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अनुशासन पर्व · अध्याय 75

देवशर्मा द्वारा रुचि की रक्षा का भार विपुल को सौंपना और विपुल का उसके शरीर में प्रवेश

भीष्म युधिष्ठिर से सहमत होते हैं कि स्त्रियों की रक्षा कठिन है और बताते हैं कि ब्रह्मा ने मनुष्यों को मोहित करने के लिए उन्हें रचा और उन्हें उनकी कामनाएँ दीं। उदाहरण के रूप में वे ऋषि देवशर्मा और उनकी रूपवती पत्नी रुचि की कथा आरम्भ करते हैं, जिस पर इन्द्र की दृष्टि थी। यज्ञ के लिए जाते समय देवशर्मा रुचि को शिष्य विपुल को सौंपते हैं और इन्द्र के अनेक रूपों का वर्णन करते हैं; तब विपुल और कोई उपाय न देखकर योगबल से रुचि के शरीर में प्रवेश कर उसकी रक्षा करता रहता है।

अध्याय 74अध्याय-सूचीअध्याय 76

भीष्म उवाच

श्लोक 1 (13.75.1)

एवमेतन्महाबाहो नात्र मिथ्याऽस्ति किञ्चन । यथा ब्रवीषि कौरव्य नारीं प्रति जनाधिप ॥

evametanmahābāho nātra mithyā'sti kiñcana | yathā bravīṣi kauravya nārīṃ prati janādhipa

हे महाबाहो, यह ठीक वैसा ही है जैसा तुम कहते हो; इसमें कुछ भी मिथ्या नहीं है। हे कुरुनन्दन, हे नरेश, स्त्रियों के विषय में तुमने जो कहा है, वह सत्य है।

श्लोक 2 (13.75.2)

अत्र ते वर्तयिष्यामि इतिहासं पुरातनम् । यथा रक्षा कृता पूर्वं विपुलेन महात्मना ॥

atra te vartayiṣyāmi itihāsaṃ purātanam | yathā rakṣā kṛtā pūrvaṃ vipulena mahātmanā

इस विषय में मैं तुम्हें एक प्राचीन इतिहास सुनाता हूँ कि महात्मा विपुल ने पूर्वकाल में किस प्रकार रक्षा की थी।

श्लोक 3 (13.75.3)

प्रमदाश्च यथा सृष्टा ब्रह्मणा भरतर्षभ । यदर्थं तच्च ते तात प्रवक्ष्यामि नराधिप ॥

pramadāśca yathā sṛṣṭā brahmaṇā bharatarṣabha | yadarthaṃ tacca te tāta pravakṣyāmi narādhipa

हे तात, हे नराधिप, हे भरतश्रेष्ठ, ब्रह्मा ने स्त्रियों की सृष्टि किस प्रकार और किस प्रयोजन से की, यह भी मैं तुम्हें बताऊँगा।

श्लोक 4 (13.75.4)

न हि स्त्रीभ्यः परं पुत्र पापीयः किञ्चिदस्ति वै । अग्निर्हि प्रमदा दीप्तो मायाश्च मयजा विभो । क्षुरधारा विषं सर्पो मृत्युरित्येकतः स्त्रियः ॥

na hi strībhyaḥ paraṃ putra pāpīyaḥ kiñcidasti vai | agnirhi pramadā dīpto māyāśca mayajā vibho | kṣuradhārā viṣaṃ sarpo mṛtyurityekataḥ striyaḥ

हे पुत्र, स्त्रियों से बढ़कर पापमय निश्चय ही और कुछ नहीं है। हे विभो, स्त्री प्रज्वलित अग्नि है, वह मय से उत्पन्न माया है; छुरे की धार, विष, सर्प और मृत्यु, ये सब एक साथ मिलकर स्त्री ही हैं।

श्लोक 5 (13.75.5)

प्रजा इमा महाबाहो धार्मिक्य इति नः श्रुतम् । स्वयं गच्छन्ति देवत्वं ततो देवानियाद्भयम् ॥

prajā imā mahābāho dhārmikya iti naḥ śrutam | svayaṃ gacchanti devatvaṃ tato devāniyādbhayam

हे महाबाहो, हमने सुना है कि ये प्रजाएँ धर्मपरायण थीं। वे अपने आप देवत्व को प्राप्त हो रही थीं, इससे देवताओं को भय हुआ।

श्लोक 6 (13.75.6)

अथाभ्यागच्छन्देवास्ते पितामहमरिंदम । निवेद्य मानसं चापि तूष्णीमासन्नधोमुखाः ॥

athābhyāgacchandevāste pitāmahamariṃdama | nivedya mānasaṃ cāpi tūṣṇīmāsannadhomukhāḥ

