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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 3

युधिष्ठिर की सूर्य-उपासना और अक्षय पात्र की प्राप्ति

वनवास में अपने पीछे आए ब्राह्मणों का भरण-पोषण न कर पाने के कारण युधिष्ठिर अपने पुरोहित धौम्य से उपाय पूछते हैं। धौम्य बताते हैं कि सूर्य ही अन्न के द्वारा सब प्राणियों का पालन करते हैं, और उन्हें सूर्य की शरण में जाने को कहते हैं। युधिष्ठिर जल में खड़े होकर एक लम्बी स्तुति से सूर्य की उपासना करते हैं; सूर्य प्रकट होकर उन्हें ताँबे का एक पात्र देते हैं, जिसका अन्न प्रतिदिन द्रौपदी के भोजन कर लेने तक समाप्त नहीं होता। फिर पाण्डव काम्यक वन की ओर प्रस्थान करते हैं। जनमेजय के पूछने पर वैशम्पायन सूर्य के एक सौ आठ नाम और उनके पाठ का फल सुनाते हैं।

अध्याय 2अध्याय-सूचीअध्याय 4

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (3.3.1)

शौनकेनैवमुक्तस्तु कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । प्रणम्य द्विजशार्दूलं पूज्यवाक्यं सुभाषितम् । पुरोहितमुपागम्य भ्रातृमध्येऽब्रवीदिदम् ॥

śaunakenaivamuktastu kuntīputro yudhiṣṭhiraḥ | praṇamya dvijaśārdūlaṃ pūjyavākyaṃ subhāṣitam | purohitamupāgamya bhrātṛmadhye'bravīdidam

शौनक के ऐसा कहने पर कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर ने सुन्दर और आदरणीय वचन बोलने वाले उन श्रेष्ठ ब्राह्मण को प्रणाम किया, फिर अपने पुरोहित के पास जाकर भाइयों के बीच यह कहा—

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 2 (3.3.2)

प्रस्थिताननुयातारो ब्राह्मणा वेदपारगाः । न चास्मि पोषणे शक्तो बहुदुःखसमन्वितः ॥

prasthitānanuyātāro brāhmaṇā vedapāragāḥ | na cāsmi poṣaṇe śakto bahuduḥkhasamanvitaḥ

"वेदों के पारंगत ये ब्राह्मण वन की ओर निकलते समय हमारे पीछे-पीछे चले आ रहे हैं, और अनेक दुःखों से घिरा मैं इनका भरण-पोषण करने में असमर्थ हूँ।

श्लोक 3 (3.3.3)

परित्यक्तुं न शक्नोमि दानशक्तिश्च नास्ति मे । कथमत्र मया कार्यं तद्ब्रूहि भगवन्मम ॥

parityaktuṃ na śaknomi dānaśaktiśca nāsti me | kathamatra mayā kāryaṃ tadbrūhi bhagavanmama

मैं इन्हें त्याग नहीं सकता, और मुझमें दान देने की सामर्थ्य भी नहीं है। ऐसी दशा में मुझे क्या करना चाहिए? भगवन्, यह मुझे बताइए।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 4 (3.3.4)

मुहूर्तमिव स ध्यात्वा धर्मेणान्वीक्ष्य तां गतिम् । युधिष्ठिरमुवाचेदं धौम्यो धर्मभृतां वरः ॥

muhūrtamiva sa dhyātvā dharmeṇānvīkṣya tāṃ gatim | yudhiṣṭhiramuvācedaṃ dhaumyo dharmabhṛtāṃ varaḥ

धर्मात्माओं में श्रेष्ठ धौम्य ने क्षण भर ध्यान किया और धर्म के बल से उस उपाय को खोजकर युधिष्ठिर से यह कहा—

धौम्य उवाच

श्लोक 5 (3.3.5)

पुरा सृष्टानि भूतानि पीड्यन्ते क्षुधया भृशम् । ततोऽनुकम्पया तेषां सविता स्वपिता यथा ॥

purā sṛṣṭāni bhūtāni pīḍyante kṣudhayā bhṛśam | tato'nukampayā teṣāṃ savitā svapitā yathā

"प्राचीन काल में, सृष्टि के आरम्भ में, प्राणी भूख से अत्यन्त पीड़ित थे। तब उन पर दया करके सविता (सूर्य) ने उनके प्रति पिता के समान आचरण किया।

श्लोक 6 (3.3.6)

गत्वोत्तरायणं तेजो रसानुद्धृत्य रश्मिभिः । दक्षिणायनमावृत्तो महीं वर्षति वारिणा ॥

gatvottarāyaṇaṃ tejo rasānuddhṛtya raśmibhiḥ | dakṣiṇāyanamāvṛtto mahīṃ varṣati vāriṇā

उत्तरायण में जाकर सूर्य अपनी तेजस्वी किरणों से रसों (जल) को ऊपर खींच लेते हैं, और दक्षिणायन में लौटकर उसी जल से पृथ्वी पर वर्षा करते हैं।

श्लोक 7 (3.3.7)

क्षेत्रभूते ततस्तस्मिन्नोषधीरोषधीपतिः । रवेस्तेजः समुद्धृत्य जनयामास वारिणा ॥

kṣetrabhūte tatastasminnoṣadhīroṣadhīpatiḥ | ravestejaḥ samuddhṛtya janayāmāsa vāriṇā

जब पृथ्वी इस प्रकार खेत बन जाती है, तब ओषधियों के स्वामी चन्द्रमा सूर्य के तेज को ग्रहण करके जल के द्वारा ओषधियों को उत्पन्न करते हैं।

श्लोक 8 (3.3.8)

निषिक्तश्चन्द्रतेजोभिः सूयते जगतो रविः । ओषध्यः षड्रसा मेध्यास्तदन्नं प्राणिनां भुवि ॥

niṣiktaścandratejobhiḥ sūyate jagato raviḥ | oṣadhyaḥ ṣaḍrasā medhyāstadannaṃ prāṇināṃ bhuvi

चन्द्रमा के तेज से सिंचित होकर सूर्य जगत् के लिए छह रसों वाली पवित्र ओषधियाँ उत्पन्न करते हैं; वही पृथ्वी पर प्राणियों का अन्न है।

श्लोक 9 (3.3.9)

एवं भानुमयं ह्यन्नं भूतानां प्राणधारणम् । नाथोऽयं सर्वभूतानां तस्मात्तं शरणं व्रज ॥

evaṃ bhānumayaṃ hyannaṃ bhūtānāṃ prāṇadhāraṇam | nātho'yaṃ sarvabhūtānāṃ tasmāttaṃ śaraṇaṃ vraja

इस प्रकार प्राणियों के प्राणों को धारण करने वाला अन्न सूर्यमय ही है। वे ही समस्त प्राणियों के स्वामी हैं; इसलिए तुम उन्हीं की शरण में जाओ।

श्लोक 10 (3.3.10)

