अनुशासन पर्व · अध्याय 137
श्राद्ध के योग्य और अयोग्य ब्राह्मण
युधिष्ठिर पूछते हैं कि श्राद्ध किसे देना चाहिए। भीष्म उन ब्राह्मणों की सूची देते हैं जो पंक्ति को दूषित करते हैं, जैसे जुआरी, ब्याजखोर, नट और देवल, और बताते हैं कि उन्हें दिए हुए दान का क्या परिणाम होता है। फिर वे पंक्ति को पवित्र करने वाले विद्वान्, संयमी और सदाचारी ब्राह्मणों को गिनाते हैं और मित्रों, तिल तथा झूठ के लिए दी गई दक्षिणा के नियम बताते हैं।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (13.137.1)
कीदृशेभ्यः प्रदातव्यं भवेच्छ्राद्धं पितामह । द्विजेभ्यः कुरुशार्दूल तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥
kīdṛśebhyaḥ pradātavyaṃ bhavecchrāddhaṃ pitāmaha | dvijebhyaḥ kuruśārdūla tanme vyākhyātumarhasi
पितामह, श्राद्ध किस प्रकार के ब्राह्मणों को देना चाहिए? हे कुरुश्रेष्ठ, आप यह मुझे समझाइए।
भीष्म उवाच
श्लोक 2 (13.137.2)
ब्राह्मणान्न परीक्षेत क्षत्रियो दानधर्मवित् । दैवे कर्मणि पित्र्ये तु न्यायमाहुः परीक्षणम् ॥
brāhmaṇānna parīkṣeta kṣatriyo dānadharmavit | daive karmaṇi pitrye tu nyāyamāhuḥ parīkṣaṇam
दान के धर्म को जानने वाला क्षत्रिय देवकर्म में ब्राह्मणों की परीक्षा न करे; किन्तु पितृकर्म में परीक्षा करना उचित बताया गया है।
श्लोक 3 (13.137.3)
देवताः पावयन्तीह दैवेनैवेह तेजसा । उपेत्य तस्माद्देवेभ्यः सर्वेभ्यो दापयेन्नरः ॥
devatāḥ pāvayantīha daivenaiveha tejasā | upetya tasmāddevebhyaḥ sarvebhyo dāpayennaraḥ
देवता इस लोक में अपने दिव्य तेज से ही पवित्र करते हैं। इसलिए मनुष्य उनके पास जाकर सभी देवताओं के निमित्त दान दिलाए।
श्लोक 4 (13.137.4)
श्राद्धे त्वथ महाराज परीक्षेद्ब्राह्मणान्बुधः । कुलशीलवयोरूपैर्विद्ययाऽभिजनेन च ॥
śrāddhe tvatha mahārāja parīkṣedbrāhmaṇānbudhaḥ | kulaśīlavayorūpairvidyayā'bhijanena ca
परन्तु हे महाराज, श्राद्ध में बुद्धिमान् पुरुष कुल, शील, आयु, रूप, विद्या और जन्म के आधार पर ब्राह्मणों की परीक्षा करे।
श्लोक 5 (13.137.5)
तेषामन्ये पङ्क्तिदूष्यास्तथाऽन्ये पङ्क्तिपावनाः । अपाङ्क्तेयास्तु ये राजन्कीर्तयिष्यामि ताञ्शृणु ॥
teṣāmanye paṅktidūṣyāstathā'nye paṅktipāvanāḥ | apāṅkteyāstu ye rājankīrtayiṣyāmi tāñśṛṇu
उनमें कुछ पंक्ति को दूषित करने वाले होते हैं और कुछ पंक्ति को पवित्र करने वाले। हे राजन्, जो पंक्ति में बैठने के अयोग्य हैं, उन्हें मैं बताता हूँ; सुनो।
श्लोक 6 (13.137.6)
कितवो भ्रूणहा यक्ष्मी पशुपालो निराकृतिः । ग्रामप्रेष्यो वार्धुषिको गायनः सर्वविक्रयी ॥
kitavo bhrūṇahā yakṣmī paśupālo nirākṛtiḥ | grāmapreṣyo vārdhuṣiko gāyanaḥ sarvavikrayī
जुआरी, भ्रूण की हत्या करने वाला, क्षयरोगी, पशुपालक, अध्ययन से रहित, गाँव का सेवक, ब्याजखोर, गायक और सब कुछ बेचने वाला,
श्लोक 7 (13.137.7)
