आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 11
भीम द्वारा किर्मीर का वध
धृतराष्ट्र विदुर से पूछते हैं कि भीम ने किर्मीर राक्षस को कैसे मारा। विदुर बताते हैं कि हस्तिनापुर से निकलने के तीन दिन बाद आधी रात को काम्यक वन में प्रवेश करते पाण्डवों का मार्ग किर्मीर ने रोक लिया, जो बक का भाई और हिडिम्ब का मित्र था और उनका बदला लेने के लिए भीम को खा जाना चाहता था। धौम्य द्वारा उसकी माया नष्ट कर दिए जाने के बाद भीम ने वृक्षों, शिला और भुजाओं से उससे युद्ध करके उसका गला घोंट दिया, और पाण्डव निष्कंटक हुए वन में रहने लगे। विदुर कहते हैं कि उन्होंने स्वयं उसका शव देखा और ब्राह्मणों से यह कथा सुनी; यह सुनकर धृतराष्ट्र दुःख से लंबी साँस लेते हैं।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 1 (3.11.1)
किर्मीरस्य वधं क्षत्तः श्रोतुमिच्छामि कथ्यताम् । रक्षसा भीमसेनस्य कथमासीत्समागमः ॥
kirmīrasya vadhaṃ kṣattaḥ śrotumicchāmi kathyatām | rakṣasā bhīmasenasya kathamāsītsamāgamaḥ
"हे क्षत्ता, मैं किर्मीर के वध का वृत्तान्त सुनना चाहता हूँ; कहो। उस राक्षस से भीमसेन का सामना कैसे हुआ?"
विदुर उवाच
श्लोक 2 (3.11.2)
शृणु भीमस्य कर्मेदमतिमानुषकर्मणः । श्रुतपूर्वं मया तेषां कथान्तेषु पुनः पुनः ॥
śṛṇu bhīmasya karmedamatimānuṣakarmaṇaḥ | śrutapūrvaṃ mayā teṣāṃ kathānteṣu punaḥ punaḥ
मनुष्यों से बढ़कर पराक्रम करने वाले भीम का यह कर्म सुनो। यह मैंने उन लोगों की कथाओं के बीच बार-बार सुना है।
श्लोक 3 (3.11.3)
इतः प्रयाता राजेन्द्र पाण्डवा द्यूतनिर्जिताः । जग्मुस्त्रिभिरहोरात्रैः काम्यकं नाम तद्वनम् ॥
itaḥ prayātā rājendra pāṇḍavā dyūtanirjitāḥ | jagmustribhirahorātraiḥ kāmyakaṃ nāma tadvanam
हे राजेन्द्र, जुए में हारकर यहाँ से निकले पाण्डव तीन दिन और तीन रातें चलकर काम्यक नामक वन में पहुँचे।
श्लोक 4 (3.11.4)
रात्रौ निशीथे त्वाभीले गतेऽर्धसमये नृप । प्रचारे पुरुषादानां रक्षसां घोरकर्मणाम् ॥
rātrau niśīthe tvābhīle gate'rdhasamaye nṛpa | pracāre puruṣādānāṃ rakṣasāṃ ghorakarmaṇām
हे राजन्, रात का समय था, आधी रात का भयानक पहर, जब भयंकर कर्म करने वाले नरभक्षी राक्षस घूमने निकलते हैं।
श्लोक 5 (3.11.5)
तद्वनं तापसा नित्यमशेषा वनचारिणः । दूरात्परिहरन्ति स्म पुरुषादभयात्किल ॥
tadvanaṃ tāpasā nityamaśeṣā vanacāriṇaḥ | dūrātpariharanti sma puruṣādabhayātkila
कहते हैं कि तपस्वी और सभी वनवासी उन नरभक्षियों के भय से उस वन से सदा दूर ही रहते थे।
श्लोक 6 (3.11.6)
तेषां प्रविशतां तत्र मार्गमावृत्य भारत । दीप्ताक्षं भीषणं रक्षः सोल्मुकं प्रत्यपद्यत ॥
teṣāṃ praviśatāṃ tatra mārgamāvṛtya bhārata | dīptākṣaṃ bhīṣaṇaṃ rakṣaḥ solmukaṃ pratyapadyata
हे भारत, जब वे उसमें प्रवेश कर रहे थे, तब जलती आँखों वाला एक भीषण राक्षस हाथ में जलती लकड़ी लिए उनका मार्ग रोककर उनके सामने आ पहुँचा।
श्लोक 7 (3.11.7)
बाहू महान्तौ कृत्वा च तथास्यं च भयानकम् । स्थितमावृत्य पन्थानं येन यान्ति कुरूद्वहाः ॥
bāhū mahāntau kṛtvā ca tathāsyaṃ ca bhayānakam | sthitamāvṛtya panthānaṃ yena yānti kurūdvahāḥ
अपनी विशाल भुजाएँ फैलाकर और भयानक मुँह खोलकर वह उस मार्ग को रोककर खड़ा हो गया जिससे कुरुवंश के वीर जा रहे थे।
श्लोक 8 (3.11.8)
दष्टोष्ठदंष्ट्रं ताम्राक्षं प्रदीप्तोर्ध्वशिरोरुहम् । सार्करश्मितडिच्चक्रं सबलाकमिवाम्बुदम् ॥
daṣṭoṣṭhadaṃṣṭraṃ tāmrākṣaṃ pradīptordhvaśiroruham | sārkaraśmitaḍiccakraṃ sabalākamivāmbudam
