Skip to main content

आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 2

शौनक का युधिष्ठिर को वैराग्य का उपदेश

प्रातःकाल युधिष्ठिर अपने पीछे आए ब्राह्मणों से लौट जाने का आग्रह करते हैं, क्योंकि अब वे उनका भरण-पोषण नहीं कर सकते; पर ब्राह्मण स्वयं अपना आहार जुटाकर साथ चलने पर अड़े रहते हैं। शोक में बैठे राजा को महर्षि शौनक उपदेश देते हैं कि शरीर और मन के दुःख आसक्ति और तृष्णा से उपजते हैं, धन भय और क्लेश का कारण है, और संतोष ही परम सुख है। युधिष्ठिर उत्तर देते हैं कि वे धन केवल ब्राह्मणों के पालन और गृहस्थ के अतिथि-धर्म के लिए चाहते हैं; तब शौनक पितृयान और देवयान मार्गों का वर्णन करके उन्हें तप और योग से वह सामर्थ्य पाने की प्रेरणा देते हैं जिससे वे सबका पालन कर सकें।

अध्याय 1अध्याय-सूचीअध्याय 3

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (3.2.1)

प्रभातायां तु शर्वर्यां तेषामक्लिष्टकर्मणाम् । वनं यियासतां विप्रास्तस्थुर्भिक्षाभुजोऽग्रतः । तानुवाच ततो राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ॥

prabhātāyāṃ tu śarvaryāṃ teṣāmakliṣṭakarmaṇām | vanaṃ yiyāsatāṃ viprāstasthurbhikṣābhujo'grataḥ | tānuvāca tato rājā kuntīputro yudhiṣṭhiraḥ

रात बीतने पर जब सवेरा हुआ और अनथक कर्म करने वाले वे पाण्डव वन जाने को तैयार हुए, तब भिक्षा पर जीने वाले ब्राह्मण उनके सामने आ खड़े हुए। तब कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने उनसे कहा —

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 2 (3.2.2)

वयं हि हृतसर्वस्वा हृतराज्या हृतश्रियः । फलमूलामिषाहारा वनं यास्याम दुःखिताः ॥

vayaṃ hi hṛtasarvasvā hṛtarājyā hṛtaśriyaḥ | phalamūlāmiṣāhārā vanaṃ yāsyāma duḥkhitāḥ

हमारा सर्वस्व, राज्य और लक्ष्मी सब छिन गए हैं। हम दुःखी होकर फल, मूल और मृगों के मांस पर जीते हुए वन में जाएँगे।

श्लोक 3 (3.2.3)

वनं च दोषबहुलं बहुव्यालसरीसृपम् । परिक्लेशश्च वो मन्ये ध्रुवं तत्र भविष्यति ॥

vanaṃ ca doṣabahulaṃ bahuvyālasarīsṛpam | parikleśaśca vo manye dhruvaṃ tatra bhaviṣyati

वन अनेक संकटों से भरा है और वहाँ बहुत से हिंसक पशु और सर्प रहते हैं। मुझे लगता है कि वहाँ आपको निश्चय ही कष्ट होगा।

श्लोक 4 (3.2.4)

ब्राह्मणानां परिक्लेशो दैवतान्यपि सादयेत् । किं पुनर्मामितो विप्रा निवर्तध्वं यथेष्टतः ॥

brāhmaṇānāṃ parikleśo daivatānyapi sādayet | kiṃ punarmāmito viprā nivartadhvaṃ yatheṣṭataḥ

ब्राह्मणों का कष्ट तो देवताओं को भी गिरा सकता है, फिर मेरी तो बात ही क्या। इसलिए हे विप्रो, आप यहाँ से इच्छानुसार लौट जाइए।

ब्राह्मणा ऊचुः

श्लोक 5 (3.2.5)

गतिर्या भवतां राजंस्तां वयं गन्तुमुद्यताः । नार्हथास्मान्परित्यक्तुं भक्तान्सद्धर्मदर्शिनः ॥

gatiryā bhavatāṃ rājaṃstāṃ vayaṃ gantumudyatāḥ | nārhathāsmānparityaktuṃ bhaktānsaddharmadarśinaḥ

हे राजन्, आप जिस मार्ग पर जाएँगे, उसी पर चलने को हम तैयार हैं। हम आपके भक्त हैं और सच्चे धर्म को पहचानते हैं; आप हमें त्याग न दें।

श्लोक 6 (3.2.6)

स्नेहकर्माणि भक्तेषु दैवतान्यपि कुर्वते । विशेषतो ब्राह्मणेषु सदाचारावलम्बिषु ॥

snehakarmāṇi bhakteṣu daivatānyapi kurvate | viśeṣato brāhmaṇeṣu sadācārāvalambiṣu

देवता भी अपने भक्तों पर स्नेह करते हैं, विशेषकर सदाचार का पालन करने वाले ब्राह्मणों पर।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 7 (3.2.7)

ममापि परमा भक्तिर्ब्राह्मणेषु सदा द्विजाः । सहायविपरिभ्रंशस्त्वयं सादयतीव माम् ॥

mamāpi paramā bhaktirbrāhmaṇeṣu sadā dvijāḥ | sahāyaviparibhraṃśastvayaṃ sādayatīva mām

हे द्विजो, मेरी भी ब्राह्मणों में सदा परम भक्ति रही है। पर आपकी सहायता के साधनों का यह अभाव ही मुझे दुःखी कर रहा है।

श्लोक 8 (3.2.8)

आहरेयुर्हि ये सर्वे फलमूलमृगांस्तथा । त इमे शोकजैर्दुःखैर्भ्रातरो मे विमोहिताः ॥

āhareyurhi ye sarve phalamūlamṛgāṃstathā | ta ime śokajairduḥkhairbhrātaro me vimohitāḥ

मेरे ये भाई, जो सब मिलकर फल, मूल और मृग ला सकते थे, शोक से उपजे दुःखों के कारण स्वयं व्याकुल हैं।

श्लोक 9 (3.2.9)

द्रौपद्या विप्रकर्षेण राज्यापहरणेन च । दुःखार्दितानिमान्क्लेशैर्नाहं योक्तुमिहोत्सहे ॥

draupadyā viprakarṣeṇa rājyāpaharaṇena ca | duḥkhārditānimānkleśairnāhaṃ yoktumihotsahe

द्रौपदी के अपमान और राज्य के छिन जाने से वे पहले ही दुःख से पीड़ित हैं; मैं उन पर यहाँ और कष्टों का बोझ नहीं डाल सकता।