अगारदाही गरदः कुण्डाशी सोमविक्रयी । सामुद्रिको राजभृत्यस्तैलिकः कूटकारकः ॥
agāradāhī garadaḥ kuṇḍāśī somavikrayī | sāmudriko rājabhṛtyastailikaḥ kūṭakārakaḥ
घर जलाने वाला, विष देने वाला, कुण्ड का अन्न खाने वाला, सोम बेचने वाला, समुद्र से आजीविका करने वाला, राजा का सेवक, तेली और जालसाज़;
श्लोक 8 (13.137.8)
पित्रा विभजमानश्च यस्य चोपपतिर्गृहे । अभिशस्तस्तथा स्तेनः शिल्पं यश्चोपजीवति ॥
pitrā vibhajamānaśca yasya copapatirgṛhe | abhiśastastathā stenaḥ śilpaṃ yaścopajīvati
पिता के साथ बँटवारा करने वाला, जिसके घर में उपपति रहता हो वह, शापित या कलंकित, चोर और शिल्प से जीविका चलाने वाला;
श्लोक 9 (13.137.9)
पर्वकारश्च सूची च मित्रध्रुक् पारदारिकः । अव्रतानामुपाध्यायः काण्डपृष्ठस्तथैव च ॥
parvakāraśca sūcī ca mitradhruk pāradārikaḥ | avratānāmupādhyāyaḥ kāṇḍapṛṣṭhastathaiva ca
दूसरे का वेष धारण करने वाला, चुगलखोर, मित्र से द्रोह करने वाला, परस्त्रीगामी, व्रतहीनों को पढ़ाने वाला और उसी प्रकार शस्त्र से जीविका करने वाला;
श्लोक 10 (13.137.10)
श्वभिश्च यः परिक्रामेद्यः शुना दष्ट एव च । परिवित्तिश्च यश्च स्याद्दुश्चर्मा गुरुतल्पगः ॥
śvabhiśca yaḥ parikrāmedyaḥ śunā daṣṭa eva ca | parivittiśca yaśca syādduścarmā gurutalpagaḥ
कुत्तों को साथ लेकर घूमने वाला, जिसे कुत्ते ने काटा हो वह, छोटे भाई के पहले विवाह हो जाने से उपेक्षित बड़ा भाई, चर्मरोगी और गुरुपत्नीगामी;
श्लोक 11 (13.137.11)
कुशीलवो देवलको नक्षत्रैर्यश्च जीवति । ईदृशैर्ब्राह्मणैर्भुक्तमपाङ्क्तेयैर्युधिष्ठिर ॥
kuśīlavo devalako nakṣatrairyaśca jīvati | īdṛśairbrāhmaṇairbhuktamapāṅkteyairyudhiṣṭhira
नट, देवल (मन्दिर का पुजारी) और नक्षत्रों के सहारे जीविका करने वाला। हे युधिष्ठिर, ऐसे पंक्ति के अयोग्य ब्राह्मणों द्वारा खाया हुआ अन्न
श्लोक 12 (13.137.12)
रक्षांसि गच्छते हव्यमित्याहुर्ब्रह्मवादिनः । श्राद्धं भुक्त्वा त्वधीयीत वृषलीतल्पगश्च यः ॥
rakṣāṃsi gacchate havyamityāhurbrahmavādinaḥ | śrāddhaṃ bhuktvā tvadhīyīta vṛṣalītalpagaśca yaḥ
हव्य बनकर राक्षसों के पास जाता है, ऐसा ब्रह्मवादी कहते हैं। और जो श्राद्ध का भोजन करके पढ़ने लगता है, अथवा वृषली के शयन पर जाता है,
श्लोक 13 (13.137.13)
पुरीषे तस्य ते मासं पितरस्तस्य शेरते । सोमविक्रयिणे विष्ठा भिषजे पूयशोणितम् ॥
purīṣe tasya te māsaṃ pitarastasya śerate | somavikrayiṇe viṣṭhā bhiṣaje pūyaśoṇitam
उसके पितर एक मास तक उसी के मल में पड़े रहते हैं। सोम बेचने वाले को दिया हुआ फल विष्ठा बन जाता है और वैद्य को दिया हुआ मवाद और रक्त।
श्लोक 14 (13.137.14)
नष्टं देवलके दत्तमप्रतिष्ठं च वार्धुषे । यत्तु वाणिजके दत्तं नेह नामुत्र तद्भवेत् । भस्मनीव हुतं हव्यं तथा पौनर्भवे द्विजे ॥
