अनुशासन पर्व · अध्याय 152
पराशर का चारों वर्णों के लिए मुक्ति का उपदेश
पराशर यह दिखाकर उपदेश समाप्त करते हैं कि मुक्ति सबके लिए खुली है: जिस भिक्षु के पाप जल गए हैं वह निर्वाण पाता है, और शूद्र, स्त्रियाँ तथा वैश्य भी सज्जनों के मार्ग, श्रद्धा, विद्वानों की सेवा और निराश न होने से परम गति पा सकते हैं। वे चेतावनी देते हैं कि गुरुजनों का अनादर करने या अभिमान करने वाले का ज्ञान अज्ञान बन जाता है; वे हृदय में स्थित प्रभु के ध्यान का, और यदि वह न बन सके तो आठ प्रकृतियों और सोलह विकारों की साङ्ख्य-गणना का उपदेश देते हैं। अन्त में भीष्म कहते हैं कि चारों वर्णों के लिए यह विधान कहकर वे महामुनि अपने आश्रम को लौट गए।
पराशर उवाच
श्लोक 1 (13.152.1)
एवं स भिक्षुर्निर्वाणं प्राप्नुयाद्दग्धकिल्बिषः । इहस्थो देहमुत्सृज्य नीडं शकुनिवद्यथा ॥
evaṃ sa bhikṣurnirvāṇaṃ prāpnuyāddagdhakilbiṣaḥ | ihastho dehamutsṛjya nīḍaṃ śakunivadyathā
इस प्रकार वह भिक्षु, जिसके पाप जल चुके हैं, यहीं शरीर त्यागकर निर्वाण पाता है, जैसे पक्षी अपना घोंसला छोड़ देता है।
श्लोक 2 (13.152.2)
सत्पथालम्बनादेव शूद्रः प्राप्नोति सद्गतिम् । ब्रह्मणः स्थानमचलं स्थानात्स्थानमवाप्नुयात् ॥
satpathālambanādeva śūdraḥ prāpnoti sadgatim | brahmaṇaḥ sthānamacalaṃ sthānātsthānamavāpnuyāt
सत्पथ का आश्रय लेने से ही शूद्र भी सद्गति पाता है — ब्रह्मा का अचल स्थान, एक स्थान से दूसरे स्थान को पाता हुआ।
श्लोक 3 (13.152.3)
यथा खनन्खनित्रेण जाङ्गले वारि विन्दति । अनिर्वेदात्ततः स्थानमीप्सितं प्रतिपद्यते ॥
yathā khanankhanitreṇa jāṅgale vāri vindati | anirvedāttataḥ sthānamīpsitaṃ pratipadyate
जैसे कुदाल से खोदता हुआ मनुष्य मरुभूमि में भी जल पा लेता है, वैसे ही हार न मानने वाला मनुष्य अपना इच्छित स्थान पा लेता है।
श्लोक 4 (13.152.4)
सैषा गतिरनाद्यन्ता सर्वैरप्युपधारिता । तस्माच्छूद्रैरनिर्वेदाच्छ्रद्दधानैस्तु नित्यदा । वर्तितव्यं यथाशक्त्या यथा प्रोक्तं मनीषिभिः ॥
saiṣā gatiranādyantā sarvairapyupadhāritā | tasmācchūdrairanirvedācchraddadhānaistu nityadā | vartitavyaṃ yathāśaktyā yathā proktaṃ manīṣibhiḥ
यह गति अनादि और अनन्त है और सबने इसे स्वीकार किया है। इसलिए शूद्रों को चाहिए कि वे श्रद्धा रखकर निराश हुए बिना सदा अपनी शक्ति के अनुसार वैसा ही आचरण करें जैसा मनीषियों ने कहा है।
श्लोक 5 (13.152.5)
यत्करोति तदश्नाति शुभं वा यदि वाऽशुभम् । नाकृतं भुज्यते कर्म न कृतं नश्यते फलम् ॥
yatkaroti tadaśnāti śubhaṃ vā yadi vā'śubham | nākṛtaṃ bhujyate karma na kṛtaṃ naśyate phalam