ब्राह्मणा ऊचुः

श्लोक 10 (3.2.10)

अस्मत्पोषणजा चिन्ता मा भूत्ते हृदि पार्थिव । स्वयमाहृत्य वन्यानि त्वानुयास्यामहे वयम् ॥

asmatpoṣaṇajā cintā mā bhūtte hṛdi pārthiva | svayamāhṛtya vanyāni tvānuyāsyāmahe vayam

हे पृथ्वीपति, हमारे भरण-पोषण की चिन्ता आपके मन में न हो। हम स्वयं वन के फल-मूल जुटाकर आपके साथ चलेंगे।

श्लोक 11 (3.2.11)

अनुध्यानेन जप्येन विधास्यामः शिवं तव । कथाभिश्चानुकूलाभिः सह रंस्यामहे वने ॥

anudhyānena japyena vidhāsyāmaḥ śivaṃ tava | kathābhiścānukūlābhiḥ saha raṃsyāmahe vane

हम ध्यान और जप से आपका कल्याण करेंगे, और मनभावन कथाएँ कहते हुए वन में आपके साथ आनन्द से रहेंगे।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 12 (3.2.12)

एवमेतन्न संदेहो रमेयं ब्राह्मणैः सह । न्यूनभावात्तु पश्यामि प्रत्यादेशमिवात्मनः ॥

evametanna saṃdeho rameyaṃ brāhmaṇaiḥ saha | nyūnabhāvāttu paśyāmi pratyādeśamivātmanaḥ

यह निःसंदेह ठीक है; ब्राह्मणों के साथ रहकर मुझे प्रसन्नता ही होगी। पर अपनी इस हीन दशा में मुझे यह अपने लिए धिक्कार-सा लगता है।

श्लोक 13 (3.2.13)

कथं द्रक्ष्यामि वः सर्वान्स्वयमाहृत्य भोजिनः । मद्भक्त्या क्लिश्यतोऽनर्हान्धिक्पापान्धृतराष्ट्रजान् ॥

kathaṃ drakṣyāmi vaḥ sarvānsvayamāhṛtya bhojinaḥ | madbhaktyā kliśyato'narhāndhikpāpāndhṛtarāṣṭrajān

मैं आप सबको, जो इस कष्ट के योग्य नहीं हैं, मेरी भक्ति के कारण क्लेश सहते और अपना जुटाया हुआ भोजन करते कैसे देखूँगा? धिक्कार है धृतराष्ट्र के पापी पुत्रों को!

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 14 (3.2.14)

इत्युक्त्वा नृपतिः शोचन्निषसाद महीतले ॥

ityuktvā nṛpatiḥ śocanniṣasāda mahītale

ऐसा कहकर राजा शोक करते हुए भूमि पर बैठ गए।

श्लोक 15 (3.2.15)

तमध्यात्मरतो विद्वाञ्शौनको नाम वै द्विजः । योगे साङ्ख्ये च कुशलो राजानमिदमब्रवीत् ॥

tamadhyātmarato vidvāñśaunako nāma vai dvijaḥ | yoge sāṅkhye ca kuśalo rājānamidamabravīt

तब अध्यात्म में रमने वाले, योग और सांख्य में निपुण शौनक नामक विद्वान ब्राह्मण ने राजा से यह कहा —

शौनक उवाच

श्लोक 16 (3.2.16)

शोकस्थानसहस्राणि हर्षस्थानशतानि च । दिवसेदिवसे मूढमाविशन्ति न पण्डितम् ॥

śokasthānasahasrāṇi harṣasthānaśatāni ca | divasedivase mūḍhamāviśanti na paṇḍitam

शोक के हजारों और हर्ष के सैकड़ों कारण मूर्ख को प्रतिदिन घेरते हैं, पर ज्ञानी को नहीं।

श्लोक 17 (3.2.17)

न हि ज्ञानविरुद्धेषु बहुदोषेषु कर्मसु । श्रेयोघातिषु सज्जन्ते बुद्धिमन्तो भवद्विधाः ॥

na hi jñānaviruddheṣu bahudoṣeṣu karmasu | śreyoghātiṣu sajjante buddhimanto bhavadvidhāḥ

आप जैसे बुद्धिमान पुरुष ज्ञान के विरुद्ध, अनेक दोषों से भरे और कल्याण का नाश करने वाले कर्मों में आसक्त नहीं होते।

श्लोक 18 (3.2.18)

अष्टाङ्गां बुद्धिमाहुर्यां सर्वाश्रेयोभिघातिनीम् । श्रुतिस्मृतिसमायुक्तां राजन्सा त्वय्यवस्थिता ॥

aṣṭāṅgāṃ buddhimāhuryāṃ sarvāśreyobhighātinīm | śrutismṛtisamāyuktāṃ rājansā tvayyavasthitā

हे राजन्, जिस आठ अंगों वाली बुद्धि को सब अमंगलों का नाश करने वाली और श्रुति-स्मृति से युक्त कहा जाता है, वह आपमें स्थित है।

श्लोक 19 (3.2.19)

शुश्रूषा श्रवणं चैव ग्रहणं धारणं तथा । ऊहापोहोऽर्थविज्ञानं तत्त्वज्ञानं च धीगुणाः ॥

śuśrūṣā śravaṇaṃ caiva grahaṇaṃ dhāraṇaṃ tathā | ūhāpoho'rthavijñānaṃ tattvajñānaṃ ca dhīguṇāḥ

सुनने की इच्छा, श्रवण, ग्रहण, धारण, ऊह (तर्क), अपोह (विवेचन), अर्थ का ज्ञान और तत्त्वज्ञान — ये बुद्धि के गुण हैं।

श्लोक 20 (3.2.20)

अर्थकृच्छ्रेषु दुर्गेषु व्यापत्सु स्वजनेष्वपि । शारीरमानसैर्दुःखैर्न सीदन्ति भवद्विधाः ॥

arthakṛcchreṣu durgeṣu vyāpatsu svajaneṣvapi | śārīramānasairduḥkhairna sīdanti bhavadvidhāḥ

आप जैसे लोग धन के संकट में, दुर्गम परिस्थितियों में, आपदाओं में और स्वजनों के बीच भी शारीरिक और मानसिक दुःखों से विचलित नहीं होते।

श्लोक 21 (3.2.21)

