अनुशासन पर्व · अध्याय 157
नहुष का पतन: अगस्त्य, भृगु और दीपदान
युधिष्ठिर पूछते हैं कि नहुष कैसे गिरा और इन्द्र को उसका पद कैसे फिर मिला। भीष्म बताते हैं कि धूप, दीप और नमस्कार के दान से इन्द्र-पद पाने वाला नहुष अभिमान में उन्हें भूल गया। उसने ऋषि अगस्त्य को अपनी पालकी में जोता और उनके सिर पर पैर से प्रहार किया; अगस्त्य की जटाओं में छिपे भृगु ने उसे सर्प होने का शाप दिया। फिर ब्रह्मा ने इन्द्र का पुनः अभिषेक कराया। अन्त में भीष्म सायंकाल के दीपदान की महिमा कहते हैं।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (13.157.1)
कथं वै स विपन्नश्च कथं वै पातितो भुवि । कथं देवेन्द्रतां प्राप्तस्तद्भवान्वक्तुमर्हति ॥
kathaṃ vai sa vipannaśca kathaṃ vai pātito bhuvi | kathaṃ devendratāṃ prāptastadbhavānvaktumarhati
वह कैसे विपत्ति में पड़ा, पृथ्वी पर कैसे गिराया गया, और देवेन्द्र का पद उसे कैसे प्राप्त हुआ? आप यह मुझे बताइए।
भीष्म उवाच
श्लोक 2 (13.157.2)
एवं तयोः संवदतोः क्रियास्तस्य महात्मनः । सर्वा एव प्रवर्तन्ते या दिव्या याश्च मानुषाः ॥
evaṃ tayoḥ saṃvadatoḥ kriyāstasya mahātmanaḥ | sarvā eva pravartante yā divyā yāśca mānuṣāḥ
जब वे दोनों इस प्रकार बातचीत कर रहे थे, तब उन महात्मा की सभी क्रियाएँ, दिव्य भी और मानुषी भी, चलती रहीं।
श्लोक 3 (13.157.3)
तथैव दीपदानानि सर्वोपकरणानि वै । बलिकर्म च यच्चान्यद्वत्सकाश्च पृथग्विधाः ॥
tathaiva dīpadānāni sarvopakaraṇāni vai | balikarma ca yaccānyadvatsakāśca pṛthagvidhāḥ
इसी प्रकार दीपदान, सब सामग्री, बलिकर्म और अन्य जो कुछ भी था, जैसे सन्तानों के लिए मनाए जाने वाले अनेक प्रकार के वार्षिक उत्सव।
श्लोक 4 (13.157.4)
सर्वास्तस्य समुत्पन्ना देवेन्द्रस्य महात्मनः । देवलोके नृलोके च सदाचारपुरस्कृताः ॥
sarvāstasya samutpannā devendrasya mahātmanaḥ | devaloke nṛloke ca sadācārapuraskṛtāḥ
ये सब उन महात्मा देवेन्द्र के लिए देवलोक में और मनुष्यलोक में प्रचलित हुए, जो सदाचार के रूप में सर्वोपरि माने जाते थे।
श्लोक 5 (13.157.5)
ताश्चोद्भवन्ति राजेन्द्र समृद्ध्यै गृहमेधिनः । धूपप्रदानैर्दीपैश्च नमस्कारैस्तथैव च ॥
tāścodbhavanti rājendra samṛddhyai gṛhamedhinaḥ | dhūpapradānairdīpaiśca namaskāraistathaiva ca
हे राजेन्द्र, ये क्रियाएँ गृहस्थों की समृद्धि के लिए होती हैं, धूप और दीप के दान तथा नमस्कारों के द्वारा।
श्लोक 6 (13.157.6)
यथा सिद्धस्य चान्नस्य गृह्य चाग्रं प्रदीयते । बलयश्च गृहोद्देशे ततः प्रीयन्ति देवताः ॥
yathā siddhasya cānnasya gṛhya cāgraṃ pradīyate | balayaśca gṛhoddeśe tataḥ prīyanti devatāḥ
