अनुशासन पर्व · अध्याय 78
देवशर्मा द्वारा विपुल की प्रशंसा; स्त्रियों की रक्षा पर भीष्म
देवशर्मा विपुल को बताते हैं कि वन में देखा हुआ जोड़ा दिन और रात था और छः पुरुष ऋतुएँ थीं, जो हर छिपे पाप को जानते हैं। विपुल ने रुचि की निर्दोष रक्षा की, इससे प्रसन्न होकर वे पत्नी और शिष्य के साथ स्वर्ग जाते हैं। फिर भीष्म युधिष्ठिर से कहते हैं कि स्त्रियों की रक्षा करनी चाहिए, अच्छी और बुरी स्त्रियों के लक्षण बताते हैं, और कहते हैं कि इसमें केवल विपुल ही सफल हुआ।
भीष्म उवाच
श्लोक 1 (13.78.1)
तमागतमभिप्रेक्ष्य शिष्यं वाक्यमथाब्रवीत् । देवशर्मा महातेजा यत्तच्छृणु जनाधिप ॥
tamāgatamabhiprekṣya śiṣyaṃ vākyamathābravīt | devaśarmā mahātejā yattacchṛṇu janādhipa
शिष्य को लौटा हुआ देखकर महातेजस्वी देवशर्मा ने उससे कहा। हे नरेश्वर, उन्होंने जो कहा, उसे सुनो।
देवशर्मोवाच
श्लोक 2 (13.78.2)
किं त्वया मिथुनं दृष्टं तस्मिञ्शिष्य महावने । ते त्वां जानन्ति निपुणा आत्मा च रुचिरेव च ॥
kiṃ tvayā mithunaṃ dṛṣṭaṃ tasmiñśiṣya mahāvane | te tvāṃ jānanti nipuṇā ātmā ca rucireva ca
शिष्य, क्या तुमने उस महावन में किसी जोड़े को देखा था? वे कुशल पर्यवेक्षक तुम्हें जानते हैं, और तुम्हारा अपना अन्तःकरण तथा स्वयं रुचि भी तुम्हें जानती है।
विपुल उवाच
श्लोक 3 (13.78.3)
ब्रह्मर्षे मिथुनं किन्तत्के च षट्पुरुषा विभो । ये मां जानन्ति तत्त्वेन यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥
brahmarṣe mithunaṃ kintatke ca ṣaṭpuruṣā vibho | ye māṃ jānanti tattvena yanmāṃ tvaṃ paripṛcchasi
हे ब्रह्मर्षि, वह जोड़ा क्या है, और वे छः पुरुष कौन हैं, हे विभो, जो मुझे यथार्थ रूप से जानते हैं, जिनके विषय में आप मुझसे पूछ रहे हैं?
देवशर्मोवाच
श्लोक 4 (13.78.4)
यद्वै तन्मिथुनं ब्रह्मन्नहोरात्रं हि विद्धि तत् । चक्रवत्परिवर्तेत तत्ते जानाति दुष्कृतम् ॥
yadvai tanmithunaṃ brahmannahorātraṃ hi viddhi tat | cakravatparivarteta tatte jānāti duṣkṛtam
हे ब्राह्मण, वह जो जोड़ा है, उसे तुम दिन और रात जानो। वह चक्र की भाँति घूमता रहता है और तुम्हारे दुष्कर्म को जानता है।
श्लोक 5 (13.78.5)
ये च ते पुरुषा विप्र अक्षैर्दीव्यन्ति हृष्टवत् । ऋतूंस्तानभिजानीहि ते ते जानन्ति दुष्कृतम् ॥
ye ca te puruṣā vipra akṣairdīvyanti hṛṣṭavat | ṛtūṃstānabhijānīhi te te jānanti duṣkṛtam
और हे विप्र, जो वे पुरुष हर्षित-से होकर पासों से खेल रहे हैं, उन्हें ऋतुएँ जानो; वे भी तुम्हारे दुष्कर्म को जानते हैं।