राजानो हि महात्मानो योनिकर्मविशोधिताः । उद्धरन्ति प्रजाः सर्वास्तप आस्थाय पुष्कलम् ॥

rājāno hi mahātmāno yonikarmaviśodhitāḥ | uddharanti prajāḥ sarvāstapa āsthāya puṣkalam

जन्म और कर्म से शुद्ध हुए महात्मा राजा प्रचुर तपस्या करके अपनी समस्त प्रजा का उद्धार करते हैं।

श्लोक 11 (3.3.11)

भीमेन कार्तवीर्येण वैन्येन नहुषेण च । तपोयोगसमाधिस्थैरुद्धृता ह्यापदः प्रजाः ॥

bhīmena kārtavīryeṇa vainyena nahuṣeṇa ca | tapoyogasamādhisthairuddhṛtā hyāpadaḥ prajāḥ

भीम, कार्तवीर्य, वैन्य (पृथु) और नहुष ने तप, योग और समाधि में स्थित रहकर अपनी प्रजा को आपत्तियों से उबारा था।

श्लोक 12 (3.3.12)

तथा त्वमपि धर्मात्मन्कर्मणा च विशोधितः । तप आस्थाय धर्मेण द्विजातीन्भर भारत ॥

tathā tvamapi dharmātmankarmaṇā ca viśodhitaḥ | tapa āsthāya dharmeṇa dvijātīnbhara bhārata

इसी प्रकार, हे धर्मात्मा भारत, कर्म से शुद्ध हुए तुम भी धर्मपूर्वक तप करके द्विजों का भरण-पोषण करो।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 13 (3.3.13)

एवमुक्तस्तु धौम्येन तत्कालसदृशं वचः । ततस्त्वध्यापयामास मन्त्रं सर्वार्थसाधकम् । अष्टाक्षरं परं मन्त्रमार्तस्य सततं प्रियम् ॥

evamuktastu dhaumyena tatkālasadṛśaṃ vacaḥ | tatastvadhyāpayāmāsa mantraṃ sarvārthasādhakam | aṣṭākṣaraṃ paraṃ mantramārtasya satataṃ priyam

समय के अनुरूप ये वचन कहकर धौम्य ने फिर युधिष्ठिर को सब प्रयोजन सिद्ध करने वाला मन्त्र सिखाया — वह परम अष्टाक्षर मन्त्र, जो दुःखी जनों को सदा प्रिय है।

श्लोक 14 (3.3.14)

विप्रत्यागसमाधिस्थः संयतात्मा दृढव्रतः । धर्मराजो विशुद्धात्मा तप आतिष्ठदुत्तमम् ॥

vipratyāgasamādhisthaḥ saṃyatātmā dṛḍhavrataḥ | dharmarājo viśuddhātmā tapa ātiṣṭhaduttamam

ब्राह्मणों को अन्नदान करने के संकल्प में स्थित, संयमी और दृढ़व्रती, शुद्धात्मा धर्मराज ने उत्तम तप आरम्भ किया।

श्लोक 15 (3.3.15)

पुष्पोपहारैर्बलिभिरर्चयित्वा दिवाकरम् । सोऽवगाह्य जलं राजा देवस्याभिमुखोऽभवत् ॥

puṣpopahārairbalibhirarcayitvā divākaram | so'vagāhya jalaṃ rājā devasyābhimukho'bhavat

पुष्पों के उपहार और बलि से दिवाकर (सूर्य) की पूजा करके राजा जल में उतरे और देवता के सम्मुख खड़े हो गए।

श्लोक 16 (3.3.16)

गाङ्गेयं वार्युपस्पृश्य प्राणायामेन तस्थिवान् । शुचिः प्रयतवाग्भूत्वा स्तोत्रमारब्धवांस्ततः ॥

gāṅgeyaṃ vāryupaspṛśya prāṇāyāmena tasthivān | śuciḥ prayatavāgbhūtvā stotramārabdhavāṃstataḥ

गंगाजल का आचमन करके वे प्राणायाम करते हुए स्थिर खड़े रहे; फिर पवित्र होकर और वाणी को संयत करके उन्होंने स्तुति आरम्भ की।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 17 (3.3.17)

त्वं भानो जगतश्चक्षुस्त्वमात्मा सर्वदेहिनाम् । त्वं योनिः सर्वभूतानां त्वमाचारः क्रियावतां ॥

tvaṃ bhāno jagataścakṣustvamātmā sarvadehinām | tvaṃ yoniḥ sarvabhūtānāṃ tvamācāraḥ kriyāvatāṃ

"हे भानु! आप जगत् के नेत्र हैं और समस्त देहधारियों की आत्मा हैं; आप सब प्राणियों के उद्गम हैं और कर्मनिष्ठ पुरुषों के आचार हैं।

श्लोक 18 (3.3.18)

त्वं गतिः सर्वसाङ्ख्यानां योगिनां त्वं परायणम् । अनावृतार्गलद्वारं त्वं गतिस्त्वं मुमुक्षताम् ॥

tvaṃ gatiḥ sarvasāṅkhyānāṃ yogināṃ tvaṃ parāyaṇam | anāvṛtārgaladvāraṃ tvaṃ gatistvaṃ mumukṣatām

आप सांख्य-ज्ञानियों की गति और योगियों के परम आश्रय हैं; आप बिना किवाड़ और अर्गला वाले (मुक्ति के) खुले द्वार हैं, और मोक्ष चाहने वालों की गति हैं।

श्लोक 19 (3.3.19)

त्वया संधार्यते लोकस्त्वया लोकः प्रकाश्यते । त्वयापवित्रीक्रियते निर्व्याजं पाल्यते त्वया ॥

tvayā saṃdhāryate lokastvayā lokaḥ prakāśyate | tvayāpavitrīkriyate nirvyājaṃ pālyate tvayā

आप ही लोक को धारण करते हैं, आप ही उसे प्रकाशित करते हैं; आप ही उसे पवित्र करते हैं और आप ही निष्कपट भाव से उसकी रक्षा करते हैं।

श्लोक 20 (3.3.20)

त्वामुपस्थाय काले तु ब्राह्मणा वेदपारगाः । स्वशाखाविहितैर्मन्त्रैरर्चन्त्यृषिगणार्चित ॥

tvāmupasthāya kāle tu brāhmaṇā vedapāragāḥ | svaśākhāvihitairmantrairarcantyṛṣigaṇārcita

हे ऋषिगणों द्वारा पूजित! वेदों के पारंगत ब्राह्मण उचित समय पर आपकी उपासना करते हैं और अपनी-अपनी वैदिक शाखा में विहित मन्त्रों से आपकी अर्चना करते हैं।

श्लोक 21 (3.3.21)

तव दिव्यं रथं यान्तमनुयान्ति वरार्थिनः । सिद्धचारणगन्धर्वा यक्षगुह्यकपन्नगाः ॥

tava divyaṃ rathaṃ yāntamanuyānti varārthinaḥ | siddhacāraṇagandharvā yakṣaguhyakapannagāḥ

