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अनुशासन पर्व · अध्याय 61

भीष्म का श्राद्ध-उपदेश: निमन्त्रण के योग्य और अयोग्य ब्राह्मण

युधिष्ठिर भीष्म से श्राद्ध तथा देवों और पितरों के कर्मों के विधान पूछते हैं। भीष्म प्रत्येक कर्म के उचित समय और उन दोषों को बताते हैं जिनसे अर्पण राक्षसों का भाग बन जाता है; वे निमन्त्रण के अयोग्य ब्राह्मणों की और उन ब्राह्मणों की सूची देते हैं जो सन्देह की स्थिति में भी योग्य हैं; फिर प्रत्येक वर्ण के लिए उचित समापन-वचन, मेखला और दण्ड बताते हैं। अन्त में वे उन अवसरों को गिनाते हैं जब अनुचित निमन्त्रण देने या स्वीकार करने से मनुष्य गोहत्या-शपथ जैसे असत्य का दोषी होता है।

अध्याय 60अध्याय-सूचीअध्याय 62

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (13.61.1)

श्राद्धकाले च दैवे च पित्र्येऽपि च पितामह । इच्छामीह त्वयाऽऽख्यातं विहितं यत्सुरर्षिभिः ॥

śrāddhakāle ca daive ca pitrye'pi ca pitāmaha | icchāmīha tvayā''khyātaṃ vihitaṃ yatsurarṣibhiḥ

पितामह, श्राद्ध के समय के विषय में तथा देवकर्म और पितृकर्म के विषय में देवर्षियों ने जो विधान किया है, उसे मैं यहाँ आपसे सुनना चाहता हूँ।

भीष्म उवाच

श्लोक 2 (13.61.2)

दैवं पौर्वाह्णिके कुर्यादपराह्णे तु पैतृकम् । मङ्गलाचारसम्पन्नः कृतशौचः प्रयत्नवान् ॥

daivaṃ paurvāhṇike kuryādaparāhṇe tu paitṛkam | maṅgalācārasampannaḥ kṛtaśaucaḥ prayatnavān

देवकर्म पूर्वाह्न में और पितृकर्म अपराह्न में करना चाहिए; करने वाला मंगल आचार से युक्त, शुद्ध और सावधान हो।

श्लोक 3 (13.61.3)

मनुष्याणां तु मध्याह्ने प्रदद्यादुपपत्तिभिः । कालहीनं तु यद्दानं तं भागं रक्षसां विदुः ॥

manuṣyāṇāṃ tu madhyāhne pradadyādupapattibhiḥ | kālahīnaṃ tu yaddānaṃ taṃ bhāgaṃ rakṣasāṃ viduḥ

मनुष्यों के लिए भोजन मध्याह्न में उचित प्रबन्ध के साथ देना चाहिए। जो दान अपने समय के बिना दिया जाता है, उसे राक्षसों का भाग कहा जाता है।

श्लोक 4 (13.61.4)

लङ्घितं चावलीढं च कलिपूर्वं च यत्कृतम् । रजस्वलाभिदृष्टं च तं भागं रक्षसां विदुः ॥

laṅghitaṃ cāvalīḍhaṃ ca kalipūrvaṃ ca yatkṛtam | rajasvalābhidṛṣṭaṃ ca taṃ bhāgaṃ rakṣasāṃ viduḥ

जिसे लाँघा गया हो, जिसे चाटा गया हो, जो कलह के बीच किया गया हो और जिस पर रजस्वला स्त्रियों की दृष्टि पड़ी हो, उसे राक्षसों का भाग कहा जाता है।

श्लोक 5 (13.61.5)

अवघुष्टं च यद्भुक्तमव्रतेन च भारत । परामृष्टं शुना चैव तं भागं रक्षसां विदुः ॥

avaghuṣṭaṃ ca yadbhuktamavratena ca bhārata | parāmṛṣṭaṃ śunā caiva taṃ bhāgaṃ rakṣasāṃ viduḥ

हे भारत, जो घोषणा करते हुए खाया जाए, जिसे व्रतहीन खाए और जिसे कुत्ते ने छू लिया हो, वह राक्षसों का भाग कहा जाता है।

श्लोक 6 (13.61.6)

केशकीटावपतितं क्षुतं श्वभिरवेक्षितम् । रुदितं चावधूतं च तं भागं रक्षसां विदुः ॥

keśakīṭāvapatitaṃ kṣutaṃ śvabhiravekṣitam | ruditaṃ cāvadhūtaṃ ca taṃ bhāgaṃ rakṣasāṃ viduḥ