जब पके हुए अन्न का पहला भाग निकालकर अर्पित किया जाता है और घर के भीतर बलि दी जाती है, तब देवता प्रसन्न होते हैं।
श्लोक 7 (13.157.7)
यथा च गृहिणस्तोषो भवेद्वै बलिकर्मणि । तथा शतगुणा प्रीतिर्देवतानां प्रजायते ॥
yathā ca gṛhiṇastoṣo bhavedvai balikarmaṇi | tathā śataguṇā prītirdevatānāṃ prajāyate
जैसे बलिकर्म में गृहस्थ को सन्तोष होता है, वैसे ही देवताओं में सौ गुनी प्रीति उत्पन्न होती है।
श्लोक 8 (13.157.8)
एवं धूपप्रदानं च दीपदानं च साधवः । प्रयच्छति नमस्कारैर्युक्तमात्मगुणावहम् ॥
evaṃ dhūpapradānaṃ ca dīpadānaṃ ca sādhavaḥ | prayacchati namaskārairyuktamātmaguṇāvaham
इसी प्रकार सज्जन नमस्कार सहित धूपदान और दीपदान करते हैं, जो अपने में गुणों को लाने वाला है।
श्लोक 9 (13.157.9)
स्नानेनाद्भिश्च यत्कर्म क्रियते वै विपश्चिता । नमस्कारप्रयुक्तेन तेन प्रीणन्ति देवताः ॥
snānenādbhiśca yatkarma kriyate vai vipaścitā | namaskāraprayuktena tena prīṇanti devatāḥ
जो कर्म विद्वान् पुरुष स्नान और जल से नमस्कार के साथ करता है, उससे देवता तृप्त होते हैं।
श्लोक 10 (13.157.10)
पितरश्च महाभागा ऋषयश्च तपोधनाः । गृह्याश्च देवताः सर्वाः प्रीयन्ते विधिनाऽर्चिताः ॥
pitaraśca mahābhāgā ṛṣayaśca tapodhanāḥ | gṛhyāśca devatāḥ sarvāḥ prīyante vidhinā'rcitāḥ
महाभाग पितर, तपस्वी ऋषि और गृह के सब देवता विधि से पूजित होने पर प्रसन्न होते हैं।
श्लोक 11 (13.157.11)
इत्येतां बुद्धिमास्थाय नहुषः स नरेश्वरः । सुरेन्द्रत्वं महत्प्राप्य कृतवानेतदद्भुतम् ॥
ityetāṃ buddhimāsthāya nahuṣaḥ sa nareśvaraḥ | surendratvaṃ mahatprāpya kṛtavānetadadbhutam
इसी विचार का आश्रय लेकर राजा नहुष ने देवेन्द्र का महान् पद पाकर यह अद्भुत कार्य किया।
श्लोक 12 (13.157.12)
कस्य चित्त्वथ कालस्य भाग्यक्षय उपस्थिते । सर्वमेतदवज्ञाय न चकार यथाविधि ॥
kasya cittvatha kālasya bhāgyakṣaya upasthite | sarvametadavajñāya na cakāra yathāvidhi
परन्तु कुछ समय बाद जब उसके भाग्य का क्षय आ पहुँचा, तब उसने यह सब उपेक्षित कर दिया और विधिपूर्वक करना छोड़ दिया।
श्लोक 13 (13.157.13)
ततः स परिहीणोऽभूत्सुरेन्द्रो बलदर्पतः । धूपदीपादिकविधिं न यथावच्चकार ह । ततोऽस्य यज्ञविषयो रक्षोभिः परिबाध्यते ॥
tataḥ sa parihīṇo'bhūtsurendro baladarpataḥ | dhūpadīpādikavidhiṃ na yathāvaccakāra ha | tato'sya yajñaviṣayo rakṣobhiḥ paribādhyate
तब वह देवेन्द्र बल के घमण्ड से भ्रष्ट हो गया और धूप-दीप आदि की विधि यथावत् नहीं करता था। इस कारण उसके यज्ञ-क्षेत्र को राक्षस सताने लगे।