जब आपका दिव्य रथ चलता है, तब वर चाहने वाले सिद्ध, चारण, गन्धर्व, यक्ष, गुह्यक और नाग उसके पीछे-पीछे चलते हैं।

श्लोक 22 (3.3.22)

त्रयस्त्रिंशच्च वै देवास्तथा वैमानिका गणाः । सोपेन्द्राः समहेन्द्राश्च त्वामिष्ट्वासिद्धिमागताः ॥

trayastriṃśacca vai devāstathā vaimānikā gaṇāḥ | sopendrāḥ samahendrāśca tvāmiṣṭvāsiddhimāgatāḥ

तैंतीस देवता तथा विमानों में विचरने वाले गण, उपेन्द्र और महेन्द्र सहित, आपकी आराधना करके ही सिद्धि को प्राप्त हुए हैं।

श्लोक 23 (3.3.23)

उपयान्त्यर्चयित्वा तु त्वां वै प्राप्तमनोरथाः । दिव्यमन्दारमालाभिस्तूर्णं विद्याधरोत्तमाः ॥

upayāntyarcayitvā tu tvāṃ vai prāptamanorathāḥ | divyamandāramālābhistūrṇaṃ vidyādharottamāḥ

श्रेष्ठ विद्याधर आपके पास आकर दिव्य मन्दार-पुष्पों की मालाओं से आपकी पूजा करते हैं और शीघ्र ही अपने मनोरथ प्राप्त कर लेते हैं।

श्लोक 24 (3.3.24)

गुह्याः पितृगणाः सप्त ये दिव्या ये च मानुषाः । ते पूजयित्वा त्वामेव गच्छन्त्याशु प्रधानताम् ॥

guhyāḥ pitṛgaṇāḥ sapta ye divyā ye ca mānuṣāḥ | te pūjayitvā tvāmeva gacchantyāśu pradhānatām

पितरों के सात गुह्य गण, जो दिव्य हैं और जो मानव हैं, वे सब आपकी ही पूजा करके शीघ्र प्रधानता प्राप्त करते हैं।

श्लोक 25 (3.3.25)

वसवो मरुतो रुद्रा ये च साध्या मरीचिपाः । वालखिल्यादयः सिद्धाः श्रेष्ठत्वं प्राणिनां गताः ॥

vasavo maruto rudrā ye ca sādhyā marīcipāḥ | vālakhilyādayaḥ siddhāḥ śreṣṭhatvaṃ prāṇināṃ gatāḥ

वसु, मरुद्गण, रुद्र, साध्य, मरीचिप तथा वालखिल्य आदि सिद्ध आपके ही द्वारा प्राणियों में श्रेष्ठता को प्राप्त हुए हैं।

श्लोक 26 (3.3.26)

सब्रह्मकेषु लोकेषु सप्तस्वप्यखिलेषु च । न तद्भूतमहं मन्ये यदर्कादतिरिच्यते ॥

sabrahmakeṣu lokeṣu saptasvapyakhileṣu ca | na tadbhūtamahaṃ manye yadarkādatiricyate

ब्रह्मलोक सहित सातों लोकों में मैं ऐसा कोई प्राणी नहीं मानता जो सूर्य से बढ़कर हो।

श्लोक 27 (3.3.27)

सन्ति चान्यानि सत्वानि वीर्यवन्ति महान्ति च । न तु तेषां तथा दीप्तिः प्रभावो वा यथा तव ॥

santi cānyāni satvāni vīryavanti mahānti ca | na tu teṣāṃ tathā dīptiḥ prabhāvo vā yathā tava

अन्य भी बलवान और महान प्राणी हैं, किन्तु उनमें न आपके जैसी दीप्ति है, न आपके जैसा प्रभाव।

श्लोक 28 (3.3.28)

ज्योतींषि त्वयि सर्वाणि त्वं सर्वज्योतिषां पतिः । त्वयि सत्यं च सत्त्वं च सर्वे भावाश्च सात्त्विकाः ॥

jyotīṃṣi tvayi sarvāṇi tvaṃ sarvajyotiṣāṃ patiḥ | tvayi satyaṃ ca sattvaṃ ca sarve bhāvāśca sāttvikāḥ

सारी ज्योतियाँ आपमें स्थित हैं; आप समस्त ज्योतियों के स्वामी हैं। सत्य, सत्त्व और सभी सात्त्विक भाव आपमें ही हैं।

श्लोक 29 (3.3.29)

त्वत्तेजसा कृतं चक्रं सुनाभं विश्वकर्मणा । देवारीणां मदो येन नाशितः शार्ङ्गधन्वना ॥

tvattejasā kṛtaṃ cakraṃ sunābhaṃ viśvakarmaṇā | devārīṇāṃ mado yena nāśitaḥ śārṅgadhanvanā

आपके ही तेज से विश्वकर्मा ने सुन्दर नाभि वाला चक्र (सुदर्शन) बनाया, जिससे शार्ङ्गधनुषधारी (विष्णु) ने देवशत्रुओं का मद चूर किया।

श्लोक 30 (3.3.30)

त्वमादायांशुभिस्तेजो निदाघे सर्वदेहिनाम् । सर्वौषधिरसानां च पुनर्वर्षासु मुञ्चसि ॥

tvamādāyāṃśubhistejo nidāghe sarvadehinām | sarvauṣadhirasānāṃ ca punarvarṣāsu muñcasi

ग्रीष्म ऋतु में आप अपनी किरणों से समस्त देहधारियों का तेज और सब ओषधियों का रस खींच लेते हैं, और वर्षा ऋतु में उसे फिर छोड़ देते हैं।

श्लोक 31 (3.3.31)

तपन्त्यन्ये दहन्त्यन्ये गर्जन्त्यन्ये तथा घनाः । विद्योतन्ते प्रवर्षन्ति तव प्रावृषि रश्मयः ॥

tapantyanye dahantyanye garjantyanye tathā ghanāḥ | vidyotante pravarṣanti tava prāvṛṣi raśmayaḥ

वर्षा ऋतु में आपकी कुछ किरणें तपाती हैं, कुछ जलाती हैं, और कुछ मेघ बनकर गरजती हैं, बिजली बनकर चमकती हैं और बरसती हैं।

श्लोक 32 (3.3.32)

न तथा सुखयत्यग्निर्न प्रावारा न कम्बलाः । शीतवातार्दितं लोकं यथा तव मरीचयः ॥

na tathā sukhayatyagnirna prāvārā na kambalāḥ | śītavātārditaṃ lokaṃ yathā tava marīcayaḥ

शीतल वायु से पीड़ित संसार को न अग्नि, न ओढ़ने के वस्त्र, न कम्बल उतना सुख देते हैं जितना आपकी किरणें।

श्लोक 33 (3.3.33)

त्रयोदशद्वीपवतीं गोभिर्भासयसे महीम् । त्रयाणामपि लोकानां हितायैकः प्रवर्तसे ॥

trayodaśadvīpavatīṃ gobhirbhāsayase mahīm | trayāṇāmapi lokānāṃ hitāyaikaḥ pravartase