जिसमें बाल या कीड़ा गिर गया हो, जिस पर छींक आई हो, जिसे कुत्तों ने देखा हो, जिस पर रोया गया हो और जिसे झटक दिया गया हो, वह राक्षसों का भाग कहा जाता है।

श्लोक 7 (13.61.7)

निरोङ्कारेण यद्भुक्तं सशस्त्रेण च भारत । दुरात्मना च यद्भुक्तं तं भागं रक्षसां विदुः ॥

niroṅkāreṇa yadbhuktaṃ saśastreṇa ca bhārata | durātmanā ca yadbhuktaṃ taṃ bhāgaṃ rakṣasāṃ viduḥ

हे भारत, जो ओंकार के बिना खाया जाए, जिसे शस्त्रधारी खाए और जिसे दुष्ट खाए, वह राक्षसों का भाग कहा जाता है।

श्लोक 8 (13.61.8)

परोच्छिष्टं च यद्भुक्तं परिभुक्तं च यद्भवेत् । दैवे पित्र्ये च सततं तं भागं रक्षसां विदुः ॥

parocchiṣṭaṃ ca yadbhuktaṃ paribhuktaṃ ca yadbhavet | daive pitrye ca satataṃ taṃ bhāgaṃ rakṣasāṃ viduḥ

दूसरे का जूठा जो खाया जाए और जो पहले ही उपभोग कर लिया गया हो, देवकर्म या पितृकर्म में वह सदा राक्षसों का भाग कहा जाता है।

श्लोक 9 (13.61.9)

मन्त्रहीनं क्रियाहीनं यच्छ्राद्धं परिविष्यते । त्रिभिर्वर्णैर्नरश्रेष्ठ तं भागं रक्षसां विदुः ॥

mantrahīnaṃ kriyāhīnaṃ yacchrāddhaṃ pariviṣyate | tribhirvarṇairnaraśreṣṭha taṃ bhāgaṃ rakṣasāṃ viduḥ

हे नरश्रेष्ठ, तीनों वर्णों के लोगों को जो श्राद्ध मन्त्र और क्रिया के बिना परोसा जाए, वह राक्षसों का भाग कहा जाता है।

श्लोक 10 (13.61.10)

आज्याहुतिं विना चैव यत्किञ्चित्परिविष्यते । दुराचारैश्च यद्भुक्तं तं भागं रक्षसां विदुः ॥

ājyāhutiṃ vinā caiva yatkiñcitpariviṣyate | durācāraiśca yadbhuktaṃ taṃ bhāgaṃ rakṣasāṃ viduḥ

घी की आहुति के बिना जो कुछ परोसा जाए और दुराचारियों ने जो खाया हो, वह राक्षसों का भाग कहा जाता है।

श्लोक 11 (13.61.11)

ये भागा रक्षसां प्राप्तास्त उक्ता भरतर्षभ । अत ऊर्ध्वं विसर्गस्य परीक्षां ब्राह्मणे शृणु ॥

ye bhāgā rakṣasāṃ prāptāsta uktā bharatarṣabha | ata ūrdhvaṃ visargasya parīkṣāṃ brāhmaṇe śṛṇu

हे भरतश्रेष्ठ, जो भाग राक्षसों को मिलते हैं, वे बता दिए गए। अब दान के पात्र ब्राह्मण की परीक्षा सुनो।

श्लोक 12 (13.61.12)

यावन्तः पतिता विप्रा जडोन्मत्तास्तथैव च । दैवे वाऽप्यथ पित्र्ये वा राजन्नार्हन्ति केतनम् ॥

yāvantaḥ patitā viprā jaḍonmattāstathaiva ca | daive vā'pyatha pitrye vā rājannārhanti ketanam

हे राजन्, जितने पतित, जड़ और उन्मत्त ब्राह्मण हैं, वे देवकर्म या पितृकर्म, किसी में भी निमन्त्रण के योग्य नहीं हैं।

श्लोक 13 (13.61.13)

श्वित्री क्लीबश्च कुष्ठी च तथा यक्ष्महतश्च यः । अपस्मारी च यश्चान्धो राजन्नार्हन्ति केतनम् ॥

śvitrī klībaśca kuṣṭhī ca tathā yakṣmahataśca yaḥ | apasmārī ca yaścāndho rājannārhanti ketanam

हे राजन्, श्वेतकुष्ठी, नपुंसक, कुष्ठरोगी, क्षयरोग से ग्रस्त, मृगी का रोगी और अन्धा, ये निमन्त्रण के योग्य नहीं हैं।

श्लोक 14 (13.61.14)