हे अरिन्दम, तब वे देवता पितामह के पास गए और अपने मन की बात निवेदन करके मुँह नीचा किए चुपचाप खड़े रहे।

श्लोक 7 (13.75.7)

तेषामन्तर्गतं ज्ञात्वा देवानां स पितामहः । मानवानां प्रमोहार्थं कृत्या नार्योऽसृजत्प्रभुः ॥

teṣāmantargataṃ jñātvā devānāṃ sa pitāmahaḥ | mānavānāṃ pramohārthaṃ kṛtyā nāryo'sṛjatprabhuḥ

देवताओं के मन की बात जानकर प्रभु पितामह ने मनुष्यों को मोहित करने के लिए स्त्रियों को कृत्या (मोहिनी शक्ति) के रूप में रचा।

श्लोक 8 (13.75.8)

पूर्वसर्गे तु कौन्तेय साध्व्यो नार्य इहाभवन् । असाध्व्यस्तु समुत्पन्नाः कृत्याः सर्गात्प्रजापतेः ॥

pūrvasarge tu kaunteya sādhvyo nārya ihābhavan | asādhvyastu samutpannāḥ kṛtyāḥ sargātprajāpateḥ

हे कौन्तेय, पहली सृष्टि में इस लोक की स्त्रियाँ सती-साध्वी थीं; किन्तु प्रजापति की इस सृष्टि से जो उत्पन्न हुईं, वे असाध्वी कृत्याएँ थीं।

श्लोक 9 (13.75.9)

ताभ्यः कामान्यथाकामं प्रादाद्धि स पितामहः । ताः कामलुब्धाः प्रमदाः प्रामथ्नन्त नरान्सदा ॥

tābhyaḥ kāmānyathākāmaṃ prādāddhi sa pitāmahaḥ | tāḥ kāmalubdhāḥ pramadāḥ prāmathnanta narānsadā

पितामह ने उन्हें उनकी इच्छा के अनुसार कामनाएँ दीं; और कामलोभी वे स्त्रियाँ पुरुषों को सदा सताने लगीं।

श्लोक 10 (13.75.10)

क्रोधं कामस्य देवेशः सहायं चासृजत्प्रभुः । असज्जन्त प्रजाः सर्वाः कामक्रोधवशङ्गताः ॥

krodhaṃ kāmasya deveśaḥ sahāyaṃ cāsṛjatprabhuḥ | asajjanta prajāḥ sarvāḥ kāmakrodhavaśaṅgatāḥ

देवेश प्रभु ने काम का सहायक क्रोध भी रचा, और सब प्राणी काम और क्रोध के वश में पड़कर आसक्त हो गए।

श्लोक 11 (13.75.11)

द्विजानां च गुरूणां च महागुरुनृपादिनाम् । क्षणस्त्रीसङ्गकामोत्था यातनाहो निरन्तरा ॥

dvijānāṃ ca gurūṇāṃ ca mahāgurunṛpādinām | kṣaṇastrīsaṅgakāmotthā yātanāho nirantarā

ब्राह्मणों, गुरुजनों, महान् वृद्धजनों, राजाओं आदि के लिए स्त्री-संग की क्षणिक कामना से उत्पन्न होने वाली पीड़ा निरन्तर बनी रहती है।

श्लोक 12 (13.75.12)

अरक्तमनसां नित्यं ब्रह्मचर्यामलात्मनाम् । तपोदमार्चनाध्यानयुक्तानां शुद्धिरुत्तमा ॥

araktamanasāṃ nityaṃ brahmacaryāmalātmanām | tapodamārcanādhyānayuktānāṃ śuddhiruttamā

जिनका मन राग से रहित है, जिनकी आत्मा ब्रह्मचर्य से निर्मल है और जो तप, दम, पूजन तथा ध्यान में लगे रहते हैं, उनकी शुद्धि सर्वोत्तम होती है।

श्लोक 13 (13.75.13)

न च स्त्रीणां क्रियाः काश्चिदिति धर्मो व्यवस्थितः । निरिन्द्रिया ह्यशास्त्राश्च स्त्रियोऽनृतमिति श्रुतिः ॥

na ca strīṇāṃ kriyāḥ kāściditi dharmo vyavasthitaḥ | nirindriyā hyaśāstrāśca striyo'nṛtamiti śrutiḥ

और स्त्रियों के लिए कोई धर्मक्रिया नहीं है, ऐसा धर्म का निश्चय है। स्त्रियाँ निर्बल, शास्त्रज्ञान से रहित और मिथ्यारूप हैं, ऐसा श्रुति कहती है।

