अनुशासन पर्व · अध्याय 139
अग्नि द्वारा पितरों का कष्ट-निवारण
भीष्म बताते हैं कि अत्रि की विधि के प्रचलित होने पर निवाप के अन्न से बीमार हुए देवता और पितर पहले सोम के पास और फिर मेरु पर ब्रह्मा के पास गए। ब्रह्मा ने उन्हें अग्नि के पास भेजा, जिसने उनके साथ निवाप खाने और पचाने का वचन दिया; इसीलिए पहला भाग अग्नि को दिया जाता है। फिर भीष्म पिण्ड, तर्पण, सात महर्षियों और श्राद्ध की उत्पत्ति के नियम बताते हैं।
भीष्म उवाच
श्लोक 1 (13.139.1)
तथा विधौ प्रवृत्ते तु सर्व एव महर्षयः । पितृयज्ञानकुर्वन्त विधिदृष्टेन कर्मणा ॥
tathā vidhau pravṛtte tu sarva eva maharṣayaḥ | pitṛyajñānakurvanta vidhidṛṣṭena karmaṇā
इस प्रकार विधि के प्रचलित हो जाने पर सभी महर्षियों ने विधि-निर्दिष्ट कर्म के अनुसार पितृयज्ञ किए।
श्लोक 2 (13.139.2)
ऋषयो धर्मनित्यास्तु कृत्वा निवपनान्युत । तर्पणं चापि कुर्वन्त तीर्थांभोभिर्यतव्रताः ॥
ṛṣayo dharmanityāstu kṛtvā nivapanānyuta | tarpaṇaṃ cāpi kurvanta tīrthāṃbhobhiryatavratāḥ
धर्म में सदा तत्पर ऋषियों ने निवाप अर्पित करके दृढ़ व्रत के साथ तीर्थों के जल से तर्पण भी किया।
श्लोक 3 (13.139.3)
निवापैर्दीयमानैश्च चातुर्वर्ण्येन भारत । तर्पिताः पितरो देवास्तत्र नान्नं जरयन्ति वै ॥
nivāpairdīyamānaiśca cāturvarṇyena bhārata | tarpitāḥ pitaro devāstatra nānnaṃ jarayanti vai
हे भारत, चारों वर्णों के लोगों द्वारा दिए जाने वाले निवापों से पितर और देवता तृप्त तो हुए, परन्तु वे उस अन्न को पचा नहीं सके।
श्लोक 4 (13.139.4)
अजीर्णैस्त्वभिहन्यन्ते ते देवाः पितृभिः सह । सोममेवाभ्यपद्यन्त तदा ह्यन्नाभिपीडिताः ॥
ajīrṇaistvabhihanyante te devāḥ pitṛbhiḥ saha | somamevābhyapadyanta tadā hyannābhipīḍitāḥ
अपच से पीड़ित वे देवता पितरों सहित, अन्न से दबे हुए, तब सोम की शरण में गए।
श्लोक 5 (13.139.5)
तेऽब्रुवन्सोममासाद्य पितरोऽजीर्णपीडिताः । निवापान्नेन पीड्यामः श्रेयो नोत्र विधीयताम् ॥
te'bruvansomamāsādya pitaro'jīrṇapīḍitāḥ | nivāpānnena pīḍyāmaḥ śreyo notra vidhīyatām
सोम के पास पहुँचकर अपच से पीड़ित पितरों ने कहा: "हम निवाप के अन्न से पीड़ित हैं। हमारे लिए कोई कल्याणकारी उपाय निश्चित किया जाए।"
श्लोक 6 (13.139.6)
तान्सोमः प्रत्युवाचाथ श्रेयश्चेदीप्सितं सुराः । स्वयंभूसदनं यात स वः श्रेयोऽभिधास्यति ॥
tānsomaḥ pratyuvācātha śreyaścedīpsitaṃ surāḥ | svayaṃbhūsadanaṃ yāta sa vaḥ śreyo'bhidhāsyati
तब सोम ने उनसे कहा: "हे देवताओ, यदि तुम कल्याण चाहते हो तो स्वयम्भू के धाम जाओ; वे तुम्हें कल्याण का उपाय बताएँगे।"
श्लोक 7 (13.139.7)
ते सोमवचनाद्देवाः पितृभिः सह भारत । मेरुशृङ्गे समासीनं पितामहमुपागमन् ॥
te somavacanāddevāḥ pitṛbhiḥ saha bhārata | meruśṛṅge samāsīnaṃ pitāmahamupāgaman
हे भारत, सोम के वचन से देवता पितरों सहित मेरु के शिखर पर बैठे पितामह के पास गए।
पितर ऊचुः
श्लोक 8 (13.139.8)
