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अनुशासन पर्व · अध्याय 76

विपुल द्वारा इन्द्र का तिरस्कार

इन्द्र सुन्दर रूप धारण कर देवशर्मा के आश्रम में आता है और रुचि को निश्चल बैठी पाता है, जिसके शरीर में विपुल छिपा हुआ है। इन्द्र के बोलने पर विपुल योग से उसकी इन्द्रियों को बाँध देता है और उसकी ओर से स्वयं उत्तर देता है। इन्द्र भीतर बैठे मुनि को देखकर काँप उठता है; विपुल रुचि का शरीर छोड़कर इन्द्र की कामवृत्ति के लिए उसे फटकारता है और लौटा देता है। देवशर्मा लौटकर विपुल से सारा वृत्तान्त सुनते हैं और शिष्य के आचरण तथा धर्म में स्थिरता से प्रसन्न होते हैं।

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भीष्म उवाच

श्लोक 1 (13.76.1)

ततः कदाचिद्देवेन्द्रो दिव्यरूपवपुर्धरः । इदमन्तरमित्येवमभ्यगात्तमथाश्रमम् ॥

tataḥ kadāciddevendro divyarūpavapurdharaḥ | idamantaramityevamabhyagāttamathāśramam

तब एक बार देवेन्द्र ने दिव्य और तेजस्वी रूप धारण कर, "यही अवसर है" ऐसा सोचकर उस आश्रम में प्रवेश किया।

श्लोक 2 (13.76.2)

रूपमप्रतिमं कृत्वा लोभनीयं जनाधिपः । दर्शनीयतमो भूत्वा प्रविवेश तमाश्रमम् ॥

rūpamapratimaṃ kṛtvā lobhanīyaṃ janādhipaḥ | darśanīyatamo bhūtvā praviveśa tamāśramam

हे नरेश, अनुपम और लुभावना रूप बनाकर, अत्यन्त दर्शनीय होकर वह उस आश्रम में घुसा।

श्लोक 3 (13.76.3)

स ददर्श तमासीनं विपुलस्य कलेबरम् । निश्चेष्टं स्तब्धनयनं यथाऽऽलेख्यगतं तथा ॥

sa dadarśa tamāsīnaṃ vipulasya kalebaram | niśceṣṭaṃ stabdhanayanaṃ yathā''lekhyagataṃ tathā

उसने विपुल के शरीर को वहाँ बैठा देखा, जो निश्चेष्ट, स्थिर नेत्रों वाला और चित्र में लिखे हुए के समान था।

श्लोक 4 (13.76.4)

रुचिं च रुचिरापाङ्गीं पीनश्रोणिपयोधराम् । पद्मपत्रविशालाक्षीं सम्पूर्णेन्दुनिभाननाम् ॥

ruciṃ ca rucirāpāṅgīṃ pīnaśroṇipayodharām | padmapatraviśālākṣīṃ sampūrṇendunibhānanām

और उसने सुन्दर कटाक्षों वाली रुचि को देखा, जिसके कूल्हे और स्तन भरे हुए थे, नेत्र कमलदल के समान विशाल थे और मुख पूर्णचन्द्र के समान था।

श्लोक 5 (13.76.5)

सा तमालोक्य सहसा प्रत्युत्थातुमियेष ह । रूपेण विस्मिता कोऽसीत्यथ वक्तुमिवेच्छती ॥

sā tamālokya sahasā pratyutthātumiyeṣa ha | rūpeṇa vismitā ko'sītyatha vaktumivecchatī

उसे देखकर वह सहसा उठने लगी; उसके रूप से विस्मित होकर वह "तुम कौन हो?" यह पूछना चाहती थी।

श्लोक 6 (13.76.6)

उत्थातुकामा तु सती विष्टब्धा विपुलेन सा । निगृहीता मनुष्येन्द्र न शशाक विचेष्टितुम् ॥

utthātukāmā tu satī viṣṭabdhā vipulena sā | nigṛhītā manuṣyendra na śaśāka viceṣṭitum

उठना चाहती हुई भी वह सती विपुल द्वारा जकड़ ली गई थी; हे नरेन्द्र, वह रोकी जाने पर हिल-डुल भी न सकी।

श्लोक 7 (13.76.7)

