अनुशासन पर्व · अध्याय 198
किसका अन्न खाना चाहिए
युधिष्ठिर पूछते हैं कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र किनका अन्न खा सकते हैं। भीष्म बताते हैं कि पहले तीन वर्ण एक-दूसरे का अन्न ले सकते हैं, शूद्र का नहीं, और जो शूद्र के कर्म से जीता है, जैसे वैद्य, शिल्पी या चुगलखोर, वह शूद्र के समान है। वे निषिद्ध अन्न खाने के दुष्परिणाम गिनाते हैं।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (13.198.1)
के भोज्या ब्राह्मणस्येह के भोज्याः क्षत्रियस्य ह । तथा वैश्यस्य के भोज्याः के शूद्रस्य च भारत ॥
ke bhojyā brāhmaṇasyeha ke bhojyāḥ kṣatriyasya ha | tathā vaiśyasya ke bhojyāḥ ke śūdrasya ca bhārata
हे भारत, इस लोक में ब्राह्मण के लिए किनका अन्न खाने योग्य है और क्षत्रिय के लिए किनका? इसी प्रकार वैश्य के लिए किनका और शूद्र के लिए किनका?
भीष्म उवाच
श्लोक 2 (13.198.2)
ब्राह्मणा ब्राह्मणस्येह भोज्या ये चैव क्षत्रियाः । वैश्याश्चापि तथा भोज्याः शूद्राश्च परिवर्जिताः ॥
brāhmaṇā brāhmaṇasyeha bhojyā ye caiva kṣatriyāḥ | vaiśyāścāpi tathā bhojyāḥ śūdrāśca parivarjitāḥ
यहाँ ब्राह्मण के लिए ब्राह्मणों का, क्षत्रियों का और वैश्यों का भी अन्न भोज्य है; शूद्रों का अन्न त्याज्य है।
श्लोक 3 (13.198.3)
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्या भोज्या वै क्षत्रियस्य ह । वर्जनीयास्तु वै शूद्राः सर्वभक्षा विकर्मिणः ॥
brāhmaṇāḥ kṣatriyā vaiśyā bhojyā vai kṣatriyasya ha | varjanīyāstu vai śūdrāḥ sarvabhakṣā vikarmiṇaḥ
क्षत्रिय के लिए ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य भोज्य हैं। शूद्र वर्जित हैं, और वे भी जो सब कुछ खा लेते हैं तथा निषिद्ध कर्म करते हैं।
श्लोक 4 (13.198.4)
वैश्यास्तु भोज्या विप्राणां क्षत्रियाणां तथैव च । नित्याग्नयो विविक्ताश्च चातुर्मास्यरताश्च ये ॥
vaiśyāstu bhojyā viprāṇāṃ kṣatriyāṇāṃ tathaiva ca | nityāgnayo viviktāśca cāturmāsyaratāśca ye
ब्राह्मणों और क्षत्रियों के लिए वे वैश्य भी भोज्य हैं जो नित्य अग्नि रखते हैं, शुद्ध आचरण वाले हैं और चातुर्मास्य व्रतों में लगे रहते हैं।
श्लोक 5 (13.198.5)
शूद्राणामथ यो भुङ्क्ते स भुङ्क्ते पृथिवीमलम् । मलं नृणां स पिबति मलं भुङ्क्ते जनस्य च ॥
śūdrāṇāmatha yo bhuṅkte sa bhuṅkte pṛthivīmalam | malaṃ nṛṇāṃ sa pibati malaṃ bhuṅkte janasya ca
जो शूद्रों का अन्न खाता है, वह पृथ्वी का मल खाता है; वह मनुष्यों का मल पीता है और लोगों का मल खाता है।
श्लोक 6 (13.198.6)
शूद्राणां यस्तथा भुङ्क्ते स भुङ्क्ते पृथिवीमलम् । पृथिवीमलमश्नन्ति ये द्विजाः शूद्रभोजिनः ॥
śūdrāṇāṃ yastathā bhuṅkte sa bhuṅkte pṛthivīmalam | pṛthivīmalamaśnanti ye dvijāḥ śūdrabhojinaḥ
इसी प्रकार जो शूद्रों का अन्न खाता है, वह पृथ्वी का मल खाता है; जो द्विज शूद्र का भोजन करते हैं, वे पृथ्वी का मल ही खाते हैं।
