आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 4
विदुर का धृतराष्ट्र को परामर्श और उनका तिरस्कार
पाण्डवों के वन चले जाने पर व्याकुल धृतराष्ट्र विदुर से पूछते हैं कि अब क्या करना चाहिए। विदुर उन्हें सलाह देते हैं कि जुए में पाण्डवों से जो कुछ लिया गया, वह सब लौटा दें, दुर्योधन को वश में करें और युधिष्ठिर को राजा बनाएँ; अन्यथा कुरुओं का विनाश निश्चित है। धृतराष्ट्र क्रोधित होकर अपने पुत्र को त्यागने से मना कर देते हैं, विदुर से कहते हैं कि वे चाहें तो जाएँ या रहें, और भीतर चले जाते हैं; विदुर शीघ्रता से पाण्डवों के पास चल पड़ते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (3.4.1)
वनं प्रविष्टेष्वथ पाण्डवेषु । प्रज्ञाचक्षुस्तप्यमानोऽम्बिकेयः । धर्मात्मानं विदुरमगाधबुद्धिं । सुखासीनो वाक्यमुवाच राजा ॥
vanaṃ praviṣṭeṣvatha pāṇḍaveṣu | prajñācakṣustapyamāno'mbikeyaḥ | dharmātmānaṃ viduramagādhabuddhiṃ | sukhāsīno vākyamuvāca rājā
जब पाण्डव वन में चले गए, तब प्रज्ञा ही जिनके नेत्र थे, वे अम्बिकानन्दन राजा धृतराष्ट्र सन्तप्त हो उठे। सुखपूर्वक बैठकर उन्होंने अगाध बुद्धि वाले धर्मात्मा विदुर से यह कहा।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 2 (3.4.2)
प्रज्ञा च ते भार्गवस्येव शुद्धा । धर्मं च त्वं परमं वेत्थ सूक्ष्मम् । समश्च त्वं संमतः कौरवाणां । पथ्यं चैषां मम चैव ब्रवीहि ॥
prajñā ca te bhārgavasyeva śuddhā | dharmaṃ ca tvaṃ paramaṃ vettha sūkṣmam | samaśca tvaṃ saṃmataḥ kauravāṇāṃ | pathyaṃ caiṣāṃ mama caiva bravīhi
"तुम्हारी बुद्धि भार्गव (शुक्राचार्य) की भाँति निर्मल है, और तुम परम सूक्ष्म धर्म को जानते हो। तुम निष्पक्ष हो और सभी कौरव तुम्हारा सम्मान करते हैं। अतः उनके लिए और मेरे लिए जो हितकर हो, वह बताओ।
श्लोक 3 (3.4.3)
एवं गते विदुर यदद्य कार्यं । पौराश्चेमे कथमस्मान्भजेरन् । ते चाप्यस्मान्नोद्धरेयुः समूला- । न्न कामये तांश्च विनश्यमानान् ॥
evaṃ gate vidura yadadya kāryaṃ | paurāśceme kathamasmānbhajeran | te cāpyasmānnoddhareyuḥ samūlā- | nna kāmaye tāṃśca vinaśyamānān
हे विदुर! ऐसी स्थिति में अब क्या करना चाहिए? ये पुरवासी किस प्रकार हमारे प्रति अनुरक्त हों? और पाण्डव भी हमें जड़ से न उखाड़ें — क्योंकि मैं उनका विनाश भी नहीं चाहता।
श्लोक 4 (3.4.4)
सौबलेनैव पापेन दुर्योधनहितैषिणा । क्रूरमाचरितं क्षत्तर्न मे प्रियमनुष्ठितम् ॥
saubalenaiva pāpena duryodhanahitaiṣiṇā | krūramācaritaṃ kṣattarna me priyamanuṣṭhitam
हे क्षत्ता! दुर्योधन का हित चाहने वाले पापी सुबलपुत्र (शकुनि) ने ही यह क्रूर कर्म किया है; जो किया गया, वह मुझे प्रिय नहीं था।
श्लोक 5 (3.4.5)
तथैवाङ्गीकृते तत्र तद्भवान्वक्तुमर्हति । उत्तरं प्राप्तकालं च किमन्यन्मन्यते क्षमम् ॥
tathaivāṅgīkṛte tatra tadbhavānvaktumarhati | uttaraṃ prāptakālaṃ ca kimanyanmanyate kṣamam
जब बात जैसी थी वैसी ही स्वीकार कर ली गई है, तो इस विषय में समयोचित उत्तर तुम्हीं बता सकते हो — अथवा तुम और क्या उचित समझते हो?