चिकित्सका देवलका वृथा नियमधारिणः । सोमविक्रयिणश्चैव श्राद्धे नार्हन्ति केतनम् ॥

cikitsakā devalakā vṛthā niyamadhāriṇaḥ | somavikrayiṇaścaiva śrāddhe nārhanti ketanam

वैद्य, देवमन्दिर में पूजा से जीविका चलाने वाले, व्यर्थ नियम धारण करने वाले और सोम बेचने वाले श्राद्ध के निमन्त्रण के योग्य नहीं हैं।

श्लोक 15 (13.61.15)

गायना नर्तकाश्चैव प्लवका वादकास्तथा । कथका योधकाश्चैव राजन्नार्हन्ति केतनम् ॥

gāyanā nartakāścaiva plavakā vādakāstathā | kathakā yodhakāścaiva rājannārhanti ketanam

हे राजन्, गायक, नर्तक, नट, वादक, कथावाचक और योद्धा निमन्त्रण के योग्य नहीं हैं।

श्लोक 16 (13.61.16)

होतारो वृषलानां च वृषलाध्यापकास्तथा । तथा वृषलशिष्याश्च राजन्नार्हन्ति केतनम् ॥

hotāro vṛṣalānāṃ ca vṛṣalādhyāpakāstathā | tathā vṛṣalaśiṣyāśca rājannārhanti ketanam

हे राजन्, शूद्रों के पुरोहित, शूद्रों को पढ़ाने वाले और शूद्रों के शिष्य निमन्त्रण के योग्य नहीं हैं।

श्लोक 17 (13.61.17)

अनुयोक्ता च यो विप्रो अनुयुक्तश्च भारत । नार्हतस्तावपि श्राद्धं ब्रह्मविक्रयिणौ हि तौ ॥

anuyoktā ca yo vipro anuyuktaśca bhārata | nārhatastāvapi śrāddhaṃ brahmavikrayiṇau hi tau

हे भारत, जो ब्राह्मण वेतन लेकर पढ़ाता है और जो वेतन देकर पढ़ता है, वे दोनों भी श्राद्ध के योग्य नहीं हैं, क्योंकि वे दोनों वेद बेचने वाले हैं।

श्लोक 18 (13.61.18)

अग्रणीर्यः कृतः पूर्वं वर्णावरपरिग्रहः । ब्राह्मणः सर्वविद्योऽपि राजन्नार्हति केतनम् ॥

agraṇīryaḥ kṛtaḥ pūrvaṃ varṇāvaraparigrahaḥ | brāhmaṇaḥ sarvavidyo'pi rājannārhati ketanam

जिस ब्राह्मण को पहले अगुआ बनाया गया हो और जिसने नीच वर्ण की स्त्री को अपनाया हो, वह सब विद्याओं का ज्ञाता होने पर भी, हे राजन्, निमन्त्रण के योग्य नहीं है।

श्लोक 19 (13.61.19)

अनग्नयश्च ये विप्रा मृतनिर्यातकाश्च ये । स्तेनाश्च पतिताश्चैव राजन्नार्हन्ति केतनम् ॥

anagnayaśca ye viprā mṛtaniryātakāśca ye | stenāśca patitāścaiva rājannārhanti ketanam

हे राजन्, जो ब्राह्मण अग्निहोत्र नहीं रखते, जो मुर्दे ढोने का काम करते हैं, चोर और पतित, ये निमन्त्रण के योग्य नहीं हैं।

श्लोक 20 (13.61.20)

अपरिज्ञातपूर्वाश्च गणपूर्वाश्च भारत । पुत्रिकापूर्वपुत्राश्च श्राद्धे नार्हन्ति केतनम् ॥

aparijñātapūrvāśca gaṇapūrvāśca bhārata | putrikāpūrvaputrāśca śrāddhe nārhanti ketanam

हे भारत, जिनकी पूर्व-पहचान अज्ञात हो, जो पहले किसी गण के प्रधान रहे हों और जो पुत्रिका के पुत्र हों, वे श्राद्ध के निमन्त्रण के योग्य नहीं हैं।

श्लोक 21 (13.61.21)

ऋणकर्ता च यो राजन्यश्च वार्धुषिको नरः । प्राणिविक्रयवृत्तिश्च राजन्नार्हन्ति केतनम् ॥

ṛṇakartā ca yo rājanyaśca vārdhuṣiko naraḥ | prāṇivikrayavṛttiśca rājannārhanti ketanam

हे राजन्, जो ऋण देता है, जो सूदखोर है और जो प्राणियों को बेचकर जीता है, वह निमन्त्रण के योग्य नहीं है।

श्लोक 22 (13.61.22)

