अनुशासन पर्व · अध्याय 200
दान से स्वर्ग पाने वाले राजा
युधिष्ठिर पूछते हैं कि पृथ्वी पर दान और तप में कौन श्रेष्ठ है। भीष्म उत्तर में उन राजाओं और ऋषियों के नाम गिनाते हैं जिन्होंने ब्राह्मणों को दान देकर उत्तम लोक पाए, शिबि और प्रतर्दन से, जिन्होंने पुत्र या प्राण दिए, राम, भगीरथ और लोमपाद तक। अन्त में वे युधिष्ठिर को दान करते रहने को कहते हैं और शेष सन्देह कल प्रातः सुलझाने का वचन देते हैं, क्योंकि सन्ध्या हो गई है।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (13.200.1)
दानेन वर्ततेत्याह तपसा चैव भारत । तदेतन्मे मनोदुःखं व्यपोह त्वं पितामह । किंस्वित्पृथिव्यां ह्येतन्मे भवाञ्शंसितुमर्हति ॥
dānena vartatetyāha tapasā caiva bhārata | tadetanme manoduḥkhaṃ vyapoha tvaṃ pitāmaha | kiṃsvitpṛthivyāṃ hyetanme bhavāñśaṃsitumarhati
भारत, कहा जाता है कि दान से और तप से भी (स्वर्ग में) स्थिति मिलती है। पितामह, मेरे मन का यह दुःख दूर कीजिए; पृथ्वी पर इन दोनों में कौन श्रेष्ठ है, यह आप मुझे बताने योग्य हैं।
भीष्म उवाच
श्लोक 2 (13.200.2)
शृणु यैर्धर्मनिरतैस्तपसा भावितात्मभिः । लोका ह्यसंशयं प्राप्ता दानपुण्यरतैर्नृपैः ॥
śṛṇu yairdharmanirataistapasā bhāvitātmabhiḥ | lokā hyasaṃśayaṃ prāptā dānapuṇyaratairnṛpaiḥ
सुनो: धर्म में लगे, तप से शुद्ध हुए अन्तःकरण वाले तथा दान के पुण्य में रमने वाले राजाओं ने निःसन्देह अपने-अपने लोक प्राप्त किए हैं।
श्लोक 3 (13.200.3)
सत्कृतश्च तथाऽऽत्रेयः शिष्येभ्यो ब्रह्म निर्गुणम् । उपदिश्य तदा राजन्गतो लोकाननुत्तमान् ॥
satkṛtaśca tathā''treyaḥ śiṣyebhyo brahma nirguṇam | upadiśya tadā rājangato lokānanuttamān
आत्रेय सत्कार पाकर शिष्यों को निर्गुण ब्रह्म का उपदेश देकर, हे राजन्, सर्वोत्तम लोकों को गए।
श्लोक 4 (13.200.4)
शिबिरोशीनरः प्राणान्प्रियस्य तनयस्य च । ब्राह्मणार्थमुपाकृत्य नाकपृष्ठमितो गतः ॥
śibirośīnaraḥ prāṇānpriyasya tanayasya ca | brāhmaṇārthamupākṛtya nākapṛṣṭhamito gataḥ
उशीनर के पुत्र शिबि अपने प्राण और अपने प्रिय पुत्र के प्राण भी ब्राह्मण के लिए अर्पित करके यहाँ से स्वर्गलोक गए।
श्लोक 5 (13.200.5)
प्रतर्दनः काशिपतिः प्रदाय तनयं स्वकम् । ब्राह्मणायातुलां कीर्तिमिह चामुत्र चाश्नुते ॥
pratardanaḥ kāśipatiḥ pradāya tanayaṃ svakam | brāhmaṇāyātulāṃ kīrtimiha cāmutra cāśnute
काशिराज प्रतर्दन अपना पुत्र ब्राह्मण को देकर यहाँ और परलोक में अतुल कीर्ति पाते हैं।
श्लोक 6 (13.200.6)
रन्तिदेवश्च सांकृत्यो वसिष्ठाय महात्मने । अर्घ्यं प्रदाय विधिवल्लेभे लोकाननुत्तमान् ॥
rantidevaśca sāṃkṛtyo vasiṣṭhāya mahātmane | arghyaṃ pradāya vidhivallebhe lokānanuttamān
सङ्कृति के पुत्र रन्तिदेव ने महात्मा वसिष्ठ को विधिपूर्वक अर्घ्य देकर सर्वोत्तम लोक पाए।
श्लोक 7 (13.200.7)
दिव्यं शतशलाकं च यज्ञार्थं काञ्चनं शुभम् । छत्रं देवावृधो दत्त्वा ब्राह्मणायास्थितो दिवम् ॥
