अनुशासन पर्व · अध्याय 194
प्रमथों द्वारा अपने आक्रमण और बचाव के उपायों का कथन
देवता, पितर और ऋषि रात में विचरने वाले प्रमथों से पूछते हैं कि वे अशुद्ध मनुष्यों को क्यों सताते हैं और मनुष्य किन उपायों से उनसे बचते हैं। प्रमथ बताते हैं कि वे उन्हें दबोचते हैं जो मैथुन से अशुद्ध हैं, मोह से मांस खाते हैं, वृक्ष की जड़ में या उलटी दिशा में सिर-पैर करके सोते हैं और जल को अपवित्र करते हैं। गोरोचन, वच, सिर पर घी और अक्षत, मांस-त्याग, घर में नित्य जलती अग्नि और कुछ घरेलू वस्तुओं से वे दूर रहते हैं।
भीष्म उवाच
श्लोक 1 (13.194.1)
ततः सर्वे महाभागा देवाश्च पितरश्च ह । ऋषयश्च महाभागाः प्रमथान्वाक्यमब्रुवन् ॥
tataḥ sarve mahābhāgā devāśca pitaraśca ha | ṛṣayaśca mahābhāgāḥ pramathānvākyamabruvan
तब सब महाभाग देवता, पितर और महाभाग ऋषि प्रमथों से बोले:
देवाः पितर ऋषयश्च ऊचुः
श्लोक 2 (13.194.2)
भवन्तो वै महाभागा अपरोक्षनिशाचराः । उच्छिष्टानशुचीन्क्षुद्रान्कथं हिंसथ मानवान् ॥
bhavanto vai mahābhāgā aparokṣaniśācarāḥ | ucchiṣṭānaśucīnkṣudrānkathaṃ hiṃsatha mānavān
"हे महाभागो, आप रात में खुले रूप से विचरने वाले हैं। आप अशुद्ध, अपवित्र और क्षुद्र मनुष्यों को किस प्रकार सताते हैं?
श्लोक 3 (13.194.3)
के च स्मृताः प्रतीघाता येन मर्त्यान्न हिंसथ । रक्षोघ्नानि च कानि स्युर्यैर्गृहेषु प्रणश्यथ । श्रोतुमिच्छाम युष्माकं सर्वमेतन्निशाचराः ॥
ke ca smṛtāḥ pratīghātā yena martyānna hiṃsatha | rakṣoghnāni ca kāni syuryairgṛheṣu praṇaśyatha | śrotumicchāma yuṣmākaṃ sarvametanniśācarāḥ
वे कौन-से बचाव कहे गए हैं जिनसे आप मनुष्यों को नहीं सताते? और वे कौन-सी वस्तुएँ हैं जो राक्षसों को नष्ट करने वाली हैं और जिनसे घरों में आपका नाश हो जाता है? हे निशाचरो, हम आपसे यह सब सुनना चाहते हैं।"
प्रमथा ऊचुः
श्लोक 4 (13.194.4)
मैथुनेन सदोच्छिष्टाः कृते चैवाधरोत्तरे । मोहान्मांसानि खादेत वृक्षमूले च यः स्वपेत् ॥
maithunena sadocchiṣṭāḥ kṛte caivādharottare | mohānmāṃsāni khādeta vṛkṣamūle ca yaḥ svapet
जो मैथुन से सदा अशुद्ध रहते हैं, या जब ऊँच-नीच उलट दिया गया हो (श्रेष्ठ का अपमान हुआ हो); जो मोह से मांस खाता है और जो वृक्ष की जड़ में सोता है;
श्लोक 5 (13.194.5)
आमिषं शीर्षतो यस्य पादतो यश्च संविशेत् । तत उच्छिष्टकाः सर्वे बहुच्छिद्राश्च मानवाः ॥
āmiṣaṃ śīrṣato yasya pādato yaśca saṃviśet | tata ucchiṣṭakāḥ sarve bahucchidrāśca mānavāḥ
जो सिर के पास मांस रखकर सोता है और जो पैर की ओर सिर करके लेटता है — ऐसे सब मनुष्य उच्छिष्ट (अशुद्ध) और छिद्रों से भरे होते हैं।
