अनुशासन पर्व · अध्याय 60
दान का पात्र कौन है
युधिष्ठिर भीष्म से पूछते हैं कि दान का पात्र कौन है। भीष्म कहते हैं कि अपनी वृत्ति में स्थित ब्राह्मण को, चिह्न वाला हो या बिना चिह्न का, दान दिया जा सकता है, और श्रद्धा दाता को पवित्र करती है, यद्यपि पितरों के कव्य में सावधानी चाहिए। वे पृथ्वी, कश्यप, अग्नि और मार्कण्डेय के आचरण और सत्य विषयक वचन सुनाते हैं, फिर धर्म के लक्षण बताते हैं, धर्म की प्रशंसा करके भी उसका आचरण न करने वालों को दान देने से सावधान करते हैं, और उन साधु ब्राह्मणों का वर्णन करते हैं जिन्हें दिया हुआ दान महान फल देता है; ऐसा एक ब्राह्मण भी पूरे कुल का उद्धार कर सकता है।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (13.60.1)
किमाहुर्भरतश्रेष्ठ पात्रं विप्राः सनातनम् । ब्राह्मणं लिङ्गिनं चैव ब्राह्मणं वाऽप्यलिङ्गिनम् ॥
kimāhurbharataśreṣṭha pātraṃ viprāḥ sanātanam | brāhmaṇaṃ liṅginaṃ caiva brāhmaṇaṃ vā'pyaliṅginam
हे भरतश्रेष्ठ, ब्राह्मण लोग सनातन पात्र किसे कहते हैं — चिह्न धारण करने वाले ब्राह्मण को या बिना चिह्न वाले ब्राह्मण को?
भीष्म उवाच
श्लोक 2 (13.60.2)
स्ववृत्तिमभिपन्नाय लिङ्गिने चेतराय च । देयमाहुर्महाराज उभावेतौ तपस्विनौ ॥
svavṛttimabhipannāya liṅgine cetarāya ca | deyamāhurmahārāja ubhāvetau tapasvinau
हे महाराज, जो अपनी वृत्ति में स्थित हो, चाहे चिह्नधारी हो या दूसरा, उसे दान देना चाहिए, ऐसा कहा जाता है; क्योंकि वे दोनों तपस्वी हैं।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 3 (13.60.3)
श्रद्धया परयाऽपूतो यः प्रयच्छेद्द्विजातये । हव्यं कव्यं तथा दानं को दोषः स्यात्पितामह ॥
śraddhayā parayā'pūto yaḥ prayaccheddvijātaye | havyaṃ kavyaṃ tathā dānaṃ ko doṣaḥ syātpitāmaha
पितामह, यदि कोई अपवित्र मनुष्य भी परम श्रद्धा के साथ किसी द्विज को हव्य, कव्य अथवा दान दे, तो उसमें क्या दोष होगा?
भीष्म उवाच
श्लोक 4 (13.60.4)
श्रद्धापूतो नरस्तात दुर्दान्तोऽपि न संशयः । पूतो भवति सर्वत्र किमुत त्वं महाद्युते ॥
śraddhāpūto narastāta durdānto'pi na saṃśayaḥ | pūto bhavati sarvatra kimuta tvaṃ mahādyute
श्रद्धा से पवित्र हुआ मनुष्य, दुर्दम होने पर भी, निःसन्देह सर्वत्र पवित्र हो जाता है; फिर हे महाद्युते, तुम्हारे विषय में तो कहना ही क्या।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 5 (13.60.5)
न ब्राह्मणं परिक्षेत दैवेषु सततं नरः । कव्यप्रदाने तु बुधाः परीक्ष्यं ब्राह्मणं विदुः ॥
na brāhmaṇaṃ parikṣeta daiveṣu satataṃ naraḥ | kavyapradāne tu budhāḥ parīkṣyaṃ brāhmaṇaṃ viduḥ
देवकर्मों में मनुष्य को ब्राह्मण की सदा परीक्षा नहीं करनी चाहिए; परन्तु पितरों को कव्य देने में विद्वान ब्राह्मण की परीक्षा करने योग्य बताते हैं।
भीष्म उवाच
श्लोक 6 (13.60.6)
