आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 1
पाण्डवों का वन की ओर प्रस्थान
जनमेजय वैशम्पायन से पूछते हैं कि पाण्डवों और द्रौपदी ने वन के बारह वर्ष कैसे बिताए। वैशम्पायन बताते हैं कि पाण्डव हस्तिनापुर से उत्तर की ओर निकले, और शोक से व्याकुल नगरवासी दुर्योधन की निन्दा करते हुए तथा सत्संग की महिमा बताते हुए उनके साथ चलने की विनती करने लगे। युधिष्ठिर उनसे लौटकर भीष्म, धृतराष्ट्र, विदुर और कुन्ती की देखभाल करने को कहते हैं; नगरवासी रोते हुए लौट जाते हैं, और पाण्डव गङ्गा-तट पर प्रमाण नामक महान वटवृक्ष के नीचे रात बिताते हैं, जहाँ साथ आए ब्राह्मण राजा को सान्त्वना देते हैं।
जनमेजय उवाच
श्लोक 1 (3.1.1)
एवं द्यूतजिताः पार्थाः कोपिताश्च दुरात्मभिः । धार्तराष्ट्रैः सहामात्यैर्निकृत्या द्विजसत्तम ॥
evaṃ dyūtajitāḥ pārthāḥ kopitāśca durātmabhiḥ | dhārtarāṣṭraiḥ sahāmātyairnikṛtyā dvijasattama
हे द्विजश्रेष्ठ, जब धृतराष्ट्र के दुष्ट पुत्रों ने अपने मन्त्रियों के साथ मिलकर छल से पार्थों को जुए में हरा दिया और उन्हें क्रोध दिलाया,
श्लोक 2 (3.1.2)
श्राविताः परुषा वाचः सृजन्तीर्वैरमुत्तमम् । किमकुर्वत कौरव्या मम पूर्वपितामहाः ॥
śrāvitāḥ paruṣā vācaḥ sṛjantīrvairamuttamam | kimakurvata kauravyā mama pūrvapitāmahāḥ
और घोर वैर उपजाने वाले कठोर वचन उन्हें सुनाए गए, तब मेरे कुरुवंशी पूर्वजों ने क्या किया?
श्लोक 3 (3.1.3)
कथं चैश्वर्यभूयिष्ठाः सहसा दुःखमेयुषः । वने विजह्रिरे पार्थाः शक्रप्रतिमतेजसः ॥
kathaṃ caiśvaryabhūyiṣṭhāḥ sahasā duḥkhameyuṣaḥ | vane vijahrire pārthāḥ śakrapratimatejasaḥ
इन्द्र के समान तेजस्वी पार्थ, जो परम ऐश्वर्य से सम्पन्न थे और सहसा दुःख में पड़ गए, वन में किस प्रकार रहे?
श्लोक 4 (3.1.4)
के चैतानन्ववर्तन्त प्राप्तान्व्यसनमुत्तमम् । किमाचाराः किमाहाराः क्व च वासो महात्मनाम् ॥
ke caitānanvavartanta prāptānvyasanamuttamam | kimācārāḥ kimāhārāḥ kva ca vāso mahātmanām
इतने बड़े संकट में पड़े उन महात्माओं के पीछे कौन-कौन गया? उनका आचरण कैसा था, वे क्या खाते थे, और कहाँ रहते थे?
श्लोक 5 (3.1.5)
कथं द्वादश वर्षाणि वने तेषां महात्मनाम् । व्यतीयुर्ब्राह्मणश्रेष्ठ शूराणामनिवर्तिनाम् ॥
kathaṃ dvādaśa varṣāṇi vane teṣāṃ mahātmanām | vyatīyurbrāhmaṇaśreṣṭha śūrāṇāmanivartinām
हे ब्राह्मणश्रेष्ठ, युद्ध से कभी पीछे न हटने वाले उन महात्मा वीरों ने वन में बारह वर्ष कैसे बिताए?