उसके दाँत होंठ पर गड़े थे, आँखें ताँबे जैसी लाल थीं और बाल ज्वाला की तरह ऊपर खड़े थे; वह बगुलों की पाँत वाले उस बादल जैसा लगता था जिसके चारों ओर बिजली और सूर्य की किरणें घिरी हों।
श्लोक 9 (3.11.9)
सृजन्तं राक्षसीं मायां महानादनिनादितम् । मुञ्चन्तं विपुलान्नादान्सतोयमिव तोयदम् ॥
sṛjantaṃ rākṣasīṃ māyāṃ mahānādanināditam | muñcantaṃ vipulānnādānsatoyamiva toyadam
वह राक्षसी माया रचता हुआ, बड़े-बड़े गर्जनों से वन को गुँजाता हुआ, जल से भरे बादल की तरह भारी नाद छोड़ रहा था।
श्लोक 10 (3.11.10)
तस्य नादेन संत्रस्ताः पक्षिणः सर्वतोदिशम् । विमुक्तनादाः संपेतुः स्थलजा जलजैः सह ॥
tasya nādena saṃtrastāḥ pakṣiṇaḥ sarvatodiśam | vimuktanādāḥ saṃpetuḥ sthalajā jalajaiḥ saha
उसके गर्जन से डरकर चारों ओर के पक्षी, थल के भी और जल के भी, चहचहाना छोड़कर उड़ भागे।
श्लोक 11 (3.11.11)
संप्रद्रुतमृगद्वीपिमहिषर्क्षसमाकुलम् । तद्वनं तस्य नादेन संप्रस्थितमिवाभवत् ॥
saṃpradrutamṛgadvīpimahiṣarkṣasamākulam | tadvanaṃ tasya nādena saṃprasthitamivābhavat
भागते हुए हिरनों, तेंदुओं, भैंसों और भालुओं से भरा वह वन उसके गर्जन से मानो अपनी जगह से चल पड़ा।
श्लोक 12 (3.11.12)
तस्योरुवाताभिहतास्ताम्रपल्लवबाहवः । विदूरजाताश्च लताः समाश्लिष्यन्ति पादपान् ॥
tasyoruvātābhihatāstāmrapallavabāhavaḥ | vidūrajātāśca latāḥ samāśliṣyanti pādapān
उसकी जाँघों की हवा के झोंके से दूर-दूर उगी लताएँ अपने ताँबई कोंपलों की भुजाओं से वृक्षों से लिपट गईं।
श्लोक 13 (3.11.13)
तस्मिन्क्षणेऽथ प्रववौ मारुतो भृशदारुणः । रजसा संवृतं तेन नष्टर्क्षमभवन्नभः ॥
tasminkṣaṇe'tha pravavau māruto bhṛśadāruṇaḥ | rajasā saṃvṛtaṃ tena naṣṭarkṣamabhavannabhaḥ
उसी क्षण बड़ी प्रचण्ड आँधी चली, और उसकी उड़ाई धूल से ढका आकाश तारों से रहित हो गया।
श्लोक 14 (3.11.14)
पञ्चानां पाण्डुपुत्राणामविज्ञातो महारिपुः । पञ्चानामिन्द्रियाणां तु शोकावेश इवातुलः ॥
pañcānāṃ pāṇḍuputrāṇāmavijñāto mahāripuḥ | pañcānāmindriyāṇāṃ tu śokāveśa ivātulaḥ
जैसे पाँचों इन्द्रियों पर अचानक अपार शोक का आवेग टूट पड़े, वैसे ही वह महाशत्रु बिना जाने-पहचाने पाँचों पाण्डुपुत्रों के सामने आ गया।
श्लोक 15 (3.11.15)
स दृष्ट्वा पाण्डवान्दूरात्कृष्णाजिनसमावृतान् । आवृणोत्तद्वनद्वारं मैनाक इव पर्वतः ॥
sa dṛṣṭvā pāṇḍavāndūrātkṛṣṇājinasamāvṛtān | āvṛṇottadvanadvāraṃ maināka iva parvataḥ
काले मृगचर्म ओढ़े पाण्डवों को दूर से देखकर उसने मैनाक पर्वत की तरह वन का द्वार रोक लिया।
श्लोक 16 (3.11.16)
तं समासाद्य वित्रस्ता कृष्णा कमललोचना । अदृष्टपूर्वं संत्रासान्न्यमीलयत लोचने ॥
taṃ samāsādya vitrastā kṛṣṇā kamalalocanā | adṛṣṭapūrvaṃ saṃtrāsānnyamīlayata locane
उसके सामने आते ही कमलनयनी कृष्णा (द्रौपदी) डर गई; ऐसा दृश्य उसने पहले कभी नहीं देखा था, इसलिए भय से उसने आँखें मूँद लीं।
श्लोक 17 (3.11.17)
दुःशासनकरोत्सृष्टविप्रकीर्णशिरोरुहा । पञ्चपर्वतमध्यस्था नदीवाकुलतां गता ॥
duḥśāsanakarotsṛṣṭaviprakīrṇaśiroruhā | pañcaparvatamadhyasthā nadīvākulatāṃ gatā
दुःशासन के हाथ से खुले उसके बाल बिखरे हुए थे; पाँचों के बीच खड़ी वह पाँच पर्वतों के बीच व्याकुल होती नदी जैसी लग रही थी।
श्लोक 18 (3.11.18)
विमुह्यमानां तां तत्र जगृहुः पञ्च पाण्डवाः । इन्द्रियाणि प्रसक्तानि विषयेषु यथारतिम् ॥
vimuhyamānāṃ tāṃ tatra jagṛhuḥ pañca pāṇḍavāḥ | indriyāṇi prasaktāni viṣayeṣu yathāratim
