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अनुशासन पर्व · अध्याय 274

भीष्म का प्रयाण और अन्त्येष्टि

भीष्म मौन होकर योग से प्राणों को रोकते हैं, और उसी समय उनके शरीर से बाण निकलते जाते हैं; उनका आत्मा मस्तक को भेदकर देवदुन्दुभियों की ध्वनि के बीच स्वर्ग को चला जाता है। पाण्डव, विदुर, धृतराष्ट्र और युयुत्सु चिता बनाकर अन्त्येष्टि करते हैं और कुरुजन गंगा में जलदान करते हैं। पुत्र के शोक में भागीरथी जल से निकलकर विलाप करती हैं; कृष्ण और व्यास उन्हें सान्त्वना देते हैं, तब वे अपने जल में लौट जाती हैं और राजा वापस चल पड़ते हैं।

अध्याय 273अध्याय-सूची

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (13.274.1)

एवमुक्त्वा कुरून्सर्वान्भीष्मः शान्तनवस्तदा । तूष्णीं बभूव कौरव्यः स मुहूर्तमरिंदम ॥

evamuktvā kurūnsarvānbhīṣmaḥ śāntanavastadā | tūṣṇīṃ babhūva kauravyaḥ sa muhūrtamariṃdama

सब कुरुओं से ऐसा कहकर शान्तनुपुत्र भीष्म, हे शत्रुदमन, क्षण भर के लिए मौन हो गए।

श्लोक 2 (13.274.2)

धारयामास चात्मानं धारणासु यथाक्रमम् । तस्योर्ध्वमगमन्प्राणाः सन्निरुद्धा महात्मनः ॥

dhārayāmāsa cātmānaṃ dhāraṇāsu yathākramam | tasyordhvamagamanprāṇāḥ sanniruddhā mahātmanaḥ

उन्होंने धारणाओं के द्वारा क्रम से अपने आत्मा को स्थिर किया, और उन महात्मा के निरुद्ध प्राण ऊपर की ओर उठे।

श्लोक 3 (13.274.3)

इदमाश्चर्यमासीच्च मध्ये तेषां महात्मनाम् । सहितैर्ऋषिभिः सर्वैस्तदा व्यासादिभिः प्रभो ॥

idamāścaryamāsīcca madhye teṣāṃ mahātmanām | sahitairṛṣibhiḥ sarvaistadā vyāsādibhiḥ prabho

तब उन महात्माओं के बीच, व्यास आदि सब ऋषियों के एकत्र होते हुए, हे प्रभो, यह आश्चर्य हुआ:

श्लोक 4 (13.274.4)

यद्यन्मुञ्चति गात्रं हि स शन्तनुसुतस्तदा । तत्तद्विशल्यमभवद्योगयुक्तस्य वै क्रमात् । क्षणेन प्रेक्षतां तेषां विशल्यः सोऽभवत्तदा ॥

yadyanmuñcati gātraṃ hi sa śantanusutastadā | tattadviśalyamabhavadyogayuktasya vai kramāt | kṣaṇena prekṣatāṃ teṣāṃ viśalyaḥ so'bhavattadā

शान्तनुपुत्र ने जिस-जिस अंग को छोड़ा, योगयुक्त होकर क्रम से वह-वह अंग बाणों से रहित होता गया; और देखते-देखते क्षण भर में वे पूरी तरह बाणरहित हो गए।

श्लोक 5 (13.274.5)

तद्दृष्ट्वा विस्मिताः सर्वे वासुदेवपुरोगमाः । सह तैर्मुनिभिः सर्वैस्तदा व्यासादिभिर्नृप ॥

taddṛṣṭvā vismitāḥ sarve vāsudevapurogamāḥ | saha tairmunibhiḥ sarvaistadā vyāsādibhirnṛpa

यह देखकर वासुदेव सहित सब लोग विस्मित हो गए, और व्यास आदि सब मुनि भी, हे राजन्।

श्लोक 6 (13.274.6)

सन्निरुद्धस्तु तेनात्मा सर्वेष्वायतनेषु च । जगाम भित्त्वा मूर्धानं दिवमभ्युत्पपात ह ॥

sanniruddhastu tenātmā sarveṣvāyataneṣu ca | jagāma bhittvā mūrdhānaṃ divamabhyutpapāta ha

शरीर के सब स्थानों में रोका हुआ उनका आत्मा मस्तक को भेदकर निकला और आकाश में ऊपर उठ गया।

