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अनुशासन पर्व · अध्याय 59

नारद: पत्नी-त्याग और पात्र ब्राह्मणों के विषय में

मार्कण्डेय नारद से गृहस्थ-धर्म के प्रश्न पूछते हैं: अनेक पत्नियों वाले पुरुष का धर्म, वेश्याओं और दासियों से उत्पन्न पुत्रों की स्थिति, पत्नी को कब त्यागा जा सकता है और कब नहीं, और नदी के समान स्त्रियों का रजोधर्म से फिर शुद्ध होना। नारद मनुष्य के हाथ में स्थित पाँच तीर्थ बताते हैं, जिनमें वैष्णव तीर्थ प्रथम है, तथा निरंकुश स्त्रियों, सावित्री से रहित ब्राह्मणों और वाणिज्य अपनाने वाले श्रोत्रियों की चर्चा करते हैं। अन्त में भीष्म बताते हैं कि मार्कण्डेय विदा लेते हैं और ऋषि तीर्थों की सेवा में लग जाते हैं।

अध्याय 58अध्याय-सूचीअध्याय 60

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 1 (13.59.1)

श्रुतं बलं प्रभावश्च योषितां मुनिसत्तम । एकस्य बहुभार्यस्य धर्ममिच्छामि वेदितुम् ॥

śrutaṃ balaṃ prabhāvaśca yoṣitāṃ munisattama | ekasya bahubhāryasya dharmamicchāmi veditum

हे मुनिश्रेष्ठ, मैंने स्त्रियों का बल और प्रभाव सुन लिया। अब मैं ऐसे पुरुष का धर्म जानना चाहता हूँ जिसकी अनेक पत्नियाँ हों।

नारद उवाच

श्लोक 2 (13.59.2)

बहुभार्यासु सक्तस्य नारीभोगेषु गेहिनः । ऋतौ विमुञ्चमानस्य सांनिध्ये भ्रूणहा स्मृतः ॥

bahubhāryāsu saktasya nārībhogeṣu gehinaḥ | ṛtau vimuñcamānasya sāṃnidhye bhrūṇahā smṛtaḥ

अनेक पत्नियों और स्त्री-भोगों में आसक्त जो गृहस्थ पास रहते हुए भी ऋतुकाल में (किसी पत्नी को) छोड़ देता है, उसे भ्रूणहत्यारा कहा गया है।

श्लोक 3 (13.59.3)

वृद्धां वन्ध्यां सुव्रतां च मृतापत्यामपुष्पिणीम् । कन्यां च बहुपुत्रां च वर्जयन्मुच्यते भयात् ॥

vṛddhāṃ vandhyāṃ suvratāṃ ca mṛtāpatyāmapuṣpiṇīm | kanyāṃ ca bahuputrāṃ ca varjayanmucyate bhayāt

वृद्धा, बाँझ, सुव्रता, जिसकी सन्तान मर चुकी हो, जिसे अभी रजोधर्म न हुआ हो, कन्या और बहुत पुत्रों वाली स्त्री को छोड़ देने से पुरुष उस भय से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 4 (13.59.4)

व्याधितो बन्धनस्थो वा प्रवासेष्वथ पर्वसु । ऋतुकाले तु नारीणां भ्रूणहत्यां प्रमुञ्चति ॥

vyādhito bandhanastho vā pravāseṣvatha parvasu | ṛtukāle tu nārīṇāṃ bhrūṇahatyāṃ pramuñcati

जो पुरुष रोगी हो, बन्धन में हो, प्रवास में हो या पर्व के दिनों में हो, वह स्त्रियों के ऋतुकाल में भ्रूणहत्या के दोष से मुक्त हो जाता है।

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 5 (13.59.5)

वैश्यनारीषु वै जाताः परप्रेष्यासु वा सुताः । कस्य ते बन्धुदायादा भवन्ति हि महामुने ॥

vaiśyanārīṣu vai jātāḥ parapreṣyāsu vā sutāḥ | kasya te bandhudāyādā bhavanti hi mahāmune

हे महामुनि, वैश्य स्त्रियों से अथवा दूसरों की दासियों से उत्पन्न पुत्र किसके बन्धु और उत्तराधिकारी होते हैं?