तामाबभाषे देवेन्द्रः साम्ना परमवल्गुना । त्वदर्थमागतं विद्धि देवेन्द्रं मां शुचिस्मिते ॥

tāmābabhāṣe devendraḥ sāmnā paramavalgunā | tvadarthamāgataṃ viddhi devendraṃ māṃ śucismite

इन्द्र ने उससे मधुर और अत्यन्त मनोहर वाणी में कहा: "हे सुन्दर मुस्कान वाली, जान लो कि मैं तुम्हारे ही लिए आया हूँ; मैं देवेन्द्र हूँ।

शक्र उवाच

श्लोक 8 (13.76.8)

क्लिश्यमानमनङ्गेन त्वत्सङ्कल्पभवेन ह । तत्पर्याप्नुहि मां सुभ्रु पुरा कालोऽतिवर्तते ॥

kliśyamānamanaṅgena tvatsaṅkalpabhavena ha | tatparyāpnuhi māṃ subhru purā kālo'tivartate

तुम्हारी कामना से उत्पन्न कामदेव मुझे पीड़ित कर रहा है। हे सुन्दर भौंहों वाली, तुम मुझे स्वीकार करो; समय बीत रहा है।"

भीष्म उवाच

श्लोक 9 (13.76.9)

तमेवंवादिनं शक्रं शुश्राव विपुलो मुनिः । गुरुपत्न्याः शरीरस्थो ददर्श त्रिदशाधिपम् ॥

tamevaṃvādinaṃ śakraṃ śuśrāva vipulo muniḥ | gurupatnyāḥ śarīrastho dadarśa tridaśādhipam

इन्द्र को ऐसा कहते हुए मुनि विपुल ने सुना; गुरुपत्नी के शरीर के भीतर रहकर उसने देवाधिपति को देख लिया।

श्लोक 10 (13.76.10)

न शशाक च सा राजन्प्रत्युत्थातुमनिन्दिता । वक्तुं च नाशकद्राजन्विष्टब्धा विपुलेन सा ॥

na śaśāka ca sā rājanpratyutthātumaninditā | vaktuṃ ca nāśakadrājanviṣṭabdhā vipulena sā

और वह निर्दोष स्त्री, हे राजन्, न उठकर उसका स्वागत कर सकी, न कुछ बोल सकी; विपुल ने उसे जकड़ रखा था।

श्लोक 11 (13.76.11)

आकारं गुरुपत्न्यास्तु स विज्ञाय भृगूद्वहः । निजग्राह महातेजा योगेन बलवत्प्रभो । बबन्ध योगबन्धैश्च तस्याः सर्वेन्द्रियाणि सः ॥

ākāraṃ gurupatnyāstu sa vijñāya bhṛgūdvahaḥ | nijagrāha mahātejā yogena balavatprabho | babandha yogabandhaiśca tasyāḥ sarvendriyāṇi saḥ

गुरुपत्नी की दशा को जानकर महातेजस्वी भृगुवंशी विपुल ने, हे प्रभो, योगबल से उसे पकड़ लिया और योग के बन्धनों से उसकी सब इन्द्रियों को बाँध दिया।

श्लोक 12 (13.76.12)

तां निर्विकारां दृष्ट्वा तु पुनरेव शचीपतिः । उवाच व्रीडितो राजंस्तां योगबलमोहिताम् ॥

tāṃ nirvikārāṃ dṛṣṭvā tu punareva śacīpatiḥ | uvāca vrīḍito rājaṃstāṃ yogabalamohitām

उसे विकाररहित देखकर शचीपति ने फिर लज्जित होकर, हे राजन्, योगबल से मोहित उस स्त्री से कहा।

श्लोक 13 (13.76.13)

एह्येहीति ततः सा तु प्रतिवक्तुमियेष तम् । स तां वाचं गुरोः पत्न्या विपुलः पर्यवर्तयत् ॥

ehyehīti tataḥ sā tu prativaktumiyeṣa tam | sa tāṃ vācaṃ guroḥ patnyā vipulaḥ paryavartayat

"आओ, आओ" ऐसा वह उसे उत्तर देना चाहती थी; किन्तु विपुल ने गुरुपत्नी की उस वाणी को पलट दिया।

श्लोक 14 (13.76.14)