श्लोक 6 (3.1.6)
कथं च राजपुत्री सा प्रवरा सर्वयोषिताम् । पतिव्रता महाभागा सततं प्रियवादिनी ॥
kathaṃ ca rājaputrī sā pravarā sarvayoṣitām | pativratā mahābhāgā satataṃ priyavādinī
और वह राजकुमारी, जो सब स्त्रियों में श्रेष्ठ, पतिव्रता, महाभाग्यशालिनी और सदा मधुर बोलने वाली थी,
श्लोक 7 (3.1.7)
वनवासमदुःखार्हा दारुणं प्रत्यपद्यत । एतदाचक्ष्व मे सर्वं विस्तरेण तपोधन ॥
vanavāsamaduḥkhārhā dāruṇaṃ pratyapadyata | etadācakṣva me sarvaṃ vistareṇa tapodhana
और जो दुःख के योग्य नहीं थी, उसने वन का कठोर जीवन कैसे सहा? हे तपोधन, यह सब मुझे विस्तार से बताइए।
श्लोक 8 (3.1.8)
श्रोतुमिच्छामि तत्सर्वं भूरिद्रविणतेजसाम् । कथ्यमानं त्वया विप्र परं कौतूहलं हि मे ॥
śrotumicchāmi tatsarvaṃ bhūridraviṇatejasām | kathyamānaṃ tvayā vipra paraṃ kautūhalaṃ hi me
हे विप्र, अपार पराक्रम और तेज वाले उन वीरों का सारा वृत्तान्त मैं आपके मुख से सुनना चाहता हूँ, क्योंकि मेरी उत्सुकता बहुत बड़ी है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 9 (3.1.9)
एवं द्यूतजिताः पार्थाः कोपिताश्च दुरात्मभिः । धार्तराष्ट्रैः सहामात्यैर्निर्ययुर्गजसाह्वयात् ॥
evaṃ dyūtajitāḥ pārthāḥ kopitāśca durātmabhiḥ | dhārtarāṣṭraiḥ sahāmātyairniryayurgajasāhvayāt
इस प्रकार जुए में हारकर और धृतराष्ट्र के दुष्ट पुत्रों तथा उनके मन्त्रियों द्वारा क्रोध दिलाए जाकर पार्थ हस्तिनापुर से निकल पड़े।
श्लोक 10 (3.1.10)
वर्धमानपुरद्वारादभिनिष्क्रम्य ते तदा । उदङ्मुखाः शस्त्रभृतः प्रययुः सह कृष्णया ॥
vardhamānapuradvārādabhiniṣkramya te tadā | udaṅmukhāḥ śastrabhṛtaḥ prayayuḥ saha kṛṣṇayā
वर्धमानपुर की ओर खुलने वाले द्वार से निकलकर वे शस्त्र धारण किए हुए कृष्णा (द्रौपदी) के साथ उत्तर दिशा की ओर चल पड़े।
श्लोक 11 (3.1.11)
इन्द्रसेनादयश्चैतान्भृत्याः परिचतुर्दश । रथैरनुययुः शीघ्रैः स्त्रिय आदाय सर्वशः ॥
indrasenādayaścaitānbhṛtyāḥ paricaturdaśa | rathairanuyayuḥ śīghraiḥ striya ādāya sarvaśaḥ
इन्द्रसेन आदि चौदह से अधिक सेवक सब स्त्रियों को साथ लेकर तेज़ रथों पर उनके पीछे-पीछे चले।
श्लोक 12 (3.1.12)
ततस्ते पुरुषव्याघ्रा रथानास्थाय भारत । ददृशुर्जाह्नवीतीरे प्रमाणाख्यं महावटम् ॥
tataste puruṣavyāghrā rathānāsthāya bhārata | dadṛśurjāhnavītīre pramāṇākhyaṃ mahāvaṭam
हे भारत, तब रथों पर सवार उन पुरुषसिंहों ने जाह्नवी (गङ्गा) के तट पर प्रमाण नामक विशाल वटवृक्ष देखा।
श्लोक 13 (3.1.13)
व्रजतस्तान्विदित्वा तु पौराः शोकाभिपीडिताः । गर्हयन्तोऽसकृद्भीष्मविदुरद्रोणगौतमान् । ऊचुर्वै समयं कृत्वा समागम्य परस्परम् ॥
