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अनुशासन पर्व · अध्याय 138

निमि का श्राद्ध और अत्रि का विधान

युधिष्ठिर के पूछने पर कि श्राद्ध का आरम्भ कैसे हुआ, भीष्म निमि की कथा सुनाते हैं, जिसने अपने मृत पुत्र के शोक में पहली बार पिण्ड अर्पित किए और फिर डरा कि उसने धर्म तोड़ा है। अत्रि प्रकट होकर उसे बताते हैं कि यह विधि ब्रह्मा ने ही निर्धारित की थी, और उसकी प्रक्रिया, विश्वेदेवों के नाम तथा वर्जित अन्न, मनुष्य और दृश्य गिनाते हैं।

अध्याय 137अध्याय-सूचीअध्याय 139

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (13.138.1)

केन सङ्कल्पितं श्राद्धं कस्मिन्काले किमात्मकम् । भृग्वङ्गिरसिके काले मुनिना कतरेण वा ॥

kena saṅkalpitaṃ śrāddhaṃ kasminkāle kimātmakam | bhṛgvaṅgirasike kāle muninā katareṇa vā

श्राद्ध की कल्पना किसने की, किस काल में, और उसका स्वरूप क्या था? क्या वह भृगुओं और अंगिरसों के समय में हुई थी, और किस मुनि ने की?

श्लोक 2 (13.138.2)

येन सङ्कल्पितं चैव तन्मे ब्रूहि पितामह । कानि श्राद्धेषु वर्ज्यानि कानि मूलफलानि च । धान्यजात्यश्च का वर्ज्यास्तन्मे ब्रूहि पितामह ॥

yena saṅkalpitaṃ caiva tanme brūhi pitāmaha | kāni śrāddheṣu varjyāni kāni mūlaphalāni ca | dhānyajātyaśca kā varjyāstanme brūhi pitāmaha

पितामह, यह बताइए कि इसकी कल्पना किसने की। श्राद्धों में कौन-सी वस्तुएँ वर्जित हैं, कौन-से मूल और फल, और कौन-सी जातियों के अन्न वर्जित हैं, यह मुझे बताइए, पितामह।

भीष्म उवाच

श्लोक 3 (13.138.3)

यथा श्राद्धं सम्प्रवृत्तं यस्मिन्काले सदात्मकम् । येन सङ्कल्पितं चैव तन्मे शृणु जनाधिप ॥

yathā śrāddhaṃ sampravṛttaṃ yasminkāle sadātmakam | yena saṅkalpitaṃ caiva tanme śṛṇu janādhipa

हे नरेश्वर, श्राद्ध कैसे प्रचलित हुआ, किस काल में, किस स्वरूप में और किसने उसकी कल्पना की, यह मुझसे सुनो।

श्लोक 4 (13.138.4)

स्वायम्भुवोऽत्रिः कौरव्य परमर्षिः प्रतापवान् । तस्य वंशे महाराज दत्तात्रेय इति स्मृतः ॥

svāyambhuvo'triḥ kauravya paramarṣiḥ pratāpavān | tasya vaṃśe mahārāja dattātreya iti smṛtaḥ

हे कौरव, स्वायम्भुव वंश के अत्रि प्रतापी परमर्षि थे। हे महाराज, उनके वंश में दत्तात्रेय नाम से स्मरण किए जाने वाले हुए।

श्लोक 5 (13.138.5)

दत्तात्रेयस्य पुत्रोऽभून्निमिर्नाम तपोधनः । निमेश्चाप्यभवत्पुत्रः श्रीमान्नाम श्रिया वृतः ॥

dattātreyasya putro'bhūnnimirnāma tapodhanaḥ | nimeścāpyabhavatputraḥ śrīmānnāma śriyā vṛtaḥ

दत्तात्रेय के निमि नाम के तपस्वी पुत्र हुए; और निमि के श्रीमान् नाम का पुत्र हुआ, जो श्री से घिरा हुआ था।