श्रूयतां चाभिधास्यामि जनकेन यथा पुरा । आत्मव्यवस्थानकरा गीताः श्लोका महात्मना ॥

śrūyatāṃ cābhidhāsyāmi janakena yathā purā | ātmavyavasthānakarā gītāḥ ślokā mahātmanā

सुनिए, मैं वे श्लोक सुनाता हूँ जिन्हें पूर्वकाल में महात्मा जनक ने गाया था और जो मन को स्थिर करने वाले हैं।

श्लोक 22 (3.2.22)

मनोदेहसमुत्थाभ्यां दुःखाभ्यामर्दितं जगत् । तयोर्व्याससमासाभ्यां शमोपायमिमं शृणु ॥

manodehasamutthābhyāṃ duḥkhābhyāmarditaṃ jagat | tayorvyāsasamāsābhyāṃ śamopāyamimaṃ śṛṇu

संसार मन और शरीर से उत्पन्न दो प्रकार के दुःखों से पीड़ित है। उन्हें शान्त करने का यह उपाय विस्तार और संक्षेप में सुनिए।

श्लोक 23 (3.2.23)

व्याधेरनिष्टसंस्पर्शाच्छ्रमादिष्टविवर्जनात् । दुःखं चतुर्भिः शारीरं कारणैः संप्रवर्तते ॥

vyādheraniṣṭasaṃsparśācchramādiṣṭavivarjanāt | duḥkhaṃ caturbhiḥ śārīraṃ kāraṇaiḥ saṃpravartate

शारीरिक दुःख चार कारणों से होता है — रोग, अप्रिय वस्तु का स्पर्श, परिश्रम और प्रिय वस्तु का वियोग।

श्लोक 24 (3.2.24)

तदा तत्प्रतिकाराच्च सततं चाविचिन्तनात् । आधिव्याधिप्रशमनं क्रियायोगबलेन तु ॥

tadā tatpratikārācca satataṃ cāvicintanāt | ādhivyādhipraśamanaṃ kriyāyogabalena tu

फिर उनका उपचार करने और उनके विषय में निरन्तर न सोचने से मानसिक और शारीरिक व्याधियाँ शान्त होती हैं; यही क्रियायोग का बल है।

श्लोक 25 (3.2.25)

मतिमन्तो व्यथोपेताः शमं प्रागेव कुर्वते । मानसस्य प्रियाख्यानैः संभोगोपनयैर्नृणाम् ॥

matimanto vyathopetāḥ śamaṃ prāgeva kurvate | mānasasya priyākhyānaiḥ saṃbhogopanayairnṛṇām

इसलिए बुद्धिमान लोग पीड़ित मनुष्यों के मन को पहले ही प्रिय वचनों और सुख-साधन जुटाकर शान्त करते हैं।

श्लोक 26 (3.2.26)

मानसेन हि दुःखेन शरीरमुपतप्यते । अयःपिण्डेन तप्तेन कुम्भसंस्थमिवोदकम् ॥

mānasena hi duḥkhena śarīramupatapyate | ayaḥpiṇḍena taptena kumbhasaṃsthamivodakam

क्योंकि मन के दुःख से शरीर तपने लगता है, जैसे तपे हुए लोहे के गोले से घड़े में रखा जल तप जाता है।

श्लोक 27 (3.2.27)

मानसं शमयेत्तस्माज्ज्ञानेनाग्निमिवाम्बुना । प्रशान्ते मानसे दुःखे शारीरमुपशाम्यति ॥

mānasaṃ śamayettasmājjñānenāgnimivāmbunā | praśānte mānase duḥkhe śārīramupaśāmyati

इसलिए जैसे जल से आग बुझाई जाती है, वैसे ही ज्ञान से मानसिक दुःख को शान्त करना चाहिए; मन का दुःख शान्त होने पर शरीर का दुःख भी मिट जाता है।

श्लोक 28 (3.2.28)

मनसो दुःखमूलं तु स्नेह इत्युपलभ्यते । स्नेहात्तु सज्जते जन्तुर्दुःखयोगमुपैति च ॥

manaso duḥkhamūlaṃ tu sneha ityupalabhyate | snehāttu sajjate janturduḥkhayogamupaiti ca

मन के दुःख की जड़ आसक्ति (स्नेह) ही पाई जाती है। आसक्ति से प्राणी बँधता है और दुःख से जुड़ जाता है।

श्लोक 29 (3.2.29)

स्नेहमूलानि दुःखानि स्नेहजानि भयानि च । शोकहर्षौ तथायासः सर्वं स्नेहात्प्रवर्तते ॥

snehamūlāni duḥkhāni snehajāni bhayāni ca | śokaharṣau tathāyāsaḥ sarvaṃ snehātpravartate

दुःखों की जड़ आसक्ति है, भय भी आसक्ति से उपजते हैं; शोक, हर्ष और क्लेश — सब आसक्ति से ही होते हैं।

श्लोक 30 (3.2.30)

स्नेहात्कारुण्यरागौ च प्रजास्वीर्ष्यादयस्तथा । अश्रेयस्कावुभावेतौ पूर्वस्तत्र गुरुः स्मृतः ॥

snehātkāruṇyarāgau ca prajāsvīrṣyādayastathā | aśreyaskāvubhāvetau pūrvastatra guruḥ smṛtaḥ

आसक्ति से ही करुणा और राग, तथा लोगों के प्रति ईर्ष्या आदि उत्पन्न होते हैं। ये दोनों ही अकल्याणकारी हैं, पर इनमें पहला अधिक गम्भीर माना गया है।

श्लोक 31 (3.2.31)

कोटराग्निर्यथाऽशेषं समूलं पादपं दहेत् । धर्मार्थिनं तथाऽल्पोऽपि रागदोषो विनाशयेत् ॥

koṭarāgniryathā'śeṣaṃ samūlaṃ pādapaṃ dahet | dharmārthinaṃ tathā'lpo'pi rāgadoṣo vināśayet

जैसे वृक्ष के खोखले में लगी आग पूरे वृक्ष को जड़ समेत जला देती है, वैसे ही राग का थोड़ा-सा दोष भी धर्म चाहने वाले का नाश कर देता है।

श्लोक 32 (3.2.32)

विप्रयोगे न तु त्यागी दोषदर्शी समागमे । विरागं भजते जन्तुर्निर्वैरो निष्परिग्रहः ॥

viprayoge na tu tyāgī doṣadarśī samāgame | virāgaṃ bhajate janturnirvairo niṣparigrahaḥ