निवापान्नेन भगवन्भृशं पीड्यामहे वयम् । प्रसादं कुरु नो देव श्रेयो नः संविधीयताम् ॥
nivāpānnena bhagavanbhṛśaṃ pīḍyāmahe vayam | prasādaṃ kuru no deva śreyo naḥ saṃvidhīyatām
"भगवन्, हम निवाप के अन्न से अत्यन्त पीड़ित हैं। हे देव, हम पर कृपा कीजिए; हमारे कल्याण की व्यवस्था की जाए।"
भीष्म उवाच
श्लोक 9 (13.139.9)
इति तेषां वचः श्रुत्वा स्वयम्भूरिदमब्रवीत् । एष मे पार्श्वतो वह्निर्युष्मच्छ्रेयो विधास्यति ॥
iti teṣāṃ vacaḥ śrutvā svayambhūridamabravīt | eṣa me pārśvato vahniryuṣmacchreyo vidhāsyati
उनकी बात सुनकर स्वयम्भू ने यह कहा: "यह अग्नि मेरे पास ही है; वही तुम्हारे कल्याण की व्यवस्था करेगा।"
अग्निरुवाच
श्लोक 10 (13.139.10)
सहितास्तस्य भोक्ष्यामो निवापे समुपस्थिते । जरयिष्यथ चाप्यन्नं मया सार्धं न संशयः ॥
sahitāstasya bhokṣyāmo nivāpe samupasthite | jarayiṣyatha cāpyannaṃ mayā sārdhaṃ na saṃśayaḥ
"जब निवाप उपस्थित होगा, तब हम सब साथ मिलकर उसे खाएँगे, और तुम मेरे साथ उस अन्न को पचा लोगे; इसमें कोई सन्देह नहीं।"
भीष्म उवाच
श्लोक 11 (13.139.11)
एतच्छ्रुत्वा तु पितरस्ततस्ते विज्वराऽभवन् । एतस्मात्कारणाच्चाग्नेः प्राग्भागो दीयते नृप ॥
etacchrutvā tu pitarastataste vijvarā'bhavan | etasmātkāraṇāccāgneḥ prāgbhāgo dīyate nṛpa
यह सुनकर पितर उसी समय रोगमुक्त हो गए; और इसी कारण, हे राजन्, पहला भाग अग्नि को दिया जाता है।
श्लोक 12 (13.139.12)
निवापे चाग्निपूर्वं वै निवृत्ते पुरुषर्षभ । न ब्रह्मराक्षसास्तं वै निवापं धर्षयन्त्युत ॥
nivāpe cāgnipūrvaṃ vai nivṛtte puruṣarṣabha | na brahmarākṣasāstaṃ vai nivāpaṃ dharṣayantyuta
हे पुरुषश्रेष्ठ, निवाप में पहले अग्नि को भाग देने के बाद ब्रह्मराक्षस उस निवाप को नहीं सताते।
श्लोक 13 (13.139.13)
रक्षांसि नाभिवर्धन्ते स्थिते देवे हुताशने । पूर्वं पिण्डं पितुर्दद्यात्ततो दद्यात्पितामहे ॥
rakṣāṃsi nābhivardhante sthite deve hutāśane | pūrvaṃ piṇḍaṃ piturdadyāttato dadyātpitāmahe
अग्निदेव के उपस्थित रहने पर राक्षसों का बल नहीं बढ़ता। पहला पिण्ड पिता को दे, फिर पितामह को दे,
श्लोक 14 (13.139.14)
प्रपितामहाय च तत एष श्राद्धविधिः स्मृतः । ब्रूयाच्छ्राद्धे च सावित्रीं पिण्डे पिण्डे समाहितः । सोमायेति च वक्तव्यं तथा पितृमतेति च ॥
prapitāmahāya ca tata eṣa śrāddhavidhiḥ smṛtaḥ | brūyācchrāddhe ca sāvitrīṃ piṇḍe piṇḍe samāhitaḥ | somāyeti ca vaktavyaṃ tathā pitṛmateti ca
और फिर प्रपितामह को; यही श्राद्ध की विधि कही गई है। प्रत्येक पिण्ड पर एकाग्र होकर सावित्री का पाठ करे, और "सोमाय" तथा "पितृमते" भी कहे।
श्लोक 15 (13.139.15)
रजस्वला च या नारी व्यङ्गिता कर्णयोश्च या । निवापे नोपतिष्ठेत सङ्ग्राह्या नान्यवंशजा ॥
rajasvalā ca yā nārī vyaṅgitā karṇayośca yā | nivāpe nopatiṣṭheta saṅgrāhyā nānyavaṃśajā
रजस्वला स्त्री अथवा जिसके कान कटे या विकृत हों, वह निवाप के समय पास न आए; और दूसरे वंश की किसी स्त्री को भी साथ नहीं लेना चाहिए।
