अनुशासन पर्व · अध्याय 151
ब्राह्मण का चन्द्रलोक-गमन और मोक्ष का मार्ग
पराशर ब्राह्मण गृहस्थ का वर्णन करते हैं: उपनयन और अध्ययन से लेकर यज्ञ और सत्य से भरे जीवन तक, फिर चन्द्रलोक में पितृ-देवों, ऋषियों और साध्यों के बीच उसका सम्मान और ब्रह्मा की सभा में उसका जाना। वहाँ का समय पूरा होने पर वह लौटा दिया जाता है; जन्म के कष्टों और प्रत्येक स्वर्ग की अनित्यता पर विचार करके वह संन्यास का निश्चय करता है। सब आसक्तियों से मुक्त भिक्षु होकर विचरता है और शरीर छोड़कर शाश्वत अव्यक्त ब्रह्म में प्रवेश करता है।
पराशर उवाच
श्लोक 1 (13.151.1)
ततः श्रुतिसमापन्नः संस्कृतश्च यथाविधि । चौलोपनयनं तस्य यथावत्क्रियते द्विजैः ॥
tataḥ śrutisamāpannaḥ saṃskṛtaśca yathāvidhi | caulopanayanaṃ tasya yathāvatkriyate dvijaiḥ
तब श्रुति-ज्ञान से सम्पन्न और विधिपूर्वक संस्कृत हुए उसका चूडाकर्म और उपनयन द्विजों द्वारा यथावत् कराया जाता है।
श्लोक 2 (13.151.2)
ततोऽष्टमे स वर्षे तु व्रतोपनयनादिभिः । क्रियाभिर्विधिदृष्टाभिर्ब्रह्मत्वमुपनीयते ॥
tato'ṣṭame sa varṣe tu vratopanayanādibhiḥ | kriyābhirvidhidṛṣṭābhirbrahmatvamupanīyate
फिर आठवें वर्ष में व्रत, उपनयन आदि विधिविहित क्रियाओं के द्वारा वह ब्राह्मणत्व में प्रवेश पाता है।
श्लोक 3 (13.151.3)
गायत्रेण छन्दसा तु संस्कृतश्चरितव्रतः । अधीयमानो मेधावी शुद्धात्मा नियतव्रतः ॥
gāyatreṇa chandasā tu saṃskṛtaścaritavrataḥ | adhīyamāno medhāvī śuddhātmā niyatavrataḥ
गायत्री छन्द से संस्कृत होकर, व्रतों का पालन करता हुआ, अध्ययन में लगा, मेधावी, शुद्ध अन्तःकरण वाला और नियमों में दृढ़ वह
श्लोक 4 (13.151.4)
अचिरेणैव कालेन साङ्गान्वेदानवाप्नुते । समावृत्तः स धर्मात्मा समावृत्तिक्रियस्तथा ॥
acireṇaiva kālena sāṅgānvedānavāpnute | samāvṛttaḥ sa dharmātmā samāvṛttikriyastathā
थोड़े ही समय में अङ्गों सहित वेदों को प्राप्त कर लेता है। फिर वह धर्मात्मा गुरुकुल से लौटता है और समावर्तन की क्रियाएँ करता है।
श्लोक 5 (13.151.5)
याजनाध्यापनरतः कुशले कर्मणि स्थितः । अग्निहोत्रपरो नित्यं देवतातिथिपूजकः ॥
yājanādhyāpanarataḥ kuśale karmaṇi sthitaḥ | agnihotraparo nityaṃ devatātithipūjakaḥ
वह यज्ञ कराने और पढ़ाने में लगा रहता है, शुभ कर्म में स्थित रहता है, सदा अग्निहोत्र-परायण होता है और देवताओं तथा अतिथियों का पूजन करता है।
श्लोक 6 (13.151.6)
यजते विविधैर्यज्ञैर्जपयज्ञैस्तथैव च । न्यायागतधनान्वेषी न्यायवृत्तस्तपोधनः ॥
yajate vividhairyajñairjapayajñaistathaiva ca | nyāyāgatadhanānveṣī nyāyavṛttastapodhanaḥ
वह अनेक यज्ञों से और जपयज्ञों से भी यजन करता है; न्याय से ही धन चाहता है, न्यायपूर्वक जीता है और तप को ही अपना धन मानता है।