भोः किमागमने कृत्यमिति तस्यास्तु निःसृता । वक्त्राच्छशाङ्कसदृशाद्वाणी संस्कारभूषणा ॥

bhoḥ kimāgamane kṛtyamiti tasyāstu niḥsṛtā | vaktrācchaśāṅkasadṛśādvāṇī saṃskārabhūṣaṇā

"महाशय, आपके आने का क्या प्रयोजन है?" ऐसी संस्कार से सुशोभित वाणी उसके चन्द्रमा-जैसे मुख से निकली।

श्लोक 15 (13.76.15)

व्रीडिता सा तु तद्वाक्यमुक्त्वा परवशा तदा । पुरन्दरश्च संत्रस्तो बभूव विमना भृशम् ॥

vrīḍitā sā tu tadvākyamuktvā paravaśā tadā | purandaraśca saṃtrasto babhūva vimanā bhṛśam

पराधीन होकर वे वचन कहने के बाद वह लज्जित हो गई; और पुरन्दर भी डर गया तथा अत्यन्त उदास हो गया।

श्लोक 16 (13.76.16)

स तद्वैकृतमालक्ष्य देवराजो विशांपते । अवैक्षत सहस्राक्षस्तदा दिव्येन चक्षुषा ॥

sa tadvaikṛtamālakṣya devarājo viśāṃpate | avaikṣata sahasrākṣastadā divyena cakṣuṣā

उस विकार को देखकर देवराज सहस्राक्ष ने, हे प्रजापालक, दिव्य नेत्र से देखा।

श्लोक 17 (13.76.17)

स ददर्श मुनिं तस्याः शरीरान्तरगोचरम् । प्रतिबिम्बमिवादर्शे गुरुपत्न्याः शरीरगम् ॥

sa dadarśa muniṃ tasyāḥ śarīrāntaragocaram | pratibimbamivādarśe gurupatnyāḥ śarīragam

उसने मुनि को उसके शरीर के भीतर घूमते देखा, जैसे दर्पण में प्रतिबिम्ब हो, गुरुपत्नी के शरीर में बैठा हुआ।

श्लोक 18 (13.76.18)

स तं घोरेण तपसा युक्तं दृष्ट्वा पुरंदरः । प्रावेपत सुसंत्रस्तो व्रीडितश्च तदा विभो ॥

sa taṃ ghoreṇa tapasā yuktaṃ dṛṣṭvā puraṃdaraḥ | prāvepata susaṃtrasto vrīḍitaśca tadā vibho

उसे घोर तप से युक्त देखकर पुरन्दर अत्यन्त भयभीत होकर काँप उठा और, हे विभो, लज्जित भी हुआ।

श्लोक 19 (13.76.19)

विमुच्य गुरुपत्नीं तु विपुलः सुमहातपाः । स्वकलेबरमाविश्य शक्रं भीतमथाब्रवीत् ॥

vimucya gurupatnīṃ tu vipulaḥ sumahātapāḥ | svakalebaramāviśya śakraṃ bhītamathābravīt

महातपस्वी विपुल गुरुपत्नी को छोड़कर अपने शरीर में प्रविष्ट हुआ और भयभीत इन्द्र से बोला।

विपुल उवाच

श्लोक 20 (13.76.20)

अजितेन्द्रिय दुर्बुद्धे पापात्मक पुरंदर । न चिरं पूजयिष्यन्ति देवास्त्वां मानुषास्तथा ॥

ajitendriya durbuddhe pāpātmaka puraṃdara | na ciraṃ pūjayiṣyanti devāstvāṃ mānuṣāstathā

"हे अजितेन्द्रिय, दुर्बुद्धि, पापस्वभाव पुरन्दर! देवता और मनुष्य तुम्हारी पूजा अधिक समय तक नहीं करेंगे।

श्लोक 21 (13.76.21)

किन्नु तद्विस्मृतं शक्र न तन्मनसि ते स्थितम् । गौतमेनासि यन्मुक्तो भगाङ्कपरिचिह्नितः ॥

kinnu tadvismṛtaṃ śakra na tanmanasi te sthitam | gautamenāsi yanmukto bhagāṅkaparicihnitaḥ

हे शक्र, क्या तुम उसे भूल गए? क्या वह तुम्हारे मन में नहीं है कि गौतम ने तुम्हें, भग के चिह्न से चिह्नित अवस्था में, छोड़ा था?