श्लोक 6 (13.194.6)
उदके चाप्यमेध्यानि श्लेष्माणं च प्रमुञ्चति । एते भक्ष्याश्च वध्याश्च मानुषा नात्र संशयः ॥
udake cāpyamedhyāni śleṣmāṇaṃ ca pramuñcati | ete bhakṣyāśca vadhyāśca mānuṣā nātra saṃśayaḥ
और जो जल में अपवित्र वस्तुएँ या कफ डालता है — ऐसे मनुष्य खाए जाने और मारे जाने के योग्य हैं, इसमें संशय नहीं।
श्लोक 7 (13.194.7)
एवं शीलसमाचारान्धर्षयामो हि मानवान् । श्रूयतां च प्रतीघातान्यैर्न शक्नुम हिंसितुम् ॥
evaṃ śīlasamācārāndharṣayāmo hi mānavān | śrūyatāṃ ca pratīghātānyairna śaknuma hiṃsitum
ऐसे शील और आचार वाले मनुष्यों को हम दबा लेते हैं। अब उन बचावों को सुनो जिनके रहते हम उन्हें सता नहीं सकते।
श्लोक 8 (13.194.8)
गोरोचनासमालम्भो वचाहस्तश्च यो भवेत् । घृताक्षतं च यो दद्यान्मस्तके तत्परायणः ॥
gorocanāsamālambho vacāhastaśca yo bhavet | ghṛtākṣataṃ ca yo dadyānmastake tatparāyaṇaḥ
जिसने गोरोचन का लेप किया हो, हाथ में वच रखी हो और जो इसी में लगा रहकर सिर पर घी और अक्षत रखता हो,
श्लोक 9 (13.194.9)
ये च मांसं न खादन्ति तान्न शक्नुम हिंसितुम् । यस्य चाग्निर्गृहे नित्यं दिवारात्रौ च दीप्यते ॥
ye ca māṃsaṃ na khādanti tānna śaknuma hiṃsitum | yasya cāgnirgṛhe nityaṃ divārātrau ca dīpyate
और जो मांस नहीं खाते — इन्हें हम नहीं सता सकते; और उसे भी नहीं जिसके घर में दिन-रात आग सदा जलती रहती है।
श्लोक 10 (13.194.10)
तरक्षोश्चर्मदंष्ट्राश्च तथैव गिरिकच्छपः । आज्यधूमो बिडालश्च च्छागः कृष्णोऽथ पिङ्गलः ॥
tarakṣoścarmadaṃṣṭrāśca tathaiva girikacchapaḥ | ājyadhūmo biḍālaśca cchāgaḥ kṛṣṇo'tha piṅgalaḥ
बाघ का चमड़ा और दाँत, पर्वत की कन्दरा का कछुआ, घी का धुआँ, बिल्ली और काला अथवा पीला (भूरा) बकरा —
श्लोक 11 (13.194.11)
येषामेतानि तिष्ठन्ति गृहेषु गृहमेधिनाम् । तान्यधृष्याण्यगाराणि पिशिताशैः सुदारुणैः ॥
yeṣāmetāni tiṣṭhanti gṛheṣu gṛhamedhinām | tānyadhṛṣyāṇyagārāṇi piśitāśaiḥ sudāruṇaiḥ
गृहस्थों के जिन घरों में ये वस्तुएँ रहती हैं, उन घरों को अत्यन्त भयंकर मांसभक्षी नहीं दबा सकते।
श्लोक 12 (13.194.12)
लोकानस्मद्विधा ये च विचरन्ति यथासुखम् । तस्मादेतानि गेहेषु रक्षोघ्नानि विशाम्पते । एतद्वः कथितं सर्वं यत्र वः संशयो महान् ॥
lokānasmadvidhā ye ca vicaranti yathāsukham | tasmādetāni geheṣu rakṣoghnāni viśāmpate | etadvaḥ kathitaṃ sarvaṃ yatra vaḥ saṃśayo mahān
हम जैसे जो प्राणी लोकों में इच्छानुसार विचरते हैं, उनसे बचने के लिए, हे विशाम्पते, घरों में ये वस्तुएँ राक्षसनाशक हैं। जिस विषय में आपको बड़ा संशय था, वह सब आपको बता दिया।