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अनुशासन पर्व · अध्याय 255

सावित्री-जप और पवित्र नामों का कीर्तन

युधिष्ठिर पूछते हैं कि नित्य जपने से धर्म का महान् फल देने वाला कौन-सा जप्य है। भीष्म व्यास द्वारा कहा हुआ सावित्री-जप बताते हैं और उसके साथ कीर्तन करने योग्य नामों की सूची देते हैं — रुद्र, आदित्य, वसु और अश्विनीकुमार, शिव के अनुचर गण, प्रत्येक दिशा के सात ऋषि तथा प्राचीन महान् राजा। प्रातः-सायं, रोग में, यात्रा में, युद्ध में तथा देव-पितृ कर्मों में इसके पाठ के फल गिनाकर वे युधिष्ठिर को और कुछ पूछने के लिए भी आमन्त्रित करते हैं।

अध्याय 254अध्याय-सूचीअध्याय 256

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (13.255.1)

पितामह महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद । किं जप्यं जपतो नित्यं भवेद्धर्मफलं महत् ॥

pitāmaha mahāprājña sarvaśāstraviśārada | kiṃ japyaṃ japato nityaṃ bhaveddharmaphalaṃ mahat

हे पितामह, महाप्राज्ञ, सब शास्त्रों में निपुण! ऐसा कौन-सा जप्य है, जिसे नित्य जपने से धर्म का महान् फल प्राप्त होता है?

श्लोक 2 (13.255.2)

प्रस्थाने वा प्रवेशे वा प्रवृत्ते वाऽपि कर्मणि । दैवे वा श्राद्धकाले वा किं जप्यं कर्मसाधनम् ॥

prasthāne vā praveśe vā pravṛtte vā'pi karmaṇi | daive vā śrāddhakāle vā kiṃ japyaṃ karmasādhanam

प्रस्थान के समय या प्रवेश के समय, किसी कर्म के आरम्भ में, देवकर्म में या श्राद्ध के समय — कौन-सा जप्य कर्म को सिद्ध करने वाला है?

श्लोक 3 (13.255.3)

शान्तिकं पौष्टिकं रक्षा शत्रुघ्नं भयनाशनम् । जप्यं यद्ब्रह्म समितं तद्भवान्वक्तुमर्हति ॥

śāntikaṃ pauṣṭikaṃ rakṣā śatrughnaṃ bhayanāśanam | japyaṃ yadbrahma samitaṃ tadbhavānvaktumarhati

जो शान्ति, पुष्टि और रक्षा करने वाला है, शत्रुओं का नाश करने वाला और भय को मिटाने वाला है, तथा ब्रह्म के समान है — ऐसा जप्य आप मुझे बताइए।

भीष्म उवाच

श्लोक 4 (13.255.4)

व्यासप्रोक्तमिमं मन्त्रं शृणुष्वैकमना नृप । सावित्र्या विहितं दिव्यं सद्यः पापविमोचनम् ॥

vyāsaproktamimaṃ mantraṃ śṛṇuṣvaikamanā nṛpa | sāvitryā vihitaṃ divyaṃ sadyaḥ pāpavimocanam

हे राजन्! व्यास के कहे हुए इस मन्त्र को एकाग्र मन से सुनो — सावित्री में विहित यह दिव्य जप्य तुरन्त पापों से छुड़ा देने वाला है।

श्लोक 5 (13.255.5)

शृणु मन्त्रविधिं कृत्स्नं प्रोच्यमानं मयाऽनघ । यं श्रुत्वा पाण्डवश्रेष्ठ सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥

śṛṇu mantravidhiṃ kṛtsnaṃ procyamānaṃ mayā'nagha | yaṃ śrutvā pāṇḍavaśreṣṭha sarvapāpaiḥ pramucyate

हे निष्पाप! मैं जो मन्त्र की सम्पूर्ण विधि कह रहा हूँ, उसे सुनो। हे पाण्डवश्रेष्ठ! उसे सुनकर मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 6 (13.255.6)

रात्रावहनि धर्मज्ञ जपन्पापैर्न लिप्यते । तत्तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि शृणुष्वैकमना नृप ॥

rātrāvahani dharmajña japanpāpairna lipyate | tatte'haṃ sampravakṣyāmi śṛṇuṣvaikamanā nṛpa

हे धर्मज्ञ! रात और दिन इसका जप करने वाला पापों से लिप्त नहीं होता। वही मैं तुम्हें बताऊँगा; हे राजन्! एकाग्र मन से सुनो।

श्लोक 7 (13.255.7)

आयुष्मान्भवते चैव यं श्रुत्वा पार्थिवात्मज । पुरुषस्तु सुसिद्धार्थः प्रेत्य चेह च मोदते ॥

āyuṣmānbhavate caiva yaṃ śrutvā pārthivātmaja | puruṣastu susiddhārthaḥ pretya ceha ca modate

हे राजकुमार! इसे सुनकर मनुष्य दीर्घायु और पूर्णतः सिद्धार्थ हो जाता है तथा यहाँ और मरने के बाद भी आनन्द पाता है।

श्लोक 8 (13.255.8)

सेवितं सततं राजन्पुरा राजर्षिसत्तमैः । क्षत्रधर्मपरैर्नित्यं सत्यव्रतपरायणैः ॥

sevitaṃ satataṃ rājanpurā rājarṣisattamaiḥ | kṣatradharmaparairnityaṃ satyavrataparāyaṇaiḥ

हे राजन्! प्राचीन काल में क्षत्रिय-धर्म में तत्पर और सत्यव्रत में लगे हुए श्रेष्ठ राजर्षियों ने इसका निरन्तर सेवन किया है।

श्लोक 9 (13.255.9)

इदमाह्निकमव्यग्रं कुर्वद्भिर्नियतैः सदा । नृपैर्भरतशार्दूल प्राप्यते श्रीरनुत्तमा ॥

idamāhnikamavyagraṃ kurvadbhirniyataiḥ sadā | nṛpairbharataśārdūla prāpyate śrīranuttamā

हे भरतश्रेष्ठ! जो संयमी राजा एकाग्र होकर सदा इस नित्य-कर्म का पालन करते हैं, उन्हें सर्वोत्तम लक्ष्मी प्राप्त होती है।