vrajatastānviditvā tu paurāḥ śokābhipīḍitāḥ | garhayanto'sakṛdbhīṣmaviduradroṇagautamān | ūcurvai samayaṃ kṛtvā samāgamya parasparam
उनके जाने की बात जानकर शोक से पीड़ित नगरवासी बार-बार भीष्म, विदुर, द्रोण और गौतम (कृपाचार्य) की निन्दा करने लगे, और आपस में एकत्र होकर तथा एक निश्चय करके एक-दूसरे से बोले।
पौरा ऊचुः
श्लोक 14 (3.1.14)
नेदमस्ति कुलं सर्वं न वयं न च नो गृहाः । यत्र दुर्योधनः पापः सौबलेयेन पालितः । कर्णदुःशासनाद्यैश्च राज्यमेतच्चिकीर्षति ॥
nedamasti kulaṃ sarvaṃ na vayaṃ na ca no gṛhāḥ | yatra duryodhanaḥ pāpaḥ saubaleyena pālitaḥ | karṇaduḥśāsanādyaiśca rājyametaccikīrṣati
जहाँ सुबलपुत्र शकुनि से रक्षित और कर्ण, दुःशासन आदि से सहायता पाता हुआ पापी दुर्योधन इस राज्य पर शासन करना चाहता है, वहाँ न हमारा सारा कुल बचा है, न हम, न हमारे घर।
श्लोक 15 (3.1.15)
न तत्कुलं न चाचारो न धर्मोऽर्थः कुतः सुखम् । यत्र पापसहायोऽयं पापो राज्यं चिकीर्षति ॥
na tatkulaṃ na cācāro na dharmo'rthaḥ kutaḥ sukham | yatra pāpasahāyo'yaṃ pāpo rājyaṃ cikīrṣati
जहाँ पापियों की सहायता से यह पापी राज्य करना चाहता है, वहाँ न कुल है, न सदाचार, न धर्म, न धन; फिर सुख कहाँ से होगा?
श्लोक 16 (3.1.16)
दुर्योधनो गुरुद्वेषी त्यक्तधर्मः प्रियानृतः । अर्थलुब्धोऽभिमानी च नीचः प्रकृतिनिर्घृणः ॥
duryodhano gurudveṣī tyaktadharmaḥ priyānṛtaḥ | arthalubdho'bhimānī ca nīcaḥ prakṛtinirghṛṇaḥ
दुर्योधन गुरुजनों से द्वेष करता है, उसने धर्म त्याग दिया है और उसे असत्य प्रिय है। वह धन का लोभी, अभिमानी, नीच और स्वभाव से ही निर्दय है।
श्लोक 17 (3.1.17)
नेयमस्ति मही कृत्स्ना यत्र दुर्योधनो नृपः । साधु गच्छामहे सर्वे यत्र गच्छन्ति पाण्डवाः ॥
neyamasti mahī kṛtsnā yatra duryodhano nṛpaḥ | sādhu gacchāmahe sarve yatra gacchanti pāṇḍavāḥ
जहाँ दुर्योधन राजा है, वह सारी पृथ्वी हमारे लिए कुछ नहीं है। अच्छा है कि हम सब वहीं चलें जहाँ पाण्डव जा रहे हैं।
श्लोक 18 (3.1.18)
सानुक्रोशा महात्मानो विजितेन्द्रियशत्रवः । ह्रीमन्तः कीर्तिमन्तश्च धर्माचारपरायणाः ॥
sānukrośā mahātmāno vijitendriyaśatravaḥ | hrīmantaḥ kīrtimantaśca dharmācāraparāyaṇāḥ
वे दयालु और महात्मा हैं, इन्द्रियों और शत्रुओं को जीतने वाले हैं, लज्जाशील, यशस्वी और धर्म तथा सदाचार में तत्पर हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 19 (3.1.19)
एवमुक्त्वाऽनुजग्मुस्ते पाण्डवांस्तान्समेत्य च । ऊचुः प्राञ्जलयः सर्वे तान्कुन्तीमाद्रिनन्दनान् ॥
evamuktvā'nujagmuste pāṇḍavāṃstānsametya ca | ūcuḥ prāñjalayaḥ sarve tānkuntīmādrinandanān
