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अनुशासन पर्व · अध्याय 273

भीष्म की श्रीकृष्ण से प्राण-त्याग की अनुमति

पचास रातों के बाद सूर्य के उत्तरायण होने पर युधिष्ठिर कुरुजनों, श्रीकृष्ण और यज्ञाग्नियों के साथ कुरुक्षेत्र में भीष्म के पास लौटते हैं। भीष्म धृतराष्ट्र को पाण्डवों को अपने पुत्रों के समान मानने की सीख देते हैं, फिर श्रीकृष्ण की परम पुरुष के रूप में स्तुति करते हैं, दुर्योधन को दी अपनी चेतावनियाँ याद करते हैं और प्राण छोड़ने की अनुमति माँगते हैं। कृष्ण अनुमति देते हैं और भीष्म पाण्डवों को सत्य, दया तथा ब्राह्मणों के सम्मान का अन्तिम उपदेश देते हैं।

अध्याय 272अध्याय-सूचीअध्याय 274

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (13.273.1)

ततः कुन्तीसुतो राजा पौरजानपदं जनम् । पूजयित्वा यथान्यायमनुजज्ञे गृहान्प्रति ॥

tataḥ kuntīsuto rājā paurajānapadaṃ janam | pūjayitvā yathānyāyamanujajñe gṛhānprati

तब कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने नगरवासियों और जनपदवासियों का यथोचित सत्कार करके उन्हें घर लौटने की अनुमति दी।

श्लोक 2 (13.273.2)

सान्त्वयामास नारीश्च हतपुत्रा हतेश्वराः । विपुलैरर्थदानैः स तदा पाण्डुसुतो नृपः ॥

sāntvayāmāsa nārīśca hataputrā hateśvarāḥ | vipulairarthadānaiḥ sa tadā pāṇḍusuto nṛpaḥ

तब पाण्डुपुत्र राजा ने उन स्त्रियों को, जिनके पुत्र और पति मारे जा चुके थे, प्रचुर धन-दान देकर सान्त्वना दी।

श्लोक 3 (13.273.3)

सोभिषिक्तो महाप्राज्ञः प्राप्य राज्यं युधिष्ठिरः । अवस्थाप्य नरश्रेष्ठः सर्वाः स्वप्रकृतीस्तथा ॥

sobhiṣikto mahāprājñaḥ prāpya rājyaṃ yudhiṣṭhiraḥ | avasthāpya naraśreṣṭhaḥ sarvāḥ svaprakṛtīstathā

महाप्राज्ञ नरश्रेष्ठ युधिष्ठिर का अभिषेक हुआ, उन्होंने राज्य पाया और अपने सब मन्त्रियों तथा प्रजाजनों को अपने-अपने स्थान पर स्थापित किया।

श्लोक 4 (13.273.4)

द्विजेभ्यो बलमुख्येभ्यो नैगमेभ्यश्च सर्वशः । प्रतिगृह्याशिषो मुख्यास्तथा धर्मभृतांवरः ॥

dvijebhyo balamukhyebhyo naigamebhyaśca sarvaśaḥ | pratigṛhyāśiṣo mukhyāstathā dharmabhṛtāṃvaraḥ

तब धर्मधारियों में श्रेष्ठ युधिष्ठिर ने ब्राह्मणों, सेना के प्रमुखों और नगरवासियों से सब ओर से प्रमुख आशीर्वाद ग्रहण किए।

श्लोक 5 (13.273.5)

उषित्वा शर्वरीः श्रीमान्पञ्चाशन्नगरोत्तमे । समयं कौरवाग्र्यस्य सस्मार पुरुषर्षभः ॥

uṣitvā śarvarīḥ śrīmānpañcāśannagarottame | samayaṃ kauravāgryasya sasmāra puruṣarṣabhaḥ

उस श्रेष्ठ नगर में पचास रातें बिताकर श्रीमान् पुरुषश्रेष्ठ युधिष्ठिर को कुरुओं में अग्रणी भीष्म के बताए हुए समय की स्मृति हुई।