श्लोक 6 (13.138.6)

पूर्णो वर्षसहस्रान्ते स कृत्वा दुष्करं तपः । कालधर्मपरीतात्मा निधनं समुपागतः ॥

pūrṇo varṣasahasrānte sa kṛtvā duṣkaraṃ tapaḥ | kāladharmaparītātmā nidhanaṃ samupāgataḥ

पूरे एक हजार वर्ष बीतने पर, कठिन तप करके, वह कालधर्म से घिरकर मृत्यु को प्राप्त हुआ।

श्लोक 7 (13.138.7)

निमिस्तु कृत्वा शौचानि विधिदृष्टेन कर्मणा । सन्तापमगमत्तीव्रं पुत्रशोकपरायणः ॥

nimistu kṛtvā śaucāni vidhidṛṣṭena karmaṇā | santāpamagamattīvraṃ putraśokaparāyaṇaḥ

निमि ने विधि के अनुसार शुद्धि के कर्म पूरे किए, और पुत्र के शोक में डूबकर तीव्र सन्ताप में पड़ गया।

श्लोक 8 (13.138.8)

अथ कृत्वोपकार्याणि चतुर्दश्यां महामतिः । तमेव गणयञ्शोकं विरात्रे प्रत्यबुध्यत ॥

atha kṛtvopakāryāṇi caturdaśyāṃ mahāmatiḥ | tameva gaṇayañśokaṃ virātre pratyabudhyata

फिर चतुर्दशी के दिन उस बुद्धिमान् ने आवश्यक तैयारियाँ कीं, और उसी शोक का चिन्तन करते हुए रात्रि के अन्त में जाग उठा।

श्लोक 9 (13.138.9)

तस्यासीत्प्रतिबुद्धस्य शोकेन व्यथितात्मनः । मनः संहृत्य विषये बुद्धिर्विस्तारगामिनी ॥

tasyāsītpratibuddhasya śokena vyathitātmanaḥ | manaḥ saṃhṛtya viṣaye buddhirvistāragāminī

जागने पर शोक से पीड़ित उसने अपने मन को विषय से हटा लिया, और उसकी बुद्धि विस्तार की ओर चल पड़ी।

श्लोक 10 (13.138.10)

ततः सञ्चिन्तयामास श्राद्धकल्पं समाहितः । यानि तस्यैव भोज्यानि मूलानि च फलानि च ॥

tataḥ sañcintayāmāsa śrāddhakalpaṃ samāhitaḥ | yāni tasyaiva bhojyāni mūlāni ca phalāni ca

तब एकाग्र होकर उसने श्राद्ध की विधि पर विचार किया: उसके योग्य भोज्य पदार्थ, मूल और फल,

श्लोक 11 (13.138.11)

उक्तानि यानि चान्यानि यानि चेष्टानि तस्य ह । तानि सर्वाणि मनसा विनिश्चित्य तपोधनः ॥

uktāni yāni cānyāni yāni ceṣṭāni tasya ha | tāni sarvāṇi manasā viniścitya tapodhanaḥ

तथा जो अन्य वस्तुएँ बताई गई थीं और जो उसे प्रिय थीं। यह सब मन में निश्चित करके उस तपस्वी ने,

श्लोक 12 (13.138.12)

अमावास्यां महाप्राज्ञो विप्रानानाय्य पूजितान् । दक्षिणावर्तिकाः सर्वा बृसीः स्वयमथाकरोत् ॥

amāvāsyāṃ mahāprājño viprānānāyya pūjitān | dakṣiṇāvartikāḥ sarvā bṛsīḥ svayamathākarot

अमावास्या के दिन उस महाप्राज्ञ ने सम्मानित ब्राह्मणों को बुलाकर सब आसन स्वयं दक्षिणावर्त रूप में बिछाए।

श्लोक 13 (13.138.13)