वहाँ मूर्च्छित होती द्रौपदी को पाँचों पाण्डवों ने थाम लिया, जैसे विषयों में आसक्त पाँचों इन्द्रियाँ अपने प्रिय विषय को पकड़े रहती हैं।
श्लोक 19 (3.11.19)
अथ तां राक्षसीं मायामुत्थितां घोरदर्शनाम् । रक्षोघ्नैर्विविधैर्मन्त्रैर्धौम्यः सम्यक्प्रयोजितैः । पश्यतां पाण्डुपुत्राणां नाशयामास वीर्यवान् ॥
atha tāṃ rākṣasīṃ māyāmutthitāṃ ghoradarśanām | rakṣoghnairvividhairmantrairdhaumyaḥ samyakprayojitaiḥ | paśyatāṃ pāṇḍuputrāṇāṃ nāśayāmāsa vīryavān
तब पराक्रमी धौम्य ने राक्षसों का नाश करने वाले अनेक मन्त्रों का विधिपूर्वक प्रयोग करके, पाण्डुपुत्रों के देखते-देखते, उठी हुई उस भयानक राक्षसी माया को नष्ट कर दिया।
श्लोक 20 (3.11.20)
स नष्टमायोऽतिबलः क्रोधविस्फारितेक्षणः । काममूर्तिधरः क्रूरः कालकल्पो व्यदृश्यत ॥
sa naṣṭamāyo'tibalaḥ krodhavisphāritekṣaṇaḥ | kāmamūrtidharaḥ krūraḥ kālakalpo vyadṛśyata
माया नष्ट होने पर वह अत्यन्त बलवान, इच्छानुसार रूप धारण करने वाला क्रूर राक्षस क्रोध से आँखें फाड़े, साक्षात् काल के समान दिखाई दिया।
श्लोक 21 (3.11.21)
तमुवाच ततो राजा दीर्घप्रज्ञो युधिष्ठिरः । को भवान्कस्य वा किं ते क्रियतां कार्यमुच्यताम् ॥
tamuvāca tato rājā dīrghaprajño yudhiṣṭhiraḥ | ko bhavānkasya vā kiṃ te kriyatāṃ kāryamucyatām
तब दूरदर्शी बुद्धि वाले राजा युधिष्ठिर ने उससे कहा — "तुम कौन हो, किसके पुत्र हो? तुम क्या चाहते हो? बताओ, तुम्हारे लिए क्या किया जाए?"
श्लोक 22 (3.11.22)
प्रत्युवाचाथ तद्रक्षो धर्मराजं युधिष्ठिरम् । अहं बकस्य वै भ्राता किर्मीर इति विश्रुतः ॥
pratyuvācātha tadrakṣo dharmarājaṃ yudhiṣṭhiram | ahaṃ bakasya vai bhrātā kirmīra iti viśrutaḥ
उस राक्षस ने धर्मराज युधिष्ठिर को उत्तर दिया — "मैं बक का भाई हूँ और किर्मीर नाम से प्रसिद्ध हूँ।
किर्मीर उवाच
श्लोक 23 (3.11.23)
वनेऽस्मिन्काम्यके शून्ये निवसामि गतज्वरः । युधि निर्जित्य पुरुषानाहारं नित्यमाचरन् ॥
vane'sminkāmyake śūnye nivasāmi gatajvaraḥ | yudhi nirjitya puruṣānāhāraṃ nityamācaran
मैं इस सूने काम्यक वन में निश्चिन्त होकर रहता हूँ, और युद्ध में मनुष्यों को हराकर सदा उन्हें अपना आहार बनाता हूँ।
श्लोक 24 (3.11.24)
के यूयमभिसंप्राप्ता भक्ष्यभूता ममान्तिकम् । युधि निर्जित्य वः सर्वान्भक्षयिष्ये गतज्वरः ॥
ke yūyamabhisaṃprāptā bhakṣyabhūtā mamāntikam | yudhi nirjitya vaḥ sarvānbhakṣayiṣye gatajvaraḥ
तुम कौन हो जो मेरा भोजन बनने मेरे पास आ पहुँचे हो? मैं युद्ध में तुम सबको हराकर निश्चिन्त होकर खा जाऊँगा।"
विदुर उवाच
श्लोक 25 (3.11.25)
युधिष्ठिरस्तु तच्छ्रुत्वा वचस्तस्य दुरात्मनः । आचचक्षे ततः सर्वं गोत्रनामादि भारत ॥
yudhiṣṭhirastu tacchrutvā vacastasya durātmanaḥ | ācacakṣe tataḥ sarvaṃ gotranāmādi bhārata
हे भारत, उस दुष्टात्मा की यह बात सुनकर युधिष्ठिर ने उसे अपना गोत्र, नाम आदि सब कुछ बता दिया।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 26 (3.11.26)
पाण्डवो धर्मराजोऽहं यदि ते श्रोत्रमागतः । सहितो भ्रातृभिः सर्वैर्भीमसेनार्जुनादिभिः ॥
pāṇḍavo dharmarājo'haṃ yadi te śrotramāgataḥ | sahito bhrātṛbhiḥ sarvairbhīmasenārjunādibhiḥ
"मैं पाण्डुपुत्र धर्मराज हूँ, यदि तुमने मेरा नाम सुना हो; मेरे साथ भीमसेन, अर्जुन आदि मेरे सब भाई हैं।
श्लोक 27 (3.11.27)
हृतराज्यो वने वासं वस्तुं कृतमतिस्ततः । वनमभ्यागतो घोरमिदं तव परिग्रहम् ॥
hṛtarājyo vane vāsaṃ vastuṃ kṛtamatistataḥ | vanamabhyāgato ghoramidaṃ tava parigraham