नारद उवाच

श्लोक 6 (13.59.6)

पण्यस्त्रीषु प्रसूता ये यस्य स्त्री तस्य ते सुताः । क्रयाच्च कृत्रिमाः पुत्राः प्रदानाच्चैव दत्रिमाः ॥

paṇyastrīṣu prasūtā ye yasya strī tasya te sutāḥ | krayācca kṛtrimāḥ putrāḥ pradānāccaiva datrimāḥ

वेश्याओं से उत्पन्न पुत्र उसके होते हैं जिसकी वह स्त्री है। खरीदने से प्राप्त पुत्र कृत्रिम कहे जाते हैं और दान से प्राप्त पुत्र दत्तक।

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 7 (13.59.7)

पण्यनारीष्वनियतः पुंसोऽर्थो वर्तते ध्रुवम् । अत्र चाहितगर्भायाः कस्य पुत्रं वदन्ति तम् ॥

paṇyanārīṣvaniyataḥ puṃso'rtho vartate dhruvam | atra cāhitagarbhāyāḥ kasya putraṃ vadanti tam

वेश्याओं के विषय में पुरुष का अधिकार निश्चय ही अनिश्चित रहता है। ऐसी दशा में जिस स्त्री ने गर्भ धारण कर लिया हो, उसका पुत्र किसका कहा जाता है?

नारद उवाच

श्लोक 8 (13.59.8)

तीर्थभूतासु नारीषु ज्ञायते योऽभिगच्छति । ऋतौ तस्य भवेद्गर्भो यं वा नारी न शङ्कते ॥

tīrthabhūtāsu nārīṣu jñāyate yo'bhigacchati | ṛtau tasya bhavedgarbho yaṃ vā nārī na śaṅkate

तीर्थ के समान (सबके लिए सुलभ) स्त्रियों में गर्भ उसी का माना जाता है जो ऋतुकाल में उनके पास गया हुआ ज्ञात हो, अथवा जिसके विषय में स्त्री को स्वयं सन्देह न हो।

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 9 (13.59.9)

नराणां त्यजतां भार्यां कामक्रोधाद्गुणान्विताम् । अप्रसूतां प्रसूतां वा तेषां पृच्छामि निष्कृतिम् ॥

narāṇāṃ tyajatāṃ bhāryāṃ kāmakrodhādguṇānvitām | aprasūtāṃ prasūtāṃ vā teṣāṃ pṛcchāmi niṣkṛtim

जो पुरुष काम या क्रोध के वश गुणवती पत्नी को त्याग देते हैं, चाहे उसने सन्तान को जन्म दिया हो या नहीं, उनके लिए प्रायश्चित्त क्या है, मैं पूछता हूँ।

नारद उवाच

श्लोक 10 (13.59.10)

अपापां त्यजमानस्य साध्वीं मत्वैवमादितः । आत्मवंशस्वधर्मो वा त्यजतो निष्कृतिर्न तु ॥

apāpāṃ tyajamānasya sādhvīṃ matvaivamāditaḥ | ātmavaṃśasvadharmo vā tyajato niṣkṛtirna tu

जो निर्दोष पत्नी को, जिसे आरम्भ से ही उसने साध्वी माना था, त्याग देता है, उसके लिए कोई प्रायश्चित्त नहीं; क्योंकि ऐसा करके वह अपने वंश और अपने धर्म को त्यागता है।

श्लोक 11 (13.59.11)

यो नरस्त्यजते भार्यां पुष्पिणीमप्रसूतिकाम् । स नष्टवंशः पितृभिर्युक्तस्त्यज्येत दैवतैः ॥

yo narastyajate bhāryāṃ puṣpiṇīmaprasūtikām | sa naṣṭavaṃśaḥ pitṛbhiryuktastyajyeta daivataiḥ

जो पुरुष ऋतुमती किन्तु सन्तानहीन पत्नी को त्याग देता है, उसका वंश नष्ट हो जाता है और पितर तथा देवता उसे छोड़ देते हैं।

श्लोक 12 (13.59.12)

