अनुशासन पर्व · अध्याय 156
नहुष और सप्तर्षि
युधिष्ठिर फिर धूप, दीप और बलिकर्म के फल के विषय में पूछते हैं। भीष्म नहुष की कथा सुनाते हैं: राजर्षि नहुष ने देवताओं का राज्य पाया और आरम्भ में अपने सब कर्म निभाता रहा, पर अभिमान में उन्हें छोड़ बैठा और सप्तर्षियों से बारी-बारी अपनी पालकी उठवाने लगा। जब अगस्त्य की बारी आई, तब भृगु उनके पास गए; अगस्त्य ने बताया कि वर के कारण नहुष को शाप देना सम्भव नहीं। तब भृगु ने ब्रह्मा की आज्ञा से नहुष को गिराने की प्रतिज्ञा की और अगस्त्य निश्चिन्त हो गए।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (13.156.1)
श्रुतं मे भरतश्रेष्ठ पुष्पधूपप्रदायिनाम् । फलं बलिविधाने च तद्भूयो वक्तुमर्हसि ॥
śrutaṃ me bharataśreṣṭha puṣpadhūpapradāyinām | phalaṃ balividhāne ca tadbhūyo vaktumarhasi
"हे भरतश्रेष्ठ, मैंने पुष्प और धूप देने वालों का तथा बलिविधान का फल सुना। आप उसे फिर से बताइए।"
श्लोक 2 (13.156.2)
धूपप्रदानस्य फलं प्रदीपस्य तथैव च । बलयश्च किमर्थं वै क्षिप्यन्ते गृहमेधिभिः ॥
dhūpapradānasya phalaṃ pradīpasya tathaiva ca | balayaśca kimarthaṃ vai kṣipyante gṛhamedhibhiḥ
"धूपदान का क्या फल है, और दीप का भी? और गृहस्थ बलि क्यों डालते हैं?"
भीष्म उवाच
श्लोक 3 (13.156.3)
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । नहुषस्य च संवादमगस्त्यस्य भृगोस्तथा ॥
atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | nahuṣasya ca saṃvādamagastyasya bhṛgostathā
इस विषय में यह प्राचीन इतिहास कहा जाता है: नहुष के विषय में, तथा अगस्त्य और भृगु का संवाद।
श्लोक 4 (13.156.4)
नहुषो हि महाराज राजर्षिः सुमहातपाः । देवराज्यमनुप्राप्तः सुकृतेनेह कर्मणा ॥
nahuṣo hi mahārāja rājarṣiḥ sumahātapāḥ | devarājyamanuprāptaḥ sukṛteneha karmaṇā
हे महाराज, नहुष महान् तपस्वी राजर्षि था; अपने शुभ कर्म से उसने देवताओं का राज्य पाया था।
श्लोक 5 (13.156.5)
तत्रापि प्रयतो राजन्नहुषस्त्रिदिवे वसन् । मानुषीश्चैव दिव्याश्च कुर्वाणो विविधाः क्रियाः ॥
tatrāpi prayato rājannahuṣastridive vasan | mānuṣīścaiva divyāśca kurvāṇo vividhāḥ kriyāḥ
हे राजन्, स्वर्ग में रहते हुए भी नहुष संयम में रहा और मनुष्यों के तथा देवताओं के अनेक प्रकार के कर्म करता रहा।
श्लोक 6 (13.156.6)
मानुष्यस्तत्र सर्वाः स्म क्रियास्तस्य महात्मनः । प्रवृत्तास्त्रिदिवे राजन्दिव्याश्चैव सनातनाः ॥
mānuṣyastatra sarvāḥ sma kriyāstasya mahātmanaḥ | pravṛttāstridive rājandivyāścaiva sanātanāḥ
हे राजन्, उस महात्मा के सब मानवीय कर्म स्वर्ग में भी चलते रहे, और सनातन दिव्य कर्म भी।
श्लोक 7 (13.156.7)
अग्निकार्याणि समिधः कुशाः सुमनसस्तथा । बलयश्चान्नलाजाभिर्धूपनं दीपकर्म च ॥