श्लोक 7 (13.151.7)
सर्वभूतहितश्चैव सर्वशास्त्रविशारदः । स्वदारपरितुष्टात्मा ऋतुगामी जितेन्द्रियः ॥
sarvabhūtahitaścaiva sarvaśāstraviśāradaḥ | svadāraparituṣṭātmā ṛtugāmī jitendriyaḥ
सब प्राणियों का हित करने वाला, सब शास्त्रों में निपुण, अपनी पत्नी में सन्तुष्ट, ऋतुकाल में ही उसके पास जाने वाला और जितेन्द्रिय,
श्लोक 8 (13.151.8)
परापवादविरतः सत्यव्रतपरः सदा । स कालपरिणामात्तु संयुतः कालधर्मणा ॥
parāpavādavirataḥ satyavrataparaḥ sadā | sa kālapariṇāmāttu saṃyutaḥ kāladharmaṇā
दूसरों की निन्दा से दूर और सदा सत्यव्रत में तत्पर वह समय के परिणाम से कालधर्म (मृत्यु) से युक्त हो जाता है।
श्लोक 9 (13.151.9)
संस्कृतश्चाग्निहोत्रेण यथावद्विधिपूर्वकम् । सोमलोकमवाप्नोति देहन्यासान्न संशयः ॥
saṃskṛtaścāgnihotreṇa yathāvadvidhipūrvakam | somalokamavāpnoti dehanyāsānna saṃśayaḥ
अग्निहोत्र द्वारा विधिपूर्वक यथावत् संस्कृत होकर वह देह छोड़ने पर निस्सन्देह चन्द्रलोक को प्राप्त होता है।
श्लोक 10 (13.151.10)
तत्र सोमप्रभैर्देवैरग्निष्वात्तैश्च भास्वरैः । तथा बर्हिषदैश्चैव देवैराङ्गिरसैरपि ॥
tatra somaprabhairdevairagniṣvāttaiśca bhāsvaraiḥ | tathā barhiṣadaiścaiva devairāṅgirasairapi
वहाँ चन्द्रमा की-सी प्रभा वाले देवताओं, तेजस्वी अग्निष्वात्तों, बर्हिषदों और आङ्गिरस देवताओं के बीच
श्लोक 11 (13.151.11)
विश्वेभिश्चैव देवैश्च तथा ब्रह्मर्षिभिः पुनः । देवर्षिभिश्चाप्रतिमैस्तथैवाप्सरसां गणैः । साध्यैः सिद्धैश्च सततं सत्कृतस्तत्र मोदते ॥
viśvebhiścaiva devaiśca tathā brahmarṣibhiḥ punaḥ | devarṣibhiścāpratimaistathaivāpsarasāṃ gaṇaiḥ | sādhyaiḥ siddhaiśca satataṃ satkṛtastatra modate
विश्वेदेवों, ब्रह्मर्षियों, अनुपम देवर्षियों, अप्सराओं के गणों, साध्यों और सिद्धों से निरन्तर सत्कार पाकर वह आनन्दित रहता है।
श्लोक 12 (13.151.12)
जातरूपमयं दिव्यमर्कतुल्यं मनोजवम् । देवगन्धर्वसंकीर्णं विमानमधिरोहति ॥
jātarūpamayaṃ divyamarkatulyaṃ manojavam | devagandharvasaṃkīrṇaṃ vimānamadhirohati
वह स्वर्णमय, सूर्य के समान दीप्त, मन के समान वेग वाले और देवों तथा गन्धर्वों से भरे दिव्य विमान पर आरूढ़ होता है।
श्लोक 13 (13.151.13)
सौम्यरूपा मनःकान्तास्तप्तकाञ्चनभूषणाः । सोमकन्या विमानस्थं रमयन्ति मुदान्विताः ॥
saumyarūpā manaḥkāntāstaptakāñcanabhūṣaṇāḥ | somakanyā vimānasthaṃ ramayanti mudānvitāḥ
सौम्य रूप वाली, मन को प्रिय लगने वाली और तपाए हुए सोने के आभूषणों से सजी सोम की कन्याएँ आनन्द से भरकर विमान में बैठे उसका मनोरञ्जन करती हैं।
श्लोक 14 (13.151.14)
स तत्र रमते प्रीतः सह देवैः सहर्षिभिः । लोकान्सर्वाननुचरन्दीप्ततेजा मनोजवः ॥