केवल विषयों से अलग हो जाने वाला त्यागी नहीं है; जो उनके संग रहते हुए भी उनके दोष देखता है, वही बैर और परिग्रह से रहित होकर वैराग्य पाता है।

श्लोक 33 (3.2.33)

तस्मात्स्नेहं स्वपक्षेभ्यो मित्रेभ्यो धनसंचयात् । स्वशरीरसमुत्थं च ज्ञानेन विनिवर्तयेत् ॥

tasmātsnehaṃ svapakṣebhyo mitrebhyo dhanasaṃcayāt | svaśarīrasamutthaṃ ca jñānena vinivartayet

इसलिए अपने पक्ष के लोगों, मित्रों और संचित धन के प्रति आसक्ति को, तथा अपने शरीर से उपजी आसक्ति को भी, ज्ञान के द्वारा दूर करना चाहिए।

श्लोक 34 (3.2.34)

ज्ञानान्वितेषु युक्तेषु शास्त्रज्ञेषु कृतात्मसु । न तेषु सज्जते स्नेहः पद्मपत्रेष्विवोदकम् ॥

jñānānviteṣu yukteṣu śāstrajñeṣu kṛtātmasu | na teṣu sajjate snehaḥ padmapatreṣvivodakam

जो ज्ञानी, संयमी, शास्त्रों के ज्ञाता और आत्मजयी हैं, उनमें आसक्ति वैसे ही नहीं टिकती जैसे कमल के पत्तों पर जल नहीं टिकता।

श्लोक 35 (3.2.35)

रागाभिभूतः पुरुषः कामेन परिकृष्यते । इच्छा संजायते तस्य ततस्तृष्णा विवर्धते ॥

rāgābhibhūtaḥ puruṣaḥ kāmena parikṛṣyate | icchā saṃjāyate tasya tatastṛṣṇā vivardhate

राग से अभिभूत मनुष्य काम के द्वारा खींचा जाता है; उसमें इच्छा उत्पन्न होती है और फिर तृष्णा बढ़ती जाती है।

श्लोक 36 (3.2.36)

तृष्णा हि सर्वपापिष्ठा नित्योद्वेगकरी नृणाम् । अधर्मबहुला चैव घोरा पापानुबन्धिनी ॥

tṛṣṇā hi sarvapāpiṣṭhā nityodvegakarī nṛṇām | adharmabahulā caiva ghorā pāpānubandhinī

तृष्णा सबसे बड़ी पापिनी है, मनुष्यों को सदा उद्विग्न रखती है; वह अधर्म से भरी, भयंकर और पाप से बाँधने वाली है।

श्लोक 37 (3.2.37)

या दुस्त्यजा दुर्मतिभिर्या न जीर्यति जीर्यतः । योऽसौ प्राणान्तिको रोगस्तां तृष्णां त्यजतः सुखम् ॥

yā dustyajā durmatibhiryā na jīryati jīryataḥ | yo'sau prāṇāntiko rogastāṃ tṛṣṇāṃ tyajataḥ sukham

जिसे दुर्बुद्धि लोग कठिनाई से छोड़ पाते हैं, जो मनुष्य के बूढ़े होने पर भी बूढ़ी नहीं होती और जो प्राण लेकर ही छोड़ने वाला रोग है, उस तृष्णा को त्यागने वाले को ही सुख मिलता है।

श्लोक 38 (3.2.38)

अनाद्यन्ता तु सा तृष्णा अन्तर्देहगता नृणाम् । विनाशयति भूतानि अयोनिज इवानलः ॥

anādyantā tu sā tṛṣṇā antardehagatā nṛṇām | vināśayati bhūtāni ayonija ivānalaḥ

आदि और अन्त से रहित वह तृष्णा मनुष्यों के शरीर के भीतर रहकर प्राणियों का नाश कर देती है, जैसे तपे हुए लोहे में समाई आग।

श्लोक 39 (3.2.39)

यथैधः स्वसमुत्थेन वह्निना नाशमृच्छति । तथाऽकृतात्मा लोभेन सहजेन विनश्यति ॥

yathaidhaḥ svasamutthena vahninā nāśamṛcchati | tathā'kṛtātmā lobhena sahajena vinaśyati

जैसे लकड़ी अपने ही भीतर से उठी आग से नष्ट हो जाती है, वैसे ही असंयमी मनुष्य अपने साथ जन्मे लोभ से नष्ट हो जाता है।

श्लोक 40 (3.2.40)

राजतः सलिलादग्नेश्चोरतः स्वजनादपि । अर्थिभ्यः कालतस्तस्मान्नित्यमर्थवतां भयम् । भयमर्थवतां नित्यं मृत्योः प्राणभृतामिव ॥

rājataḥ salilādagneścorataḥ svajanādapi | arthibhyaḥ kālatastasmānnityamarthavatāṃ bhayam | bhayamarthavatāṃ nityaṃ mṛtyoḥ prāṇabhṛtāmiva

धनवानों को राजा, जल, अग्नि, चोर और अपने स्वजनों से भी, याचकों से और काल से सदा भय रहता है। जैसे प्राणियों को मृत्यु का भय रहता है, वैसे ही धनवानों को सदा भय बना रहता है।

श्लोक 41 (3.2.41)

यथा ह्यामिषमाकाशे पक्षिभिः श्वापदैर्भुवि । भक्ष्यते सलिले मत्स्यैस्तथा सर्वेण वित्तवान् ॥

yathā hyāmiṣamākāśe pakṣibhiḥ śvāpadairbhuvi | bhakṣyate salile matsyaistathā sarveṇa vittavān

जैसे मांस को आकाश में पक्षी, धरती पर हिंसक पशु और जल में मछलियाँ खा जाती हैं, वैसे ही धनवान को सब लोग नोच खाते हैं।

श्लोक 42 (3.2.42)

अर्थ एव हि केषांचिदनर्थं भजते नृणाम् । अर्थश्रेयसि चासक्तो न श्रेयो विन्दते नरः । तस्मादर्थागमाः सर्वे मनोमोहविवर्धनाः ॥

artha eva hi keṣāṃcidanarthaṃ bhajate nṛṇām | arthaśreyasi cāsakto na śreyo vindate naraḥ | tasmādarthāgamāḥ sarve manomohavivardhanāḥ

कुछ लोगों के लिए धन ही अनर्थ का कारण बन जाता है। धन से मिलने वाले कल्याण में आसक्त मनुष्य सच्चा कल्याण नहीं पाता। इसलिए धन की सारी प्राप्तियाँ मन के मोह को ही बढ़ाती हैं।