मनुष्य जो कुछ करता है, शुभ हो या अशुभ, उसी का फल भोगता है; जो कर्म किया नहीं गया उसका भोग नहीं होता, और जो किया गया उसका फल नष्ट नहीं होता।
श्लोक 6 (13.152.6)
तथा शुभसमाचारः शुभमेवाप्नुते फलम् । तथाऽशुभसमाचारो ह्यशुभं समवाप्नुते । शुभान्येव समादद्याद्य इच्छेद्भूतिमात्मनः ॥
tathā śubhasamācāraḥ śubhamevāpnute phalam | tathā'śubhasamācāro hyaśubhaṃ samavāpnute | śubhānyeva samādadyādya icchedbhūtimātmanaḥ
इसी प्रकार शुभ आचरण वाला शुभ फल ही पाता है और अशुभ आचरण वाला अशुभ फल पाता है। जो अपना कल्याण चाहे वह केवल शुभ कर्मों को ही अपनाए।
श्लोक 7 (13.152.7)
भूतिश्च नान्यतः शक्या शूद्राणामिति निश्चयः । ऋते यतीनां शुश्रूषामिति सन्तो व्यवस्थिताः ॥
bhūtiśca nānyataḥ śakyā śūdrāṇāmiti niścayaḥ | ṛte yatīnāṃ śuśrūṣāmiti santo vyavasthitāḥ
और शूद्रों की उन्नति यतियों की सेवा के सिवा किसी और उपाय से नहीं हो सकती — यह निश्चय है; सज्जनों ने ऐसा ही स्थिर किया है।
श्लोक 8 (13.152.8)
तस्मादागमसम्पन्नो भवेत्सुनियतेन्द्रियः । शक्यते ह्यागमादेव गतिं प्राप्तुमनामयाम् ॥
tasmādāgamasampanno bhavetsuniyatendriyaḥ | śakyate hyāgamādeva gatiṃ prāptumanāmayām
इसलिए वह आगम (शास्त्र) से सम्पन्न हो और इन्द्रियों को भली-भाँति संयम में रखे; क्योंकि आगम से ही निर्दोष गति पाई जा सकती है।
श्लोक 9 (13.152.9)
वरा चैषा गतिर्दृष्टा यामन्वेषन्ति साधवः । यत्रामृतत्वं लभते त्यक्त्वा दुःखमनन्तरम् ॥
varā caiṣā gatirdṛṣṭā yāmanveṣanti sādhavaḥ | yatrāmṛtatvaṃ labhate tyaktvā duḥkhamanantaram
यह श्रेष्ठ गति देखी गई है, जिसे साधु खोजते हैं और जिसमें निरन्तर चलने वाले दुःख को छोड़कर अमरत्व मिलता है।
श्लोक 10 (13.152.10)
इमं हि धर्ममास्थाय येऽपि स्युः पापयोनयः । स्त्रियो वैश्याश्च शूद्राश्च प्राप्नुयुः परमां गतिम् । किं पुनर्ब्राह्मणो विद्वान्क्षत्रियो वा बहुश्रुतः ॥
imaṃ hi dharmamāsthāya ye'pi syuḥ pāpayonayaḥ | striyo vaiśyāśca śūdrāśca prāpnuyuḥ paramāṃ gatim | kiṃ punarbrāhmaṇo vidvānkṣatriyo vā bahuśrutaḥ
इस धर्म का आश्रय लेकर पापयोनि में उत्पन्न लोग भी — स्त्रियाँ, वैश्य और शूद्र — परम गति पा सकते हैं; फिर विद्वान् ब्राह्मण या बहुश्रुत क्षत्रिय की तो बात ही क्या।
श्लोक 11 (13.152.11)
न चाप्यक्षीणपापस्य ज्ञानं भवति देहिनः । ज्ञानोपलब्धिर्भवति कृतकृत्यो यदा भवेत् ॥
na cāpyakṣīṇapāpasya jñānaṃ bhavati dehinaḥ | jñānopalabdhirbhavati kṛtakṛtyo yadā bhavet
जिस देहधारी के पाप क्षीण नहीं हुए, उसे ज्ञान नहीं होता; ज्ञान की प्राप्ति तभी होती है जब वह कृतकृत्य हो जाता है।