स्त्रीपूर्वाः काण्डपृष्ठाश्च यावन्तो भरतर्षभ । आजपा ब्राह्मणाश्चैव श्राद्धे नार्हन्ति केतनम् ॥

strīpūrvāḥ kāṇḍapṛṣṭhāśca yāvanto bharatarṣabha | ājapā brāhmaṇāścaiva śrāddhe nārhanti ketanam

हे भरतश्रेष्ठ, स्त्रियों के वश में रहने वाले, वेश्याओं के पति, जितने भी हों, और जप न करने वाले ब्राह्मण श्राद्ध के निमन्त्रण के योग्य नहीं हैं।

श्लोक 23 (13.61.23)

श्राद्धे दैवे च निर्दिष्टो ब्राह्मणो भरतर्षभ । दातुः प्रतिग्रहीतुश्च शृणुष्वानुग्रहं पुनः ॥

śrāddhe daive ca nirdiṣṭo brāhmaṇo bharatarṣabha | dātuḥ pratigrahītuśca śṛṇuṣvānugrahaṃ punaḥ

हे भरतश्रेष्ठ, श्राद्ध और देवकर्म के लिए जिस ब्राह्मण का निर्देश किया गया है, उसके विषय में दाता और ग्रहण करने वाले के लिए जो छूट है, उसे फिर सुनो।

श्लोक 24 (13.61.24)

चीर्णव्रता गुणैर्युक्ता भवेयुर्येऽपि कर्षकाः । सावित्रीज्ञाः क्रियावन्तस्ते राजन्केतनक्षमाः ॥

cīrṇavratā guṇairyuktā bhaveyurye'pi karṣakāḥ | sāvitrījñāḥ kriyāvantaste rājanketanakṣamāḥ

जो किसान भी व्रतों का पूर्ण पालन कर चुके हों, गुणों से युक्त हों, सावित्री मन्त्र को जानते हों और कर्मों में निष्ठा रखते हों, हे राजन्, वे निमन्त्रण के योग्य हैं।

श्लोक 25 (13.61.25)

क्षात्रधर्मिणमप्याजौ केतयेत्कुलजं द्विजम् । न त्वेव वणिजं तात श्राद्धे च परिकल्पयेत् ॥

kṣātradharmiṇamapyājau ketayetkulajaṃ dvijam | na tveva vaṇijaṃ tāta śrāddhe ca parikalpayet

युद्ध में क्षत्रिय धर्म निभाने वाले कुलीन ब्राह्मण को भी निमन्त्रित किया जा सकता है, परन्तु हे तात, वाणिज्य करने वाले को श्राद्ध में कभी नियुक्त न करे।

श्लोक 26 (13.61.26)

अग्निहोत्री च यो विप्रो ग्रामवासी च यो भवेत् । अस्तेनश्चातिथिज्ञश्च स राजन्केतनक्षमः ॥

agnihotrī ca yo vipro grāmavāsī ca yo bhavet | astenaścātithijñaśca sa rājanketanakṣamaḥ

जो ब्राह्मण अग्निहोत्री है, गाँव में रहता है, चोरी नहीं करता और अतिथि का सत्कार जानता है, हे राजन्, वह निमन्त्रण के योग्य है।

श्लोक 27 (13.61.27)

सावित्रीं जपते यस्तु त्रिकालं भरतर्षभ । भिक्षावृत्तिः क्रियावांश्च स राजन्केतनक्षमः ॥

sāvitrīṃ japate yastu trikālaṃ bharatarṣabha | bhikṣāvṛttiḥ kriyāvāṃśca sa rājanketanakṣamaḥ

हे भरतश्रेष्ठ, जो दिन में तीन बार सावित्री का जप करता है, भिक्षा से जीता है और कर्मों में निष्ठा रखता है, हे राजन्, वह निमन्त्रण के योग्य है।

श्लोक 28 (13.61.28)

उदितास्तमितो यश्च तथैवास्तमितोदितः । अहिंस्रश्चाल्पदोषश्च स राजन्केतनक्षमः ॥

uditāstamito yaśca tathaivāstamitoditaḥ | ahiṃsraścālpadoṣaśca sa rājanketanakṣamaḥ

जो उदित होकर अस्त हुआ है और वैसे ही जो अस्त होकर उदित हुआ है (अर्थात् जो धनी से निर्धन या निर्धन से धनी हुआ है), जो अहिंसक है और जिसके दोष थोड़े हैं, हे राजन्, वह निमन्त्रण के योग्य है।

श्लोक 29 (13.61.29)