श्लोक 6 (3.4.6)
नास्ति धर्मे सहायत्वमिति मे दीर्यते मनः । यत्र पाण्डुसुताः सर्वे क्लिश्यन्ति वनमागताः ॥
nāsti dharme sahāyatvamiti me dīryate manaḥ | yatra pāṇḍusutāḥ sarve kliśyanti vanamāgatāḥ
यह सोचकर मेरा मन विदीर्ण हो रहा है कि धर्म का कोई सहायक नहीं है, जब पाण्डु के सभी पुत्र वन में आकर कष्ट भोग रहे हैं।"
विदुर उवाच
श्लोक 7 (3.4.7)
त्रिवर्गोऽयं धर्ममूलो नरेन्द्र । राज्यं चेदं धर्ममूलं वदन्ति । धर्मे राजन्वर्तमानः स्वशक्त्या । पुत्रान्सर्वान्पाहि कुन्तीसुतांश्च ॥
trivargo'yaṃ dharmamūlo narendra | rājyaṃ cedaṃ dharmamūlaṃ vadanti | dharme rājanvartamānaḥ svaśaktyā | putrānsarvānpāhi kuntīsutāṃśca
"हे नरेन्द्र! धर्म, अर्थ और काम — इस त्रिवर्ग का मूल धर्म ही है, और कहते हैं कि यह राज्य भी धर्म पर ही टिका है। हे राजन्! अपनी शक्ति भर धर्म में स्थित रहते हुए अपने सब पुत्रों की, और कुन्ती के पुत्रों की भी, रक्षा कीजिए।
श्लोक 8 (3.4.8)
स वै धर्मो विप्रलब्धः सभायां । पापात्मभिः सौबलेयप्रधानैः । आहूय कुन्तीसुतमक्षवत्यां । पराजैषीत्सत्यसन्धं सुतस्ते ॥
sa vai dharmo vipralabdhaḥ sabhāyāṃ | pāpātmabhiḥ saubaleyapradhānaiḥ | āhūya kuntīsutamakṣavatyāṃ | parājaiṣītsatyasandhaṃ sutaste
उसी धर्म को सभा में शकुनि आदि पापियों ने छल से ठग लिया, जब आपके पुत्र ने सत्यप्रतिज्ञ कुन्तीपुत्र को जुए के लिए बुलाकर हरा दिया।
श्लोक 9 (3.4.9)
एतस्य ते दुष्प्रणीतस्य राज- । न्द्वेषस्याहं परिपश्याम्युपायम् । यथा पुत्रस्तव कौरव्य पापा- । न्मुक्तो लोके प्रतितिष्ठेत साधु ॥
etasya te duṣpraṇītasya rāja- | ndveṣasyāhaṃ paripaśyāmyupāyam | yathā putrastava kauravya pāpā- | nmukto loke pratitiṣṭheta sādhu
हे राजन्! आपकी इस कुनीति से उपजे द्वेष को शान्त करने का एक उपाय मुझे दिखाई देता है, जिससे हे कौरव्य, आपका पुत्र पाप से मुक्त होकर संसार में भली-भाँति प्रतिष्ठित रहे।
श्लोक 10 (3.4.10)
तद्वै सर्वं पाण्डुपुत्रा लभन्तां । यत्तद्राजन्नतिसृष्टं त्वयाऽऽसीत् । एष धर्मः परमो यत्स्वकेन । राजा तुष्येन्न परस्वेषु गृद्ध्येत् ॥
tadvai sarvaṃ pāṇḍuputrā labhantāṃ | yattadrājannatisṛṣṭaṃ tvayā''sīt | eṣa dharmaḥ paramo yatsvakena | rājā tuṣyenna parasveṣu gṛddhyet
हे राजन्! आपने पाण्डुपुत्रों को जो कुछ दिया था, वह सब उन्हें फिर से मिल जाए। यही परम धर्म है कि राजा अपने धन से सन्तुष्ट रहे और पराये धन का लोभ न करे।
श्लोक 11 (3.4.11)
यशो न नश्येज्ज्ञातिभेदश्च न स्या- । द्धर्मो न स्यान्नैव चैवं कृते त्वाम् । एतत्कार्यं तव सर्वप्रधानं । तेषां तुष्टिः शकुनेश्चावमानः ॥
yaśo na naśyejjñātibhedaśca na syā- | ddharmo na syānnaiva caivaṃ kṛte tvām | etatkāryaṃ tava sarvapradhānaṃ | teṣāṃ tuṣṭiḥ śakuneścāvamānaḥ