आप अपनी किरणों से तेरह द्वीपों वाली पृथ्वी को प्रकाशित करते हैं; तीनों लोकों के हित के लिए आप अकेले ही प्रवृत्त रहते हैं।

श्लोक 34 (3.3.34)

तव यद्युदयो न स्यादन्धं जगदिदं भवेत् । न च धर्मार्थकामेषु प्रवर्तेरन्मनीषिणः ॥

tava yadyudayo na syādandhaṃ jagadidaṃ bhavet | na ca dharmārthakāmeṣu pravarteranmanīṣiṇaḥ

यदि आपका उदय न हो तो यह सारा जगत् अन्धा हो जाए, और मनीषी धर्म, अर्थ और काम में प्रवृत्त ही न हों।

श्लोक 35 (3.3.35)

आधानपशुबन्धेष्टिमन्त्रयज्ञतपःक्रियाः । त्वत्प्रसादादवाप्यन्ते ब्रह्मक्षत्रविशां गणैः ॥

ādhānapaśubandheṣṭimantrayajñatapaḥkriyāḥ | tvatprasādādavāpyante brahmakṣatraviśāṃ gaṇaiḥ

अग्न्याधान, पशुबन्ध, इष्टि, मन्त्र, यज्ञ और तप — ये सब क्रियाएँ ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य आपकी कृपा से ही सम्पन्न कर पाते हैं।

श्लोक 36 (3.3.36)

यदहर्ब्रह्मणः प्रोक्तं सहस्रयुगसंमितम् । तस्य त्वमादिरन्तश्च कालज्ञैः परिकीर्तितः ॥

yadaharbrahmaṇaḥ proktaṃ sahasrayugasaṃmitam | tasya tvamādirantaśca kālajñaiḥ parikīrtitaḥ

काल के ज्ञाता कहते हैं कि सहस्र युगों के बराबर जो ब्रह्मा का एक दिन कहा गया है, उसका आदि और अन्त आप ही हैं।

श्लोक 37 (3.3.37)

मनूनां मनुपुत्राणां जगतोऽमानवस्य च । मन्वन्तराणां सर्वेषामीश्वराणां त्वमीश्वरः ॥

manūnāṃ manuputrāṇāṃ jagato'mānavasya ca | manvantarāṇāṃ sarveṣāmīśvarāṇāṃ tvamīśvaraḥ

मनुओं, मनुपुत्रों, जगत् तथा मानवेतर सृष्टि के, सभी मन्वन्तरों के और समस्त ईश्वरों के भी ईश्वर आप ही हैं।

श्लोक 38 (3.3.38)

संहारकाले संप्राप्ते तव क्रोधविनिःसृतः । संवर्तकाग्निस्त्रैलोक्यं भस्मीकृत्यावतिष्ठते ॥

saṃhārakāle saṃprāpte tava krodhaviniḥsṛtaḥ | saṃvartakāgnistrailokyaṃ bhasmīkṛtyāvatiṣṭhate

प्रलय का समय आने पर आपके क्रोध से निकली संवर्तक अग्नि त्रिलोकी को भस्म करके स्थित रहती है।

श्लोक 39 (3.3.39)

त्वद्दीधितिसमुत्पन्ना नानावर्णा महाघनाः । सैरावताः साशनयः कुर्वन्त्याभूतसंप्लवम् ॥

tvaddīdhitisamutpannā nānāvarṇā mahāghanāḥ | sairāvatāḥ sāśanayaḥ kurvantyābhūtasaṃplavam

आपकी किरणों से उत्पन्न अनेक रंगों वाले महामेघ, ऐरावत और वज्र सहित, समस्त प्राणियों को डुबो देने वाला जलप्लावन ले आते हैं।

श्लोक 40 (3.3.40)

कृत्वा द्वादशधाऽऽत्मानं द्वादशादित्यतां गतः । संहृत्यैकार्णवं सर्वं त्वं शोषयसि रश्मिभिः ॥

kṛtvā dvādaśadhā''tmānaṃ dvādaśādityatāṃ gataḥ | saṃhṛtyaikārṇavaṃ sarvaṃ tvaṃ śoṣayasi raśmibhiḥ

आप अपने को बारह भागों में बाँटकर बारह आदित्य बन जाते हैं, और उस एकार्णव (प्रलय-समुद्र) को समेटकर अपनी किरणों से सुखा देते हैं।

श्लोक 41 (3.3.41)

त्वामिन्द्रमाहुस्त्वं रुद्रस्त्वं विष्णुस्त्वं प्रजापतिः । त्वमग्निस्त्वं मनः सूक्ष्मं प्रभुस्त्वं ब्रह्मशाश्वतं ॥

tvāmindramāhustvaṃ rudrastvaṃ viṣṇustvaṃ prajāpatiḥ | tvamagnistvaṃ manaḥ sūkṣmaṃ prabhustvaṃ brahmaśāśvataṃ

आपको ही इन्द्र कहते हैं; आप रुद्र हैं, आप विष्णु हैं, आप प्रजापति हैं; आप अग्नि हैं, आप सूक्ष्म मन हैं, आप प्रभु हैं, आप सनातन ब्रह्म हैं।

श्लोक 42 (3.3.42)

त्वं हंसः सविता भानुरंशुमाली वृषाकपिः । विवस्वान्मिहिरः पूषा मित्रो धर्मस्तथैव च ॥

tvaṃ haṃsaḥ savitā bhānuraṃśumālī vṛṣākapiḥ | vivasvānmihiraḥ pūṣā mitro dharmastathaiva ca

आप हंस, सविता, भानु, अंशुमाली, वृषाकपि, विवस्वान्, मिहिर, पूषा, मित्र और धर्म हैं।

श्लोक 43 (3.3.43)

सहस्ररश्मिरादित्यस्तपनस्त्वं गवां पतिः । मार्तण्डोऽर्को रविः सूर्यः शरण्यो दिनकृत्तथा ॥

sahasraraśmirādityastapanastvaṃ gavāṃ patiḥ | mārtaṇḍo'rko raviḥ sūryaḥ śaraṇyo dinakṛttathā

आप सहस्ररश्मि, आदित्य, तपन, किरणों के स्वामी (गवांपति), मार्तण्ड, अर्क, रवि, सूर्य, शरण्य और दिनकृत् हैं।

श्लोक 44 (3.3.44)

दिवाकरः सप्तसप्तिर्धामकेशी विरोचनः । आशुगामी तमोघ्नश्च हरिताश्वश्च कीर्त्यसे ॥

divākaraḥ saptasaptirdhāmakeśī virocanaḥ | āśugāmī tamoghnaśca haritāśvaśca kīrtyase

आप दिवाकर, सप्तसप्ति, धामकेशी, विरोचन, आशुगामी, तमोघ्न और हरिताश्व नामों से कीर्तित होते हैं।

श्लोक 45 (3.3.45)

