आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 10
मैत्रेय का दुर्योधन को शाप
धृतराष्ट्र व्यास से प्रार्थना करते हैं कि वे स्वयं दुर्योधन को समझाएँ; व्यास कहते हैं कि पाण्डवों से मिलकर आ रहे महर्षि मैत्रेय उसे उपदेश देंगे, और चले जाते हैं। मैत्रेय दुर्योधन से सन्धि करने का आग्रह करते हैं और याद दिलाते हैं कि भीम ने राक्षस किर्मीर और जरासन्ध को कैसे मारा, पर दुर्योधन तिरस्कार से अपनी जाँघ पर हाथ मारता है और पैर से धरती कुरेदता है। क्रुद्ध होकर मैत्रेय उसे शाप देते हैं कि एक महायुद्ध में भीम गदा से उसकी जाँघ तोड़ देगा, और यह शाप तभी टलेगा जब वह सन्धि कर ले; किर्मीर की कथा वे विदुर पर छोड़ जाते हैं।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 1 (3.10.1)
एवमेतन्महाप्राज्ञ यथा वदसि मां मुने । अहं चैव विजानामि सर्वे चेमे नराधिपाः ॥
evametanmahāprājña yathā vadasi māṃ mune | ahaṃ caiva vijānāmi sarve ceme narādhipāḥ
"हे महाबुद्धिमान मुनि, जैसा आप मुझसे कहते हैं, वैसा ही है। मैं भी यह जानता हूँ और ये सब राजा भी।"
श्लोक 2 (3.10.2)
भवांश्च मन्यते साधु यत्कुरूणां सुखोदयम् । तदेव विदुरोऽप्याह भीष्मो द्रोणश्च मां मुने ॥
bhavāṃśca manyate sādhu yatkurūṇāṃ sukhodayam | tadeva viduro'pyāha bhīṣmo droṇaśca māṃ mune
"हे मुनि, आप उसी को उचित मानते हैं जिससे कुरुवंशियों का सुख हो; विदुर भी मुझसे यही कहते हैं, और भीष्म तथा द्रोण भी।"
श्लोक 3 (3.10.3)
यदि त्वहमनुग्राह्यः कौरव्येषु दया यदि । अनुशाधि दुरात्मानं पुत्रं दुर्योधनं मम ॥
yadi tvahamanugrāhyaḥ kauravyeṣu dayā yadi | anuśādhi durātmānaṃ putraṃ duryodhanaṃ mama
"यदि मैं आपकी कृपा का पात्र हूँ, यदि कौरवों पर आपकी दया है, तो मेरे दुष्ट पुत्र दुर्योधन को आप ही शिक्षा दीजिए।"
व्यास उवाच
श्लोक 4 (3.10.4)
अयमायाति वै राजन्मैत्रेयो भगवानृषिः । अन्वीक्ष्य पाण्डवान्भ्रातॄनिहैवाऽस्मद्दिदृक्षया ॥
ayamāyāti vai rājanmaitreyo bhagavānṛṣiḥ | anvīkṣya pāṇḍavānbhrātṝnihaivā'smaddidṛkṣayā
"राजन्, भगवान् मैत्रेय ऋषि यहाँ आ रहे हैं। वे पाण्डव भाइयों से मिलकर अब हमसे मिलने की इच्छा से यहीं आ रहे हैं।"
श्लोक 5 (3.10.5)
