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अनुशासन पर्व · अध्याय 11

इन्द्र और निष्ठावान् शुक

करुणा और भक्त के गुणों के विषय में युधिष्ठिर के पूछने पर भीष्म उस शुक की कथा सुनाते हैं जिसने विष से सूख चुके अपने वृक्ष को नहीं छोड़ा। ब्राह्मण का रूप धरकर आए इन्द्र जब कारण पूछते हैं, तो शुक कहता है कि जिसने वृक्ष के अच्छे दिनों में उसका आश्रय लिया, वह उसकी विपत्ति में उसे कैसे त्यागे। प्रसन्न इन्द्र वर देते हैं, शुक वृक्ष का पुनर्जीवन माँगता है, और अन्त में वृक्ष और शुक दोनों का कल्याण होता है।

अध्याय 10अध्याय-सूचीअध्याय 12

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (13.11.1)

आनृशंस्यस्य धर्मज्ञ गुणान्भक्तजनस्य च । श्रोतुमिच्छामि धर्मज्ञ तन्मे ब्रूहि पितामह ॥

ānṛśaṃsyasya dharmajña guṇānbhaktajanasya ca | śrotumicchāmi dharmajña tanme brūhi pitāmaha

युधिष्ठिर ने कहा — हे धर्मज्ञ, मैं करुणा के और भक्त जन के गुण सुनना चाहता हूँ; पितामह, वह मुझे बताइए।

भीष्म उवाच

श्लोक 2 (13.11.2)

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । वासवस्य च संवादं शुकस्य च महात्मनः ॥

atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | vāsavasya ca saṃvādaṃ śukasya ca mahātmanaḥ

भीष्म ने कहा — इस विषय में एक पुराना इतिहास सुनाया जाता है: इन्द्र और महात्मा शुक का संवाद।

श्लोक 3 (13.11.3)

विषये काशिराजस्य ग्रामान्निष्क्रम्य लुब्धकः । सविषं काण्डमादाय मृगयामास वै मृगम् ॥

viṣaye kāśirājasya grāmānniṣkramya lubdhakaḥ | saviṣaṃ kāṇḍamādāya mṛgayāmāsa vai mṛgam

काशिराज के राज्य में एक व्याध गाँव से निकला और विष लगा बाण लेकर मृग का शिकार करने गया।

श्लोक 4 (13.11.4)

तत्र चामिषलुब्धेन लुब्धकेन महावने । अविदूरे मृगान्दृष्ट्वा बाणः प्रतिसमाहितः ॥

tatra cāmiṣalubdhena lubdhakena mahāvane | avidūre mṛgāndṛṣṭvā bāṇaḥ pratisamāhitaḥ

वहाँ विशाल वन में मांस के लोभी उस व्याध ने कुछ दूरी पर मृगों को देखकर बाण चढ़ाया।

श्लोक 5 (13.11.5)

तेन दुर्वारितास्त्रेण निमित्तचपलेषुणा । महान्वनतरुस्तत्र विद्धो मृगजिघांसया ॥

tena durvāritāstreṇa nimittacapaleṣuṇā | mahānvanatarustatra viddho mṛgajighāṃsayā

उस दुर्निवार बाण से, जिसका निशाना चंचल था, मृग को मारने की इच्छा में वहाँ एक विशाल वन-वृक्ष बिंध गया।

श्लोक 6 (13.11.6)

स तीक्ष्णविषदिग्धेन शरेणातिबलात्क्षतः । उत्सृज्य फलपत्राणि पादपः शोषमागतः ॥

sa tīkṣṇaviṣadigdhena śareṇātibalātkṣataḥ | utsṛjya phalapatrāṇi pādapaḥ śoṣamāgataḥ

तीखे विष में डूबे बाण की गहरी चोट खाकर वह वृक्ष फल और पत्ते गिराकर सूख गया।

श्लोक 7 (13.11.7)