राज्य छिन जाने पर मैंने वन में रहने का निश्चय किया, और इसीलिए तुम्हारे अधिकार वाले इस भयानक वन में आया हूँ।"
विदुर उवाच
श्लोक 28 (3.11.28)
विस्मयं परमं गत्वा राक्षसो घोरदर्शनः । किर्मीरस्त्वब्रवीदेनं दिष्ट्या देवैरिदं मम । उपपादितमद्येह चिरकालान्मनोरथम् ॥
vismayaṃ paramaṃ gatvā rākṣaso ghoradarśanaḥ | kirmīrastvabravīdenaṃ diṣṭyā devairidaṃ mama | upapāditamadyeha cirakālānmanoratham
यह सुनकर अत्यन्त विस्मित हुए उस भयानक रूप वाले राक्षस किर्मीर ने उनसे कहा — "सौभाग्य से देवताओं ने आज यहाँ मेरी बहुत दिनों की अभिलाषा पूरी कर दी है।
किर्मीर उवाच
श्लोक 29 (3.11.29)
भीमसेनवधार्थं हि नित्यमभ्युद्यतायुधः । चरामि पृथिवीं कृत्स्नां नैनं चासादयाम्यहम् ॥
bhīmasenavadhārthaṃ hi nityamabhyudyatāyudhaḥ | carāmi pṛthivīṃ kṛtsnāṃ nainaṃ cāsādayāmyaham
भीमसेन को मारने के लिए मैं सदा शस्त्र उठाए सारी पृथ्वी पर घूमता हूँ, पर वह मुझे कभी मिला नहीं।
श्लोक 30 (3.11.30)
सोऽयमासादितो दिष्ट्या भ्रातृहा काङ्क्षितश्चिरम् । अनेन हि मम भ्राता बको विनिहतः प्रियः ॥
so'yamāsādito diṣṭyā bhrātṛhā kāṅkṣitaściram | anena hi mama bhrātā bako vinihataḥ priyaḥ
और आज सौभाग्य से वह मेरे भाई का हत्यारा मिल गया है, जिसे मैं बहुत दिनों से ढूँढ रहा था; इसी ने मेरे प्रिय भाई बक को मारा था,
श्लोक 31 (3.11.31)
वैत्रकीयवने राजन्ब्राह्मणच्छद्मरूपिणा । विद्याबलमुपाश्रित्य न ह्यस्त्यस्यौरसं बलम् ॥
vaitrakīyavane rājanbrāhmaṇacchadmarūpiṇā | vidyābalamupāśritya na hyastyasyaurasaṃ balam
हे राजन्, वैत्रकीय वन में ब्राह्मण का छद्मवेश धरकर, विद्या के बल का सहारा लेकर; इसमें अपना कोई बल नहीं है।
श्लोक 32 (3.11.32)
हिडिम्बश्च सखा मह्यं दयितो वनगोचरः । हतो दुरात्मनाऽनेन स्वसा चास्य हृता पुरा ॥
hiḍimbaśca sakhā mahyaṃ dayito vanagocaraḥ | hato durātmanā'nena svasā cāsya hṛtā purā
वन में विचरने वाला मेरा प्रिय मित्र हिडिम्ब भी पहले इसी दुष्टात्मा के हाथों मारा गया था, और इसने उसकी बहन का हरण कर लिया था।
श्लोक 33 (3.11.33)
सोऽयमभ्यागतो मूढो ममेदं गहनं वनम् । प्रचारसमयेऽस्माकमर्द्धरात्रे स्थिते समे ॥
so'yamabhyāgato mūḍho mamedaṃ gahanaṃ vanam | pracārasamaye'smākamarddharātre sthite same
अब यह मूर्ख ठीक आधी रात को, जब हमारे घूमने का समय होता है, मेरे इस घने वन में आ गया है।
श्लोक 34 (3.11.34)
अद्यास्य यातयिष्यामि तद्वैरं चिरसंभृतम् । तर्पयिष्यामि च बकं रुधिरेणास्य भूरिणा ॥
adyāsya yātayiṣyāmi tadvairaṃ cirasaṃbhṛtam | tarpayiṣyāmi ca bakaṃ rudhireṇāsya bhūriṇā
आज मैं इससे वह बहुत दिनों से संचित वैर चुकाऊँगा, और इसके भरपूर रक्त से बक को तृप्त करूँगा।
श्लोक 35 (3.11.35)
अद्याहमनृणो भूत्वा भ्रातुः सख्युस्तथैव च । शान्तिं लब्धास्मि परमां हत्वा राक्षसकण्टकम् ॥
adyāhamanṛṇo bhūtvā bhrātuḥ sakhyustathaiva ca | śāntiṃ labdhāsmi paramāṃ hatvā rākṣasakaṇṭakam
आज राक्षसों के इस काँटे को मारकर मैं अपने भाई और मित्र के ऋण से मुक्त हो जाऊँगा और परम शान्ति पाऊँगा।
श्लोक 36 (3.11.36)
यदि तेन पुरा मुक्तो भीमसेनो बकेन वै । अद्यैनं भक्षयिष्यामि पश्यतस्ते युधिष्ठिर ॥
yadi tena purā mukto bhīmaseno bakena vai | adyainaṃ bhakṣayiṣyāmi paśyataste yudhiṣṭhira
यदि पहले बक ने भीमसेन को छोड़ दिया था, तो आज, हे युधिष्ठिर, मैं तुम्हारे देखते-देखते इसे खा जाऊँगा।
श्लोक 37 (3.11.37)