ऐसा करने पर आपका यश नष्ट नहीं होगा, कुटुम्ब में फूट नहीं पड़ेगी, और यह कदापि नहीं होगा कि आपको धर्म प्राप्त न हो। आपका सबसे प्रमुख कर्तव्य यही है — पाण्डवों को सन्तुष्ट करना और शकुनि का मान भंग करना।
श्लोक 12 (3.4.12)
एवं शेषं यदि पुत्रेषु ते स्या- । देतद्राजंस्त्वरमाणः कुरुष्व । अथैतदेवं न करोषि राजन् । ध्रुवं कुरूणां भविता विनाशः ॥
evaṃ śeṣaṃ yadi putreṣu te syā- | detadrājaṃstvaramāṇaḥ kuruṣva | athaitadevaṃ na karoṣi rājan | dhruvaṃ kurūṇāṃ bhavitā vināśaḥ
हे राजन्! यदि आप चाहते हैं कि आपके पुत्रों का कुछ शेष बचा रहे, तो यह काम शीघ्र कीजिए। और यदि आप ऐसा नहीं करते, तो कुरुओं का विनाश निश्चित है।
श्लोक 13 (3.4.13)
नहि क्रुद्धो भीमसेनोऽर्जुनो वा । शेषं कुर्याच्छात्रवाणामनीके । येषां योद्धा सव्यसाची कृतास्त्रो । धनुर्येषां गाण्डिवं लोकसारम् ॥
nahi kruddho bhīmaseno'rjuno vā | śeṣaṃ kuryācchātravāṇāmanīke | yeṣāṃ yoddhā savyasācī kṛtāstro | dhanuryeṣāṃ gāṇḍivaṃ lokasāram
क्योंकि क्रोधित होने पर भीमसेन या अर्जुन शत्रु-सेना में किसी को शेष नहीं छोड़ेंगे — जिनका योद्धा अस्त्रविद्या में निपुण सव्यसाची है, और जिनका धनुष संसार में सबसे श्रेष्ठ गाण्डीव है,
श्लोक 14 (3.4.14)
येषां भीमो बाहुशाली च योद्धा । तेषां लोके किंनु न प्राप्यमस्ति । उक्तं पूर्वं जातमात्रे सुते ते । मया यत्ते हितमासीत्तदानीम् ॥
yeṣāṃ bhīmo bāhuśālī ca yoddhā | teṣāṃ loke kiṃnu na prāpyamasti | uktaṃ pūrvaṃ jātamātre sute te | mayā yatte hitamāsīttadānīm
और जिनका योद्धा बलशाली भुजाओं वाला भीम है — उनके लिए संसार में क्या अप्राप्य है? आपके पुत्र के जन्म लेते ही मैंने आपसे वह बात कही थी जो तब आपके हित में थी —
श्लोक 15 (3.4.15)
पुत्रं त्यजेममहितं कुलस्य । हितं परं न च तत्त्वं चकर्थ । इदानीं ते हितमुक्तं न चेत्त्व- । मेवं कर्ता परितप्ताऽसि पश्चात् ॥
putraṃ tyajemamahitaṃ kulasya | hitaṃ paraṃ na ca tattvaṃ cakartha | idānīṃ te hitamuktaṃ na cettva- | mevaṃ kartā paritaptā'si paścāt
"कुल का अहित करने वाले इस पुत्र को त्याग दीजिए।" वह परम हितकर बात थी, पर आपने वैसा नहीं किया। अब मैंने आपके हित की बात कही है; यदि आप ऐसा नहीं करेंगे, तो बाद में पछताएँगे।
श्लोक 16 (3.4.16)
यद्येतदेवमनुमन्ता सुतस्ते । संप्रीयमाणः पाण्डवैरेकराज्यम् । तापो न ते भविता प्रीतियोगा- । त्त्वं चेन्न गृह्णासि सुतं सहायैः ॥
yadyetadevamanumantā sutaste | saṃprīyamāṇaḥ pāṇḍavairekarājyam | tāpo na te bhavitā prītiyogā- | ttvaṃ cenna gṛhṇāsi sutaṃ sahāyaiḥ