divyaṃ śataśalākaṃ ca yajñārthaṃ kāñcanaṃ śubham | chatraṃ devāvṛdho dattvā brāhmaṇāyāsthito divam
देवावृध ने यज्ञ के लिए सौ तीलियों वाला सुन्दर दिव्य स्वर्ण-छत्र ब्राह्मण को देकर स्वर्ग में स्थान पाया।
श्लोक 8 (13.200.8)
भगवानम्बरीषश्च ब्राह्मणायामितौजसे । प्रदाय सकलं राष्ट्रं सुरलोकमवाप्तवान् ॥
bhagavānambarīṣaśca brāhmaṇāyāmitaujase | pradāya sakalaṃ rāṣṭraṃ suralokamavāptavān
भगवान् अम्बरीष ने अमित तेजस्वी ब्राह्मण को अपना सारा राष्ट्र देकर देवलोक पाया।
श्लोक 9 (13.200.9)
सावित्रः कुण्डलं दिव्यं यानं च जनमेजयः । ब्राह्मणाय च गा दत्त्वा गतो लोकाननुत्तमान् ॥
sāvitraḥ kuṇḍalaṃ divyaṃ yānaṃ ca janamejayaḥ | brāhmaṇāya ca gā dattvā gato lokānanuttamān
सूर्यपुत्र कर्ण ने अपने दिव्य कुण्डल दिए और जनमेजय ने रथ; ब्राह्मण को गौएँ भी देकर वे सर्वोत्तम लोकों को गए।
श्लोक 10 (13.200.10)
वृषादर्भिश्च राजर्षी रत्नानि विविधानि च । रम्यांश्चावसथान्दत्त्वा द्विजेभ्यो दिवमागतः ॥
vṛṣādarbhiśca rājarṣī ratnāni vividhāni ca | ramyāṃścāvasathāndattvā dvijebhyo divamāgataḥ
राजर्षि वृषादर्भि नाना प्रकार के रत्न और सुन्दर निवास ब्राह्मणों को देकर स्वर्ग पहुँचे।
श्लोक 11 (13.200.11)
निमी राष्ट्रं च वैदर्भिः कन्यां दत्त्वा महात्मने । अगस्त्याय गतः स्वर्गं सपुत्रपशुबान्धवः ॥
nimī rāṣṭraṃ ca vaidarbhiḥ kanyāṃ dattvā mahātmane | agastyāya gataḥ svargaṃ saputrapaśubāndhavaḥ
विदर्भ-वंशी निमि ने महात्मा अगस्त्य को राष्ट्र और कन्या देकर पुत्रों, पशुओं और बन्धुओं सहित स्वर्ग पाया।
श्लोक 12 (13.200.12)
जामदग्न्यश्च विप्राय भूमिं दत्त्वा महायशाः । रामोऽक्षयांस्तथा लोकाञ्जगाम मनसोऽधिकान् ॥
jāmadagnyaśca viprāya bhūmiṃ dattvā mahāyaśāḥ | rāmo'kṣayāṃstathā lokāñjagāma manaso'dhikān
महायशस्वी जमदग्निपुत्र परशुराम ने ब्राह्मण को भूमि देकर मन की कल्पना से भी परे अक्षय लोक प्राप्त किए।
श्लोक 13 (13.200.13)
अवर्षति च पर्जन्ये सर्वभूतानि देवराट् । वसिष्ठो जीवयामास येन यातोऽक्षयां गतिम् ॥
avarṣati ca parjanye sarvabhūtāni devarāṭ | vasiṣṭho jīvayāmāsa yena yāto'kṣayāṃ gatim
जब मेघ वर्षा नहीं करते थे, तब पृथ्वी के देवताओं (ब्राह्मणों) के अधिपति वसिष्ठ ने सब प्राणियों को जिला दिया; इसी से वे अक्षय गति को प्राप्त हुए।
श्लोक 14 (13.200.14)
रामो दाशरथिश्चैव हुत्वा यज्ञेषु वै वसु । सगतो ह्यक्षयाँल्लोकान्यस्य लोके महद्यशः ॥
rāmo dāśarathiścaiva hutvā yajñeṣu vai vasu | sagato hyakṣayām̐llokānyasya loke mahadyaśaḥ
दशरथ के पुत्र राम ने यज्ञों में धन लुटाकर अक्षय लोक पाए; संसार में उनका महान् यश है।
श्लोक 15 (13.200.15)
कक्षसेनश्च राजर्षिर्वसिष्ठाय महात्मने । न्यासं यथावत्संन्यस्य जगाम सुमहायशाः ॥
kakṣasenaśca rājarṣirvasiṣṭhāya mahātmane | nyāsaṃ yathāvatsaṃnyasya jagāma sumahāyaśāḥ
महायशस्वी राजर्षि कक्षसेन महात्मा वसिष्ठ को विधिपूर्वक अपना धन न्यास के रूप में सौंपकर स्वर्ग गए।
