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अनुशासन पर्व · अध्याय 77

विपुल का झगड़ते दम्पति का शाप सुनना

अपने तप पर गर्वित विपुल दोनों लोकों को जीता हुआ मानकर निर्भय विचरता है। रुचि की बहन के बुलावे पर रुचि पति की आज्ञा से विपुल को बहन के लिए दिव्य पुष्प लाने भेजती है; चम्पा के मार्ग में उसे एक झगड़ता हुआ जोड़ा मिलता है, जो शपथ लेता है कि जो झूठ बोला हो उसे वही गति मिले जो विपुल को परलोक में मिलेगी; छह जुआरी भी वही शपथ लेते हैं। व्यथित विपुल अपने अतीत की खोज करके समझता है कि उसने गुरु को यह नहीं बताया था कि वह रुचि के शरीर में प्रविष्ट हुआ था, और वह चम्पा पहुँचकर गुरु को पुष्प अर्पित करता है।

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भीष्म उवाच

श्लोक 1 (13.77.1)

विपुलस्त्वकरोत्तीव्रं तपः कृत्वा गुरोर्वचः । तपोयुक्तमथात्मानममन्यत स वीर्यवान् ॥

vipulastvakarottīvraṃ tapaḥ kṛtvā gurorvacaḥ | tapoyuktamathātmānamamanyata sa vīryavān

गुरु के वचन के अनुसार विपुल ने कठोर तप किया और उस पराक्रमी ने अपने को तप से युक्त माना।

श्लोक 2 (13.77.2)

स तेन कर्मणा स्वर्गं पृथिवीं पृथिवीपते । चचार गतभीः प्रीतो लब्धकीर्तिवरो नृप ॥

sa tena karmaṇā svargaṃ pṛthivīṃ pṛthivīpate | cacāra gatabhīḥ prīto labdhakīrtivaro nṛpa

हे पृथ्वीपते, उस कर्म के कारण वह कीर्ति पाकर निर्भय और प्रसन्न होकर स्वर्ग और पृथ्वी पर विचरता रहा, हे नृप।

श्लोक 3 (13.77.3)

उभौ लोकौ जितौ चापि तथैवामन्यत प्रभुः । कर्मणा तेन कौरव्य तपसा विपुलेन च ॥

ubhau lokau jitau cāpi tathaivāmanyata prabhuḥ | karmaṇā tena kauravya tapasā vipulena ca

हे कौरव्य, उस कर्म और महान् तप से उस प्रभु ने यह भी माना कि उसने दोनों लोक जीत लिए हैं।

श्लोक 4 (13.77.4)

अथ काले व्यतिक्रान्ते कस्मिंश्चित्कुरुनन्दन । रुच्या भगिन्या आदानं प्रभूतधनधान्यवत् ॥

atha kāle vyatikrānte kasmiṃścitkurunandana | rucyā bhaginyā ādānaṃ prabhūtadhanadhānyavat

हे कुरुनन्दन, कुछ समय बीतने पर रुचि की बहन के यहाँ एक आयोजन हुआ, जिसमें बन्धुओं के उपहार लिए जाते थे और जो धन-धान्य से समृद्ध था।

श्लोक 5 (13.77.5)

एतस्मिन्नेव काले तु दिव्या काचिद्वराङ्गना । बिभ्रती परमं रूपं जगामाथ विहायसा ॥

etasminneva kāle tu divyā kācidvarāṅganā | bibhratī paramaṃ rūpaṃ jagāmātha vihāyasā

उसी समय परम सौन्दर्य धारण किए कोई दिव्य सुन्दरी आकाश-मार्ग से जा रही थी।

श्लोक 6 (13.77.6)

तस्याः शरीरात्पुष्पाणि पतितानि महीतले । तस्याश्रमस्याविदूरे दिव्यगन्धानि भारत ॥

tasyāḥ śarīrātpuṣpāṇi patitāni mahītale | tasyāśramasyāvidūre divyagandhāni bhārata

हे भारत, उसके शरीर से दिव्य सुगन्ध वाले पुष्प उस आश्रम के पास ही भूमि पर गिर पड़े।

श्लोक 7 (13.77.7)

तान्यगृह्णात्ततो राजन्रुचिर्ललितलोचना । तदा निमन्त्रकस्तस्या अङ्गेभ्यः क्षिप्रमागमत् ॥

tānyagṛhṇāttato rājanrucirlalitalocanā | tadā nimantrakastasyā aṅgebhyaḥ kṣipramāgamat

तब, हे राजन्, सुन्दर नेत्रों वाली रुचि ने उन्हें उठा लिया; और उसी समय अंग देश से निमन्त्रण लेकर दूत उसके पास शीघ्र आ पहुँचा।