naṣṭaṃ devalake dattamapratiṣṭhaṃ ca vārdhuṣe | yattu vāṇijake dattaṃ neha nāmutra tadbhavet | bhasmanīva hutaṃ havyaṃ tathā paunarbhave dvije
देवल को दिया हुआ नष्ट हो जाता है और ब्याजखोर को दिया हुआ निष्फल रहता है। जो वणिक् को दिया जाता है, उसका फल न यहाँ मिलता है, न परलोक में; और पुनर्विवाहिता स्त्री के पुत्र द्विज को दिया हुआ हव्य राख में डाली गई आहुति के समान है।
श्लोक 15 (13.137.15)
ये तु धर्मव्यपेतेषु चारित्रापगतेषु च । हव्यं कव्यं प्रयच्छन्ति येषां तत्प्रेत्य नश्यति ॥
ye tu dharmavyapeteṣu cāritrāpagateṣu ca | havyaṃ kavyaṃ prayacchanti yeṣāṃ tatpretya naśyati
जो लोग धर्म से गिरे हुए और सदाचार से च्युत मनुष्यों को हव्य और कव्य देते हैं, उनका वह दान परलोक में नष्ट हो जाता है।
श्लोक 16 (13.137.16)
ज्ञानपूर्वं तु ये तेभ्यः प्रयच्छन्त्यल्पबुद्धयः । पुरीषं भुञ्जते तस्य पितरः प्रेत्य निश्चयः ॥
jñānapūrvaṃ tu ye tebhyaḥ prayacchantyalpabuddhayaḥ | purīṣaṃ bhuñjate tasya pitaraḥ pretya niścayaḥ
जो अल्पबुद्धि लोग जान-बूझकर उन्हें दान देते हैं, उनके पितर मरने के बाद मल खाते हैं; यह निश्चय है।
श्लोक 17 (13.137.17)
एतानिमान्विजानीयादपाङ्क्तेयान्द्विजाधमान् । शूद्राणामुपदेशं च ये कुर्वन्त्यल्पचेतसः ॥
etānimānvijānīyādapāṅkteyāndvijādhamān | śūdrāṇāmupadeśaṃ ca ye kurvantyalpacetasaḥ
इन्हें पंक्ति के अयोग्य द्विजाधम जानना चाहिए; इसी प्रकार उन अल्पबुद्धियों को भी, जो शूद्रों को उपदेश देते हैं।
श्लोक 18 (13.137.18)
षष्टिं काणः शतं षण्डः श्वित्री यावत्प्रपश्यति । पङ्क्त्यां समुपविष्टायां तावद्दूषयते नृप ॥
ṣaṣṭiṃ kāṇaḥ śataṃ ṣaṇḍaḥ śvitrī yāvatprapaśyati | paṅktyāṃ samupaviṣṭāyāṃ tāvaddūṣayate nṛpa
काना साठ को, नपुंसक सौ को दूषित करता है, और श्वित्र (श्वेत कुष्ठ) का रोगी जितनों को देखता है उतनों को; हे राजन्, बैठी हुई पंक्ति में वह उतनों को दूषित कर देता है।
श्लोक 19 (13.137.19)
यद्वेष्टितशिरा भुङ्क्ते यद्भुङ्क्ते दक्षिणामुखः । सोपानत्कश्च यद्भुङ्क्ते सर्वं विद्यात्तदासुरम् ॥
yadveṣṭitaśirā bhuṅkte yadbhuṅkte dakṣiṇāmukhaḥ | sopānatkaśca yadbhuṅkte sarvaṃ vidyāttadāsuram
जो सिर ढककर खाया जाए, जो दक्षिण की ओर मुख करके खाया जाए और जो जूते पहनकर खाया जाए, उस सबको आसुर जानना चाहिए।
श्लोक 20 (13.137.20)
असूयता च यदत्तं यच्च श्रद्धाविवर्जितम् । सर्वं तदसुरेन्द्राय ब्रह्मा भागमकल्पयत् ॥
asūyatā ca yadattaṃ yacca śraddhāvivarjitam | sarvaṃ tadasurendrāya brahmā bhāgamakalpayat
जो द्वेषभाव से दिया गया हो और जो श्रद्धा से रहित हो, वह सब ब्रह्मा ने असुरों के राजा के भाग के रूप में निश्चित किया है।
श्लोक 21 (13.137.21)
श्वानश्च पङ्क्तिदूषाश्च नावेक्षेरन्कथञ्चन । तस्मात्परिसृते दद्यात्तिलांश्चान्ववकीरयेत् ॥
śvānaśca paṅktidūṣāśca nāvekṣerankathañcana | tasmātparisṛte dadyāttilāṃścānvavakīrayet