अकल्कको ह्यतर्कश्च ब्राह्मणो भरतर्षभ । संसर्ग भैक्ष्यवृत्तिश्च स राजन्केतनक्षमः ॥

akalkako hyatarkaśca brāhmaṇo bharatarṣabha | saṃsarga bhaikṣyavṛttiśca sa rājanketanakṣamaḥ

हे भरतश्रेष्ठ, जो ब्राह्मण छल-कपट और वाद-विवाद से रहित है और जान-पहचान के घरों में भिक्षा से जीता है, हे राजन्, वह निमन्त्रण के योग्य है।

श्लोक 30 (13.61.30)

अव्रती कितवः स्तेनः प्राणिविक्रयिको वणिक् । सनिष्कृतिः पुनः सोमं पीतवान्केतनक्षमः ॥

avratī kitavaḥ stenaḥ prāṇivikrayiko vaṇik | saniṣkṛtiḥ punaḥ somaṃ pītavānketanakṣamaḥ

व्रतभंग करने वाला, जुआरी, चोर, प्राणियों का विक्रेता, व्यापारी, यदि उसने प्रायश्चित्त कर लिया हो और उसके बाद सोमपान किया हो, तो वह निमन्त्रण के योग्य है।

श्लोक 31 (13.61.31)

अर्जयित्वा धनं पूर्वं दारुणैरपि कर्मभिः । भवेत्सर्वातिथिः पश्चात्स राजन्केतनक्षमः ॥

arjayitvā dhanaṃ pūrvaṃ dāruṇairapi karmabhiḥ | bhavetsarvātithiḥ paścātsa rājanketanakṣamaḥ

जिसने पहले कठोर कर्मों से भी धन कमाया हो और बाद में सब अतिथियों का सत्कार करने वाला बन जाए, हे राजन्, वह निमन्त्रण के योग्य है।

श्लोक 32 (13.61.32)

ब्रह्मविक्रयनिर्दिष्टं स्त्रिया यच्चार्जितं धनम् । अदेयं पितृविप्रेभ्यो यच्च क्लैब्यादुपार्जितम् ॥

brahmavikrayanirdiṣṭaṃ striyā yaccārjitaṃ dhanam | adeyaṃ pitṛviprebhyo yacca klaibyādupārjitam

वेद बेचकर कमाया हुआ धन, स्त्री के द्वारा कमाया हुआ धन और दीन-हीन वचन आदि कायरता के उपायों से प्राप्त धन पितरों और ब्राह्मणों को नहीं देना चाहिए।

श्लोक 33 (13.61.33)

क्रियमाणेऽपवर्गे च यो द्विजो भरतर्षभ । न व्याहरति यद्युक्तं तस्याधर्मो गवानृतम् ॥

kriyamāṇe'pavarge ca yo dvijo bharatarṣabha | na vyāharati yadyuktaṃ tasyādharmo gavānṛtam

हे भरतश्रेष्ठ, श्राद्ध की समाप्ति के समय जो द्विज उचित वचन नहीं बोलता, उसे गाय के विषय में असत्य बोलने का पाप लगता है।

श्लोक 34 (13.61.34)

श्राद्धस्य ब्राह्मणः कालः प्राप्तं दधि घृतं तथा । सोमक्षयश्च मांसं च यदारण्यं युधिष्ठिर ॥

śrāddhasya brāhmaṇaḥ kālaḥ prāptaṃ dadhi ghṛtaṃ tathā | somakṣayaśca māṃsaṃ ca yadāraṇyaṃ yudhiṣṭhira

हे युधिष्ठिर, श्राद्ध का समय ब्राह्मण का उपस्थित होना है; और वह भी जब दही और घी प्राप्त हो जाएँ, अमावस्या हो, और जंगली पशु का मांस मिल जाए।

श्लोक 35 (13.61.35)

मुहूर्तानां त्रयं पूर्वमह्नः प्रातरिति स्मृतम् । जपध्यानादिभिस्तस्मिन्विप्रैः कार्यं शुभव्रतम् ॥

muhūrtānāṃ trayaṃ pūrvamahnaḥ prātariti smṛtam | japadhyānādibhistasminvipraiḥ kāryaṃ śubhavratam

दिन के पहले तीन मुहूर्त प्रातःकाल कहे गए हैं। उस समय ब्राह्मणों को जप और ध्यान आदि के द्वारा शुभ अनुष्ठान करना चाहिए।

श्लोक 36 (13.61.36)

सङ्गवाख्यं त्रिभागं तु मध्याह्नस्त्रिमुहूर्तकः । लौकिकं सङ्गवेऽर्धं च स्नानादि ह्यथ मध्यमे ॥

saṅgavākhyaṃ tribhāgaṃ tu madhyāhnastrimuhūrtakaḥ | laukikaṃ saṅgave'rdhaṃ ca snānādi hyatha madhyame