सप्तम्यामथवा षष्ठ्यां भक्त्या पूजां करोति यः । अनिर्विण्णोऽनहंकारी तं लक्ष्मीर्भजते नरम् ॥

saptamyāmathavā ṣaṣṭhyāṃ bhaktyā pūjāṃ karoti yaḥ | anirviṇṇo'nahaṃkārī taṃ lakṣmīrbhajate naram

जो मनुष्य सप्तमी या षष्ठी तिथि को बिना थके और अहंकार से रहित होकर भक्तिपूर्वक आपकी पूजा करता है, लक्ष्मी उसका वरण करती हैं।

श्लोक 46 (3.3.46)

न तेषामापदः सन्ति नाधयो व्याधयस्तथा । ये तवानन्यमनसा कुर्वन्त्यर्चनवन्दनम् ॥

na teṣāmāpadaḥ santi nādhayo vyādhayastathā | ye tavānanyamanasā kurvantyarcanavandanam

जो अनन्य मन से आपकी अर्चना और वन्दना करते हैं, उन पर न आपत्तियाँ आती हैं, न मानसिक व्यथाएँ, न रोग।

श्लोक 47 (3.3.47)

सर्वरोगैर्विरहिताः सर्वपापविवर्जिताः । त्वद्भावभक्ताः सुखिनो भवन्ति चिरजीविनः ॥

sarvarogairvirahitāḥ sarvapāpavivarjitāḥ | tvadbhāvabhaktāḥ sukhino bhavanti cirajīvinaḥ

आपकी भावना में अनुरक्त वे भक्त सब रोगों से रहित और सब पापों से मुक्त होकर सुखी और दीर्घायु होते हैं।

श्लोक 48 (3.3.48)

त्वं ममापन्नकामस्य सर्वातिथ्यं चिकीर्षतः । अन्नमन्नपते दातुमभितः श्रद्धयाऽर्हसि ॥

tvaṃ mamāpannakāmasya sarvātithyaṃ cikīrṣataḥ | annamannapate dātumabhitaḥ śraddhayā'rhasi

हे अन्नपते! मैं संकट में हूँ और श्रद्धापूर्वक सबका आतिथ्य करना चाहता हूँ; आप मुझे भरपूर अन्न देने की कृपा करें।

श्लोक 49 (3.3.49)

ये च तेऽनुचराः सर्वे पादोपान्तं समाश्रिताः । माठरारुणदण्डाद्यास्तांस्तान्वन्देऽशनिक्षुभान् ॥

ye ca te'nucarāḥ sarve pādopāntaṃ samāśritāḥ | māṭharāruṇadaṇḍādyāstāṃstānvande'śanikṣubhān

और आपके चरणों के समीप रहने वाले जो सब अनुचर हैं — माठर, अरुण, दण्ड आदि, जो वज्र और विद्युत् को प्रेरित करते हैं — उन सबको मैं प्रणाम करता हूँ।

श्लोक 50 (3.3.50)

क्षुभया सहिता मैत्री याश्चान्या भूतमातरः । ताश्च सर्वा नमस्यामि पान्तु मां शरणागतम् ॥

kṣubhayā sahitā maitrī yāścānyā bhūtamātaraḥ | tāśca sarvā namasyāmi pāntu māṃ śaraṇāgatam

क्षुभा के साथ मैत्री तथा अन्य जो भूतमाताएँ हैं, उन सबको मैं नमस्कार करता हूँ; वे मुझ शरणागत की रक्षा करें।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 51 (3.3.51)

कण्ठदघ्ने जले स्थित्वा मन्त्रैः स्तोत्रैश्च तोषितः । ततो दिवाकरः प्रीतो दर्शयामास पाण्डवम् । दीप्यमानः स्ववपुषा ज्वलन्निव हुताशनः ॥

kaṇṭhadaghne jale sthitvā mantraiḥ stotraiśca toṣitaḥ | tato divākaraḥ prīto darśayāmāsa pāṇḍavam | dīpyamānaḥ svavapuṣā jvalanniva hutāśanaḥ

गले तक जल में खड़े होकर युधिष्ठिर ने मन्त्रों और स्तुतियों से सूर्य को सन्तुष्ट किया। तब प्रसन्न हुए दिवाकर अपने तेजस्वी रूप में प्रज्वलित अग्नि की भाँति दीप्त होते हुए पाण्डुपुत्र के सामने प्रकट हुए।

विवस्वानुवाच

श्लोक 52 (3.3.52)

यत्तेऽभिलषितं किंचित्तत्त्वं सर्वमवाप्स्यसि । अहमन्नं प्रदास्यामि सप्त पञ्च च ते समाः ॥

yatte'bhilaṣitaṃ kiṃcittattvaṃ sarvamavāpsyasi | ahamannaṃ pradāsyāmi sapta pañca ca te samāḥ

"तुम जो कुछ चाहते हो, वह सब तुम्हें प्राप्त होगा। मैं सात और पाँच, अर्थात् बारह वर्षों तक तुम्हें अन्न दूँगा।

श्लोक 53 (3.3.53)

गृह्णीष्व पिठरं ताम्रं मया दत्तं नराधिप । यावद्वर्त्स्यति पाञ्चाली पात्रेणानेन सुव्रत ॥

gṛhṇīṣva piṭharaṃ tāmraṃ mayā dattaṃ narādhipa | yāvadvartsyati pāñcālī pātreṇānena suvrata

हे नरेश्वर, मेरे दिए हुए इस ताँबे के पात्र को ग्रहण करो। हे सुव्रत, जब तक पांचाली इस पात्र से (लोगों का) भरण-पोषण करती रहेगी,

श्लोक 54 (3.3.54)

फलमूलामिषं शाकं संस्कृतं यन्महानसे । चतुर्विधं तदन्नाद्यमक्षय्यं ते भविष्यति । इतश्चतुर्दशे वर्षे भूयो राज्यमवाप्स्यसि ॥

phalamūlāmiṣaṃ śākaṃ saṃskṛtaṃ yanmahānase | caturvidhaṃ tadannādyamakṣayyaṃ te bhaviṣyati | itaścaturdaśe varṣe bhūyo rājyamavāpsyasi

तब तक तुम्हारी पाकशाला में पकाए गए फल, मूल, मांस और शाक — यह चार प्रकार का भोजन — अक्षय रहेगा। और आज से चौदहवें वर्ष में तुम फिर से राज्य प्राप्त करोगे।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 55 (3.3.55)

एवमुक्त्वा तु भगवांस्तत्रैवान्तरधीयत ॥

evamuktvā tu bhagavāṃstatraivāntaradhīyata

ऐसा कहकर भगवान् सूर्य वहीं अन्तर्धान हो गए।

श्लोक 56 (3.3.56)

लब्ध्वा वरं तु कौन्तेयो जलादुत्तीर्य धर्मवित् । जग्राह पादौ धौम्यस्य भ्रातॄंश्च परिषस्वजे ॥

labdhvā varaṃ tu kaunteyo jalāduttīrya dharmavit | jagrāha pādau dhaumyasya bhrātṝṃśca pariṣasvaje