श्लोक 10 (13.255.10)

नमो वसिष्ठाय महाव्रताय । पराशरं वेदनिधिं नमस्ते । नमोस्त्वनन्ताय महोरगाय । नमोस्तु सिद्धेभ्य इहाक्षयेभ्यः ॥

namo vasiṣṭhāya mahāvratāya | parāśaraṃ vedanidhiṃ namaste | namostvanantāya mahoragāya | namostu siddhebhya ihākṣayebhyaḥ

महाव्रती वसिष्ठ को नमस्कार। वेदों के भण्डार पराशर, आपको नमस्कार। महान् सर्प अनन्त को नमस्कार। यहाँ विद्यमान अक्षय सिद्धों को नमस्कार।

श्लोक 11 (13.255.11)

नमोस्त्वृषिभ्यः परमं परेषां । देवेषु देवं वरदं वराणाम् । सहस्रशीर्षाय नमः शिवाय । सहस्रनामाय जनार्दनाय ॥

namostvṛṣibhyaḥ paramaṃ pareṣāṃ | deveṣu devaṃ varadaṃ varāṇām | sahasraśīrṣāya namaḥ śivāya | sahasranāmāya janārdanāya

श्रेष्ठों में भी श्रेष्ठ ऋषियों को नमस्कार; देवों में देव, वर देने वालों में वरदाता को नमस्कार; सहस्र शिरों वाले शिव को नमस्कार तथा सहस्र नामों वाले जनार्दन को नमस्कार।

श्लोक 12 (13.255.12)

अजैकपादहिर्बुध्न्यः पिनाकी चापराजितः । ऋतश्च पितृरूपश्च त्र्यम्बकश्च महेश्वरः ॥

ajaikapādahirbudhnyaḥ pinākī cāparājitaḥ | ṛtaśca pitṛrūpaśca tryambakaśca maheśvaraḥ

अजैकपाद्, अहिर्बुध्न्य, पिनाकी, अपराजित, ऋत, पितृरूप, त्र्यम्बक और महेश्वर;

श्लोक 13 (13.255.13)

वृषाकपिश्च शंभुश्च हवनोऽथेश्वरस्तथा । एकादशैते प्रथिता रुद्रास्त्रिभुवनेश्वराः ॥

vṛṣākapiśca śaṃbhuśca havano'theśvarastathā | ekādaśaite prathitā rudrāstribhuvaneśvarāḥ

वृषाकपि, शम्भु, हवन और ईश्वर — ये ग्यारह त्रिभुवन के स्वामी रुद्र के रूप में प्रसिद्ध हैं।

श्लोक 14 (13.255.14)

शतमेतत्समाम्नातं शतरुद्रे महात्मनाम् ॥

śatametatsamāmnātaṃ śatarudre mahātmanām

महात्माओं की यह सौ की गणना शतरुद्रीय में बताई गई है।

श्लोक 15 (13.255.15)

अंशो भगश्च मित्रश्च वरुणश्च जलेश्वरः । तथा धाताऽर्यमा चैव जयन्तो भास्करस्तथा ॥

aṃśo bhagaśca mitraśca varuṇaśca jaleśvaraḥ | tathā dhātā'ryamā caiva jayanto bhāskarastathā

अंश, भग, मित्र और जल के स्वामी वरुण; तथा धाता, अर्यमा, जयन्त और भास्कर;

श्लोक 16 (13.255.16)

त्वष्टा पूषा तथैवेन्द्रो द्वादशो विष्णुरुच्यते । इत्येते द्वादशादित्याः काश्यपेया इति श्रुतिः ॥

tvaṣṭā pūṣā tathaivendro dvādaśo viṣṇurucyate | ityete dvādaśādityāḥ kāśyapeyā iti śrutiḥ

त्वष्टा, पूषा और इन्द्र, तथा बारहवें विष्णु कहे जाते हैं। ये बारह आदित्य हैं, कश्यप के पुत्र — ऐसी श्रुति है।

श्लोक 17 (13.255.17)

धरो ध्रुवश्च सोमश्च सावित्रोऽथानिलोऽनलः । प्रत्यूषश्च प्रभासश्च वसवोष्टौ प्रकीर्तिताः ॥

dharo dhruvaśca somaśca sāvitro'thānilo'nalaḥ | pratyūṣaśca prabhāsaśca vasavoṣṭau prakīrtitāḥ

धर, ध्रुव, सोम, सावित्र, अनिल, अनल, प्रत्यूष और प्रभास — ये आठ वसु कहे गए हैं।

श्लोक 18 (13.255.18)

नासत्यश्चापि दस्रश्च स्मृतौ द्वावश्विनावपि । मार्तण्डस्यात्मजावेतौ संज्ञानासाविनिर्गतौ ॥

nāsatyaścāpi dasraśca smṛtau dvāvaśvināvapi | mārtaṇḍasyātmajāvetau saṃjñānāsāvinirgatau

नासत्य और दस्र दोनों अश्विनीकुमार माने गए हैं; ये मार्तण्ड के पुत्र हैं, जो संज्ञा की नासिका से उत्पन्न हुए थे।

श्लोक 19 (13.255.19)

अतः परं प्रवक्ष्यामि लोकानां कर्मसाक्षिणः । अपि यज्ञस्य वेत्तारो दत्तस्य सुकृतस्य च ॥

ataḥ paraṃ pravakṣyāmi lokānāṃ karmasākṣiṇaḥ | api yajñasya vettāro dattasya sukṛtasya ca

इसके बाद मैं उनका वर्णन करूँगा जो लोकों के कर्मों के साक्षी हैं और यज्ञ, दान तथा सुकर्म के भी जानने वाले हैं।

श्लोक 20 (13.255.20)

अदृश्याः सर्वभूतेषु पश्यन्ति त्रिदशेश्वराः । शुभाशुभानि कर्माणि मृत्युः कालश्च सर्वशः ॥

adṛśyāḥ sarvabhūteṣu paśyanti tridaśeśvarāḥ | śubhāśubhāni karmāṇi mṛtyuḥ kālaśca sarvaśaḥ

