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अनुशासन पर्व · अध्याय 199

दान-ग्रहण और निषिद्ध भोजन के प्रायश्चित्त

युधिष्ठिर निषिद्ध दान लेने या निषिद्ध भोजन करने पर ब्राह्मण के प्रायश्चित्त पूछते हैं। भीष्म उन्हें बताते हैं: सावित्री का जप, उपवास, सूर्योदय तक खड़े रहना, तीनों सन्ध्याओं में स्नान आदि; साथ ही मृतक-सम्बन्धी भोजन तथा शूद्र, वैश्य और क्षत्रिय के साथ भोजन के अलग नियम।

अध्याय 198अध्याय-सूचीअध्याय 200

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (13.199.1)

उक्तास्तु भवता भोज्यास्तथाऽभोज्याश्च सर्वशः । अत्र मे प्रश्नसन्देहस्तन्मे वद पितामह ॥

uktāstu bhavatā bhojyāstathā'bhojyāśca sarvaśaḥ | atra me praśnasandehastanme vada pitāmaha

आपने सब प्रकार से बता दिया कि किनका अन्न भोज्य है और किनका अभोज्य। इस विषय में एक प्रश्न को लेकर मेरे मन में संशय है; पितामह, उसे मुझे बताइए।

श्लोक 2 (13.199.2)

ब्राह्मणानां विशेषेण हव्यकव्यप्रतिग्रहे । नानाविधेषु भोज्येषु प्रायश्चित्तानि शंस मे ॥

brāhmaṇānāṃ viśeṣeṇa havyakavyapratigrahe | nānāvidheṣu bhojyeṣu prāyaścittāni śaṃsa me

विशेषकर ब्राह्मणों के लिए देवकार्य और पितृकार्य के दान को ग्रहण करने में तथा नाना प्रकार के भोजनों में जो प्रायश्चित्त हैं, वे मुझे बताइए।

भीष्म उवाच

श्लोक 3 (13.199.3)

हन्त वक्ष्यामि ते राजन्ब्राह्मणानां महात्मनाम् । प्रतिग्रहेषु भोज्ये च मुच्यते येन पाप्मनः ॥

hanta vakṣyāmi te rājanbrāhmaṇānāṃ mahātmanām | pratigraheṣu bhojye ca mucyate yena pāpmanaḥ

राजन्, अच्छा; महात्मा ब्राह्मण दान लेने और भोजन करने के जिस पाप से जिस उपाय द्वारा मुक्त होते हैं, वह मैं तुम्हें बताता हूँ।

श्लोक 4 (13.199.4)

घृतप्रतिग्रहे चैव सावित्री समिदाहुतिः । तिलप्रतिग्रहे चैव सममेतद्युधिष्ठिर ॥

ghṛtapratigrahe caiva sāvitrī samidāhutiḥ | tilapratigrahe caiva samametadyudhiṣṭhira

घी का दान लेने पर सावित्री-मन्त्र के साथ समिधा की आहुति देनी चाहिए; हे युधिष्ठिर, तिल का दान लेने पर भी यही विधान है।

श्लोक 5 (13.199.5)

मांसप्रतिग्रहे चैव मधुनो लवणस्य च । आदित्योदयनं स्थित्वा पूतो भवति ब्राह्मणः ॥

māṃsapratigrahe caiva madhuno lavaṇasya ca | ādityodayanaṃ sthitvā pūto bhavati brāhmaṇaḥ

मांस, मधु और नमक का दान लेने पर ब्राह्मण सूर्योदय तक खड़ा रहकर शुद्ध हो जाता है।

श्लोक 6 (13.199.6)

काञ्चनं प्रतिगृह्याथ जपमानो गुरुश्रुतिम् । कृष्णायसं च विवृतं धारयन्मुच्यते द्विजः ॥

kāñcanaṃ pratigṛhyātha japamāno guruśrutim | kṛṣṇāyasaṃ ca vivṛtaṃ dhārayanmucyate dvijaḥ

सोना ग्रहण करके ब्राह्मण गुरु से सीखे हुए श्रुति-पाठ का जप करते हुए और काले लोहे को सबके सामने धारण करते हुए पाप से छूट जाता है।

श्लोक 7 (13.199.7)

एवं प्रतिगृहीतेऽथ धने वस्त्रे तथा स्त्रियाम् । एवमेव नरश्रेष्ठ सुवर्णस्य प्रतिग्रहे ॥

evaṃ pratigṛhīte'tha dhane vastre tathā striyām | evameva naraśreṣṭha suvarṇasya pratigrahe

इसी प्रकार धन, वस्त्र या स्त्री का दान लेने पर भी; और हे नरश्रेष्ठ, सुवर्ण का दान लेने पर भी यही विधि है।

श्लोक 8 (13.199.8)

अन्नप्रतिग्रहे चैव पायसेक्षुरसे तथा । इक्षुतैलपवित्राणां त्रिसन्ध्येऽप्सु निमज्जनम् ॥

annapratigrahe caiva pāyasekṣurase tathā | ikṣutailapavitrāṇāṃ trisandhye'psu nimajjanam