श्लोक 14 (13.75.14)

शय्यासनमलङ्कारमन्नपानमनार्यताम् । दुर्वाग्भावं रतिं चैव ददौ स्त्रीभ्यः प्रजापतिः ॥

śayyāsanamalaṅkāramannapānamanāryatām | durvāgbhāvaṃ ratiṃ caiva dadau strībhyaḥ prajāpatiḥ

प्रजापति ने स्त्रियों को शय्या, आसन, अलंकार, अन्न-पान, अनार्यता, कटुवाणी और रति दी।

श्लोक 15 (13.75.15)

न तासां रक्षणं शक्यं कर्तुं पुंसां कथञ्चन । अपि विश्वकृता तात कुतस्तु पुरुषैरिह ॥

na tāsāṃ rakṣaṇaṃ śakyaṃ kartuṃ puṃsāṃ kathañcana | api viśvakṛtā tāta kutastu puruṣairiha

पुरुष किसी प्रकार उनकी रक्षा नहीं कर सकते। हे तात, जब विश्व के रचयिता भी नहीं कर सके, तब इस लोक में पुरुषों की तो बात ही क्या।

श्लोक 16 (13.75.16)

वाचा च वधबन्धैर्वा क्लेशैर्वा विविधैस्तथा । न शक्या रक्षितुं नार्यस्ता हि नित्यमसंयताः ॥

vācā ca vadhabandhairvā kleśairvā vividhaistathā | na śakyā rakṣituṃ nāryastā hi nityamasaṃyatāḥ

वाणी से, वध और बन्धन से, अथवा नाना प्रकार के क्लेशों से भी स्त्रियों की रक्षा नहीं की जा सकती, क्योंकि वे सदा असंयत रहती हैं।

श्लोक 17 (13.75.17)

इदं तु पुरुषव्याघ्र पुरस्ताच्छ्रुतवानहम् । यथा रक्षा कृता पूर्वं विपुलेन गुरुस्त्रियाः ॥

idaṃ tu puruṣavyāghra purastācchrutavānaham | yathā rakṣā kṛtā pūrvaṃ vipulena gurustriyāḥ

हे पुरुषव्याघ्र, मैंने पहले सुना था कि विपुल ने किस प्रकार अपने गुरु की पत्नी की रक्षा की थी।

श्लोक 18 (13.75.18)

ऋषिरासीन्महाभागो देवशर्मेति विश्रुतः । तस्य भार्या रुचिर्नाम रूपेणासदृशी भुवि ॥

ṛṣirāsīnmahābhāgo devaśarmeti viśrutaḥ | tasya bhāryā rucirnāma rūpeṇāsadṛśī bhuvi

देवशर्मा नाम से प्रसिद्ध एक महाभाग ऋषि थे। उनकी पत्नी रुचि थी, जो रूप में पृथ्वी पर अद्वितीय थी।

श्लोक 19 (13.75.19)

तस्या रूपेण सम्मत्ता देवगन्धर्वदानवाः । विशेषेण तु राजेन्द्र वृत्रहा पाकशासनः ॥

tasyā rūpeṇa sammattā devagandharvadānavāḥ | viśeṣeṇa tu rājendra vṛtrahā pākaśāsanaḥ

देवता, गन्धर्व और दानव उसके रूप से मतवाले हो गए थे, और हे राजेन्द्र, विशेष रूप से वृत्रहन्ता पाकशासन इन्द्र।

श्लोक 20 (13.75.20)

नारीणां चरितज्ञश्च देवशर्मा महामतिः । यथाशक्ति यथोत्साहं भार्यां तामभ्यरक्षत ॥

nārīṇāṃ caritajñaśca devaśarmā mahāmatiḥ | yathāśakti yathotsāhaṃ bhāryāṃ tāmabhyarakṣata

स्त्रियों के चरित्र को जानने वाले महाबुद्धिमान् देवशर्मा अपनी शक्ति और उत्साह के अनुसार उस पत्नी की रक्षा करते थे।

श्लोक 21 (13.75.21)

पुरंदरं च जानंश्च परस्त्रीकामचारिणम् । तस्माद्यत्नेन भार्याया रक्षणं स चकार ह ॥

puraṃdaraṃ ca jānaṃśca parastrīkāmacāriṇam | tasmādyatnena bhāryāyā rakṣaṇaṃ sa cakāra ha

पुरन्दर को परस्त्री की कामना से विचरने वाला जानकर वे अपनी पत्नी की रक्षा बड़े यत्न से करते थे।

श्लोक 22 (13.75.22)