समस्त प्राणियों में अदृश्य रहकर देवेश्वर शुभ और अशुभ कर्मों को देखते हैं, और मृत्यु तथा काल भी सब प्रकार से देखते हैं।

श्लोक 21 (13.255.21)

विश्वेदेवाः पितृगणा मूर्तिमन्तस्तपोधनाः । मुनयश्चैव सिद्धाश्च तपोमोक्षपरायणाः । शुचिस्मिताः कीर्तयतां प्रयच्छन्ति शुभं नृणाम् ॥

viśvedevāḥ pitṛgaṇā mūrtimantastapodhanāḥ | munayaścaiva siddhāśca tapomokṣaparāyaṇāḥ | śucismitāḥ kīrtayatāṃ prayacchanti śubhaṃ nṛṇām

विश्वेदेव, पितृगण, मूर्तिमान् तपोधन, मुनि तथा तप और मोक्ष में लगे हुए सिद्ध — ये उज्ज्वल मुस्कान वाले अपना कीर्तन करने वाले मनुष्यों को कल्याण प्रदान करते हैं।

श्लोक 22 (13.255.22)

प्रजापतिकृतानेतान्लोकान्दिव्येन तेजसा । वसन्ति सर्वलोकेषु प्रयताः सर्वकर्मसु ॥

prajāpatikṛtānetānlokāndivyena tejasā | vasanti sarvalokeṣu prayatāḥ sarvakarmasu

प्रजापति द्वारा रचे गए इन लोकों में वे अपने दिव्य तेज से सब लोकों में निवास करते हैं और सब कर्मों में सदा सावधान रहते हैं।

श्लोक 23 (13.255.23)

प्राणानामीश्वरानेतान्कीर्तयन्प्रयतो नरः । धर्मार्थकामैर्विपुलैर्युज्यते सह नित्यशः ॥

prāṇānāmīśvarānetānkīrtayanprayato naraḥ | dharmārthakāmairvipulairyujyate saha nityaśaḥ

जो मनुष्य सावधान होकर प्राणों के इन स्वामियों का कीर्तन करता है, वह नित्य प्रचुर धर्म, अर्थ और काम से युक्त रहता है।

श्लोक 24 (13.255.24)

लोकांश्च लभते पुण्यान्विश्वेश्वरकृताञ्शुभान् । एते देवास्त्रयस्त्रिंशत्सर्वभूतगणेश्वराः ॥

lokāṃśca labhate puṇyānviśveśvarakṛtāñśubhān | ete devāstrayastriṃśatsarvabhūtagaṇeśvarāḥ

वह विश्वेश्वर द्वारा रचे हुए पवित्र और शुभ लोकों को प्राप्त करता है। ये तैंतीस देवता सब प्राणिसमूहों के स्वामी हैं।

श्लोक 25 (13.255.25)

नन्दीश्वरो महाकायो ग्रामणीर्वृषभध्वजः । ईश्वराः सर्वलोकानां गणेश्वरविनायकाः ॥

nandīśvaro mahākāyo grāmaṇīrvṛṣabhadhvajaḥ | īśvarāḥ sarvalokānāṃ gaṇeśvaravināyakāḥ

विशाल देह वाले नन्दीश्वर, गणों के नायक और वृषभध्वज; तथा सब लोकों के ईश्वर, गणेश्वर और विनायक;

श्लोक 26 (13.255.26)

सौम्या रौद्रा गणाश्चैव योगभूतगणास्तथा । ज्योतींषि सरितो व्योम सुपर्णः पतगेश्वरः ॥

saumyā raudrā gaṇāścaiva yogabhūtagaṇāstathā | jyotīṃṣi sarito vyoma suparṇaḥ patageśvaraḥ

सौम्य और रौद्र गण तथा योगी भूतगण; ज्योतिर्मण्डल, नदियाँ, आकाश और पक्षियों के स्वामी सुपर्ण;

श्लोक 27 (13.255.27)

पृथिव्यां तपसा सिद्धाः स्थावराश्च चराश्च ह । हिमवान्गिरयः सर्वे चत्वारश्च महार्णवाः ॥

pṛthivyāṃ tapasā siddhāḥ sthāvarāśca carāśca ha | himavāngirayaḥ sarve catvāraśca mahārṇavāḥ

पृथ्वी पर तप से सिद्ध हुए स्थावर और जंगम प्राणी; हिमालय और सब पर्वत तथा चारों महासागर;

श्लोक 28 (13.255.28)

भवस्यानुचराश्चैव हरतुल्यपराक्रमाः । विष्णुर्देवोथ जिष्णुश्च स्कन्दश्चाम्बिकया सह ॥

bhavasyānucarāścaiva haratulyaparākramāḥ | viṣṇurdevotha jiṣṇuśca skandaścāmbikayā saha

भव के अनुचर, जो हर के समान पराक्रमी हैं; देव विष्णु, जिष्णु तथा अम्बिका के साथ स्कन्द।

श्लोक 29 (13.255.29)

कीर्तयन्प्रयतः सर्वान्सर्वपापैः प्रमुच्यते । अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि मानवानृषिसत्तमान् ॥

kīrtayanprayataḥ sarvānsarvapāpaiḥ pramucyate | ata ūrdhvaṃ pravakṣyāmi mānavānṛṣisattamān

जो सावधान होकर इन सबका कीर्तन करता है, वह सब पापों से मुक्त हो जाता है। इसके आगे मैं मनुष्य-योनि के श्रेष्ठ ऋषियों के नाम बताऊँगा।

श्लोक 30 (13.255.30)

यवक्रीतश्च रैभ्यश्च अर्वावसुपरावसू । औशिजश्चैव कक्षीवान्बलश्चाङ्गिरसः सुतः ॥

yavakrītaśca raibhyaśca arvāvasuparāvasū | auśijaścaiva kakṣīvānbalaścāṅgirasaḥ sutaḥ

यवक्रीत और रैभ्य, अर्वावसु और परावसु, औशिज, कक्षीवान् और अंगिरा के पुत्र बल;

श्लोक 31 (13.255.31)

ऋषिर्मेधातिथेः पुत्रः कण्वो बर्हिषदस्तथा । ब्रह्मतेजोमयाः सर्वे कीर्तिता लोकभावनाः ॥