श्लोक 7 (13.274.7)

देवदुन्दुभिनादश्च पुष्पवर्षैः सहाभवत् । सिद्धा ब्रह्मर्षयश्चैव साधुसाध्विति हर्षिताः ॥

devadundubhinādaśca puṣpavarṣaiḥ sahābhavat | siddhā brahmarṣayaścaiva sādhusādhviti harṣitāḥ

देवताओं की दुन्दुभियों का घोष पुष्पवर्षा के साथ हुआ, और सिद्ध तथा ब्रह्मर्षि हर्ष से "साधु, साधु" कहने लगे।

श्लोक 8 (13.274.8)

महोल्केव च भीष्मस्य मूर्धदेशाज्जनाधिप । निःसृत्याकाशमाविश्य क्षणेनान्तरधीयत ॥

maholkeva ca bhīṣmasya mūrdhadeśājjanādhipa | niḥsṛtyākāśamāviśya kṣaṇenāntaradhīyata

हे जनाधिप, भीष्म के मस्तक से एक बड़ी उल्का के समान वह निकली, आकाश में प्रवेश कर गई और क्षण भर में अन्तर्धान हो गई।

श्लोक 9 (13.274.9)

एवं स राजशार्दूल नृपः शान्तनवस्तदा । समयुज्यत लोकैः स्वैर्भरतानां कुलोद्वहः ॥

evaṃ sa rājaśārdūla nṛpaḥ śāntanavastadā | samayujyata lokaiḥ svairbharatānāṃ kulodvahaḥ

इस प्रकार, हे राजाओं में सिंह, भरतवंश के उद्धारक वे राजा शान्तनुपुत्र अपने लोकों से जा मिले।

श्लोक 10 (13.274.10)

ततस्त्वादाय दारूणि गन्धांश्च विविधान्बहून् । चितां चक्रुर्महात्मानः पाण्डवा विदुरस्तथा । युयुत्सुश्चापि कौरव्यं प्रेक्षकास्त्वितरेऽभवन् ॥

tatastvādāya dārūṇi gandhāṃśca vividhānbahūn | citāṃ cakrurmahātmānaḥ pāṇḍavā vidurastathā | yuyutsuścāpi kauravyaṃ prekṣakāstvitare'bhavan

तब महात्मा पाण्डवों और विदुर ने लकड़ी तथा नाना प्रकार के गन्ध-द्रव्य लेकर चिता बनाई; युयुत्सु ने भी कौरव के लिए यही किया, और अन्य लोग देखते रहे।

श्लोक 11 (13.274.11)

युधिष्ठिरश्च गाङ्गेयं धृतराष्ट्रश्च दुःखितौ । छादयामासतुरुभौ क्षौमैर्माल्यैश्च कौरवम् ॥

yudhiṣṭhiraśca gāṅgeyaṃ dhṛtarāṣṭraśca duḥkhitau | chādayāmāsaturubhau kṣaumairmālyaiśca kauravam

शोक से व्याकुल युधिष्ठिर और धृतराष्ट्र दोनों ने गंगापुत्र कौरव को रेशमी वस्त्रों और मालाओं से ढक दिया।

श्लोक 12 (13.274.12)

धारयामास तस्याथ युयुत्सुश्छत्रमुत्तमम् । चामरे व्यजने शुभ्रे भीमसेनार्जुनावुभौ । उष्णीषे परिगृह्णीतां माद्रीपुत्रावुभौ तथा ॥

dhārayāmāsa tasyātha yuyutsuśchatramuttamam | cāmare vyajane śubhre bhīmasenārjunāvubhau | uṣṇīṣe parigṛhṇītāṃ mādrīputrāvubhau tathā

युयुत्सु ने उन पर उत्तम छत्र धारण किया; भीमसेन और अर्जुन ने श्वेत चामर और पंखे लिए; और माद्री के दोनों पुत्रों ने दो उष्णीष (पगड़ियाँ) सँभाले।

श्लोक 13 (13.274.13)

युधिष्ठिरेण सहितो धृतराष्ट्रश्च पादतः । वृद्धा स्त्रियः कौरवाणां भीष्मं कुरुकुलोद्वहम् । तालवृन्तान्युपादाय पर्यवीजन्त सर्वशः ॥

yudhiṣṭhireṇa sahito dhṛtarāṣṭraśca pādataḥ | vṛddhā striyaḥ kauravāṇāṃ bhīṣmaṃ kurukulodvaham | tālavṛntānyupādāya paryavījanta sarvaśaḥ