श्लोक 16 (13.200.16)
करंधमस्य पौत्रस्तु मरुत्तोऽविक्षितः सुतः । कन्यामाङ्गिरसे दत्त्वा दिवामाशु जगाम सः ॥
karaṃdhamasya pautrastu marutto'vikṣitaḥ sutaḥ | kanyāmāṅgirase dattvā divāmāśu jagāma saḥ
करन्धम के पौत्र और अविक्षित के पुत्र मरुत्त अपनी कन्या अङ्गिरा को देकर शीघ्र स्वर्ग गए।
श्लोक 17 (13.200.17)
ब्रह्मदत्तश्च पाञ्चाल्यो राजा धर्मभृतांवरः । निधिं शङ्खमनुज्ञाप्य जगाम परमां गतिम् ॥
brahmadattaśca pāñcālyo rājā dharmabhṛtāṃvaraḥ | nidhiṃ śaṅkhamanujñāpya jagāma paramāṃ gatim
धर्मात्माओं में श्रेष्ठ पाञ्चालराज ब्रह्मदत्त शङ्ख नामक निधि दान करके परम गति को प्राप्त हुए।
श्लोक 18 (13.200.18)
राजा मित्रसहश्चैव वसिष्ठाय महात्मने । मदयन्तीं प्रियां भार्यां दत्त्वा च त्रिदिवं गतः ॥
rājā mitrasahaścaiva vasiṣṭhāya mahātmane | madayantīṃ priyāṃ bhāryāṃ dattvā ca tridivaṃ gataḥ
राजा मित्रसह अपनी प्रिय पत्नी मदयन्ती महात्मा वसिष्ठ को देकर स्वर्ग गए।
श्लोक 19 (13.200.19)
मनोः पुत्रश्च सुद्युम्नो लिखिताय महात्मने । दण्डमुद्धृत्य धर्मेण गतो लोकाननुत्तमान् ॥
manoḥ putraśca sudyumno likhitāya mahātmane | daṇḍamuddhṛtya dharmeṇa gato lokānanuttamān
मनु के पुत्र सुद्युम्न महात्मा लिखित को धर्मानुसार (हाथ काटने का) दण्ड देकर सर्वोत्तम लोकों को गए।
श्लोक 20 (13.200.20)
सहस्रचित्यो राजर्षिः प्राणानिष्टान्महायशाः । ब्राह्मणार्थे परित्यज्य गतो लोकाननुत्तमान् ॥
sahasracityo rājarṣiḥ prāṇāniṣṭānmahāyaśāḥ | brāhmaṇārthe parityajya gato lokānanuttamān
महायशस्वी राजर्षि सहस्रचित्य ब्राह्मण के लिए अपने प्रिय प्राण त्यागकर सर्वोत्तम लोकों को गए।
श्लोक 21 (13.200.21)
सर्वकामैश्च सम्पूर्णं दत्त्वा वेश्म हिरण्मयम् । मौद्गल्याय गतः स्वर्गं शतद्युम्नो महीपतिः ॥
sarvakāmaiśca sampūrṇaṃ dattvā veśma hiraṇmayam | maudgalyāya gataḥ svargaṃ śatadyumno mahīpatiḥ
राजा शतद्युम्न सब कामनाओं से परिपूर्ण स्वर्णमय भवन महात्मा मौद्गल्य को देकर स्वर्ग गए।
श्लोक 22 (13.200.22)
भक्ष्यभोज्यस्य च कृतान्राशयः पर्वतोपमान् । शाण्डिल्याय पुरा दत्त्वा सुमन्युर्दिवमास्थितः ॥
bhakṣyabhojyasya ca kṛtānrāśayaḥ parvatopamān | śāṇḍilyāya purā dattvā sumanyurdivamāsthitaḥ
सुमन्यु ने पूर्वकाल में शाण्डिल्य को पर्वत जैसी भक्ष्य-भोज्य पदार्थों की राशियाँ देकर स्वर्ग में स्थान पाया।
श्लोक 23 (13.200.23)
नाम्ना च द्युतिमान्नाम साल्वराजो महाद्युतिः । दत्त्वा राज्यमृचीकाय गतो लोकाननुत्तमान् ॥
nāmnā ca dyutimānnāma sālvarājo mahādyutiḥ | dattvā rājyamṛcīkāya gato lokānanuttamān
महान् तेजस्वी शाल्वराज, जिनका नाम द्युतिमान् था, ऋचीक को राज्य देकर सर्वोत्तम लोकों को गए।
श्लोक 24 (13.200.24)
मदिराश्वश्च राजर्षिर्दत्त्वा कन्यां सुमध्यमाम् । हिरण्यहस्ताय गतो लोकान्देवैरधिष्ठितान् ॥
madirāśvaśca rājarṣirdattvā kanyāṃ sumadhyamām | hiraṇyahastāya gato lokāndevairadhiṣṭhitān