न ब्राह्मणः साधयते हव्यं दैवात्प्रसिद्ध्यति । देवप्रसादादिज्यन्ते यजमानैर्न संशयः ॥
na brāhmaṇaḥ sādhayate havyaṃ daivātprasiddhyati | devaprasādādijyante yajamānairna saṃśayaḥ
हव्य को ब्राह्मण सिद्ध नहीं करता; वह दैव से सिद्ध होता है। यजमानों द्वारा देवताओं का यजन देवताओं की कृपा से ही होता है, इसमें सन्देह नहीं।
श्लोक 7 (13.60.7)
ब्राह्मणान्भरतश्रेष्ठ सततं ब्रह्मवादिनः । मार्कण्डेयः पुरा प्राह इति लोकेषु बुद्धिमान् । ब्राह्मणाः पात्रभूताश्च शुद्धा नैवं पितृष्विह ॥
brāhmaṇānbharataśreṣṭha satataṃ brahmavādinaḥ | mārkaṇḍeyaḥ purā prāha iti lokeṣu buddhimān | brāhmaṇāḥ pātrabhūtāśca śuddhā naivaṃ pitṛṣviha
हे भरतश्रेष्ठ, सदा ब्रह्म का प्रतिपादन करने वाले ब्राह्मणों के विषय में बुद्धिमान मार्कण्डेय ने पूर्वकाल में ऐसा कहा था, जैसा लोकों में प्रसिद्ध है। ब्राह्मण पात्र-स्वरूप और शुद्ध हैं, परन्तु यहाँ पितरों के कर्म में ऐसा नहीं।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 8 (13.60.8)
अपूर्वोऽप्यथवा विद्वान्सम्बन्धी वा यथा भवेत् । तपस्वी यज्ञशीलो वा कथं पात्रं भवेत्तु सः ॥
apūrvo'pyathavā vidvānsambandhī vā yathā bhavet | tapasvī yajñaśīlo vā kathaṃ pātraṃ bhavettu saḥ
चाहे वह अपरिचित हो, विद्वान हो या सम्बन्धी हो, जैसा भी हो, तपस्वी हो या यज्ञशील — वह पात्र कैसे बनता है?
भीष्म उवाच
श्लोक 9 (13.60.9)
कुलीनः कर्मकृद्वैद्यस्तथैवाप्यनृशंस्यवान् । ह्रीमानृजुः सत्यवादी पात्रं पूर्वे च ये त्रयः ॥
kulīnaḥ karmakṛdvaidyastathaivāpyanṛśaṃsyavān | hrīmānṛjuḥ satyavādī pātraṃ pūrve ca ye trayaḥ
कुलीन, कर्म करने वाला, वेद का ज्ञाता, दयालु, लज्जाशील, सरल और सत्यवादी — ये सात, तथा पहले कहे हुए तीन, पात्र हैं।
श्लोक 10 (13.60.10)
तत्रेमं शृणु मे पार्थ चतुर्णां तेजसां मतम् । पृथिव्याः काश्यपस्याग्नेर्मार्कण्डेयस्य चैव हि ॥
tatremaṃ śṛṇu me pārtha caturṇāṃ tejasāṃ matam | pṛthivyāḥ kāśyapasyāgnermārkaṇḍeyasya caiva hi
हे पार्थ, इस विषय में चार तेजस्वियों का मत मुझसे सुनो: पृथ्वी का, कश्यप का, अग्नि का और मार्कण्डेय का।
पृथिव्युवाच
श्लोक 11 (13.60.11)
यथा महार्णवे क्षिप्तः क्षिप्रं नेष्टुर्विनश्यति । तथा दुश्चरितं सर्वं त्रयीनित्ये निमज्जति ॥
yathā mahārṇave kṣiptaḥ kṣipraṃ neṣṭurvinaśyati | tathā duścaritaṃ sarvaṃ trayīnitye nimajjati
जैसे महासागर में फेंका हुआ मिट्टी का ढेला शीघ्र गल जाता है, वैसे ही त्रयी (तीनों वेदों) में नित्य स्थित रहने वाले में सारा दुराचार डूब जाता है।
काश्यप उवाच
श्लोक 12 (13.60.12)
सर्वे च वेदाः सह षड्भिरङ्गैः । साङ्ख्यं पुराणं च कुले च जन्म । नैतानि सर्वाणि गतिर्भवन्ति । शीलव्यपेतस्य नृप द्विजस्य ॥
sarve ca vedāḥ saha ṣaḍbhiraṅgaiḥ | sāṅkhyaṃ purāṇaṃ ca kule ca janma | naitāni sarvāṇi gatirbhavanti | śīlavyapetasya nṛpa dvijasya