युधिष्ठिर के साथ धृतराष्ट्र उनके चरणों के पास खड़े रहे, और कौरवों की वृद्धा स्त्रियाँ ताड़ के पंखे लेकर कुरुकुल के उद्धारक भीष्म को चारों ओर से हवा करती रहीं।

श्लोक 14 (13.274.14)

ततोस्य विधिवच्चक्रुः पितृमेधं महात्मनः । याजका जुहुवुश्चाग्नौ जगुः सामानि सामगाः ॥

tatosya vidhivaccakruḥ pitṛmedhaṃ mahātmanaḥ | yājakā juhuvuścāgnau jaguḥ sāmāni sāmagāḥ

तब उन्होंने उन महात्मा के लिए विधिपूर्वक पितृमेध (अन्त्येष्टि) किया; याजकों ने अग्नि में आहुतियाँ दीं और सामगान करने वालों ने सामवेद के मन्त्र गाए।

श्लोक 15 (13.274.15)

ततश्चन्दनकाष्ठैश्च तथा कालीयकैरपि । कालागुरुप्रभृतिभिर्गन्धैश्चोच्चावचैस्तथा ॥

tataścandanakāṣṭhaiśca tathā kālīyakairapi | kālāguruprabhṛtibhirgandhaiścoccāvacaistathā

चन्दन की लकड़ियों, पीले चन्दन, कालागुरु आदि तथा छोटे-बड़े सब प्रकार के गन्ध-द्रव्यों से,

श्लोक 16 (13.274.16)

समवच्छाद्य गाङ्गेयं सम्प्रज्वाल्य हुताशनम् । अपसव्यमकुर्वन्त धृतराष्ट्रमुखाश्चिताम् ॥

samavacchādya gāṅgeyaṃ samprajvālya hutāśanam | apasavyamakurvanta dhṛtarāṣṭramukhāścitām

गंगापुत्र को ढककर और अग्नि प्रज्वलित करके धृतराष्ट्र आदि ने अन्त्येष्टि की रीति से चिता की अपसव्य प्रदक्षिणा की।

श्लोक 17 (13.274.17)

संस्कृत्य च कुरुश्रेष्ठं गाङ्गेयं कुरुसत्तमाः । जग्मुर्भागीरथीं पुण्यामृषिजुष्टां कुरूद्वहाः ॥

saṃskṛtya ca kuruśreṣṭhaṃ gāṅgeyaṃ kurusattamāḥ | jagmurbhāgīrathīṃ puṇyāmṛṣijuṣṭāṃ kurūdvahāḥ

कुरुश्रेष्ठ गंगापुत्र का संस्कार करके कुरुओं के श्रेष्ठ जन ऋषियों से सेवित पवित्र भागीरथी के पास गए।

श्लोक 18 (13.274.18)

अनुगम्यमाना व्यासेन नारदेनासितेन च । कृष्णेन भरतस्त्रीभिर्ये च पौराः समागताः ॥

anugamyamānā vyāsena nāradenāsitena ca | kṛṣṇena bharatastrībhirye ca paurāḥ samāgatāḥ

उनके पीछे व्यास, नारद, असित, कृष्ण, भरतवंश की स्त्रियाँ और वहाँ एकत्र नगरवासी भी चले।

श्लोक 19 (13.274.19)

उदकं चक्रिरे सर्वे गाङ्गेयस्य महात्मनः । विधिवत्क्षत्रियश्रेष्ठाः स च सर्वो जनस्तदा ॥

udakaṃ cakrire sarve gāṅgeyasya mahātmanaḥ | vidhivatkṣatriyaśreṣṭhāḥ sa ca sarvo janastadā

वहाँ क्षत्रियश्रेष्ठों ने और सब लोगों ने महात्मा गंगापुत्र के लिए विधिपूर्वक जलांजलि दी।

श्लोक 20 (13.274.20)

ततो भागीरथी देवी तनयस्योदके कृते । उत्थाय सलिलात्तस्माद्रुदती शोकविह्वला । परिदेवयती तत्र कौरवानभ्यभाषत ॥

tato bhāgīrathī devī tanayasyodake kṛte | utthāya salilāttasmādrudatī śokavihvalā | paridevayatī tatra kauravānabhyabhāṣata