एष दुर्योधनं पुत्रं तव राजन्महानृषिः । अनुशास्ता यथान्यायं शमायास्य कुलस्य च ॥
eṣa duryodhanaṃ putraṃ tava rājanmahānṛṣiḥ | anuśāstā yathānyāyaṃ śamāyāsya kulasya ca
"हे राजन्, ये महर्षि इस कुल की शान्ति के लिए तुम्हारे पुत्र दुर्योधन को यथोचित शिक्षा देंगे।"
श्लोक 6 (3.10.6)
ब्रूयाद्यदेष कौरव्य तत्कार्यमविशङ्कया । अक्रियायां तु कार्यस्य पुत्रं ते शप्स्यते रुषा ॥
brūyādyadeṣa kauravya tatkāryamaviśaṅkayā | akriyāyāṃ tu kāryasya putraṃ te śapsyate ruṣā
"हे कौरव, वे जो कहें, उसे बिना संशय के करना चाहिए; यदि करणीय कार्य नहीं किया गया, तो वे क्रोध में तुम्हारे पुत्र को शाप दे देंगे।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 7 (3.10.7)
एवमुक्त्वा ययौ व्यासो मैत्रेयः प्रत्यदृश्यत । पूजया प्रतिजग्राह सपुत्रस्तं नराधिपः ॥
evamuktvā yayau vyāso maitreyaḥ pratyadṛśyata | pūjayā pratijagrāha saputrastaṃ narādhipaḥ
यह कहकर व्यास चले गए और मैत्रेय दिखाई दिए। राजा ने पुत्र सहित पूजा करके उनका स्वागत किया।
श्लोक 8 (3.10.8)
कृत्वाऽर्घ्याद्याः क्रियाः सर्वा विश्रान्तं मुनिसत्तमम् । प्रश्रयेणाब्रवीद्राजा धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः ॥
kṛtvā'rghyādyāḥ kriyāḥ sarvā viśrāntaṃ munisattamam | praśrayeṇābravīdrājā dhṛtarāṣṭro'mbikāsutaḥ
अर्घ्य आदि सारी सत्कार-क्रियाएँ हो जाने पर, जब मुनिश्रेष्ठ विश्राम कर चुके, तब अम्बिकापुत्र राजा धृतराष्ट्र ने विनयपूर्वक कहा —
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 9 (3.10.9)
सुखेनागमनं कच्चिद्भगवन्कुरुजाङ्गले । कच्चित्कुशलिनो वीरा भ्रातरः पञ्च पाण्डवाः ॥
sukhenāgamanaṃ kaccidbhagavankurujāṅgale | kaccitkuśalino vīrā bhrātaraḥ pañca pāṇḍavāḥ
"भगवन्, कुरुजांगल तक आपकी यात्रा सुख से तो हुई? क्या पाँचों वीर पाण्डव भाई सकुशल हैं?"
श्लोक 10 (3.10.10)
समये स्थातुमिच्छन्ति कच्चिच्च भरतर्षभाः । कच्चित्कुरूणां सौभ्रात्रमव्युच्छिन्नं भविष्यति ॥
samaye sthātumicchanti kaccicca bharatarṣabhāḥ | kaccitkurūṇāṃ saubhrātramavyucchinnaṃ bhaviṣyati
"क्या वे भरतश्रेष्ठ प्रतिज्ञा पर टिके रहना चाहते हैं? क्या कुरुवंशियों का भ्रातृभाव अटूट बना रहेगा?"