कुत्ते और पंक्ति को दूषित करने वाले लोग किसी प्रकार उसे न देखने पाएँ। इसलिए घिरे हुए स्थान में दान दे और तिल बिखेर दे।
श्लोक 22 (13.137.22)
तिलैर्विरहितं श्राद्धं कृतं क्रोधवशेन च । यातुधानाः पिशाचाश्च विप्रलुम्पन्ति तद्धविः ॥
tilairvirahitaṃ śrāddhaṃ kṛtaṃ krodhavaśena ca | yātudhānāḥ piśācāśca vipralumpanti taddhaviḥ
तिल के बिना किया गया, अथवा क्रोध के वश होकर किया गया श्राद्ध — उसके हविष्य को यातुधान और पिशाच छीन ले जाते हैं।
श्लोक 23 (13.137.23)
अपाङ्क्तो यावतः पाङ्क्तान्भुञ्जानाननुपश्यति । तावत्फलाद्भ्रंशयति दातारं तस्य बालिशम् ॥
apāṅkto yāvataḥ pāṅktānbhuñjānānanupaśyati | tāvatphalādbhraṃśayati dātāraṃ tasya bāliśam
पंक्ति के अयोग्य मनुष्य जितने पंक्ति-योग्य भोजन करने वालों को देखता है, उतने फल से वह उस मूर्ख दाता को वंचित कर देता है।
श्लोक 24 (13.137.24)
इमे तु भरतश्रेष्ठ विज्ञेयाः पङ्क्तिपावनाः । हेतुतस्तान्प्रवक्ष्यामि परीक्षस्वेह तान्द्विजान् ॥
ime tu bharataśreṣṭha vijñeyāḥ paṅktipāvanāḥ | hetutastānpravakṣyāmi parīkṣasveha tāndvijān
हे भरतश्रेष्ठ, अब ये पंक्ति को पवित्र करने वाले जानने योग्य हैं। मैं कारण सहित उन्हें बताऊँगा; तुम उन ब्राह्मणों की वैसी ही परीक्षा करना।
श्लोक 25 (13.137.25)
विद्यावेदव्रतस्नाता ब्राह्मणाः सर्व एव हि । सदाचारपराश्चैव विज्ञेयाः सर्वपावनाः ॥
vidyāvedavratasnātā brāhmaṇāḥ sarva eva hi | sadācāraparāścaiva vijñeyāḥ sarvapāvanāḥ
विद्या, वेद और व्रत में स्नातक तथा सदाचार में तत्पर सभी ब्राह्मण सबको पवित्र करने वाले जानने चाहिए।
श्लोक 26 (13.137.26)
पाङ्क्तेयांस्तु प्रवक्ष्यामि ज्ञेयास्ते पङ्क्तिपावनाः । त्रिणाचिकेतः पञ्चाग्निस्त्रिसुपर्णः षडङ्गवित् ॥
pāṅkteyāṃstu pravakṣyāmi jñeyāste paṅktipāvanāḥ | triṇāciketaḥ pañcāgnistrisuparṇaḥ ṣaḍaṅgavit
जो पंक्ति के योग्य हैं और पंक्ति को पवित्र करने वाले जाने जाते हैं, उन्हें मैं बताता हूँ: त्रिणाचिकेत, पञ्चाग्नि, त्रिसुपर्ण और छहों अंगों का ज्ञाता;
श्लोक 27 (13.137.27)
ब्रह्मदेयानुसन्तानश्छन्दोगो ज्येष्ठसामगः । मातापित्रोर्यश्च वश्यः श्रोत्रियो दशपूरुषः ॥
brahmadeyānusantānaśchandogo jyeṣṭhasāmagaḥ | mātāpitroryaśca vaśyaḥ śrotriyo daśapūruṣaḥ
ब्रह्मदेय की परम्परा में उत्पन्न, छन्दोग, ज्येष्ठसामग, माता-पिता के आज्ञाकारी, श्रोत्रिय और दस पीढ़ियों तक विद्वान् कुल का पुरुष;
श्लोक 28 (13.137.28)
ऋतुकालाभिगामी च धर्मपत्नीषु यः सदा । वेदविद्याव्रतस्नातो विप्रः पङ्क्तिं पुनात्युत ॥
ṛtukālābhigāmī ca dharmapatnīṣu yaḥ sadā | vedavidyāvratasnāto vipraḥ paṅktiṃ punātyuta
जो सदा ऋतुकाल में अपनी धर्मपत्नियों के पास जाता है; और वेद, विद्या तथा व्रत में स्नातक ब्राह्मण पंक्ति को पवित्र करता है।
श्लोक 29 (13.137.29)