भार्यामपत्यसञ्जातां प्रसूतां पुत्रपौत्रिणीम् । पुत्रदारपरित्यागी न स प्राप्नोति निष्कृतिम् ॥

bhāryāmapatyasañjātāṃ prasūtāṃ putrapautriṇīm | putradāraparityāgī na sa prāpnoti niṣkṛtim

जो पुरुष सन्तान उत्पन्न कर चुकी, प्रसव कर चुकी, पुत्र-पौत्रों वाली पत्नी को त्यागता है, वह पुत्रों और पत्नी का त्याग करने वाला प्रायश्चित्त नहीं पाता।

श्लोक 13 (13.59.13)

एवं हि भार्यां त्यजतां नराणां नास्ति निष्कृतिः । नार्हन्ति प्रमदास्त्यक्तुं पुत्रपौत्रप्रतिष्ठिताः ॥

evaṃ hi bhāryāṃ tyajatāṃ narāṇāṃ nāsti niṣkṛtiḥ | nārhanti pramadāstyaktuṃ putrapautrapratiṣṭhitāḥ

इस प्रकार पत्नियों को त्यागने वाले पुरुषों के लिए कोई प्रायश्चित्त नहीं। जो स्त्रियाँ पुत्र-पौत्रों से प्रतिष्ठित हैं, वे त्यागने योग्य नहीं।

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 14 (13.59.14)

कीदृशीं संत्यजन्भार्यां नरो दोषैर्न लिप्यते । एतदिच्छामि तत्वेन विज्ञातुमृषिसत्तम ॥

kīdṛśīṃ saṃtyajanbhāryāṃ naro doṣairna lipyate | etadicchāmi tatvena vijñātumṛṣisattama

कैसी पत्नी को त्यागने पर पुरुष दोषों से लिप्त नहीं होता? हे ऋषिश्रेष्ठ, मैं इसे यथार्थ रूप से जानना चाहता हूँ।

नारद उवाच

श्लोक 15 (13.59.15)

मोक्षधर्मस्थितानां तु अन्योन्यमनुजानताम् । भार्यापतीनां मुक्तानामधर्मो न विधीयते ॥

mokṣadharmasthitānāṃ tu anyonyamanujānatām | bhāryāpatīnāṃ muktānāmadharmo na vidhīyate

जो पति-पत्नी मोक्षधर्म में स्थित हैं, मुक्त हो चुके हैं और परस्पर सहमत हैं, उनके लिए अधर्म का विधान नहीं है।

श्लोक 16 (13.59.16)

अन्यसङ्गां गतापत्यां शूद्रगां परगामिनीम् । परीक्ष्य त्यजमानानां नराणां नास्ति पातकम् ॥

anyasaṅgāṃ gatāpatyāṃ śūdragāṃ paragāminīm | parīkṣya tyajamānānāṃ narāṇāṃ nāsti pātakam

जो पुरुष जाँच-परख कर ऐसी पत्नी को त्यागते हैं जो दूसरे के साथ सम्बन्ध रखती हो, जिसे सन्तान हो चुकी हो, जो शूद्र के पास जाती हो, या जो परपुरुषगामिनी हो, उन्हें पाप नहीं लगता।

श्लोक 17 (13.59.17)

पातकेऽपि तु भर्तव्यौ द्वौ तु माता पिता तथा ॥

pātake'pi tu bhartavyau dvau tu mātā pitā tathā

पाप में पड़ जाने पर भी दो का भरण-पोषण करना ही चाहिए: माता और पिता का।

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 18 (13.59.18)

भार्यायां व्यभिचारिण्यां नरस्य त्यजतो रुषा । कथं धर्मोऽप्यधर्मो वा भवतीह महामते ॥

bhāryāyāṃ vyabhicāriṇyāṃ narasya tyajato ruṣā | kathaṃ dharmo'pyadharmo vā bhavatīha mahāmate

हे महामते, जब पत्नी व्यभिचारिणी हो और पति क्रोध में उसे त्याग दे, तो वह धर्म है या अधर्म, यह कैसे होता है?