श्लोक 6 (13.273.6)

स निर्ययौ गजपुराद्याजकैः परिवारितः । दृष्ट्वा निवृत्तमादित्यं प्रवृत्तं चोत्तरायणम् ॥

sa niryayau gajapurādyājakaiḥ parivāritaḥ | dṛṣṭvā nivṛttamādityaṃ pravṛttaṃ cottarāyaṇam

सूर्य को लौटा हुआ और उत्तरायण को आरम्भ हुआ देखकर वे याजकों से घिरे हुए गजपुर (हस्तिनापुर) से निकले।

श्लोक 7 (13.273.7)

घृतं माल्यं च गन्धांश्च क्षौमाणि च युधिष्ठिरः । चन्दनागरुमुख्यानि तथा कालगरूणि च ॥

ghṛtaṃ mālyaṃ ca gandhāṃśca kṣaumāṇi ca yudhiṣṭhiraḥ | candanāgarumukhyāni tathā kālagarūṇi ca

युधिष्ठिर ने घी, मालाएँ, गन्ध-द्रव्य, रेशमी वस्त्र, चन्दन, उत्तम अगरु और कालागरु पहले ही भेज दिए,

श्लोक 8 (13.273.8)

प्रस्थाप्य च पूर्वं कौन्तेयो भीष्मसंस्करणाय वै । माल्यानि च वरार्हाणि रत्नानि विविधानि च ॥

prasthāpya ca pūrvaṃ kaunteyo bhīṣmasaṃskaraṇāya vai | mālyāni ca varārhāṇi ratnāni vividhāni ca

और कुन्तीपुत्र ने भीष्म के संस्कार के लिए उत्तम मालाएँ तथा अनेक प्रकार के रत्न भी पहले भेज दिए।

श्लोक 9 (13.273.9)

धृतराष्ट्रं पुरस्कृत्य गान्धारीं च यशस्विनीम् । मातरं च पृथां धीमान्भ्रातॄंश्च पुरुषर्षभान् ॥

dhṛtarāṣṭraṃ puraskṛtya gāndhārīṃ ca yaśasvinīm | mātaraṃ ca pṛthāṃ dhīmānbhrātṝṃśca puruṣarṣabhān

धृतराष्ट्र और यशस्विनी गान्धारी को, अपनी माता पृथा को तथा पुरुषश्रेष्ठ अपने बुद्धिमान् भाइयों को आगे करके,

श्लोक 10 (13.273.10)

जनार्दनेनानुगतो विदुरेण च धीमता । युयुत्सुना च कौरव्यो युयुधानेन चाभिभो ॥

janārdanenānugato vidureṇa ca dhīmatā | yuyutsunā ca kauravyo yuyudhānena cābhibho

जनार्दन, बुद्धिमान् विदुर, युयुत्सु और युयुधान के साथ, वे कुरुवंशी, हे प्रतापी राजन्,

श्लोक 11 (13.273.11)

महता राजभोगेन पारिबर्हेण संवृतः । स्तूयमानो महातेजा भीष्मस्याग्नीननुव्रजन् ॥

mahatā rājabhogena pāribarheṇa saṃvṛtaḥ | stūyamāno mahātejā bhīṣmasyāgnīnanuvrajan

विशाल राजसी वैभव और परिवार से घिरे, स्तुति सुनते हुए, महातेजस्वी युधिष्ठिर भीष्म की यज्ञाग्नियों के पीछे चलते हुए,

श्लोक 12 (13.273.12)

निश्चक्राम पुरात्तस्माद्यथा देवपतिस्तथा । आससाद कुरुक्षेत्रे ततः शान्तनवं नृपः ॥

niścakrāma purāttasmādyathā devapatistathā | āsasāda kurukṣetre tataḥ śāntanavaṃ nṛpaḥ

उस नगर से देवराज के समान निकले और कुरुक्षेत्र में शान्तनुपुत्र भीष्म के पास पहुँचे।

श्लोक 13 (13.273.13)