सप्त विप्रांस्ततो भोज्ये युगपत्समुपानयत् । ऋते च लवणं भोज्यं श्यामाकान्नं ददौ प्रभुः ॥

sapta viprāṃstato bhojye yugapatsamupānayat | ṛte ca lavaṇaṃ bhojyaṃ śyāmākānnaṃ dadau prabhuḥ

फिर उसने सात ब्राह्मणों को एक साथ भोजन के लिए बुलाया; और उस प्रभु ने उन्हें बिना नमक का श्यामाक अन्न दिया।

श्लोक 14 (13.138.14)

दक्षिणाग्रास्ततो दर्भा विष्टरेषु निवेशिताः । पादयोश्चैव विप्राणां ये त्वन्नमुपभुञ्जते ॥

dakṣiṇāgrāstato darbhā viṣṭareṣu niveśitāḥ | pādayoścaiva viprāṇāṃ ye tvannamupabhuñjate

फिर आसनों पर दक्षिण की ओर नोक वाला कुश बिछाया गया, और भोजन करने वाले ब्राह्मणों के पैरों के पास भी।

श्लोक 15 (13.138.15)

कृत्वा च दक्षिणाग्रान्वै दर्भान्स प्रयतः शुचिः । प्रददौ श्रीमते पिण्डान्नामगोत्रमुदाहरन् ॥

kṛtvā ca dakṣiṇāgrānvai darbhānsa prayataḥ śuciḥ | pradadau śrīmate piṇḍānnāmagotramudāharan

दक्षिण की ओर नोक वाले कुश बिछाकर उसने संयत और पवित्र होकर श्रीमान् के नाम और गोत्र का उच्चारण करते हुए पिण्ड अर्पित किए।

श्लोक 16 (13.138.16)

तत्कृत्वा स मुनिश्रेष्ठो धर्मसङ्करमात्मनः । पश्चात्तापेन महता तप्यमानोऽभ्यचिन्तयत् ॥

tatkṛtvā sa muniśreṣṭho dharmasaṅkaramātmanaḥ | paścāttāpena mahatā tapyamāno'bhyacintayat

यह करके वह मुनिश्रेष्ठ अपने द्वारा किए गए धर्मसंकर के कारण बड़े पश्चात्ताप से जलते हुए सोचने लगा:

श्लोक 17 (13.138.17)

अकृतं मुनिभिः पूर्वं किं मयेदमनुष्ठितम् । कथं नु शापेन न मां दहेयुर्ब्राह्मणा इति ॥

akṛtaṃ munibhiḥ pūrvaṃ kiṃ mayedamanuṣṭhitam | kathaṃ nu śāpena na māṃ daheyurbrāhmaṇā iti

"जो कार्य पहले मुनियों ने कभी नहीं किया, वह मैंने क्यों कर डाला? ब्राह्मण मुझे शाप से कैसे भस्म नहीं कर देंगे?"

श्लोक 18 (13.138.18)

ततः सञ्चिन्तयामास वंशकर्तारमात्मनः । बुद्ध्वाऽत्रिं मनसा दध्यौ भगवन्तं समाहितः । ध्यातमात्रस्तथा चात्रिराजगाम तपोधनः ॥

tataḥ sañcintayāmāsa vaṃśakartāramātmanaḥ | buddhvā'triṃ manasā dadhyau bhagavantaṃ samāhitaḥ | dhyātamātrastathā cātrirājagāma tapodhanaḥ

तब उसने अपने वंश के प्रवर्तक का स्मरण किया। मन में पूज्य अत्रि का ध्यान करके वह एकाग्र होकर उनका चिन्तन करने लगा; और स्मरण करते ही तपोधन अत्रि वहाँ आ पहुँचे।

श्लोक 19 (13.138.19)