agnikāryāṇi samidhaḥ kuśāḥ sumanasastathā | balayaścānnalājābhirdhūpanaṃ dīpakarma ca
अग्निकार्य, समिधाएँ, कुश, पुष्प, अन्न और लाजा से बलि, धूप और दीपकर्म,
श्लोक 8 (13.156.8)
सर्वं तस्य गृहे राज्ञः प्रावर्तत महात्मनः । जपयज्ञान्मनोयज्ञांस्त्रिदिवेऽपि चकार सः ॥
sarvaṃ tasya gṛhe rājñaḥ prāvartata mahātmanaḥ | japayajñānmanoyajñāṃstridive'pi cakāra saḥ
यह सब उस महात्मा राजा के घर में चलता रहा। उसने स्वर्ग में भी जपयज्ञ और मानसयज्ञ किए।
श्लोक 9 (13.156.9)
देवानभ्यर्चयच्चापि विधिवत्स सुरेश्वरः । सर्वानेव यथान्यायं यथापूर्वमरिंदम ॥
devānabhyarcayaccāpi vidhivatsa sureśvaraḥ | sarvāneva yathānyāyaṃ yathāpūrvamariṃdama
और वह सुरेश्वर पहले की भाँति सभी देवताओं की विधिपूर्वक यथोचित पूजा करता रहा, हे शत्रुदमन।
श्लोक 10 (13.156.10)
अथेन्द्रोऽहमिति ज्ञात्वा अहङ्कारं समाविशत् । सर्वाश्चैव क्रियास्तस्य पर्यहीयन्त भूपतेः ॥
athendro'hamiti jñātvā ahaṅkāraṃ samāviśat | sarvāścaiva kriyāstasya paryahīyanta bhūpateḥ
फिर "मैं इन्द्र हूँ" ऐसा समझकर उसमें अहंकार समा गया, और हे राजन्, उसके सब कर्म क्षीण होते चले गए।
श्लोक 11 (13.156.11)
सप्तर्षीन्वाहयामास वरदानमदान्वितः । परिहीनक्रियश्चैव दुर्बलत्वमुपेयिवान् ॥
saptarṣīnvāhayāmāsa varadānamadānvitaḥ | parihīnakriyaścaiva durbalatvamupeyivān
वर के मद से भरकर उसने सप्तर्षियों से अपना वाहन उठवाया; और कर्मों से हीन होकर वह दुर्बल हो गया।
श्लोक 12 (13.156.12)
तस्य वाहयतः कालो मुनिमुख्यांस्तपोधनान् । अहङ्काराभिभूतस्य सुमहानत्यवर्तत ॥
tasya vāhayataḥ kālo munimukhyāṃstapodhanān | ahaṅkārābhibhūtasya sumahānatyavartata
अहंकार से अभिभूत होकर वह तपोधन श्रेष्ठ मुनियों से वाहन उठवाता रहा, और उसका बहुत लम्बा समय बीत गया।
श्लोक 13 (13.156.13)
अथ पर्यायशः सर्वान्वाहनायोपचक्रमे । पर्यायश्चाप्यगस्त्यस्य समपद्यत भारत ॥
atha paryāyaśaḥ sarvānvāhanāyopacakrame | paryāyaścāpyagastyasya samapadyata bhārata
फिर वह सबसे बारी-बारी से वाहन उठवाने लगा, और हे भारत, अगस्त्य की भी बारी आ गई।
श्लोक 14 (13.156.14)
अथागत्य महातेजा भृगुर्ब्रह्मविदांवरः । अगस्त्यमाश्रमस्थं वै समुपेत्येदमब्रवीत् ॥
athāgatya mahātejā bhṛgurbrahmavidāṃvaraḥ | agastyamāśramasthaṃ vai samupetyedamabravīt
तब महातेजस्वी ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ भृगु अगस्त्य के आश्रम में आए, उनके पास पहुँचकर उनसे यह बोले:
भृगुरुवाच
श्लोक 15 (13.156.15)
एवं वयमसत्कारं देवेन्द्रस्यास्य दुर्मतेः । नहुषस्य किमर्थं वै मर्षयाम महामुने ॥
evaṃ vayamasatkāraṃ devendrasyāsya durmateḥ | nahuṣasya kimarthaṃ vai marṣayāma mahāmune
"हे महामुने, हम इस दुर्बुद्धि देवराज नहुष का यह अपमान क्यों सहें?"