उपास्यमानं व्यासेन पाराशर्येण धीमता । नारदेन च राजर्षे देवलेनासितेन च ॥

upāsyamānaṃ vyāsena pārāśaryeṇa dhīmatā | nāradena ca rājarṣe devalenāsitena ca

वहाँ बुद्धिमान् पराशरपुत्र व्यास, हे राजर्षे नारद, देवल और असित उनकी सेवा में थे,

श्लोक 14 (13.273.14)

हतशिष्टैर्नृपैश्चान्यैर्नानादेशसमागतैः । रक्षिभिश्च महात्मानं रक्ष्यमाणं समन्ततः ॥

hataśiṣṭairnṛpaiścānyairnānādeśasamāgataiḥ | rakṣibhiśca mahātmānaṃ rakṣyamāṇaṃ samantataḥ

और युद्ध में बचे हुए तथा नाना देशों से आए अन्य राजा भी थे; वे महात्मा भीष्म चारों ओर से रक्षकों द्वारा सुरक्षित थे।

श्लोक 15 (13.273.15)

शयानं वीरशयने ददर्श नृपतिस्ततः । ततो रथादवारोहद्धातृभिः सह धर्मराट् ॥

śayānaṃ vīraśayane dadarśa nṛpatistataḥ | tato rathādavārohaddhātṛbhiḥ saha dharmarāṭ

राजा ने उन्हें वीरशय्या पर लेटे देखा। तब धर्मराज युधिष्ठिर अपने भाइयों के साथ रथ से उतर गए,

श्लोक 16 (13.273.16)

अभिवाद्याथ कौन्तेयः पितामहमरिंदमम् । द्वैपायनादीन्विप्रांश्च तैश्च प्रत्यभिनन्दितः ॥

abhivādyātha kaunteyaḥ pitāmahamariṃdamam | dvaipāyanādīnviprāṃśca taiśca pratyabhinanditaḥ

और कुन्तीपुत्र ने शत्रुदमन पितामह को तथा द्वैपायन आदि ब्राह्मणों को प्रणाम किया, और उन सबने उसका अभिनन्दन किया।

श्लोक 17 (13.273.17)

ऋत्विग्भिर्ब्रह्मकल्पैश्च भ्रातृभिः सह धर्मजः । आसाद्य शरतल्पस्थमृषिभिः परिवारितम् ॥

ṛtvigbhirbrahmakalpaiśca bhrātṛbhiḥ saha dharmajaḥ | āsādya śaratalpasthamṛṣibhiḥ parivāritam

ब्रह्मा के समान ऋत्विजों और भाइयों के साथ धर्मपुत्र युधिष्ठिर ऋषियों से घिरे हुए शरशय्या पर लेटे भीष्म के पास पहुँचे,

श्लोक 18 (13.273.18)

अब्रवीद्भरतश्रेष्ठं धर्मराजो युधिष्ठिरः । भ्रातृभिः सह कौरव्यः शयानं निम्नगासुतम् ॥

abravīdbharataśreṣṭhaṃ dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ | bhrātṛbhiḥ saha kauravyaḥ śayānaṃ nimnagāsutam

और धर्मराज युधिष्ठिर ने भाइयों के साथ शय्या पर लेटे हुए भरतश्रेष्ठ, नदीपुत्र भीष्म से कहा।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 19 (13.273.19)

युधिष्ठिरोऽहं नृपते नमस्ते जाह्नवीसुत । शृणोषि चेन्महाबाहो ब्रूहि किं करवाणि ते ॥

yudhiṣṭhiro'haṃ nṛpate namaste jāhnavīsuta | śṛṇoṣi cenmahābāho brūhi kiṃ karavāṇi te

हे राजन्, मैं युधिष्ठिर हूँ; हे जाह्नवीपुत्र, आपको प्रणाम है। हे महाबाहो, यदि आप सुन रहे हैं तो कहिए, मैं आपके लिए क्या करूँ?