अथात्रिस्तं तथा दृष्ट्वा पुत्रशोकेन कर्शितम् । भृशमाश्वासयामास वाग्भिरिष्टाभिरव्ययः ॥

athātristaṃ tathā dṛṣṭvā putraśokena karśitam | bhṛśamāśvāsayāmāsa vāgbhiriṣṭābhiravyayaḥ

तब अविनाशी अत्रि ने उसे पुत्रशोक से क्षीण देखकर प्रिय वचनों से उसे बहुत सान्त्वना दी।

अत्रिरुवाच

श्लोक 20 (13.138.20)

निमे सङ्कल्पितस्तेऽयं पितृयज्ञस्तपोधन । मतो मे पूर्वदृष्टोऽत्र धर्मोऽयं ब्रह्मणा स्वयम् ॥

nime saṅkalpitaste'yaṃ pitṛyajñastapodhana | mato me pūrvadṛṣṭo'tra dharmo'yaṃ brahmaṇā svayam

निमि, हे तपोधन, तुमने जो यह पितृयज्ञ सोचा है, उसे मैं स्वीकार करता हूँ; क्योंकि यह धर्म पहले ब्रह्मा ने स्वयं यहाँ देखा था।

श्लोक 21 (13.138.21)

सोऽयं स्वयम्भुविहितो धर्मः सङ्कल्पितस्त्वया । ऋते स्वयम्भुवः कोऽन्यः श्राद्धे संविधिमाहरेत् ॥

so'yaṃ svayambhuvihito dharmaḥ saṅkalpitastvayā | ṛte svayambhuvaḥ ko'nyaḥ śrāddhe saṃvidhimāharet

यह स्वयम्भू द्वारा विहित धर्म तुमने स्वयं सोचा है। स्वयम्भू के सिवा और कौन श्राद्ध में विधि का प्रवर्तन कर सकता है?

श्लोक 22 (13.138.22)

अथाख्यास्यामि ते पुत्र श्राद्धे यं विधिमुत्तमम् । स्वयम्भुविहितं पुत्र तत्कुरुष्व निबोध मे ॥

athākhyāsyāmi te putra śrāddhe yaṃ vidhimuttamam | svayambhuvihitaṃ putra tatkuruṣva nibodha me

पुत्र, अब मैं तुम्हें श्राद्ध की वह उत्तम विधि बताऊँगा जो स्वयम्भू ने निर्धारित की है। पुत्र, मेरी बात सुनो और उसका पालन करो।

श्लोक 23 (13.138.23)

कृत्वाऽग्निशरणं पूर्वं मन्त्रपूर्वं तपोधन । ततोऽग्नयेऽथ सोमाय वरुणाय च नित्यशः ॥

kṛtvā'gniśaraṇaṃ pūrvaṃ mantrapūrvaṃ tapodhana | tato'gnaye'tha somāya varuṇāya ca nityaśaḥ

हे तपोधन, पहले मन्त्रों सहित अग्नि का स्थान तैयार करके, फिर अग्नि, सोम और वरुण के लिए सदा आहुति दो।

श्लोक 24 (13.138.24)

विश्वेदेवाश्च ये नित्यं पितृभिः सह गोचराः । तेभ्यः सङ्कल्पिता भागाः स्वयमेव स्वयम्भुवा ॥

viśvedevāśca ye nityaṃ pitṛbhiḥ saha gocarāḥ | tebhyaḥ saṅkalpitā bhāgāḥ svayameva svayambhuvā

और विश्वेदेव, जो सदा पितरों के साथ विचरते हैं, उनके लिए स्वयम्भू ने स्वयं भाग निश्चित किए हैं।

श्लोक 25 (13.138.25)

स्तोतव्या चेह पृथिवी लोकस्यैव तु धारिणी । वैष्णवी काश्यपि चेति तथैवेहाक्षयेति च ॥

stotavyā ceha pṛthivī lokasyaiva tu dhāriṇī | vaiṣṇavī kāśyapi ceti tathaivehākṣayeti ca

