तुम्हें हिमालय की तलहटी में उतरी हुई माला की तरह छोड़ दिया।
श्लोक 91 (1.98.91)
स चापि निरनुक्रोशः क्षत्रयोनिः पिता तव । विश्वामित्रो ब्राह्मणत्वे लुब्धः कामपरायणः ॥
sa cāpi niranukrośaḥ kṣatrayoniḥ pitā tava | viśvāmitro brāhmaṇatve lubdhaḥ kāmaparāyaṇaḥ
और तुम्हारे पिता विश्वामित्र भी निर्दयी थे — क्षत्रिय कुल में जन्मे, ब्राह्मणत्व के लोभी और काम के वश में रहने वाले।
श्लोक 92 (1.98.92)
सुषाव सुरनारी मां विश्वामित्राद्यथेष्टतः । अहो जानामि ते जन्म कुत्सितं कुलटे जनैः ॥
suṣāva suranārī māṃ viśvāmitrādyatheṣṭataḥ | aho jānāmi te janma kutsitaṃ kulaṭe janaiḥ
"देवांगना ने विश्वामित्र से मनमाने ढंग से मुझे जन्म दिया" — अरी कुलटा, मैं तुम्हारा जन्म जानता हूँ; लोग उसकी निन्दा करते हैं।
श्लोक 93 (1.98.93)
मेनकाऽप्सरसां श्रेष्ठा महर्षिश्चापि ते पिता । तयोरपत्यं कस्मात्त्वं पुंश्चलीवाभिभाषसे ॥
menakā'psarasāṃ śreṣṭhā maharṣiścāpi te pitā | tayorapatyaṃ kasmāttvaṃ puṃścalīvābhibhāṣase
मेनका अप्सराओं में श्रेष्ठ है और तुम्हारे पिता भी महर्षि हैं; फिर उनकी संतान होकर तुम कुलटा की तरह क्यों बोल रही हो?
श्लोक 94 (1.98.94)
जातिश्चापि निकृष्टा ते कुलीनेति विजल्पसे । जनयित्वा त्वमुत्सृष्टा कोकिलेन परैर्भृता ॥
jātiścāpi nikṛṣṭā te kulīneti vijalpase | janayitvā tvamutsṛṣṭā kokilena parairbhṛtā
तुम्हारी जाति भी नीच है, फिर भी तुम अपने को कुलीन बताती हो। जन्म के बाद तुम्हें वैसे ही छोड़ दिया गया जैसे कोयल अपने बच्चे को छोड़ देती है, और दूसरों ने तुम्हें पाला।
श्लोक 95 (1.98.95)
अरिष्टैरिव दुर्बुद्धिः कण्वो वर्धयिता पिता । अश्रद्धेयमिदं वाक्यं यत्त्वं जल्पसि तापसि ॥
ariṣṭairiva durbuddhiḥ kaṇvo vardhayitā pitā | aśraddheyamidaṃ vākyaṃ yattvaṃ jalpasi tāpasi
तुम्हें पालने वाला कण्व मानो कौओं को पालने वाले के समान मूर्ख है। तपस्विनी, तुम जो बकवास कर रही हो, वह विश्वास के योग्य नहीं,
श्लोक 96 (1.98.96)
ब्रुवन्ती राजसान्निध्ये गम्यतां यत्र चेच्छसि । सुवर्णमणिमुक्तानि वस्त्राण्याभरणानि च ॥
bruvantī rājasānnidhye gamyatāṃ yatra cecchasi | suvarṇamaṇimuktāni vastrāṇyābharaṇāni ca
और वह भी राजा के सामने कही जा रही है। जहाँ चाहो चली जाओ। सोना, मणि, मोती, वस्त्र और आभूषण —
श्लोक 97 (1.98.97)
यदिहेच्छसि भोगार्थं तापसि प्रतिगृह्यताम् । नाहं त्वां द्रष्टुमिच्छामि यथेष्टं गम्यतामितः ॥
yadihecchasi bhogārthaṃ tāpasi pratigṛhyatām | nāhaṃ tvāṃ draṣṭumicchāmi yatheṣṭaṃ gamyatāmitaḥ
तपस्विनी, भोग के लिए यहाँ जो कुछ चाहो, ले लो। मैं तुम्हें देखना नहीं चाहता; यहाँ से जहाँ चाहो चली जाओ।