तस्मिन्वृक्षे तथाभूते कोटरेषु चिरोषितः । न जहाति शुको वासं तस्य भक्त्या वनस्पतेः ॥

tasminvṛkṣe tathābhūte koṭareṣu ciroṣitaḥ | na jahāti śuko vāsaṃ tasya bhaktyā vanaspateḥ

उस दशा को पहुँचे वृक्ष के कोटरों में बहुत समय से रहता एक शुक वनस्पति के प्रति भक्ति के कारण अपना निवास नहीं छोड़ता था।

श्लोक 8 (13.11.8)

निष्प्रचारो निराहारो ग्लानः शिथिलवागपि । कृतज्ञः सह वृक्षेण धर्मात्मा सोऽप्यशुष्यत ॥

niṣpracāro nirāhāro glānaḥ śithilavāgapi | kṛtajñaḥ saha vṛkṣeṇa dharmātmā so'pyaśuṣyata

न चलता-फिरता, न खाता, क्षीण और धीमी वाणी वाला वह कृतज्ञ, धर्मात्मा पक्षी भी वृक्ष के साथ सूखने लगा।

श्लोक 9 (13.11.9)

तमुदारं महासत्वमतिमानुषचेष्टितम् । समदुःखसुखं दृष्ट्वा विस्मितः पाकशासनः ॥

tamudāraṃ mahāsatvamatimānuṣaceṣṭitam | samaduḥkhasukhaṃ dṛṣṭvā vismitaḥ pākaśāsanaḥ

उस उदार, महान् पक्षी को, जिसका आचरण मनुष्य से भी ऊपर था और जो वृक्ष के सुख-दुःख में समान भागी था, देखकर इन्द्र विस्मित हुए।

श्लोक 10 (13.11.10)

ततश्चिन्तामुपगतः शक्रः कथमयं द्विजः । तिर्यग्योनावसम्भाव्यमानृशंस्यमवस्थितः ॥

tataścintāmupagataḥ śakraḥ kathamayaṃ dvijaḥ | tiryagyonāvasambhāvyamānṛśaṃsyamavasthitaḥ

तब इन्द्र सोच में पड़ गए: तिर्यक् योनि में जन्मा यह पक्षी ऐसी करुणा में कैसे स्थित है, जिसकी सम्भावना ही नहीं लगती?

श्लोक 11 (13.11.11)

अथवा नात्र चित्रं हीत्यभवद्वासवस्य तु । प्राणिनामपि सर्वेषां सर्वं सर्वत्र दृश्यते ॥

athavā nātra citraṃ hītyabhavadvāsavasya tu | prāṇināmapi sarveṣāṃ sarvaṃ sarvatra dṛśyate

अथवा इसमें कुछ आश्चर्य नहीं, इन्द्र को ऐसा लगा; क्योंकि सब प्राणियों में सब कुछ सर्वत्र देखा जाता है।

श्लोक 12 (13.11.12)

ततो ब्राह्मणवेषेण मानुषं रूपमास्थितः । अवतीर्य महीं शक्रस्तं पक्षिणमुवाच ह ॥

tato brāhmaṇaveṣeṇa mānuṣaṃ rūpamāsthitaḥ | avatīrya mahīṃ śakrastaṃ pakṣiṇamuvāca ha

तब ब्राह्मण का वेश और मनुष्य का रूप धारण करके इन्द्र पृथ्वी पर उतरे और उस पक्षी से बोले।

शक्र उवाच

श्लोक 13 (13.11.13)

शुक भो पक्षिणांश्रेष्ठ दाक्षेयी सुप्रजास्त्वया । पृच्छे त्वां शुष्कमेनं त्वं कस्मान्न त्यजसि द्रुमम् ॥

śuka bho pakṣiṇāṃśreṣṭha dākṣeyī suprajāstvayā | pṛcche tvāṃ śuṣkamenaṃ tvaṃ kasmānna tyajasi drumam

इन्द्र ने कहा — हे शुक, पक्षियों में श्रेष्ठ, तुम्हारे कारण दक्ष की पुत्री का वंश उत्तम सन्तान वाला है। शुक, मैं तुमसे पूछता हूँ: तुम इस सूखे वृक्ष को क्यों नहीं छोड़ते?