श्लोक 20 (13.273.20)

प्राप्तोस्मि समये राजन्नग्नीनादाय ते विभो । आचार्यान्ब्राह्मणांश्चैव ऋत्विजो भ्रातरश्च मे ॥

prāptosmi samaye rājannagnīnādāya te vibho | ācāryānbrāhmaṇāṃścaiva ṛtvijo bhrātaraśca me

हे राजन्, मैं ठीक समय पर आपकी यज्ञाग्नियों को लेकर आया हूँ, हे विभो, और आचार्य, ब्राह्मण, ऋत्विज तथा मेरे भाई भी साथ हैं।

श्लोक 21 (13.273.21)

पुत्रश्च ते महातेजा धृतराष्ट्रो जनेश्वरः । उपस्थितः सहामात्यो वासुदेवश्च वीर्यवान् ॥

putraśca te mahātejā dhṛtarāṣṭro janeśvaraḥ | upasthitaḥ sahāmātyo vāsudevaśca vīryavān

आपके महातेजस्वी पुत्र जनेश्वर धृतराष्ट्र मन्त्रियों सहित उपस्थित हैं, और पराक्रमी वासुदेव भी।

श्लोक 22 (13.273.22)

हतशिष्टाश्च राजानः सर्वे च कुरुजाङ्गलाः । तान्पश्य नरशार्दूल समुन्मीलय लोचने ॥

hataśiṣṭāśca rājānaḥ sarve ca kurujāṅgalāḥ | tānpaśya naraśārdūla samunmīlaya locane

युद्ध में बचे हुए राजा और कुरुजांगल के सब लोग भी यहाँ हैं। हे नरशार्दूल, उन्हें देखिए और अपनी आँखें खोलिए।

श्लोक 23 (13.273.23)

यच्चेह किञ्चित्कर्तव्यं तत्सर्वं प्रापितं मया । यथोक्तं भवता काले सर्वमेव च तत्कृतम् ॥

yacceha kiñcitkartavyaṃ tatsarvaṃ prāpitaṃ mayā | yathoktaṃ bhavatā kāle sarvameva ca tatkṛtam

यहाँ जो कुछ करना था, वह सब मैंने पूरा कर दिया है, और आपने समय पर जैसा कहा था, वह सब किया जा चुका है।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 24 (13.273.24)

एवमुक्तस्तु गाङ्गेयः कुन्तीपुत्रेण धीमता । ददर्श भारतान्सर्वान्स्थितान्सम्परिवार्य ह ॥

evamuktastu gāṅgeyaḥ kuntīputreṇa dhīmatā | dadarśa bhāratānsarvānsthitānsamparivārya ha

बुद्धिमान् कुन्तीपुत्र के ऐसा कहने पर गंगापुत्र भीष्म ने चारों ओर खड़े सब भरतवंशियों को देखा।

श्लोक 25 (13.273.25)

ततश्चलवपुर्भीष्मः प्रगृह्य विपुलं भुजम् । ओघमेघस्वरो वाग्मी काले वचनमब्रवीत् ॥

tataścalavapurbhīṣmaḥ pragṛhya vipulaṃ bhujam | oghameghasvaro vāgmī kāle vacanamabravīt

तब काँपते शरीर वाले भीष्म ने युधिष्ठिर की विशाल भुजा को थामकर, मेघ-गर्जन के समान गम्भीर स्वर में, उचित समय पर वाक्पटु होकर कहा।

भीष्म उवाच

श्लोक 26 (13.273.26)

दिष्ट्या प्राप्तोसि कौन्तेय सहामात्यो युधिष्ठिर । परिवृत्तो हि भगवान्सहस्रांशुर्दिवाकरः ॥

diṣṭyā prāptosi kaunteya sahāmātyo yudhiṣṭhira | parivṛtto hi bhagavānsahasrāṃśurdivākaraḥ

हे कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर, सौभाग्य से तुम मन्त्रियों सहित आ गए हो। भगवान् सहस्ररश्मि दिवाकर अब लौट चुके हैं।

श्लोक 27 (13.273.27)

