अनुशासन पर्व · अध्याय 74
युधिष्ठिर का प्रश्न: स्त्रियों की रक्षा कैसे हो
युधिष्ठिर एक संशय में हैं: पुरुष बार-बार स्त्रियों में आसक्त होते हैं और स्त्रियाँ पुरुषों में, फिर भी कहा जाता है कि स्त्रियाँ शीघ्र मन बदल लेती हैं और छलती हैं। वे शम्बर, नमुचि, बलि और कुम्भीनसी की मायाओं का स्मरण करते हैं, कहते हैं कि स्त्रियों की बुद्धि उशना और बृहस्पति के शास्त्र से भी बढ़कर है, और भीष्म से पूछते हैं कि क्या स्त्रियों की रक्षा कभी सम्भव है, अब या पहले कभी।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (13.74.1)
इमे वै मानवा लोके स्त्रीषु सज्जन्त्यभीक्ष्णशः । मोहेन परमाविष्टा देवदृष्टेन कर्मणा ॥
ime vai mānavā loke strīṣu sajjantyabhīkṣṇaśaḥ | mohena paramāviṣṭā devadṛṣṭena karmaṇā
इस संसार में मनुष्य बार-बार स्त्रियों में आसक्त होते हैं, मोह से अत्यन्त घिरकर, देवताओं द्वारा निर्धारित कर्म के कारण।
श्लोक 2 (13.74.2)
स्त्रियश्च पुरुषेष्वेव प्रत्यक्षं लोकसाक्षिकम् । अत्र मे संशयस्तीव्रो हृदि सम्परिवर्तते ॥
striyaśca puruṣeṣveva pratyakṣaṃ lokasākṣikam | atra me saṃśayastīvro hṛdi samparivartate
और स्त्रियाँ भी पुरुषों में ही आसक्त होती हैं, यह प्रत्यक्ष है और लोक इसका साक्षी है। इस विषय में मेरे हृदय में तीव्र संशय घूम रहा है।
श्लोक 3 (13.74.3)
कथमासां नराः सङ्गं कुर्वते कुरुनन्दन । स्त्रियो वातेषु रज्यन्ते विरज्यन्ते च ताः पुनः ॥
kathamāsāṃ narāḥ saṅgaṃ kurvate kurunandana | striyo vāteṣu rajyante virajyante ca tāḥ punaḥ
हे कुरुनन्दन, पुरुष इनसे सम्बन्ध कैसे करते हैं? और स्त्रियाँ उनमें अनुराग कैसे करती हैं और फिर विरक्त कैसे हो जाती हैं?
श्लोक 4 (13.74.4)
इति ताः पुरुषव्याघ्र कथं शक्यास्तु रक्षितुम् । प्रमदाः पुरुषेणेह तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥
iti tāḥ puruṣavyāghra kathaṃ śakyāstu rakṣitum | pramadāḥ puruṣeṇeha tanme vyākhyātumarhasi
हे पुरुषव्याघ्र, ऐसी स्थिति में पुरुष द्वारा स्त्रियों की रक्षा कैसे की जा सकती है? कृपया मुझे यह समझाइए।
श्लोक 5 (13.74.5)
एता हि स्वीयमायाभिर्वञ्चयन्तीह मानवान् । न चासां मुच्यते कश्चित्पुरुषो हस्तमागतः ॥
etā hi svīyamāyābhirvañcayantīha mānavān | na cāsāṃ mucyate kaścitpuruṣo hastamāgataḥ
ये अपनी मायाओं से यहाँ मनुष्यों को ठगती हैं, और इनके हाथ में आया हुआ कोई पुरुष इनसे छूटता नहीं।
श्लोक 6 (13.74.6)
गावो नवतृणानीव गृह्णन्त्येता नवन्नवम् ॥
gāvo navatṛṇānīva gṛhṇantyetā navannavam
जैसे गायें नई-नई घास को ग्रहण करती हैं, वैसे ही ये नए-नए पुरुष को अपनाती हैं।
श्लोक 7 (13.74.7)
शम्बरस्य च या माया माया या नमुचेरपि । बलेः कुम्भीनसेश्चैव सर्वास्ता योषितो विदुः ॥
śambarasya ca yā māyā māyā yā namucerapi | baleḥ kumbhīnaseścaiva sarvāstā yoṣito viduḥ
शम्बर की जो माया थी, नमुचि की जो माया थी, बलि और कुम्भीनसी की जो मायाएँ थीं, स्त्रियाँ उन सबको जानती हैं।
श्लोक 8 (13.74.8)
हसन्तं प्रहसन्त्येता रुदन्तं प्ररुदन्ति च । अप्रियं प्रियवाक्यैश्च गृह्णते कालयोगतः ॥
hasantaṃ prahasantyetā rudantaṃ prarudanti ca | apriyaṃ priyavākyaiśca gṛhṇate kālayogataḥ
हँसने वाले के साथ ये हँसती हैं और रोने वाले के साथ रोती हैं; और अप्रिय पुरुष को भी अवसर के अनुसार प्रिय वचनों से अपना लेती हैं।
श्लोक 9 (13.74.9)
यदि जिह्वासहस्रं स्याज्जीवेच्च शरदां शतम् । अनन्यकर्मा स्त्रीदोषाननुक्त्वा निधनं व्रजेत् ॥
yadi jihvāsahasraṃ syājjīvecca śaradāṃ śatam | ananyakarmā strīdoṣānanuktvā nidhanaṃ vrajet
यदि किसी के हजार जिह्वाएँ हों और वह सौ वर्ष जीए, तथा दूसरा कोई काम न करे, तो भी वह स्त्रियों के दोष पूरे कहे बिना ही मर जाएगा।
श्लोक 10 (13.74.10)
उशना वेद यच्छास्त्रं यच्च वेद बृहस्पतिः । स्त्री बुद्ध्या न विशिष्येत तास्तु रक्ष्याः कथं नरैः ॥
uśanā veda yacchāstraṃ yacca veda bṛhaspatiḥ | strī buddhyā na viśiṣyeta tāstu rakṣyāḥ kathaṃ naraiḥ
उशना जो शास्त्र जानते हैं और बृहस्पति जो जानते हैं, वह भी स्त्री की बुद्धि से बढ़कर नहीं है। फिर पुरुष उनकी रक्षा कैसे कर सकते हैं?