और यहाँ लोक को धारण करने वाली पृथ्वी की स्तुति करनी चाहिए: वैष्णवी, काश्यपी और अक्षया नामों से।

श्लोक 26 (13.138.26)

उदकानयने चैव स्तोतव्यो वरुणो विभुः । ततोऽग्निश्चैव सोमश्च आराध्याविह तेऽनघ ॥

udakānayane caiva stotavyo varuṇo vibhuḥ | tato'gniścaiva somaśca ārādhyāviha te'nagha

और जल लाते समय विभु वरुण की स्तुति करनी चाहिए; फिर हे निष्पाप, यहाँ अग्नि और सोम की भी आराधना करनी चाहिए।

श्लोक 27 (13.138.27)

देवास्तु पितरो नाम निर्मिता ये स्वयम्भुवा । ऊष्मपा ये महाभागास्तेषां भागः प्रकल्पितः ॥

devāstu pitaro nāma nirmitā ye svayambhuvā | ūṣmapā ye mahābhāgāsteṣāṃ bhāgaḥ prakalpitaḥ

स्वयम्भू ने जिन्हें रचा, वे पितर नाम के देवता हैं, महाभाग ऊष्मप; उनके लिए भाग निश्चित किया गया है।

श्लोक 28 (13.138.28)

ते श्राद्धेनार्च्यमाना वै विमुच्यन्ते ह किल्बिषात् । सप्तकाः पितृवंशास्तु पूर्वदृष्टाः स्वयंभुवा ॥

te śrāddhenārcyamānā vai vimucyante ha kilbiṣāt | saptakāḥ pitṛvaṃśāstu pūrvadṛṣṭāḥ svayaṃbhuvā

श्राद्ध से पूजित होने पर वे पाप से मुक्त हो जाते हैं। सात-सात की पितृ-परम्पराएँ स्वयम्भू ने पहले ही देख रखी थीं।

श्लोक 29 (13.138.29)

विश्वे चाग्निमुखा देवाः संख्याताः पूर्वमेव ते । तेषां नामानि वक्ष्यामि भागार्हाणां महात्मनाम् ॥

viśve cāgnimukhā devāḥ saṃkhyātāḥ pūrvameva te | teṣāṃ nāmāni vakṣyāmi bhāgārhāṇāṃ mahātmanām

अग्नि को आगे रखने वाले विश्वेदेवों की गणना पहले ही हो चुकी है। भाग के योग्य उन महात्माओं के नाम मैं बताता हूँ।

श्लोक 30 (13.138.30)

सहः कृतिर्विपाप्मा च पुण्यकृत्पावनस्तथा । ग्राम्यः क्षेम्यः समूहश्च दिव्यसानुस्तथैव च ॥

sahaḥ kṛtirvipāpmā ca puṇyakṛtpāvanastathā | grāmyaḥ kṣemyaḥ samūhaśca divyasānustathaiva ca

सह, कृति, विपाप्मा, पुण्यकृत् और पावन; ग्राम्य, क्षेम्य, समूह और दिव्यसानु;

श्लोक 31 (13.138.31)

विवस्वान्वीर्यवाञ्श्रीमान्कीर्तिमान्कृत एव च । जितात्मा मुनिवीर्यश्च दीप्तरोमा भयङ्करः ॥

vivasvānvīryavāñśrīmānkīrtimānkṛta eva ca | jitātmā munivīryaśca dīptaromā bhayaṅkaraḥ

विवस्वान्, वीर्यवान्, श्रीमान्, कीर्तिमान् और कृत; जितात्मा, मुनिवीर्य, दीप्तरोमा और भयंकर;

श्लोक 32 (13.138.32)

अनुकर्मा प्रतीतश्च प्रदाताऽप्यंशुमांस्तथा । शैलाभः परमक्रोधी धीरोष्णी भूपतिस्तथा ॥

anukarmā pratītaśca pradātā'pyaṃśumāṃstathā | śailābhaḥ paramakrodhī dhīroṣṇī bhūpatistathā