मैत्रेय उवाच
श्लोक 11 (3.10.11)
तीर्थयात्रामनुक्रामन्प्राप्तोऽस्मि कुरुजाङ्गलान् । यदृच्छया धर्मराजं दृष्टवान्काम्यके वने ॥
tīrthayātrāmanukrāmanprāpto'smi kurujāṅgalān | yadṛcchayā dharmarājaṃ dṛṣṭavānkāmyake vane
"तीर्थयात्रा करते हुए मैं कुरुजांगल पहुँचा और संयोग से काम्यक वन में मुझे धर्मराज के दर्शन हुए।"
श्लोक 12 (3.10.12)
तं जटाजिनसंवीतं तपोवननिवासिनम् । समाजग्मुर्महात्मानं द्रष्टुं मुनिगणाः प्रभो ॥
taṃ jaṭājinasaṃvītaṃ tapovananivāsinam | samājagmurmahātmānaṃ draṣṭuṃ munigaṇāḥ prabho
"हे प्रभु, जटा और मृगचर्म धारण किए, तपोवन में रहने वाले उस महात्मा के दर्शन के लिए मुनियों के समूह आए हुए थे।"
श्लोक 13 (3.10.13)
तत्राश्रौषं महाराज पुत्राणां तव विग्रहम् । अनयं द्यूतरूपेण महाभयमुपस्थितम् ॥
tatrāśrauṣaṃ mahārāja putrāṇāṃ tava vigraham | anayaṃ dyūtarūpeṇa mahābhayamupasthitam
"हे महाराज, वहीं मैंने तुम्हारे पुत्रों के कलह के विषय में सुना — जुए के रूप में हुई अनीति, जो बड़ा भय बनकर सामने खड़ी है।"
श्लोक 14 (3.10.14)
ततोऽहं त्वामनुप्राप्तः कौरवाणामवेक्षया । सदा ह्यभ्यधिकः स्नेहः प्रीतिश्च त्वयि मे प्रभो ॥
tato'haṃ tvāmanuprāptaḥ kauravāṇāmavekṣayā | sadā hyabhyadhikaḥ snehaḥ prītiśca tvayi me prabho
"इसलिए कौरवों के हित का विचार करके मैं तुम्हारे पास आया हूँ, क्योंकि हे प्रभु, तुम्हारे प्रति मेरा स्नेह और प्रेम सदा से अधिक रहा है।"
श्लोक 15 (3.10.15)
नैतदौपयिकं राजंस्त्वयि भीष्मे च जीवति । यदन्योन्येन ते पुत्रा विरुध्यन्ते कथंचन ॥
naitadaupayikaṃ rājaṃstvayi bhīṣme ca jīvati | yadanyonyena te putrā virudhyante kathaṃcana
"राजन्, तुम्हारे और भीष्म के जीवित रहते यह उचित नहीं कि तुम्हारे पुत्र किसी भी प्रकार आपस में विरोध करें।"
श्लोक 16 (3.10.16)
मेढीभूतः स्वयं राजन्निग्रहे प्रग्रहे भवान् । किमर्थमनयं घोरमुत्पतन्तमुपेक्षसे ॥
meḍhībhūtaḥ svayaṃ rājannigrahe pragrahe bhavān | kimarthamanayaṃ ghoramutpatantamupekṣase
"राजन्, निग्रह और अनुग्रह दोनों में तुम्हीं केन्द्र-स्तम्भ हो। फिर इस भयंकर अनीति को उठते देखकर भी तुम उसकी उपेक्षा क्यों कर रहे हो?"
श्लोक 17 (3.10.17)
दस्यूनामिव यद्वृत्तं सभायां कुरुनन्दन । तेन न भ्राजसे राजंस्तापसानां समागमे ॥
dasyūnāmiva yadvṛttaṃ sabhāyāṃ kurunandana | tena na bhrājase rājaṃstāpasānāṃ samāgame
"हे कुरुनन्दन, सभा में जो लुटेरों जैसा आचरण हुआ, उसके कारण, राजन्, तपस्वियों के समाज में तुम्हारी शोभा नहीं रही।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 18 (3.10.18)
ततो व्यावृत्य राजानं दुर्योधनममर्षणम् । उवाच श्लक्ष्णया वाचा मैत्रेयो भगवानृषिः ॥
tato vyāvṛtya rājānaṃ duryodhanamamarṣaṇam | uvāca ślakṣṇayā vācā maitreyo bhagavānṛṣiḥ
तब भगवान् मैत्रेय ऋषि ने असहिष्णु राजा दुर्योधन की ओर मुड़कर मधुर वाणी में कहा —
मैत्रेय उवाच
श्लोक 19 (3.10.19)
दुर्योधन महाबाहो निबोध वदतां वर । वचनं मे महाभाग ब्रुवतो यद्धितं तव ॥