राजर्षि मदिराश्व अपनी सुन्दर कटि वाली कन्या हिरण्यहस्त को देकर देवताओं से अधिष्ठित लोकों को गए।
श्लोक 25 (13.200.25)
लोमपादश्च राजर्षिः शान्तां दत्त्वा सुतां प्रभुः । ऋश्यशृङ्गाय विपुलैः सर्वैः कामैरयुज्यत ॥
lomapādaśca rājarṣiḥ śāntāṃ dattvā sutāṃ prabhuḥ | ṛśyaśṛṅgāya vipulaiḥ sarvaiḥ kāmairayujyata
राजर्षि लोमपाद ने अपनी पुत्री शान्ता ऋष्यशृङ्ग को देकर समर्थ होते हुए सभी प्रचुर सुख पाए।
श्लोक 26 (13.200.26)
कौत्साय दत्त्वा कन्यां तु हंसीं नाम यशस्विनीम् । गतोऽक्षयानतो लोकान्राजर्षिश्च भगीरथः ॥
kautsāya dattvā kanyāṃ tu haṃsīṃ nāma yaśasvinīm | gato'kṣayānato lokānrājarṣiśca bhagīrathaḥ
राजर्षि भगीरथ यशस्विनी हंसी नाम की कन्या कौत्स को देकर यहाँ से अक्षय लोकों को गए।
श्लोक 27 (13.200.27)
दत्त्वा शतसहस्रं तु गवां राजा भगीरथः । स वत्सानां कोहलाय गतो लोकाननुत्तमान् ॥
dattvā śatasahasraṃ tu gavāṃ rājā bhagīrathaḥ | sa vatsānāṃ kohalāya gato lokānanuttamān
राजा भगीरथ ने कोहल को बछड़ों सहित एक लाख गौएँ देकर सर्वोत्तम लोक पाए।
श्लोक 28 (13.200.28)
एते चान्ये च बहवो दानेन तपसा च ह । युधिष्ठिर गताः स्वर्गं निवर्तन्ते पुनःपुनः ॥
ete cānye ca bahavo dānena tapasā ca ha | yudhiṣṭhira gatāḥ svargaṃ nivartante punaḥpunaḥ
हे युधिष्ठिर, ये और दूसरे बहुत-से लोग दान और तप से स्वर्ग गए हैं; और वहाँ से बार-बार लौटते भी हैं।
श्लोक 29 (13.200.29)
तेषां प्रतिष्ठिता कीर्तिर्यावत्स्थास्यति मेदिनी । गृहस्थैर्दानतपसा यैर्लोका वै विनिर्जिताः ॥
teṣāṃ pratiṣṭhitā kīrtiryāvatsthāsyati medinī | gṛhasthairdānatapasā yairlokā vai vinirjitāḥ
जब तक पृथ्वी रहेगी, तब तक उनकी कीर्ति स्थिर रहेगी: उन गृहस्थों की, जिन्होंने दान और तप से लोकों को जीत लिया।
श्लोक 30 (13.200.30)
शिष्टानां चरितं ह्येतत्कीर्तितं मे युधिष्ठिर । दानयज्ञप्रजासर्गैरेते हि दिवमास्थिताः ॥
śiṣṭānāṃ caritaṃ hyetatkīrtitaṃ me yudhiṣṭhira | dānayajñaprajāsargairete hi divamāsthitāḥ
हे युधिष्ठिर, सज्जनों का यह चरित्र मैंने तुम्हें सुनाया; दान, यज्ञ और सन्तानोत्पत्ति के द्वारा ये स्वर्ग में स्थित हुए हैं।
श्लोक 31 (13.200.31)
दत्त्वा तु सततं तेऽस्तु कौरवाणां धुरन्धर । दानयज्ञक्रियायुक्ता बुद्धिर्धर्मोपचायिनी ॥
dattvā tu satataṃ te'stu kauravāṇāṃ dhurandhara | dānayajñakriyāyuktā buddhirdharmopacāyinī
हे कुरुओं के भार को उठाने वाले, तुम्हारे द्वारा निरन्तर दान होता रहे; दान और यज्ञ-कर्म में लगी तुम्हारी बुद्धि धर्म को बढ़ाने वाली हो।
श्लोक 32 (13.200.32)
यत्र ते नृपशार्दूल सन्देहो वै भविष्यति । श्वः प्रभाते हि वक्ष्यामि सन्ध्या हि समुपस्थिता ॥
yatra te nṛpaśārdūla sandeho vai bhaviṣyati | śvaḥ prabhāte hi vakṣyāmi sandhyā hi samupasthitā
हे राजाओं में सिंह, जिस विषय में तुम्हें सन्देह होगा, वह मैं कल प्रातःकाल बताऊँगा; क्योंकि सन्ध्या हो आई है।