sa tatra ramate prītaḥ saha devaiḥ saharṣibhiḥ | lokānsarvānanucarandīptatejā manojavaḥ
वहाँ वह प्रसन्न होकर देवताओं और ऋषियों के साथ रमण करता है, सब लोकों में घूमता है; उसका तेज दीप्त होता है और वेग मन के समान होता है।
श्लोक 15 (13.151.15)
सभां कामजवीं चापि नित्यमेवाभिगच्छति । सर्वलोकेश्वरमृषिं नमस्कृत्य पितामहम् ॥
sabhāṃ kāmajavīṃ cāpi nityamevābhigacchati | sarvalokeśvaramṛṣiṃ namaskṛtya pitāmaham
और वह इच्छा के वेग से चलने वाली सभा में नित्य जाता है और सब लोकों के ईश्वर ऋषि पितामह को नमस्कार करता है —
श्लोक 16 (13.151.16)
परमेष्ठिरनन्तश्रीर्लोकानां प्रभवाप्ययः । यतः सर्वाः प्रवर्तन्ते सर्गप्रलयविक्रियाः । स तत्र वर्तते श्रीमान्द्विशतं द्विजसत्तम ॥
parameṣṭhiranantaśrīrlokānāṃ prabhavāpyayaḥ | yataḥ sarvāḥ pravartante sargapralayavikriyāḥ | sa tatra vartate śrīmāndviśataṃ dvijasattama
उन परमेष्ठी को, जिनकी श्री अनन्त है, जो लोकों के उत्पत्ति और लय के स्थान हैं और जिनसे सृष्टि तथा प्रलय के सब विकार प्रवृत्त होते हैं। वहाँ वह श्रीमान् दो सौ तक रहता है, हे द्विजश्रेष्ठ।
श्लोक 17 (13.151.17)
अथ कालक्षयात्तस्मात्स्थानादावर्तते पुनः । जातिधर्मांस्तथा सर्वान्सर्गादावर्तनानि च ॥
atha kālakṣayāttasmātsthānādāvartate punaḥ | jātidharmāṃstathā sarvānsargādāvartanāni ca
फिर काल के क्षय होने पर वह उस स्थान से फिर लौट आता है — जन्म के सब धर्मों में और सृष्टि के आवर्तनों में।
श्लोक 18 (13.151.18)
अशाश्वतमिदं सर्वमिति चिन्त्योपलभ्य च । शाश्वतं दिव्यमचलमदीनमपुनर्भवम् ॥
aśāśvatamidaṃ sarvamiti cintyopalabhya ca | śāśvataṃ divyamacalamadīnamapunarbhavam
"यह सब अनित्य है" — ऐसा विचार करके और शाश्वत, दिव्य, अचल, अदीन तथा पुनर्जन्म से रहित पद को जानकर
श्लोक 19 (13.151.19)
आस्थास्यत्यभयं नित्यं यत्रावृत्तिर्न विद्यते । यत्र गत्वा न म्रियते जन्म चापि न विद्यते ॥
āsthāsyatyabhayaṃ nityaṃ yatrāvṛttirna vidyate | yatra gatvā na mriyate janma cāpi na vidyate
वह उस नित्य अभय पद में स्थित होगा जहाँ से पुनरावृत्ति नहीं होती, जहाँ पहुँचकर न कोई मरता है और न जन्म ही होता है।
श्लोक 20 (13.151.20)
गर्भक्लेशा मया प्राप्ता जायता च पुनः पुनः । कायक्लेशाश्च विविधा द्वन्द्वानि विविधानि च ॥
garbhakleśā mayā prāptā jāyatā ca punaḥ punaḥ | kāyakleśāśca vividhā dvandvāni vividhāni ca
"बार-बार जन्म लेते हुए मैंने गर्भ के क्लेश भोगे हैं; शरीर के अनेक कष्ट और अनेक द्वन्द्व —
श्लोक 21 (13.151.21)
शीतोष्णसुखदुःखानि ईर्ष्याद्वेषकृतानि च । तत्रतत्रोपभुक्तानि न क्वचिच्छाश्वती स्थितिः ॥