अन्न का दान लेने पर, तथा खीर, ईख का रस, ईख से बनी वस्तुएँ, तेल और पवित्र वस्तुओं का दान लेने पर तीनों सन्ध्याओं में जल में स्नान करना चाहिए।

श्लोक 9 (13.199.9)

व्रीहौ पुष्पे फले चैव जले पिष्टमये तथा । यावके दधिदुग्धे च सावित्रीं शतशोऽन्विताम् ॥

vrīhau puṣpe phale caiva jale piṣṭamaye tathā | yāvake dadhidugdhe ca sāvitrīṃ śataśo'nvitām

धान, पुष्प, फल, जल, पिसी हुई वस्तुओं, जौ की लपसी, दही और दूध का दान लेने पर सौ बार सावित्री का जप करना चाहिए।

श्लोक 10 (13.199.10)

उपानहौ च च्छत्रं च प्रतिगृह्यौर्ध्वदेहिके । जपेच्छतं समायुक्तस्तेन मुच्यते पाप्मना ॥

upānahau ca cchatraṃ ca pratigṛhyaurdhvadehike | japecchataṃ samāyuktastena mucyate pāpmanā

मृतक के और्ध्वदैहिक कर्म में जूते और छाता ग्रहण करके मन को एकाग्र कर सौ बार जप करे; इससे वह उस पाप से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 11 (13.199.11)

क्षेत्रप्रतिग्रहे चैव ग्रहसूतकयोस्तथा । त्रीणि रात्राण्युपोषित्वा तेन पापाद्विमुच्यते ॥

kṣetrapratigrahe caiva grahasūtakayostathā | trīṇi rātrāṇyupoṣitvā tena pāpādvimucyate

खेत का दान लेने पर, तथा बन्दीगृह में पड़े हुए और सूतक में स्थित लोगों से दान लेने पर तीन रात उपवास करके वह उस पाप से छूट जाता है।

श्लोक 12 (13.199.12)

कृष्णपक्षे तु यः श्राद्धं पितॄणामश्नुते द्विजः । अन्नमेतदहोरात्रात्पूतो भवति ब्राह्मणः ॥

kṛṣṇapakṣe tu yaḥ śrāddhaṃ pitṝṇāmaśnute dvijaḥ | annametadahorātrātpūto bhavati brāhmaṇaḥ

जो द्विज कृष्णपक्ष में पितरों के श्राद्ध का भोजन करता है, वह उस अन्न के विषय में एक दिन-रात बीतने पर शुद्ध हो जाता है।

श्लोक 13 (13.199.13)

न च सन्ध्यामुपासीत न च जाप्यं प्रवर्तयेत् । न सङ्किरेत्तदन्नं च ततः पूयेत ब्राह्मणः ॥

na ca sandhyāmupāsīta na ca jāpyaṃ pravartayet | na saṅkirettadannaṃ ca tataḥ pūyeta brāhmaṇaḥ

वह सन्ध्योपासना न करे, जप न चलाए और उस अन्न को फिर न खाए; ऐसा करने से ब्राह्मण शुद्ध हो जाता है।

श्लोक 14 (13.199.14)

इत्यर्थमपराह्णे तु पितॄणां श्राद्धमुच्यते । यथोक्तानां यदश्नीयुर्ब्राह्मणाः पूर्वकेतिताः ॥

ityarthamaparāhṇe tu pitṝṇāṃ śrāddhamucyate | yathoktānāṃ yadaśnīyurbrāhmaṇāḥ pūrvaketitāḥ

इसी कारण पितरों का श्राद्ध अपराह्ण में कहा गया है, ताकि पहले से निमन्त्रित ब्राह्मण बताए हुए पदार्थ खा सकें।

श्लोक 15 (13.199.15)

मृतकस्य तृतीयाहे ब्राह्मणो योऽन्नमश्नुते । स त्रिवेलं समुन्मज्ज्य द्वादशाहेन शुध्यति ॥

mṛtakasya tṛtīyāhe brāhmaṇo yo'nnamaśnute | sa trivelaṃ samunmajjya dvādaśāhena śudhyati

जो ब्राह्मण मृतक के तीसरे दिन अन्न खाता है, वह तीन बार डुबकी लगाकर बारह दिन में शुद्ध होता है।

श्लोक 16 (13.199.16)

द्वादशाहे व्यतीते तु कृतशौचो विशेषतः । ब्राह्मणेभ्यो हविर्दत्त्वा मुच्यते तेन पाप्मना ॥

dvādaśāhe vyatīte tu kṛtaśauco viśeṣataḥ | brāhmaṇebhyo havirdattvā mucyate tena pāpmanā

बारह दिन बीत जाने पर विशेष रूप से शुद्धि करके और ब्राह्मणों को अन्न देकर वह उस पाप से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 17 (13.199.17)