श्लोक 14 (13.157.14)
अथागस्त्यमृषिश्रेष्ठं वाहनायाजुहाव ह । द्रुतं सरस्वतीकूलात्स्मयन्निव महाबलः ॥
athāgastyamṛṣiśreṣṭhaṃ vāhanāyājuhāva ha | drutaṃ sarasvatīkūlātsmayanniva mahābalaḥ
तब महाबली नहुष ने मानो मुसकराते हुए सरस्वती के तट से ऋषिश्रेष्ठ अगस्त्य को अपना वाहन बनने के लिए शीघ्र बुलाया।
श्लोक 15 (13.157.15)
ततो भृगुर्महातेजा मैत्रावरुणिमब्रवीत् । निमीलयस्व नयने जटां यावद्विशामि ते । सुरेन्द्रपतनायेति स च नेत्रे न्यमीलयत् ॥
tato bhṛgurmahātejā maitrāvaruṇimabravīt | nimīlayasva nayane jaṭāṃ yāvadviśāmi te | surendrapatanāyeti sa ca netre nyamīlayat
तब महातेजस्वी भृगु ने मित्रावरुण के पुत्र अगस्त्य से कहा, "अपनी आँखें बन्द कर लो, जब तक मैं तुम्हारी जटाओं में प्रवेश करता हूँ।" और अगस्त्य ने देवेन्द्र के पतन के लिए अपनी आँखें मूँद लीं।
श्लोक 16 (13.157.16)
ततोऽगस्त्यस्याथ जटां दृष्ट्वा प्राविशदच्युतः । भृगुः स सुमहातेजाः पातनाय नृपस्य च ॥
tato'gastyasyātha jaṭāṃ dṛṣṭvā prāviśadacyutaḥ | bhṛguḥ sa sumahātejāḥ pātanāya nṛpasya ca
तब अगस्त्य की जटाओं को देखकर अच्युत, महातेजस्वी भृगु उस राजा को गिराने के लिए उनमें प्रविष्ट हो गए।
श्लोक 17 (13.157.17)
ततः स देवराट् प्राप्तस्तमृषिं वाहनाय वै । ततोऽगस्त्यः सुरपतिं वाक्यमाह विशाम्पते । योजयस्वेति मां क्षिप्रं कं च देशं वहामि ते ॥
tataḥ sa devarāṭ prāptastamṛṣiṃ vāhanāya vai | tato'gastyaḥ surapatiṃ vākyamāha viśāmpate | yojayasveti māṃ kṣipraṃ kaṃ ca deśaṃ vahāmi te
तब वह देवराज उन ऋषि को वाहन बनाने के लिए आ पहुँचा। हे नरेश्वर, तब अगस्त्य ने देवेन्द्र से कहा, "मुझे शीघ्र जोत लो, और बताओ कि मैं तुम्हें किस स्थान पर ले चलूँ।"
श्लोक 18 (13.157.18)
यत्र वक्ष्यसि तत्र त्वां नयिष्यामि सुराधिप । इत्युक्तो नहुषस्तेन योजयामास तं मुनिम् ॥
yatra vakṣyasi tatra tvāṃ nayiṣyāmi surādhipa | ityukto nahuṣastena yojayāmāsa taṃ munim
"देवेश्वर, तुम जहाँ कहोगे, वहीं मैं तुम्हें ले चलूँगा।" उनके यह कहने पर नहुष ने उन मुनि को जोत लिया।
श्लोक 19 (13.157.19)
भृगुस्तस्य जटान्तस्थो बभूव हृषितो भृशम् । न चापि दर्शनं तस्य चकार स भृगुस्तदा । वरदानप्रभावज्ञो नहुषस्य महात्मनः ॥
bhṛgustasya jaṭāntastho babhūva hṛṣito bhṛśam | na cāpi darśanaṃ tasya cakāra sa bhṛgustadā | varadānaprabhāvajño nahuṣasya mahātmanaḥ
भृगु उनकी जटाओं के भीतर बैठे हुए अत्यन्त प्रसन्न थे। महात्मा नहुष को मिले वरदान का प्रभाव जानने वाले भृगु ने तब उसे अपना दर्शन नहीं दिया।
श्लोक 20 (13.157.20)