अष्टपञ्चाशतं रात्र्यः शयानस्याद्य मे गताः । शरेषु निशिताग्नेषु यथा वर्षशतं तथा ॥

aṣṭapañcāśataṃ rātryaḥ śayānasyādya me gatāḥ | śareṣu niśitāgneṣu yathā varṣaśataṃ tathā

तीखी नोकों वाले बाणों पर लेटे हुए मुझे आज अट्ठावन रातें बीत गई हैं; वे मुझे सौ वर्ष के समान लगी हैं।

श्लोक 28 (13.273.28)

माघोऽयं समनुप्राप्तो मासः पुण्यो युधिष्ठिर । त्रिभागशेषः पक्षोऽयं शुक्लो भवितुमर्हति ॥

māgho'yaṃ samanuprāpto māsaḥ puṇyo yudhiṣṭhira | tribhāgaśeṣaḥ pakṣo'yaṃ śuklo bhavitumarhati

हे युधिष्ठिर, यह पुण्य माघ मास आ गया है; इस शुक्ल पक्ष का एक तिहाई भाग शेष होना चाहिए।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 29 (13.273.29)

एवमुक्त्वा तु गाङ्गेयो धर्मपुत्रं युधिष्ठिरम् । धृतराष्ट्रमथामन्त्र्य काले वचनमब्रवीत् ॥

evamuktvā tu gāṅgeyo dharmaputraṃ yudhiṣṭhiram | dhṛtarāṣṭramathāmantrya kāle vacanamabravīt

धर्मपुत्र युधिष्ठिर से ऐसा कहकर गंगापुत्र ने धृतराष्ट्र को सम्बोधित किया और उचित समय पर यह वचन कहा।

भीष्म उवाच

श्लोक 30 (13.273.30)

राजन्विदितधर्मोसि सुनिर्णीतार्थसंशयः । बहुश्रुता हि ते विप्रा बहवः पर्युपासिताः ॥

rājanviditadharmosi sunirṇītārthasaṃśayaḥ | bahuśrutā hi te viprā bahavaḥ paryupāsitāḥ

हे राजन्, तुम धर्म को जानते हो, तुम्हारे अर्थ-सम्बन्धी संशय भलीभाँति निश्चित हो चुके हैं, और तुमने अनेक बहुश्रुत ब्राह्मणों की सेवा की है।

श्लोक 31 (13.273.31)

वेद शास्त्राणि सूक्ष्माणि धर्मांश्च मनुजेश्वर । वेदांश्च चतुरः सर्वान्षडङ्गैरुपबृंहितान् ॥

veda śāstrāṇi sūkṣmāṇi dharmāṃśca manujeśvara | vedāṃśca caturaḥ sarvānṣaḍaṅgairupabṛṃhitān

हे नरेश्वर, तुम सूक्ष्म शास्त्रों और धर्मों को जानते हो, तथा छह अंगों से पुष्ट चारों वेदों को भी।

श्लोक 32 (13.273.32)

न शोचितव्यं कौरव्य भवितव्यं हि तत्तथा । श्रुतं देवरहस्यं ते कृष्णद्वैपायनादपि ॥

na śocitavyaṃ kauravya bhavitavyaṃ hi tattathā | śrutaṃ devarahasyaṃ te kṛṣṇadvaipāyanādapi

हे कौरव, तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए, क्योंकि वैसा ही होना था। देवताओं का रहस्य तो तुमने कृष्ण द्वैपायन से भी सुना है।

श्लोक 33 (13.273.33)

यथा पाण्डोः सुता राजंस्तथैव तव धर्मतः । तान्पालय स्थितो धर्मे गुरुशुश्रूषणे रतान् ॥

yathā pāṇḍoḥ sutā rājaṃstathaiva tava dharmataḥ | tānpālaya sthito dharme guruśuśrūṣaṇe ratān

हे राजन्, जैसे तुम्हारे पुत्र हैं, वैसे ही धर्म से पाण्डु के पुत्र भी तुम्हारे हैं। धर्म में स्थित रहकर उनका पालन करो; वे गुरुजनों की सेवा में लगे रहने वाले हैं।