ṛṣirmedhātitheḥ putraḥ kaṇvo barhiṣadastathā | brahmatejomayāḥ sarve kīrtitā lokabhāvanāḥ

मेधातिथि के पुत्र ऋषि कण्व और बर्हिषद् — ये सब ब्रह्मतेज से परिपूर्ण हैं और लोकों के पालक कहे गए हैं।

श्लोक 32 (13.255.32)

लभन्ते हि शुभं सर्वे रुद्रानलवसुप्रभाः । भुवि कृत्वा शुभं कर्म मोदन्ते दिवि दैवतैः ॥

labhante hi śubhaṃ sarve rudrānalavasuprabhāḥ | bhuvi kṛtvā śubhaṃ karma modante divi daivataiḥ

रुद्र, अनल और वसुओं के समान कान्ति वाले ये सब कल्याण पाते हैं; पृथ्वी पर शुभ कर्म करके वे स्वर्ग में देवताओं के साथ आनन्द करते हैं।

श्लोक 33 (13.255.33)

महेन्द्रगुरवः सप्त प्राचीं वै दिशमाश्रिताः । प्रयतः कीर्तयेदेताञ्शक्रलोके महीयते ॥

mahendraguravaḥ sapta prācīṃ vai diśamāśritāḥ | prayataḥ kīrtayedetāñśakraloke mahīyate

महेन्द्र के सात गुरु पूर्व दिशा में रहते हैं। जो सावधान होकर इनका कीर्तन करता है, वह शक्र के लोक में सम्मान पाता है।

श्लोक 34 (13.255.34)

उन्मुचुः प्रमुचुश्चैव स्वस्त्यात्रेयश्च वीर्यवान् । दृढव्यश्चोर्ध्वबाहुश्च तृणसोमाङ्गिरास्तथा ॥

unmucuḥ pramucuścaiva svastyātreyaśca vīryavān | dṛḍhavyaścordhvabāhuśca tṛṇasomāṅgirāstathā

उन्मुचु और प्रमुचु, पराक्रमी स्वस्त्यात्रेय, दृढव्य और ऊर्ध्वबाहु, तथा तृणसोम और अंगिरा;

श्लोक 35 (13.255.35)

मित्रावरुणयोः पुत्रस्तथाऽगस्त्यः प्रतापवान् । धर्मराजर्त्विजः सप्त दक्षिणां दिशमाश्रिताः ॥

mitrāvaruṇayoḥ putrastathā'gastyaḥ pratāpavān | dharmarājartvijaḥ sapta dakṣiṇāṃ diśamāśritāḥ

तथा मित्र और वरुण के पुत्र प्रतापी अगस्त्य — ये सात धर्मराज के ऋत्विज् दक्षिण दिशा में रहते हैं।

श्लोक 36 (13.255.36)

दृढेयुश्च ऋतेयुश्च परिव्याधश्च कीर्तिमान् । एकतश्च द्वितश्चैव त्रितश्चादित्यसन्निभाः ॥

dṛḍheyuśca ṛteyuśca parivyādhaśca kīrtimān | ekataśca dvitaścaiva tritaścādityasannibhāḥ

दृढेयु और ऋतेयु, कीर्तिमान् परिव्याध, तथा एकत, द्वित और त्रित — जो सूर्य के समान तेजस्वी हैं।

श्लोक 37 (13.255.37)

अत्रेः पुत्रश्च धर्मात्मा ऋषिः सारस्वतस्तथा । वरुणस्यर्त्विजः सप्त पश्चिमां दिशमाश्रिताः ॥

atreḥ putraśca dharmātmā ṛṣiḥ sārasvatastathā | varuṇasyartvijaḥ sapta paścimāṃ diśamāśritāḥ

अत्रि के धर्मात्मा पुत्र और ऋषि सारस्वत — ये सात वरुण के ऋत्विज् पश्चिम दिशा में रहते हैं।

श्लोक 38 (13.255.38)

अत्रिर्वसिष्ठो भगवान्कश्यपश्च महानृषिः । गौतमश्च भरद्वाजो विश्वामित्रोथ कौशिकः ॥

atrirvasiṣṭho bhagavānkaśyapaśca mahānṛṣiḥ | gautamaśca bharadvājo viśvāmitrotha kauśikaḥ

अत्रि, भगवान् वसिष्ठ, महर्षि कश्यप, गौतम और भरद्वाज, तथा कौशिक विश्वामित्र,

श्लोक 39 (13.255.39)

ऋचीकतनयश्चोग्रो जमदग्निः प्रतापवान् । धनेश्वरस्य गुरवः सप्तैते उत्तराश्रिताः ॥

ṛcīkatanayaścogro jamadagniḥ pratāpavān | dhaneśvarasya guravaḥ saptaite uttarāśritāḥ

और ऋचीक के पुत्र उग्र तथा प्रतापी जमदग्नि — ये सात धनेश्वर के गुरु उत्तर दिशा में स्थित हैं।

श्लोक 40 (13.255.40)

अपरे मुनयः सप्त दिक्षु सर्वास्वधिष्ठिताः । कीर्तिस्वस्तिकरा नॄणां कीर्तिता लोकभावनाः ॥

apare munayaḥ sapta dikṣu sarvāsvadhiṣṭhitāḥ | kīrtisvastikarā nṝṇāṃ kīrtitā lokabhāvanāḥ

अन्य सात मुनि सभी दिशाओं में स्थित हैं; वे मनुष्यों के लिए कीर्ति और कल्याण करने वाले तथा लोकों को धारण करने वाले कहे गए हैं।

श्लोक 41 (13.255.41)

धर्मः कामश्च कालश्च वसुर्वासुकिरेव च । अनन्तः कपिलश्चैव सप्तैते धरणीधराः ॥

dharmaḥ kāmaśca kālaśca vasurvāsukireva ca | anantaḥ kapilaścaiva saptaite dharaṇīdharāḥ

धर्म, काम, काल, वसु, वासुकि, अनन्त और कपिल — ये सात पृथ्वी को धारण करने वाले हैं।

श्लोक 42 (13.255.42)