श्लोक 7 (13.198.7)
शूद्रस्य कर्मनिष्ठायां विकर्मस्थोपि पच्यते । ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यो विकर्मस्थश्च पच्यते ॥
śūdrasya karmaniṣṭhāyāṃ vikarmasthopi pacyate | brāhmaṇaḥ kṣatriyo vaiśyo vikarmasthaśca pacyate
जो अपने से ऊँचे कर्म में स्थित होकर भी शूद्र की सेवा-वृत्ति में लगा रहता है, वह नरक में पकता है; इसी प्रकार जो ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य अपने कर्म से भिन्न कर्म में स्थित रहता है, वह भी पकता है।
श्लोक 8 (13.198.8)
स्वाध्यायनिरता विप्रास्तथा स्वस्त्ययने नृणाम् । रक्षणे क्षत्रियं प्राहुर्वैश्यं पुष्ट्यर्थमेव च ॥
svādhyāyaniratā viprāstathā svastyayane nṛṇām | rakṣaṇe kṣatriyaṃ prāhurvaiśyaṃ puṣṭyarthameva ca
कहा गया है कि ब्राह्मण स्वाध्याय और मनुष्यों के कल्याण-कर्म में लगे रहते हैं, क्षत्रिय रक्षा में और वैश्य पोषण तथा समृद्धि के लिए हैं।
श्लोक 9 (13.198.9)
करोति कर्म यद्वैश्यस्तद्गत्वा ह्युपजीवति । कृषिगोरक्ष्यवाणिज्यमकुत्सा वैश्यकर्मणि ॥
karoti karma yadvaiśyastadgatvā hyupajīvati | kṛṣigorakṣyavāṇijyamakutsā vaiśyakarmaṇi
वैश्य जो कर्म करता है, उसी का अनुसरण करके वह जीविका चलाता है। खेती, गोपालन और व्यापार वैश्य के कर्म में निन्दनीय नहीं हैं।
श्लोक 10 (13.198.10)
शूद्रकर्म तु यः कुर्यादवहाय स्वकर्म च । स विज्ञेयो यथा शूद्रो न च भोज्यः कदाचन ॥
śūdrakarma tu yaḥ kuryādavahāya svakarma ca | sa vijñeyo yathā śūdro na ca bhojyaḥ kadācana
जो अपना कर्म छोड़कर शूद्र का कर्म करता है, उसे शूद्र ही जानना चाहिए; उसका अन्न कभी नहीं खाना चाहिए।
श्लोक 11 (13.198.11)
चिकित्सकः काण्डपृष्ठः पुराऽध्यक्षः पुरोहितः । सांवत्सरो वृथाध्यायी सर्वे ते शूद्रसंमिताः ॥
cikitsakaḥ kāṇḍapṛṣṭhaḥ purā'dhyakṣaḥ purohitaḥ | sāṃvatsaro vṛthādhyāyī sarve te śūdrasaṃmitāḥ
वैद्य, नीच जन, नगर का अध्यक्ष, पुरोहित, ज्योतिषी और व्यर्थ पढ़ने वाला, ये सब शूद्र के समान माने गए हैं।
श्लोक 12 (13.198.12)
शूद्रकर्मस्वथैतेषु यो भुङ्क्ते निरपत्रपः । अभोज्यभोजनं भुक्त्वा भयं प्राप्नोति दारुणम् ॥
śūdrakarmasvathaiteṣu yo bhuṅkte nirapatrapaḥ | abhojyabhojanaṃ bhuktvā bhayaṃ prāpnoti dāruṇam
जो निर्लज्ज इन शूद्र-तुल्य कर्म करने वालों का अन्न खाता है, वह अभोज्य का भोजन करके भयंकर भय को प्राप्त होता है।
श्लोक 13 (13.198.13)
कुलं वीर्यं च तेजश्च तिर्यग्योनित्वमेव च । स प्रयाति यथा श्वा वै निष्क्रियो धर्मवर्जितः ॥
kulaṃ vīryaṃ ca tejaśca tiryagyonitvameva ca | sa prayāti yathā śvā vai niṣkriyo dharmavarjitaḥ
वह कुल, बल और तेज को खो देता है और पशु-योनि में भी जाता है; कर्महीन और धर्म से रहित वह कुत्ते की गति को प्राप्त होता है।
श्लोक 14 (13.198.14)