अगला तिहाई भाग सङ्गव कहलाता है; मध्याह्न तीन मुहूर्त का होता है। लौकिक कार्य सङ्गव के आधे भाग में होता है और स्नान आदि बीच के समय में।

श्लोक 37 (13.61.37)

चतुर्थमपराह्णं तु त्रिमुहूर्तं तु पित्र्यकम् । सायाह्नस्त्रिमुहूर्तं च मध्यमं कविभिः स्मृतम् ॥

caturthamaparāhṇaṃ tu trimuhūrtaṃ tu pitryakam | sāyāhnastrimuhūrtaṃ ca madhyamaṃ kavibhiḥ smṛtam

चौथा भाग अपराह्न है, जो तीन मुहूर्त का है और पितरों के लिए है; तीन मुहूर्त की सायंकाल को विद्वानों ने मध्यम कहा है।

श्लोक 38 (13.61.38)

चतुर्थ त्वपराह्णाख्ये श्राद्धं कुर्यात्सदा नृप ॥

caturtha tvaparāhṇākhye śrāddhaṃ kuryātsadā nṛpa

हे राजन्, श्राद्ध सदा चौथे भाग में करना चाहिए, जिसे अपराह्न कहते हैं।

श्लोक 39 (13.61.39)

प्रागुदीचीमुखा विप्राः विश्वेदेवे च दक्षिणाः । श्रावितेषु सुतृप्तेषु पिण्डं दद्यात्सदक्षिणम् ॥

prāgudīcīmukhā viprāḥ viśvedeve ca dakṣiṇāḥ | śrāviteṣu sutṛpteṣu piṇḍaṃ dadyātsadakṣiṇam

ब्राह्मण पूर्व या उत्तर की ओर मुख करें, और विश्वेदेवों के कर्म में दक्षिण वाले। जब वे सुन चुके हों और भली-भाँति तृप्त हो जाएँ, तब दक्षिणा के साथ पिण्ड दे।

श्लोक 40 (13.61.40)

श्राद्धापवर्गे विप्रस्य दातारो वोऽस्त्वितीरयेत् । क्षत्रियस्यापि यो ब्रूयात्प्रीयन्तां पितरस्त्विति ॥

śrāddhāpavarge viprasya dātāro vo'stvitīrayet | kṣatriyasyāpi yo brūyātprīyantāṃ pitarastviti

श्राद्ध की समाप्ति पर ब्राह्मण से कहे, "आपको दाता मिलें"; और क्षत्रिय से भी कहे, "पितर प्रसन्न हों।"

श्लोक 41 (13.61.41)

अपवर्गे तु वैश्यस्य श्राद्धकर्मणि भारत । अक्षय्यमभिधातव्यं स्वस्ति शूद्रस्य भारत ॥

apavarge tu vaiśyasya śrāddhakarmaṇi bhārata | akṣayyamabhidhātavyaṃ svasti śūdrasya bhārata

हे भारत, वैश्य के श्राद्धकर्म की समाप्ति पर "अक्षय हो" कहना चाहिए और शूद्र के लिए "कल्याण हो", हे भारत।

श्लोक 42 (13.61.42)

पुण्याहवाचनं दैवं ब्राह्मणस्य विधीयते । एतदेव निरोङ्कारं क्षत्रियस्य विधीयते ॥

puṇyāhavācanaṃ daivaṃ brāhmaṇasya vidhīyate | etadeva niroṅkāraṃ kṣatriyasya vidhīyate

देवकर्म में ब्राह्मण के लिए "पुण्याह हो" का वचन विहित है; क्षत्रिय के लिए यही वचन ओंकार के बिना विहित है।

श्लोक 43 (13.61.43)

वैश्यस्य दैवे वक्तव्यं प्रीयन्तां देवता इति । गोहिंसायां चतुर्भागं पूर्वं विप्रादिकेतनः ॥

vaiśyasya daive vaktavyaṃ prīyantāṃ devatā iti | gohiṃsāyāṃ caturbhāgaṃ pūrvaṃ viprādiketanaḥ

वैश्य के लिए देवकर्म में "देवता प्रसन्न हों" कहना चाहिए। गोहिंसा के विषय में चौथा भाग, जहाँ निमन्त्रण पहले ब्राह्मण आदि को दिया गया हो।

श्लोक 44 (13.61.44)

