आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 12
श्रीकृष्ण के सम्मुख द्रौपदी का विलाप
भोज, वृष्णि और अन्धक, तथा पाञ्चाल, चेदि और केकय राजकुमार वन में निर्वासित पाण्डवों के पास आते हैं, और क्रुद्ध श्रीकृष्ण प्रतिज्ञा करते हैं कि पृथ्वी दुर्योधन और उसके साथियों का रक्त पिएगी। अर्जुन उनकी तपस्याओं और दिव्य कर्मों का वर्णन करके उन्हें शान्त करते हैं, और श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे दोनों नर और नारायण हैं, जो कभी अलग नहीं। फिर द्रौपदी श्रीकृष्ण की स्तुति करके अपना दुःख कहती है — सभा में हुआ अपमान और भीम को विष देने से लेकर वारणावत के अग्निकाण्ड तक पाण्डवों के प्राण लेने के दुर्योधन के पुराने प्रयास। श्रीकृष्ण वचन देते हैं कि वह राजाओं की रानी बनेगी, अर्जुन उनके वचन का समर्थन करते हैं, और धृष्टद्युम्न बताते हैं कि कौरव पक्ष के किस वीर को कौन मारेगा।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (3.12.1)
भोजाः प्रव्रजिताञ्श्रुत्वा वृष्णयश्चान्धकैः सह । पाण्डवान्दुःखसंतप्तान्समाजग्मुर्महावने ॥
bhojāḥ pravrajitāñśrutvā vṛṣṇayaścāndhakaiḥ saha | pāṇḍavānduḥkhasaṃtaptānsamājagmurmahāvane
पाण्डवों के वनवास का समाचार सुनकर भोज, वृष्णि और अन्धक वंश के लोग उस महान वन में दुःख से संतप्त पाण्डवों के पास एकत्र हुए।
श्लोक 2 (3.12.2)
पाञ्चालस्य च दायादो धृष्टकेतुश्च चेदिपः । केकयाश्च महावीर्या भ्रातरो लोकविश्रुताः ॥
pāñcālasya ca dāyādo dhṛṣṭaketuśca cedipaḥ | kekayāśca mahāvīryā bhrātaro lokaviśrutāḥ
पाञ्चालराज का उत्तराधिकारी, चेदिराज धृष्टकेतु और लोकविख्यात महापराक्रमी केकय भाई —
श्लोक 3 (3.12.3)
वने द्रष्टुं ययुः पार्थान्क्रोधामर्षसमन्विताः । गर्हयन्तो धार्तराष्ट्रान्किं कुर्म इति चाब्रुवन् ॥
vane draṣṭuṃ yayuḥ pārthānkrodhāmarṣasamanvitāḥ | garhayanto dhārtarāṣṭrānkiṃ kurma iti cābruvan
ये सब क्रोध और रोष से भरे हुए पार्थों से मिलने वन में गए। धृतराष्ट्र के पुत्रों की निन्दा करते हुए वे बोले — "हम क्या करें?"