एनं हि विपुलप्राणमद्य हत्वा वृकोदरम् । संभक्ष्य जरयिष्यामि यथाऽगस्त्यो महासुरम् ॥
enaṃ hi vipulaprāṇamadya hatvā vṛkodaram | saṃbhakṣya jarayiṣyāmi yathā'gastyo mahāsuram
आज मैं इस महाबली वृकोदर को मारकर खा जाऊँगा और पचा डालूँगा, जैसे अगस्त्य ने महासुर वातापि को पचा डाला था।"
विदुर उवाच
श्लोक 38 (3.11.38)
एवमुक्तस्तु धर्मात्मा सत्यसन्धो युधिष्ठिरः । नैतदस्तीति सक्रोधो भर्त्सयामास राक्षसम् ॥
evamuktastu dharmātmā satyasandho yudhiṣṭhiraḥ | naitadastīti sakrodho bhartsayāmāsa rākṣasam
यह सुनकर सत्यप्रतिज्ञ धर्मात्मा युधिष्ठिर ने क्रोधपूर्वक "ऐसा नहीं होगा" कहकर राक्षस को फटकारा।
श्लोक 39 (3.11.39)
ततो भीमो महाबाहुरारुज्य तरसा द्रुमम् । दशव्याममथोद्विद्धं निष्पत्रमकरोत्तदा ॥
tato bhīmo mahābāhurārujya tarasā drumam | daśavyāmamathodviddhaṃ niṣpatramakarottadā
तब महाबाहु भीम ने वेग से दस व्याम (पुरसा) ऊँचा एक वृक्ष तोड़कर उखाड़ लिया और उसे पत्तों से रहित कर दिया।
श्लोक 40 (3.11.40)
चकार सज्यं गाण्डीवं वज्रनिष्पेषगौरवम् । निमेषान्तरमात्रेण तथैव विजयोऽर्जुनः ॥
cakāra sajyaṃ gāṇḍīvaṃ vajraniṣpeṣagauravam | nimeṣāntaramātreṇa tathaiva vijayo'rjunaḥ
उतनी ही देर में, पलक झपकते ही, विजयी अर्जुन ने वज्र के प्रहार जैसे भारी गाण्डीव पर डोरी चढ़ा ली।
श्लोक 41 (3.11.41)
निवार्य भीमो जिष्णुं तं तद्रक्षो मेघनिःस्वनम् । अभिद्रुत्याब्रवीद्वाक्यं तिष्ठतिष्ठेति भारत ॥
nivārya bhīmo jiṣṇuṃ taṃ tadrakṣo meghaniḥsvanam | abhidrutyābravīdvākyaṃ tiṣṭhatiṣṭheti bhārata
हे भारत, जिष्णु (अर्जुन) को रोककर भीम मेघ जैसे गर्जन वाले उस राक्षस पर झपटे और बोले — "ठहर! ठहर!"
श्लोक 42 (3.11.42)
इत्युक्त्वैनमतिक्रुद्धः कक्ष्यामुत्पीड्य पाण्डवः । निष्पिष्य पाणिना पाणिं संदष्टौष्ठपुटो बली । तमभ्यधावद्वेगेन भीमो वृक्षायुधस्तदा ॥
ityuktvainamatikruddhaḥ kakṣyāmutpīḍya pāṇḍavaḥ | niṣpiṣya pāṇinā pāṇiṃ saṃdaṣṭauṣṭhapuṭo balī | tamabhyadhāvadvegena bhīmo vṛkṣāyudhastadā
यह कहकर अत्यन्त क्रुद्ध बलवान पाण्डुपुत्र ने अपनी कमर कसी, हाथ से हाथ मसला और होंठ चबाए; फिर वृक्ष को ही शस्त्र बनाकर भीम वेग से उस पर टूट पड़े।
श्लोक 43 (3.11.43)
यमदण्डप्रतीकाशं ततस्तं तस्य मूर्धनि । पातयामास वेगेन कुलिशं मघवानिव ॥
yamadaṇḍapratīkāśaṃ tatastaṃ tasya mūrdhani | pātayāmāsa vegena kuliśaṃ maghavāniva
फिर उन्होंने यमदण्ड जैसा वह वृक्ष, जैसे इन्द्र वज्र गिराते हैं, वैसे ही वेग से उसके सिर पर दे मारा।
श्लोक 44 (3.11.44)
असंभ्रान्तं तु तद्रक्षः समरे प्रत्यदृश्यत । चिक्षेप चोल्मुकं दीप्तमशनिं ज्वलितामिव ॥
asaṃbhrāntaṃ tu tadrakṣaḥ samare pratyadṛśyata | cikṣepa colmukaṃ dīptamaśaniṃ jvalitāmiva
पर वह राक्षस युद्ध में तनिक भी विचलित नहीं हुआ, और उसने जलते हुए वज्र जैसी अपनी धधकती लुकाठी फेंकी।
श्लोक 45 (3.11.45)
तदुदस्तमलातं तु भीमः प्रहरतां वरः । पदा सव्येन चिक्षेप तद्रक्षः पुनराव्रजत् ॥
tadudastamalātaṃ tu bhīmaḥ praharatāṃ varaḥ | padā savyena cikṣepa tadrakṣaḥ punarāvrajat
योद्धाओं में श्रेष्ठ भीम ने फेंकी हुई उस लुकाठी को बाएँ पैर से ठोकर मारकर उछाल दिया, और वह वापस राक्षस की ओर जा पड़ी।
श्लोक 46 (3.11.46)
किर्मीरश्चापि सहसा वृक्षमुत्पाट्य पाण्डवम् । दण्डपाणिरिव क्रुद्धः समरे प्रत्यधावत ॥
kirmīraścāpi sahasā vṛkṣamutpāṭya pāṇḍavam | daṇḍapāṇiriva kruddhaḥ samare pratyadhāvata
किर्मीर ने भी झट से एक वृक्ष उखाड़ लिया और दण्डधारी यम की तरह क्रुद्ध होकर युद्ध में पाण्डुपुत्र पर दौड़ पड़ा।