स कदाचिदृषिस्तात यज्ञं कर्तुमनास्तदा । भार्यासंरक्षणं कार्यं कथं स्यादित्यचिन्तयत् ॥

sa kadācidṛṣistāta yajñaṃ kartumanāstadā | bhāryāsaṃrakṣaṇaṃ kāryaṃ kathaṃ syādityacintayat

हे तात, एक बार जब वे ऋषि यज्ञ करना चाहते थे, तब वे सोचने लगे कि पत्नी की रक्षा कैसे होगी।

श्लोक 23 (13.75.23)

रक्षाविधानं मनसा स सञ्चिन्त्य महातपाः । आहूय दयितं शिष्यं विपुलं प्राह भार्गवम् ॥

rakṣāvidhānaṃ manasā sa sañcintya mahātapāḥ | āhūya dayitaṃ śiṣyaṃ vipulaṃ prāha bhārgavam

रक्षा का उपाय मन में सोचकर उन महातपस्वी ने अपने प्रिय शिष्य भृगुवंशी विपुल को बुलाकर कहा।

देवशर्मोवाच

श्लोक 24 (13.75.24)

यज्ञकारो गमिष्यामि रुचिं चेमां सुरेश्वरः । यतः प्रार्थयते नित्यं तां रक्षस्व यथाबलम् ॥

yajñakāro gamiṣyāmi ruciṃ cemāṃ sureśvaraḥ | yataḥ prārthayate nityaṃ tāṃ rakṣasva yathābalam

मैं यज्ञ करने जा रहा हूँ। देवेश्वर इन्द्र इस रुचि की सदा कामना करता रहता है; तुम अपनी पूरी शक्ति से इसकी रक्षा करना।

श्लोक 25 (13.75.25)

अप्रमत्तेन ते भाव्यं सदा प्रति पुरंदरम् । स हि रूपाणि कुरुते विविधानि भृगूत्तम ॥

apramattena te bhāvyaṃ sadā prati puraṃdaram | sa hi rūpāṇi kurute vividhāni bhṛgūttama

हे भृगुश्रेष्ठ, तुम्हें पुरन्दर की ओर से सदा सावधान रहना चाहिए, क्योंकि वह अनेक प्रकार के रूप धारण करता है।

भीष्म उवाच

श्लोक 26 (13.75.26)

इत्युक्तो विपुलस्तेन तपस्वी नियतेन्द्रियः । सदैवोग्रतपा राजन्नग्र्यर्कसदृशद्युतिः ॥

ityukto vipulastena tapasvī niyatendriyaḥ | sadaivogratapā rājannagryarkasadṛśadyutiḥ

गुरु के ऐसा कहने पर इन्द्रियों को वश में रखने वाले, सदा उग्र तप करने वाले, अग्नि और सूर्य के समान तेजस्वी तपस्वी विपुल ने, हे राजन्,

श्लोक 27 (13.75.27)

धर्मज्ञः सत्यवादी च तथेति प्रत्यभाषत । पुनश्चेदं महाराज पप्रच्छ प्रस्थितं गुरुम् ॥

dharmajñaḥ satyavādī ca tatheti pratyabhāṣata | punaścedaṃ mahārāja papraccha prasthitaṃ gurum

जो धर्म को जानने वाला और सत्यवादी था, "ऐसा ही हो" कहकर उत्तर दिया। फिर हे महाराज, उसने प्रस्थान करते हुए गुरु से यह भी पूछा।

विपुल उवाच

श्लोक 28 (13.75.28)

कानि रूपाणि शक्रस्य भवन्त्यागच्छतो मुने । वपुस्तेजश्च कीदृग्वै तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥

kāni rūpāṇi śakrasya bhavantyāgacchato mune | vapustejaśca kīdṛgvai tanme vyākhyātumarhasi

हे मुने, इन्द्र जब आता है तब कौन-से रूप धारण करता है? उसका शरीर और तेज कैसा होता है? यह आप मुझे बताइए।

भीष्म उवाच

श्लोक 29 (13.75.29)

ततः स भगवांस्तस्मै विपुलाय महात्मने । आचचक्षे यथातत्त्वं मायां शक्रस्य भारत ॥

tataḥ sa bhagavāṃstasmai vipulāya mahātmane | ācacakṣe yathātattvaṃ māyāṃ śakrasya bhārata

तब उन भगवान् ऋषि ने महात्मा विपुल को इन्द्र की माया यथार्थ रूप से बताई, हे भारत।

देवशर्मोवाच

श्लोक 30 (13.75.30)