न चुकोप तदाऽगस्त्यो युक्तोऽपि नहुषेण वै । तं तु राजा पदैकेन चोदयामास भारत । श्रुतिः स्मृतिः प्रमाणं वा नेतिवादेन देवराट् ॥
na cukopa tadā'gastyo yukto'pi nahuṣeṇa vai | taṃ tu rājā padaikena codayāmāsa bhārata | śrutiḥ smṛtiḥ pramāṇaṃ vā netivādena devarāṭ
नहुष द्वारा जोते जाने पर भी अगस्त्य क्रुद्ध नहीं हुए। हे भारत, उस राजा ने श्रुति और स्मृति के प्रमाण होने का खण्डन करने वाले वाद में उन्हें पैर से ठोकर मारी।
श्लोक 21 (13.157.21)
न चुकोप स धर्मात्मा ततः पादेन देवराट् । अगस्त्यस्य तदा क्रुद्धो वामेनाभ्यहनच्छिरः ॥
na cukopa sa dharmātmā tataḥ pādena devarāṭ | agastyasya tadā kruddho vāmenābhyahanacchiraḥ
वे धर्मात्मा क्रुद्ध नहीं हुए; किन्तु तब क्रोधित देवराज ने अपने बाएँ पैर से अगस्त्य के सिर पर प्रहार किया।
श्लोक 22 (13.157.22)
तस्मिञ्शिरस्यभिहते स जटान्तर्गतो भृगुः । शशाप बलवत्क्रुद्धो नहुषं पापचेतसम् ॥
tasmiñśirasyabhihate sa jaṭāntargato bhṛguḥ | śaśāpa balavatkruddho nahuṣaṃ pāpacetasam
उस सिर पर चोट लगने पर जटाओं के भीतर स्थित भृगु ने अत्यन्त क्रुद्ध होकर पापबुद्धि नहुष को शाप दिया।
भृगुरुवाच
श्लोक 23 (13.157.23)
यस्मात्पदाऽवधीः क्रोधाच्छिरसीमं महामुनिम् । तस्मादाशु महीं गच्छ सर्पो भूत्वा सुदुर्मते ॥
yasmātpadā'vadhīḥ krodhācchirasīmaṃ mahāmunim | tasmādāśu mahīṃ gaccha sarpo bhūtvā sudurmate
"तूने क्रोध में आकर इन महामुनि के सिर पर पैर से प्रहार किया है, इसलिए हे दुर्बुद्धि, तू सर्प होकर शीघ्र पृथ्वी पर चला जा।"
भीष्म उवाच
श्लोक 24 (13.157.24)
शप्तोऽथ स तदा तेन सर्पो भूत्वा पपात ह । अदृष्टेनाथ भृगुणा भूतले भरतर्षभ ॥
śapto'tha sa tadā tena sarpo bhūtvā papāta ha | adṛṣṭenātha bhṛguṇā bhūtale bharatarṣabha
उनके इस प्रकार शाप देने पर वह उसी समय सर्प होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा, हे भरतश्रेष्ठ; और भृगु अदृश्य ही रहे।
श्लोक 25 (13.157.25)
भृगुं हि यदि सोऽद्राक्षीन्नहुषः पृथिवीपते । स शक्तो नाभविष्यद्वै पातने तस्य तेजसा ॥
bhṛguṃ hi yadi so'drākṣīnnahuṣaḥ pṛthivīpate | sa śakto nābhaviṣyadvai pātane tasya tejasā
हे पृथ्वीपति, यदि नहुष ने भृगु को देख लिया होता, तो नहुष के तेज के कारण भृगु उसे गिराने में समर्थ नहीं होते।
श्लोक 26 (13.157.26)
स तु तैस्तैः प्रदानैश्च तपोभिर्नियमैस्तथा । पतितोऽपि महाराज भूतले स्मृतिमानभूत् ॥
sa tu taistaiḥ pradānaiśca tapobhirniyamaistathā | patito'pi mahārāja bhūtale smṛtimānabhūt