श्लोक 12 (13.152.12)
उपलभ्य तु विज्ञानं ज्ञानं वाऽप्यनसूयकः । तथैव वर्तेद्गुरुषु भूयांसं वा समाहितः ॥
upalabhya tu vijñānaṃ jñānaṃ vā'pyanasūyakaḥ | tathaiva vartedguruṣu bhūyāṃsaṃ vā samāhitaḥ
विज्ञान अथवा ज्ञान प्राप्त करके वह असूयारहित होकर समाहित चित्त से गुरुजनों के प्रति वैसा ही, या उससे भी अधिक आदरपूर्ण, आचरण करे।
श्लोक 13 (13.152.13)
अथावमन्येत गुरुं तथा तेषु प्रवर्तते । व्यर्थमस्य श्रुतं भवति ज्ञानमज्ञानतां व्रजेत् ॥
athāvamanyeta guruṃ tathā teṣu pravartate | vyarthamasya śrutaṃ bhavati jñānamajñānatāṃ vrajet
किन्तु यदि वह गुरु का अपमान करे और उनके प्रति वैसा ही व्यवहार करे, तो उसका पढ़ा-सुना व्यर्थ हो जाता है और ज्ञान अज्ञान में बदल जाता है।
श्लोक 14 (13.152.14)
गतिं चाप्यशुभां गच्छेन्निरयाय न संशयः । प्रक्षीयते तस्य पुण्यं ज्ञानमस्य विरुध्यते ॥
gatiṃ cāpyaśubhāṃ gacchennirayāya na saṃśayaḥ | prakṣīyate tasya puṇyaṃ jñānamasya virudhyate
वह अशुभ गति को, नरक को जाता है — इसमें सन्देह नहीं; उसका पुण्य क्षीण हो जाता है और उसका ज्ञान उसके विरुद्ध हो जाता है।
श्लोक 15 (13.152.15)
अदृष्टपूर्वकल्याणो यथा दृष्ट्वा विधिं नरः । उत्सेकान्मोहमापद्य तत्वज्ञानमवाप्तवान् ॥
adṛṣṭapūrvakalyāṇo yathā dṛṣṭvā vidhiṃ naraḥ | utsekānmohamāpadya tatvajñānamavāptavān
जिसे पहले कभी कल्याण देखने को नहीं मिला, वह मनुष्य विधि को देखकर अभिमान से मोह में पड़ जाता है, भले ही उसने तत्त्वज्ञान पा लिया हो।
श्लोक 16 (13.152.16)
एवमेव हि नोत्सेकः कर्तव्यो ज्ञानसम्भवः । फलं ज्ञानस्य हि शमः प्रशमाय यतेत्सदा ॥
evameva hi notsekaḥ kartavyo jñānasambhavaḥ | phalaṃ jñānasya hi śamaḥ praśamāya yatetsadā
इसी प्रकार जिसमें ज्ञान उत्पन्न हुआ हो उसे अभिमान नहीं करना चाहिए; ज्ञान का फल शम है, इसलिए वह सदा शान्ति के लिए प्रयत्न करे।
श्लोक 17 (13.152.17)
उपशान्तेन दान्तेन क्षमायुक्तेन सर्वदा । शुश्रूषा प्रतिपत्तव्या नित्यमेवानसूयता ॥
upaśāntena dāntena kṣamāyuktena sarvadā | śuśrūṣā pratipattavyā nityamevānasūyatā
शान्त, दमनशील और सदा क्षमा से युक्त होकर उसे सदा ईर्ष्यारहित भाव से सेवा का आचरण करना चाहिए।
श्लोक 18 (13.152.18)
धृत्या शिश्नोदरं रक्षेत्पाणिपादं च चक्षुषा । इन्द्रियार्थांश्च मनसा मनो बुद्धौ समादधेत् ॥
dhṛtyā śiśnodaraṃ rakṣetpāṇipādaṃ ca cakṣuṣā | indriyārthāṃśca manasā mano buddhau samādadhet