श्लोक 22 (13.76.22)

जाने त्वां बालिशमतिमकृतात्मानमस्थिरम् । मयेयं रक्ष्यते मूढ गच्छ पाप यथागतम् ॥

jāne tvāṃ bāliśamatimakṛtātmānamasthiram | mayeyaṃ rakṣyate mūḍha gaccha pāpa yathāgatam

मैं जानता हूँ कि तुम मूढ़बुद्धि, अशिक्षित आत्मा वाले और चंचल हो। इसकी रक्षा मैं कर रहा हूँ; हे मूढ़, हे पापी, जैसे आए थे वैसे ही चले जाओ।

श्लोक 23 (13.76.23)

नाहं त्वामद्य मूढात्मन्दहेयं हि स्वतेजसा । कृपायमानस्तु न ते दग्धुमिच्छामि वासव ॥

nāhaṃ tvāmadya mūḍhātmandaheyaṃ hi svatejasā | kṛpāyamānastu na te dagdhumicchāmi vāsava

हे मूढ़, मैं आज अपने तेज से तुम्हें जला सकता हूँ; किन्तु दया के कारण, हे वासव, मैं तुम्हें जलाना नहीं चाहता।

श्लोक 24 (13.76.24)

स च घोरतमो धीमान्गुरुर्मे पापचेतसम् । दृष्ट्वा त्वां निर्दहेदद्य क्रोधदीप्तेन चक्षुषा ॥

sa ca ghoratamo dhīmāngururme pāpacetasam | dṛṣṭvā tvāṃ nirdahedadya krodhadīptena cakṣuṣā

किन्तु मेरे गुरु अत्यन्त घोर तेज वाले और बुद्धिमान् हैं; तुम पापचित्त को देखकर वे आज क्रोध से जलती आँखों से तुम्हें भस्म कर देंगे।

श्लोक 25 (13.76.25)

नैवं तु शक्र कर्तव्यं पुनर्मान्याश्च ते द्विजाः । मा गमः ससुतामात्यः क्षयं ब्रह्मबलार्दितः ॥

naivaṃ tu śakra kartavyaṃ punarmānyāśca te dvijāḥ | mā gamaḥ sasutāmātyaḥ kṣayaṃ brahmabalārditaḥ

हे शक्र, ऐसा फिर मत करना; ब्राह्मण तुम्हारे लिए माननीय हैं। ब्रह्मबल से पीड़ित होकर पुत्रों और मन्त्रियों सहित नाश को मत प्राप्त होओ।

श्लोक 26 (13.76.26)

अमरोऽस्मीति यद्बुद्धिं समास्थाय प्रवर्तते । मावमंस्था न तपसा न साध्यं नाम किञ्चन ॥

amaro'smīti yadbuddhiṃ samāsthāya pravartate | māvamaṃsthā na tapasā na sādhyaṃ nāma kiñcana

जो "मैं अमर हूँ" इस बुद्धि का सहारा लेकर चलता है, वह तपस्वियों का अपमान न करे; तप से कुछ भी असाध्य नहीं है।"

भीष्म उवाच

श्लोक 27 (13.76.27)

तच्छ्रुत्वा वचनं शक्रो विपुलस्य महात्मनः । न किञ्चिदुक्त्वा व्रीडार्तस्तत्रैवान्तरधीयत ॥

tacchrutvā vacanaṃ śakro vipulasya mahātmanaḥ | na kiñciduktvā vrīḍārtastatraivāntaradhīyata

महात्मा विपुल के वचन सुनकर इन्द्र लज्जा से पीड़ित होकर कुछ न बोला और वहीं अन्तर्धान हो गया।

श्लोक 28 (13.76.28)

मुहूर्तयाते तस्मिंस्तु देवशर्मा महातपाः । कृत्वा यज्ञं यथाकाममाजगाम स्वमाश्रमम् ॥

muhūrtayāte tasmiṃstu devaśarmā mahātapāḥ | kṛtvā yajñaṃ yathākāmamājagāma svamāśramam

उसके जाने के एक मुहूर्त बाद महातपस्वी देवशर्मा यज्ञ को इच्छानुसार पूर्ण करके अपने आश्रम लौट आए।

श्लोक 29 (13.76.29)