श्लोक 8 (13.77.8)

तस्या हि भगिनी तात ज्येष्ठा नाम्ना प्रभावती । भार्या चित्ररथस्याथ बभूवाङ्गेश्वरस्य वै ॥

tasyā hi bhaginī tāta jyeṣṭhā nāmnā prabhāvatī | bhāryā citrarathasyātha babhūvāṅgeśvarasya vai

हे तात, उसकी बड़ी बहन प्रभावती अंगराज चित्ररथ की पत्नी थी।

श्लोक 9 (13.77.9)

पिनह्य तानि पुष्पाणि केशेषु वरवर्णिनी । आमन्त्रिता ततोऽगच्छद्रुचिरङ्गपतेर्गृहम् ॥

pinahya tāni puṣpāṇi keśeṣu varavarṇinī | āmantritā tato'gacchadruciraṅgapatergṛham

उन पुष्पों को केशों में सजाकर वह सुन्दरी रुचि निमन्त्रित होकर अंगराज के घर गई।

श्लोक 10 (13.77.10)

पुष्पाणि तानि दृष्ट्वा तु तदाङ्गेन्द्रवराङ्गना । भगिनीं चोदयामास पुष्पार्थे चारुलोचना ॥

puṣpāṇi tāni dṛṣṭvā tu tadāṅgendravarāṅganā | bhaginīṃ codayāmāsa puṣpārthe cārulocanā

उन पुष्पों को देखकर अंगराज की सुनयना रानी ने बहन से वैसे ही पुष्प लाने के लिए आग्रह किया।

श्लोक 11 (13.77.11)

सा भर्त्रे सर्वमाचष्ट रुचिः सुरुचिरानना । भगिन्या भाषितं सर्वमृषिस्तच्चाभ्यनन्दत ॥

sā bhartre sarvamācaṣṭa ruciḥ surucirānanā | bhaginyā bhāṣitaṃ sarvamṛṣistaccābhyanandata

सुन्दर मुख वाली रुचि ने पति से सब कुछ कहा, और ऋषि ने बहन की कही हुई सब बात का अनुमोदन किया।

श्लोक 12 (13.77.12)

ततो विपुलमानाय्य देवशर्मा महातपाः । पुष्पार्थे चोदयामास गच्छगच्छेति भारत ॥

tato vipulamānāyya devaśarmā mahātapāḥ | puṣpārthe codayāmāsa gacchagaccheti bhārata

तब महातपस्वी देवशर्मा ने विपुल को बुलाकर, हे भारत, "जाओ, जाओ" कहकर पुष्पों के लिए भेजा।

श्लोक 13 (13.77.13)

विपुलस्तु गुरोर्वाक्यमविचार्य महातपाः । स तथेत्यब्रवीद्राजंस्तं च देशं जगाम ह ॥

vipulastu gurorvākyamavicārya mahātapāḥ | sa tathetyabravīdrājaṃstaṃ ca deśaṃ jagāma ha

महातपस्वी विपुल ने गुरु की बात पर विचार किए बिना "ऐसा ही हो" कहा, हे राजन्, और उस स्थान को चला गया।

श्लोक 14 (13.77.14)

यस्मिन्देशे तु तान्यासन्पतितानि नभस्तलात् । अम्लानान्यपि तत्रासन्कुसुमान्यपराण्यपि ॥

yasmindeśe tu tānyāsanpatitāni nabhastalāt | amlānānyapi tatrāsankusumānyaparāṇyapi

जहाँ आकाश से वे पुष्प गिरे थे, वहाँ और भी अनेक कुसुम बिना मुरझाए पड़े थे।

श्लोक 15 (13.77.15)

स ततस्तानि जग्राह दिव्यानि रुचिराणि च । प्राप्तानि स्वेन तपसा दिव्यगन्धानि भारत ॥

sa tatastāni jagrāha divyāni rucirāṇi ca | prāptāni svena tapasā divyagandhāni bhārata

हे भारत, उसने उन दिव्य, मनोहर और दिव्य सुगन्ध वाले पुष्पों को, जो उसे अपने तप से प्राप्त हुए थे, चुन लिया।

श्लोक 16 (13.77.16)

सम्प्राप्य तानि प्रीतात्मा गुरोर्वचनकारकः । तदा जगाम तूर्णं च चम्पां चम्पकमालिनीम् ॥

samprāpya tāni prītātmā gurorvacanakārakaḥ | tadā jagāma tūrṇaṃ ca campāṃ campakamālinīm