श्लोक 43 (3.2.43)

कार्पण्यं दर्पमानौ च भयमुद्वेग एव च । अर्थजानि विदुः प्राज्ञा दुःखान्येतानि देहिनाम् ॥

kārpaṇyaṃ darpamānau ca bhayamudvega eva ca | arthajāni viduḥ prājñā duḥkhānyetāni dehinām

कृपणता, घमण्ड, अभिमान, भय और उद्वेग — ज्ञानी लोग इन्हें देहधारियों के धन से उपजे दुःख मानते हैं।

श्लोक 44 (3.2.44)

अर्थस्योपार्जने दुःखमार्जितानां च रक्षणे । नाशे दुःखं व्यये दुःखं घ्नन्ति चैवार्थकारणात् ॥

arthasyopārjane duḥkhamārjitānāṃ ca rakṣaṇe | nāśe duḥkhaṃ vyaye duḥkhaṃ ghnanti caivārthakāraṇāt

धन कमाने में दुःख है, कमाए हुए की रक्षा में दुःख है; उसके नष्ट होने में दुःख है और खर्च होने में भी दुःख है। धन के कारण लोग हत्या तक कर डालते हैं।

श्लोक 45 (3.2.45)

अर्था दुःखं परित्यक्तुं पालिताश्चैव शत्रवः । दुःखेन चाधिगम्यन्ते तेषां नाशं न चिन्तयेत् ॥

arthā duḥkhaṃ parityaktuṃ pālitāścaiva śatravaḥ | duḥkhena cādhigamyante teṣāṃ nāśaṃ na cintayet

धन को छोड़ना कठिन है, और रक्षा करने पर वह शत्रु बन जाता है; वह दुःख से ही प्राप्त होता है। उसके नाश की चिन्ता नहीं करनी चाहिए।

श्लोक 46 (3.2.46)

असन्तोषपरा मूढाः संतोषं यान्ति पण्डिताः । अन्तो नास्ति पिपासायाः संतोषः परमं सुखम् । तस्मात्संतोषमेवेह परं पश्यन्ति पण्डिताः ॥

asantoṣaparā mūḍhāḥ saṃtoṣaṃ yānti paṇḍitāḥ | anto nāsti pipāsāyāḥ saṃtoṣaḥ paramaṃ sukham | tasmātsaṃtoṣameveha paraṃ paśyanti paṇḍitāḥ

मूर्ख असंतोष में डूबे रहते हैं, ज्ञानी संतोष पाते हैं। तृष्णा का कोई अन्त नहीं, संतोष ही परम सुख है। इसलिए ज्ञानी इस संसार में संतोष को ही सबसे श्रेष्ठ मानते हैं।

श्लोक 47 (3.2.47)

अनित्यं यौवनं रूपं जीवितं रत्नसंचयः । ऐश्वर्यं प्रियसंवासो गृद्ध्येत्तत्र न पण्डितः ॥

anityaṃ yauvanaṃ rūpaṃ jīvitaṃ ratnasaṃcayaḥ | aiśvaryaṃ priyasaṃvāso gṛddhyettatra na paṇḍitaḥ

यौवन, रूप, जीवन, रत्नों का संचय, ऐश्वर्य और प्रियजनों का साथ — सब अनित्य हैं; ज्ञानी को इनका लोभ नहीं करना चाहिए।

श्लोक 48 (3.2.48)

त्यजेत संचयांस्तस्मात्तज्जान्क्लेशान्सहेत च । न हि संचयवान्कश्चिद्दृश्यते निरुपद्रवः । अतश्च धार्मिकैः पुम्भिरनीहार्थः प्रशस्यते ॥

tyajeta saṃcayāṃstasmāttajjānkleśānsaheta ca | na hi saṃcayavānkaściddṛśyate nirupadravaḥ | ataśca dhārmikaiḥ pumbhiranīhārthaḥ praśasyate

इसलिए संचित धन को त्याग देना चाहिए और उससे होने वाले कष्टों को सह लेना चाहिए। कोई भी संचय करने वाला उपद्रवों से मुक्त नहीं दिखता। इसी कारण धर्मात्मा पुरुष धन की चेष्टा न करने वाले की प्रशंसा करते हैं।

श्लोक 49 (3.2.49)

धर्मार्थं यस्य वित्तेहा वरं तस्य निरीहता । प्रक्षालनाद्धि पङ्कस्य श्रेयो ह्यस्पर्शनं नृणाम् ॥

dharmārthaṃ yasya vittehā varaṃ tasya nirīhatā | prakṣālanāddhi paṅkasya śreyo hyasparśanaṃ nṛṇām

जो धर्म के लिए धन की इच्छा करता है, उसके लिए भी धन की इच्छा न करना ही श्रेष्ठ है; कीचड़ लगाकर धोने से अच्छा है कि मनुष्य उसे छुए ही नहीं।

श्लोक 50 (3.2.50)

युधिष्ठिरैवमर्थेषु न स्पृहां कर्तुमर्हसि । धर्मेण यदि ते कार्यं विमुक्तेच्छो भवार्थतः ॥

yudhiṣṭhiraivamartheṣu na spṛhāṃ kartumarhasi | dharmeṇa yadi te kāryaṃ vimukteccho bhavārthataḥ

इसलिए हे युधिष्ठिर, आपको धन की लालसा नहीं करनी चाहिए। यदि आपको धर्म से प्रयोजन है, तो धन की इच्छा से मुक्त हो जाइए।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 51 (3.2.51)

नार्थोपभोगलिप्सार्थमियमर्थेप्सुता मम । भरणार्थं तु विप्राणां ब्रह्मन्काङ्क्षे न लोभतः ॥

nārthopabhogalipsārthamiyamarthepsutā mama | bharaṇārthaṃ tu viprāṇāṃ brahmankāṅkṣe na lobhataḥ

धन की यह इच्छा मुझे भोग की लालसा से नहीं है। हे ब्रह्मन्, मैं इसे ब्राह्मणों के भरण-पोषण के लिए चाहता हूँ, लोभ से नहीं।

श्लोक 52 (3.2.52)

कथं ह्यस्मद्विधो ब्रह्मन्वर्तमानो गृहाश्रमे । भरणं पालनं चापि न कुर्यादनुयायिनाम् ॥

kathaṃ hyasmadvidho brahmanvartamāno gṛhāśrame | bharaṇaṃ pālanaṃ cāpi na kuryādanuyāyinām

हे ब्रह्मन्, गृहस्थ-आश्रम में रहने वाला मुझ जैसा व्यक्ति अपने अनुयायियों का भरण और पालन कैसे न करे?