śītoṣṇasukhaduḥkhāni īrṣyādveṣakṛtāni ca | tatratatropabhuktāni na kvacicchāśvatī sthitiḥ
शीत और उष्ण, सुख और दुःख, और ईर्ष्या तथा द्वेष से उत्पन्न दुःख — इन सबको मैंने जहाँ-तहाँ भोगा है; कहीं भी स्थायी स्थिति नहीं है।"
श्लोक 22 (13.151.22)
एवं स निश्चयं कृत्वा निर्मुच्य ग्रहबन्धनात् । छित्त्वा भार्यामयं पाशं तथैवापत्यसम्भवम् ॥
evaṃ sa niścayaṃ kṛtvā nirmucya grahabandhanāt | chittvā bhāryāmayaṃ pāśaṃ tathaivāpatyasambhavam
इस प्रकार निश्चय करके वह गृह के बन्धन से मुक्त होकर, पत्नी के पाश को और सन्तान के बन्धन को काटकर
श्लोक 23 (13.151.23)
यतिधर्ममुपाश्रित्य गुरुशुश्रूषणे रतः । अचिरेणैव कालेन श्रेयः समभिगच्छति ॥
yatidharmamupāśritya guruśuśrūṣaṇe rataḥ | acireṇaiva kālena śreyaḥ samabhigacchati
यतिधर्म का आश्रय लेता है, गुरु की सेवा में लगा रहता है और थोड़े ही समय में परम कल्याण को प्राप्त होता है।
श्लोक 24 (13.151.24)
योगशास्त्रं च साङ्ख्यं च विदित्वा सोऽर्थतत्वतः । अनुज्ञातश्च गुरुणा यथाशास्त्रमवस्थितः ॥
yogaśāstraṃ ca sāṅkhyaṃ ca viditvā so'rthatatvataḥ | anujñātaśca guruṇā yathāśāstramavasthitaḥ
योगशास्त्र और साङ्ख्य को उनके यथार्थ अर्थ में जानकर और गुरु की अनुमति पाकर वह शास्त्र के अनुसार स्थित रहता है —
श्लोक 25 (13.151.25)
पुण्यतीर्थानुसेवी च नदीनां पुलिनाश्रयः । शून्यागारनिकेतश्च वनवृक्षगुहाशयः ॥
puṇyatīrthānusevī ca nadīnāṃ pulināśrayaḥ | śūnyāgāraniketaśca vanavṛkṣaguhāśayaḥ
पुण्य तीर्थों का सेवन करता, नदियों के तटों का आश्रय लेता, सूने घरों में रहता और वन के वृक्षों और गुफाओं में सोता है,
श्लोक 26 (13.151.26)
अरण्यानुचरो नित्यं देवारण्यनिकेतनः । एकरात्रं द्विरात्रं वा न क्वचित्सज्जते द्विजः ॥
araṇyānucaro nityaṃ devāraṇyaniketanaḥ | ekarātraṃ dvirātraṃ vā na kvacitsajjate dvijaḥ
सदा वन में विचरता है, देववनों में निवास करता है; वह द्विज एक या दो रात के लिए भी कहीं आसक्त नहीं होता।
श्लोक 27 (13.151.27)
शीर्णपर्णभुगेवापि वने चरति भिक्षुकः । न भोगार्थमनुप्रेत्य यात्रामात्रं समश्नुते ॥
śīrṇaparṇabhugevāpi vane carati bhikṣukaḥ | na bhogārthamanupretya yātrāmātraṃ samaśnute
सूखे पत्तों पर जीने वाला वह भिक्षु वन में विचरता है; वह भोग के लिए नहीं, केवल शरीर-यात्रा चलाने भर को खाता है।
श्लोक 28 (13.151.28)
धर्मलब्धं समश्नाति न कामात्किञ्चिदश्नुते । युगमात्रदृगध्वानं क्रोशादूर्ध्वं न गच्छति ॥
dharmalabdhaṃ samaśnāti na kāmātkiñcidaśnute | yugamātradṛgadhvānaṃ krośādūrdhvaṃ na gacchati
वह धर्म से प्राप्त अन्न खाता है, कामना से कुछ नहीं खाता; केवल एक युग (जुए) भर की दूरी तक देखता हुआ चलता है और एक कोस से आगे नहीं जाता।