धैर्य से उपस्थ और उदर की रक्षा करे, नेत्र से हाथ-पैरों की, मन से इन्द्रियों के विषयों की रक्षा करे और मन को बुद्धि में स्थिर करे।
श्लोक 19 (13.152.19)
धृत्याऽऽसीत ततो गत्वा शुद्धदेशं सुसंवृतम् । लब्धासनं यथा दृष्टं विधिपूर्वं समाचरेत् ॥
dhṛtyā''sīta tato gatvā śuddhadeśaṃ susaṃvṛtam | labdhāsanaṃ yathā dṛṣṭaṃ vidhipūrvaṃ samācaret
धैर्यपूर्वक वह किसी शुद्ध और भली-भाँति ढके हुए स्थान पर जाकर बैठे; आसन पाकर जैसा बताया गया है वैसे ही विधिपूर्वक साधना करे।
श्लोक 20 (13.152.20)
ज्ञानयुक्तस्तथा देवं हृदिस्थमुपलक्षयेत् । आदीप्यमानं वपुषा विधूममनलं यथा ॥
jñānayuktastathā devaṃ hṛdisthamupalakṣayet | ādīpyamānaṃ vapuṣā vidhūmamanalaṃ yathā
ज्ञान से युक्त होकर वह हृदय में स्थित देव को देखे, जो अपने स्वरूप से धूमरहित अग्नि की भाँति प्रज्वलित हो रहा है,
श्लोक 21 (13.152.21)
रश्मिमन्तमिवादित्यं वैद्युताग्निमिवाम्बरे । संस्थितं हृदये पश्येदीशं शाश्वतमव्ययम् ॥
raśmimantamivādityaṃ vaidyutāgnimivāmbare | saṃsthitaṃ hṛdaye paśyedīśaṃ śāśvatamavyayam
किरणों वाले सूर्य के समान, आकाश में चमकती बिजली की अग्नि के समान। वह हृदय में स्थित शाश्वत, अविनाशी ईश्वर का दर्शन करे।
श्लोक 22 (13.152.22)
न चायुक्तेन शक्येत द्रष्टुं देहे महेश्वरः । युक्तस्तु पश्यते बुद्ध्या सन्निवेश्य मनो हृदि ॥
na cāyuktena śakyeta draṣṭuṃ dehe maheśvaraḥ | yuktastu paśyate buddhyā sanniveśya mano hṛdi
अयुक्त पुरुष देह में महेश्वर को नहीं देख सकता; युक्त पुरुष मन को हृदय में स्थापित करके बुद्धि से उन्हें देखता है।
श्लोक 23 (13.152.23)
अथ त्वेवं न शक्नोति कर्तुं हृदयधारणम् । यथासांख्यमुपासीत यथावद्योगमास्थितः ॥
atha tvevaṃ na śaknoti kartuṃ hṛdayadhāraṇam | yathāsāṃkhyamupāsīta yathāvadyogamāsthitaḥ
और यदि वह इस प्रकार हृदय में धारणा नहीं कर पाता, तो योग में स्थित होकर साङ्ख्य के अनुसार यथाविधि उपासना करे।
श्लोक 24 (13.152.24)
पञ्च बुद्धीन्द्रियाणीह पञ्च कर्मेन्द्रियाणि वै । पञ्च भूतविशेषाश्च मनश्चैव तु षोडश ॥
pañca buddhīndriyāṇīha pañca karmendriyāṇi vai | pañca bhūtaviśeṣāśca manaścaiva tu ṣoḍaśa
पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच भूत-विशेष और मन — ये सोलह हैं।
श्लोक 25 (13.152.25)
तन्मात्राण्यपि पञ्चैव मनोऽहङ्कार एव च । अष्टमं चाप्यथाव्यक्तमेताः प्रकृतिसंज्ञिताः । एताः प्रकृतयश्चाष्टौ विकाराश्चापि षोडश ॥
tanmātrāṇyapi pañcaiva mano'haṅkāra eva ca | aṣṭamaṃ cāpyathāvyaktametāḥ prakṛtisaṃjñitāḥ | etāḥ prakṛtayaścāṣṭau vikārāścāpi ṣoḍaśa