श्लोक 4 (3.12.4)
वासुदेवं पुरस्कृत्य सर्वे ते क्षत्रियर्षभाः । परिवार्योपविविशुर्धर्मराजं युधिष्ठिरम् । अभिवाद्य कुरुश्रेष्ठं विषण्णः केशवोऽब्रवीत् ॥
vāsudevaṃ puraskṛtya sarve te kṣatriyarṣabhāḥ | parivāryopaviviśurdharmarājaṃ yudhiṣṭhiram | abhivādya kuruśreṣṭhaṃ viṣaṇṇaḥ keśavo'bravīt
वासुदेव को आगे करके वे सभी क्षत्रियश्रेष्ठ धर्मराज युधिष्ठिर को घेरकर बैठ गए। कुरुश्रेष्ठ का अभिवादन करके केशव ने खिन्न होकर कहा।
वासुदेव उवाच
श्लोक 5 (3.12.5)
दुर्योधनस्य कर्णस्य शकुनेश्च दुरात्मनः । दुःशासनचतुर्थानां भूमिः पास्यति शोणितम् ॥
duryodhanasya karṇasya śakuneśca durātmanaḥ | duḥśāsanacaturthānāṃ bhūmiḥ pāsyati śoṇitam
दुर्योधन, कर्ण, दुष्टात्मा शकुनि और चौथे दुःशासन का रक्त यह पृथ्वी पिएगी।
श्लोक 6 (3.12.6)
एतान्निहत्य समरे ये च तेषां पदानुगाः । तांश्च सर्वान्विनिर्जित्य सहितान्स नराधिपान् ॥
etānnihatya samare ye ca teṣāṃ padānugāḥ | tāṃśca sarvānvinirjitya sahitānsa narādhipān
इन्हें और इनके सब अनुयायियों को युद्ध में मारकर, और इनके साथ खड़े उन सब राजाओं को जीतकर,
श्लोक 7 (3.12.7)
ततः सर्वेऽभिषिञ्चामो धर्मराजं युधिष्ठिरम् । निकृत्याऽभिचरन्वध्य एष धर्मः सनातनः ॥
tataḥ sarve'bhiṣiñcāmo dharmarājaṃ yudhiṣṭhiram | nikṛtyā'bhicaranvadhya eṣa dharmaḥ sanātanaḥ
तब हम सब मिलकर धर्मराज युधिष्ठिर का राज्याभिषेक करेंगे। जो छल से दूसरे का अनिष्ट करता है, वह वध के योग्य है — यही सनातन धर्म है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 8 (3.12.8)
पार्थानामभिषङ्गेण तथा क्रुद्धं जनार्दनम् । अर्जुनः शमयामास दिधक्षन्तमिव प्रजाः ॥
pārthānāmabhiṣaṅgeṇa tathā kruddhaṃ janārdanam | arjunaḥ śamayāmāsa didhakṣantamiva prajāḥ
पार्थों पर हुए अन्याय से जनार्दन इतने क्रुद्ध हो उठे मानो समस्त प्रजा को भस्म कर देना चाहते हों; तब अर्जुन ने उन्हें शान्त किया।
श्लोक 9 (3.12.9)
संक्रुद्धं केशवं दृष्ट्वा पूर्वदेहेषु फल्गुनः । कीर्तयामास कर्माणि सत्यकीर्तेर्महात्मनः ॥
saṃkruddhaṃ keśavaṃ dṛṣṭvā pūrvadeheṣu phalgunaḥ | kīrtayāmāsa karmāṇi satyakīrtermahātmanaḥ
केशव को अत्यन्त क्रुद्ध देखकर फाल्गुन (अर्जुन) ने उन सत्यकीर्ति महात्मा के वे कर्म गिनाए जो उन्होंने अपने पूर्व शरीरों (अवतारों) में किए थे —
श्लोक 10 (3.12.10)
पुरुषस्याप्रमेयस्य सत्यस्यामिततेजसः । प्रजापतिपतेर्विष्णोर्लोकनाथस्य धीमतः ॥
puruṣasyāprameyasya satyasyāmitatejasaḥ | prajāpatipaterviṣṇorlokanāthasya dhīmataḥ
उन अप्रमेय पुरुष, अमित तेजस्वी सत्यस्वरूप, प्रजापतियों के भी स्वामी, लोकनाथ, बुद्धिमान विष्णु के कर्म।
अर्जुन उवाच
श्लोक 11 (3.12.11)