श्लोक 6 (13.78.6)
न मां कश्चिद्विजानीत इति कृत्वा न विश्वसेत् । नरो रहसि पापात्मा पापकं कर्म वै द्विज ॥
na māṃ kaścidvijānīta iti kṛtvā na viśvaset | naro rahasi pāpātmā pāpakaṃ karma vai dvija
हे द्विज, पापी मन वाला मनुष्य एकान्त में पापकर्म करके यह सोचकर निश्चिन्त न हो कि मुझे कोई नहीं जानता।
श्लोक 7 (13.78.7)
कुर्वाणं हि नरं कर्म पापं रहसि सर्वदा । पश्यन्ति ऋतवश्चापि तथा दिननिशेऽप्युत ॥
kurvāṇaṃ hi naraṃ karma pāpaṃ rahasi sarvadā | paśyanti ṛtavaścāpi tathā dinaniśe'pyuta
एकान्त में सदा पापकर्म करने वाले मनुष्य को ऋतुएँ तथा दिन और रात भी देखते रहते हैं।
श्लोक 8 (13.78.8)
तथैव हि भवेयुस्ते लोकाः पापकृतो यथा । कृत्वाऽनाचक्षतः कर्म मम तच्च यथा कृतम् ॥
tathaiva hi bhaveyuste lokāḥ pāpakṛto yathā | kṛtvā'nācakṣataḥ karma mama tacca yathā kṛtam
जैसे पापियों के लोक होते हैं, वैसे ही उसके भी होंगे जो कर्म करके उसे कहता नहीं, जैसे मेरे उस कर्म को, जैसा वह किया गया था, तुमने नहीं कहा।
श्लोक 9 (13.78.9)
ते त्वां हर्षस्मितं दृष्ट्वा गुरोः कर्मानिवेदकम् । स्मारयन्तस्तथा प्राहुस्ते यथा श्रुतवान्भवान् ॥
te tvāṃ harṣasmitaṃ dṛṣṭvā guroḥ karmānivedakam | smārayantastathā prāhuste yathā śrutavānbhavān
तुम्हें प्रसन्न होकर मुस्कुराते और गुरु को अपना कर्म न बताते देखकर, उन्होंने तुम्हें स्मरण दिलाते हुए वैसा ही कहा जैसा तुमने सुना है।
श्लोक 10 (13.78.10)
अहोरात्रं विजानाति ऋतवश्चापि नित्यशः । पुरुषे पापकं कर्म शुभं वाऽशुभकर्मिणः ॥
ahorātraṃ vijānāti ṛtavaścāpi nityaśaḥ | puruṣe pāpakaṃ karma śubhaṃ vā'śubhakarmiṇaḥ
दिन-रात और ऋतुएँ भी सदा मनुष्य के पापकर्म को जानती हैं, शुभ को भी और अशुभ कर्म करने वाले के कर्म को भी।
श्लोक 11 (13.78.11)
तत्त्वया मम यत्कर्म व्यभिचाराद्भयात्मकम् । नाख्यातमिति जानन्तस्ते त्वामाहुस्तथा द्विज ॥
tattvayā mama yatkarma vyabhicārādbhayātmakam | nākhyātamiti jānantaste tvāmāhustathā dvija
मेरे विषय में तुमने जो कर्म किया, जो व्यभिचार के भय से भरा था, उसे तुमने नहीं बताया। यह जानते हुए ही उन्होंने हे द्विज, तुमसे वैसा कहा।
श्लोक 12 (13.78.12)
तेनैव हि भवेयुस्ते लोकाः पापकृतो यथा । कृत्वा नाचक्षतः कर्म मम यच्च त्वया कृतम् ॥
tenaiva hi bhaveyuste lokāḥ pāpakṛto yathā | kṛtvā nācakṣataḥ karma mama yacca tvayā kṛtam
इसी कारण वे लोक उसके होते हैं जैसे पापियों के होते हैं, जो कर्म करके उसे नहीं कहता, जैसे तुमने मेरे विषय में किया हुआ कर्म नहीं कहा।