नारद उवाच

श्लोक 19 (13.59.19)

अनृतेऽपि हि सत्ये वा यो नारीं दूषितां त्यजेत् । अरक्षमाणः स्वां भार्यां नरो भवति भ्रूणहा ॥

anṛte'pi hi satye vā yo nārīṃ dūṣitāṃ tyajet | arakṣamāṇaḥ svāṃ bhāryāṃ naro bhavati bhrūṇahā

आरोप झूठा हो या सच्चा, जो पुरुष दोषी ठहराई गई स्त्री को त्यागता है और अपनी पत्नी की रक्षा नहीं करता, वह भ्रूणहत्यारा हो जाता है।

श्लोक 20 (13.59.20)

अपत्यहेतोर्या नारी भर्तारमतिलङ्घयेत् । लोलेन्द्रियेति सा रक्ष्या न सन्त्याज्या कथञ्चन ॥

apatyahetoryā nārī bhartāramatilaṅghayet | lolendriyeti sā rakṣyā na santyājyā kathañcana

जो स्त्री सन्तान के लिए पति का उल्लंघन करती है — 'वह चंचल इन्द्रियों वाली है' — उसकी रक्षा करनी चाहिए; उसे किसी भी प्रकार त्यागना नहीं चाहिए।

श्लोक 21 (13.59.21)

नद्यश्च नार्यश्च समस्वभावा । नैताः प्रमुञ्चन्ति नरावगाढाः । स्रोतांसि नद्यो वहते निपातं । नारी रजोभिः पुनरेति शौचम् ॥

nadyaśca nāryaśca samasvabhāvā | naitāḥ pramuñcanti narāvagāḍhāḥ | srotāṃsi nadyo vahate nipātaṃ | nārī rajobhiḥ punareti śaucam

नदियाँ और स्त्रियाँ एक समान स्वभाव की हैं; पुरुष उनमें अवगाहन कर लें, तब भी वे (अपना स्वभाव) नहीं छोड़तीं। नदियाँ अपनी धाराओं को नीचे की ओर बहा ले जाती हैं; स्त्री रजोधर्म से फिर शुद्ध हो जाती है।

श्लोक 22 (13.59.22)

एवं नार्यो न दुष्यन्ति व्यभिचारेऽपि भर्तृणाम् । मासिमासि भवेद्रागस्ततः शुद्धा भवन्त्युत ॥

evaṃ nāryo na duṣyanti vyabhicāre'pi bhartṛṇām | māsimāsi bhavedrāgastataḥ śuddhā bhavantyuta

इस प्रकार पतियों के विरुद्ध व्यभिचार करने पर भी स्त्रियाँ दूषित नहीं होतीं; प्रत्येक मास रज आता है और उसके बाद वे शुद्ध हो जाती हैं।

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 23 (13.59.23)

कानि तीर्थानि भगवन्नृणां देहाश्रितानि वै । तानि वै शंस भगवन्याथातथ्येन पृच्छतः ॥

kāni tīrthāni bhagavannṛṇāṃ dehāśritāni vai | tāni vai śaṃsa bhagavanyāthātathyena pṛcchataḥ

हे भगवन्, मनुष्यों के शरीर में स्थित तीर्थ कौन-से हैं? पूछने वाले मुझे वे यथार्थ रूप से बताइए।

श्लोक 24 (13.59.24)

सर्वतीर्थेषु सर्वज्ञ किं तीर्थं परमं नृणाम् । यत्रोपस्पृश्य पूतो यो नरो भवति नित्यशः ॥

sarvatīrtheṣu sarvajña kiṃ tīrthaṃ paramaṃ nṛṇām | yatropaspṛśya pūto yo naro bhavati nityaśaḥ

हे सर्वज्ञ, सब तीर्थों में मनुष्यों के लिए सर्वोत्तम तीर्थ कौन-सा है, जहाँ आचमन करके मनुष्य सदा के लिए पवित्र हो जाता है?