अनुकर्मा, प्रतीत, प्रदाता और अंशुमान्; शैलाभ, परमक्रोधी, धीरोष्णी और भूपति;

श्लोक 33 (13.138.33)

स्रजी वज्री वरी चैव विश्वेदेवाः सनातनाः । विद्युद्वर्चाः सोमवर्चाः सूर्यश्रीश्चेति नामतः ॥

srajī vajrī varī caiva viśvedevāḥ sanātanāḥ | vidyudvarcāḥ somavarcāḥ sūryaśrīśceti nāmataḥ

स्रजी, वज्री और वरी, ये सनातन विश्वेदेव; विद्युद्वर्चा, सोमवर्चा और सूर्यश्री नामक;

श्लोक 34 (13.138.34)

सोमपः सूर्यसावित्रो दत्तात्मा पुण्डरीयकः । उष्णीनाभो नभोदश्च विश्वायुर्दीप्तिरेव च ॥

somapaḥ sūryasāvitro dattātmā puṇḍarīyakaḥ | uṣṇīnābho nabhodaśca viśvāyurdīptireva ca

सोमप, सूर्यसावित्र, दत्तात्मा और पुण्डरीयक; उष्णीनाभ, नभोद, विश्वायु और दीप्ति;

श्लोक 35 (13.138.35)

चमूहरः सुरेशश्च व्योमारिः शङ्करो भवः । ईशः कर्ता कृतिर्दक्षो भुवनो दिव्यकर्मकृत् ॥

camūharaḥ sureśaśca vyomāriḥ śaṅkaro bhavaḥ | īśaḥ kartā kṛtirdakṣo bhuvano divyakarmakṛt

चमूहर, सुरेश, व्योमारि, शंकर और भव; ईश, कर्ता, कृति, दक्ष, भुवन और दिव्यकर्मकृत्;

श्लोक 36 (13.138.36)

गणितः पञ्चवीर्यश्च आदित्यो रश्मिवांस्तथा । सप्तकृत्सोमवर्चाश्च विश्वकृत्कविरेव च ॥

gaṇitaḥ pañcavīryaśca ādityo raśmivāṃstathā | saptakṛtsomavarcāśca viśvakṛtkavireva ca

गणित, पञ्चवीर्य, आदित्य और रश्मिमान्; सप्तकृत्, सोमवर्चा, विश्वकृत् और कवि;

श्लोक 37 (13.138.37)

अनुगोप्ता सुगोप्ता च नप्ता चेश्वर एव च । कीर्तितास्ते महाभागाः कालस्य गतिगोचराः ॥

anugoptā sugoptā ca naptā ceśvara eva ca | kīrtitāste mahābhāgāḥ kālasya gatigocarāḥ

अनुगोप्ता, सुगोप्ता, नप्ता और ईश्वर। इन महाभाग देवों के नाम कहे गए; ये काल की गति के भीतर विचरते हैं।

श्लोक 38 (13.138.38)

अश्राद्धेयानि धान्यानि कोद्रवाः पुलकास्तथा । हिङ्गुद्रवेषु शाकेषु मूलानां लशुनं तथा ॥

aśrāddheyāni dhānyāni kodravāḥ pulakāstathā | hiṅgudraveṣu śākeṣu mūlānāṃ laśunaṃ tathā

श्राद्ध के अयोग्य अन्न ये हैं: कोद्रव और पुलक; साथ ही शाकों में डाले जाने वाले हींग के द्रव, और मूलों में लहसुन;

श्लोक 39 (13.138.39)

पलाण्डुः सौभाञ्जनकस्तथा गृञ्जनकादयः । कूश्माण्डजात्यलाबुं च कृष्णं लवणमेव च ॥

palāṇḍuḥ saubhāñjanakastathā gṛñjanakādayaḥ | kūśmāṇḍajātyalābuṃ ca kṛṣṇaṃ lavaṇameva ca