श्लोक 13 (13.78.13)
तथाऽशक्याश्च दुर्वृत्ता रक्षितुं प्रमदा द्विज । न च त्वं कृतवान्किंचिदागः प्रीतोस्मि तेन ते ॥
tathā'śakyāśca durvṛttā rakṣituṃ pramadā dvija | na ca tvaṃ kṛtavānkiṃcidāgaḥ prītosmi tena te
और हे द्विज, दुराचारिणी स्त्रियों की रक्षा नहीं की जा सकती; फिर भी तुमने कुछ भी अपराध नहीं किया, इससे मैं तुमसे प्रसन्न हूँ।
श्लोक 14 (13.78.14)
मनोदोषविहीनानां न दोषः स्यात्तथा तव । अन्यथाऽऽलिङ्ग्यते कान्ता स्नेहेन दुहिताऽन्यथा ॥
manodoṣavihīnānāṃ na doṣaḥ syāttathā tava | anyathā''liṅgyate kāntā snehena duhitā'nyathā
जो मन के दोष से रहित हैं, उन्हें दोष नहीं लगता, और इसी प्रकार तुम्हें भी नहीं। प्रिय पत्नी को स्नेह से एक प्रकार से गले लगाया जाता है, और पुत्री को दूसरे प्रकार से।
श्लोक 15 (13.78.15)
यतेश्च कामुकानां च योषिद्रूपेऽन्यथा मतिः । अशिक्षयैव मनसः प्रायो लोकस्तु वञ्च्यते ॥
yateśca kāmukānāṃ ca yoṣidrūpe'nyathā matiḥ | aśikṣayaiva manasaḥ prāyo lokastu vañcyate
स्त्री के रूप के विषय में संन्यासी की बुद्धि और कामी की बुद्धि अलग-अलग होती है। मन के प्रशिक्षण के अभाव में ही प्रायः लोग धोखा खाते हैं।
श्लोक 16 (13.78.16)
लालेत्युद्विजते लोको वक्त्रासव इति स्पृहा । अबन्धायोग्यमनसामिति मन्त्रात्मदैवकम् ॥
lāletyudvijate loko vaktrāsava iti spṛhā | abandhāyogyamanasāmiti mantrātmadaivakam
लोग घबराकर कहते हैं, "यह तो मात्र लार है"; और लालसा उसे "मुख का आसव" कहती है। जिनका मन बन्धन के योग्य नहीं, उनके लिए यह इसी प्रकार है; उनका सहारा मन्त्र और देवता है।
श्लोक 17 (13.78.17)
न रागस्नेहलोभान्धं कर्मिणां तन्महाफलम् । निष्कषायो विशुद्धस्त्वं रुच्यावेशान्न दूषितः ॥
na rāgasnehalobhāndhaṃ karmiṇāṃ tanmahāphalam | niṣkaṣāyo viśuddhastvaṃ rucyāveśānna dūṣitaḥ
जो राग, स्नेह और लोभ से अन्धा है, वह कर्म करने वालों का महाफल नहीं है। तुम निर्मल और पूर्णतः शुद्ध हो; रुचि में प्रवेश करने से तुम दूषित नहीं हुए।
श्लोक 18 (13.78.18)
यदि त्वहं त्वां दुर्वृत्तमद्राक्षं द्विजसत्तम । शपेयं त्वामहं क्रोधान्न मेऽत्रास्ति विचारणा ॥
yadi tvahaṃ tvāṃ durvṛttamadrākṣaṃ dvijasattama | śapeyaṃ tvāmahaṃ krodhānna me'trāsti vicāraṇā
हे द्विजश्रेष्ठ, यदि मैं तुम्हें दुराचार करते देखता, तो क्रोध में तुम्हें शाप दे देता; इसमें मुझे कोई सन्देह नहीं।
श्लोक 19 (13.78.19)
