अनुशासन पर्व · अध्याय 195
हाथी रेणुक और वल्मीक पर बलि का विधान
ब्रह्मा देवताओं से कहते हैं कि रसातल में विचरने वाला महाबली हाथी रेणुक पृथ्वी को धारण करने वाले दिग्गजों से धर्म के रहस्य पूछे, और देवता उसे भेज देते हैं। दिग्गज उसे नागों के लिए बलि का विधान बताते हैं: कार्तिक कृष्ण अष्टमी को अश्लेषा नक्षत्र में गुड़ मिला भात सूर्यास्त के समय मन्त्र सहित वल्मीक पर चढ़ाया जाए और एक वर्ष तक यह किया जाए। तब देवता, पितर और ऋषि रेणुक का सम्मान करते हैं।
भीष्म उवाच
श्लोक 1 (13.195.1)
ततः पद्मप्रतीकाशः पद्मोद्भूतः पितामहः । उवाच वचनं देवान्वासवं च शचीपतिम् ॥
tataḥ padmapratīkāśaḥ padmodbhūtaḥ pitāmahaḥ | uvāca vacanaṃ devānvāsavaṃ ca śacīpatim
तब कमल के समान कान्ति वाले, कमल से उत्पन्न पितामह ने देवताओं से और शचीपति वासव से कहा।
पितामह उवाच
श्लोक 2 (13.195.2)
अयं महाबलो नागो रसातलचरो बली । तेजस्वी रेणुको नाम महासत्वपराक्रमः ॥
ayaṃ mahābalo nāgo rasātalacaro balī | tejasvī reṇuko nāma mahāsatvaparākramaḥ
"यह महाबली, पराक्रमी हाथी, जो रसातल में विचरता है, तेजस्वी रेणुक नाम का है, महान् धैर्य और पराक्रम वाला।
श्लोक 3 (13.195.3)
अतितेजस्विनः सर्वे महावीर्या महागजाः । धारयन्ति महीं कृत्स्नां सशैलवनकाननाम् ॥
atitejasvinaḥ sarve mahāvīryā mahāgajāḥ | dhārayanti mahīṃ kṛtsnāṃ saśailavanakānanām
सभी महान् हाथी अत्यन्त तेजस्वी और महावीर्यवान् हैं; वे पर्वत, वन और उपवनों सहित सारी पृथ्वी को धारण करते हैं।
श्लोक 4 (13.195.4)
भवद्भिः समनुज्ञातो रेणुकस्तान्महागजान् । धर्मगुह्यानि सर्वाणि गत्वा पृच्छतु तत्र वै ॥
bhavadbhiḥ samanujñāto reṇukastānmahāgajān | dharmaguhyāni sarvāṇi gatvā pṛcchatu tatra vai
आप सबकी अनुमति से रेणुक उन महान् हाथियों के पास जाकर उनसे धर्म के सब रहस्य पूछे।"
भीष्म उवाच
श्लोक 5 (13.195.5)
पितामहवचः श्रुत्वा ते देवा रेणुकं तदा । प्रेषयामासुरव्यग्रा यत्र ते धरणीधराः ॥
pitāmahavacaḥ śrutvā te devā reṇukaṃ tadā | preṣayāmāsuravyagrā yatra te dharaṇīdharāḥ
पितामह की बात सुनकर देवताओं ने निश्चिन्त होकर रेणुक को वहाँ भेज दिया जहाँ वे पृथ्वी को धारण करने वाले दिग्गज थे।
रेणुक उवाच
श्लोक 6 (13.195.6)
अनुज्ञातोऽस्मि देवैश्च पितृभिश्च महाबलाः । धर्मगुह्यानि युष्माकं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः । कथयध्वं महाभागा यद्वस्तत्त्वं मनीषितम् ॥
anujñāto'smi devaiśca pitṛbhiśca mahābalāḥ | dharmaguhyāni yuṣmākaṃ śrotumicchāmi tattvataḥ | kathayadhvaṃ mahābhāgā yadvastattvaṃ manīṣitam
"देवताओं और पितरों ने मुझे अनुमति दी है, हे महाबली दिग्गजो। मैं आपके धर्म-रहस्य यथार्थ रूप में सुनना चाहता हूँ। हे महाभाग, आपने जो तत्त्व सोचा-समझा है, वह मुझे बताइए।"
दिग्गजा ऊचुः
श्लोक 7 (13.195.7)
कार्तिके मासि चाश्लेषा बहुलस्याष्टमी शिवा । तेन नक्षत्रयोगेन यो ददाति गुडौदनम् । इमं मन्त्रं जपञ्छ्राद्धे यताहारो ह्यकोपनः ॥
kārtike māsi cāśleṣā bahulasyāṣṭamī śivā | tena nakṣatrayogena yo dadāti guḍaudanam | imaṃ mantraṃ japañchrāddhe yatāhāro hyakopanaḥ
"कार्तिक मास में, कृष्ण पक्ष की शुभ अष्टमी को जब अश्लेषा नक्षत्र हो — उस नक्षत्र-योग में जो गुड़ मिला भात देता है और श्राद्ध में यह मन्त्र जपता है, संयत आहार वाला और क्रोधरहित रहकर —