ऐसा कहकर वे पाण्डवों के पीछे चल पड़े, और उनके पास पहुँचकर सबने हाथ जोड़कर कुन्ती और माद्री के उन पुत्रों से कहा।
पौरा ऊचुः
श्लोक 20 (3.1.20)
क्व गमिष्यथ भद्रं वस्त्यक्त्वाऽस्मान्दुःखभागिनः । वयमप्यनुयास्यामो यत्र यूयं गमिष्यथ ॥
kva gamiṣyatha bhadraṃ vastyaktvā'smānduḥkhabhāginaḥ | vayamapyanuyāsyāmo yatra yūyaṃ gamiṣyatha
हमें दुःख में छोड़कर आप कहाँ जाएँगे? आपका कल्याण हो! आप जहाँ भी जाएँगे, हम भी आपके पीछे वहीं चलेंगे।
श्लोक 21 (3.1.21)
अधर्मेण जिताञ्श्रुत्वा युष्मांस्त्यक्तघृणैः परैः । उद्विग्नाः स्मो भृशं सर्वे नास्मान्हातुमिहार्हथ ॥
adharmeṇa jitāñśrutvā yuṣmāṃstyaktaghṛṇaiḥ paraiḥ | udvignāḥ smo bhṛśaṃ sarve nāsmānhātumihārhatha
जब से हमने सुना है कि निर्दय शत्रुओं ने आपको अधर्म से जीत लिया, तब से हम सब अत्यन्त व्याकुल हैं। आप हमें यहाँ छोड़कर न जाएँ।
श्लोक 22 (3.1.22)
भक्तानुरक्तान्सुहृदः सदा प्रियहिते रतान् । कुराजाधिष्ठिते राज्ये न विनश्येम सर्वशः ॥
bhaktānuraktānsuhṛdaḥ sadā priyahite ratān | kurājādhiṣṭhite rājye na vinaśyema sarvaśaḥ
हम आपके भक्त, स्नेही और हितैषी हैं, सदा आपके प्रिय और हित में लगे रहते हैं। दुष्ट राजा के शासन वाले राज्य में हमारा सर्वनाश न होने दें।
श्लोक 23 (3.1.23)
श्रूयतां चाभिधास्यामो गुणदोषान्नरर्षभाः । शुभाशुभाधिवासेन संसर्गः कुरुते यथा ॥
śrūyatāṃ cābhidhāsyāmo guṇadoṣānnararṣabhāḥ | śubhāśubhādhivāsena saṃsargaḥ kurute yathā
हे नरश्रेष्ठो, सुनिए; हम बताते हैं कि संगति से गुण और दोष कैसे आते हैं, और अच्छे-बुरे सान्निध्य से संगति कैसा प्रभाव डालती है।
श्लोक 24 (3.1.24)
वस्त्रमापस्तिलान्भूमिं गन्धो वासयते यथा । पुष्पाणामधिवासेन तथा संसर्गजा गुणाः ॥
vastramāpastilānbhūmiṃ gandho vāsayate yathā | puṣpāṇāmadhivāsena tathā saṃsargajā guṇāḥ
जैसे फूलों के सम्पर्क से सुगन्ध वस्त्र, जल, तिल और भूमि को सुवासित कर देती है, वैसे ही गुण भी संगति से उत्पन्न होते हैं।
श्लोक 25 (3.1.25)
मोहजालस्य योनिर्हि मूढैरेव समागमः । अहन्यहनि धर्मस्य योनिः साधुसमागमः ॥
mohajālasya yonirhi mūḍhaireva samāgamaḥ | ahanyahani dharmasya yoniḥ sādhusamāgamaḥ
मूर्खों का संग ही मोह-जाल की जड़ है, और सज्जनों का संग दिन-प्रतिदिन धर्म का स्रोत बनता है।
श्लोक 26 (3.1.26)
तस्मात्प्राज्ञैश्च वृद्धैश्च सुस्वभावैस्तपस्विभिः । सद्भिश्च सह संसर्गः कार्यः शमपरायणैः ॥
tasmātprājñaiśca vṛddhaiśca susvabhāvaistapasvibhiḥ | sadbhiśca saha saṃsargaḥ kāryaḥ śamaparāyaṇaiḥ
इसलिए बुद्धिमानों, वृद्धों, अच्छे स्वभाव वालों, तपस्वियों और शान्ति-परायण सज्जनों का ही संग करना चाहिए।