श्लोक 47 (3.11.47)
तद्वृक्षयुद्धमभवन्महीरुहविनाशनम् । वालिसुग्रीवयोर्भ्रात्रोर्यथा स्त्रीकाङ्क्षिणोः पुरा ॥
tadvṛkṣayuddhamabhavanmahīruhavināśanam | vālisugrīvayorbhrātroryathā strīkāṅkṣiṇoḥ purā
तब वृक्षों से ऐसा युद्ध हुआ जिसमें वन के वृक्ष नष्ट हो गए, जैसा पूर्वकाल में स्त्री की चाह रखने वाले भाई वाली और सुग्रीव के बीच हुआ था।
श्लोक 48 (3.11.48)
शीर्षयोः पतिता वृक्षा बिभिदुर्नैकधा तयोः । यथैवोत्पलपत्राणि मत्तयोर्द्विपयोस्तथा ॥
śīrṣayoḥ patitā vṛkṣā bibhidurnaikadhā tayoḥ | yathaivotpalapatrāṇi mattayordvipayostathā
उनके सिरों पर गिरे वृक्ष अनेक टुकड़ों में टूट गए, जैसे दो मतवाले हाथियों के सिरों पर कमल के पत्ते।
श्लोक 49 (3.11.49)
मूर्ध्नि जर्जरभूतास्तु बहवस्तत्र पादपाः । चीराणीव व्युदस्तानि रेजुस्तत्र महावने ॥
mūrdhni jarjarabhūtāstu bahavastatra pādapāḥ | cīrāṇīva vyudastāni rejustatra mahāvane
वहाँ उनके सिरों पर टूटकर जर्जर हुए बहुत-से वृक्ष छाल के चिथड़ों की तरह बिखरे पड़े थे और उस महावन में चमक रहे थे।
श्लोक 50 (3.11.50)
तद्वृक्षयुद्धमभवन्मुहूर्तं भरतर्षभ । राक्षसानां च मुख्यस्य नराणामुत्तमस्य च ॥
tadvṛkṣayuddhamabhavanmuhūrtaṃ bharatarṣabha | rākṣasānāṃ ca mukhyasya narāṇāmuttamasya ca
हे भरतश्रेष्ठ, राक्षसों के मुखिया और मनुष्यों में श्रेष्ठ भीम के बीच वह वृक्ष-युद्ध कुछ देर तक चलता रहा।
श्लोक 51 (3.11.51)
ततः शिलां समुत्क्षिप्य भीमस्य युधि तिष्ठतः । प्राहिणोद्राक्षसः क्रुद्धो भीमसेनश्चचाल ह ॥
tataḥ śilāṃ samutkṣipya bhīmasya yudhi tiṣṭhataḥ | prāhiṇodrākṣasaḥ kruddho bhīmasenaścacāla ha
फिर क्रुद्ध राक्षस ने एक शिला उठाकर युद्ध में डटे भीम पर फेंकी, और भीमसेन लड़खड़ा गए।
श्लोक 52 (3.11.52)
तं शिलाताडनजडं पर्यधावत राक्षसः । बाहुविक्षिप्तकिरणः स्वर्भानुरिव भास्करम् ॥
taṃ śilātāḍanajaḍaṃ paryadhāvata rākṣasaḥ | bāhuvikṣiptakiraṇaḥ svarbhānuriva bhāskaram
शिला की चोट से जड़ हुए भीम पर वह राक्षस भुजाएँ फैलाए वैसे ही झपटा, जैसे किरणों को बिखेरता हुआ स्वर्भानु (राहु) सूर्य पर झपटता है।
श्लोक 53 (3.11.53)
तावन्योन्यं समाश्लिष्य प्रकर्षन्तौ परस्परम् । उभावपि चकाशेते प्रवृद्धौ वृषभाविव ॥
tāvanyonyaṃ samāśliṣya prakarṣantau parasparam | ubhāvapi cakāśete pravṛddhau vṛṣabhāviva
एक-दूसरे से गुँथकर और एक-दूसरे को खींचते हुए वे दोनों दो बलवान साँड़ों जैसे शोभा पा रहे थे।
श्लोक 54 (3.11.54)
तयोरासीत्सुतुमुलः संप्रहारः सुदारुणः । नखदंष्ट्रायुधवतोर्व्याघ्रयोरिव दृप्तयोः ॥
tayorāsītsutumulaḥ saṃprahāraḥ sudāruṇaḥ | nakhadaṃṣṭrāyudhavatorvyāghrayoriva dṛptayoḥ
उन दोनों के बीच नखों और दाढ़ों से लड़ने वाले दो घमण्डी बाघों जैसी अत्यन्त भयंकर और घमासान भिड़न्त हुई।
श्लोक 55 (3.11.55)
दुर्योधननिकाराच्च बाहुवीर्याच्च दर्पितः । कृष्णानयनदृष्टश्च व्यवर्धत वृकोदरः ॥
duryodhananikārācca bāhuvīryācca darpitaḥ | kṛṣṇānayanadṛṣṭaśca vyavardhata vṛkodaraḥ
दुर्योधन के किए अपमान से उत्तेजित, अपनी भुजाओं के बल पर गर्वित और द्रौपदी की आँखों के सामने लड़ते हुए वृकोदर का बल और बढ़ गया।
श्लोक 56 (3.11.56)
अभिहत्याथ बाहुभ्यां प्रत्यगृह्णादमर्षितः । मातङ्गमिव मातङ्गः प्रभिन्नकरटामुखम् ॥
abhihatyātha bāhubhyāṃ pratyagṛhṇādamarṣitaḥ | mātaṅgamiva mātaṅgaḥ prabhinnakaraṭāmukham