श्लोक 8 (13.195.8)
बलदेवप्रभृतयो ये नागा बलवत्तराः । अनन्ता ह्यक्षया नित्यं भोगिनः सुमहाबलाः ॥
baladevaprabhṛtayo ye nāgā balavattarāḥ | anantā hyakṣayā nityaṃ bhoginaḥ sumahābalāḥ
"बलदेव आदि जो अत्यन्त बलवान् नाग हैं — अनन्त, अक्षय, सदा फन वाले, महाबली —
श्लोक 9 (13.195.9)
तेषां कुलोद्भवा ये च महाभूता भुजङ्गमाः । ते मे बलिं प्रयच्छन्तु बलतेजोभिवृद्धये ॥
teṣāṃ kulodbhavā ye ca mahābhūtā bhujaṅgamāḥ | te me baliṃ prayacchantu balatejobhivṛddhaye
और उनके कुलों में उत्पन्न जो महाभूत सर्प हैं, वे बल और तेज की वृद्धि के लिए मेरी बलि ग्रहण करें।
श्लोक 10 (13.195.10)
यदा नारायणः श्रीमानुज्जहार वसुन्धराम् । तद्बलं तस्य देवस्य धरामुद्धरतस्तथा ॥
yadā nārāyaṇaḥ śrīmānujjahāra vasundharām | tadbalaṃ tasya devasya dharāmuddharatastathā
जब श्रीमान् नारायण ने पृथ्वी का उद्धार किया था, पृथ्वी को उठाते हुए उन देव का वह बल —"
श्लोक 11 (13.195.11)
एवमुक्त्वा बलिं तत्र वल्मीके तु निवेदयेत् ॥
evamuktvā baliṃ tatra valmīke tu nivedayet
ऐसा कहकर वह वहीं वल्मीक (दीमक की बाँबी) पर बलि अर्पित करे।
श्लोक 12 (13.195.12)
गजेन्द्रकुसुमाकीर्णं नीलवस्त्रानुलेपनम् । निर्वपेत्तं तु वल्मीके अस्तं याते दिवाकरे ॥
gajendrakusumākīrṇaṃ nīlavastrānulepanam | nirvapettaṃ tu valmīke astaṃ yāte divākare
गजेन्द्र-पुष्पों से सजी, नीले वस्त्र और लेप के साथ वह बलि सूर्यास्त हो जाने पर वल्मीक पर रखे।
श्लोक 13 (13.195.13)
एवं तुष्टास्ततः सर्वे अधस्ताद्भारपीडिताः । श्रमं तं नावबुध्यामो धारयन्तो वसुन्धराम् ॥
evaṃ tuṣṭāstataḥ sarve adhastādbhārapīḍitāḥ | śramaṃ taṃ nāvabudhyāmo dhārayanto vasundharām
इस प्रकार प्रसन्न होकर हम सब नीचे भार से दबे हुए भी, पृथ्वी को धारण करते हुए, उस थकान को नहीं जानते।
श्लोक 14 (13.195.14)
एवं मन्यामहे सर्वे भारार्ता निरपेक्षिणः । ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः शूद्रो वा यद्युपोषितः ॥
evaṃ manyāmahe sarve bhārārtā nirapekṣiṇaḥ | brāhmaṇaḥ kṣatriyo vaiśyaḥ śūdro vā yadyupoṣitaḥ
इस प्रकार हम सब भार से पीड़ित और निरपेक्ष होकर मानते हैं कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र — जो उपवास किए हो —
श्लोक 15 (13.195.15)
एवं संवत्सरं कृत्वा दानं बहुफलं लभेत् । वल्मीके बलिमादाय तन्नो बहुफलं मतम् ॥
evaṃ saṃvatsaraṃ kṛtvā dānaṃ bahuphalaṃ labhet | valmīke balimādāya tanno bahuphalaṃ matam
इस प्रकार एक वर्ष तक करके बहुत फल वाले दान का फल पाता है। वल्मीक पर बलि ले जाकर चढ़ाना — इसे हम बहुत फल देने वाला मानते हैं।
श्लोक 16 (13.195.16)
ये च नागा महावीर्यास्त्रिषु लोकेषु कृत्स्नशः । कृतातिथ्या भवेयुस्ते शतं वर्षाणि तत्त्वतः ॥
ye ca nāgā mahāvīryāstriṣu lokeṣu kṛtsnaśaḥ | kṛtātithyā bhaveyuste śataṃ varṣāṇi tattvataḥ
और तीनों लोकों में जो महापराक्रमी नाग हैं, वे इस प्रकार अतिथि-सत्कार पाकर सचमुच सौ वर्षों तक तृप्त रहते हैं।"
भीष्म उवाच
श्लोक 17 (13.195.17)
दिग्गजानां च तच्छ्रुत्वा देवताः पितरस्तथा । ऋषयश्च महाभागाः पूजयन्ति स्म रेणुकम् ॥
diggajānāṃ ca tacchrutvā devatāḥ pitarastathā | ṛṣayaśca mahābhāgāḥ pūjayanti sma reṇukam
दिग्गजों की यह बात सुनकर देवताओं, पितरों और महाभाग ऋषियों ने रेणुक का सम्मान किया।