श्लोक 27 (3.1.27)
येषां त्रीण्यवदातानि विद्या योनिश्च कर्म च । ते सेव्यास्तैः समास्याहि शास्त्रेभ्योऽपि गरीयसी ॥
yeṣāṃ trīṇyavadātāni vidyā yoniśca karma ca | te sevyāstaiḥ samāsyāhi śāstrebhyo'pi garīyasī
जिनकी विद्या, कुल और कर्म तीनों निर्मल हों, उन्हीं की सेवा करनी चाहिए; उनकी संगति शास्त्रों से भी बढ़कर है।
श्लोक 28 (3.1.28)
निरारम्भा ह्यपि वयं पुण्यशीलेषु साधुषु । पुण्यमेवाप्नुयामेह पापं पापोपसेवनात् ॥
nirārambhā hyapi vayaṃ puṇyaśīleṣu sādhuṣu | puṇyamevāpnuyāmeha pāpaṃ pāpopasevanāt
हम स्वयं कोई अनुष्ठान न करें तब भी पुण्यशील सज्जनों के बीच रहकर यहाँ पुण्य ही पाएँगे, जैसे पापियों की सेवा से पाप मिलता है।
श्लोक 29 (3.1.29)
असतां दर्शनात्स्पर्शात्संजल्पाच्च सहासनात् । धर्माचाराः प्रहीयन्ते सिद्ध्यन्ति च न मानवाः ॥
asatāṃ darśanātsparśātsaṃjalpācca sahāsanāt | dharmācārāḥ prahīyante siddhyanti ca na mānavāḥ
दुष्टों को देखने, छूने, उनसे बातचीत करने और साथ बैठने से मनुष्यों के धर्म और सदाचार नष्ट हो जाते हैं, और उन्हें सिद्धि नहीं मिलती।
श्लोक 30 (3.1.30)
बुद्धिश्च हीयते पुंसां नीचैः सह समागमात् । मध्यमैर्मध्यतां याति श्रेष्ठैः श्रेष्ठत्वमाप्नुयुः ॥
buddhiśca hīyate puṃsāṃ nīcaiḥ saha samāgamāt | madhyamairmadhyatāṃ yāti śreṣṭhaiḥ śreṣṭhatvamāpnuyuḥ
नीच लोगों के संग से मनुष्य की बुद्धि घटती है; मध्यम लोगों के संग से वह मध्यम बनती है, और श्रेष्ठ जनों के संग से मनुष्य श्रेष्ठता पाते हैं।
श्लोक 31 (3.1.31)
अनीचैर्नाप्यविषयैर्नाधर्मिष्ठैर्विशेषतः । ये गुणाः कीर्तिता लोके धर्मकामार्थसंभवाः । लोकाचारेषु संभूता वेदोक्ताः शिष्टसंमताः ॥
anīcairnāpyaviṣayairnādharmiṣṭhairviśeṣataḥ | ye guṇāḥ kīrtitā loke dharmakāmārthasaṃbhavāḥ | lokācāreṣu saṃbhūtā vedoktāḥ śiṣṭasaṃmatāḥ
संसार में जिन गुणों की प्रशंसा होती है, जो धर्म, काम और अर्थ के मूल हैं, जो लोकाचार से उपजते हैं, जिन्हें वेद बताते हैं और शिष्ट जन मानते हैं, वे नीचों में नहीं मिलते, अपरिचितों में नहीं मिलते, और अधर्मियों में तो बिलकुल नहीं।
श्लोक 32 (3.1.32)
ते युष्मासु समस्ताश्च व्यस्ताश्चैवेह सद्गुणाः । इच्छामो गुणवन्मध्ये वस्तुं श्रेयोऽभिकाङ्क्षिणः ॥
te yuṣmāsu samastāśca vyastāścaiveha sadguṇāḥ | icchāmo guṇavanmadhye vastuṃ śreyo'bhikāṅkṣiṇaḥ
ये सारे सद्गुण आपमें एक साथ भी हैं और अलग-अलग भी। अपने कल्याण की इच्छा से हम गुणवानों के बीच ही रहना चाहते हैं।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 33 (3.1.33)
धन्या वयं यदस्माकं स्नेहकारुण्ययन्त्रिताः । असतोऽपि गुणानाहुर्ब्राह्मणप्रमुखाः प्रजाः ॥