रामो व्यासस्तथा द्रौणिरश्वत्थामा च लोमशः । इत्येते मुनयो दिव्या एकैकः सप्तसप्तधा ॥

rāmo vyāsastathā drauṇiraśvatthāmā ca lomaśaḥ | ityete munayo divyā ekaikaḥ saptasaptadhā

राम, व्यास, द्रोणपुत्र अश्वत्थामा और लोमश — ये दिव्य मुनि हैं, इनमें से प्रत्येक सात-सात रूपों में स्थित है।

श्लोक 43 (13.255.43)

शान्तिस्वस्तिकरा लोके दिशांपालाः प्रकीर्तिताः । यस्यांयस्यां दिशि ह्येते तन्मुखः शरणं व्रजेत् ॥

śāntisvastikarā loke diśāṃpālāḥ prakīrtitāḥ | yasyāṃyasyāṃ diśi hyete tanmukhaḥ śaraṇaṃ vrajet

ये दिशाओं के पालक कहे गए हैं, जो संसार में शान्ति और कल्याण करते हैं। मनुष्य जिस-जिस दिशा में हो, उसी ओर मुख करके इनकी शरण ले।

श्लोक 44 (13.255.44)

स्रष्टारः सर्वभूतानां कीर्तिता लोकपावनाः । संवर्तो मेरुसावर्णो मार्कण्डेयश्च धार्मिकः ॥

sraṣṭāraḥ sarvabhūtānāṃ kīrtitā lokapāvanāḥ | saṃvarto merusāvarṇo mārkaṇḍeyaśca dhārmikaḥ

समस्त प्राणियों के स्रष्टा और लोकों को पवित्र करने वाले कहे गए हैं — संवर्त, मेरुसावर्णि और धर्मात्मा मार्कण्डेय;

श्लोक 45 (13.255.45)

साङ्ख्ययोगौ नारदश्च दुर्वासाश्च महानृषिः । अत्यन्ततपसो दान्तास्त्रिषु लोकेषु विश्रुताः ॥

sāṅkhyayogau nāradaśca durvāsāśca mahānṛṣiḥ | atyantatapaso dāntāstriṣu lokeṣu viśrutāḥ

साङ्ख्य और योग, नारद तथा महर्षि दुर्वासा — ये संयमी, अत्यन्त तपस्वी और तीनों लोकों में प्रसिद्ध हैं।

श्लोक 46 (13.255.46)

अपरे रुद्रसङ्काशाः कीर्तिता ब्रह्मलौकिकाः । अपुत्रो लभते पुत्रं दरिद्रो लभते धनम् ॥

apare rudrasaṅkāśāḥ kīrtitā brahmalaukikāḥ | aputro labhate putraṃ daridro labhate dhanam

रुद्र के समान अन्य ब्रह्मलोक-निवासी भी कहे गए हैं। निःसन्तान पुत्र पाता है, निर्धन धन पाता है,

श्लोक 47 (13.255.47)

तथा धर्मार्थकामेषु सिद्धिं च लभते नरः । पृथुं वैन्यं नृपवरं पृथ्वी यस्याभवत्सुता ॥

tathā dharmārthakāmeṣu siddhiṃ ca labhate naraḥ | pṛthuṃ vainyaṃ nṛpavaraṃ pṛthvī yasyābhavatsutā

और मनुष्य धर्म, अर्थ और काम में सिद्धि पाता है। वह वेन-पुत्र श्रेष्ठ राजा पृथु का कीर्तन करे, जिनकी पुत्री पृथ्वी हुई;

श्लोक 48 (13.255.48)

प्रजापतिं सार्वभौमं कीर्तयेद्वसुधाधिपम् । आदित्यवंशप्रभवं महेन्द्रसमविक्रमम् ॥

prajāpatiṃ sārvabhaumaṃ kīrtayedvasudhādhipam | ādityavaṃśaprabhavaṃ mahendrasamavikramam

उन प्रजापति, सार्वभौम पृथ्वीपति का कीर्तन करे, जो आदित्यवंश में उत्पन्न हुए और महेन्द्र के समान पराक्रमी थे;

श्लोक 49 (13.255.49)

पुरूरवसमैलं च त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् । बुधस्य दयितं पुत्रं कीर्तयेद्वसुधाधिपम् ॥

purūravasamailaṃ ca triṣu lokeṣu viśrutam | budhasya dayitaṃ putraṃ kīrtayedvasudhādhipam

तथा तीनों लोकों में प्रसिद्ध, बुध के प्रिय पुत्र इला-पुत्र पुरूरवा, उस पृथ्वीपति का कीर्तन करे;

श्लोक 50 (13.255.50)

त्रिलोकविश्रुतं वीरं भरतं च प्रकीर्तयेत् । गवामयेन यज्ञेन येनेष्टं वै कृते युगे ॥

trilokaviśrutaṃ vīraṃ bharataṃ ca prakīrtayet | gavāmayena yajñena yeneṣṭaṃ vai kṛte yuge

और तीनों लोकों में प्रसिद्ध वीर भरत का कीर्तन करे, जिन्होंने कृतयुग में गवामय यज्ञ से यजन किया था;

श्लोक 51 (13.255.51)

रन्तिदेवं महादेवं कीर्तयेत्परमद्युतिम् । विश्वजित्तपसोपेतं लक्षण्यं लोकपूजितम् ॥

rantidevaṃ mahādevaṃ kīrtayetparamadyutim | viśvajittapasopetaṃ lakṣaṇyaṃ lokapūjitam

परम तेजस्वी रन्तिदेव का कीर्तन करे, जो महान् देवता के तुल्य, विश्वविजयी, तप से युक्त, शुभ लक्षणों वाले और लोक में पूजित थे;

श्लोक 52 (13.255.52)

तथा श्वेतं च राजर्षिं कीर्तयेत्परमुद्यतिम् । सगरस्यात्मजा येन प्लावितास्तारितास्तथा ॥

tathā śvetaṃ ca rājarṣiṃ kīrtayetparamudyatim | sagarasyātmajā yena plāvitāstāritāstathā

तथा राजर्षि श्वेत का भी कीर्तन करे, जो परम उद्यमी थे और जिनके द्वारा सगर के पुत्र जल में डूबे और फिर तार दिए गए।