किन्तु अपने उन-उन दानों, तपों और नियमों के बल से, हे महाराज, पृथ्वी पर गिर जाने पर भी उसकी स्मृति बनी रही।
श्लोक 27 (13.157.27)
प्रसादयामास भृगुं शापान्तो मे भवेदिति । ततोऽगस्त्यः कृपाविष्टः प्रासादयत तं भृगुम् । शापान्तार्थं महाराज स च प्रादात्कृपान्वितः ॥
prasādayāmāsa bhṛguṃ śāpānto me bhavediti | tato'gastyaḥ kṛpāviṣṭaḥ prāsādayata taṃ bhṛgum | śāpāntārthaṃ mahārāja sa ca prādātkṛpānvitaḥ
उसने भृगु को प्रसन्न किया कि "मेरे शाप का अन्त हो।" तब हे महाराज, दया से भरे अगस्त्य ने भी शाप के अन्त के लिए भृगु को मनाया, और करुणायुक्त भृगु ने उसे दे दिया।
भृगुरुवाच
श्लोक 28 (13.157.28)
राजा युधिष्ठिरो नाम भविष्यति कुरूद्वहः । स त्वां मोक्षयिता शापादित्युक्त्वाऽन्तरधीयत ॥
rājā yudhiṣṭhiro nāma bhaviṣyati kurūdvahaḥ | sa tvāṃ mokṣayitā śāpādityuktvā'ntaradhīyata
"युधिष्ठिर नाम का एक राजा होगा, कुरुकुल का श्रेष्ठ। वह तुझे इस शाप से छुड़ाएगा।" यह कहकर भृगु अन्तर्धान हो गए।
भीष्म उवाच
श्लोक 29 (13.157.29)
अगस्त्योऽपि महातेजाः कृत्वा कार्यं शतक्रतोः । स्वमाश्रमपदं प्रायात्पूज्यमानो द्विजातिभिः ॥
agastyo'pi mahātejāḥ kṛtvā kāryaṃ śatakratoḥ | svamāśramapadaṃ prāyātpūjyamāno dvijātibhiḥ
और महातेजस्वी अगस्त्य भी इन्द्र का कार्य सम्पन्न करके, ब्राह्मणों से पूजित होते हुए, अपने आश्रम को चले गए।
श्लोक 30 (13.157.30)
नहुषोऽपि त्वया राजंस्तस्माच्छापात्समुद्धृतः । जगाम ब्रह्मभवनं पश्यतस्ते जनाधिप ॥
nahuṣo'pi tvayā rājaṃstasmācchāpātsamuddhṛtaḥ | jagāma brahmabhavanaṃ paśyataste janādhipa
और हे राजन्, नहुष भी तुम्हारे द्वारा उस शाप से उबारा गया, और हे जनाधिप, तुम्हारे देखते-देखते ब्रह्मलोक को चला गया।
श्लोक 31 (13.157.31)
तदा स पातयित्वा तं नहुषं भूतले भृगुः । जगाम ब्रह्मभवनं ब्रह्मणे च न्यवेदयत् ॥
tadā sa pātayitvā taṃ nahuṣaṃ bhūtale bhṛguḥ | jagāma brahmabhavanaṃ brahmaṇe ca nyavedayat
उस समय नहुष को पृथ्वी पर गिराकर भृगु ब्रह्मलोक गए और उन्होंने ब्रह्मा को यह सब निवेदन किया।
श्लोक 32 (13.157.32)
ततः शक्रं समानाय्य देवानाह पितामहः । वरदानान्मम सुरा नहुषो राज्यमाप्तवान् । स चागस्त्येन क्रुद्धेन भ्रंशितो भूतलं गतः ॥
tataḥ śakraṃ samānāyya devānāha pitāmahaḥ | varadānānmama surā nahuṣo rājyamāptavān | sa cāgastyena kruddhena bhraṃśito bhūtalaṃ gataḥ
तब पितामह ने इन्द्र को बुलाकर देवताओं से कहा, "देवताओ, मेरे वरदान से नहुष को राज्य मिला था; और क्रुद्ध अगस्त्य ने उसे भ्रष्ट कर दिया, वह पृथ्वी पर चला गया है।"
ब्रह्मोवाच
श्लोक 33 (13.157.33)