नारद उवाच

श्लोक 25 (13.59.25)

देवर्षिपितृतीर्थानि ब्राह्मं मध्येऽथ वैष्णवम् । नृणां तीर्थानि पञ्चाहुः पाणौ सन्निहितानि वै ॥

devarṣipitṛtīrthāni brāhmaṃ madhye'tha vaiṣṇavam | nṛṇāṃ tīrthāni pañcāhuḥ pāṇau sannihitāni vai

देवतीर्थ, ऋषितीर्थ, पितृतीर्थ, बीच में ब्राह्मतीर्थ और वैष्णवतीर्थ — ये मनुष्यों के पाँच तीर्थ बताए जाते हैं, जो हाथ में ही स्थित हैं।

श्लोक 26 (13.59.26)

आद्यतीर्थं तु तीर्थानां वैष्णवो भाग उच्यते । यत्रोपस्पृश्य वर्णानां चतुर्णां वर्धते कुलम् । पितृदैवतकार्याणि वर्धन्ते प्रेत्य चेह च ॥

ādyatīrthaṃ tu tīrthānāṃ vaiṣṇavo bhāga ucyate | yatropaspṛśya varṇānāṃ caturṇāṃ vardhate kulam | pitṛdaivatakāryāṇi vardhante pretya ceha ca

वैष्णव भाग को तीर्थों में प्रथम तीर्थ कहा जाता है। वहाँ आचमन करने से चारों वर्णों का कुल बढ़ता है और पितरों तथा देवताओं के कर्म परलोक और इस लोक में फलते-फूलते हैं।

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 27 (13.59.27)

नराणां कामवृत्तानां या नार्यो निरवग्रहाः । यासामभिग्रहो नास्ति ता मे कथय नारद ॥

narāṇāṃ kāmavṛttānāṃ yā nāryo niravagrahāḥ | yāsāmabhigraho nāsti tā me kathaya nārada

स्वेच्छाचारी पुरुषों में जो स्त्रियाँ निरंकुश हैं, जिन पर कोई नियन्त्रण नहीं है, हे नारद, उनके विषय में मुझे बताइए।

नारद उवाच

श्लोक 28 (13.59.28)

पाशुर्वैश्या नटी गोपी तान्तुकी तुन्नवायिकी । नारी किराती शबरी नर्तकी चानवग्रहा ॥

pāśurvaiśyā naṭī gopī tāntukī tunnavāyikī | nārī kirātī śabarī nartakī cānavagrahā

फंदा लगाने वालों की स्त्री, वैश्य स्त्री, नटी, गोपी, जुलाहिन, दर्जिन, किरात स्त्री, शबर स्त्री और नर्तकी — ये निरंकुश हैं।

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 29 (13.59.29)

एतासु जाता नारीषु सर्ववर्णेषु ये सुताः । केषु के बन्धुदायादा भवन्ति ऋषिसत्तम ॥

etāsu jātā nārīṣu sarvavarṇeṣu ye sutāḥ | keṣu ke bandhudāyādā bhavanti ṛṣisattama

हे ऋषिश्रेष्ठ, सब वर्णों में इन स्त्रियों से जो पुत्र उत्पन्न होते हैं, वे किसके बन्धु और उत्तराधिकारी होते हैं?

नारद उवाच

श्लोक 30 (13.59.30)

य एताः परिगृह्णन्ति तेषामेव हि ते सुताः । सर्वत्र तु प्रवृत्तासु बीजं नश्यति देहिनाम् ॥

ya etāḥ parigṛhṇanti teṣāmeva hi te sutāḥ | sarvatra tu pravṛttāsu bījaṃ naśyati dehinām

जो इन स्त्रियों को अपनाते हैं, वे पुत्र उन्हीं के होते हैं। जो स्त्रियाँ सर्वत्र प्रवृत्त होती हैं, उनमें देहधारियों का बीज नष्ट हो जाता है।

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 31 (13.59.31)

सर्वस्त्रीषु प्रवृत्ताश्च साधुवेदविवर्जिताः । मानवाः काण्डपृष्ठाश्च वेदमन्त्रबहिष्कृताः । नियुक्ता हव्यकव्येषु तेषां दत्तं कथं भवेत् ॥

sarvastrīṣu pravṛttāśca sādhuvedavivarjitāḥ | mānavāḥ kāṇḍapṛṣṭhāśca vedamantrabahiṣkṛtāḥ | niyuktā havyakavyeṣu teṣāṃ dattaṃ kathaṃ bhavet

जो मनुष्य सब स्त्रियों में प्रवृत्त हैं, सदाचार और वेद से रहित हैं, काण्डपृष्ठ कहलाते हैं और वेदमन्त्रों से बहिष्कृत हैं, यदि उन्हें हव्य और कव्य के कर्मों में नियुक्त किया जाए तो उन्हें दिया हुआ दान कैसे फलेगा?