duryodhana mahābāho nibodha vadatāṃ vara | vacanaṃ me mahābhāga bruvato yaddhitaṃ tava
"हे महाबाहु, वक्ताओं में श्रेष्ठ, महाभाग दुर्योधन, मैं तुम्हारे हित की जो बात कह रहा हूँ, उसे सुनो।"
श्लोक 20 (3.10.20)
मा द्रुहः पाण्डवान्राजन्कुरुष्व हितमात्मनः । पाण्डवानां कुरूणां च लोकस्य च नरर्षभ ॥
mā druhaḥ pāṇḍavānrājankuruṣva hitamātmanaḥ | pāṇḍavānāṃ kurūṇāṃ ca lokasya ca nararṣabha
"राजन्, पाण्डवों से द्रोह मत करो। हे नरश्रेष्ठ, अपना, पाण्डवों का, कुरुओं का और संसार का हित करो।"
श्लोक 21 (3.10.21)
पाण्डवान्प्राप्य तान्रात्रौ किर्मीरो नाम राक्षसः । आवृत्य मार्गं रौद्रात्मा तस्थौ गिरिरिवाचलः ॥
pāṇḍavānprāpya tānrātrau kirmīro nāma rākṣasaḥ | āvṛtya mārgaṃ raudrātmā tasthau giririvācalaḥ
"जब रात में किर्मीर नाम का क्रूर स्वभाव वाला राक्षस पाण्डवों के सामने आया, तो वह उनका मार्ग रोककर अचल पर्वत की भाँति खड़ा हो गया।"
श्लोक 22 (3.10.22)
तं भीमः समरश्लाघी बलेन बलिनां वरः । जघान पशुमारेण व्याघ्रः क्षुद्रमृगं यथा ॥
taṃ bhīmaḥ samaraślāghī balena balināṃ varaḥ | jaghāna paśumāreṇa vyāghraḥ kṣudramṛgaṃ yathā
"युद्ध पर गर्व करने वाले, बलवानों में श्रेष्ठ भीम ने उसे अपने बल से पशु की भाँति मार डाला, जैसे बाघ किसी छोटे मृग को मार देता है।"
श्लोक 23 (3.10.23)
पश्य दिग्विजये राजन्यथा भीमेन पातितः । जरासन्धो महेष्वासो नागायुतबलो युधि ॥
paśya digvijaye rājanyathā bhīmena pātitaḥ | jarāsandho maheṣvāso nāgāyutabalo yudhi
"राजन्, देखो, दिग्विजय में भीम ने युद्ध में दस हज़ार हाथियों के बल वाले महाधनुर्धर जरासन्ध को कैसे मार गिराया।"
श्लोक 24 (3.10.24)
संबन्धी वासुदेवश्च श्यालाः सर्वे च पार्षताः । ते हि सर्वे नरव्याघ्राः शूरा विक्रान्तयोधिनः ॥
saṃbandhī vāsudevaśca śyālāḥ sarve ca pārṣatāḥ | te hi sarve naravyāghrāḥ śūrā vikrāntayodhinaḥ
"वासुदेव उनके सम्बन्धी हैं और पृषतवंशी सब उनके साले हैं। वे सभी नरव्याघ्र, शूरवीर और पराक्रम से लड़ने वाले हैं।"
श्लोक 25 (3.10.25)
सर्वे नागायुतप्राणा वज्रसंहनना दृढाः । सत्यव्रतधराः सर्वे सर्वे पुरुषमानिनः ॥
sarve nāgāyutaprāṇā vajrasaṃhananā dṛḍhāḥ | satyavratadharāḥ sarve sarve puruṣamāninaḥ
"उन सबमें दस हज़ार हाथियों का बल है, उनके शरीर वज्र के समान दृढ़ हैं; सभी सत्यव्रत के धारक हैं और सभी को अपने पौरुष पर गर्व है।"
श्लोक 26 (3.10.26)
हन्तारो देवशत्रूणां रक्षसां कामरूपिणाम् । हिडिम्बबकमुख्यानां किर्मीरस्य च रक्षसः । कस्तान्युधि समासीत जरामरणवान्नरः ॥
hantāro devaśatrūṇāṃ rakṣasāṃ kāmarūpiṇām | hiḍimbabakamukhyānāṃ kirmīrasya ca rakṣasaḥ | kastānyudhi samāsīta jarāmaraṇavānnaraḥ
"वे देवताओं के शत्रुओं के, इच्छानुसार रूप धारण करने वाले राक्षसों के — जिनमें हिडिम्ब और बक प्रमुख थे — तथा राक्षस किर्मीर के संहारक हैं। जरा और मृत्यु के अधीन कौन मनुष्य युद्ध में उनका सामना कर सकता है?"