क्रोध से भरे भीम ने दोनों भुजाओं से प्रहार करके उसे पकड़ लिया, जैसे एक हाथी मदजल बहाती कनपटियों वाले दूसरे हाथी को पकड़ ले।
श्लोक 57 (3.11.57)
स चाप्येनं ततो रक्षः प्रतिजग्राह वीर्यवान् । तमाक्षिपद्भीमसेनो बलेन बलिनां वरः ॥
sa cāpyenaṃ tato rakṣaḥ pratijagrāha vīryavān | tamākṣipadbhīmaseno balena balināṃ varaḥ
उस बलवान राक्षस ने भी उन्हें पकड़ लिया, पर बलवानों में श्रेष्ठ भीमसेन ने ज़ोर लगाकर उसे झटक दिया।
श्लोक 58 (3.11.58)
तयोर्भुजविनिष्पेषादुभयोर्बलिनोस्तदा । शब्दः समभवद्घोरो वेणुस्फोटसमो युधि ॥
tayorbhujaviniṣpeṣādubhayorbalinostadā | śabdaḥ samabhavadghoro veṇusphoṭasamo yudhi
उन दोनों बलवानों की भुजाओं के आपस में पिसने से युद्ध में बाँस फटने जैसा भयंकर शब्द हुआ।
श्लोक 59 (3.11.59)
अथैनमाक्षिप्य बलाद्गृह्य मध्ये वृकोदरः । धूनयामास वेगेन वायुश्चण्ड इव द्रुमम् ॥
athainamākṣipya balādgṛhya madhye vṛkodaraḥ | dhūnayāmāsa vegena vāyuścaṇḍa iva drumam
फिर वृकोदर ने उसे झटककर बलपूर्वक कमर से पकड़ लिया और वेग से वैसे झकझोरा जैसे प्रचण्ड वायु किसी वृक्ष को झकझोरती है।
श्लोक 60 (3.11.60)
स भीमेन परामृष्टो दुर्बलो बलिनां रणे । व्यस्पन्दत यथाप्राणं विचकर्ष च पाण्डवम् ॥
sa bhīmena parāmṛṣṭo durbalo balināṃ raṇe | vyaspandata yathāprāṇaṃ vicakarṣa ca pāṇḍavam
भीम की पकड़ में आया वह राक्षस, जो उन दोनों बलवानों में दुर्बल था, पूरी शक्ति से छटपटाया और पाण्डुपुत्र को खींचने लगा।
श्लोक 61 (3.11.61)
तत एनं परिश्रान्तमुपलक्ष्य वृकोदरः । योक्त्रयामास बाहुभ्यां पशुं रशनया यथा ॥
tata enaṃ pariśrāntamupalakṣya vṛkodaraḥ | yoktrayāmāsa bāhubhyāṃ paśuṃ raśanayā yathā
फिर उसे थका हुआ देखकर वृकोदर ने अपनी भुजाओं से उसे वैसे ही जकड़ लिया जैसे पशु को रस्सी से बाँधा जाता है।
श्लोक 62 (3.11.62)
विनदन्तं महानादं भिन्नभेरीस्वनं बली । भ्रामयामास सुचिरं विस्फुरन्तमचेतसम् ॥
vinadantaṃ mahānādaṃ bhinnabherīsvanaṃ balī | bhrāmayāmāsa suciraṃ visphurantamacetasam
फटे नगाड़े जैसी आवाज़ में ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाते, छटपटाते और अचेत होते उस राक्षस को बलवान भीम बहुत देर तक घुमाते रहे।
श्लोक 63 (3.11.63)
तं विषीदन्तमाज्ञाय राक्षसं पाण्डुनन्दनः । प्रगृह्य तरसा दोर्भ्यां पशुमारममारयत् ॥
taṃ viṣīdantamājñāya rākṣasaṃ pāṇḍunandanaḥ | pragṛhya tarasā dorbhyāṃ paśumāramamārayat
राक्षस को शिथिल पड़ता जानकर पाण्डुनन्दन ने उसे वेग से दोनों भुजाओं में पकड़कर पशु की तरह मार डाला।
श्लोक 64 (3.11.64)
आक्रम्य च कटीदेशे जानुना राक्षसाधमम् । पीडयामास पाणिभ्यां तस्य कण्ठं वृकोदरः ॥
ākramya ca kaṭīdeśe jānunā rākṣasādhamam | pīḍayāmāsa pāṇibhyāṃ tasya kaṇṭhaṃ vṛkodaraḥ
उस नीच राक्षस की कमर को घुटने से दबाकर वृकोदर ने अपने हाथों से उसका गला दबा दिया।
श्लोक 65 (3.11.65)
अथ जर्जरसर्वाङ्गं व्यावृत्तनयनोल्बणम् । भूतले भ्रामयामास वाक्यं चेदमुवाच ह ॥
atha jarjarasarvāṅgaṃ vyāvṛttanayanolbaṇam | bhūtale bhrāmayāmāsa vākyaṃ cedamuvāca ha
फिर जिसका अंग-अंग चूर हो गया था और आँखें भयानक ढंग से उलट गई थीं, उसे भीम ने धरती पर घुमाया और यह वचन कहा —
भीम उवाच
श्लोक 66 (3.11.66)
हिडिम्बबकयोः पाप न त्वमश्रुप्रमार्जनम् । करिष्यसि गतश्चापि यमस्य सदनं प्रति ॥
hiḍimbabakayoḥ pāpa na tvamaśrupramārjanam | kariṣyasi gataścāpi yamasya sadanaṃ prati
"हे पापी, तू हिडिम्ब और बक के आँसू नहीं पोंछ सकेगा, क्योंकि तू भी यमलोक को चला गया है।"
विदुर उवाच