श्लोक 53 (13.255.53)

हुताशनसमानेतान्महारूपान्महौजसः । उग्रकायान्महासत्वान्कीर्तयेत्कीर्तिवर्धनान् ॥

hutāśanasamānetānmahārūpānmahaujasaḥ | ugrakāyānmahāsatvānkīrtayetkīrtivardhanān

इन सबका कीर्तन करे, जो अग्नि के समान हैं, महान् रूप और महान् ओज वाले, भयंकर देह और महान् बल वाले तथा कीर्ति बढ़ाने वाले हैं;

श्लोक 54 (13.255.54)

देवानृषिगणांश्चैव नृपांश्च जगतीश्वरान् । साङ्ख्यं योगं च परमं हव्यं कव्यं तथैव च ॥

devānṛṣigaṇāṃścaiva nṛpāṃśca jagatīśvarān | sāṅkhyaṃ yogaṃ ca paramaṃ havyaṃ kavyaṃ tathaiva ca

देवताओं, ऋषिगणों और पृथ्वी के स्वामी राजाओं का; साङ्ख्य और परम योग का तथा हव्य और कव्य का;

श्लोक 55 (13.255.55)

कीर्तितं परमं ब्रह्म सर्वश्रुतिपरायणम् । मङ्गल्यं सर्वभूतानां पवित्रं बहु कीर्तितम् ॥

kīrtitaṃ paramaṃ brahma sarvaśrutiparāyaṇam | maṅgalyaṃ sarvabhūtānāṃ pavitraṃ bahu kīrtitam

सब श्रुतियों में रमा हुआ परब्रह्म भी यहाँ कीर्तित है — जो समस्त प्राणियों के लिए मंगलकारी, पवित्र और बहुत गाया गया है।

श्लोक 56 (13.255.56)

व्याधिप्रशमनं श्रेष्ठं पौष्टिकं सर्वकर्मणाम् । प्रयतः कीर्तयेच्चैतान्कल्यं सायं च भारत ॥

vyādhipraśamanaṃ śreṣṭhaṃ pauṣṭikaṃ sarvakarmaṇām | prayataḥ kīrtayeccaitānkalyaṃ sāyaṃ ca bhārata

यह रोग को शान्त करने में श्रेष्ठ और सब कर्मों में पुष्टि देने वाला है। हे भारत! सावधान होकर प्रातः और सायं इनका कीर्तन करे।

श्लोक 57 (13.255.57)

एते वै यान्ति वर्षन्ति भान्ति वान्ति सृजन्ति च । एते विनायकाः श्रेष्ठा दक्षाः क्षान्ता जितेन्द्रियाः ॥

ete vai yānti varṣanti bhānti vānti sṛjanti ca | ete vināyakāḥ śreṣṭhā dakṣāḥ kṣāntā jitendriyāḥ

ये चलते हैं, बरसाते हैं, चमकते हैं, बहते हैं और रचते हैं। ये श्रेष्ठ विनायक हैं — कुशल, क्षमाशील और जितेन्द्रिय।

श्लोक 58 (13.255.58)

नराणामशुभं सर्वे व्यपोहन्ति प्रकीर्तिताः । साक्षिभूता महात्मानः पापस्य सुकृतस्य च ॥

narāṇāmaśubhaṃ sarve vyapohanti prakīrtitāḥ | sākṣibhūtā mahātmānaḥ pāpasya sukṛtasya ca

कीर्तन किए जाने पर ये मनुष्यों के सब अशुभ को दूर कर देते हैं; ये महात्मा पाप और पुण्य के साक्षी हैं।

श्लोक 59 (13.255.59)

एतान्वै कल्यमुत्थाय कीर्तयञ्शुभमश्नुते । नाग्निचोरभयं तस्य न मार्गप्रतिरोधनम् ॥

etānvai kalyamutthāya kīrtayañśubhamaśnute | nāgnicorabhayaṃ tasya na mārgapratirodhanam

जो प्रातःकाल उठकर इनका कीर्तन करता है, वह शुभ फल पाता है। उसे अग्नि और चोरों का भय नहीं होता और मार्ग में कोई रुकावट नहीं आती।

श्लोक 60 (13.255.60)

एतान्कीर्तयतां नित्यं दुःस्वप्नो नश्यते नृणाम् । मुच्यते सर्वपापेभ्यः स्वस्तिमांश्च गृहान्व्रजेत् ॥

etānkīrtayatāṃ nityaṃ duḥsvapno naśyate nṛṇām | mucyate sarvapāpebhyaḥ svastimāṃśca gṛhānvrajet

जो मनुष्य इनका नित्य कीर्तन करते हैं, उनके बुरे स्वप्न नष्ट हो जाते हैं। वह सब पापों से छूट जाता है और कुशलपूर्वक घर लौटता है।

श्लोक 61 (13.255.61)

दीक्षाकालेषु सर्वेषु यः पठेन्नियतो द्विजः । न्यायवानात्मनिरतः क्षान्तो दान्तोऽनसूयकः ॥

dīkṣākāleṣu sarveṣu yaḥ paṭhenniyato dvijaḥ | nyāyavānātmanirataḥ kṣānto dānto'nasūyakaḥ

जो संयमी द्विज सभी दीक्षा-कालों में इसका पाठ करता है — न्यायशील, आत्मनिष्ठ, क्षमावान्, दमनशील और असूया से रहित;

श्लोक 62 (13.255.62)

रोगार्तो व्याधियुक्तो वा पठन्पापात्प्रमुच्यते । वास्तुमध्ये तु पठतः कुले स्वस्त्ययनं भवेत् ॥

rogārto vyādhiyukto vā paṭhanpāpātpramucyate | vāstumadhye tu paṭhataḥ kule svastyayanaṃ bhavet

अथवा जो रोग से पीड़ित या व्याधिग्रस्त होकर पाठ करता है, वह पाप से छूट जाता है। घर के बीच में पाठ करने वाले के कुल का कल्याण होता है।

श्लोक 63 (13.255.63)