अथर्वशिरसोऽध्येता ब्रह्मचारी यतव्रतः । सत्यवादी धर्मशीलः स्वकर्मनिरतश्च सः ॥
atharvaśiraso'dhyetā brahmacārī yatavrataḥ | satyavādī dharmaśīlaḥ svakarmanirataśca saḥ
अथर्वशिरस् का अध्ययन करने वाला, दृढ़ व्रत वाला ब्रह्मचारी, सत्यवादी, धर्मशील और अपने कर्म में लगा हुआ;
श्लोक 30 (13.137.30)
ये च पुण्येषु तीर्थेषु अभिषेककृतश्रमाः । मखेषु च समन्त्रेषु भवन्त्यवभृथप्लुताः ॥
ye ca puṇyeṣu tīrtheṣu abhiṣekakṛtaśramāḥ | makheṣu ca samantreṣu bhavantyavabhṛthaplutāḥ
जिन्होंने पवित्र तीर्थों में स्नान का श्रम किया है, और जो मन्त्रयुक्त यज्ञों में अवभृथ स्नान में डूबे होते हैं;
श्लोक 31 (13.137.31)
अक्रोधना ह्यचपलाः क्षान्ताः दान्ता जितेन्द्रियाः । सर्वभूतहिता ये च श्राद्धेष्वेतान्निमन्त्रयेत् ॥
akrodhanā hyacapalāḥ kṣāntāḥ dāntā jitendriyāḥ | sarvabhūtahitā ye ca śrāddheṣvetānnimantrayet
जो क्रोधरहित, स्थिर, क्षमाशील, संयमी, जितेन्द्रिय और सब प्राणियों का हित चाहने वाले हैं, उन्हें श्राद्धों में निमन्त्रित करे।
श्लोक 32 (13.137.32)
एतेषु दत्तमक्षय्यमेते वै पङ्क्तिपावनाः । इमे परे महाभागा विज्ञेयाः पङ्क्तिपावनाः ॥
eteṣu dattamakṣayyamete vai paṅktipāvanāḥ | ime pare mahābhāgā vijñeyāḥ paṅktipāvanāḥ
इन्हें दिया हुआ अक्षय होता है; ये ही पंक्ति को पवित्र करने वाले हैं। अन्य महाभाग भी पंक्ति को पवित्र करने वाले जानने चाहिए:
श्लोक 33 (13.137.33)
यतयो मोक्षधर्मज्ञा योगिनश्चरितव्रताः । पञ्चरात्रविदो मुख्यास्तथा भागवताः परे ॥
yatayo mokṣadharmajñā yoginaścaritavratāḥ | pañcarātravido mukhyāstathā bhāgavatāḥ pare
मोक्षधर्म को जानने वाले यति, व्रत पूर्ण करने वाले योगी, पाञ्चरात्र के श्रेष्ठ ज्ञाता और इसी प्रकार अन्य भागवत;
श्लोक 34 (13.137.34)
वैखानसाः कुलश्रेष्ठा वैदिकाचारचारिणः । ये चेतिहासं प्रयताः श्रावयन्ति द्विजोत्तमान् ॥
vaikhānasāḥ kulaśreṣṭhā vaidikācāracāriṇaḥ | ye cetihāsaṃ prayatāḥ śrāvayanti dvijottamān
वैखानस, जो श्रेष्ठ कुलों के हैं और वैदिक आचार का पालन करते हैं; तथा जो संयमपूर्वक श्रेष्ठ द्विजों को इतिहास सुनाते हैं;
श्लोक 35 (13.137.35)
ये च भाष्यविदः केचिद्ये च व्याकरणे रताः । अधीयते पुराणं ये धर्मशास्त्राण्यथापि च ॥
ye ca bhāṣyavidaḥ kecidye ca vyākaraṇe ratāḥ | adhīyate purāṇaṃ ye dharmaśāstrāṇyathāpi ca
कुछ जो भाष्य के ज्ञाता हैं, जो व्याकरण में रमते हैं, और जो पुराण तथा धर्मशास्त्रों का अध्ययन करते हैं;
श्लोक 36 (13.137.36)
अधीत्य च यथान्यायं विधिवत्तस्य कारिणः । उपपन्नो गुरुकुले सत्यवादी सहस्रशः ॥
adhītya ca yathānyāyaṃ vidhivattasya kāriṇaḥ | upapanno gurukule satyavādī sahasraśaḥ
जो विधिपूर्वक अध्ययन करके उसी के अनुसार आचरण करते हैं; गुरुकुल में रहने वाले, सत्यवादी, ऐसे लोग हजारों की संख्या में होते हैं।
श्लोक 37 (13.137.37)