यदि आपका पुत्र पाण्डवों से प्रेमपूर्वक मिलकर एक ही राज्य साझा करने की बात मान ले, तो उस मैत्री के कारण आपको सन्ताप नहीं होगा; और यदि न माने, तो सहायकों की सहायता से अपने पुत्र को वश में कीजिए।
श्लोक 17 (3.4.17)
दुर्योधनं त्वहितं वै निगृह्य । पाण्डोः पुत्रं प्रकुरुष्वाधिपत्ये । ध्रुवं विनाशस्तव पुत्रेण धीमन् । सबन्धुवर्गेण सहैव राजभिः ॥
duryodhanaṃ tvahitaṃ vai nigṛhya | pāṇḍoḥ putraṃ prakuruṣvādhipatye | dhruvaṃ vināśastava putreṇa dhīman | sabandhuvargeṇa sahaiva rājabhiḥ
अहितकारी दुर्योधन को वश में करके पाण्डुपुत्र को राज्य का अधिपति बनाइए। अन्यथा, हे बुद्धिमान्, अपने पुत्र के कारण बन्धु-बान्धवों और राजाओं सहित आपका विनाश निश्चित है।
श्लोक 18 (3.4.18)
चतुर्दशे चैव वर्षे नरेन्द्र । कुलक्षयं प्राप्स्यसि राजसिंह । तस्मात्कुरुष्वाधिपत्ये नरेन्द्र । युधिष्ठिरं धर्मभृतां वरिष्ठम् ॥
caturdaśe caiva varṣe narendra | kulakṣayaṃ prāpsyasi rājasiṃha | tasmātkuruṣvādhipatye narendra | yudhiṣṭhiraṃ dharmabhṛtāṃ variṣṭham
हे नरेन्द्र, हे राजसिंह! चौदहवें वर्ष में आपको अपने कुल का विनाश देखना पड़ेगा। इसलिए हे नरेन्द्र, धर्मात्माओं में श्रेष्ठ युधिष्ठिर को राज्य का अधिपति बनाइए।
श्लोक 19 (3.4.19)
अजातशत्रुर्हि विमुक्तरागो । धर्मेणेमां पृथिवीं शास्तु राजन् । ततो राजन्पार्थिवाः सर्व एव । वैश्या इवास्मानुपतिष्ठन्तु सद्यः ॥
ajātaśatrurhi vimuktarāgo | dharmeṇemāṃ pṛthivīṃ śāstu rājan | tato rājanpārthivāḥ sarva eva | vaiśyā ivāsmānupatiṣṭhantu sadyaḥ
हे राजन्! रागरहित अजातशत्रु धर्मपूर्वक इस पृथ्वी का शासन करें। तब सभी राजा तुरन्त वैश्यों की भाँति हमारी सेवा में उपस्थित होंगे।
श्लोक 20 (3.4.20)
दुर्योधनः शकुनिः सूतपुत्रः । प्रीत्या राजन्पाण्डुपुत्रान्भजन्तु । दुःशासनो याचतु भीमसेनं । सभामध्ये द्रुपदस्यात्मजां च ॥
duryodhanaḥ śakuniḥ sūtaputraḥ | prītyā rājanpāṇḍuputrānbhajantu | duḥśāsano yācatu bhīmasenaṃ | sabhāmadhye drupadasyātmajāṃ ca
हे राजन्! दुर्योधन, शकुनि और सूतपुत्र (कर्ण) प्रेमपूर्वक पाण्डुपुत्रों का सम्मान करें। दुःशासन भरी सभा में भीमसेन और द्रुपदकुमारी से क्षमा माँगे।
श्लोक 21 (3.4.21)
युधिष्ठिरं त्वं परिसान्त्वयस्व । राज्ये चैनं स्थापयस्वाभिपूज्य । त्वया पृष्टः किमहमन्यद्वदेय- । मेतत्कृत्वा कृतकृत्योसि राजन् ॥
yudhiṣṭhiraṃ tvaṃ parisāntvayasva | rājye cainaṃ sthāpayasvābhipūjya | tvayā pṛṣṭaḥ kimahamanyadvadeya- | metatkṛtvā kṛtakṛtyosi rājan
आप युधिष्ठिर को सान्त्वना दीजिए और उनका सम्मान करके उन्हें राज्य पर प्रतिष्ठित कीजिए। आपने पूछा है, तो मैं और क्या कहूँ? हे राजन्! यह करके आप कृतकृत्य हो जाएँगे।"
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 22 (3.4.22)