अगस्त्य उवाच
श्लोक 16 (13.156.16)
कथमेष मया शक्यः शप्तुं यस्य महामुने । वरदेन वरो दत्तो भवतो विदितश्च सः ॥
kathameṣa mayā śakyaḥ śaptuṃ yasya mahāmune | varadena varo datto bhavato viditaśca saḥ
"हे महामुने, मैं उसे शाप कैसे दे सकता हूँ? वर देने वाले ने उसे वर दिया है, और यह आप जानते हैं।
श्लोक 17 (13.156.17)
यो मे दृष्टिपथं गच्छेत्स मे वश्यो भवेदिति । इत्यनेन वरं देवो याचितो गच्छता दिवम् ॥
yo me dṛṣṭipathaṃ gacchetsa me vaśyo bhavediti | ityanena varaṃ devo yācito gacchatā divam
"जो मेरी दृष्टि के सामने आए, वह मेरे वश में हो जाए": यही वर स्वर्ग को जाते हुए उसने देवता से माँगा था।"
श्लोक 18 (13.156.18)
एवं न दग्धः स मया भवता च न संशयः । अन्येनाप्यृषिमुख्येन न दग्धो न च पातितः ॥
evaṃ na dagdhaḥ sa mayā bhavatā ca na saṃśayaḥ | anyenāpyṛṣimukhyena na dagdho na ca pātitaḥ
"इसीलिए न मैंने उसे भस्म किया, न आपने, इसमें सन्देह नहीं; किसी अन्य श्रेष्ठ ऋषि ने भी उसे न जलाया, न गिराया।"
श्लोक 19 (13.156.19)
अमृतं चैव पानाय दत्तमस्मै पुरा विभो । महात्मना तदर्थं च नास्माभिर्विनिपात्यते ॥
amṛtaṃ caiva pānāya dattamasmai purā vibho | mahātmanā tadarthaṃ ca nāsmābhirvinipātyate
"और हे विभो, पहले उस महात्मा ने उसे पीने के लिए अमृत दिया था; इस कारण भी हम उसे नहीं गिराते।"
श्लोक 20 (13.156.20)
प्रायच्छत वरं देवः प्रजानां दुःखकारणम् । द्विजेष्वधर्मयुक्तानि स करोति नराधमः ॥
prāyacchata varaṃ devaḥ prajānāṃ duḥkhakāraṇam | dvijeṣvadharmayuktāni sa karoti narādhamaḥ
"देवता ने ऐसा वर दिया जो प्रजाओं के दुःख का कारण है; वह अधम मनुष्य द्विजों के साथ अधर्मपूर्ण कार्य करता है।"
श्लोक 21 (13.156.21)
तत्र यत्प्राप्तकालं नस्तद्ब्रूहि वदतांवर । भवांश्चापि यथा ब्रूयात्तत्कर्तास्मि न संशयः ॥
tatra yatprāptakālaṃ nastadbrūhi vadatāṃvara | bhavāṃścāpi yathā brūyāttatkartāsmi na saṃśayaḥ
"हे वक्ताओं में श्रेष्ठ, इस विषय में हमारे लिए जो उचित समय का कर्तव्य हो, वह बताइए; आप जो भी कहेंगे, मैं वही करूँगा, इसमें सन्देह नहीं।"
भृगुरुवाच
श्लोक 22 (13.156.22)
पितामहनियोगेन भवन्तं सोऽहमागतः । प्रतिकर्तुं बलवति नहुषे दर्पमोहिते ॥
pitāmahaniyogena bhavantaṃ so'hamāgataḥ | pratikartuṃ balavati nahuṣe darpamohite
"पितामह की आज्ञा से मैं आपके पास आया हूँ, दर्प से मोहित बलवान् नहुष का प्रतिकार करने के लिए।"
श्लोक 23 (13.156.23)