अग्र्याः सर्वेषु वेदेषु सर्वप्रवचनेषु च । यावदेते प्रपश्यन्ति पङ्क्त्यास्तावत्पुनन्त्युत ॥
agryāḥ sarveṣu vedeṣu sarvapravacaneṣu ca | yāvadete prapaśyanti paṅktyāstāvatpunantyuta
सब वेदों और सब प्रवचनों में अग्रणी ये लोग पंक्ति में जहाँ तक देखते हैं, वहाँ तक उसे पवित्र कर देते हैं।
श्लोक 38 (13.137.38)
ततो हि पावनात्पङ्क्त्याः पङ्क्तिपावन उच्यते । क्रोशादर्धतृतीयाच्च पावयेदेक एव हि । ब्रह्मदेयानुसन्तान इति ब्रह्मविदो विदुः ॥
tato hi pāvanātpaṅktyāḥ paṅktipāvana ucyate | krośādardhatṛtīyācca pāvayedeka eva hi | brahmadeyānusantāna iti brahmavido viduḥ
पंक्ति को पवित्र करने के कारण उसे पंक्तिपावन कहा जाता है। ऐसा अकेला मनुष्य ढाई कोस तक के लोगों को पवित्र कर सकता है। ब्रह्मवेत्ता कहते हैं कि वह ब्रह्मदेय की परम्परा में उत्पन्न है।
श्लोक 39 (13.137.39)
अनुत्विगनुपाध्यायः स चेदग्रासनं व्रजेत् । ऋत्विग्भिरभ्यनुज्ञातः पङ्क्त्या हरति दुष्कृतम् ॥
anutviganupādhyāyaḥ sa cedagrāsanaṃ vrajet | ṛtvigbhirabhyanujñātaḥ paṅktyā harati duṣkṛtam
जो न ऋत्विक् है, न उपाध्याय, यदि वह ऋत्विजों की अनुमति से प्रथम आसन पर बैठे, तो वह पंक्ति के दोष को दूर कर देता है।
श्लोक 40 (13.137.40)
अथ चेद्वेदवित्सर्वैः पङ्क्तिदोषैर्विवर्जितः । न च स्यात्पतितो राजन्पङ्क्तिपावन एव सः ॥
atha cedvedavitsarvaiḥ paṅktidoṣairvivarjitaḥ | na ca syātpatito rājanpaṅktipāvana eva saḥ
और यदि वेदवेत्ता पंक्ति के सब दोषों से रहित हो और पतित न हो, तो हे राजन्, वह पंक्ति को पवित्र करने वाला ही है।
श्लोक 41 (13.137.41)
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन परीक्ष्यामन्त्रयेद्द्विजान् । स्वकर्मनिरतान्दान्तान्कुले जातान्बहुश्रुतान् ॥
tasmātsarvaprayatnena parīkṣyāmantrayeddvijān | svakarmaniratāndāntānkule jātānbahuśrutān
इसलिए पूरे प्रयत्न से परीक्षा करके ऐसे ब्राह्मणों को निमन्त्रित करे जो अपने कर्म में लगे हों, संयमी हों, उत्तम कुल में उत्पन्न हों और बहुश्रुत हों।
श्लोक 42 (13.137.42)
यस्य मित्रप्रधानानि श्राद्धानि च हवींषि च । न प्रीणन्ति पितॄन्देवान्स्वर्गं च न स गच्छति ॥
yasya mitrapradhānāni śrāddhāni ca havīṃṣi ca | na prīṇanti pitṝndevānsvargaṃ ca na sa gacchati
जिसके श्राद्ध और हवन मुख्यतः मित्रों के लिए होते हैं, वह पितरों और देवताओं को प्रसन्न नहीं करता और स्वर्ग को भी नहीं जाता।
श्लोक 43 (13.137.43)
यश्च श्राद्धे कुरुते सङ्गतानि । न देवयानेन पथा स याति । स वै मुक्तः पिप्पलं बन्धनाद्वा । स्वर्गाल्लोकाच्च्यवते श्राद्धमित्रः ॥
yaśca śrāddhe kurute saṅgatāni | na devayānena pathā sa yāti | sa vai muktaḥ pippalaṃ bandhanādvā | svargāllokāccyavate śrāddhamitraḥ