बहुमायः स विप्रर्षे बलहा पाकशासनः । तांस्तान्विकुरुते भावान्बहूनथ मुहुर्मुहुः ॥

bahumāyaḥ sa viprarṣe balahā pākaśāsanaḥ | tāṃstānvikurute bhāvānbahūnatha muhurmuhuḥ

हे विप्रर्षि, बल का संहार करने वाला पाकशासन अनेक मायाओं वाला है; वह बार-बार उन-उन अनेक रूपों को धारण करता है।

श्लोक 31 (13.75.31)

किरीटी वज्रधृग्धन्वी मुकुटी बद्धकुण्डलः । भवत्यथ मुहूर्तेन चण्डालसमदर्शनः ॥

kirīṭī vajradhṛgdhanvī mukuṭī baddhakuṇḍalaḥ | bhavatyatha muhūrtena caṇḍālasamadarśanaḥ

वह किरीट, वज्र और धनुष धारण करने वाला, मुकुटधारी और कुण्डल पहने हुए होता है, और क्षण भर में चाण्डाल के समान दिखाई देने लगता है।

श्लोक 32 (13.75.32)

शिखी जटी चीरवासाः पुनर्भवति पुत्रक । बृहच्छरीरश्च पुनश्चीरवासाः पुनः कृशः ॥

śikhī jaṭī cīravāsāḥ punarbhavati putraka | bṛhaccharīraśca punaścīravāsāḥ punaḥ kṛśaḥ

हे पुत्र, वह कभी शिखावाला और जटाधारी होता है, फिर चीर-वस्त्र पहने होता है; कभी विशाल शरीर वाला होता है, फिर चीर-वस्त्रधारी और फिर कृश हो जाता है।

श्लोक 33 (13.75.33)

गौरं श्यामं च कृष्णं च वर्णं विकुरुते पुनः । विरूपो रूपवांश्चैव युवा वृद्धस्तथैव च ॥

gauraṃ śyāmaṃ ca kṛṣṇaṃ ca varṇaṃ vikurute punaḥ | virūpo rūpavāṃścaiva yuvā vṛddhastathaiva ca

वह फिर अपने रंग को बदलता है: गोरा, साँवला या काला; कुरूप या रूपवान्; युवा या वृद्ध।

श्लोक 34 (13.75.34)

प्राज्ञो जडश्च मूकश्च ह्रस्वो दीर्घस्तथैव च । ब्राह्मणः क्षत्रियश्चैव वैश्यः शूद्रस्तथैव च ॥

prājño jaḍaśca mūkaśca hrasvo dīrghastathaiva ca | brāhmaṇaḥ kṣatriyaścaiva vaiśyaḥ śūdrastathaiva ca

वह बुद्धिमान्, जड़ या गूँगा; ठिगना या लम्बा; ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र भी बन जाता है।

श्लोक 35 (13.75.35)

प्रतिलोमोऽनुलोमश्च भवत्यथ शतक्रतुः । शुकवायसरूपी च हंसकोकिलरूपवान् ॥

pratilomo'nulomaśca bhavatyatha śatakratuḥ | śukavāyasarūpī ca haṃsakokilarūpavān

शतक्रतु प्रतिलोम या अनुलोम (वर्णसंकर) जाति का भी हो जाता है; वह तोते, कौए, हंस और कोयल का रूप भी धारण करता है।

श्लोक 36 (13.75.36)

सिंहव्याघ्रगजानां च रूपं धारयते पुनः । दैवं दैत्यमथो राज्ञां वपुर्धारयतेऽपि च ॥

siṃhavyāghragajānāṃ ca rūpaṃ dhārayate punaḥ | daivaṃ daityamatho rājñāṃ vapurdhārayate'pi ca

वह फिर सिंह, व्याघ्र और हाथियों का रूप धारण करता है, और देवता, दैत्य तथा राजाओं का शरीर भी धारण कर लेता है।

श्लोक 37 (13.75.37)

अकृशो वायुभग्नाङ्गः शकुनिर्विकृतस्तथा । चतुष्पाद्बहुरूपश्च पुनर्भवति बालिशः ॥

akṛśo vāyubhagnāṅgaḥ śakunirvikṛtastathā | catuṣpādbahurūpaśca punarbhavati bāliśaḥ

वह कृश न होकर वायु से टूटे अंगों वाला, विकृत पक्षी, अनेक रूपों वाला चौपाया बन जाता है; वह मूढ़ बार-बार ऐसा हो जाता है।

श्लोक 38 (13.75.38)

मक्षिकामशकादीनां वपुर्धारयतेऽपि च । न शक्यमस्य ग्रहणं कर्तुं विपुल केनचित् ॥

makṣikāmaśakādīnāṃ vapurdhārayate'pi ca | na śakyamasya grahaṇaṃ kartuṃ vipula kenacit