पुत्र के लिए जलदान हो जाने पर देवी भागीरथी उस जल से उठीं, रोती हुई और शोक से व्याकुल, और वहाँ विलाप करती हुई कौरवों से बोलीं:

गङ्गोवाच

श्लोक 21 (13.274.21)

निबोधत यथावृत्तमुच्यमानं मया नृपाः । राजवृत्तेन सम्पन्नः प्रज्ञयाभिजनेन च । सत्कर्ता कुरुवृद्धानां पितृभक्तो दृढव्रतः ॥

nibodhata yathāvṛttamucyamānaṃ mayā nṛpāḥ | rājavṛttena sampannaḥ prajñayābhijanena ca | satkartā kuruvṛddhānāṃ pitṛbhakto dṛḍhavrataḥ

हे राजाओं, जैसा हुआ वैसा मैं कहती हूँ, सुनो। वह राजोचित आचरण, प्रज्ञा और उत्तम कुल से सम्पन्न था, कुरुवृद्धों का आदर करने वाला, पितृभक्त और दृढ़व्रत था,

श्लोक 22 (13.274.22)

जामदग्न्येन रामेण यः पुरा न पराजितः । दिव्यैरस्त्रैर्महावीर्यः स हतोऽद्य शिखण्डिना ॥

jāmadagnyena rāmeṇa yaḥ purā na parājitaḥ | divyairastrairmahāvīryaḥ sa hato'dya śikhaṇḍinā

और जिसे जमदग्नि के पुत्र राम भी दिव्य अस्त्रों के होते हुए पहले कभी पराजित न कर सके, वही महापराक्रमी आज शिखण्डी के हाथों मारा गया।

श्लोक 23 (13.274.23)

अश्मसारमयं नूनं हृदयं मम पार्थिवाः । अपश्यन्त्याः प्रियं पुत्रं यन्न दीर्यति मेऽद्य वै ॥

aśmasāramayaṃ nūnaṃ hṛdayaṃ mama pārthivāḥ | apaśyantyāḥ priyaṃ putraṃ yanna dīryati me'dya vai

हे राजाओं, निश्चय ही मेरा हृदय पत्थर का बना है, जो आज अपने प्रिय पुत्र को न देखकर भी नहीं फटता।

श्लोक 24 (13.274.24)

समेतं पार्थिवं क्षत्रं काशिपुर्यां स्वयंपरे । विजित्यैकरथेनाजौ कन्याश्चायं जहार ह ॥

sametaṃ pārthivaṃ kṣatraṃ kāśipuryāṃ svayaṃpare | vijityaikarathenājau kanyāścāyaṃ jahāra ha

काशी नगरी में स्वयंवर के समय एकत्र हुए सब राजाओं को एक ही रथ से युद्ध में जीतकर उसी ने कन्याओं का हरण किया था।

श्लोक 25 (13.274.25)

यस्य नास्ति बले तुल्यः पृथिव्यामपि कश्चन । हतं शिखण्डिना श्रुत्वा यन्न दीर्यति मे मनः ॥

yasya nāsti bale tulyaḥ pṛthivyāmapi kaścana | hataṃ śikhaṇḍinā śrutvā yanna dīryati me manaḥ

पृथ्वी पर बल में जिसके समान कोई नहीं था, उसे शिखण्डी द्वारा मारा गया सुनकर भी मेरा मन नहीं फटता।

श्लोक 26 (13.274.26)

जामदग्न्यः कुरुक्षेत्रे युधि येन महात्मना । पीडितो नातियत्नेन स हतोऽद्य शिखण्डिना ॥

jāmadagnyaḥ kurukṣetre yudhi yena mahātmanā | pīḍito nātiyatnena sa hato'dya śikhaṇḍinā

जिस महात्मा ने कुरुक्षेत्र में युद्ध में बिना अधिक प्रयास के जमदग्निपुत्र को पीड़ित कर दिया था, वही आज शिखण्डी के हाथों मारा गया।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 27 (13.274.27)

एवंविधं बहु तदा विलपतीं महानदीम् । आश्वासयामास तदा साम्ना दामोदरो विभुः ॥

evaṃvidhaṃ bahu tadā vilapatīṃ mahānadīm | āśvāsayāmāsa tadā sāmnā dāmodaro vibhuḥ

इस प्रकार बहुत विलाप करती हुई महानदी गंगा को सर्वव्यापी दामोदर ने मधुर वाणी से सान्त्वना दी।

वासुदेव उवाच

श्लोक 28 (13.274.28)