श्लोक 53 (3.2.53)

संविभागो हि भूतानां सर्वेषामेव दृश्यते । तथैवापचमानेभ्यः प्रदेयं गृहमेधिना ॥

saṃvibhāgo hi bhūtānāṃ sarveṣāmeva dṛśyate | tathaivāpacamānebhyaḥ pradeyaṃ gṛhamedhinā

सब प्राणियों के साथ बाँटकर खाना स्पष्ट रूप से नियम है; उसी प्रकार गृहस्थ को उन लोगों को भी देना चाहिए जो स्वयं भोजन नहीं पकाते।

श्लोक 54 (3.2.54)

तृणानि भूमिरुदकं वाक्चतुर्थी च सूनृता । सतामेतानि गेहेषु नोच्छिद्यन्ते कदाचन ॥

tṛṇāni bhūmirudakaṃ vākcaturthī ca sūnṛtā | satāmetāni geheṣu nocchidyante kadācana

बैठने के लिए तृण, विश्राम के लिए भूमि, जल और चौथी मधुर वाणी — ये सज्जनों के घरों में कभी समाप्त नहीं होते।

श्लोक 55 (3.2.55)

देयमार्तस्य शयनं स्थितश्रान्तस्य चासनम् । तृषितस्य च पानीयं क्षुधितस्य च भोजनम् ॥

deyamārtasya śayanaṃ sthitaśrāntasya cāsanam | tṛṣitasya ca pānīyaṃ kṣudhitasya ca bhojanam

रोगी को शय्या, खड़े-खड़े थके हुए को आसन, प्यासे को जल और भूखे को भोजन देना चाहिए।

श्लोक 56 (3.2.56)

चक्षुर्दद्यान्मनो दद्याद्वाचं दद्याच्च सूनृताम् । उत्थाय चासनं दद्यादेष धर्मः सनातनः । प्रत्युत्थायाभिगमनं कुर्यान्न्यायेन चार्चनाम् ॥

cakṣurdadyānmano dadyādvācaṃ dadyācca sūnṛtām | utthāya cāsanaṃ dadyādeṣa dharmaḥ sanātanaḥ | pratyutthāyābhigamanaṃ kuryānnyāyena cārcanām

अतिथि को स्नेह-भरी दृष्टि, मन और मधुर वाणी देनी चाहिए; उठकर आसन देना चाहिए — यही सनातन धर्म है; और उठकर आगे बढ़कर उसका स्वागत करना और विधिपूर्वक सत्कार करना चाहिए।

श्लोक 57 (3.2.57)

अग्निहोत्रमनड्वांश्च ज्ञातयोऽतिथिबान्धवाः । पुत्रा दाराश्च भृत्याश्च निर्दहेयुरपूजिताः ॥

agnihotramanaḍvāṃśca jñātayo'tithibāndhavāḥ | putrā dārāśca bhṛtyāśca nirdaheyurapūjitāḥ

अग्निहोत्र की अग्नि, बैल, जाति-बन्धु, अतिथि, सम्बन्धी, पुत्र, पत्नी और सेवक — यदि इनका सत्कार न हो तो ये मनुष्य को जला डालते हैं।

श्लोक 58 (3.2.58)

आत्मार्थं पाचयेन्नान्नं न वृथा घातयेत्पशून् । न चैकः स्वयमश्नीयाद्विधिवर्जं न निर्वपेत् ॥

ātmārthaṃ pācayennānnaṃ na vṛthā ghātayetpaśūn | na caikaḥ svayamaśnīyādvidhivarjaṃ na nirvapet

केवल अपने लिए भोजन नहीं पकाना चाहिए, न व्यर्थ पशुओं को मारना चाहिए; न अकेले भोजन करना चाहिए, न विधि के बिना आहुति देनी चाहिए।

श्लोक 59 (3.2.59)

श्वभ्यश्च श्वपचेभ्यश्च वयोभ्यश्चावपेद्भुवि । वैश्वदेवं हि नामैतत्सायं प्रातश्च दीयते ॥

śvabhyaśca śvapacebhyaśca vayobhyaścāvapedbhuvi | vaiśvadevaṃ hi nāmaitatsāyaṃ prātaśca dīyate

कुत्तों, श्वपचों और पक्षियों के लिए भूमि पर अन्न बिखेरना चाहिए। इसे वैश्वदेव कहते हैं, जो सायं और प्रातः दिया जाता है।

श्लोक 60 (3.2.60)

विघसाशी भवेत्तस्मान्नित्यं चामृतभोजनः । विघसो भुक्तशेषं तु यज्ञशेषं तथाऽमृतम् ॥

vighasāśī bhavettasmānnityaṃ cāmṛtabhojanaḥ | vighaso bhuktaśeṣaṃ tu yajñaśeṣaṃ tathā'mṛtam

इसलिए मनुष्य को विघस खाने वाला और सदा अमृत का भोजन करने वाला होना चाहिए। दूसरों के खा लेने के बाद बचा हुआ अन्न विघस है, और यज्ञ के बाद बचा हुआ अन्न अमृत है।

श्लोक 61 (3.2.61)

चक्षुर्दद्यान्मनो दद्याद्वाचं दद्याच्च सूनृताम् । अनुव्रजेदुपासीत स यज्ञः पञ्चदक्षिणः ॥

cakṣurdadyānmano dadyādvācaṃ dadyācca sūnṛtām | anuvrajedupāsīta sa yajñaḥ pañcadakṣiṇaḥ

अतिथि को स्नेह-भरी दृष्टि, मन और मधुर वाणी देनी चाहिए; जाते समय उसके पीछे कुछ दूर जाना चाहिए और उसके पास बैठना चाहिए — यह पाँच दक्षिणाओं वाला यज्ञ है।

श्लोक 62 (3.2.62)

यो दद्यादपरिक्लिष्टमन्नमध्वनि वर्तते । श्रान्तायादृष्टपूर्वाय तस्य पुण्यफलं महत् ॥

yo dadyādaparikliṣṭamannamadhvani vartate | śrāntāyādṛṣṭapūrvāya tasya puṇyaphalaṃ mahat

जो मार्ग में चलते थके हुए, पहले कभी न देखे गए व्यक्ति को बिना खिन्न हुए अन्न देता है, उसे महान पुण्य-फल मिलता है।

श्लोक 63 (3.2.63)

एवं यो वर्तते वृत्तिं वर्तमानो गृहाश्रमे । तस्य धर्मं परं प्राहुः कथं वा विप्र मन्यसे ॥

evaṃ yo vartate vṛttiṃ vartamāno gṛhāśrame | tasya dharmaṃ paraṃ prāhuḥ kathaṃ vā vipra manyase

कहते हैं कि जो गृहस्थ-आश्रम में रहते हुए इस प्रकार आचरण करता है, उसका धर्म सबसे श्रेष्ठ है। हे विप्र, आप क्या मानते हैं?