न च शक्यं विना राज्ञा सुखं वर्तयितुं क्वचित् । तस्मादयं पुनः शक्रो देवराज्येऽभिषिच्यताम् ॥
na ca śakyaṃ vinā rājñā sukhaṃ vartayituṃ kvacit | tasmādayaṃ punaḥ śakro devarājye'bhiṣicyatām
"राजा के बिना कहीं भी सुखपूर्वक रहना सम्भव नहीं है। इसलिए यही इन्द्र फिर से देवताओं के राज्य पर अभिषिक्त किया जाए।"
भीष्म उवाच
श्लोक 34 (13.157.34)
एवं सम्भाषमाणं तु देवाः पार्थ पितामहम् । एवमस्त्विति संहृष्टाः प्रत्यूचुस्तं नराधिप ॥
evaṃ sambhāṣamāṇaṃ tu devāḥ pārtha pitāmaham | evamastviti saṃhṛṣṭāḥ pratyūcustaṃ narādhipa
हे पार्थ, इस प्रकार बोलते हुए पितामह से देवताओं ने प्रसन्न होकर कहा, "ऐसा ही हो," हे नराधिप।
श्लोक 35 (13.157.35)
सोऽभिषिक्तो भगवता देवराज्ये च वासवः । ब्रह्मणा राजशार्दूल यथापूर्वं व्यरोचत ॥
so'bhiṣikto bhagavatā devarājye ca vāsavaḥ | brahmaṇā rājaśārdūla yathāpūrvaṃ vyarocata
हे राजशार्दूल, भगवान् ब्रह्मा द्वारा देवताओं के राज्य पर अभिषिक्त होकर इन्द्र पहले की भाँति शोभित हुए।
श्लोक 36 (13.157.36)
एवमेतत्पुरावृत्तं नहुषस्य व्यतिक्रमात् । स च तैरेव संसिद्धो नहुषः कर्मभिः पुनः ॥
evametatpurāvṛttaṃ nahuṣasya vyatikramāt | sa ca taireva saṃsiddho nahuṣaḥ karmabhiḥ punaḥ
नहुष के अपराध के कारण यह प्राचीन घटना इस प्रकार घटी; और उन्हीं कर्मों के द्वारा नहुष फिर सिद्धि को प्राप्त हुआ।
श्लोक 37 (13.157.37)
तस्माद्दीपाः प्रदातव्याः सायं वै गृहमेधिभिः । दिव्यं चक्षुरवाप्नोति प्रेत्य दीपस्य दायकः । पूर्णचन्द्रप्रतीकाशा दीपदाश्च भवन्त्युत ॥
tasmāddīpāḥ pradātavyāḥ sāyaṃ vai gṛhamedhibhiḥ | divyaṃ cakṣuravāpnoti pretya dīpasya dāyakaḥ | pūrṇacandrapratīkāśā dīpadāśca bhavantyuta
इसलिए गृहस्थों को सायंकाल दीप जलाकर देना चाहिए। दीप देने वाला मरने के बाद दिव्य दृष्टि पाता है, और दीपदान करने वाले पूर्णचन्द्र के समान कान्तिमान् होते हैं।
श्लोक 38 (13.157.38)
यावदक्षिनिमेषाणि ज्वलन्ते तावतीः समाः । रूपवान्बलवांश्चापि नरो भवति दीपदः ॥
yāvadakṣinimeṣāṇi jvalante tāvatīḥ samāḥ | rūpavānbalavāṃścāpi naro bhavati dīpadaḥ
जितने नेत्र-पलकों के बराबर वर्षों तक दीपक जलते हैं, उतने वर्षों तक दीप देने वाला मनुष्य रूपवान् और बलवान् होता है।
श्लोक 39 (13.157.39)
य इदं शृणुयाद्वापि पठते यो द्विजोत्तमः । ब्रह्मलोकमवाप्नोति स च वै नात्र संशयः ॥
ya idaṃ śṛṇuyādvāpi paṭhate yo dvijottamaḥ | brahmalokamavāpnoti sa ca vai nātra saṃśayaḥ
जो इसे सुनता है, अथवा जो श्रेष्ठ ब्राह्मण इसका पाठ करता है, वह ब्रह्मलोक को प्राप्त होता है; इसमें कोई संशय नहीं।