एतद्वाक्यं विदुर यत्ते सभाया- । मिह प्रोक्तं पाण्डवान्प्राप्य मां च । हितं तेषामहितं मामकाना- । मेतत्सर्वं मम नावैति चेतः ॥
etadvākyaṃ vidura yatte sabhāyā- | miha proktaṃ pāṇḍavānprāpya māṃ ca | hitaṃ teṣāmahitaṃ māmakānā- | metatsarvaṃ mama nāvaiti cetaḥ
"हे विदुर! तुमने सभा में और यहाँ पाण्डवों तथा मेरे विषय में जो बातें कहीं, वे उनके लिए हितकर और मेरे पुत्रों के लिए अहितकर हैं; मेरा मन इनमें से कुछ भी स्वीकार नहीं करता।
श्लोक 23 (3.4.23)
इदं त्विदानीं गत एव निश्चितं । तेषामर्थे पाण्डवानां यदात्थ । तेनाद्य मन्ये नासि हितो ममेति । कथं हि पुत्रं पाण्डवार्थे त्यजेयम् ॥
idaṃ tvidānīṃ gata eva niścitaṃ | teṣāmarthe pāṇḍavānāṃ yadāttha | tenādya manye nāsi hito mameti | kathaṃ hi putraṃ pāṇḍavārthe tyajeyam
और अब तुम पाण्डवों के हित में जो कहते हो, उससे निश्चित हो गया कि तुम उन्हीं के पक्ष में चले गए हो। इसलिए आज मैं मानता हूँ कि तुम मेरे हितैषी नहीं हो। भला मैं पाण्डवों के लिए अपने पुत्र को कैसे त्याग दूँ?
श्लोक 24 (3.4.24)
असंशयं तेऽपि ममैव पुत्रा । दुर्योधनस्तु मम देहात्प्रसूतः । स्वं वै देहं परहेतोस्त्यजेति । कोनु ब्रूयात्समतामन्ववेक्षन् ॥
asaṃśayaṃ te'pi mamaiva putrā | duryodhanastu mama dehātprasūtaḥ | svaṃ vai dehaṃ parahetostyajeti | konu brūyātsamatāmanvavekṣan
निःसन्देह वे भी मेरे ही पुत्र हैं, परन्तु दुर्योधन मेरे शरीर से उत्पन्न हुआ है। समता का विचार करने वाला कौन किसी से कहेगा कि "दूसरे के लिए अपना शरीर त्याग दो"?
श्लोक 25 (3.4.25)
स मां जिह्मं विदुर सर्वं ब्रवीषि । मन्युं तेऽहमधिकं धारयामि । यथेच्छकं गच्छ वा तिष्ठ वा त्वं । सुसान्त्व्यमानाऽप्यसती स्त्री जहाति ॥
sa māṃ jihmaṃ vidura sarvaṃ bravīṣi | manyuṃ te'hamadhikaṃ dhārayāmi | yathecchakaṃ gaccha vā tiṣṭha vā tvaṃ | susāntvyamānā'pyasatī strī jahāti
हे विदुर! तुम मुझसे जो कुछ कहते हो, सब कुटिल है, और मेरे मन में तुम्हारे प्रति बहुत क्रोध है। तुम्हारी जैसी इच्छा हो — जाओ या रहो। कुलटा स्त्री को कितना भी मनाओ, वह छोड़कर चली ही जाती है।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 26 (3.4.26)
एतावदुक्त्वा धृतराष्ट्रोऽन्वपद्य- । दन्तर्वेश्म सहसोत्थाय राजन् । नेदमस्तीत्यथ विदुरो भाषमाणः । संप्राद्रवद्यत्र पार्था बभूवुः ॥
etāvaduktvā dhṛtarāṣṭro'nvapadya- | dantarveśma sahasotthāya rājan | nedamastītyatha viduro bhāṣamāṇaḥ | saṃprādravadyatra pārthā babhūvuḥ
हे राजन्! इतना कहकर धृतराष्ट्र सहसा उठे और महल के भीतर चले गए। तब "अब यह कुल नहीं बचेगा" ऐसा कहते हुए विदुर शीघ्रता से वहाँ चल पड़े जहाँ पाण्डव थे।