श्लोक 67 (3.11.67)
इत्येवमुक्त्वा पुरुषप्रवीर- । स्तं राक्षसं क्रोधपरीतचेताः । विस्रस्तवस्त्राभरणं स्फुरन्त- । मुद्भ्रान्तचित्तं व्यसुमुत्ससर्ज ॥
ityevamuktvā puruṣapravīra- | staṃ rākṣasaṃ krodhaparītacetāḥ | visrastavastrābharaṇaṃ sphuranta- | mudbhrāntacittaṃ vyasumutsasarja
ऐसा कहकर क्रोध से भरे उस नरश्रेष्ठ ने उस राक्षस को छोड़ दिया, जो प्राणहीन हो चुका था, जिसके वस्त्र और आभूषण बिखर गए थे, जो अब भी फड़क रहा था और जिसका चित्त भ्रमित हो गया था।
श्लोक 68 (3.11.68)
तस्मिन्हते तोयदतुल्यरूपे । कृष्णां पुरस्कृत्य नरेन्द्रपुत्राः । भीमं प्रशस्याथ गुणैरनेकै- । र्हृष्टास्ततो द्वैतवनाय जग्मुः ॥
tasminhate toyadatulyarūpe | kṛṣṇāṃ puraskṛtya narendraputrāḥ | bhīmaṃ praśasyātha guṇairanekai- | rhṛṣṭāstato dvaitavanāya jagmuḥ
जलधर जैसे रूप वाले उस राक्षस के मारे जाने पर राजकुमारों ने कृष्णा को आगे करके भीम के अनेक गुणों की प्रशंसा की और प्रसन्न होकर द्वैतवन की ओर चल पड़े।
श्लोक 69 (3.11.69)
एवं विनिहतः सङ्ख्ये किर्मीरो मनुजाधिप । भीमेन वचनात्तस्य धर्मराजस्य कौरव ॥
evaṃ vinihataḥ saṅkhye kirmīro manujādhipa | bhīmena vacanāttasya dharmarājasya kaurava
हे नरेश्वर, हे कौरव, इस प्रकार धर्मराज के कहने पर भीम ने युद्ध में किर्मीर को मार डाला।
श्लोक 70 (3.11.70)
ततो निष्कण्टकं कृत्वा वनं तदपराजितः । द्रौपद्या सह धर्मज्ञो वसतिं तामुवास ह ॥
tato niṣkaṇṭakaṃ kṛtvā vanaṃ tadaparājitaḥ | draupadyā saha dharmajño vasatiṃ tāmuvāsa ha
फिर उस वन को काँटे से रहित करके वे अपराजित, धर्मज्ञ राजा द्रौपदी के साथ वहीं निवास करने लगे।
श्लोक 71 (3.11.71)
समाश्वास्य च ते सर्वे द्रौपदीं भरतर्षभाः । प्रहृष्टमनसः प्रीत्या प्रशशंसुर्वृकोदरम् ॥
samāśvāsya ca te sarve draupadīṃ bharatarṣabhāḥ | prahṛṣṭamanasaḥ prītyā praśaśaṃsurvṛkodaram
उन सब भरतश्रेष्ठों ने द्रौपदी को सान्त्वना दी और प्रसन्न मन से प्रेमपूर्वक वृकोदर की प्रशंसा की।
श्लोक 72 (3.11.72)
भीमबाहुबलोत्पिष्टे विनष्टे राक्षसे ततः । विविशुस्ते वनं वीराः क्षेमं निहतकण्टकम् ॥
bhīmabāhubalotpiṣṭe vinaṣṭe rākṣase tataḥ | viviśuste vanaṃ vīrāḥ kṣemaṃ nihatakaṇṭakam
भीम की भुजाओं के बल से कुचले जाकर राक्षस के नष्ट हो जाने पर वे वीर उस वन में प्रविष्ट हुए, जो अब निरापद और निष्कंटक हो गया था।
श्लोक 73 (3.11.73)
स मया गच्छता मार्गे विनिकीर्णो भयावहः । वने महति दुष्टात्मा दृष्टो भीमबलाद्धतः ॥
sa mayā gacchatā mārge vinikīrṇo bhayāvahaḥ | vane mahati duṣṭātmā dṛṣṭo bhīmabalāddhataḥ
मार्ग से जाते हुए मैंने उस भयानक दुष्टात्मा को उस महावन में भीम के बल से मारा गया, बिखरा पड़ा देखा।
श्लोक 74 (3.11.74)
तत्राश्रौषमहं चैतत्कर्म भीमस्य भारत । ब्राह्मणानां कथयतां ये तत्रासन्समागताः ॥
tatrāśrauṣamahaṃ caitatkarma bhīmasya bhārata | brāhmaṇānāṃ kathayatāṃ ye tatrāsansamāgatāḥ
हे भारत, वहीं इकट्ठे हुए ब्राह्मणों को आपस में चर्चा करते हुए मैंने भीम का यह कर्म सुना।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 75 (3.11.75)
एवं विनिहतं सङ्ख्ये किर्मीरं रक्षसां वरम् । श्रुत्वा ध्यानपरो राजा निशश्वासार्तवत्तदा ॥
evaṃ vinihataṃ saṅkhye kirmīraṃ rakṣasāṃ varam | śrutvā dhyānaparo rājā niśaśvāsārtavattadā
राक्षसों में श्रेष्ठ किर्मीर के युद्ध में इस प्रकार मारे जाने का समाचार सुनकर राजा चिन्ता में डूब गए और दुःखी व्यक्ति की तरह लंबी साँस लेने लगे।