अनुशासन पर्व · अध्याय 197
स्कन्द, विष्णु और भीष्म द्वारा धर्म-रहस्यों का समापन
स्कन्द दो और नियम बताते हैं: काले साँड़ के सींगों की मिट्टी से तीन दिन का स्नान, और पूर्णिमा को उदुम्बर के पात्र में पका अन्न और मधु उगते चन्द्रमा को अर्पित करना। विष्णु कहते हैं कि जो इन धर्म-रहस्यों का पाठ करता, सुनता या सुनाता है, वह विघ्नों और पापों से मुक्त हो जाता है। अन्त में भीष्म युधिष्ठिर से कहते हैं कि व्यास द्वारा बताया गया यह उपदेश केवल श्रद्धालुओं को देना चाहिए।
स्कन्द उवाच
श्लोक 1 (13.197.1)
ममाप्यनुमतो धर्मस्तं शृणुध्वं समाहिताः । नीलषण्डस्य शृङ्गाभ्यां गृहीत्वा मृत्तिकां तु यः ॥
mamāpyanumato dharmastaṃ śṛṇudhvaṃ samāhitāḥ | nīlaṣaṇḍasya śṛṅgābhyāṃ gṛhītvā mṛttikāṃ tu yaḥ
जो धर्म मुझे भी मान्य है, उसे ध्यान से सुनो। जो नील साँड़ (नीलषण्ड) के दोनों सींगों से मिट्टी लेकर
श्लोक 2 (13.197.2)
अभिषेकं त्र्यहं कुर्यात्तस्य धर्मं निबोधत । शोधयेदशुभं सर्वमाधिपत्यं परत्र च ॥
abhiṣekaṃ tryahaṃ kuryāttasya dharmaṃ nibodhata | śodhayedaśubhaṃ sarvamādhipatyaṃ paratra ca
तीन दिन तक उससे स्नान करता है, उसका धर्म सुनो: वह सब अशुभ को धो डालता है और परलोक में भी आधिपत्य पाता है।
श्लोक 3 (13.197.3)
यावच्च जायते मर्त्यस्तावच्छूरो भविष्यति । इदं चाप्यपरं गुह्यं सरहस्यं निबोधत ॥
yāvacca jāyate martyastāvacchūro bhaviṣyati | idaṃ cāpyaparaṃ guhyaṃ sarahasyaṃ nibodhata
वह मनुष्य जब तक जीवित रहता है, तब तक शूरवीर रहेगा। यह दूसरा रहस्य भी रहस्य सहित सुनो।
श्लोक 4 (13.197.4)
प्रगृह्यौदुम्बरं पात्रं पक्वान्नं मधुना सह । सोमस्योत्तिष्ठमानस्य पौर्णमास्यां बलिं हरेत् ॥
pragṛhyaudumbaraṃ pātraṃ pakvānnaṃ madhunā saha | somasyottiṣṭhamānasya paurṇamāsyāṃ baliṃ haret
उदुम्बर की लकड़ी का पात्र लेकर, उसमें पका अन्न और मधु रखकर, पूर्णिमा के दिन उगते हुए चन्द्रमा को बलि अर्पित करे।
श्लोक 5 (13.197.5)
तस्य धर्मफलं नित्यं श्रद्दधाना निबोधत । साध्या रुद्रास्तथाऽऽदित्या विश्वेदेवास्तथाऽश्विनौ ॥
tasya dharmaphalaṃ nityaṃ śraddadhānā nibodhata | sādhyā rudrāstathā''dityā viśvedevāstathā'śvinau
श्रद्धा के साथ उसका नित्य धर्मफल सुनो: साध्य, रुद्र, आदित्य, विश्वेदेव और दोनों अश्विनीकुमार,
श्लोक 6 (13.197.6)
मरुतो वसवश्चैव प्रतिगृह्णन्ति तं बलिम् । सोमश्च वर्धते तेन समुद्रश्च महोदधिः ॥
maruto vasavaścaiva pratigṛhṇanti taṃ balim | somaśca vardhate tena samudraśca mahodadhiḥ
मरुद्गण और वसु उस बलि को ग्रहण करते हैं; उससे चन्द्रमा बढ़ता है और महासागर भी बढ़ता है।
श्लोक 7 (13.197.7)
एष धर्मो मयोद्दिष्टः सरहस्यः सुखावहः ॥
eṣa dharmo mayoddiṣṭaḥ sarahasyaḥ sukhāvahaḥ
सुख देने वाला यह धर्म रहस्य सहित मेरे द्वारा बताया गया।
विष्णुरुवाच
श्लोक 8 (13.197.8)
धर्मगुह्यानि सर्वाणि देवतानां महात्मनाम् । ऋषीणां चैव गुह्यानि यः पठेदाह्निकं सदा ॥
dharmaguhyāni sarvāṇi devatānāṃ mahātmanām | ṛṣīṇāṃ caiva guhyāni yaḥ paṭhedāhnikaṃ sadā
महात्मा देवताओं के सब धर्म-रहस्य और ऋषियों के भी रहस्य, जो प्रतिदिन उनका पाठ करता है,
श्लोक 9 (13.197.9)
शृणुयाद्वाऽनसूयुर्यः श्रद्दधानः समाहितः । नास्य विघ्नः प्रभवति भयं चास्य न विद्यते ॥