वर पाकर धर्मज्ञ कुन्तीपुत्र जल से बाहर निकले, धौम्य के चरण पकड़े और अपने भाइयों को गले लगाया।

श्लोक 57 (3.3.57)

द्रौपद्या सह संगम्य पश्यमानोऽपयात्प्रभुः । महानसे तदान्नं तु साधयामास पाण्डवः ॥

draupadyā saha saṃgamya paśyamāno'payātprabhuḥ | mahānase tadānnaṃ tu sādhayāmāsa pāṇḍavaḥ

द्रौपदी से मिलकर प्रभु युधिष्ठिर देखते हुए उसके साथ गए, और उस पाण्डुपुत्र ने तब पाकशाला में अन्न तैयार करवाया।

श्लोक 58 (3.3.58)

संस्कृतं प्रसवं याति स्वल्पमन्नं चतुर्विधम् । अक्षय्यं वर्धते चान्नं तेनाभोजयत द्विजान् ॥

saṃskṛtaṃ prasavaṃ yāti svalpamannaṃ caturvidham | akṣayyaṃ vardhate cānnaṃ tenābhojayata dvijān

पकाया गया थोड़ा-सा चार प्रकार का अन्न भी बढ़ने लगा; वह अक्षय होकर बढ़ता रहा, और उससे उन्होंने ब्राह्मणों को भोजन कराया।

श्लोक 59 (3.3.59)

भुक्तवत्सु च विप्रेषु भोजयित्वाऽनुजानपि । शेषं विघससंज्ञं तु पश्चाद्भुङ्क्ते युधिष्ठिरः ॥

bhuktavatsu ca vipreṣu bhojayitvā'nujānapi | śeṣaṃ vighasasaṃjñaṃ tu paścādbhuṅkte yudhiṣṭhiraḥ

ब्राह्मणों के भोजन कर लेने पर और छोटे भाइयों को भी भोजन कराकर युधिष्ठिर अन्त में 'विघस' कहलाने वाला शेष अन्न खाते थे।

श्लोक 60 (3.3.60)

युधिष्ठिरं भोजयित्वा शेषमश्नाति पार्षती । द्रौपद्यां भुज्यमानायां तदन्नं क्षयमेति च ॥

yudhiṣṭhiraṃ bhojayitvā śeṣamaśnāti pārṣatī | draupadyāṃ bhujyamānāyāṃ tadannaṃ kṣayameti ca

युधिष्ठिर को भोजन कराकर पार्षती (द्रौपदी) शेष अन्न खाती थीं; और द्रौपदी के भोजन कर लेने पर वह अन्न समाप्त हो जाता था।

श्लोक 61 (3.3.61)

एवं दिवाकरात्प्राप्य दिवाकरसमप्रभः । कामान्मनोभिलषितान्ब्राह्मणेभ्योऽददात्प्रभुः ॥

evaṃ divākarātprāpya divākarasamaprabhaḥ | kāmānmanobhilaṣitānbrāhmaṇebhyo'dadātprabhuḥ

इस प्रकार सूर्य से मनचाही वस्तुएँ पाकर सूर्य के समान तेजस्वी प्रभु युधिष्ठिर उन्हें ब्राह्मणों को दान करते थे।

श्लोक 62 (3.3.62)

पुरोहितपुरोगाश्च तिथिनक्षत्रपर्वसु । इज्यार्थे संप्रवर्तन्ते विधिमन्त्रप्रमाणतः ॥

purohitapurogāśca tithinakṣatraparvasu | ijyārthe saṃpravartante vidhimantrapramāṇataḥ

पुरोहित को आगे रखकर वे तिथि, नक्षत्र और पर्वों पर विधि और मन्त्रों के प्रमाण के अनुसार यज्ञ-कर्म करते थे।

श्लोक 63 (3.3.63)

ततः कृतस्वस्त्ययना धौम्येन सह पाण्डवाः । द्विजसङ्घैः परिवृताः प्रययुः काम्यकं वनम् ॥

tataḥ kṛtasvastyayanā dhaumyena saha pāṇḍavāḥ | dvijasaṅghaiḥ parivṛtāḥ prayayuḥ kāmyakaṃ vanam

तत्पश्चात् स्वस्तिवाचन करवाकर पाण्डव धौम्य के साथ, ब्राह्मणों के समूहों से घिरे हुए, काम्यक वन की ओर चल पड़े।

जनमेजय उवाच

श्लोक 64 (3.3.64)

पुष्पोपहारबलिभिर्बहुशश्च यथाविधि । सर्वात्मभूतं संपूज्य यतप्राणो जितेन्द्रियः ॥

puṣpopahārabalibhirbahuśaśca yathāvidhi | sarvātmabhūtaṃ saṃpūjya yataprāṇo jitendriyaḥ

पुष्पों के उपहार और बलि से बार-बार विधिपूर्वक सबके आत्मस्वरूप सूर्य की पूजा करके, प्राणों को संयत और इन्द्रियों को वश में रखकर,

श्लोक 65 (3.3.65)

स्तवेन केन विप्रर्षे स तु राजा युधिष्ठिरः । विप्रार्थमाराधितवान्सूर्यमद्भुतविक्रमम् ॥

stavena kena viprarṣe sa tu rājā yudhiṣṭhiraḥ | viprārthamārādhitavānsūryamadbhutavikramam

हे विप्रर्षि! राजा युधिष्ठिर ने ब्राह्मणों के हित के लिए अद्भुत पराक्रम वाले सूर्य की किस स्तुति से आराधना की थी?

श्लोक 66 (3.3.66)

मयि स्नेहोऽस्ति चेद्ब्रह्मन्यद्यनुग्रहभागहम् । भगवन्नास्ति चेद्गुह्यं तच्च मे ब्रूहि सांप्रतम् ॥

mayi sneho'sti cedbrahmanyadyanugrahabhāgaham | bhagavannāsti cedguhyaṃ tacca me brūhi sāṃpratam

हे ब्रह्मन्! यदि मुझ पर आपका स्नेह है, यदि मैं आपकी कृपा का पात्र हूँ, और भगवन्, यदि यह कोई गोपनीय विषय न हो, तो वह मुझे अभी बताइए।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 67 (3.3.67)

शृणुष्वावहितो राजञ्शुचिर्भूत्वा समाहितः । क्षणं च कुरु राजेन्द्र गुह्यं वक्ष्यामि ते हितम् ॥

śṛṇuṣvāvahito rājañśucirbhūtvā samāhitaḥ | kṣaṇaṃ ca kuru rājendra guhyaṃ vakṣyāmi te hitam

हे राजन्! पवित्र और एकाग्र होकर सावधानी से सुनो। हे राजेन्द्र, क्षण भर ठहरो; मैं तुम्हें एक हितकारी गुप्त बात बताता हूँ।

श्लोक 68 (3.3.68)

धौम्येन तु यथाप्रोक्तं पार्थाय सुमहात्मने । नाम्नामष्टोत्तरं पुण्यं शतं तच्छृणु भूपते ॥

dhaumyena tu yathāproktaṃ pārthāya sumahātmane | nāmnāmaṣṭottaraṃ puṇyaṃ śataṃ tacchṛṇu bhūpate