वर्णावरेषु भुञ्जानं क्रमाच्छूद्रे चतुर्गुणम् । नान्यत्र ब्राह्मणो ब्रूयात्पूर्वं विप्रेण केतितः ॥

varṇāvareṣu bhuñjānaṃ kramācchūdre caturguṇam | nānyatra brāhmaṇo brūyātpūrvaṃ vipreṇa ketitaḥ

निम्न वर्णों के बीच भोजन करने का दोष क्रम से बढ़ता है; शूद्र के विषय में वह चौगुना है। जिस ब्राह्मण को पहले ब्राह्मण ने निमन्त्रित किया हो, वह अन्यत्र भोजन के लिए सहमति न दे।

श्लोक 45 (13.61.45)

अभोजने च दोषः स्याद्वर्जयेच्छूद्रकेतनम् । शूद्रान्नरसपुष्टाङ्गो द्विजो नोर्ध्वां गतिं लभेत् ॥

abhojane ca doṣaḥ syādvarjayecchūdraketanam | śūdrānnarasapuṣṭāṅgo dvijo nordhvāṃ gatiṃ labhet

निमन्त्रण पाकर भोजन न करने में भी दोष है; फिर भी शूद्र का निमन्त्रण छोड़ देना चाहिए। जिस द्विज का शरीर शूद्र के अन्न के रस से पुष्ट होता है, वह ऊर्ध्व गति नहीं पाता।

श्लोक 46 (13.61.46)

अशुचिर्नैव चाश्नीयान्नास्तिको मानवर्जितः । न पूर्वं लङ्घयेल्लोभादेकवर्णोऽपि पार्थिव ॥

aśucirnaiva cāśnīyānnāstiko mānavarjitaḥ | na pūrvaṃ laṅghayellobhādekavarṇo'pi pārthiva

अपवित्र मनुष्य भोजन न करे, न नास्तिक, न मानहीन। लोभ से पहले के निमन्त्रण का उल्लंघन न करे, चाहे दूसरा निमन्त्रण करने वाला अपने ही वर्ण का हो, हे राजन्।

श्लोक 47 (13.61.47)

विप्राः स्मृता भूमिदेवा उपकुर्वाणवर्जिताः । कर्मणामानुपूर्व्येण विधिपूर्वं कृतं शृणु ॥

viprāḥ smṛtā bhūmidevā upakurvāṇavarjitāḥ | karmaṇāmānupūrvyeṇa vidhipūrvaṃ kṛtaṃ śṛṇu

उपकुर्वाण को छोड़कर ब्राह्मण पृथ्वी के देवता माने गए हैं। अब कर्मों को उनके क्रम से, विधिपूर्वक किए जाने के अनुसार सुनो।

श्लोक 48 (13.61.48)

जातकर्मादिकाः सर्वास्त्रिषु वर्णेषु भारत । ब्रह्मक्षत्रे हि मन्त्रोक्ता वैश्यस्य च युधिष्ठिर ॥

jātakarmādikāḥ sarvāstriṣu varṇeṣu bhārata | brahmakṣatre hi mantroktā vaiśyasya ca yudhiṣṭhira

हे भारत, जातकर्म आदि सभी संस्कार तीनों वर्णों के हैं; ब्राह्मण और क्षत्रिय के लिए वे मन्त्रों के साथ कहे गए हैं और वैश्य के लिए भी, हे युधिष्ठिर।

श्लोक 49 (13.61.49)

विप्रस्य रशना मौञ्जी मौर्वी राजन्यगामिनी । बाल्वजी ह्येव वैश्यस्य धर्म एष युधिष्ठिर ॥

viprasya raśanā mauñjī maurvī rājanyagāminī | bālvajī hyeva vaiśyasya dharma eṣa yudhiṣṭhira

ब्राह्मण की मेखला मूँज की, क्षत्रिय की धनुष की डोरी जैसी मूर्वा की और वैश्य की बल्बज घास की होती है; हे युधिष्ठिर, यही धर्म है।

श्लोक 50 (13.61.50)

पालाशो द्विजदण्डः स्यादश्वत्थः क्षत्रियस्य तु । औदुम्बरश्च वैश्यस्य धर्म एष युधिष्ठिर ॥

pālāśo dvijadaṇḍaḥ syādaśvatthaḥ kṣatriyasya tu | audumbaraśca vaiśyasya dharma eṣa yudhiṣṭhira

द्विज का दण्ड पलाश का, क्षत्रिय का पीपल का और वैश्य का गूलर का होना चाहिए; हे युधिष्ठिर, यही धर्म है।

श्लोक 51 (13.61.51)