पाँच तन्मात्राएँ, मन और अहङ्कार, और आठवाँ अव्यक्त — ये प्रकृतियाँ कहलाती हैं। ये आठ प्रकृतियाँ हैं और विकार सोलह हैं।
श्लोक 26 (13.152.26)
एवमेतदिहस्थेन विज्ञेयं तत्वबुद्धिना । एवं वर्ष्म समुत्तीर्य तीर्णो भवति नान्यथा ॥
evametadihasthena vijñeyaṃ tatvabuddhinā | evaṃ varṣma samuttīrya tīrṇo bhavati nānyathā
यहाँ देह में स्थित तत्त्वबुद्धि वाले को यह जानना चाहिए। इस प्रकार शरीर को पार करके वह पार हो जाता है, अन्यथा नहीं।
श्लोक 27 (13.152.27)
परिसंख्यानमेवैतन्मन्तव्यं ज्ञानबुद्धिना ॥
parisaṃkhyānamevaitanmantavyaṃ jñānabuddhinā
ज्ञानबुद्धि वाले को इस परिगणन का मनन करना चाहिए।
श्लोक 28 (13.152.28)
अहन्यहनि शान्तात्मा पावनाय हिताय च । एवमेव प्रसंख्याय तत्वबुद्धिर्विमुच्यते । निष्कलं केवलं भवति शुद्धतत्वार्थतत्ववित् ॥
ahanyahani śāntātmā pāvanāya hitāya ca | evameva prasaṃkhyāya tatvabuddhirvimucyate | niṣkalaṃ kevalaṃ bhavati śuddhatatvārthatatvavit
प्रतिदिन शान्तचित्त होकर अपनी पवित्रता और हित के लिए इस प्रकार गणना करके तत्त्वबुद्धि वाला मुक्त हो जाता है। शुद्ध तत्त्वों और उनके अर्थ को जानने वाला निष्कल, केवल (अकेला) हो जाता है।
श्लोक 29 (13.152.29)
भिक्षुकाश्रममास्थाय शुश्रूषानिरतो बुधः । शूद्रो निर्मुच्यते सत्वसंसर्गादेव नान्यथा ॥
bhikṣukāśramamāsthāya śuśrūṣānirato budhaḥ | śūdro nirmucyate satvasaṃsargādeva nānyathā
भिक्षु-आश्रम का आश्रय लेकर, सेवा में तत्पर रहने वाला बुद्धिमान् शूद्र सत्त्व के संसर्ग से ही मुक्त होता है, अन्यथा नहीं।
श्लोक 30 (13.152.30)
सत्संनिकर्षे परिवर्तितव्यं । विद्याधिकाश्चापि निषेवितव्याः । सवर्णतां गच्छति सन्निकर्षान् । नीलः खगो मेरुमिवाश्रयन्वै ॥
satsaṃnikarṣe parivartitavyaṃ | vidyādhikāścāpi niṣevitavyāḥ | savarṇatāṃ gacchati sannikarṣān | nīlaḥ khago merumivāśrayanvai
सज्जनों के सान्निध्य में रहना चाहिए और विद्या में अधिक लोगों की सेवा करनी चाहिए; निकट रहने से मनुष्य उसी के समान रंग का हो जाता है, जैसे मेरु पर्वत का आश्रय लेने वाला काला पक्षी।
भीष्म उवाच
श्लोक 31 (13.152.31)
इत्येवमाख्याय महामुनिस्तदा । चतुर्षु वर्णेषु विधानमर्थवित् । शुश्रूषया वृत्तगतिं समाधिना । समाधियुक्तः प्रययौ स्वमाश्रमम् ॥
ityevamākhyāya mahāmunistadā | caturṣu varṇeṣu vidhānamarthavit | śuśrūṣayā vṛttagatiṃ samādhinā | samādhiyuktaḥ prayayau svamāśramam
इस प्रकार कहकर अर्थ को जानने वाले उन महामुनि ने चारों वर्णों के लिए विधान — सेवा और समाधि से आचरण का मार्ग — बताया, और समाधि में लीन होकर वे अपने आश्रम को चले गए।