जो श्राद्ध में मित्रताएँ जोड़ता है, वह देवयान मार्ग से नहीं जाता। बन्धन से छूटे पीपल के फल की तरह वह स्वर्गलोक से गिर जाता है, जो श्राद्ध को मित्रता का साधन बनाता है।
श्लोक 44 (13.137.44)
तस्मान्मित्रं श्राद्धकृन्नाद्रियेत । दद्यान्मित्रेभ्यः सङ्ग्रहार्थं धनानि । यन्मन्यते नैव शत्रुं न मित्रं । तं मध्यस्थं भोजयेद्धव्यकव्ये ॥
tasmānmitraṃ śrāddhakṛnnādriyeta | dadyānmitrebhyaḥ saṅgrahārthaṃ dhanāni | yanmanyate naiva śatruṃ na mitraṃ | taṃ madhyasthaṃ bhojayeddhavyakavye
इसलिए श्राद्ध करने वाला मित्र का आदर न करे। मित्रों को अपने साथ जोड़े रखने के लिए वह धन दे सकता है; पर जिसे वह न शत्रु मानता हो, न मित्र, उस मध्यस्थ को देवकार्य और पितृकार्य में भोजन कराए।
श्लोक 45 (13.137.45)
यथोषरे बीजमुप्तं न रोहे- । न्नचावप्ता प्राप्नुयाद्बीजभागम् । एवं श्राद्धं भुक्तमनर्हमाणै- । र्न चेह नामुत्र फलं ददाति ॥
yathoṣare bījamuptaṃ na rohe- | nnacāvaptā prāpnuyādbījabhāgam | evaṃ śrāddhaṃ bhuktamanarhamāṇai- | rna ceha nāmutra phalaṃ dadāti
जैसे ऊसर भूमि में बोया हुआ बीज उगता नहीं और बोने वाले को फसल का भाग नहीं मिलता, वैसे ही अयोग्य लोगों द्वारा खाया हुआ श्राद्ध न यहाँ फल देता है, न परलोक में।
श्लोक 46 (13.137.46)
ब्राह्मणो ह्यनधीयानस्तृणाग्निरिव शाम्यति । तस्मै श्राद्धं न दातव्यं न हि भस्मनि हूयते ॥
brāhmaṇo hyanadhīyānastṛṇāgniriva śāmyati | tasmai śrāddhaṃ na dātavyaṃ na hi bhasmani hūyate
जो ब्राह्मण अध्ययन नहीं करता, वह तिनकों की आग की तरह बुझ जाता है। उसे श्राद्ध नहीं देना चाहिए, क्योंकि राख में आहुति नहीं दी जाती।
श्लोक 47 (13.137.47)
सम्भोजनी नाम पिशाचदक्षिणा । सा नैव देवान्न पितॄनुपैति । इहैव सा भ्राम्यति हीनपुण्या । शालान्तरे गौरिव नष्टवत्सा ॥
sambhojanī nāma piśācadakṣiṇā | sā naiva devānna pitṝnupaiti | ihaiva sā bhrāmyati hīnapuṇyā | śālāntare gauriva naṣṭavatsā
सम्भोजनी नामक दक्षिणा पिशाचों की दक्षिणा है। वह न देवताओं के पास पहुँचती है, न पितरों के पास; यहीं भटकती रहती है, पुण्यहीन, उस गाय की तरह जिसका बछड़ा गोशाला में खो गया हो।
श्लोक 48 (13.137.48)
यथाऽग्नौ शान्ते घृतमाजुहोति । तन्नैव देवान्न पितॄनुपैति । तथा दत्तं नर्तके गायके च । यां चानृते दक्षिणामावृणोति ॥
yathā'gnau śānte ghṛtamājuhoti | tannaiva devānna pitṝnupaiti | tathā dattaṃ nartake gāyake ca | yāṃ cānṛte dakṣiṇāmāvṛṇoti
जैसे बुझी हुई आग में डाला गया घी न देवताओं को पहुँचता है, न पितरों को, वैसे ही वह भी है जो नर्तक और गायक को दिया जाए, और वह दक्षिणा भी जो झूठ के लिए दी जाए।
श्लोक 49 (13.137.49)
उभौ हिनस्ति न भुनक्ति चैषा । या चानृते दक्षिणा दीयते वै । आघातिनी गर्हितैषा पतन्ती । तेषां प्रेतान्पातयेद्देवयानात् ॥
ubhau hinasti na bhunakti caiṣā | yā cānṛte dakṣiṇā dīyate vai | āghātinī garhitaiṣā patantī | teṣāṃ pretānpātayeddevayānāt