छहों अंगों सहित सब वेद, साङ्ख्य, पुराण और उत्तम कुल में जन्म — हे राजन्, शील से रहित द्विज के लिए ये सब गति नहीं बनते।
अग्निरुवाच
श्लोक 13 (13.60.13)
अधीयानः पण्डितम्मन्यमानो । यो विद्यया हन्ति यशः परेषाम् । ब्रह्मन्स तेन लभते ब्रह्मवध्यां । लोकास्तस्य ह्यन्तवन्तो भवन्ति ॥
adhīyānaḥ paṇḍitammanyamāno | yo vidyayā hanti yaśaḥ pareṣām | brahmansa tena labhate brahmavadhyāṃ | lokāstasya hyantavanto bhavanti
जो पढ़ने वाला अपने को पण्डित मानकर अपनी विद्या से दूसरों का यश नष्ट करता है, हे ब्राह्मण, वह उसी से ब्रह्महत्या का भागी होता है, और उसके लोक अन्त वाले हो जाते हैं।
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 14 (13.60.14)
अश्वमेधसहस्रं च सत्यं च तुलया धृतम् । नाभिजानामि यज्ञं तु सत्यस्यार्धमवाप्नुयात् ॥
aśvamedhasahasraṃ ca satyaṃ ca tulayā dhṛtam | nābhijānāmi yajñaṃ tu satyasyārdhamavāpnuyāt
एक हज़ार अश्वमेध यज्ञ और सत्य को तराज़ू पर तौला गया। मैं ऐसा कोई यज्ञ नहीं जानता जो सत्य के आधे तक भी पहुँचे।
भीष्म उवाच
श्लोक 15 (13.60.15)
इत्युक्त्वा ते जग्मुराशु चत्वारोऽमिततेजसः । पृथिवी काश्यपोऽग्निश्च प्रकृष्टायुश्च भार्गवः ॥
ityuktvā te jagmurāśu catvāro'mitatejasaḥ | pṛthivī kāśyapo'gniśca prakṛṣṭāyuśca bhārgavaḥ
यह कहकर वे चारों अपार तेज वाले शीघ्र चले गए — पृथ्वी, कश्यप, अग्नि और दीर्घायु भार्गव।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 16 (13.60.16)
यदि ते ब्राह्मणा लोके व्रतिनो भुञ्जते हविः । दत्तं ब्राह्मणकामाय कथं तत्सुकृतं भवेत् ॥
yadi te brāhmaṇā loke vratino bhuñjate haviḥ | dattaṃ brāhmaṇakāmāya kathaṃ tatsukṛtaṃ bhavet
यदि संसार में व्रत का पालन करने वाले वे ब्राह्मण हविष्य खाते हैं, तो ब्राह्मणों की कामना से दिया हुआ दान पुण्यकारी कैसे हो सकता है?
भीष्म उवाच
श्लोक 17 (13.60.17)
आदिष्टिनो ये राजेन्द्र ब्राह्मणा वेदपारगाः । भुञ्जते ब्रह्मकामाय व्रतलुप्ता भवन्ति ते ॥
ādiṣṭino ye rājendra brāhmaṇā vedapāragāḥ | bhuñjate brahmakāmāya vrataluptā bhavanti te
हे राजेन्द्र, जो वेदपारगामी ब्राह्मण गुरु की आज्ञा से व्रत में स्थित हैं, वे यदि ब्राह्मण चाहने वाले के लिए भोजन करते हैं तो उनका व्रत टूट जाता है।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 18 (13.60.18)
अनेकान्तं बहुद्वारं धर्ममाहुर्मनीषिणः । किं निमित्तं भवेदत्र तन्मे ब्रूहि पितामह ॥
anekāntaṃ bahudvāraṃ dharmamāhurmanīṣiṇaḥ | kiṃ nimittaṃ bhavedatra tanme brūhi pitāmaha
बुद्धिमान कहते हैं कि धर्म के अनेक अन्त और अनेक द्वार हैं। इसमें निश्चायक कारण क्या है? पितामह, मुझे वह बताइए।
भीष्म उवाच
श्लोक 19 (13.60.19)
अहिंसा सत्यमक्रोध आनृशंस्यं दमस्तथा । आर्जवं चैव राजेन्द्र निश्चितं धर्मलक्षणम् ॥