समाश्वसिहि भद्रे त्वं मा शुचः शुभदर्शने । गतः स परमं लोकं तव पुत्रो न संशयः ॥

samāśvasihi bhadre tvaṃ mā śucaḥ śubhadarśane | gataḥ sa paramaṃ lokaṃ tava putro na saṃśayaḥ

हे भद्रे, धीरज धरो और शोक मत करो, हे सुन्दर दर्शन वाली। तुम्हारा पुत्र निःसन्देह परम लोक को चला गया है।

श्लोक 29 (13.274.29)

वसुरेष महातेजाः शापदोषेण शोभने । मानुषत्वमनुप्राप्तो नैनं शोचितुमर्हसि ॥

vasureṣa mahātejāḥ śāpadoṣeṇa śobhane | mānuṣatvamanuprāpto nainaṃ śocitumarhasi

हे शोभने, वह महातेजस्वी वसु था, जो शाप-दोष से मनुष्यभाव को प्राप्त हुआ; तुम्हें उसके लिए शोक नहीं करना चाहिए।

श्लोक 30 (13.274.30)

स एष क्षत्रधर्मेण युध्यमानो रणाजिरे । धनंजयेन निहतो नैष देवि शिखण्डिना ॥

sa eṣa kṣatradharmeṇa yudhyamāno raṇājire | dhanaṃjayena nihato naiṣa devi śikhaṇḍinā

हे देवि, क्षत्रिय-धर्म के अनुसार रणभूमि में लड़ते हुए वह धनंजय के हाथों मारा गया है, शिखण्डी के हाथों नहीं।

श्लोक 31 (13.274.31)

भीष्मं हि कुरुशार्दूलमुद्यतेषु महारणे । न शक्तः संयुगे हन्तुं साक्षादपि शतक्रतुः ॥

bhīṣmaṃ hi kuruśārdūlamudyateṣu mahāraṇe | na śaktaḥ saṃyuge hantuṃ sākṣādapi śatakratuḥ

शस्त्र उठे होने पर महायुद्ध में कुरुशार्दूल भीष्म को साक्षात् शतक्रतु इन्द्र भी नहीं मार सकते थे।

श्लोक 32 (13.274.32)

स्वच्छन्दतस्तव सुतो गतः स्वर्गं शुभानने । न शक्ता विनिहन्तुं हि रणे तं सर्वदेवताः ॥

svacchandatastava suto gataḥ svargaṃ śubhānane | na śaktā vinihantuṃ hi raṇe taṃ sarvadevatāḥ

हे शुभानने, तुम्हारा पुत्र अपनी इच्छा से स्वर्ग गया है; युद्ध में समस्त देवता भी उसे नहीं मार सकते थे।

श्लोक 33 (13.274.33)

तस्मान्मा त्वं सरिच्छ्रेष्ठे शोचस्व कुरुनन्दनम् । वसूनेष गतो देवि पुत्रस्ते विज्वरा भव ॥

tasmānmā tvaṃ saricchreṣṭhe śocasva kurunandanam | vasūneṣa gato devi putraste vijvarā bhava

इसलिए हे नदियों में श्रेष्ठ, कुरुनन्दन के लिए शोक मत करो। हे देवि, तुम्हारा पुत्र वसुओं के पास चला गया है; सन्ताप से मुक्त हो जाओ।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 34 (13.274.34)

इत्युक्ता सा तु कृष्णेन व्यासेन तु सरिद्वरा । त्यक्त्वा शोकं महाराज स्वं वार्यवततार ह ॥

ityuktā sā tu kṛṣṇena vyāsena tu saridvarā | tyaktvā śokaṃ mahārāja svaṃ vāryavatatāra ha

कृष्ण और व्यास के ऐसा कहने पर नदियों में श्रेष्ठ गंगा ने शोक छोड़ दिया और, हे महाराज, अपने जल में प्रवेश कर गईं।

श्लोक 35 (13.274.35)

सत्कृत्य ते तां सरितं ततः कृष्णमुखा नृप । अनुज्ञातास्तया सर्वे न्यवर्तन्त जनाधिपाः ॥

satkṛtya te tāṃ saritaṃ tataḥ kṛṣṇamukhā nṛpa | anujñātāstayā sarve nyavartanta janādhipāḥ

उस नदी का सत्कार करके कृष्ण आदि सब राजा, हे नृप, उसकी अनुमति पाकर लौट पड़े।

अध्याय 273अध्याय-सूची