मृतस्य दशरात्रेण प्रायश्चित्तानि दापयेत् । सावित्रीं रैवतीमिष्टिं कूश्माण्डमघमर्षणम् ॥

mṛtasya daśarātreṇa prāyaścittāni dāpayet | sāvitrīṃ raivatīmiṣṭiṃ kūśmāṇḍamaghamarṣaṇam

मृतक के लिए दस रात तक प्रायश्चित्त करवाने चाहिए: सावित्री-जप, रैवत साम, पवित्रेष्टि, कूष्माण्ड-मन्त्र और अघमर्षण।

श्लोक 18 (13.199.18)

मृतकस्य त्रिरात्रे यः समुद्दिष्टे समश्नुते । सप्तत्रिषवणं स्नात्वा पूतो भवति ब्राह्मणः ॥

mṛtakasya trirātre yaḥ samuddiṣṭe samaśnute | saptatriṣavaṇaṃ snātvā pūto bhavati brāhmaṇaḥ

जो ब्राह्मण मृतक के विहित तीन रात वाले कर्म में भोजन करता है, वह सात दिन तीनों सवनों में स्नान करके शुद्ध हो जाता है।

श्लोक 19 (13.199.19)

सिद्धिमाप्नोति विपुलामापदं चैव नाप्नुयात् ॥

siddhimāpnoti vipulāmāpadaṃ caiva nāpnuyāt

वह विपुल सिद्धि पाता है और विपत्ति में नहीं पड़ता।

श्लोक 20 (13.199.20)

यस्तु शूद्रैः समश्नीयाद्ब्राह्मणोऽप्येकभोजने । अशौचं विधिवत्तस्य शौचमत्र विधीयते ॥

yastu śūdraiḥ samaśnīyādbrāhmaṇo'pyekabhojane | aśaucaṃ vidhivattasya śaucamatra vidhīyate

जो ब्राह्मण एक ही भोजन में शूद्रों के साथ खाता है, उस अशुद्ध के लिए यहाँ विधिपूर्वक शुद्धि का विधान है।

श्लोक 21 (13.199.21)

यस्तु वैश्यैः सहाश्नीयाद्ब्राह्मणोऽप्येकभोजने । स वै त्रिरात्रं दीक्षित्वा मुच्यते तेन कर्मणा ॥

yastu vaiśyaiḥ sahāśnīyādbrāhmaṇo'pyekabhojane | sa vai trirātraṃ dīkṣitvā mucyate tena karmaṇā

जो ब्राह्मण एक ही भोजन में वैश्यों के साथ खाता है, वह तीन रात दीक्षा लेकर उस कर्म से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 22 (13.199.22)

क्षत्रियैः सह योऽश्नीयाद्ब्राह्मणोऽप्येकभोजने । आप्लुतः सह वासोभिस्तेन मुच्येत पाप्मना ॥

kṣatriyaiḥ saha yo'śnīyādbrāhmaṇo'pyekabhojane | āplutaḥ saha vāsobhistena mucyeta pāpmanā

जो ब्राह्मण एक ही भोजन में क्षत्रियों के साथ खाता है, वह वस्त्रों सहित स्नान करके उस पाप से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 23 (13.199.23)

शूद्रस्य तु कुलं हन्ति वैश्यस्य पशुबान्धवान् । क्षत्रियस्य श्रियं हन्ति ब्राह्मणस्य सुवर्चसम् ॥

śūdrasya tu kulaṃ hanti vaiśyasya paśubāndhavān | kṣatriyasya śriyaṃ hanti brāhmaṇasya suvarcasam

यह शूद्र के विषय में कुल का नाश करता है, वैश्य के विषय में पशुओं और बन्धुओं का, क्षत्रिय के विषय में श्री का और ब्राह्मण के विषय में तेज का।

श्लोक 24 (13.199.24)

प्रायश्चित्तं च शान्तिं च जुहुयात्तेन मुच्यते । सावित्रीं रैवतीमिष्टिं कूश्माण्डमघमर्षणम् ॥

prāyaścittaṃ ca śāntiṃ ca juhuyāttena mucyate | sāvitrīṃ raivatīmiṣṭiṃ kūśmāṇḍamaghamarṣaṇam

वह प्रायश्चित्त और शान्ति के लिए होम करे, उससे मुक्त हो जाता है: सावित्री, रैवत साम, पवित्रेष्टि, कूष्माण्ड और अघमर्षण।

श्लोक 25 (13.199.25)

तथोच्छिष्टमथान्योन्यं सम्प्राशेन्नात्र संशयः । रोचना विरजा रात्रिर्मङ्गलालम्भनानि च ॥

tathocchiṣṭamathānyonyaṃ samprāśennātra saṃśayaḥ | rocanā virajā rātrirmaṅgalālambhanāni ca

इसी प्रकार वह परस्पर एक-दूसरे का उच्छिष्ट भी ग्रहण करे, इसमें सन्देह नहीं; और गोरोचन, दूर्वा, हल्दी तथा माङ्गलिक स्पर्शों का प्रयोग करे।

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