ahiṃsā satyamakrodha ānṛśaṃsyaṃ damastathā | ārjavaṃ caiva rājendra niścitaṃ dharmalakṣaṇam
हे राजेन्द्र, अहिंसा, सत्य, क्रोध का अभाव, दया, इन्द्रिय-संयम और सरलता — ये धर्म के निश्चित लक्षण हैं।
श्लोक 20 (13.60.20)
ये तु धर्मं प्रशंसन्तश्चरन्ति पृथिवीमिमाम् । अनाचरन्तस्तद्धर्मं सङ्करेऽभिरताः प्रभो ॥
ye tu dharmaṃ praśaṃsantaścaranti pṛthivīmimām | anācarantastaddharmaṃ saṅkare'bhiratāḥ prabho
परन्तु हे प्रभो, जो धर्म की प्रशंसा करते हुए इस पृथ्वी पर घूमते हैं, उसका आचरण नहीं करते और मिश्रण (सङ्कर) में रमे रहते हैं —
श्लोक 21 (13.60.21)
तेभ्यो हिरण्यं रत्नं वा गामश्वं वा ददाति यः । दशवर्षाणि विष्ठां स भुङ्क्ते निरयमास्थितः ॥
tebhyo hiraṇyaṃ ratnaṃ vā gāmaśvaṃ vā dadāti yaḥ | daśavarṣāṇi viṣṭhāṃ sa bhuṅkte nirayamāsthitaḥ
उन्हें जो सोना, रत्न, गाय या घोड़ा देता है, वह नरक में स्थित होकर दस वर्ष तक विष्ठा खाता है।
श्लोक 22 (13.60.22)
धनेन पुल्कसानां च तथैवान्तेवसायिनाम् । कृतं कर्माकृतं वाऽपि रागमोहेन जल्पताम् ॥
dhanena pulkasānāṃ ca tathaivāntevasāyinām | kṛtaṃ karmākṛtaṃ vā'pi rāgamohena jalpatām
इसी प्रकार पुल्कसों और अन्तेवसायियों को दिए धन के विषय में भी, जो राग और मोह से किए और न किए हुए कर्मों की बकवास करते हैं।
श्लोक 23 (13.60.23)
वैश्वदेवं च ये मूढा विप्राय ब्रह्मचारिणे । न ददन्तीह राजेन्द्र ते लोकान्भुञ्जतेऽशुभान् ॥
vaiśvadevaṃ ca ye mūḍhā viprāya brahmacāriṇe | na dadantīha rājendra te lokānbhuñjate'śubhān
और हे राजेन्द्र, जो मूढ़ यहाँ ब्रह्मचारी ब्राह्मण को वैश्वदेव का भाग नहीं देते, वे अशुभ लोकों को भोगते हैं।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 24 (13.60.24)
किं परं ब्रह्मचर्यं च किं परं धर्मलक्षणम् । किञ्च श्रेष्ठतमं शौचं तन्मे ब्रूहि पितामह ॥
kiṃ paraṃ brahmacaryaṃ ca kiṃ paraṃ dharmalakṣaṇam | kiñca śreṣṭhatamaṃ śaucaṃ tanme brūhi pitāmaha
सर्वोच्च ब्रह्मचर्य क्या है, धर्म का सर्वोच्च लक्षण क्या है और सबसे श्रेष्ठ शुद्धि क्या है? पितामह, मुझे बताइए।
भीष्म उवाच
श्लोक 25 (13.60.25)
ब्रह्मचर्यं परं तात मधुमांसस्य वर्जनम् । मर्यादायां स्थितो धर्मः शमः शौचस्य लक्षणम् ॥
brahmacaryaṃ paraṃ tāta madhumāṃsasya varjanam | maryādāyāṃ sthito dharmaḥ śamaḥ śaucasya lakṣaṇam
हे तात, परम ब्रह्मचर्य मधु और मांस का त्याग है। मर्यादा में स्थित रहना धर्म है; शान्ति शुद्धि का लक्षण है।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 26 (13.60.26)
कस्मिन्काले चरेद्धर्मं कस्मिन्कालेऽर्थमाचरेत् । कस्मिन्काले सुखी च स्यात्तन्मे ब्रूहि पितामह ॥
kasminkāle careddharmaṃ kasminkāle'rthamācaret | kasminkāle sukhī ca syāttanme brūhi pitāmaha
किस समय धर्म का आचरण करे, किस समय अर्थ का, और किस समय सुखी रहे? पितामह, मुझे यह बताइए।