उन्हें पाकर गुरु की आज्ञा का पालन करने वाला वह प्रसन्नचित्त होकर शीघ्र चम्पक-माला से सुशोभित चम्पा नगरी की ओर चल पड़ा।

श्लोक 17 (13.77.17)

स वने निर्जने तात ददर्श मिथुनं नृणाम् । चक्रवत्परिवर्तन्तं गृहीत्वा पाणिना करम् ॥

sa vane nirjane tāta dadarśa mithunaṃ nṛṇām | cakravatparivartantaṃ gṛhītvā pāṇinā karam

हे तात, उसने निर्जन वन में एक स्त्री-पुरुष के जोड़े को देखा, जो हाथ से हाथ पकड़े चक्र की तरह घूम रहा था।

श्लोक 18 (13.77.18)

तत्रैकस्तूर्णमगमत्तत्पदे च विवर्तयन् । एकस्तु न तदा राजंश्चक्रतुः कलहं ततः ॥

tatraikastūrṇamagamattatpade ca vivartayan | ekastu na tadā rājaṃścakratuḥ kalahaṃ tataḥ

उनमें से एक तेजी से चला जा रहा था और दूसरे को अपने पदचिह्नों पर घुमा रहा था; दूसरा उतनी तेजी से नहीं चला, तब, हे राजन्, वे दोनों झगड़ने लगे।

श्लोक 19 (13.77.19)

त्वं शीघ्रं गच्छसीत्येकोऽब्रवीन्नेति तथाऽपरः । पतितेति च तौ राजन्परस्परमथोचतुः ॥

tvaṃ śīghraṃ gacchasītyeko'bravīnneti tathā'paraḥ | patiteti ca tau rājanparasparamathocatuḥ

एक ने कहा, "तुम बहुत तेज चल रहे हो"; दूसरे ने कहा, "नहीं"। और, हे राजन्, वे दोनों एक-दूसरे से "तुम पतित हो" भी बोले।

श्लोक 20 (13.77.20)

तयोर्विस्पर्धतोरेवं शपथोऽयमभूत्तदा । सहसोद्दिश्य विपुलं ततो वाक्यमथोचतुः ॥

tayorvispardhatorevaṃ śapatho'yamabhūttadā | sahasoddiśya vipulaṃ tato vākyamathocatuḥ

इस प्रकार स्पर्धा करते हुए उन दोनों ने तब यह शपथ ली; सहसा विपुल की ओर संकेत करके वे यह बोले:

तावूचतुः

श्लोक 21 (13.77.21)

आवयोरनृतं प्राह यस्तस्याभूद्द्विजस्य वै । विपुलस्य परे लोके या गतिः सा भवेदिति ॥

āvayoranṛtaṃ prāha yastasyābhūddvijasya vai | vipulasya pare loke yā gatiḥ sā bhavediti

"हम दोनों में से जिसने झूठ कहा हो, उस ब्राह्मण विपुल की परलोक में जो गति होने वाली है, वही गति उसे मिले।"

भीष्म उवाच

श्लोक 22 (13.77.22)

एतच्छ्रुत्वा तु विपुलो विषण्णवदनोऽभवत् । एवं तीव्रतपाश्चाहं कष्टश्चायं परिश्रमः ॥

etacchrutvā tu vipulo viṣaṇṇavadano'bhavat | evaṃ tīvratapāścāhaṃ kaṣṭaścāyaṃ pariśramaḥ

यह सुनकर विपुल का मुख उदास हो गया। "मैं इतना कठोर तप करने वाला हूँ और यह परिश्रम कष्टदायक रहा है;

श्लोक 23 (13.77.23)

मिथुनस्यास्य किं मे स्यात्कृतं पापं यथा गतिः । अनिष्टा सर्वभूतानां कीर्तिताऽनेन मेऽद्य वै ॥

mithunasyāsya kiṃ me syātkṛtaṃ pāpaṃ yathā gatiḥ | aniṣṭā sarvabhūtānāṃ kīrtitā'nena me'dya vai

इस जोड़े ने आज मेरे लिए सब प्राणियों को अप्रिय गति बताई है; मैंने ऐसा कौन-सा पाप किया है?"