श्लोक 16 (13.139.16)
जलं प्रतरमाणश्च कीर्तयेत पितामहान् । नदीमासाद्य कुर्वीत पितॄणां पितृतर्पणम् ॥
jalaṃ prataramāṇaśca kīrtayeta pitāmahān | nadīmāsādya kurvīta pitṝṇāṃ pitṛtarpaṇam
जल पार करते समय पितामहों का स्मरण करे; और नदी के पास पहुँचकर पितरों के लिए पितृतर्पण करे।
श्लोक 17 (13.139.17)
पूर्वं स्ववंशजानां तु कृत्वाऽद्भिस्तर्पणं पुनः । सुहृत्सम्बन्धिवर्गाणां ततो दद्याज्जलाञ्जलिम् ॥
pūrvaṃ svavaṃśajānāṃ tu kṛtvā'dbhistarpaṇaṃ punaḥ | suhṛtsambandhivargāṇāṃ tato dadyājjalāñjalim
पहले अपने वंश के लोगों के लिए जल से तर्पण करके, फिर मित्रों और सम्बन्धियों के वर्ग के लिए जलाञ्जलि दे।
श्लोक 18 (13.139.18)
कल्माषगोयुगेनाथ युक्तेन तरतो जलम् । पितरोऽभिलषन्ते वै नावं चाप्यधिरोहिताः ॥
kalmāṣagoyugenātha yuktena tarato jalam | pitaro'bhilaṣante vai nāvaṃ cāpyadhirohitāḥ
जब कोई चितकबरे बैलों की जोड़ी से जुते रथ या गाड़ी में जल पार करता है, तब नाव पर चढ़ाए गए पितर भी उस (जल) की इच्छा करते हैं।
श्लोक 19 (13.139.19)
सदा नावि जलं तज्ज्ञाः प्रयच्छन्ति समाहिताः । मासार्धे कृष्णपक्षस्य कुर्यान्निर्वपणानि वै ॥
sadā nāvi jalaṃ tajjñāḥ prayacchanti samāhitāḥ | māsārdhe kṛṣṇapakṣasya kuryānnirvapaṇāni vai
जो इसे जानते हैं, वे नाव में रहते हुए सदा एकाग्र होकर जल देते हैं। कृष्ण पक्ष के मध्य (अमावास्या) के दिन निवाप करे।
श्लोक 20 (13.139.20)
पुष्टिरायुस्तथा वीर्यं श्रीश्चैव पितृभक्तितः ॥
puṣṭirāyustathā vīryaṃ śrīścaiva pitṛbhaktitaḥ
पितरों की भक्ति से पुष्टि, आयु, बल और श्री प्राप्त होती है।
श्लोक 21 (13.139.21)
पितामहः पुलस्त्यश्च वसिष्ठः पुलहस्तथा । अङ्गिराश्च क्रतुश्चैव कश्यपश्च महानृषिः ॥
pitāmahaḥ pulastyaśca vasiṣṭhaḥ pulahastathā | aṅgirāśca kratuścaiva kaśyapaśca mahānṛṣiḥ
पितामह, पुलस्त्य, वसिष्ठ और पुलह, अंगिरा, क्रतु और महान् ऋषि कश्यप,
श्लोक 22 (13.139.22)
एते कुरुकुलश्रेष्ठ महायोगेश्वराः स्मृताः । एते च पितरो राजन्नेष श्राद्धविधिः परः ॥
ete kurukulaśreṣṭha mahāyogeśvarāḥ smṛtāḥ | ete ca pitaro rājanneṣa śrāddhavidhiḥ paraḥ
हे कुरुकुलश्रेष्ठ, ये महायोगेश्वर माने गए हैं। हे राजन्, ये ही पितर हैं; यही श्राद्ध की परम विधि है।
श्लोक 23 (13.139.23)
प्रेतास्तु पिण्डसम्बन्धान्मुच्यन्ते तेन कर्मणा । इत्येषा पुरुषश्रेष्ठ श्राद्धोत्पत्तिर्यथागमम् ॥
pretāstu piṇḍasambandhānmucyante tena karmaṇā | ityeṣā puruṣaśreṣṭha śrāddhotpattiryathāgamam
उस कर्म से पिण्डों के सम्बन्ध द्वारा दिवंगत जन मुक्त हो जाते हैं। हे पुरुषश्रेष्ठ, श्राद्ध की उत्पत्ति आगम के अनुसार इसी प्रकार है।
श्लोक 24 (13.139.24)
व्याख्याता पूर्वनिर्दिष्टा किं ते वक्ष्याम्यतः परम् ॥
vyākhyātā pūrvanirdiṣṭā kiṃ te vakṣyāmyataḥ param
पहले जैसा संकेत किया गया था, वैसा ही यह व्याख्यान हो गया। अब मैं तुम्हें और क्या बताऊँ?