दशवर्षसहस्राणि यत्रसायंगृहो मुनिः । व्यचरस्त्वं पुरा कृष्ण पर्वते गन्धमादने ॥
daśavarṣasahasrāṇi yatrasāyaṃgṛho muniḥ | vyacarastvaṃ purā kṛṣṇa parvate gandhamādane
हे कृष्ण, पूर्वकाल में आप गन्धमादन पर्वत पर दस हज़ार वर्षों तक ऐसे मुनि के रूप में विचरते रहे, जिसका घर वहीं होता है जहाँ सन्ध्या हो जाए।
श्लोक 12 (3.12.12)
दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि च । पुष्करेष्ववसः कृष्ण त्वमपो भक्षयन्पुरा ॥
daśavarṣasahasrāṇi daśavarṣaśatāni ca | puṣkareṣvavasaḥ kṛṣṇa tvamapo bhakṣayanpurā
हे कृष्ण, दस हज़ार वर्ष और उस पर दस सौ वर्ष आपने पुष्कर तीर्थों में केवल जल पीकर निवास किया।
श्लोक 13 (3.12.13)
ऊर्ध्वबाहुर्विशालायां बदर्यां मधुसूदन । अतिष्ठ एकपादेन वायुभक्षः शतं समाः ॥
ūrdhvabāhurviśālāyāṃ badaryāṃ madhusūdana | atiṣṭha ekapādena vāyubhakṣaḥ śataṃ samāḥ
हे मधुसूदन, विशाल बदरी में आप भुजाएँ ऊपर उठाए, एक पैर पर खड़े होकर, केवल वायु का आहार करते हुए सौ वर्षों तक स्थित रहे।
श्लोक 14 (3.12.14)
कृष्णाजिनोत्तरासङ्गः कृशो धमनिसंततः । आसीः कृष्ण सरस्वत्यां सत्रे द्वादशवार्षिके ॥
kṛṣṇājinottarāsaṅgaḥ kṛśo dhamanisaṃtataḥ | āsīḥ kṛṣṇa sarasvatyāṃ satre dvādaśavārṣike
हे कृष्ण, काले मृगचर्म का उत्तरीय ओढ़े, दुर्बल शरीर, जिसकी नसें उभर आई थीं, आप सरस्वती के तट पर बारह वर्ष के सत्र में रहे।
श्लोक 15 (3.12.15)
प्रभासमप्यथासाद्य तीर्थं पुण्यजनार्चितम् । तत्र कृष्ण महातेजा दिव्यं वर्षसहस्रकम् ॥
prabhāsamapyathāsādya tīrthaṃ puṇyajanārcitam | tatra kṛṣṇa mahātejā divyaṃ varṣasahasrakam
फिर, हे महातेजस्वी कृष्ण, पुण्यात्माओं से पूजित प्रभास तीर्थ में पहुँचकर आपने देवताओं के हज़ार वर्षों तक
श्लोक 16 (3.12.16)
आतिष्ठस्त्वमथैकेन पादेन नियमस्थितः । लोकप्रवृत्तिहेतोस्त्वमिति व्यासो ममाब्रवीत् ॥
ātiṣṭhastvamathaikena pādena niyamasthitaḥ | lokapravṛttihetostvamiti vyāso mamābravīt
नियम में स्थित रहकर एक पैर पर खड़े होकर तप किया — लोक की प्रवृत्ति के लिए; यह बात मुझे व्यास जी ने बताई।
श्लोक 17 (3.12.17)
क्षेत्रज्ञः सर्वभूतानामादिरन्तश्च केशव । निधानं तपसां कृष्ण यज्ञस्त्वं च सनातनः ॥
kṣetrajñaḥ sarvabhūtānāmādirantaśca keśava | nidhānaṃ tapasāṃ kṛṣṇa yajñastvaṃ ca sanātanaḥ
हे केशव, आप समस्त प्राणियों के क्षेत्रज्ञ (अन्तरात्मा) हैं, उनके आदि और अन्त हैं। हे कृष्ण, आप तपस्याओं के निधि हैं और आप ही सनातन यज्ञ हैं।
श्लोक 18 (3.12.18)
योगकर्ता हृषीकेशः सांख्यकर्ता सनातनः । शीलस्त्वं सर्वयोगानां करणं नियमस्य च ॥
yogakartā hṛṣīkeśaḥ sāṃkhyakartā sanātanaḥ | śīlastvaṃ sarvayogānāṃ karaṇaṃ niyamasya ca