श्लोक 11 (13.74.11)
अनृतं सत्यमित्याहुः सत्यं चापि तथाऽनृतम् । इति यास्ताः कथं वीर संरक्ष्याः पुरुषैरिह । दोषास्पदेऽशुचौ देहे ह्यासां सक्तास्त्वहो नराः ॥
anṛtaṃ satyamityāhuḥ satyaṃ cāpi tathā'nṛtam | iti yāstāḥ kathaṃ vīra saṃrakṣyāḥ puruṣairiha | doṣāspade'śucau dehe hyāsāṃ saktāstvaho narāḥ
स्त्रियाँ असत्य को सत्य और सत्य को असत्य कहती हैं। हे वीर, ऐसी होने पर पुरुष यहाँ उनकी रक्षा कैसे कर सकते हैं? अहो, मनुष्य दोषों के आश्रय और अपवित्र उनके शरीर में आसक्त हैं।
श्लोक 12 (13.74.12)
स्त्रीणां बुद्ध्यर्थनिष्कर्षादर्थशास्त्राणि शत्रुहन् । बृहस्पतिप्रभृतिभिर्मन्ये सद्भिः कृतानि वै ॥
strīṇāṃ buddhyarthaniṣkarṣādarthaśāstrāṇi śatruhan | bṛhaspatiprabhṛtibhirmanye sadbhiḥ kṛtāni vai
हे शत्रुहन्ता, मैं मानता हूँ कि स्त्रियों की बुद्धि का सार निकालकर ही बृहस्पति आदि सज्जनों ने अर्थशास्त्रों की रचना की है।
श्लोक 13 (13.74.13)
संपूज्यमानाः पुरुषैर्विकुर्वन्ति मनो नृषु । अपास्ताश्च तथा राजन्विकुर्वन्ति मनः स्त्रियः ॥
saṃpūjyamānāḥ puruṣairvikurvanti mano nṛṣu | apāstāśca tathā rājanvikurvanti manaḥ striyaḥ
पुरुषों द्वारा सम्मानित होने पर स्त्रियाँ पुरुषों के प्रति मन बदल लेती हैं; और हे राजन्, तिरस्कृत होने पर भी स्त्रियाँ उसी प्रकार मन बदल लेती हैं।
श्लोक 14 (13.74.14)
इमाः प्रजा महाबाहो धार्मिक्य इति नः श्रुतम् ॥
imāḥ prajā mahābāho dhārmikya iti naḥ śrutam
हे महाबाहो, हमने सुना है कि ये स्त्रियाँ धर्मपरायण हैं।
श्लोक 15 (13.74.15)
सत्कृतासत्कृताश्चापि विकुर्वन्ति मनः सदा । कस्ताः शक्तो रक्षितुं स्यादिति मे संशयो महान् ॥
satkṛtāsatkṛtāścāpi vikurvanti manaḥ sadā | kastāḥ śakto rakṣituṃ syāditi me saṃśayo mahān
सम्मानित हों या असम्मानित, वे सदा मन बदलती रहती हैं। उनकी रक्षा कौन कर सकता है, इसमें मुझे बड़ा संशय है।
श्लोक 16 (13.74.16)
तथा ब्रूहि महाभाग कुरूणां वंशवर्धन । यदि शक्या कुरुश्रेष्ठ रक्षा तासां कदाचन ॥
tathā brūhi mahābhāga kurūṇāṃ vaṃśavardhana | yadi śakyā kuruśreṣṭha rakṣā tāsāṃ kadācana
अतः हे महाभाग, कुरुवंश को बढ़ाने वाले, मुझे बताइए: हे कुरुश्रेष्ठ, यदि उनकी रक्षा कभी सम्भव हो,
श्लोक 17 (13.74.17)
कर्तुं वा कृतपूर्वं वा तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥
kartuṃ vā kṛtapūrvaṃ vā tanme vyākhyātumarhasi
चाहे अब की जाए या पहले कभी की गई हो, यह मुझे समझाइए।