अद्य हि त्वां सुदुर्बुद्धी रथे योक्ष्यति देवराट् । अद्यैनमहमुद्वृत्तं करिष्येऽनिन्द्रमोजसा ॥
adya hi tvāṃ sudurbuddhī rathe yokṣyati devarāṭ | adyainamahamudvṛttaṃ kariṣye'nindramojasā
"आज वह दुर्बुद्धि देवराज आपको अपने रथ में जोतेगा। आज मैं अपने तेज से इस उद्दण्ड को इन्द्र-पद से रहित कर दूँगा।"
श्लोक 24 (13.156.24)
अद्येन्द्रं स्थापयिष्यामि पश्यतस्ते शतक्रतुम् । सञ्चाल्य पापकर्माणमैन्द्रात्स्थानात्सुदुर्मतिम् ॥
adyendraṃ sthāpayiṣyāmi paśyataste śatakratum | sañcālya pāpakarmāṇamaindrātsthānātsudurmatim
"आज आपके देखते-देखते मैं उस पापी, दुर्मति को इन्द्र के पद से हटाकर शतक्रतु इन्द्र को पुनः स्थापित करूँगा।"
श्लोक 25 (13.156.25)
अद्य चासौ कुदेवेन्द्रस्त्वां पदा धर्षयिष्यति । दैवोपहतचित्तत्वादात्मनाशाय मन्दधीः ॥
adya cāsau kudevendrastvāṃ padā dharṣayiṣyati | daivopahatacittatvādātmanāśāya mandadhīḥ
"और आज वह कुत्सित देवेन्द्र, दैव से हत चित्त वाला मूढ़, अपने ही विनाश के लिए आपको पैर से ठोकर मारेगा।"
श्लोक 26 (13.156.26)
व्युत्क्रान्तधर्मं तमहं धर्षणामर्षितो भृशम् । अहिर्भवस्वेति रुषा शप्स्ये पापं द्विजद्रुहम् ॥
vyutkrāntadharmaṃ tamahaṃ dharṣaṇāmarṣito bhṛśam | ahirbhavasveti ruṣā śapsye pāpaṃ dvijadruham
"उस धर्म का उल्लंघन करने वाले, द्विजद्रोही पापी को, इस आघात से अत्यन्त क्रुद्ध होकर, मैं क्रोध में शाप दूँगा: 'सर्प हो जाओ!'"
श्लोक 27 (13.156.27)
तत एनं सुदुर्बुद्धिं धिक्शब्दाभिहतत्विषम् । धरण्यां पातयिष्यामि पश्यतस्ते महामुने ॥
tata enaṃ sudurbuddhiṃ dhikśabdābhihatatviṣam | dharaṇyāṃ pātayiṣyāmi paśyataste mahāmune
"तब 'धिक्!' शब्द से जिसका तेज नष्ट हो चुका होगा, उस अत्यन्त दुर्बुद्धि को मैं, हे महामुने, आपके देखते-देखते पृथ्वी पर गिरा दूँगा।"
श्लोक 28 (13.156.28)
नहुषं पापकर्माणमैश्वर्यबलमोहितम् । यथा च रोचते तुभ्यं तथा कर्तास्म्यहं मुने ॥
nahuṣaṃ pāpakarmāṇamaiśvaryabalamohitam | yathā ca rocate tubhyaṃ tathā kartāsmyahaṃ mune
"ऐश्वर्य और बल से मोहित उस पापी के विषय में, हे मुनि, जैसा आपको अच्छा लगे, वैसा ही मैं करूँगा।"
भीष्म उवाच
श्लोक 29 (13.156.29)
एवमुक्तस्तु भृगुणा मैत्रावरुणिरव्ययः । अगस्त्यः परमप्रीतो बभूव विगतज्वरः ॥
evamuktastu bhṛguṇā maitrāvaruṇiravyayaḥ | agastyaḥ paramaprīto babhūva vigatajvaraḥ
भृगु के यों कहने पर मित्रावरुण के पुत्र अविनाशी अगस्त्य अत्यन्त प्रसन्न हुए और चिन्ता से मुक्त हो गए।