dhanyā vayaṃ yadasmākaṃ snehakāruṇyayantritāḥ | asato'pi guṇānāhurbrāhmaṇapramukhāḥ prajāḥ
हम धन्य हैं कि ब्राह्मणों के नेतृत्व में प्रजा स्नेह और करुणा से बँधकर हममें वे गुण भी बताती है जो हममें नहीं हैं।
श्लोक 34 (3.1.34)
तदहं भ्रातृसहितः सर्वान्विज्ञापयामि वः । नान्यथा तद्धि कर्तव्यमस्मत्स्नेहानुकम्पया ॥
tadahaṃ bhrātṛsahitaḥ sarvānvijñāpayāmi vaḥ | nānyathā taddhi kartavyamasmatsnehānukampayā
इसलिए मैं अपने भाइयों के साथ आप सबसे एक निवेदन करता हूँ; हमारे प्रति स्नेह और कृपा के कारण आप इसके विपरीत न करें।
श्लोक 35 (3.1.35)
भीष्मः पितामहो राजा विदुरो जननी च मे । सुहृज्जनश्च प्रायो मे नगरे नागसाह्वये ॥
bhīṣmaḥ pitāmaho rājā viduro jananī ca me | suhṛjjanaśca prāyo me nagare nāgasāhvaye
पितामह भीष्म, राजा धृतराष्ट्र, विदुर, मेरी माता और मेरे अधिकांश सुहृद् हस्तिनापुर नगर में हैं।
श्लोक 36 (3.1.36)
ते त्वस्मद्धितकामार्थं पालनीयाः प्रयत्नतः । युष्माभिः सहिताः सर्वे शोकसंतापविह्वलाः ॥
te tvasmaddhitakāmārthaṃ pālanīyāḥ prayatnataḥ | yuṣmābhiḥ sahitāḥ sarve śokasaṃtāpavihvalāḥ
हमारे हित के लिए आप सब मिलकर उनकी यत्नपूर्वक देखभाल करें, क्योंकि वे शोक और संताप से व्याकुल हैं।
श्लोक 37 (3.1.37)
निवर्ततागता दूरं ममागमनकाङ्क्षिणः । स्वजने न्यासभूते मे कार्या स्नेहान्विता मतिः ॥
nivartatāgatā dūraṃ mamāgamanakāṅkṣiṇaḥ | svajane nyāsabhūte me kāryā snehānvitā matiḥ
आप बहुत दूर तक आ गए हैं; मेरे लौटने की प्रतीक्षा करते हुए अब लौट जाइए। मेरे स्वजनों को मैं धरोहर के रूप में आपको सौंपता हूँ; उनके प्रति आपके मन में स्नेह बना रहे।
श्लोक 38 (3.1.38)
एतद्धि मम कार्याणां परमं हृदि संस्थितम् । कृता तेन तु तुष्टिर्मे सत्कारश्च भविष्यति ॥
etaddhi mama kāryāṇāṃ paramaṃ hṛdi saṃsthitam | kṛtā tena tu tuṣṭirme satkāraśca bhaviṣyati
मेरे सब कामों में यही सबसे बड़ा है और मेरे हृदय में बसा है। ऐसा करने से मुझे संतोष होगा और यही मेरा सत्कार होगा।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 39 (3.1.39)
तथानुमन्त्रितास्तेन धर्मराजेन ताः प्रजाः । चक्रुरार्तस्वरं घोरं हा राजन्निति दुःखिताः ॥
tathānumantritāstena dharmarājena tāḥ prajāḥ | cakrurārtasvaraṃ ghoraṃ hā rājanniti duḥkhitāḥ
धर्मराज के ऐसा कहने पर दुःखी प्रजा ने "हा राजन्!" कहकर भयानक आर्तनाद किया।
श्लोक 40 (3.1.40)
गुणान्पार्थस्य संस्मृत्य दुःखार्ताः परमातुराः । अकामाः संन्यवर्तन्त समागम्याथ पाण्डवान् ॥
guṇānpārthasya saṃsmṛtya duḥkhārtāḥ paramāturāḥ | akāmāḥ saṃnyavartanta samāgamyātha pāṇḍavān