श्लोक 34 (13.273.34)

धर्मराजो हि शुद्धात्मा निदेशे स्थास्यते तव । आनृशंस्यपरं ह्येनं जानामि गुरुवत्सलम् ॥

dharmarājo hi śuddhātmā nideśe sthāsyate tava | ānṛśaṃsyaparaṃ hyenaṃ jānāmi guruvatsalam

शुद्ध हृदय धर्मराज तुम्हारी आज्ञा में रहेगा। मैं उसे दयालु और गुरुजनों के प्रति स्नेहशील जानता हूँ।

श्लोक 35 (13.273.35)

तव पुत्रा दुरात्मानः क्रोधलोभपरायणाः । ईर्ष्याभिभूता दुर्वृत्तास्तान्न शोचितुमर्हसि ॥

tava putrā durātmānaḥ krodhalobhaparāyaṇāḥ | īrṣyābhibhūtā durvṛttāstānna śocitumarhasi

तुम्हारे पुत्र दुष्टात्मा, क्रोध और लोभ में डूबे, ईर्ष्या से ग्रस्त और दुराचारी थे; उनके लिए तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 36 (13.273.36)

एतावदुक्त्वा वचनं धृतराष्ट्रं मनीषिणम् । वासुदेवं महाबाहुमभ्यभाषत कौरवः ॥

etāvaduktvā vacanaṃ dhṛtarāṣṭraṃ manīṣiṇam | vāsudevaṃ mahābāhumabhyabhāṣata kauravaḥ

बुद्धिमान् धृतराष्ट्र से इतना कहकर कुरुवंशी भीष्म ने महाबाहु वासुदेव को सम्बोधित किया।

भीष्म उवाच

श्लोक 37 (13.273.37)

भगवन्देवदेवेश सुरासुरनमस्कृत । त्रिविक्रम नमस्तुभ्यं शङ्खचक्रगदाधर ॥

bhagavandevadeveśa surāsuranamaskṛta | trivikrama namastubhyaṃ śaṅkhacakragadādhara

हे भगवन्, देवों के देव, सुरों और असुरों से नमस्कृत, त्रिविक्रम, शंख-चक्र-गदा धारण करने वाले, आपको नमस्कार है।

श्लोक 38 (13.273.38)

वासुदेवो हिरण्यात्मा पुरुषः सविता विराद् । जीवभूतोऽनुरूपस्त्वं परमात्मा सनातनः ॥

vāsudevo hiraṇyātmā puruṣaḥ savitā virād | jīvabhūto'nurūpastvaṃ paramātmā sanātanaḥ

आप वासुदेव हैं, हिरण्यात्मा, पुरुष, सविता और विराट् हैं। आप जीवरूप होकर उसके अनुरूप भी हैं, आप सनातन परमात्मा हैं।

श्लोक 39 (13.273.39)

त्वद्भक्तं त्वद्गतिं शान्तमुदारमपरिग्रहम् । त्रायस्व पुण्डरीकाक्ष पुरुषोत्तम नित्यशः । अनुजानीहि मां कृष्ण वैकुण्ठ पुरुषोत्तम ॥

tvadbhaktaṃ tvadgatiṃ śāntamudāramaparigraham | trāyasva puṇḍarīkākṣa puruṣottama nityaśaḥ | anujānīhi māṃ kṛṣṇa vaikuṇṭha puruṣottama

हे कमलनयन पुरुषोत्तम, जो आपका भक्त है, आपकी ही शरण चाहता है, शान्त, उदार और परिग्रहरहित है, उसकी सदा रक्षा कीजिए। हे कृष्ण, हे वैकुण्ठ, हे पुरुषोत्तम, मुझे अनुमति दीजिए।

श्लोक 40 (13.273.40)

रक्ष्याश्च ते पाण्डवेया भवान्येषां परायणम् । उक्तवानस्मि दुर्बुद्धिं मन्दं दुर्योधनं तदा ॥

rakṣyāśca te pāṇḍaveyā bhavānyeṣāṃ parāyaṇam | uktavānasmi durbuddhiṃ mandaṃ duryodhanaṃ tadā