क्षेत्रमध्ये तु पठतः सर्वं सस्यं प्ररोहति । गच्छतः क्षेममध्वानं ग्रामान्तरगतः पठन् ॥

kṣetramadhye tu paṭhataḥ sarvaṃ sasyaṃ prarohati | gacchataḥ kṣemamadhvānaṃ grāmāntaragataḥ paṭhan

खेत के बीच में पाठ करने वाले की सारी फसल उगती है; और जो दूसरे गाँव में पहुँचकर पाठ करता हुआ कुशलपूर्वक मार्ग पर चलता है,

श्लोक 64 (13.255.64)

आत्मनश्च सुतानां च दाराणां च धनस्य च । बीजानामोषधीनां च रक्षामेतां प्रयोजयेत् ॥

ātmanaśca sutānāṃ ca dārāṇāṃ ca dhanasya ca | bījānāmoṣadhīnāṃ ca rakṣāmetāṃ prayojayet

वह इसे अपनी, पुत्रों की, स्त्रियों की और धन की, तथा बीजों और ओषधियों की रक्षा के लिए प्रयोग में लाए।

श्लोक 65 (13.255.65)

एतान्सङ्ग्रामकाले तु पठतः क्षत्रियस्य तु । व्रजन्ति रिपवो नाशं क्षेमं च परिवर्तते ॥

etānsaṅgrāmakāle tu paṭhataḥ kṣatriyasya tu | vrajanti ripavo nāśaṃ kṣemaṃ ca parivartate

युद्ध के समय जब कोई क्षत्रिय इनका पाठ करता है, तब उसके शत्रु नाश को प्राप्त होते हैं और उसका कल्याण लौट आता है।

श्लोक 66 (13.255.66)

एतान्दैवे च पित्र्ये च पठतः पुरुषस्य हि । भुञ्जते पितरः कव्यं हव्यं च त्रिदिवौकसः ॥

etāndaive ca pitrye ca paṭhataḥ puruṣasya hi | bhuñjate pitaraḥ kavyaṃ havyaṃ ca tridivaukasaḥ

देव और पितृ कर्म में जब मनुष्य इनका पाठ करता है, तब पितर कव्य और स्वर्गवासी देवता हव्य ग्रहण करते हैं।

श्लोक 67 (13.255.67)

न व्याधिश्वापदभयं न द्विपान्न हि तस्करात् । कश्मलं लघुतां याति पाप्मना च प्रमुच्यते ॥

na vyādhiśvāpadabhayaṃ na dvipānna hi taskarāt | kaśmalaṃ laghutāṃ yāti pāpmanā ca pramucyate

उसे रोग और हिंसक पशुओं का भय नहीं रहता, न हाथियों का और न चोर का। उसका पाप हलका हो जाता है और वह पाप से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 68 (13.255.68)

यानपात्रे च याने च प्रवासे राजवेश्मनि । परां सिद्धिमवाप्नोति सावित्रीं ह्युत्तमां पठन् ॥

yānapātre ca yāne ca pravāse rājaveśmani | parāṃ siddhimavāpnoti sāvitrīṃ hyuttamāṃ paṭhan

नाव में या सवारी पर, प्रवास में या राजभवन में, उत्तम सावित्री का पाठ करने वाला परम सिद्धि पाता है।

श्लोक 69 (13.255.69)

न च राजभयं तेषां न पिशाचान्न राक्षसात् । नाग्न्यम्बुपवनव्यालाद्भयं तस्योपजायते ॥

na ca rājabhayaṃ teṣāṃ na piśācānna rākṣasāt | nāgnyambupavanavyālādbhayaṃ tasyopajāyate

उन्हें राजा का भय नहीं होता, न पिशाचों का और न राक्षसों का; अग्नि, जल, वायु और हिंसक जन्तुओं से भी उसे भय नहीं होता।

श्लोक 70 (13.255.70)

चतुर्णामपि वर्णानामाश्रमस्य विशेषतः । करोति सततं शान्तिं सावित्रीमुत्तमां पठन् ॥

caturṇāmapi varṇānāmāśramasya viśeṣataḥ | karoti satataṃ śāntiṃ sāvitrīmuttamāṃ paṭhan

उत्तम सावित्री का पाठ करने वाला चारों वर्णों के लिए और विशेषतः आश्रम के लिए निरन्तर शान्ति करता है।

श्लोक 71 (13.255.71)

नाग्निर्दहति काष्ठानि सावित्री यत्र पठ्यते । न तत्र बालो म्रियते न च तिष्ठन्ति पन्नगाः ॥

nāgnirdahati kāṣṭhāni sāvitrī yatra paṭhyate | na tatra bālo mriyate na ca tiṣṭhanti pannagāḥ

जहाँ सावित्री का पाठ होता है, वहाँ अग्नि काठ को नहीं जलाती; वहाँ कोई बालक नहीं मरता और सर्प नहीं ठहरते।

श्लोक 72 (13.255.72)

न तेषां विद्यते दुःखं गच्छन्ति परमां गतिम् । ये शृण्वन्ति महद्ब्रह्म सावित्रीगुणकीर्तनम् ॥

na teṣāṃ vidyate duḥkhaṃ gacchanti paramāṃ gatim | ye śṛṇvanti mahadbrahma sāvitrīguṇakīrtanam

जो महान् ब्रह्मरूप सावित्री के गुणों का कीर्तन सुनते हैं, उन्हें दुःख नहीं होता और वे परम गति को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 73 (13.255.73)

गवां मध्ये तु पठतो गावोऽस्य बहुवत्सलाः । प्रस्थाने वा प्रवासे वा सर्वावस्थां गतः पठेत् ॥

gavāṃ madhye tu paṭhato gāvo'sya bahuvatsalāḥ | prasthāne vā pravāse vā sarvāvasthāṃ gataḥ paṭhet

गौओं के बीच पाठ करने वाले की गौएँ बहुत बछड़ों वाली होती हैं। प्रस्थान में या प्रवास में, जिस किसी अवस्था में हो, वह पाठ करे।

श्लोक 74 (13.255.74)

जपतां जुह्वतां चैव नित्यं च प्रयतात्मनाम् । ऋषीणां परमं जप्यं गुह्यमेतन्नराधिप ॥

japatāṃ juhvatāṃ caiva nityaṃ ca prayatātmanām | ṛṣīṇāṃ paramaṃ japyaṃ guhyametannarādhipa