पार्थ के गुणों को याद करके दुःख से व्याकुल और अत्यन्त आतुर वे लोग पाण्डवों से विदा लेकर अनिच्छा से लौट गए।
श्लोक 41 (3.1.41)
निवृत्तेषु तु पौरेषु रथानास्थाय पाण्डवाः । आजग्मुर्जाह्नवीतीरे प्रमाणाख्यं महावटम् ॥
nivṛtteṣu tu paureṣu rathānāsthāya pāṇḍavāḥ | ājagmurjāhnavītīre pramāṇākhyaṃ mahāvaṭam
नगरवासियों के लौट जाने पर पाण्डव रथों पर सवार होकर जाह्नवी के तट पर प्रमाण नामक महान वटवृक्ष के पास पहुँचे।
श्लोक 42 (3.1.42)
ते तं दिवसशेषेण वटं गत्वा तु पाण्डवाः । ऊषुस्तां रजनीं वीराः संस्पृश्य सलिलं शुचि ॥
te taṃ divasaśeṣeṇa vaṭaṃ gatvā tu pāṇḍavāḥ | ūṣustāṃ rajanīṃ vīrāḥ saṃspṛśya salilaṃ śuci
दिन ढलते-ढलते उस वटवृक्ष के पास पहुँचकर वीर पाण्डवों ने पवित्र जल का स्पर्श किया और वहीं रात बिताई।
श्लोक 43 (3.1.43)
उदकेनैव तां रात्रिमूषुस्ते दुःखकर्शिताः । अनुजग्मुश्च तत्रैतान्स्नेहात्केचिद्द्विजातयः ॥
udakenaiva tāṃ rātrimūṣuste duḥkhakarśitāḥ | anujagmuśca tatraitānsnehātkeciddvijātayaḥ
दुःख से दुर्बल उन्होंने वह रात केवल जल पीकर बिताई। और स्नेह के कारण कुछ ब्राह्मण भी वहाँ उनके पीछे-पीछे आ गए,
श्लोक 44 (3.1.44)
साग्नयोऽनग्नयश्चैव सशिष्यगणबान्धवाः । स तैः परिवृतो राजा शुशुभे ब्रह्मवादिभिः ॥
sāgnayo'nagnayaścaiva saśiṣyagaṇabāndhavāḥ | sa taiḥ parivṛto rājā śuśubhe brahmavādibhiḥ
कुछ अग्निहोत्री और कुछ बिना अग्नि वाले, अपने शिष्यों और बन्धुओं के साथ। उन ब्रह्मवादियों से घिरे हुए राजा युधिष्ठिर शोभा पाने लगे।
श्लोक 45 (3.1.45)
तेषां प्रादुष्कृताग्नीनां मुहूर्ते रम्यदारुणे । ब्रह्मघोषपुरस्कारः संजल्पः समजायत ॥
teṣāṃ prāduṣkṛtāgnīnāṃ muhūrte ramyadāruṇe | brahmaghoṣapuraskāraḥ saṃjalpaḥ samajāyata
उस सुहावने और साथ ही भयावने सन्ध्या-काल में जब उन्होंने अपनी अग्नियाँ प्रज्वलित कीं, तब वेद-पाठ की ध्वनि के साथ उनमें आपसी चर्चा होने लगी।
श्लोक 46 (3.1.46)
राजानं तु कुरुश्रेष्ठं ते हंसमधुरस्वराः । आश्वासयन्तो विप्राग्र्याः क्षपां सर्वां व्यनोदयन् ॥
rājānaṃ tu kuruśreṣṭhaṃ te haṃsamadhurasvarāḥ | āśvāsayanto viprāgryāḥ kṣapāṃ sarvāṃ vyanodayan
हंस के समान मधुर स्वर वाले उन श्रेष्ठ ब्राह्मणों ने कुरुश्रेष्ठ राजा को ढाढ़स बँधाते हुए पूरी रात उनका मन बहलाया।
श्लोक 47 (3.1.47)
राजा तु भ्रातृभिः सार्धं तथा सर्वैः सुहृद्गणैः । अशेत तां निशां राजन्दुःखशोकसमाहितः ॥
rājā tu bhrātṛbhiḥ sārdhaṃ tathā sarvaiḥ suhṛdgaṇaiḥ | aśeta tāṃ niśāṃ rājanduḥkhaśokasamāhitaḥ
हे राजन्, राजा युधिष्ठिर ने अपने भाइयों और सब सुहृदों के साथ दुःख और शोक में डूबे हुए वह रात बिताई।