शौनक उवाच

श्लोक 64 (3.2.64)

अहो बत महत्कष्टं विपरीतमिदं जगत् । येनापत्रपते साधुरसाधुस्तेन तुष्यति ॥

aho bata mahatkaṣṭaṃ viparītamidaṃ jagat | yenāpatrapate sādhurasādhustena tuṣyati

अहो, बड़े दुःख की बात है! यह संसार उलटा है — जिस बात से सज्जन लज्जित होता है, उसी से दुर्जन प्रसन्न होता है।

श्लोक 65 (3.2.65)

शिश्नोदरकृतेऽप्राज्ञः करोति विघसं बहु । मोहरागवशाक्रान्त इन्द्रियार्थवशानुगः ॥

śiśnodarakṛte'prājñaḥ karoti vighasaṃ bahu | moharāgavaśākrānta indriyārthavaśānugaḥ

काम-वासना और पेट के लिए मूर्ख मनुष्य "विघस" के नाम पर बहुत-सा अन्न तैयार करता है; वह मोह और राग के वश में होकर इन्द्रियों के विषयों के पीछे चलता है।

श्लोक 66 (3.2.66)

ह्रियते बुध्यमानोऽपि नरो हारिभिरिन्द्रियैः । विमूढसंज्ञो दुष्टाश्वैरुद्भ्रान्तैरिव सारथिः ॥

hriyate budhyamāno'pi naro hāribhirindriyaiḥ | vimūḍhasaṃjño duṣṭāśvairudbhrāntairiva sārathiḥ

समझदार मनुष्य को भी हर ले जाने वाली इन्द्रियाँ खींच ले जाती हैं और उसकी चेतना मूढ़ हो जाती है, जैसे बेकाबू दुष्ट घोड़े सारथी को खींच ले जाते हैं।

श्लोक 67 (3.2.67)

षडिन्द्रियाणि विषयं समागच्छन्ति वै यदा । तदा प्रादुर्भवत्येषां पूर्वसंकल्पजं मनः ॥

ṣaḍindriyāṇi viṣayaṃ samāgacchanti vai yadā | tadā prādurbhavatyeṣāṃ pūrvasaṃkalpajaṃ manaḥ

जब छहों इन्द्रियाँ अपने विषयों से मिलती हैं, तब उनमें पूर्व संकल्पों से उपजा मन प्रकट होता है।

श्लोक 68 (3.2.68)

मनो यस्येन्द्रियस्येह विषयान्याति सेवितुम् । तस्यौत्सुक्यं संभवति प्रवृत्तिश्चोपजायते ॥

mano yasyendriyasyeha viṣayānyāti sevitum | tasyautsukyaṃ saṃbhavati pravṛttiścopajāyate

जब मनुष्य का मन किसी इन्द्रिय के विषयों को भोगने के लिए उधर जाता है, तब उसमें उत्सुकता जागती है और फिर प्रवृत्ति उत्पन्न होती है।

श्लोक 69 (3.2.69)

ततः संकल्पवीर्येण कामेन विषयेषुभिः । विद्धः पतति लोभाग्नौ ज्योतिर्लोभात्पतङ्गवत् ॥

tataḥ saṃkalpavīryeṇa kāmena viṣayeṣubhiḥ | viddhaḥ patati lobhāgnau jyotirlobhātpataṅgavat

फिर संकल्प के बल से चलाए गए विषय-रूपी बाणों से काम द्वारा बिँधा हुआ वह लोभ की आग में गिर पड़ता है, जैसे पतंगा प्रकाश के लोभ से दीपक की लौ में गिरता है।

श्लोक 70 (3.2.70)

ततो दारैर्विहारैश्च मोहितश्च यथेप्सया । महामोहमुखे मग्नो नात्मानमवबुध्यते ॥

tato dārairvihāraiśca mohitaśca yathepsayā | mahāmohamukhe magno nātmānamavabudhyate

फिर मनचाहे स्त्री-सुख और विहारों से मोहित होकर, महामोह के मुख में डूबा हुआ वह अपने आप को नहीं पहचानता।

श्लोक 71 (3.2.71)

एवं पतति संसारे तासु तास्विह योनिषु । अविद्याकर्मतृष्णाभिर्भ्राम्यमाणोऽथ चक्रवत् ॥

evaṃ patati saṃsāre tāsu tāsviha yoniṣu | avidyākarmatṛṣṇābhirbhrāmyamāṇo'tha cakravat

इस प्रकार वह संसार में गिरता है और अविद्या, कर्म और तृष्णा के द्वारा चक्र की तरह घुमाया जाता हुआ यहाँ भिन्न-भिन्न योनियों में जन्म लेता है।

श्लोक 72 (3.2.72)

ब्रह्मादिषु तृणान्तेषु भूतेषु परिवर्तते । जले भुवि तथाऽऽकाशे जायमानः पुनःपुनः ॥

brahmādiṣu tṛṇānteṣu bhūteṣu parivartate | jale bhuvi tathā''kāśe jāyamānaḥ punaḥpunaḥ

वह ब्रह्मा से लेकर तृण तक के प्राणियों में घूमता रहता है, और जल, थल तथा आकाश में बार-बार जन्म लेता है।

श्लोक 73 (3.2.73)

अबुधानां गतिस्त्वेषा बुधानामपि मे शृणु । ये धर्मे श्रेयसि रता विमोक्षरतयो जनाः ॥

abudhānāṃ gatistveṣā budhānāmapi me śṛṇu | ye dharme śreyasi ratā vimokṣaratayo janāḥ

यह अज्ञानियों की गति है। अब मुझसे ज्ञानियों की गति भी सुनिए — उन लोगों की जो धर्म और कल्याण में लगे हैं और मोक्ष में रुचि रखते हैं।