जप और होम करने वाले संयतचित्त ऋषियों का यह सर्वोत्तम जप्य है; हे नरेश्वर! यह गुप्त है।

श्लोक 75 (13.255.75)

याथातथ्येन सिद्धस्य इतिहासं पुरातनम् । पराशरमतं दिव्यं शक्राय कथितं पुरा ॥

yāthātathyena siddhasya itihāsaṃ purātanam | parāśaramataṃ divyaṃ śakrāya kathitaṃ purā

यह सिद्ध का यथार्थ प्राचीन इतिहास है — पराशर का दिव्य मत, जो पूर्वकाल में शक्र को सुनाया गया था।

श्लोक 76 (13.255.76)

तदेतत्ते समाख्यातं तथ्यं ब्रह्म सनातनम् । हृदयं सर्वभूतानां श्रुतिरेषा सनातनी ॥

tadetatte samākhyātaṃ tathyaṃ brahma sanātanam | hṛdayaṃ sarvabhūtānāṃ śrutireṣā sanātanī

यह सब मैंने तुम्हें बता दिया — यही सत्य और सनातन ब्रह्म है, सब प्राणियों का हृदय है, यही सनातन श्रुति है।

श्लोक 77 (13.255.77)

सोमादित्यान्वयाः सर्वे राघवाः कुरवस्तथा । पठन्ति शुचयो नित्यं सावित्रीं प्राणिनां गतिं ॥

somādityānvayāḥ sarve rāghavāḥ kuravastathā | paṭhanti śucayo nityaṃ sāvitrīṃ prāṇināṃ gatiṃ

चन्द्र और सूर्य के वंश में उत्पन्न सब राजा, रघुवंशी और कुरुवंशी भी, पवित्र होकर प्राणियों की गति सावित्री का नित्य पाठ करते हैं।

श्लोक 78 (13.255.78)

अभ्यासे नित्यं देवानां सप्तर्षीणां ध्रुवस्य च । मोक्षणं सर्वकृच्छ्राणां मोचयत्यशुभात्सदा ॥

abhyāse nityaṃ devānāṃ saptarṣīṇāṃ dhruvasya ca | mokṣaṇaṃ sarvakṛcchrāṇāṃ mocayatyaśubhātsadā

देवताओं, सप्तर्षियों और ध्रुव के समीप नित्य इसका अभ्यास करना सब संकटों से मुक्ति है; यह सदा अशुभ से छुड़ाता है।

श्लोक 79 (13.255.79)

वृद्धैः काश्यपगौतमप्रभृतिभिर्भृग्वङ्गिरोत्र्यादिभिः । शुक्रागस्त्यबृहस्पतिप्रभृतिभिर्ब्रह्मर्षिभिः सेवितम् । भारद्वाजमतं ऋचीकतनयैः प्राप्तं वसिष्ठात्पुनः । सावित्रीमधिगम्य शक्रवसुभिः कृत्स्ना जिता दानवाः ॥

vṛddhaiḥ kāśyapagautamaprabhṛtibhirbhṛgvaṅgirotryādibhiḥ | śukrāgastyabṛhaspatiprabhṛtibhirbrahmarṣibhiḥ sevitam | bhāradvājamataṃ ṛcīkatanayaiḥ prāptaṃ vasiṣṭhātpunaḥ | sāvitrīmadhigamya śakravasubhiḥ kṛtsnā jitā dānavāḥ

यह कश्यप, गौतम आदि वृद्धों द्वारा, भृगु, अंगिरा, अत्रि आदि द्वारा तथा शुक्र, अगस्त्य, बृहस्पति आदि ब्रह्मर्षियों द्वारा सेवित है; भरद्वाज का यह मत ऋचीक के पुत्रों ने वसिष्ठ से पाया था; सावित्री को पाकर इन्द्र और वसुओं ने सब दानवों को जीत लिया।

श्लोक 80 (13.255.80)

यो गोशतं कनकशृङ्गमयं ददाति । विप्राय वेदविदुषे च बहुश्रुताय । दिव्यां च भारतकथां कथयेच्च नित्यं । तुल्यं फलं भवति तस्य च तस्य चैव ॥

yo gośataṃ kanakaśṛṅgamayaṃ dadāti | viprāya vedaviduṣe ca bahuśrutāya | divyāṃ ca bhāratakathāṃ kathayecca nityaṃ | tulyaṃ phalaṃ bhavati tasya ca tasya caiva

जो वेदज्ञ और बहुश्रुत ब्राह्मण को सोने के सींगों वाली सौ गौएँ दान करता है और जो नित्य दिव्य भारत-कथा सुनाता है — इन दोनों को समान फल मिलता है।

श्लोक 81 (13.255.81)

धर्मो विवर्धति भृगोः परिकीर्तनेन । वीर्यं विवर्धति वसिष्ठनमोनतेन । सङ्ग्रामजिद्भवति चैव रघुं नमस्यन् । स्यादश्विनौ च परिकीर्तयतो न रोगः ॥

dharmo vivardhati bhṛgoḥ parikīrtanena | vīryaṃ vivardhati vasiṣṭhanamonatena | saṅgrāmajidbhavati caiva raghuṃ namasyan | syādaśvinau ca parikīrtayato na rogaḥ

भृगु का कीर्तन करने से धर्म बढ़ता है; वसिष्ठ को नमस्कार करने से वीर्य बढ़ता है; रघु को नमस्कार करने वाला युद्ध जीतने वाला होता है; और अश्विनीकुमारों का कीर्तन करने वाले को रोग नहीं होता।

श्लोक 82 (13.255.82)

एषा ते कथिता राजन्सावित्री ब्रह्मशाश्वती । विवक्षुरसि यच्चान्यत्तत्ते वक्ष्यामि भारत ॥

eṣā te kathitā rājansāvitrī brahmaśāśvatī | vivakṣurasi yaccānyattatte vakṣyāmi bhārata

हे राजन्! यह शाश्वत ब्रह्मरूप सावित्री मैंने तुम्हें बता दी। हे भारत! और भी कुछ जानना चाहो तो वह भी मैं तुम्हें बताऊँगा।

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