हे भूपते! धौम्य ने महात्मा पार्थ (युधिष्ठिर) को जिस प्रकार बताया था, वे एक सौ आठ पवित्र नाम सुनो।

श्लोक 69 (3.3.69)

सूर्योऽर्यमा भगस्त्वष्टा पूषाऽर्कः सविता रविः । गभस्तिमानजः कालो मृत्युर्धाता प्रभाकरः ॥

sūryo'ryamā bhagastvaṣṭā pūṣā'rkaḥ savitā raviḥ | gabhastimānajaḥ kālo mṛtyurdhātā prabhākaraḥ

सूर्य, अर्यमा, भग, त्वष्टा, पूषा, अर्क, सविता, रवि; गभस्तिमान्, अज, काल, मृत्यु, धाता, प्रभाकर;

श्लोक 70 (3.3.70)

पृथिव्यापश्च तेजश्च खं वायुश्च परायणम् । सोमो बृहस्पतिः शुक्रो बुधोऽङ्गारक एव च ॥

pṛthivyāpaśca tejaśca khaṃ vāyuśca parāyaṇam | somo bṛhaspatiḥ śukro budho'ṅgāraka eva ca

पृथ्वी, जल, तेज, आकाश, वायु, परायण (परम आश्रय); सोम, बृहस्पति, शुक्र, बुध और अंगारक;

श्लोक 71 (3.3.71)

इन्द्रो विवस्वान्दीप्तांशुः शुचिः शौरिः शनैश्चरः । ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च स्कन्दो वैश्रवणो यमः ॥

indro vivasvāndīptāṃśuḥ śuciḥ śauriḥ śanaiścaraḥ | brahmā viṣṇuśca rudraśca skando vaiśravaṇo yamaḥ

इन्द्र, विवस्वान्, दीप्तांशु, शुचि, शौरि, शनैश्चर; ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, स्कन्द, वैश्रवण, यम;

श्लोक 72 (3.3.72)

वैद्युतो जाठरश्चाग्निरैन्धनस्तेजसां पतिः । धर्मध्वजो वेदकर्ता वेगाङ्गो वेदवाहनः ॥

vaidyuto jāṭharaścāgniraindhanastejasāṃ patiḥ | dharmadhvajo vedakartā vegāṅgo vedavāhanaḥ

वैद्युत, जाठर और ऐन्धन — विद्युत्, उदर और ईंधन की अग्नियाँ; तेजसांपति; धर्मध्वज, वेदकर्ता, वेगांग, वेदवाहन;

श्लोक 73 (3.3.73)

कृतं त्रेता द्वापरश्च कलिः सर्वामराश्रयः । कला काष्ठा मुहूर्ताश्च पक्षा मासा ऋतुस्तथा ॥

kṛtaṃ tretā dvāparaśca kaliḥ sarvāmarāśrayaḥ | kalā kāṣṭhā muhūrtāśca pakṣā māsā ṛtustathā

कृत, त्रेता, द्वापर, कलि; सर्वामराश्रय (सब देवताओं के आश्रय); कला, काष्ठा, मुहूर्त, पक्ष, मास और ऋतु;

श्लोक 74 (3.3.74)

संवत्सरकरोऽश्वत्थः कालचक्रो विभावसुः । पुरुषः शाश्वतो योगी व्यक्ताव्यक्तः सनातनः ॥

saṃvatsarakaro'śvatthaḥ kālacakro vibhāvasuḥ | puruṣaḥ śāśvato yogī vyaktāvyaktaḥ sanātanaḥ

संवत्सरकर, अश्वत्थ, कालचक्र, विभावसु; पुरुष, शाश्वत, योगी, व्यक्ताव्यक्त, सनातन;

श्लोक 75 (3.3.75)

लोकाध्यक्षः सुराध्यक्षो विश्वकर्मा तमोनुदः । वरुणः सागरोऽंशश्च जीमूतो जीवनोऽरिहा ॥

lokādhyakṣaḥ surādhyakṣo viśvakarmā tamonudaḥ | varuṇaḥ sāgaro'ṃśaśca jīmūto jīvano'rihā

लोकाध्यक्ष, सुराध्यक्ष, विश्वकर्मा, तमोनुद; वरुण, सागर, अंश, जीमूत, जीवन, अरिहा;

श्लोक 76 (3.3.76)

भूताश्रयो भूतपतिः सर्वभूतनिषेवितः । मणिः सुवर्णो भूतात्मा कामदः सर्वतोमुखः । स्रष्टा संवर्तको वह्निः सर्वस्यादिरलोलुपः ॥

bhūtāśrayo bhūtapatiḥ sarvabhūtaniṣevitaḥ | maṇiḥ suvarṇo bhūtātmā kāmadaḥ sarvatomukhaḥ | sraṣṭā saṃvartako vahniḥ sarvasyādiralolupaḥ

भूताश्रय, भूतपति, सर्वभूतनिषेवित; मणि, सुवर्ण, भूतात्मा, कामद, सर्वतोमुख; स्रष्टा, संवर्तक, वह्नि, सर्वस्यादि (सबके आदि), अलोलुप;

श्लोक 77 (3.3.77)

अनन्तः कपिलो भानुः कामदः सर्वतोमुखः । जयो विशालो वरदः सर्वधातुनिषेचिता ॥

anantaḥ kapilo bhānuḥ kāmadaḥ sarvatomukhaḥ | jayo viśālo varadaḥ sarvadhātuniṣecitā

अनन्त, कपिल, भानु, कामद, सर्वतोमुख; जय, विशाल, वरद, सर्वधातुनिषेचिता (सब धातुओं का सिंचन करने वाले);

श्लोक 78 (3.3.78)

मनः सुपर्णो भूतादिः शीघ्रगः प्राणधारकः । धन्वन्तरिर्धूमकेतुरादिदेवोऽदितेः सुतः ॥

manaḥ suparṇo bhūtādiḥ śīghragaḥ prāṇadhārakaḥ | dhanvantarirdhūmaketurādidevo'diteḥ sutaḥ

मन, सुपर्ण, भूतादि, शीघ्रग, प्राणधारक; धन्वन्तरि, धूमकेतु, आदिदेव, अदितिपुत्र;

श्लोक 79 (3.3.79)

द्वादशात्माऽरविन्दाक्षः पिता माता पितामहः । स्वर्गद्वारं प्रजाद्वारं मोक्षद्वारं त्रिविष्टपम् ॥

dvādaśātmā'ravindākṣaḥ pitā mātā pitāmahaḥ | svargadvāraṃ prajādvāraṃ mokṣadvāraṃ triviṣṭapam

द्वादशात्मा, अरविन्दाक्ष, पिता, माता, पितामह; स्वर्गद्वार, प्रजाद्वार, मोक्षद्वार, त्रिविष्टप;

श्लोक 80 (3.3.80)