झूठ के लिए जो दक्षिणा दी जाती है, वह देने वाले और लेने वाले दोनों को हानि पहुँचाती है और भोग नहीं देती। वह घातक और निन्दित होकर गिरती है, और उनके दिवंगत पितरों को देवयान मार्ग से गिरा देती है।
श्लोक 50 (13.137.50)
ऋषीणां समये नित्यं ये चरन्ति युधिष्ठिर । निश्चिताः सर्वधर्मज्ञास्तान्देवा ब्राह्मणान्विदुः ॥
ṛṣīṇāṃ samaye nityaṃ ye caranti yudhiṣṭhira | niścitāḥ sarvadharmajñāstāndevā brāhmaṇānviduḥ
हे युधिष्ठिर, जो सदा ऋषियों की मर्यादा का पालन करते हैं, दृढ़ निश्चय वाले और सब धर्मों के ज्ञाता हैं, उन्हीं को देवता ब्राह्मण जानते हैं।
श्लोक 51 (13.137.51)
स्वाध्यायनिष्ठा ऋषयो ज्ञाननिष्ठास्तथैव च । तपोनिष्ठाश्च बोद्धव्याः कर्मनिष्ठाश्च भारत ॥
svādhyāyaniṣṭhā ṛṣayo jñānaniṣṭhāstathaiva ca | taponiṣṭhāśca boddhavyāḥ karmaniṣṭhāśca bhārata
हे भारत, ऋषियों को स्वाध्याय में निष्ठा रखने वाले, इसी प्रकार ज्ञान में निष्ठा रखने वाले, तप में निष्ठा रखने वाले और कर्म में निष्ठा रखने वाले जानना चाहिए।
श्लोक 52 (13.137.52)
कव्यानि ज्ञाननिष्ठेभ्यः प्रतिष्ठाप्यानि भारत । तत्र ये ब्राह्मणान्केचिन्न सीदन्ति हि ते नराः ॥
kavyāni jñānaniṣṭhebhyaḥ pratiṣṭhāpyāni bhārata | tatra ye brāhmaṇānkecinna sīdanti hi te narāḥ
हे भारत, पितरों के निमित्त कव्य ज्ञान में निष्ठा रखने वालों को ही अर्पित करना चाहिए। उनमें जो लोग किसी ब्राह्मण को दुःख में नहीं डालते, वे स्वयं दुःख में नहीं पड़ते।
श्लोक 53 (13.137.53)
ये तु निन्दन्ति जल्पेषु न ताञ्श्राद्धेषु भोजयेत् । ब्राह्मणा निन्दिता राजन्हन्युस्त्रैपुरुषं कुलम् ॥
ye tu nindanti jalpeṣu na tāñśrāddheṣu bhojayet | brāhmaṇā ninditā rājanhanyustraipuruṣaṃ kulam
जो बातचीत में उनकी निन्दा करते हैं, उन्हें श्राद्धों में भोजन न कराए। हे राजन्, निन्दित ब्राह्मण तीन पीढ़ियों तक के कुल का नाश कर सकते हैं।
श्लोक 54 (13.137.54)
वैखानसानां वचनमृषीणां श्रूयते नृप । दूरादेव परीक्षेत ब्राह्मणान्वेदपारगान् ॥
vaikhānasānāṃ vacanamṛṣīṇāṃ śrūyate nṛpa | dūrādeva parīkṣeta brāhmaṇānvedapāragān
हे राजन्, वैखानस ऋषियों का वचन सुना जाता है कि वेद के पारंगत ब्राह्मणों की परीक्षा दूर से ही करनी चाहिए।
श्लोक 55 (13.137.55)
प्रियो वा यदि वा द्वेष्यस्तेषां तु श्राद्धमावपेत् ॥
priyo vā yadi vā dveṣyasteṣāṃ tu śrāddhamāvapet
वे प्रिय हों या अप्रिय, उन्हीं को श्राद्ध अर्पित करना चाहिए।
श्लोक 56 (13.137.56)
यः सहस्रं सहस्राणां भोजयेदनृचो नरः । एकस्तान्मन्त्रवित्प्रीतः सर्वानर्हति भारत ॥
yaḥ sahasraṃ sahasrāṇāṃ bhojayedanṛco naraḥ | ekastānmantravitprītaḥ sarvānarhati bhārata
यदि कोई मनुष्य ऋचाओं को न जानने वाले हजारों-हजार ब्राह्मणों को भोजन कराए, तो भी हे भारत, प्रसन्न हुआ अकेला मन्त्रवेत्ता उन सबके बराबर है।