श्लोक 27 (3.10.27)
तस्य ते शम एवास्तु पाण्डवैर्भरतर्षभ । कुरु मे वचनं राजन्मा मृत्युवशमन्वगाः ॥
tasya te śama evāstu pāṇḍavairbharatarṣabha | kuru me vacanaṃ rājanmā mṛtyuvaśamanvagāḥ
"इसलिए हे भरतश्रेष्ठ, पाण्डवों के साथ तुम्हारी सन्धि ही हो। राजन्, मेरी बात मानो; मृत्यु के वश में मत पड़ो।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 28 (3.10.28)
एवं तु ब्रुवतस्तस्य मैत्रेयस्य विशांपते । ऊरुं करिकराकारं करेणाभिजघान सः ॥
evaṃ tu bruvatastasya maitreyasya viśāṃpate | ūruṃ karikarākāraṃ kareṇābhijaghāna saḥ
हे प्रजानाथ, मैत्रेय जब इस प्रकार कह रहे थे, तब दुर्योधन ने हाथी की सूँड़ जैसी अपनी जाँघ पर हाथ से थपकी मारी।
श्लोक 29 (3.10.29)
दुर्योधनः स्मितं कृत्वा चरणेनोल्लिखन्महीम् । न किंचिदुक्त्वा दुर्मेधास्तस्थौ किंचिदवाङ्मुखः ॥
duryodhanaḥ smitaṃ kṛtvā caraṇenollikhanmahīm | na kiṃciduktvā durmedhāstasthau kiṃcidavāṅmukhaḥ
दुर्योधन मुस्कराया और पैर से धरती कुरेदने लगा; वह दुर्बुद्धि कुछ भी न कहकर थोड़ा मुँह नीचा किए खड़ा रहा।
श्लोक 30 (3.10.30)
तमशुश्रूषमाणं तु विलिखन्तं वसुंधराम् । दृष्ट्वा दुर्योधनं राजन्मैत्रेयं कोप आविशत् ॥
tamaśuśrūṣamāṇaṃ tu vilikhantaṃ vasuṃdharām | dṛṣṭvā duryodhanaṃ rājanmaitreyaṃ kopa āviśat
राजन्, दुर्योधन को बात अनसुनी करते और धरती कुरेदते देखकर मैत्रेय को क्रोध आ गया।
श्लोक 31 (3.10.31)
स कोपवशमापन्नो मैत्रेयो मुनिसत्तमः । विधिना संप्रयुक्तश्च शापायास्य मनो दधे ॥
sa kopavaśamāpanno maitreyo munisattamaḥ | vidhinā saṃprayuktaśca śāpāyāsya mano dadhe
क्रोध के वश में होकर और विधाता से प्रेरित होकर मुनिश्रेष्ठ मैत्रेय ने उसे शाप देने का निश्चय किया।
श्लोक 32 (3.10.32)
ततः स वार्युपस्पृश्य कोपसंरक्तलोचनः । मैत्रेयो धार्तराष्ट्रं तमशपद्दुष्टचेतसम् ॥
tataḥ sa vāryupaspṛśya kopasaṃraktalocanaḥ | maitreyo dhārtarāṣṭraṃ tamaśapadduṣṭacetasam
तब क्रोध से लाल आँखों वाले मैत्रेय ने जल का स्पर्श किया और उस दुष्टचित्त धृतराष्ट्रपुत्र को शाप दिया —
मैत्रेय उवाच
श्लोक 33 (3.10.33)
यस्मात्त्वं मामनादृत्य नेमां वाचं चिकीर्षसि । तस्मादस्यातिमानस्य सद्यः फलमवाप्स्यसि ॥
yasmāttvaṃ māmanādṛtya nemāṃ vācaṃ cikīrṣasi | tasmādasyātimānasya sadyaḥ phalamavāpsyasi