नारद उवाच

श्लोक 32 (13.59.32)

नार्हन्ति हव्यकव्यानि सावित्रीवर्जिता द्विजाः । व्रात्येष्वन्नप्रदानं तद्यथा शूद्रेषु वै तथा ॥

nārhanti havyakavyāni sāvitrīvarjitā dvijāḥ | vrātyeṣvannapradānaṃ tadyathā śūdreṣu vai tathā

जो द्विज सावित्री से रहित हैं वे हव्य और कव्य के योग्य नहीं हैं। व्रात्यों को अन्न देना वैसा ही है जैसा शूद्रों को देना।

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 33 (13.59.33)

धर्मेष्वधिकृतानां तु नराणां मुह्यते मनः । कथं न विघ्नो भवति एतदिच्छामि वेदितुम् ॥

dharmeṣvadhikṛtānāṃ tu narāṇāṃ muhyate manaḥ | kathaṃ na vighno bhavati etadicchāmi veditum

धर्म के कार्यों में नियुक्त पुरुषों का मन भ्रमित हो जाता है। यह विघ्न कैसे नहीं बनता? मैं यह जानना चाहता हूँ।

नारद उवाच

श्लोक 34 (13.59.34)

अर्थाश्च नार्यश्च समानमेन- । च्छ्रेयांसि पुंसामिह मोहयन्ति । रतिप्रमोदात्प्रमदा हरन्ति । भोगैर्धनं चाप्युपहन्ति धर्मान् ॥

arthāśca nāryaśca samānamena- | cchreyāṃsi puṃsāmiha mohayanti | ratipramodātpramadā haranti | bhogairdhanaṃ cāpyupahanti dharmān

धन और स्त्रियाँ समान रूप से यहाँ पुरुषों के कल्याण को भ्रमित करते हैं। स्त्रियाँ रति के आनन्द से उसे हर लेती हैं, और धन भोगों के द्वारा धर्मों को नष्ट कर देता है।

श्लोक 35 (13.59.35)

हव्यं कव्यं च धर्मात्मा सर्वं तच्छ्रोत्रियोऽर्हति । दत्तं हि श्रोत्रिये साधौ ज्वलिताग्नाविवाहुतिः ॥

havyaṃ kavyaṃ ca dharmātmā sarvaṃ tacchrotriyo'rhati | dattaṃ hi śrotriye sādhau jvalitāgnāvivāhutiḥ

धर्मात्मा श्रोत्रिय सभी हव्य और कव्य के योग्य है; क्योंकि साधु श्रोत्रिय को दिया हुआ दान जलती अग्नि में दी गई आहुति के समान है।

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 36 (13.59.36)

श्रोत्रियाणां कुले जाता वेदार्थविदितात्मनाम् । हित्वा कस्मात्त्रयीं विद्यां वार्तां वृत्तिमुपाश्रिताः ॥

śrotriyāṇāṃ kule jātā vedārthaviditātmanām | hitvā kasmāttrayīṃ vidyāṃ vārtāṃ vṛttimupāśritāḥ

जो श्रोत्रियों के कुलों में उत्पन्न हुए और जिनकी आत्मा वेदों के अर्थ को जान चुकी है, वे त्रयी विद्या को छोड़कर खेती-व्यापार की वृत्ति क्यों अपनाते हैं?

नारद उवाच

श्लोक 37 (13.59.37)

चातुर्वर्ण्यं पुरा न्यस्तं सुविद्वत्सु द्विजातिषु । तस्माद्वर्णैः संविभज्या वृत्तिः सङ्करवर्जिता ॥

cāturvarṇyaṃ purā nyastaṃ suvidvatsu dvijātiṣu | tasmādvarṇaiḥ saṃvibhajyā vṛttiḥ saṅkaravarjitā

प्राचीन काल में चातुर्वर्ण्य विद्वान द्विजों को सौंपा गया था। इसलिए वर्णों के बीच जीविका का विभाजन इस प्रकार किया जाना चाहिए कि उसमें मिश्रण न हो।