श्लोक 29 (13.151.29)
समो मानावमानाभ्यां समलोष्टाश्मकाञ्चनः । सर्वभूताभयकरस्तथैवाभयदक्षिणः ॥
samo mānāvamānābhyāṃ samaloṣṭāśmakāñcanaḥ | sarvabhūtābhayakarastathaivābhayadakṣiṇaḥ
मान और अपमान में सम, मिट्टी के ढेले, पत्थर और सोने को समान समझने वाला, सब प्राणियों को अभय देने वाला — अभय ही उसकी दक्षिणा है।
श्लोक 30 (13.151.30)
निर्द्वन्द्वो निर्नमस्कारो निरानन्दपरिग्रहः । निर्ममो निरहङ्कारः सर्वभूतनिराश्रयः ॥
nirdvandvo nirnamaskāro nirānandaparigrahaḥ | nirmamo nirahaṅkāraḥ sarvabhūtanirāśrayaḥ
द्वन्द्वों से रहित, किसी को नमस्कार न करने वाला, आनन्द के लिए कुछ ग्रहण न करने वाला, ममता और अहङ्कार से रहित और किसी भी प्राणी पर आश्रित न रहने वाला,
श्लोक 31 (13.151.31)
परिसङ्ख्यानतत्वज्ञस्तदा सत्यरतः सदा । ऊर्ध्वं नाधो न तिर्यक्च न किञ्चिदभिकामयेत् ॥
parisaṅkhyānatatvajñastadā satyarataḥ sadā | ūrdhvaṃ nādho na tiryakca na kiñcidabhikāmayet
तत्त्वों की गणना के सत्य को जानने वाला और सदा सत्य में रत वह ऊपर, नीचे या तिरछे कहीं भी किसी वस्तु की कामना नहीं करता।
श्लोक 32 (13.151.32)
एवं हि रममाणस्तु यतिधर्मं यथाविधि । कालस्य परिणामात्तु यथा पक्वफलं तथा ॥
evaṃ hi ramamāṇastu yatidharmaṃ yathāvidhi | kālasya pariṇāmāttu yathā pakvaphalaṃ tathā
इस प्रकार विधिपूर्वक यतिधर्म में रमण करते हुए, समय के परिपाक से, जैसे फल पक जाता है,
श्लोक 33 (13.151.33)
स विसृज्य स्वकं देहं प्रविशेद्ब्रह्म शाश्वतम् । निरामयमनाद्यन्तं गुणसौम्यमचेतनम् ॥
sa visṛjya svakaṃ dehaṃ praviśedbrahma śāśvatam | nirāmayamanādyantaṃ guṇasaumyamacetanam
वह अपने शरीर को छोड़कर शाश्वत ब्रह्म में प्रवेश करता है — जो रोगरहित है, आदि-अन्त से रहित है, गुणों में सौम्य है और अचेतन है,
श्लोक 34 (13.151.34)
निरक्षरमबीजं च निरिन्द्रियमजं तथा । अजय्यमक्षयं यत्तदभेद्यं सूक्ष्ममेव च ॥
nirakṣaramabījaṃ ca nirindriyamajaṃ tathā | ajayyamakṣayaṃ yattadabhedyaṃ sūkṣmameva ca
जो अक्षरहीन है, बीजहीन है, इन्द्रियहीन है, अजन्मा है, अजेय है, अक्षय है, जिसका भेदन नहीं हो सकता और जो सूक्ष्म है,
श्लोक 35 (13.151.35)
निर्गुणं च प्रकृतिमन्निर्विकारं च सर्वशः । भूतभव्यभविष्यस्य कालस्य परमेश्वरम् । अव्यक्तं पुरुषं क्षेत्रमानन्त्याय प्रपद्यते ॥
nirguṇaṃ ca prakṛtimannirvikāraṃ ca sarvaśaḥ | bhūtabhavyabhaviṣyasya kālasya parameśvaram | avyaktaṃ puruṣaṃ kṣetramānantyāya prapadyate
जो गुणों से रहित होकर भी प्रकृति से युक्त है, सब प्रकार से विकाररहित है, भूत, भविष्य और वर्तमान काल का परमेश्वर है — उस अव्यक्त, पुरुष और क्षेत्र में वह अनन्तता के लिए प्रवेश करता है।