भीष्म उवाच

श्लोक 14 (13.11.14)

अथ पृष्टः शुकः प्राह मूर्ध्ना समभिवाद्य तम् । स्वागतं देवराज त्वं विज्ञातस्तपसा मया ॥

atha pṛṣṭaḥ śukaḥ prāha mūrdhnā samabhivādya tam | svāgataṃ devarāja tvaṃ vijñātastapasā mayā

भीष्म ने कहा — तब पूछे जाने पर शुक ने सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम किया और कहा, 'देवराज, आपका स्वागत है; मैंने अपने तप से आपको पहचान लिया है।'

श्लोक 15 (13.11.15)

ततो दशशताक्षेण साधुसाध्विति भाषितम् । अहो विज्ञानमित्येवं मनसा पूजितस्ततः ॥

tato daśaśatākṣeṇa sādhusādhviti bhāṣitam | aho vijñānamityevaṃ manasā pūjitastataḥ

तब सहस्राक्ष ने कहा, 'साधु, साधु! कैसी सूझ है!' और इस प्रकार मन में उसका सम्मान किया।

श्लोक 16 (13.11.16)

तमेवं शुभकर्माणं शुकं परमधार्मिकम् । जानन्नपि च तत्पापं पप्रच्छ बलसूदनः ॥

tamevaṃ śubhakarmāṇaṃ śukaṃ paramadhārmikam | jānannapi ca tatpāpaṃ papraccha balasūdanaḥ

बल को मारने वाले इन्द्र ने, उस दुःखद बात को जानते हुए भी, ऐसे शुभकर्मा और परम धार्मिक शुक से पूछा।

शक्र उवाच

श्लोक 17 (13.11.17)

निष्पत्रमफलं शुष्कमशरण्यं पतत्त्रिणाम् । किमर्थं सेवसे वृक्षं यदा महदिदं वनम् ॥

niṣpatramaphalaṃ śuṣkamaśaraṇyaṃ patattriṇām | kimarthaṃ sevase vṛkṣaṃ yadā mahadidaṃ vanam

इन्द्र ने कहा — यह वृक्ष पत्तों से रहित, फलहीन, सूखा और पक्षियों के लिए शरण-रहित है; जब यह वन इतना विशाल है, तब तुम इसकी सेवा क्यों करते हो?

श्लोक 18 (13.11.18)

अन्येऽपि बहवो वृक्षाः पत्रसंछन्नकोटराः । शुभाः पर्याप्तसञ्चारा विद्यन्तेऽस्मिन्महावने ॥

anye'pi bahavo vṛkṣāḥ patrasaṃchannakoṭarāḥ | śubhāḥ paryāptasañcārā vidyante'sminmahāvane

इस महावन में और भी बहुत से वृक्ष हैं, जिनके कोटर पत्तों से ढके हैं, जो सुन्दर हैं और जिनमें विचरने को पर्याप्त स्थान है।

श्लोक 19 (13.11.19)

गतायुषमसामर्थ्यं क्षीणसारं हतश्रियम् । विमृश्य प्रज्ञया धीर जहीमं ह्यस्थिरं द्रुमम् ॥

gatāyuṣamasāmarthyaṃ kṣīṇasāraṃ hataśriyam | vimṛśya prajñayā dhīra jahīmaṃ hyasthiraṃ drumam

इस वृक्ष की आयु पूरी हो गई है, यह असमर्थ है, इसका सार क्षीण और शोभा नष्ट हो चुकी है; हे धीर, अपनी बुद्धि से विचार करके इस अस्थिर वृक्ष को छोड़ दो।