भुङ्क्ते चिकित्सकस्यान्नं तदन्नं च पुरीषवत् । पुंश्चल्यन्नं च मूत्रं स्यात्कारुकान्नं च शोणितम् ॥
bhuṅkte cikitsakasyānnaṃ tadannaṃ ca purīṣavat | puṃścalyannaṃ ca mūtraṃ syātkārukānnaṃ ca śoṇitam
जो वैद्य का अन्न खाता है, उसके लिए वह अन्न मल के समान है; वेश्या का अन्न मूत्र जैसा और शिल्पी का अन्न रक्त जैसा होता है।
श्लोक 15 (13.198.15)
विद्योपजीविनोऽन्नं च यो भुङ्क्ते साधुसम्मतः । तदप्यन्नं यथा शौद्रं तत्साधुः परिवर्जयेत् ॥
vidyopajīvino'nnaṃ ca yo bhuṅkte sādhusammataḥ | tadapyannaṃ yathā śaudraṃ tatsādhuḥ parivarjayet
जो विद्या से जीविका चलाने वाले का अन्न खाता है, चाहे वह सज्जनों में मान्य ही हो, वह अन्न भी शूद्र के अन्न जैसा है; सज्जन उसे त्याग दे।
श्लोक 16 (13.198.16)
वचनीयस्य यो भुङ्क्ते तमाहुः शोणितं ह्रदम् । पिशुनं भोजनं भुङ्क्ते ब्रह्महत्यासमं विदुः ॥
vacanīyasya yo bhuṅkte tamāhuḥ śoṇitaṃ hradam | piśunaṃ bhojanaṃ bhuṅkte brahmahatyāsamaṃ viduḥ
जो निन्दनीय मनुष्य का अन्न खाता है, उसे रक्त का कुण्ड कहते हैं; जो चुगलखोर का भोजन खाता है, उसे ब्रह्महत्यारे के समान मानते हैं।
श्लोक 17 (13.198.17)
असत्कृतमवज्ञातं न भोक्तव्यं कदाचन ॥
asatkṛtamavajñātaṃ na bhoktavyaṃ kadācana
जो अन्न बिना आदर के या तिरस्कार के साथ दिया गया हो, उसे कभी नहीं खाना चाहिए।
श्लोक 18 (13.198.18)
व्याधिं कुलक्षयं चैव क्षिप्रं प्राप्नोति ब्राह्मणः । नगरीरक्षिणो भुङ्क्ते श्वपचप्रवणो भवेत् ॥
vyādhiṃ kulakṣayaṃ caiva kṣipraṃ prāpnoti brāhmaṇaḥ | nagarīrakṣiṇo bhuṅkte śvapacapravaṇo bhavet
ब्राह्मण शीघ्र ही रोग और कुल का नाश पाता है; जो नगर के रक्षक का अन्न खाता है, वह श्वपच (चाण्डाल) की ओर झुकने वाला हो जाता है।
श्लोक 19 (13.198.19)
गोघ्ने च ब्राह्मणघ्ने च सुरापे गुरुतल्पगे । भुक्त्वाऽन्नं जायते विप्रो रक्षसां कुलवर्धनः ॥
goghne ca brāhmaṇaghne ca surāpe gurutalpage | bhuktvā'nnaṃ jāyate vipro rakṣasāṃ kulavardhanaḥ
गोहत्यारे, ब्रह्महत्यारे, मदिरा पीने वाले और गुरुपत्नीगामी का अन्न खाकर ब्राह्मण राक्षसों के कुल को बढ़ाने वाला होकर जन्म लेता है।
श्लोक 20 (13.198.20)
न्यासापहारिणो भुक्त्वा कृतघ्ने क्लीबवर्तिनि । जायते शबरावासे मध्यदेशबहिष्कृते ॥
nyāsāpahāriṇo bhuktvā kṛtaghne klībavartini | jāyate śabarāvāse madhyadeśabahiṣkṛte
धरोहर हड़पने वाले, कृतघ्न और नपुंसक-वृत्ति वाले का अन्न खाकर वह मध्यदेश से बहिष्कृत शबरों की बस्ती में जन्म लेता है।
श्लोक 21 (13.198.21)
अभोज्याश्चैव भोज्याश्च मया प्रोक्ता यथाविधि । किमन्यदद्य कौन्तेय मत्तस्त्वं श्रोतुमिच्छसि ॥
abhojyāścaiva bhojyāśca mayā proktā yathāvidhi | kimanyadadya kaunteya mattastvaṃ śrotumicchasi
इस प्रकार मैंने विधिपूर्वक बता दिया कि किनका अन्न भोज्य है और किनका अभोज्य। हे कुन्तीपुत्र, आज मुझसे और क्या सुनना चाहते हो?