śṛṇuyādvā'nasūyuryaḥ śraddadhānaḥ samāhitaḥ | nāsya vighnaḥ prabhavati bhayaṃ cāsya na vidyate
अथवा जो ईर्ष्यारहित, श्रद्धा और एकाग्रता के साथ उन्हें सुनता है, उस पर कोई विघ्न प्रभाव नहीं डालता और उसे कोई भय नहीं रहता।
श्लोक 10 (13.197.10)
ये च धर्माः शुभाः पुण्याः सरहस्या उदाहृताः । तेषां धर्मफलं तस्य यः पठेत जितेन्द्रियः ॥
ye ca dharmāḥ śubhāḥ puṇyāḥ sarahasyā udāhṛtāḥ | teṣāṃ dharmaphalaṃ tasya yaḥ paṭheta jitendriyaḥ
जो शुभ और पुण्यमय धर्म रहस्य सहित बताए गए हैं, उनका धर्मफल उस जितेन्द्रिय पुरुष को मिलता है जो उनका पाठ करता है।
श्लोक 11 (13.197.11)
नास्य पापं प्रभवति न च पापेन लिप्यते । पठेद्वा श्रावयेद्वाऽपि श्रुत्वा वा लभते फलम् ॥
nāsya pāpaṃ prabhavati na ca pāpena lipyate | paṭhedvā śrāvayedvā'pi śrutvā vā labhate phalam
उस पर पाप का प्रभाव नहीं पड़ता और वह पाप से लिप्त नहीं होता। चाहे वह पाठ करे, सुनाए या सुने, उसे फल मिलता है।
श्लोक 12 (13.197.12)
भुञ्जते पितरो देवा हव्यं कव्यमथाक्षयम् । श्रावयंश्चापि विप्रेन्द्रान्पर्वसु प्रयतो नरः ॥
bhuñjate pitaro devā havyaṃ kavyamathākṣayam | śrāvayaṃścāpi viprendrānparvasu prayato naraḥ
जब संयमी मनुष्य पर्वों पर श्रेष्ठ ब्राह्मणों को इसे सुनाता है, तब पितर और देवता उसके अक्षय हव्य और कव्य का भोग करते हैं,
श्लोक 13 (13.197.13)
ऋषीणां देवतानां च पितॄणां चैव नित्यदा । भवत्यभिमतः श्रीमान्धर्मेषु प्रयतः सदा ॥
ṛṣīṇāṃ devatānāṃ ca pitṝṇāṃ caiva nityadā | bhavatyabhimataḥ śrīmāndharmeṣu prayataḥ sadā
और वह ऋषियों, देवताओं और पितरों का सदा प्रिय, श्रीसम्पन्न और धर्मों में सदा दृढ़ रहने वाला होता है।
श्लोक 14 (13.197.14)
कृत्वाऽपि पापकं कर्म महापातकवर्जितम् । रहस्यधर्मं श्रुत्वेमं सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥
kṛtvā'pi pāpakaṃ karma mahāpātakavarjitam | rahasyadharmaṃ śrutvemaṃ sarvapāpaiḥ pramucyate
महापातकों को छोड़कर कोई पाप कर्म करके भी मनुष्य इस रहस्य-धर्म को सुनकर सब पापों से छूट जाता है।
भीष्म उवाच
श्लोक 15 (13.197.15)
एतद्धर्मरहस्यं वै देवतानां नराधिप । व्यासोद्दिष्टं मया प्रोक्तं सर्वदेवनमस्कृतम् ॥
etaddharmarahasyaṃ vai devatānāṃ narādhipa | vyāsoddiṣṭaṃ mayā proktaṃ sarvadevanamaskṛtam
हे नराधिप, देवताओं का यह धर्म-रहस्य, जिसे व्यास ने बताया था, मैंने कह दिया; इसे सब देवता नमस्कार करते हैं।
श्लोक 16 (13.197.16)
पृथिवी रत्नसंपूर्णा ज्ञानं चेदमनुत्तमम् । इदमेव ततः श्राव्यमिति मन्येत धर्मवित् ॥
pṛthivī ratnasaṃpūrṇā jñānaṃ cedamanuttamam | idameva tataḥ śrāvyamiti manyeta dharmavit
रत्नों से भरी पृथ्वी और यह सर्वोत्तम ज्ञान — इन दोनों में से धर्म को जानने वाला यही माने कि यही सुनने योग्य है।
श्लोक 17 (13.197.17)
नाश्रद्दधानाय न नास्तिकाय । न नष्टधर्माय न निर्घृणाय । न हेतुदुष्टाय गुरुद्विषे वा । नानात्मभूताय निवेद्यमेतत् ॥
nāśraddadhānāya na nāstikāya | na naṣṭadharmāya na nirghṛṇāya | na hetuduṣṭāya gurudviṣe vā | nānātmabhūtāya nivedyametat
यह श्रद्धाहीन को न बताया जाए, न नास्तिक को; न धर्म खो चुके को, न निर्दयी को; न कुतर्क से बिगड़े हुए को, न गुरु से द्वेष करने वाले को और न उसको जो अपने आत्मा के समान (अपना) नहीं है।