पाण्डवों की रक्षा कीजिए, क्योंकि आप ही उनके परम आश्रय हैं। मैंने उस समय मन्द और दुर्बुद्धि दुर्योधन से कहा था:

श्लोक 41 (13.273.41)

यतः कृष्णस्ततो धर्मो यतो धर्मस्ततो जयः । वासुदेवेन तीर्थेन पुत्र संशाम्य पाण्डवैः ॥

yataḥ kṛṣṇastato dharmo yato dharmastato jayaḥ | vāsudevena tīrthena putra saṃśāmya pāṇḍavaiḥ

"जहाँ कृष्ण हैं, वहाँ धर्म है; जहाँ धर्म है, वहाँ जय है। हे पुत्र, वासुदेव के माध्यम से पाण्डवों के साथ सन्धि कर लो,

श्लोक 42 (13.273.42)

सन्धानस्य परः कालस्तवेति च पुनःपुनः । न च मे तद्वचो मूढः कृतवान्स सुमन्दधीः । घातयित्वेह पृथिवीं ततः स निधनं गतः ॥

sandhānasya paraḥ kālastaveti ca punaḥpunaḥ | na ca me tadvaco mūḍhaḥ kṛtavānsa sumandadhīḥ | ghātayitveha pṛthivīṃ tataḥ sa nidhanaṃ gataḥ

अब सन्धि का सर्वोत्तम समय है," यह मैंने उससे बार-बार कहा। पर उस मूढ़ मन्दबुद्धि ने मेरी बात नहीं मानी, और पृथ्वी का विनाश कराकर वह स्वयं मृत्यु को प्राप्त हुआ।

श्लोक 43 (13.273.43)

त्वां तु जानाम्यहं देवं पुराणमृषिसत्तमम् । नरेण सहितं देव बदर्यां सुचिरोषितम् ॥

tvāṃ tu jānāmyahaṃ devaṃ purāṇamṛṣisattamam | nareṇa sahitaṃ deva badaryāṃ suciroṣitam

हे देव, मैं आपको जानता हूँ, आप पुरातन ऋषिश्रेष्ठ हैं, जो बदरी में नर के साथ बहुत समय तक रहे।

श्लोक 44 (13.273.44)

तथा मे नारदः प्राह व्यासश्च सुमहातपाः । नरनारायणावेतौ सम्भूतौ मनुजेष्विति ॥

tathā me nāradaḥ prāha vyāsaśca sumahātapāḥ | naranārāyaṇāvetau sambhūtau manujeṣviti

नारद ने मुझसे ऐसा कहा था, और महातपस्वी व्यास ने भी, कि ये दोनों नर और नारायण मनुष्यों में उत्पन्न हुए हैं।

श्लोक 45 (13.273.45)

स मां त्वमनुजानीहि कृष्ण मोक्ष्ये कलेवरम् । त्वयाऽहं समनुज्ञातो गच्छेयं परमां गतिम् ॥

sa māṃ tvamanujānīhi kṛṣṇa mokṣye kalevaram | tvayā'haṃ samanujñāto gaccheyaṃ paramāṃ gatim

इसलिए हे कृष्ण, मुझे अनुमति दीजिए; मैं यह शरीर छोड़ूँगा। आपकी अनुमति पाकर मैं परम गति को प्राप्त करूँ।

वासुदेव उवाच

श्लोक 46 (13.273.46)

अनुजानामि भीष्म त्वां वसून्प्राप्नुहि पार्थिव । न तेऽस्ति वृजिनं किञ्चिच्छुद्धात्मैश्वर्यसंयुतः ॥

anujānāmi bhīṣma tvāṃ vasūnprāpnuhi pārthiva | na te'sti vṛjinaṃ kiñcicchuddhātmaiśvaryasaṃyutaḥ