सञ्जन्ति पुरुषे नार्यः पुंसां सोऽर्थश्च पुष्कलः । अन्यथा रक्षतः शापोऽभविष्यत्ते मतिश्च मे ॥
sañjanti puruṣe nāryaḥ puṃsāṃ so'rthaśca puṣkalaḥ | anyathā rakṣataḥ śāpo'bhaviṣyatte matiśca me
स्त्रियाँ पुरुष से जुड़ी रहती हैं और वही पुरुषों का बड़ा प्रयोजन है। यदि तुमने और प्रकार से रक्षा की होती, तो तुम पर शाप पड़ता, और मेरा भी यही निश्चय होता।
श्लोक 20 (13.78.20)
रक्षिता च त्वया पुत्र मम चापि निवेदिता । अहं ते प्रीतिमांस्तात स्वस्थः स्वर्गं गमिष्यसि ॥
rakṣitā ca tvayā putra mama cāpi niveditā | ahaṃ te prītimāṃstāta svasthaḥ svargaṃ gamiṣyasi
पुत्र, तुमने उसकी रक्षा की और उसे मुझे लौटा दिया। हे तात, मैं तुमसे प्रसन्न हूँ; तुम सुख से स्वर्ग जाओगे।
भीष्म उवाच
श्लोक 21 (13.78.21)
इत्युक्त्वा विपुलं प्रीतो देवशर्मा महानृषिः । मुमोद स्वर्गमास्थाय सहभार्यः सशिष्यकः ॥
ityuktvā vipulaṃ prīto devaśarmā mahānṛṣiḥ | mumoda svargamāsthāya sahabhāryaḥ saśiṣyakaḥ
विपुल से यह कहकर महर्षि देवशर्मा प्रसन्न हुए और अपनी पत्नी तथा शिष्य के साथ स्वर्ग जाकर आनन्दित हुए।
श्लोक 22 (13.78.22)
इदमाख्यातवांश्चापि ममाख्यानं महामुनिः । मार्कण्डेयः पुरा राजन्गङ्गाकूले कथान्तरे ॥
idamākhyātavāṃścāpi mamākhyānaṃ mahāmuniḥ | mārkaṇḍeyaḥ purā rājangaṅgākūle kathāntare
हे राजन्, यह कथा महामुनि मार्कण्डेय ने बहुत पहले गंगा के तट पर, बातचीत के बीच मुझे सुनाई थी।
श्लोक 23 (13.78.23)
तस्माद्ब्रवीमि पार्थ त्वां स्त्रियो रक्ष्याः सदैव च । उभयं दृश्यते तासु सततं साध्वसाधु च ॥
tasmādbravīmi pārtha tvāṃ striyo rakṣyāḥ sadaiva ca | ubhayaṃ dṛśyate tāsu satataṃ sādhvasādhu ca
इसलिए हे पार्थ, मैं तुमसे कहता हूँ कि स्त्रियों की सदा रक्षा करनी चाहिए। उनमें सदा दोनों दिखाई देते हैं, भला भी और बुरा भी।
श्लोक 24 (13.78.24)
स्त्रियः साध्व्यो महाभागाः सम्मता लोकमातरः । धारयन्ति महीं राजन्निमां सवनकाननाम् ॥
striyaḥ sādhvyo mahābhāgāḥ sammatā lokamātaraḥ | dhārayanti mahīṃ rājannimāṃ savanakānanām
हे राजन्, साध्वी, महाभाग्यशालिनी, लोकमाता मानी जाने वाली स्त्रियाँ वनों और उपवनों सहित इस पृथ्वी को धारण करती हैं।
श्लोक 25 (13.78.25)
असाध्व्यश्चापि दुर्वृत्ताः कुलघ्नाः पापनिश्चयाः । विज्ञेया लक्षणैर्दुष्टैः स्वगात्रसहजैर्नृप ॥
asādhvyaścāpi durvṛttāḥ kulaghnāḥ pāpaniścayāḥ | vijñeyā lakṣaṇairduṣṭaiḥ svagātrasahajairnṛpa
किन्तु जो असाध्वी, दुराचारिणी, कुल का नाश करने वाली और पाप का निश्चय रखने वाली हैं, उन्हें हे राजन्, उनके शरीर के साथ उत्पन्न बुरे लक्षणों से पहचानना चाहिए।