आगतेऽथ गुरौ राजन्विपुलः प्रियकर्मकृत् । रक्षितां गुरवे भार्यां न्यवेदयदनिन्दिताम् ॥

āgate'tha gurau rājanvipulaḥ priyakarmakṛt | rakṣitāṃ gurave bhāryāṃ nyavedayadaninditām

हे राजन्, गुरु के आने पर प्रिय करने वाले विपुल ने निर्दोष और सुरक्षित भार्या को गुरु को सौंप दिया।

श्लोक 30 (13.76.30)

अभिवाद्य च शान्तात्मा स गुरुं गुरुवत्सलः । विपुलः पर्युपातिष्ठद्यथापूर्वमशङ्कितः ॥

abhivādya ca śāntātmā sa guruṃ guruvatsalaḥ | vipulaḥ paryupātiṣṭhadyathāpūrvamaśaṅkitaḥ

गुरु को प्रणाम करके गुरुभक्त और शान्त विपुल पहले की तरह निःशंक होकर उनकी सेवा में उपस्थित रहा।

श्लोक 31 (13.76.31)

विश्रान्ताय ततस्तस्मै सहासीनाय भार्यया । निवेदयामास तदा विपुलः शक्रकर्म तत् ॥

viśrāntāya tatastasmai sahāsīnāya bhāryayā | nivedayāmāsa tadā vipulaḥ śakrakarma tat

जब गुरु विश्राम कर चुके और पत्नी के साथ बैठे थे, तब विपुल ने उन्हें इन्द्र का वह कार्य बताया।

श्लोक 32 (13.76.32)

तच्छुत्वा स मुनिस्तुष्टो विपुलस्य प्रतापवान् । बभूव शीलवृत्ताभ्यां तपसा नियमेन च ॥

tacchutvā sa munistuṣṭo vipulasya pratāpavān | babhūva śīlavṛttābhyāṃ tapasā niyamena ca

यह सुनकर प्रतापी मुनि विपुल के शील, आचरण, तप और नियम से प्रसन्न हुए।

श्लोक 33 (13.76.33)

विपुलस्य गुरौ वृत्तिं भक्तिमात्मनि तत्प्रभुः । धर्मे च स्थिरतां दृष्ट्वा साधुसाध्वित्यभाषत ॥

vipulasya gurau vṛttiṃ bhaktimātmani tatprabhuḥ | dharme ca sthiratāṃ dṛṣṭvā sādhusādhvityabhāṣata

विपुल का गुरु के प्रति व्यवहार, अपने में भक्ति और धर्म में स्थिरता देखकर प्रभु ने कहा, "साधु, साधु!"

श्लोक 34 (13.76.34)

प्रतिनन्द्य च धर्मात्मा शिष्यं धर्मपरायणम् । वरेण च्छन्दयामास देवशर्मा महामतिः ॥

pratinandya ca dharmātmā śiṣyaṃ dharmaparāyaṇam | vareṇa cchandayāmāsa devaśarmā mahāmatiḥ

धर्मपरायण शिष्य का अभिनन्दन करके धर्मात्मा और महाबुद्धिमान् देवशर्मा ने उसे वर माँगने के लिए प्रेरित किया।

श्लोक 35 (13.76.35)

स्थितिं च धर्मे जग्राह स तस्माद्गुरुवत्सलः । अनुज्ञातश्च गुरुणा चचारानुत्तमं तपः ॥

sthitiṃ ca dharme jagrāha sa tasmādguruvatsalaḥ | anujñātaśca guruṇā cacārānuttamaṃ tapaḥ

गुरुभक्त विपुल ने उनसे धर्म में स्थिरता का वर प्राप्त किया और गुरु की आज्ञा पाकर सर्वोत्तम तप किया।

श्लोक 36 (13.76.36)

तथैव देवशर्मापि सभार्यः स महातपाः । निर्भयो बलवृत्रघ्नाच्चचार विजने वने ॥

tathaiva devaśarmāpi sabhāryaḥ sa mahātapāḥ | nirbhayo balavṛtraghnāccacāra vijane vane

वैसे ही महातपस्वी देवशर्मा भी पत्नी सहित बल और वृत्र के संहारक इन्द्र से निर्भय होकर निर्जन वन में विचरने लगे।

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