हृषीकेश योग के प्रवर्तक हैं, सनातन सांख्य के प्रवर्तक हैं; आप समस्त योगों के स्वभाव और नियम के साधन हैं।
श्लोक 19 (3.12.19)
निहत्य नरकं भौममाहृत्य मणिकुण्डले । प्रथमोत्पादितं कृष्ण मेध्यमश्वमवासृजः ॥
nihatya narakaṃ bhaumamāhṛtya maṇikuṇḍale | prathamotpāditaṃ kṛṣṇa medhyamaśvamavāsṛjaḥ
भूमिपुत्र नरक का वध करके और मणिमय कुण्डल लाकर, हे कृष्ण, आपने सबसे पहले उत्पन्न हुए यज्ञीय अश्व को छोड़ा।
श्लोक 20 (3.12.20)
कृत्वा तत्कर्म लोकानामृषभः सर्वलोकजित् । अवधीस्त्वं रणे सर्वान्समेतान्दैत्यदानवान् ॥
kṛtvā tatkarma lokānāmṛṣabhaḥ sarvalokajit | avadhīstvaṃ raṇe sarvānsametāndaityadānavān
वह कर्म करके, हे लोकश्रेष्ठ और सर्वलोकविजयी, आपने युद्ध में एकत्र हुए सभी दैत्यों और दानवों का वध किया।
श्लोक 21 (3.12.21)
ततः सर्वेश्वरत्वं च संप्रदाय शचीपतेः । मानुषेषु महाबाहो प्रादुर्भूतोऽसि केशव ॥
tataḥ sarveśvaratvaṃ ca saṃpradāya śacīpateḥ | mānuṣeṣu mahābāho prādurbhūto'si keśava
फिर शचीपति इन्द्र को सर्वेश्वरत्व प्रदान करके, हे महाबाहु केशव, आप मनुष्यों में प्रकट हुए।
श्लोक 22 (3.12.22)
स त्वं नारायणो भूत्वा हरिरासीः परंतप । ब्रह्मा सोमश्च सूर्यश्च धर्मो धाता यमोऽनलः ॥
sa tvaṃ nārāyaṇo bhūtvā harirāsīḥ paraṃtapa | brahmā somaśca sūryaśca dharmo dhātā yamo'nalaḥ
हे परंतप, आप नारायण होकर हरि हुए। आप ही ब्रह्मा, सोम, सूर्य, धर्म, धाता, यम और अग्नि हैं;
श्लोक 23 (3.12.23)
वायुर्वैश्रवणो रुद्रः कालः खं पृथिवी दिशः । अजश्चराचरगुरुः स्रष्टा त्वं पुरुषोत्तम ॥
vāyurvaiśravaṇo rudraḥ kālaḥ khaṃ pṛthivī diśaḥ | ajaścarācaraguruḥ sraṣṭā tvaṃ puruṣottama
आप ही वायु, वैश्रवण (कुबेर), रुद्र, काल, आकाश, पृथ्वी और दिशाएँ हैं। हे पुरुषोत्तम, आप अजन्मा, चराचर के गुरु और स्रष्टा हैं।
श्लोक 24 (3.12.24)
तुरायणादिभिर्देव क्रतुभिर्भूरिदक्षिणैः । अयजो भूरितेजा वै कृष्ण चैत्ररथे वने ॥
turāyaṇādibhirdeva kratubhirbhūridakṣiṇaiḥ | ayajo bhūritejā vai kṛṣṇa caitrarathe vane
हे देव, हे महातेजस्वी कृष्ण, आपने चैत्ररथ वन में तुरायण आदि यज्ञों से, जिनमें प्रचुर दक्षिणा दी गई, यजन किया।
श्लोक 25 (3.12.25)
शतं शतसहस्राणि सुवर्णस्य जनार्दन । एकैकस्मिंस्तदा यज्ञे परिपूर्णानि दत्तवान् ॥
śataṃ śatasahasrāṇi suvarṇasya janārdana | ekaikasmiṃstadā yajñe paripūrṇāni dattavān
हे जनार्दन, उस समय प्रत्येक यज्ञ में आपने सौ-सौ लाख स्वर्ण-मुद्राएँ पूरी-पूरी दान कीं।
श्लोक 26 (3.12.26)
अदितेरपि पुत्रत्वमेत्य यादवनन्दन । त्वं विष्णुरिति विख्यात इन्द्रादवरजो विभुः ॥
aditerapi putratvametya yādavanandana | tvaṃ viṣṇuriti vikhyāta indrādavarajo vibhuḥ