दातुः प्रतिग्रहीतुश्च धर्माधर्माविमौ शृणु । ब्राह्मणस्यानृतेऽधर्मः प्रोक्तः पातकसंज्ञितः । चतुर्गुणः क्षत्रियस्य वैश्यस्याष्टगुणः स्मृतः ॥

dātuḥ pratigrahītuśca dharmādharmāvimau śṛṇu | brāhmaṇasyānṛte'dharmaḥ proktaḥ pātakasaṃjñitaḥ | caturguṇaḥ kṣatriyasya vaiśyasyāṣṭaguṇaḥ smṛtaḥ

अब दाता और ग्रहण करने वाले के धर्म और अधर्म को सुनो। इस विषय में असत्य का पाप ब्राह्मण के लिए पातक नाम का कहा गया है; क्षत्रिय के लिए वह चौगुना और वैश्य के लिए आठगुना माना गया है।

श्लोक 52 (13.61.52)

नान्यत्र ब्राह्मणोऽश्नीयात्पूर्वं विप्रेण केतितः । यवीयान्पशुहिंसायां तुल्यधर्मा भवेत्स हि ॥

nānyatra brāhmaṇo'śnīyātpūrvaṃ vipreṇa ketitaḥ | yavīyānpaśuhiṃsāyāṃ tulyadharmā bhavetsa hi

ब्राह्मण ने पहले जिसे निमन्त्रित किया हो, वह ब्राह्मण अन्यत्र भोजन न करे। पशुहिंसा में छोटा भी समान दोष का भागी होता है।

श्लोक 53 (13.61.53)

तथा राजन्यवैश्याभ्यां यद्यश्नीयात्तु केतितः । यवीयान्पशुहिंसायां भागार्धं समवाप्नुयात् ॥

tathā rājanyavaiśyābhyāṃ yadyaśnīyāttu ketitaḥ | yavīyānpaśuhiṃsāyāṃ bhāgārdhaṃ samavāpnuyāt

इसी प्रकार यदि क्षत्रिय या वैश्य से निमन्त्रित होकर वह भोजन करे, तो पशुहिंसा में छोटा आधे भाग का दोषी होता है।

श्लोक 54 (13.61.54)

दैवं वाऽप्यथवा पित्र्यं योऽश्नीयाद्ब्राह्मणादिषु । अस्नातो ब्राह्मणो राजंस्तस्याधर्मोऽनृतं स्मृतम् ॥

daivaṃ vā'pyathavā pitryaṃ yo'śnīyādbrāhmaṇādiṣu | asnāto brāhmaṇo rājaṃstasyādharmo'nṛtaṃ smṛtam

हे राजन्, जो अस्नात ब्राह्मण देवकर्म या पितृकर्म में ब्राह्मणों आदि के बीच भोजन करे, उसका अधर्म असत्य का पाप कहा गया है।

श्लोक 55 (13.61.55)

आशौचो ब्राह्मणो राजन्योऽश्नीयाद्ब्राह्मणादिषु । ज्ञानपूर्वमथो लोभात्तस्याधर्मो गवानृतम् ॥

āśauco brāhmaṇo rājanyo'śnīyādbrāhmaṇādiṣu | jñānapūrvamatho lobhāttasyādharmo gavānṛtam

जो ब्राह्मण जन्म या मरण के अशौच में हो और जानकर या लोभ से ब्राह्मणों आदि के बीच भोजन करे, उसे गाय के विषय में असत्य का पाप लगता है।

श्लोक 56 (13.61.56)

अर्थेनान्येन यो लिप्सेत्कर्मार्थं चैव भारत । आमन्त्रयति राजेन्द्र तस्याधर्मोऽनृतं स्मृतम् ॥

arthenānyena yo lipsetkarmārthaṃ caiva bhārata | āmantrayati rājendra tasyādharmo'nṛtaṃ smṛtam

हे भारत, जो किसी दूसरे प्रयोजन से धन चाहता है, या हे राजेन्द्र, कर्म के बहाने दाता को सम्बोधित करता है, उसका अधर्म असत्य का पाप कहा गया है।

श्लोक 57 (13.61.57)

अवेदव्रतचारित्रास्त्रिभिर्वर्णैर्युधिष्ठिर । मन्त्रवत्परिविष्यन्ते तस्याधर्मो गवानृतम् ॥

avedavratacāritrāstribhirvarṇairyudhiṣṭhira | mantravatpariviṣyante tasyādharmo gavānṛtam

हे युधिष्ठिर, जब वेदाध्ययन, व्रत और आचरण से रहित लोगों को तीनों वर्णों के लोग मन्त्रों के साथ भोजन परोसते हैं, तब उस पर गाय के विषय में असत्य का पाप लगता है।

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