भीष्म उवाच
श्लोक 27 (13.60.27)
काल्यमर्थं निषेवेत ततो धर्ममनन्तरम् । पश्चात्कामं निषेवेत न च गच्छेत्प्रसङ्गिताम् ॥
kālyamarthaṃ niṣeveta tato dharmamanantaram | paścātkāmaṃ niṣeveta na ca gacchetprasaṅgitām
प्रातः काल अर्थ का सेवन करे, उसके तुरन्त बाद धर्म का; उसके पश्चात् काम का सेवन करे, पर उसमें आसक्त न हो।
श्लोक 28 (13.60.28)
ब्राह्मणांश्चैव मन्येत गुरूंश्चाप्यभिपूजयेत् । सर्वभूतानुलोमश्च मृदुशीलः प्रियंवदः ॥
brāhmaṇāṃścaiva manyeta gurūṃścāpyabhipūjayet | sarvabhūtānulomaśca mṛduśīlaḥ priyaṃvadaḥ
ब्राह्मणों का सम्मान करे और गुरुओं का पूजन करे; सब प्राणियों के अनुकूल, कोमल स्वभाव वाला और मधुरभाषी हो।
श्लोक 29 (13.60.29)
अधिकारे यदनृतं यच्च राजसु पैशुनम् । गुरोश्चालीकनिर्बन्धः समानि ब्रह्महत्यया ॥
adhikāre yadanṛtaṃ yacca rājasu paiśunam | guroścālīkanirbandhaḥ samāni brahmahatyayā
अधिकार के पद पर रहते हुए बोला गया झूठ, राजाओं की चुगली, और गुरु के विरुद्ध झूठा हठ — ये ब्रह्महत्या के समान हैं।
श्लोक 30 (13.60.30)
प्रहरेन्न नरेन्द्रेषु न हन्याद्गां तथैव च । भ्रूणहत्यासमं चैतदुभयं यो निषेवते ॥
praharenna narendreṣu na hanyādgāṃ tathaiva ca | bhrūṇahatyāsamaṃ caitadubhayaṃ yo niṣevate
राजाओं पर प्रहार न करे और गाय को न मारे; जो इन दोनों में से कोई एक भी करता है वह भ्रूणहत्या के समान है।
श्लोक 31 (13.60.31)
नाग्निं परित्यजेज्जातु न च वेदान्परित्यजेत् । न च ब्राह्मणमाक्रोशेत्समं तद्ब्रह्महत्यया ॥
nāgniṃ parityajejjātu na ca vedānparityajet | na ca brāhmaṇamākrośetsamaṃ tadbrahmahatyayā
कभी अग्नि का त्याग न करे, वेदों का त्याग न करे, और ब्राह्मण को गाली न दे; इनमें से हर एक ब्रह्महत्या के समान है।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 32 (13.60.32)
कीदृशाः साधवो विप्राः केभ्यो दत्तं महाफलम् । कीदृशानां च भोक्तव्यं तन्मे ब्रूहि पितामह ॥
kīdṛśāḥ sādhavo viprāḥ kebhyo dattaṃ mahāphalam | kīdṛśānāṃ ca bhoktavyaṃ tanme brūhi pitāmaha
कैसे ब्राह्मण साधु हैं, किन्हें दिया हुआ दान महान फल देता है, और किनके लिए भोजन कराना उचित है? पितामह, मुझे बताइए।
भीष्म उवाच
श्लोक 33 (13.60.33)
अक्रोधना धर्मपराः सत्यनित्या दमे रताः । तादृशाः साधवो विप्रास्तेभ्यो दत्तं महाफलम् ॥
akrodhanā dharmaparāḥ satyanityā dame ratāḥ | tādṛśāḥ sādhavo viprāstebhyo dattaṃ mahāphalam
जो क्रोध से रहित, धर्म में तत्पर, सदा सत्यनिष्ठ और संयम में रत हैं, ऐसे ब्राह्मण साधु हैं; उन्हें दिया हुआ दान महान फल देता है।
श्लोक 34 (13.60.34)
अमानिनः सर्वसहा दृढार्था विजितेन्द्रियाः । सर्वभूतहिता मैत्रास्तेभ्यो दत्तं महाफलम् ॥
amāninaḥ sarvasahā dṛḍhārthā vijitendriyāḥ | sarvabhūtahitā maitrāstebhyo dattaṃ mahāphalam