भीष्म उवाच

श्लोक 20 (13.11.20)

तदुपश्रुत्य धर्मात्मा शुकः शक्रेण भाषितम् । सुदीर्घमतिनिःश्वस्य दीनो वाक्यमुवाच ह ॥

tadupaśrutya dharmātmā śukaḥ śakreṇa bhāṣitam | sudīrghamatiniḥśvasya dīno vākyamuvāca ha

भीष्म ने कहा — इन्द्र की कही बात सुनकर धर्मात्मा शुक ने लम्बी साँस ली और दुःखी होकर यह वचन कहा।

शुक उवाच

श्लोक 21 (13.11.21)

अनतिक्रमणीयानि दैवतानि शचीपते । यत्राभवंस्तत्र भवांस्तन्निबोध सुराधिप ॥

anatikramaṇīyāni daivatāni śacīpate | yatrābhavaṃstatra bhavāṃstannibodha surādhipa

शुक ने कहा — हे शचीपति, देवताओं का उल्लंघन नहीं किया जा सकता। हे देवेश्वर, यह समझिए: जहाँ वे थे, वहाँ आप हैं।

श्लोक 22 (13.11.22)

अस्मिन्नहं द्रुमे जातः साधुभिश्च गुणैर्युते । बालभावेन सङ्गुप्तः शत्रुभिश्च न धर्षितः ॥

asminnahaṃ drume jātaḥ sādhubhiśca guṇairyute | bālabhāvena saṅguptaḥ śatrubhiśca na dharṣitaḥ

मैं इसी वृक्ष में जन्मा, जो उत्तम गुणों से युक्त था; बचपन में यहीं मेरी रक्षा हुई और शत्रुओं ने मुझे कभी नहीं सताया।

श्लोक 23 (13.11.23)

किमनुक्रोश्यं वैफल्यमुत्पादयसि मेऽनघ । अनुरक्तस्य भक्तस्य संस्पृशेन्न च पावकम् । आनृशंस्याभियुक्तस्य भक्तस्यानन्यगस्य च ॥

kimanukrośyaṃ vaiphalyamutpādayasi me'nagha | anuraktasya bhaktasya saṃspṛśenna ca pāvakam | ānṛśaṃsyābhiyuktasya bhaktasyānanyagasya ca

हे निष्पाप, आप दया दिखाकर मुझ पर विफलता क्यों लाते हैं? जो अनुरक्त और भक्त है, उसे अग्नि स्पर्श न करे: जो करुणा में लगा है, भक्त है और किसी दूसरे की ओर नहीं जाता।

श्लोक 24 (13.11.24)

अनुक्रोशो हि साधूनां महद्धर्मस्य लक्षणम् । अनुक्रोशश्च साधूनां सदा प्रीतिं प्रयच्छति ॥

anukrośo hi sādhūnāṃ mahaddharmasya lakṣaṇam | anukrośaśca sādhūnāṃ sadā prītiṃ prayacchati

करुणा सज्जनों का लक्षण और महान् धर्म का चिह्न है; और करुणा सज्जनों को सदा प्रसन्नता देती है।

श्लोक 25 (13.11.25)

त्वमेव दैवतैः सर्वैः पृच्छ्यसे धर्मसंशयात् । अतस्त्वं देवदेवानामाधिपत्ये प्रतिष्ठितः ॥

tvameva daivataiḥ sarvaiḥ pṛcchyase dharmasaṃśayāt | atastvaṃ devadevānāmādhipatye pratiṣṭhitaḥ

सब देवता धर्म के संशय में आपसे ही पूछते हैं, और इसीलिए आप देवताओं के अधिपति पद पर प्रतिष्ठित हैं।

श्लोक 26 (13.11.26)

नार्हसे मां सहस्राक्ष द्रुमं त्याजयितुं चिरात् । समस्थमुपजीवन्वै विषमस्थं कथं त्यजेत् ॥

nārhase māṃ sahasrākṣa drumaṃ tyājayituṃ cirāt | samasthamupajīvanvai viṣamasthaṃ kathaṃ tyajet

हे सहस्राक्ष, इतने समय बाद आपको मुझसे इस वृक्ष को छुड़वाना उचित नहीं। जिसके अच्छे दिनों में उसके सहारे जिया, उसे बुरे दिनों में कैसे छोड़ा जाए?