हे भीष्म, मैं तुम्हें अनुमति देता हूँ; हे राजन्, तुम वसुओं को प्राप्त करो। हे शुद्धात्मन्, ऐश्वर्य से युक्त तुममें कोई पाप नहीं है।

श्लोक 47 (13.273.47)

पितृभक्तोसि राजर्षे मार्कण्डेय इवापरः । तेन मृत्युस्तव वशे स्थितो भृत्य इवानतः ॥

pitṛbhaktosi rājarṣe mārkaṇḍeya ivāparaḥ | tena mṛtyustava vaśe sthito bhṛtya ivānataḥ

हे राजर्षे, तुम पितृभक्त हो, दूसरे मार्कण्डेय के समान। इसी कारण मृत्यु सेवक की भाँति झुकी हुई तुम्हारे वश में खड़ी है।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 48 (13.273.48)

एवमुक्तस्तु गाङ्गेयः पाण्डवानिदमब्रवीत् । धृतराष्ट्रमुखांश्चापि सर्वांश्च सुहृदस्तथा ॥

evamuktastu gāṅgeyaḥ pāṇḍavānidamabravīt | dhṛtarāṣṭramukhāṃścāpi sarvāṃśca suhṛdastathā

ऐसा कहे जाने पर गंगापुत्र ने पाण्डवों से, धृतराष्ट्र आदि से और सब सुहृदों से यह कहा:

भीष्म उवाच

श्लोक 49 (13.273.49)

प्राणानुत्स्रष्टुमिच्छामि तत्रानुज्ञातुमर्हथ । सत्येषु यतितव्यं वः सत्यं हि परमं बलम् ॥

prāṇānutsraṣṭumicchāmi tatrānujñātumarhatha | satyeṣu yatitavyaṃ vaḥ satyaṃ hi paramaṃ balam

मैं प्राण छोड़ना चाहता हूँ; आप सब इसकी अनुमति दें। आपको सत्य में प्रयत्नशील रहना चाहिए, क्योंकि सत्य ही परम बल है।

श्लोक 50 (13.273.50)

आनृशंस्यपरैर्भाव्यं सदैव नियतात्मभिः । ब्रह्मण्यैर्धर्मशीलैश्च तपोनित्यैश्च भारताः ॥

ānṛśaṃsyaparairbhāvyaṃ sadaiva niyatātmabhiḥ | brahmaṇyairdharmaśīlaiśca taponityaiśca bhāratāḥ

हे भारतो, आप सदा दयालु और संयमी रहें, ब्राह्मणों के भक्त, धर्मशील और नित्य तपस्या में लगे रहें।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 51 (13.273.51)

इत्युक्त्वा सुहृदः सर्वांस्तथा सम्पूज्य चैव ह । धनं बहुविधं राजन्दत्त्वा नित्यं द्विजातिषु । पुनरेवाब्रवीद्धीमान्युधिष्ठिरमिदं वचः ॥

ityuktvā suhṛdaḥ sarvāṃstathā sampūjya caiva ha | dhanaṃ bahuvidhaṃ rājandattvā nityaṃ dvijātiṣu | punarevābravīddhīmānyudhiṣṭhiramidaṃ vacaḥ

ऐसा कहकर, सब सुहृदों का आलिंगन और सत्कार करके, और हे राजन्, ब्राह्मणों को सदा अनेक प्रकार का धन देकर, बुद्धिमान् भीष्म ने फिर युधिष्ठिर से यह वचन कहा:

भीष्म उवाच

श्लोक 52 (13.273.52)

ब्राह्मणाश्चैव ते नित्यं प्राज्ञाश्चैव विशेषतः । आचार्या ऋत्विजश्चैव पूजनीया जनाधिप ॥

brāhmaṇāścaiva te nityaṃ prājñāścaiva viśeṣataḥ | ācāryā ṛtvijaścaiva pūjanīyā janādhipa

हे जनाधिप, ब्राह्मण, विशेषकर विद्वान्, तथा आचार्य और ऋत्विज तुम्हारे द्वारा सदा पूजनीय हैं।

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