श्लोक 74 (3.2.74)

तदिदं वेदवचनं कुरु कर्म त्यजेति च । तस्माद्धर्मानिमान्सर्वान्नाभिमानात्समाचरेत् ॥

tadidaṃ vedavacanaṃ kuru karma tyajeti ca | tasmāddharmānimānsarvānnābhimānātsamācaret

वेद का वचन है — "कर्म करो और उसका त्याग भी करो।" इसलिए इन सब धर्मों का पालन अभिमान के बिना करना चाहिए।

श्लोक 75 (3.2.75)

इज्याध्ययनदानानि तपः सत्यं क्षमा दमः । अलोभ इति मार्गोऽयं धर्मस्याष्टविधः स्मृतः ॥

ijyādhyayanadānāni tapaḥ satyaṃ kṣamā damaḥ | alobha iti mārgo'yaṃ dharmasyāṣṭavidhaḥ smṛtaḥ

यज्ञ, अध्ययन, दान, तप, सत्य, क्षमा, दम और अलोभ — यह धर्म का आठ प्रकार का मार्ग कहा गया है।

श्लोक 76 (3.2.76)

अत्र पूर्वश्चतुर्वर्गः पितृयाणपथे स्थितः । कर्तव्यमिति यत्कार्यं नाभिमानात्समाचरेत् ॥

atra pūrvaścaturvargaḥ pitṛyāṇapathe sthitaḥ | kartavyamiti yatkāryaṃ nābhimānātsamācaret

इनमें पहले चार पितृयान मार्ग पर स्थित हैं। जो कर्तव्य समझकर करना आवश्यक है, उसे अभिमान के बिना करना चाहिए।

श्लोक 77 (3.2.77)

उत्तरो देवयानस्तु सद्भिराचरितः सदा । अष्टाङ्गेनैव मार्गेण विशुद्धात्मा समाचरेत् ॥

uttaro devayānastu sadbhirācaritaḥ sadā | aṣṭāṅgenaiva mārgeṇa viśuddhātmā samācaret

बाद के चार देवयान मार्ग हैं, जिस पर सज्जन सदा चलते आए हैं। शुद्ध अन्तःकरण वाला मनुष्य आठ अंगों वाले मार्ग से उसका आचरण करे।

श्लोक 78 (3.2.78)

सम्यक्संकल्पसंबन्धात्सम्यक्चेन्द्रियनिग्रहात् । सम्यग्व्रतविशेषाच्च सम्यक्च गुरुसेवनात् ॥

samyaksaṃkalpasaṃbandhātsamyakcendriyanigrahāt | samyagvrataviśeṣācca samyakca gurusevanāt

संकल्प के सम्यक् संयम से, इन्द्रियों के सम्यक् निग्रह से, विशेष व्रतों के सम्यक् पालन से, गुरु की सम्यक् सेवा से,

श्लोक 79 (3.2.79)

सम्यगाहारयोगाच्च सम्यक्चाध्ययनागमात् । सम्यक्कर्मोपसंन्यासात्सम्यक्चित्तनिरोधनात् ॥

samyagāhārayogācca samyakcādhyayanāgamāt | samyakkarmopasaṃnyāsātsamyakcittanirodhanāt

आहार के सम्यक् नियम से, शास्त्रों के सम्यक् अध्ययन से, कर्मों के सम्यक् संन्यास से और चित्त के सम्यक् निरोध से —

श्लोक 80 (3.2.80)

एवं कर्माणि कुर्वन्ति संसारविजिगीषवः । रागद्वेषविनिर्मुक्ता ऐश्वर्यवशमागताः ॥

evaṃ karmāṇi kurvanti saṃsāravijigīṣavaḥ | rāgadveṣavinirmuktā aiśvaryavaśamāgatāḥ

इसी प्रकार संसार को जीतने की इच्छा वाले कर्म करते हैं; राग और द्वेष से मुक्त होकर वे ऐश्वर्य पर अधिकार पा लेते हैं।

श्लोक 81 (3.2.81)

रुद्राः साध्यास्तथाऽऽदित्या वसवोऽथ तथाश्विनौ । योगैश्वर्येण संयुक्ता धारयन्ति प्रजा इमाः ॥

rudrāḥ sādhyāstathā''dityā vasavo'tha tathāśvinau | yogaiśvaryeṇa saṃyuktā dhārayanti prajā imāḥ

रुद्र, साध्य, आदित्य, वसु और दोनों अश्विनीकुमार योग के ऐश्वर्य से युक्त होकर इन प्रजाओं का धारण करते हैं।

श्लोक 82 (3.2.82)

तथा त्वमपि कौन्तेय शममास्थाय पुष्कलम् । तपसा सिद्धिमन्विच्छ योगसिद्धिं च भारत ॥

tathā tvamapi kaunteya śamamāsthāya puṣkalam | tapasā siddhimanviccha yogasiddhiṃ ca bhārata

इसी प्रकार हे कुन्तीनन्दन, आप भी पूर्ण शान्ति का आश्रय लेकर तप के द्वारा सिद्धि और योग की सिद्धि प्राप्त करने का प्रयत्न कीजिए, हे भारत।

श्लोक 83 (3.2.83)

पितृमातृमयी सिद्धिः प्राप्ता कर्ममयी च ते । तपसा सिद्धिमन्विच्छ द्विजानां भरणाय वै ॥

pitṛmātṛmayī siddhiḥ prāptā karmamayī ca te | tapasā siddhimanviccha dvijānāṃ bharaṇāya vai

माता-पिता से मिलने वाली सिद्धि और कर्म से मिलने वाली सिद्धि आप पा चुके हैं। अब ब्राह्मणों के भरण-पोषण के लिए तप से सिद्धि पाने का प्रयत्न कीजिए।

श्लोक 84 (3.2.84)

सिद्धा हि यद्यदिच्छन्ति कुर्वते तदनुग्रहम् । तस्मात्तपः समास्थाय कुरुष्वात्ममनोरथम् ॥

siddhā hi yadyadicchanti kurvate tadanugraham | tasmāttapaḥ samāsthāya kuruṣvātmamanoratham

क्योंकि सिद्ध पुरुष जो-जो चाहते हैं, उस पर अनुग्रह कर देते हैं। इसलिए तप का आश्रय लेकर अपना मनोरथ पूरा कीजिए।

अध्याय 1अध्याय-सूचीअध्याय 3