देवकर्ता प्रशान्तात्मा विश्वात्मा विश्वतोमुखः । चराचरात्मा सूक्ष्मात्मा मैत्रेण वपुषाऽन्वितः ॥

devakartā praśāntātmā viśvātmā viśvatomukhaḥ | carācarātmā sūkṣmātmā maitreṇa vapuṣā'nvitaḥ

देवकर्ता, प्रशान्तात्मा, विश्वात्मा, विश्वतोमुख; चराचरात्मा, सूक्ष्मात्मा, और मैत्रीपूर्ण शरीर धारण करने वाले।

श्लोक 81 (3.3.81)

एतद्वै कीर्तनीयस्य सूर्यस्यामिततेजसः । नाम्नामष्टशतं पुण्यं शक्रेणोक्तं महात्मना ॥

etadvai kīrtanīyasya sūryasyāmitatejasaḥ | nāmnāmaṣṭaśataṃ puṇyaṃ śakreṇoktaṃ mahātmanā

स्तुति के योग्य, अपार तेज वाले सूर्य के ये एक सौ आठ पवित्र नाम महात्मा इन्द्र ने कहे थे।

श्लोक 82 (3.3.82)

शक्राच्च नारदः प्राप्तो धौम्यश्च तदन्तरम् । धौम्याद्युधिष्ठिरः प्राप्य सर्वान्कामानवाप्तवान् ॥

śakrācca nāradaḥ prāpto dhaumyaśca tadantaram | dhaumyādyudhiṣṭhiraḥ prāpya sarvānkāmānavāptavān

इन्द्र से नारद ने इन्हें प्राप्त किया, उसके बाद धौम्य ने; और धौम्य से पाकर युधिष्ठिर ने अपनी सब कामनाएँ प्राप्त कीं।

श्लोक 83 (3.3.83)

सुरगणपितृयक्षसेवितं । ह्यसुरनिशाचरसिद्धवन्दितम् । वरकनकहुताशनप्रभं । त्वमपि मनस्यभिधेहि भास्करम् ॥

suragaṇapitṛyakṣasevitaṃ | hyasuraniśācarasiddhavanditam | varakanakahutāśanaprabhaṃ | tvamapi manasyabhidhehi bhāskaram

देवगण, पितर और यक्ष जिनकी सेवा करते हैं, असुर, निशाचर और सिद्ध जिनकी वन्दना करते हैं, और जिनकी प्रभा उत्तम सुवर्ण तथा अग्नि के समान है, उन भास्कर को तुम भी अपने मन में धारण करो।

श्लोक 84 (3.3.84)

सूर्योदये यः सुसमाहितः पठे- । त्स पुत्रदारान्धनरत्नसंचयान् । लभेत जातिस्मरतां नरः सदा । धृतिं च मेधां च स विन्दते पुमान् ॥

sūryodaye yaḥ susamāhitaḥ paṭhe- | tsa putradārāndhanaratnasaṃcayān | labheta jātismaratāṃ naraḥ sadā | dhṛtiṃ ca medhāṃ ca sa vindate pumān

जो मनुष्य सूर्योदय के समय भली-भाँति एकाग्र होकर इसका पाठ करता है, वह पुत्र, पत्नी तथा धन और रत्नों के भण्डार पाता है; उसे सदा पूर्वजन्मों का स्मरण रहता है, और वह धैर्य तथा मेधा प्राप्त करता है।

श्लोक 85 (3.3.85)

इमं स्तवं देववरस्य यो नरः । प्रकीर्तयेच्छुचिसुमनाः समाहितः । स मुच्यते शोकदवाग्निसागरा- । ल्लभेत कामान्मनसा यथेप्सितान् ॥

imaṃ stavaṃ devavarasya yo naraḥ | prakīrtayecchucisumanāḥ samāhitaḥ | sa mucyate śokadavāgnisāgarā- | llabheta kāmānmanasā yathepsitān

जो मनुष्य पवित्र, प्रसन्नचित्त और एकाग्र होकर देवश्रेष्ठ सूर्य की इस स्तुति का कीर्तन करता है, वह शोक रूपी दावानल और सागर से मुक्त हो जाता है और मनचाही कामनाएँ प्राप्त करता है।

श्लोक 86 (3.3.86)

इमं स्तवं प्रयतमनाः समाधिना । पठेदिहान्योऽपि वरं समर्थयन् । तत्तस्य दद्याच्च रविर्मनीषितं । तदाऽऽप्नुयाद्यद्यपि तत्सुदुर्लभम् ॥

imaṃ stavaṃ prayatamanāḥ samādhinā | paṭhedihānyo'pi varaṃ samarthayan | tattasya dadyācca ravirmanīṣitaṃ | tadā''pnuyādyadyapi tatsudurlabham

यदि कोई अन्य व्यक्ति भी यहाँ संयत मन से, ध्यानपूर्वक, कोई वर चाहते हुए इस स्तुति का पाठ करे, तो सूर्य उसे उसकी मनचाही वस्तु देंगे; वह उसे पा लेगा, चाहे वह कितनी ही दुर्लभ क्यों न हो।

श्लोक 87 (3.3.87)

यश्चेदं धारयेन्नित्यं शृणुयाद्वाप्यभीक्ष्णशः । पुत्रार्थी लभते पुत्रं धनार्थी लभते धनम् । विद्यार्थी लभते विद्यां पुरुषोप्यथवा स्त्रियः ॥

yaścedaṃ dhārayennityaṃ śṛṇuyādvāpyabhīkṣṇaśaḥ | putrārthī labhate putraṃ dhanārthī labhate dhanam | vidyārthī labhate vidyāṃ puruṣopyathavā striyaḥ

जो इसे सदा धारण करता है या बार-बार सुनता है, वह पुत्र चाहे तो पुत्र पाता है, धन चाहे तो धन पाता है, विद्या चाहे तो विद्या पाता है — चाहे वह पुरुष हो या स्त्री।

श्लोक 88 (3.3.88)

उभे संध्ये पठेन्नित्यं नारी वा पुरुषो यदि । आपदं प्राप्य मुच्येत बद्धो मुच्येत बन्धनात् ॥

ubhe saṃdhye paṭhennityaṃ nārī vā puruṣo yadi | āpadaṃ prāpya mucyeta baddho mucyeta bandhanāt

स्त्री हो या पुरुष, जो प्रतिदिन दोनों सन्ध्याओं में इसका पाठ करता है, वह विपत्ति में पड़कर भी छूट जाता है, और बँधा हुआ हो तो बन्धन से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 89 (3.3.89)

संग्रामे च जयेन्नित्यं विपुलं चाप्नुयाद्वसु । मुच्यते सर्वपापेभ्यः सूर्यलोकं स गच्छति ॥

saṃgrāme ca jayennityaṃ vipulaṃ cāpnuyādvasu | mucyate sarvapāpebhyaḥ sūryalokaṃ sa gacchati

वह युद्ध में सदा विजयी होता है और प्रचुर धन पाता है; वह सब पापों से मुक्त होकर सूर्यलोक को जाता है।

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