प्याज, सौभाञ्जनक और गृञ्जनक आदि; कुम्हड़ा, उसी जाति की लौकी और काला नमक;

श्लोक 40 (13.138.40)

ग्राम्यवाराहमांसं च यच्चैवाप्रोक्षितं भवेत् । कृष्णाजं जीरकं चैव शीतपाकी तथैव च । अङ्कुराद्यास्तथा वर्ज्या इह शृङ्गाटकानि च ॥

grāmyavārāhamāṃsaṃ ca yaccaivāprokṣitaṃ bhavet | kṛṣṇājaṃ jīrakaṃ caiva śītapākī tathaiva ca | aṅkurādyāstathā varjyā iha śṛṅgāṭakāni ca

ग्रामीण सूअर का मांस और जो कुछ जल से अभिषिक्त न किया गया हो; काला जीरा और जीरा तथा शीतपाकी; अंकुर आदि भी वर्जित हैं, और यहाँ सिंघाड़े भी।

श्लोक 41 (13.138.41)

वर्जयेल्लवणं सर्वं तथा जम्बूफलानि च । अवक्षुतावरुदितं तथा श्राद्धे च वर्जयेत् ॥

varjayellavaṇaṃ sarvaṃ tathā jambūphalāni ca | avakṣutāvaruditaṃ tathā śrāddhe ca varjayet

सब प्रकार का नमक और जामुन के फल वर्जित करे; और श्राद्ध में छींक तथा रोना भी वर्जित करे।

श्लोक 42 (13.138.42)

निवापे हव्यकव्ये वा गर्हितं च श्वदर्शनम् । पितरश्च हि देवाश्च नाभिनन्दन्ति तद्धविः ॥

nivāpe havyakavye vā garhitaṃ ca śvadarśanam | pitaraśca hi devāśca nābhinandanti taddhaviḥ

निवाप में, देवकार्य हो या पितृकार्य, कुत्ते का दिखाई देना निन्दित है; पितर और देवता उस हविष्य से प्रसन्न नहीं होते।

श्लोक 43 (13.138.43)

चण्डालश्वपचौ वर्ज्यौ निवापे समुपस्थिते । काषायवासाः कुष्ठी वा पतितो ब्रह्महाऽपि वा ॥

caṇḍālaśvapacau varjyau nivāpe samupasthite | kāṣāyavāsāḥ kuṣṭhī vā patito brahmahā'pi vā

जब निवाप उपस्थित हो, तब चाण्डाल और श्वपच को दूर रखना चाहिए; इसी प्रकार काषाय वस्त्र पहनने वाले, कोढ़ी, पतित या ब्रह्महत्यारे को भी।

श्लोक 44 (13.138.44)

सङ्कीर्णयोनिर्विप्रश्च सम्बन्धी पतितश्च यः । वर्जनीया बुधैरेते निवापे समुपस्थिते ॥

saṅkīrṇayonirvipraśca sambandhī patitaśca yaḥ | varjanīyā budhairete nivāpe samupasthite

संकर योनि का ब्राह्मण और पतित सम्बन्धी, ये निवाप उपस्थित होने पर बुद्धिमानों द्वारा वर्जित किए जाने चाहिए।

भीष्म उवाच

श्लोक 45 (13.138.45)

इत्येवमुक्त्वा भगवान्स्ववंश्यं तमृषिं पुरा । पितामहसभां दिव्यां जगामात्रिस्तपोधनः ॥

ityevamuktvā bhagavānsvavaṃśyaṃ tamṛṣiṃ purā | pitāmahasabhāṃ divyāṃ jagāmātristapodhanaḥ

इस प्रकार अपने वंश के उस ऋषि से कहकर तपोधन भगवान् अत्रि प्राचीन काल में पितामह की दिव्य सभा को चले गए।

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