वह मक्खी और मच्छर आदि के शरीर भी धारण करता है। हे विपुल, उसे कोई भी पकड़ नहीं सकता,

श्लोक 39 (13.75.39)

अपि विश्वकृता तात येन सृष्टमिदं जगत् । पुनरन्तर्हितः शक्रो दृश्यते ज्ञानचक्षुषा ॥

api viśvakṛtā tāta yena sṛṣṭamidaṃ jagat | punarantarhitaḥ śakro dṛśyate jñānacakṣuṣā

हे तात, उस विश्वकर्ता से भी नहीं, जिसने यह जगत् रचा है। अदृश्य हुआ इन्द्र फिर ज्ञानचक्षु से ही दिखाई देता है।

श्लोक 40 (13.75.40)

वायुभूतश्च स पुनर्देवराजो भवत्युतः । एवंरूपाणि सततं कुरुते पाकशासनः । तस्माद्विपुल यत्नेन रक्षेमां तनुमध्यमाम् ॥

vāyubhūtaśca sa punardevarājo bhavatyutaḥ | evaṃrūpāṇi satataṃ kurute pākaśāsanaḥ | tasmādvipula yatnena rakṣemāṃ tanumadhyamām

वह देवराज वायु के समान भी हो जाता है। पाकशासन निरन्तर ऐसे ही रूप बनाता रहता है। इसलिए हे विपुल, तुम इस कृशोदरी की यत्नपूर्वक रक्षा करना,

श्लोक 41 (13.75.41)

यथा रुचिं नावलिहेद्देवेन्द्रो भृगुसत्तम । क्रतावुपहिते न्यस्तं हविः श्वेव दुरात्मवान् ॥

yathā ruciṃ nāvaliheddevendro bhṛgusattama | kratāvupahite nyastaṃ haviḥ śveva durātmavān

जिससे हे भृगुश्रेष्ठ, इन्द्र रुचि को न चाट जाए, जैसे दुष्ट कुत्ता यज्ञ में रखी हुई हवि को चाट जाता है।

भीष्म उवाच

श्लोक 42 (13.75.42)

एवमाख्याय स मुनिर्यज्ञकारोऽगमत्तदा । देवशर्मा महाभागस्ततो भरतसत्तम ॥

evamākhyāya sa muniryajñakāro'gamattadā | devaśarmā mahābhāgastato bharatasattama

हे भरतश्रेष्ठ, ऐसा कहकर महाभाग मुनि देवशर्मा तब यज्ञ करने चले गए।

श्लोक 43 (13.75.43)

विपुलस्तु वचः श्रुत्वा गुरोश्चिन्तामुपेयिवान् । रक्षां च परमां चक्रे देवराजान्महाबलात् ॥

vipulastu vacaḥ śrutvā gurościntāmupeyivān | rakṣāṃ ca paramāṃ cakre devarājānmahābalāt

गुरु के वचन सुनकर विपुल चिन्ता में पड़ गया और उसने महाबली देवराज से रक्षा का पूरा प्रबन्ध किया।

श्लोक 44 (13.75.44)

किन्नु शक्यं मया कर्तुं गुरुदाराभिरक्षणे । मायावी हि सुरेन्द्रोऽसौ दुर्धर्षश्चापि वीर्यवान् ॥

kinnu śakyaṃ mayā kartuṃ gurudārābhirakṣaṇe | māyāvī hi surendro'sau durdharṣaścāpi vīryavān

"गुरु की पत्नी की रक्षा के विषय में मैं क्या कर सकता हूँ? वह सुरेन्द्र मायावी, दुर्धर्ष और पराक्रमी है।

श्लोक 45 (13.75.45)

नापिधायाश्रमं शक्यो रक्षितुं पाकशासनः । उटजं वा तथा ह्यस्य नानाविधसरूपता ॥

nāpidhāyāśramaṃ śakyo rakṣituṃ pākaśāsanaḥ | uṭajaṃ vā tathā hyasya nānāvidhasarūpatā

आश्रम या कुटिया को बन्द करके पाकशासन से रक्षा नहीं की जा सकती, क्योंकि उसके रूप अनेक प्रकार के हैं।

श्लोक 46 (13.75.46)

वायुरूपेण वा शक्रो गुरुपत्नीं प्रधर्षयेत् । तस्मादिमां सम्प्रविश्य रुचिं स्थास्येऽहमद्य वै ॥

vāyurūpeṇa vā śakro gurupatnīṃ pradharṣayet | tasmādimāṃ sampraviśya ruciṃ sthāsye'hamadya vai