भीष्म उवाच

श्लोक 27 (13.11.27)

तस्य वाक्येन सौम्येन हर्षितः पाकशासनः । शुकं प्रोवाच धर्मज्ञमानृशंस्येन तोषितः ॥

tasya vākyena saumyena harṣitaḥ pākaśāsanaḥ | śukaṃ provāca dharmajñamānṛśaṃsyena toṣitaḥ

भीष्म ने कहा — उसके सौम्य वचनों से हर्षित और उसकी करुणा से सन्तुष्ट होकर इन्द्र ने धर्मज्ञ शुक से कहा।

श्लोक 28 (13.11.28)

वरं वृणीष्वेति तदा स च वव्रे वरं शुकः । आनृशंस्यपरो नित्यं तस्य वृक्षस्य सम्भवम् ॥

varaṃ vṛṇīṣveti tadā sa ca vavre varaṃ śukaḥ | ānṛśaṃsyaparo nityaṃ tasya vṛkṣasya sambhavam

'वर माँगो,' इन्द्र ने कहा, और सदा करुणा में लगे शुक ने तब वर माँगा: उस वृक्ष का पुनर्जीवन।

श्लोक 29 (13.11.29)

विदित्वा च दृढां भक्तिं तां शुके शीलसम्पदम् । प्रीतः क्षिप्रमथो वृक्षममृतेनावसिक्तवान् ॥

viditvā ca dṛḍhāṃ bhaktiṃ tāṃ śuke śīlasampadam | prītaḥ kṣipramatho vṛkṣamamṛtenāvasiktavān

शुक की दृढ़ भक्ति और उसकी शील-सम्पदा को जानकर प्रसन्न इन्द्र ने तुरन्त वृक्ष पर अमृत छिड़क दिया।

श्लोक 30 (13.11.30)

ततः फलानि पत्राणि शाखाश्चापि मनोहराः । शुकस्य दृढभक्तित्वाच्छ्रीमत्तां प्राप स द्रुमः ॥

tataḥ phalāni patrāṇi śākhāścāpi manoharāḥ | śukasya dṛḍhabhaktitvācchrīmattāṃ prāpa sa drumaḥ

तब फल, पत्ते और मनोहर शाखाएँ निकल आईं, और शुक की दृढ़ भक्ति से वह वृक्ष शोभा से सम्पन्न हो गया।

श्लोक 31 (13.11.31)

शुकश्च कर्मणा तेन आनृशंस्यकृतेन वै । आयुषोऽन्ते महाराज प्राप शक्रसलोकताम् ॥

śukaśca karmaṇā tena ānṛśaṃsyakṛtena vai | āyuṣo'nte mahārāja prāpa śakrasalokatām

और वह शुक, हे महाराज, करुणा से किए उस कर्म के कारण आयु पूरी होने पर इन्द्र का सालोक्य पा गया।

श्लोक 32 (13.11.32)

एवमेव मनुष्येन्द्र भक्तिमन्तं समाश्रितः । सर्वार्थसिद्धिं लभते शुकं प्राप्य यथा द्रुमः ॥

evameva manuṣyendra bhaktimantaṃ samāśritaḥ | sarvārthasiddhiṃ labhate śukaṃ prāpya yathā drumaḥ

इसी प्रकार, हे नरेन्द्र, जो भक्तिमान् का आश्रय लेता है वह सब प्रयोजनों में सिद्धि पाता है, जैसे शुक को पाकर वह वृक्ष।

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