श्लोक 24 (13.77.24)

एवं सञ्चिन्तयन्नेव विपुलो राजसत्तम । अवाङ्मुखो दीनमना दध्यौ दुष्कृतमात्मनः ॥

evaṃ sañcintayanneva vipulo rājasattama | avāṅmukho dīnamanā dadhyau duṣkṛtamātmanaḥ

हे राजसत्तम, ऐसा सोचते हुए विपुल नीचा मुख किए, दीन मन से अपने किसी दुष्कर्म का विचार करता रहा।

श्लोक 25 (13.77.25)

ततः षडन्यान्पुरुषानक्षैः काञ्चनराजतैः । अपश्यद्दीव्यमानान्वै लोभामर्षान्वितांस्तथा ॥

tataḥ ṣaḍanyānpuruṣānakṣaiḥ kāñcanarājataiḥ | apaśyaddīvyamānānvai lobhāmarṣānvitāṃstathā

तब उसने लोभ और रोष से भरे हुए छह और पुरुषों को सोने और चाँदी के पासों से खेलते देखा।

श्लोक 26 (13.77.26)

कुर्वतः शपथं तेन यः कृतो मिथुनेन तु । विपुलं वै समुद्दिश्य तेऽपि वाक्यमथाब्रुवन् ॥

kurvataḥ śapathaṃ tena yaḥ kṛto mithunena tu | vipulaṃ vai samuddiśya te'pi vākyamathābruvan

उस जोड़े ने जो शपथ ली थी, उसे लेते हुए वे भी विपुल की ओर संकेत करके यह बोले:

षट्पुरुषा ऊचुः

श्लोक 27 (13.77.27)

लोभमास्थाय योऽस्माकं विषमं कर्तुमुत्सहेत् । विपुलस्य परे लोके या गतिस्तामवाप्नुयात् ॥

lobhamāsthāya yo'smākaṃ viṣamaṃ kartumutsahet | vipulasya pare loke yā gatistāmavāpnuyāt

"हम में से जो कोई लोभ में पड़कर कपट करने का साहस करे, विपुल की परलोक में जो गति होती है, वही उसे मिले।"

भीष्म उवाच

श्लोक 28 (13.77.28)

एतच्छ्रुत्वा तु विपुलो नापश्यद्धर्मसङ्करम् । जन्मप्रभृति कौरव्य कृतपूर्वमथात्मनः ॥

etacchrutvā tu vipulo nāpaśyaddharmasaṅkaram | janmaprabhṛti kauravya kṛtapūrvamathātmanaḥ

यह सुनकर विपुल ने, हे कौरव्य, जन्म से लेकर अपने किए हुए किसी कर्म में धर्म का दोष नहीं देखा।

श्लोक 29 (13.77.29)

स प्रदध्यौ तथा राजन्नग्नावग्निरिवाहितः । दह्यमानेन मनसा शापं श्रुत्वा तथाविधम् ॥

sa pradadhyau tathā rājannagnāvagnirivāhitaḥ | dahyamānena manasā śāpaṃ śrutvā tathāvidham

तब, हे राजन्, वैसा शाप सुनकर वह जलते मन से, अग्नि पर रखी हुई अग्नि के समान, गहरे चिन्तन में डूब गया।

श्लोक 30 (13.77.30)

तस्य चिन्तयतस्तात बह्वीर्वाचो निशम्य तु । इदमासीन्मनसि च रुच्या रक्षणकारितम् ॥

tasya cintayatastāta bahvīrvāco niśamya tu | idamāsīnmanasi ca rucyā rakṣaṇakāritam

हे तात, चिन्ता करते हुए और बहुत-सी बातें सुनकर उसके मन में रुचि की रक्षा के सम्बन्ध में यह बात आई:

श्लोक 31 (13.77.31)

लक्षणं लक्षणेनैव वदनं वदनेन च । विधाय न मया चोक्तं सत्यमेतद्गुरोस्तथा ॥

lakṣaṇaṃ lakṣaṇenaiva vadanaṃ vadanena ca | vidhāya na mayā coktaṃ satyametadgurostathā

"लक्षण से लक्षण और मुख से मुख मिलाकर मैंने गुरु से उस सत्य को नहीं कहा।"

श्लोक 32 (13.77.32)

एतदात्मनि कौरव्य दुष्कृतं विपुलस्तदा । अमन्यत महाभाग तथा तच्च न संशयः ॥

etadātmani kauravya duṣkṛtaṃ vipulastadā | amanyata mahābhāga tathā tacca na saṃśayaḥ

हे कौरव्य, हे महाभाग, उस समय विपुल ने उसी को अपना दुष्कर्म माना, और वह वैसा ही था, इसमें सन्देह नहीं।

श्लोक 33 (13.77.33)

स चम्पां नगरीमेत्य पुष्पाणि गुरवे ददौ । पूजयामास च गुरुं विधिवत्स गुरुप्रियः ॥

sa campāṃ nagarīmetya puṣpāṇi gurave dadau | pūjayāmāsa ca guruṃ vidhivatsa gurupriyaḥ

चम्पा नगरी में पहुँचकर उस गुरुप्रिय शिष्य ने गुरु को पुष्प दिए और विधिपूर्वक उनका सम्मान किया।

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