अथवा इन्द्र वायुरूप से गुरुपत्नी पर आक्रमण कर सकता है। इसलिए मैं आज इस रुचि के भीतर प्रवेश करके रहूँगा।

श्लोक 47 (13.75.47)

अथवा पौरुषेणेयं न शक्या रक्षितुं मया । बहुरूपो हि भगवाञ्छ्रूयते पाकशासनः ॥

athavā pauruṣeṇeyaṃ na śakyā rakṣituṃ mayā | bahurūpo hi bhagavāñchrūyate pākaśāsanaḥ

अथवा केवल पुरुषार्थ से मैं इसकी रक्षा नहीं कर सकता, क्योंकि भगवान् पाकशासन बहुत रूप धारण करने वाला सुना जाता है।

श्लोक 48 (13.75.48)

सोऽहं योगबलादेनां रक्षिष्ये पाकशासनात् । गात्राणि गात्रैरस्याहं सम्प्रवेक्ष्ये हि रक्षितुम् ॥

so'haṃ yogabalādenāṃ rakṣiṣye pākaśāsanāt | gātrāṇi gātrairasyāhaṃ sampravekṣye hi rakṣitum

इसलिए मैं योगबल से इसकी पाकशासन से रक्षा करूँगा। रक्षा के लिए मैं अपने अंगों से इसके अंगों में प्रवेश करूँगा।

श्लोक 49 (13.75.49)

यद्युच्छिष्टामिमां पत्नीमद्य पश्यति मे गुरुः । शप्स्यत्यसंशयं कोपाद्दिव्यज्ञानो महातपाः ॥

yadyucchiṣṭāmimāṃ patnīmadya paśyati me guruḥ | śapsyatyasaṃśayaṃ kopāddivyajñāno mahātapāḥ

यदि दिव्य ज्ञान वाले महातपस्वी मेरे गुरु आज अपनी इस पत्नी को उच्छिष्ट (अपवित्र) देखेंगे, तो निःसन्देह क्रोध से मुझे शाप देंगे।

श्लोक 50 (13.75.50)

न चेयं रक्षितुं शक्या यथाऽन्या प्रमदा नृभिः । मायावी हि सुरेन्द्रोऽसावहो प्राप्तोऽस्मि संशयम् ॥

na ceyaṃ rakṣituṃ śakyā yathā'nyā pramadā nṛbhiḥ | māyāvī hi surendro'sāvaho prāpto'smi saṃśayam

जैसे दूसरी स्त्रियों की पुरुष रक्षा कर लेते हैं, वैसे इसकी रक्षा नहीं हो सकती, क्योंकि वह सुरेन्द्र मायावी है। हाय, मैं संशय में पड़ गया हूँ।

श्लोक 51 (13.75.51)

अवश्यं करणीयं हि गुरोरिह हि शासनम् । यदि त्वेतदहं कुर्यामाश्चर्यं स्यात्कृतं मया ॥

avaśyaṃ karaṇīyaṃ hi guroriha hi śāsanam | yadi tvetadahaṃ kuryāmāścaryaṃ syātkṛtaṃ mayā

फिर भी गुरु की आज्ञा का पालन यहाँ अवश्य करना है। यदि मैं यह कर सका, तो यह मेरे द्वारा किया हुआ आश्चर्य होगा।

श्लोक 52 (13.75.52)

योगेनाथ प्रविश्येदं गुरुपत्न्याः कलेवरम् । असक्तः पद्मपत्रस्थो जलबिन्दुर्यथा चलः ॥

yogenātha praviśyedaṃ gurupatnyāḥ kalevaram | asaktaḥ padmapatrastho jalabinduryathā calaḥ

योग से गुरुपत्नी के शरीर में प्रवेश करके, कमल के पत्ते पर चंचल जलबिन्दु के समान अनासक्त रहकर,

श्लोक 53 (13.75.53)

एवमेव शरीरेऽस्या निवत्स्यामि समाहितः । निर्मुक्तस्य रजोरूपान्नापराधो भवेन्मम ॥

evameva śarīre'syā nivatsyāmi samāhitaḥ | nirmuktasya rajorūpānnāparādho bhavenmama

वैसे ही मैं समाहित चित्त होकर इसके शरीर में निवास करूँगा; राग से मुक्त रहने के कारण मुझे कोई अपराध नहीं लगेगा।

श्लोक 54 (13.75.54)