श्लोक 38 (13.59.38)

ये चान्ये श्रोत्रिया जाताः संस्कृताः पुत्रगृध्नुभिः । पूर्वनिर्वाणनिर्वृत्तां जातां वृत्तिमुपाश्रिताः ॥

ye cānye śrotriyā jātāḥ saṃskṛtāḥ putragṛdhnubhiḥ | pūrvanirvāṇanirvṛttāṃ jātāṃ vṛttimupāśritāḥ

और वे अन्य श्रोत्रिय, जो पुत्र की इच्छा रखने वालों द्वारा जन्म पाकर संस्कारित हुए, पहले के विनाश से उत्पन्न वृत्ति का आश्रय ले चुके हैं।

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 39 (13.59.39)

असंस्कृताः श्रोत्रियजाः संस्कृता ज्ञानिजाः कथम् ॥

asaṃskṛtāḥ śrotriyajāḥ saṃskṛtā jñānijāḥ katham

श्रोत्रियों से उत्पन्न लोग असंस्कारित और ज्ञानियों से उत्पन्न लोग संस्कारित कैसे हो सकते हैं?

नारद उवाच

श्लोक 40 (13.59.40)

असंस्कारो वैदिकश्च स मान्यः श्रोत्रियात्मजः । शुद्धान्वयः श्रोत्रियस्तु सुविद्वद्भिः समोऽन्यथा ॥

asaṃskāro vaidikaśca sa mānyaḥ śrotriyātmajaḥ | śuddhānvayaḥ śrotriyastu suvidvadbhiḥ samo'nyathā

जो श्रोत्रिय-पुत्र संस्कारहीन हो परन्तु वेद का ज्ञाता हो, वह सम्मान के योग्य है। शुद्ध वंश का श्रोत्रिय परम विद्वानों के समान होता है; अन्यथा नहीं।

श्लोक 41 (13.59.41)

अनधीयानपुत्राश्च वेदसंस्कारवर्जिताः । तस्मात्ते वेदविज्ञाऽपि विप्राः श्रुतिनिकारिणः ॥

anadhīyānaputrāśca vedasaṃskāravarjitāḥ | tasmātte vedavijñā'pi viprāḥ śrutinikāriṇaḥ

जिनके पुत्र अध्ययन नहीं करते और वेद-संस्कारों से रहित हैं — इसलिए वे ब्राह्मण, वेद के ज्ञाता होते हुए भी, श्रुति का अपमान करने वाले हैं।

श्लोक 42 (13.59.42)

ब्रह्मराशौ पुरा सृष्टा वेदसंस्कारसंस्कृताः । तस्मात्तेष्वेव ते जाताः साधवः कुलधारिणः ॥

brahmarāśau purā sṛṣṭā vedasaṃskārasaṃskṛtāḥ | tasmātteṣveva te jātāḥ sādhavaḥ kuladhāriṇaḥ

प्राचीन काल में ब्राह्मण-समूह में वे वेद-संस्कारों से संस्कारित होकर रचे गए थे; इसलिए उन्हीं में जन्म लेने वाले साधु और कुल को धारण करने वाले होते हैं।

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 43 (13.59.43)

स्वयं क्रीतासु प्रेष्यासु प्रसूयन्ते तु ये नराः । कस्य नार्यः सुताश्चैव भवन्ति ऋषिसत्तम ॥

svayaṃ krītāsu preṣyāsu prasūyante tu ye narāḥ | kasya nāryaḥ sutāścaiva bhavanti ṛṣisattama

हे ऋषिश्रेष्ठ, जो पुरुष स्वयं खरीदी हुई दासियों से उत्पन्न होते हैं, उन स्त्रियों और पुत्रों का स्वामी कौन होता है?