"क्योंकि तुम मेरा अनादर करके मेरी बात मानना नहीं चाहते, इसलिए इस अहंकार का फल तुम्हें शीघ्र ही मिलेगा।"
श्लोक 34 (3.10.34)
त्वदभिद्रोहसंयुक्तं युद्धमुत्पत्स्यते महत् । यत्र भीमो गदाघातैस्तवोरुं भेत्स्यते बली ॥
tvadabhidrohasaṃyuktaṃ yuddhamutpatsyate mahat | yatra bhīmo gadāghātaistavoruṃ bhetsyate balī
"तुम्हारे द्रोह के कारण एक महान् युद्ध छिड़ेगा, जिसमें बलवान भीम अपनी गदा के प्रहारों से तुम्हारी जाँघ तोड़ देगा।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 35 (3.10.35)
इत्येवमुक्ते वचने धृतराष्ट्रो महीपतिः । प्रसादयामास मुनिं नैतदेवं भवेदिति ॥
ityevamukte vacane dhṛtarāṣṭro mahīpatiḥ | prasādayāmāsa muniṃ naitadevaṃ bhavediti
यह वचन कहे जाने पर पृथ्वीपति राजा धृतराष्ट्र ने मुनि को प्रसन्न करने का प्रयत्न किया और कहा — "ऐसा न हो!"
मैत्रेय उवाच
श्लोक 36 (3.10.36)
शमं यास्यति चेत्पुत्रस्तव राजन्यदा तदा । शापो न भविता तात विपरीते भविष्यति ॥
śamaṃ yāsyati cetputrastava rājanyadā tadā | śāpo na bhavitā tāta viparīte bhaviṣyati
"राजन्, तुम्हारा पुत्र जब कभी भी सन्धि कर ले, तो वत्स, यह शाप नहीं लगेगा; अन्यथा अवश्य फलेगा।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 37 (3.10.37)
सविलक्षस्तु राजेन्द्रो दुर्योधनपिता तदा । मैत्रेयं प्राह किर्मीरः कथं भीमेन पातितः ॥
savilakṣastu rājendro duryodhanapitā tadā | maitreyaṃ prāha kirmīraḥ kathaṃ bhīmena pātitaḥ
तब कुछ लज्जित होकर दुर्योधन के पिता राजेन्द्र धृतराष्ट्र ने मैत्रेय से पूछा कि भीम ने किर्मीर को कैसे मारा।
मैत्रेय उवाच
श्लोक 38 (3.10.38)
नाहं वक्ष्याम्यसूया ते न ते शुश्रूषते सुतः । एष ते विदुरः सर्वमाख्यास्यति गते मयि ॥
nāhaṃ vakṣyāmyasūyā te na te śuśrūṣate sutaḥ | eṣa te viduraḥ sarvamākhyāsyati gate mayi
"मैं नहीं बताऊँगा, क्योंकि तुम्हारे मन में दुर्भाव है और तुम्हारा पुत्र सुनना नहीं चाहता। मेरे जाने के बाद ये विदुर तुम्हें सब बता देंगे।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 39 (3.10.39)
इत्येवमुक्त्वा मैत्रेयः प्रातिष्ठत यथागतम् । किर्मीरवधसंविग्नो भयं दुर्योधनो ययौ ॥
ityevamuktvā maitreyaḥ prātiṣṭhata yathāgatam | kirmīravadhasaṃvigno bhayaṃ duryodhano yayau
यह कहकर मैत्रेय जैसे आए थे वैसे ही चले गए, और किर्मीर-वध से घबराया हुआ दुर्योधन भय से भर गया।