यथाहि शून्यां पथिकः सभामध्यावसेत्पथि । तथाऽद्यावासयिष्यामि गुरुपत्न्याः कलेवरम् । एवमेव शरीरेऽस्या निवत्स्यामि समाहितः ॥

yathāhi śūnyāṃ pathikaḥ sabhāmadhyāvasetpathi | tathā'dyāvāsayiṣyāmi gurupatnyāḥ kalevaram | evameva śarīre'syā nivatsyāmi samāhitaḥ

जैसे मार्ग में पथिक किसी सूनी सभा में ठहर जाता है, वैसे ही आज मैं गुरुपत्नी के शरीर में निवास करूँगा। इसी प्रकार मैं समाहित चित्त होकर उसके शरीर में रहूँगा।"

श्लोक 55 (13.75.55)

इत्येवं धर्ममालोक्य वेदवेदांश्च सर्वशः । तपश्च विपुलं दृष्ट्वा गुरोरात्मन एव च ॥

ityevaṃ dharmamālokya vedavedāṃśca sarvaśaḥ | tapaśca vipulaṃ dṛṣṭvā gurorātmana eva ca

इस प्रकार धर्म, सम्पूर्ण वेद-वेदांगों तथा गुरु और अपने महान् तप का विचार करके,

श्लोक 56 (13.75.56)

इति निश्चित्य मनसा रक्षां प्रति स भार्गवः । अन्वतिष्ठत्परं यत्नं यथा तच्छृणु पार्थिव ॥

iti niścitya manasā rakṣāṃ prati sa bhārgavaḥ | anvatiṣṭhatparaṃ yatnaṃ yathā tacchṛṇu pārthiva

मन में रक्षा का ऐसा निश्चय कर भार्गव ने परम प्रयत्न किया। हे राजन्, वह जिस प्रकार हुआ, सुनो।

श्लोक 57 (13.75.57)

गुरुपत्नीं समासीनो विपुलः स महातपाः । उपासीनामनिन्द्याङ्गीं कथार्थैः समलोभयत् ॥

gurupatnīṃ samāsīno vipulaḥ sa mahātapāḥ | upāsīnāmanindyāṅgīṃ kathārthaiḥ samalobhayat

महातपस्वी विपुल गुरुपत्नी के पास बैठा और समीप बैठी हुई उस अनिन्द्य अंगों वाली स्त्री को कथाओं और बातों में लगाए रहा।

श्लोक 58 (13.75.58)

नेत्राभ्यां नेत्रयोरस्या रश्मिं संयोज्य रश्मिभिः । विवेश विपुलः कायमाकाशं पवनो यथा ॥

netrābhyāṃ netrayorasyā raśmiṃ saṃyojya raśmibhiḥ | viveśa vipulaḥ kāyamākāśaṃ pavano yathā

अपनी नेत्र-किरणों को उसके नेत्रों की किरणों से मिलाकर विपुल उसके शरीर में वैसे प्रविष्ट हुआ जैसे वायु आकाश में प्रवेश करता है।

श्लोक 59 (13.75.59)

लक्षणं लक्षणेनैव वदनं वदनेन च । अविचेष्टन्नतिष्ठद्वै छायेवान्तर्गतो मुनिः ॥

lakṣaṇaṃ lakṣaṇenaiva vadanaṃ vadanena ca | aviceṣṭannatiṣṭhadvai chāyevāntargato muniḥ

उसके लक्षणों से अपने लक्षण और मुख से मुख मिलाकर वह मुनि छाया के समान निश्चेष्ट होकर उसके भीतर टिका रहा।

श्लोक 60 (13.75.60)

ततो विष्टभ्य विपुलो गुरुपत्न्याः कलेवरम् । उवास रक्षणे युक्तो न च सा तमबुध्यत ॥

tato viṣṭabhya vipulo gurupatnyāḥ kalevaram | uvāsa rakṣaṇe yukto na ca sā tamabudhyata

तब गुरुपत्नी के शरीर को अपने नियन्त्रण में लेकर विपुल रक्षा में लगा हुआ वहाँ रहा, और उसे उसका पता नहीं चला।

श्लोक 61 (13.75.61)

यं कालं नागतो राजन्गुरुस्तस्य महात्मनः । क्रतुं समाप्य स्वगृहं तं कालं सोऽभ्यरक्षत ॥

yaṃ kālaṃ nāgato rājangurustasya mahātmanaḥ | kratuṃ samāpya svagṛhaṃ taṃ kālaṃ so'bhyarakṣata

हे राजन्, जब तक उन महात्मा गुरु का आगमन नहीं हुआ, अर्थात् जब तक वे यज्ञ समाप्त करके घर नहीं लौटे, तब तक वह उसकी रक्षा करता रहा।

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