जो मानरहित, सब कुछ सहने वाले, दृढ़ निश्चय वाले, जितेन्द्रिय, सब प्राणियों के हितैषी और मित्रभाव वाले हैं, उन्हें दिया हुआ दान महान फल देता है।
श्लोक 35 (13.60.35)
अलुब्धाः शुचयो वैद्या ह्रीमन्तः सत्यवादिनः । स्वकर्मनिरता ये च तेभ्यो दत्तं महाफलम् ॥
alubdhāḥ śucayo vaidyā hrīmantaḥ satyavādinaḥ | svakarmaniratā ye ca tebhyo dattaṃ mahāphalam
जो लोभरहित, पवित्र, विद्वान, लज्जाशील, सत्यवादी और अपने कर्मों में लगे रहने वाले हैं, उन्हें दिया हुआ दान महान फल देता है।
श्लोक 36 (13.60.36)
साङ्गांश्च चतुरो वेदानधीते यो द्विजर्षभः । षड्भ्यः प्रवृत्तः कर्मभ्यस्तं पात्रमृषयो विदुः ॥
sāṅgāṃśca caturo vedānadhīte yo dvijarṣabhaḥ | ṣaḍbhyaḥ pravṛttaḥ karmabhyastaṃ pātramṛṣayo viduḥ
जो द्विजश्रेष्ठ अंगों सहित चारों वेदों का अध्ययन करता है और छह कर्मों में प्रवृत्त है, उसे ऋषि पात्र मानते हैं।
श्लोक 37 (13.60.37)
ये त्वेवंगुणजातीयास्तेभ्यो दत्तं महाफलम् । सहस्रगुणमाप्नोति गुणार्हाय प्रदायकः ॥
ye tvevaṃguṇajātīyāstebhyo dattaṃ mahāphalam | sahasraguṇamāpnoti guṇārhāya pradāyakaḥ
जो ऐसे गुणों वाले हैं, उन्हें दिया हुआ दान महान फल देता है। गुणों के योग्य पात्र को देने वाला दाता हज़ार गुना फल पाता है।
श्लोक 38 (13.60.38)
प्रज्ञाश्रुताभ्यां वृत्तेन शीलेन च समन्वितः । तारयेत कुलं सर्वमेकोऽपीह द्विजर्षभः । तृप्ते तृप्ताः सर्वदेवाः पितरो मुनयोपि च ॥
prajñāśrutābhyāṃ vṛttena śīlena ca samanvitaḥ | tārayeta kulaṃ sarvameko'pīha dvijarṣabhaḥ | tṛpte tṛptāḥ sarvadevāḥ pitaro munayopi ca
प्रज्ञा, श्रुत, आचरण और शील से युक्त द्विजश्रेष्ठ अकेला भी यहाँ अपने सारे कुल का उद्धार कर सकता है। उसके तृप्त होने पर सब देवता, पितर और मुनि भी तृप्त हो जाते हैं।
श्लोक 39 (13.60.39)
गामश्वं वित्तमन्नं वा तद्विधे प्रतिपादयेत् । द्रव्याणि चान्यानि तथा प्रेत्यभावे न शोचति ॥
gāmaśvaṃ vittamannaṃ vā tadvidhe pratipādayet | dravyāṇi cānyāni tathā pretyabhāve na śocati
ऐसे पात्र को गाय, घोड़ा, धन या अन्न और अन्य वस्तुएँ भी देनी चाहिए; ऐसा दाता परलोक में शोक नहीं करता।
श्लोक 40 (13.60.40)
तारयेत कुलं सर्वमेकोपि ह द्विजोत्तमः । किमङ्ग पुनरेवैते तस्मात्पात्रं समाचरेत् ॥
tārayeta kulaṃ sarvamekopi ha dvijottamaḥ | kimaṅga punarevaite tasmātpātraṃ samācaret
एक भी श्रेष्ठ द्विज सारे कुल का उद्धार कर देता है; फिर जब ये गुण भी उसमें हों तब तो कहना ही क्या? इसलिए पात्र की खोज करनी चाहिए।
श्लोक 41 (13.60.41)
निशाम्य च गुणोपेतं ब्राह्मणं साधुसम्मतम् । दूरादानाय्य सत्कृत्य सर्वतश्चापि पूजयेत् ॥
niśāmya ca guṇopetaṃ brāhmaṇaṃ sādhusammatam | dūrādānāyya satkṛtya sarvataścāpi pūjayet
गुणों से युक्त और साधुओं द्वारा सम्मानित ब्राह्मण का पता पाकर उसे दूर से बुलवाकर सत्कार करे और सब प्रकार से उसकी पूजा करे।