नारद उवाच

श्लोक 44 (13.59.44)

स्वदास्यां यो नरो मोहात्प्रसूयेत स पापकृत् । इहाभिनिन्दितः प्रेत्य अपत्यं प्रेष्यतां नयेत् ॥

svadāsyāṃ yo naro mohātprasūyeta sa pāpakṛt | ihābhininditaḥ pretya apatyaṃ preṣyatāṃ nayet

जो पुरुष मोहवश अपनी ही दासी से सन्तान उत्पन्न करता है वह पापी है; यहाँ निन्दित होकर मरने के बाद वह अपनी सन्तान को दासता में पहुँचा देता है।

श्लोक 45 (13.59.45)

सा तस्य भार्या पुत्रा ये हव्यकव्यप्रदास्तु ते । तस्या ये बान्धवाः केचिद्विषक्ताः प्रेष्यतां गताः । सर्वे तस्यास्तु सम्बन्धा मुच्यन्ते प्रेष्यकर्मसु ॥

sā tasya bhāryā putrā ye havyakavyapradāstu te | tasyā ye bāndhavāḥ kecidviṣaktāḥ preṣyatāṃ gatāḥ | sarve tasyāstu sambandhā mucyante preṣyakarmasu

वह उसकी पत्नी है और उसके पुत्र हव्य और कव्य देने वाले हैं। उसके जो भी बन्धु बन्धन में पड़कर दासता को प्राप्त हुए हैं, उसके वे सभी सम्बन्धी दासों के कर्मों से मुक्त हो जाते हैं।

श्लोक 46 (13.59.46)

एतत्ते कथितं सर्वं यदभिव्याहृतं त्वया । अथवा संशयः कश्चिद्भूयः सम्प्रष्टुमर्हसि ॥

etatte kathitaṃ sarvaṃ yadabhivyāhṛtaṃ tvayā | athavā saṃśayaḥ kaścidbhūyaḥ sampraṣṭumarhasi

तुमने जो पूछा था वह सब मैंने तुम्हें बता दिया। अथवा कोई और सन्देह हो तो फिर पूछ सकते हो।

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 47 (13.59.47)

अमिथ्यादर्शनो लोके नारदः सर्वकोविदः । प्रत्यक्षदर्शी लोकानां स्वयंभुरिव सत्तमः ॥

amithyādarśano loke nāradaḥ sarvakovidaḥ | pratyakṣadarśī lokānāṃ svayaṃbhuriva sattamaḥ

नारद लोक में मिथ्या दर्शन से रहित, सर्वज्ञ और लोकों के प्रत्यक्षदर्शी हैं; वे स्वयम्भू के समान श्रेष्ठ हैं।

भीष्म उवाच

श्लोक 48 (13.59.48)

इति सम्भाष्य ऋषिभिर्मार्कण्डेयो महातपाः । नारदं चापि सत्कृत्य तेन चैवाभिसत्कृतः । आमन्त्रयित्वा ऋषिभिः प्रययावाश्रमं मुनिः ॥

iti sambhāṣya ṛṣibhirmārkaṇḍeyo mahātapāḥ | nāradaṃ cāpi satkṛtya tena caivābhisatkṛtaḥ | āmantrayitvā ṛṣibhiḥ prayayāvāśramaṃ muniḥ

इस प्रकार ऋषियों के साथ वार्तालाप करके महातपस्वी मार्कण्डेय ने नारद का सत्कार किया और उनसे भी सत्कृत हुए; फिर ऋषियों से विदा लेकर वे मुनि अपने आश्रम को चले गए।

श्लोक 49 (13.59.49)

ऋषयश्चापि तीर्थानां परिचर्यां प्रचक्रमुः ॥

ṛṣayaścāpi tīrthānāṃ paricaryāṃ pracakramuḥ

और ऋषियों ने भी तीर्थों की सेवा आरम्भ की।

श्लोक 50 (13.59.50)

सुक्षेत्रबीजसंस्कारविशुद्धो ब्रह्मचर्यया । नित्यनैमित्तिकात्स्नातो मनश्शुद्ध्या च शुद्ध्यति ॥

sukṣetrabījasaṃskāraviśuddho brahmacaryayā | nityanaimittikātsnāto manaśśuddhyā ca śuddhyati

उत्तम क्षेत्र, उत्तम बीज और संस्कारों से शुद्ध हुआ, ब्रह्मचर्य का पालन करने वाला और नित्य तथा नैमित्तिक कर्मों के अनुसार स्नान करने वाला पुरुष मन की शुद्धि से भी शुद्ध होता है।

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