श्लोक 26 (13.78.26)
एवमेतासु रक्षा वै शक्या कर्तुं महात्मभिः । अन्यथा राजशार्दूल न शक्या रक्षितुं स्त्रियः ॥
evametāsu rakṣā vai śakyā kartuṃ mahātmabhiḥ | anyathā rājaśārdūla na śakyā rakṣituṃ striyaḥ
इस प्रकार महात्मा लोग उनकी रक्षा कर सकते हैं; हे राजशार्दूल, अन्यथा स्त्रियों की रक्षा नहीं हो सकती।
श्लोक 27 (13.78.27)
एता हि मनुजव्याघ्र तीक्ष्णास्तीक्ष्णपराक्रमाः । नासामस्ति प्रियो नाम मैथुने सङ्गमेति यः ॥
etā hi manujavyāghra tīkṣṇāstīkṣṇaparākramāḥ | nāsāmasti priyo nāma maithune saṅgameti yaḥ
हे मनुजव्याघ्र, वे तीक्ष्ण हैं और उनका पराक्रम भी तीक्ष्ण है; मिलन के लिए जो भी उनके पास आता है, उनमें से किसी को वह सचमुच प्रिय नहीं होता।
श्लोक 28 (13.78.28)
एताः कृत्याश्च कष्टाश्च कृतघ्ना भरतर्षभ । न चैकस्मिन्नमन्त्येताः पुरुषे पाण्डुनन्दन ॥
etāḥ kṛtyāśca kaṣṭāśca kṛtaghnā bharatarṣabha | na caikasminnamantyetāḥ puruṣe pāṇḍunandana
हे भरतर्षभ, वे कृत्या (अभिचार-शक्ति) जैसी, कष्टदायिनी और कृतघ्न हैं; और हे पाण्डुनन्दन, वे केवल एक पुरुष के आगे नहीं झुकतीं।
श्लोक 29 (13.78.29)
नासु स्नेहो नरैः कार्यस्तथैवेर्ष्या जनेश्वर । खेदमास्थाय भुञ्जीत धर्ममास्थाय चैव ह । अनृताविह पर्वादिदोषवर्जं नराधिप ॥
nāsu sneho naraiḥ kāryastathaiverṣyā janeśvara | khedamāsthāya bhuñjīta dharmamāsthāya caiva ha | anṛtāviha parvādidoṣavarjaṃ narādhipa
हे जनेश्वर, पुरुषों को उनसे अत्यधिक स्नेह नहीं करना चाहिए, और ईर्ष्या भी नहीं। उनका भोग अनिच्छा से और धर्म का आश्रय लेकर करे; और हे नराधिप, यहाँ ऋतुकाल के बाहर तथा पर्व आदि के दोषों से बचकर ही करे।
श्लोक 30 (13.78.30)
विहन्येतान्यथा कुर्वन्नरः कौरवनन्दन । सर्वथा राजशार्दूल युक्तः सर्वत्र युज्यते ॥
vihanyetānyathā kurvannaraḥ kauravanandana | sarvathā rājaśārdūla yuktaḥ sarvatra yujyate
हे कुरुनन्दन, जो मनुष्य इससे अन्यथा आचरण करता है, वह नष्ट हो जाता है। हे राजशार्दूल, सब प्रकार से संयमी पुरुष सर्वत्र सफल होता है।
श्लोक 31 (13.78.31)
तेनैकेन तु रक्षा वै विपुलेन कृता स्त्रियाः । नान्यः शक्तस्त्रिलोकेऽस्मिन्रक्षितुं नृप योषितः ॥
tenaikena tu rakṣā vai vipulena kṛtā striyāḥ | nānyaḥ śaktastriloke'sminrakṣituṃ nṛpa yoṣitaḥ
हे राजन्, उसी उपाय से केवल विपुल ने एक स्त्री की रक्षा की; तीनों लोकों में कोई दूसरा स्त्रियों की रक्षा करने में समर्थ नहीं।