हे यादवनन्दन, अदिति के पुत्र बनकर आप, सर्वव्यापक प्रभु, इन्द्र के छोटे भाई विष्णु के नाम से विख्यात हुए।
श्लोक 27 (3.12.27)
शिशुर्भूत्वा दिवं खं च पृथिवीं च परंतप । त्रिभिर्विक्रमणैः कृष्ण क्रान्तवानसि तेजसा ॥
śiśurbhūtvā divaṃ khaṃ ca pṛthivīṃ ca paraṃtapa | tribhirvikramaṇaiḥ kṛṣṇa krāntavānasi tejasā
हे परंतप कृष्ण, बालक (वामन) बनकर आपने अपने तेज से तीन पगों में स्वर्ग, आकाश और पृथ्वी को नाप लिया।
श्लोक 28 (3.12.28)
संप्राप्य दिवमाकाशमादित्यस्यन्दने स्थितः । अत्यरोचश्च भूतात्मन्भास्करं स्वेन तेजसा ॥
saṃprāpya divamākāśamādityasyandane sthitaḥ | atyarocaśca bhūtātmanbhāskaraṃ svena tejasā
हे भूतात्मा, स्वर्ग और आकाश में व्याप्त होकर, सूर्य के रथ में स्थित होकर आपने अपने तेज से सूर्य को भी फीका कर दिया।
श्लोक 29 (3.12.29)
प्रादुर्भावसहस्रेषु तेषुतेषु त्वया विभो । अधर्मरुचयः कृष्ण निहताः शतशोऽसुराः ॥
prādurbhāvasahasreṣu teṣuteṣu tvayā vibho | adharmarucayaḥ kṛṣṇa nihatāḥ śataśo'surāḥ
हे विभो कृष्ण, उन हज़ारों अवतारों में आपने अधर्म में रुचि रखने वाले सैकड़ों असुरों का वध किया।
श्लोक 30 (3.12.30)
सादिता मौरवाः पाशा निशुम्भनरकौ हतौ । कृतः क्षेमः पुनः पन्थाः पुरं प्राग्ज्योतिषं प्रति ॥
sāditā mauravāḥ pāśā niśumbhanarakau hatau | kṛtaḥ kṣemaḥ punaḥ panthāḥ puraṃ prāgjyotiṣaṃ prati
मुर के पाश काट डाले गए, निशुम्भ और नरक मारे गए, और प्राग्ज्योतिषपुर का मार्ग फिर से निरापद कर दिया गया।
श्लोक 31 (3.12.31)
जारूथ्यामाहुतिः क्राथः शिशुपालो नृपैः सह । जरासन्धश्च शैब्यश्च शतधन्वा च निर्जितः ॥
jārūthyāmāhutiḥ krāthaḥ śiśupālo nṛpaiḥ saha | jarāsandhaśca śaibyaśca śatadhanvā ca nirjitaḥ
जारूथी नगरी में आहुति और क्राथ, राजाओं सहित शिशुपाल, जरासन्ध, शैब्य और शतधन्वा — ये सब पराजित किए गए।
श्लोक 32 (3.12.32)
तथा पर्जन्यघोषेण रथेनादित्यवर्चसा । अहार्षी रुक्मिणीं भैष्मीं रणे निर्जित्य रुक्मिणम् ॥
tathā parjanyaghoṣeṇa rathenādityavarcasā | ahārṣī rukmiṇīṃ bhaiṣmīṃ raṇe nirjitya rukmiṇam
और मेघ के समान गरजते तथा सूर्य के समान तेजस्वी रथ पर आपने युद्ध में रुक्मी को परास्त करके भीष्मक की पुत्री रुक्मिणी का हरण किया।
श्लोक 33 (3.12.33)
इन्द्रद्युम्नो हतः कोपाद्यवनश्च कशेरुमान् । हतः सौभपतिः साल्वस्त्वया सौभं च पातितम् ॥
indradyumno hataḥ kopādyavanaśca kaśerumān | hataḥ saubhapatiḥ sālvastvayā saubhaṃ ca pātitam
आपने क्रोध में इन्द्रद्युम्न और यवन कशेरुमान् को मारा; सौभपति शाल्व आपके हाथों मारा गया और सौभ नगर गिरा दिया गया।
श्लोक 34 (3.12.34)
एवमेते युधि हता भूयश्चान्याञ्शृणुष्व ह । इरावत्यां हतो भोजः कार्तवीर्यसमो युधि । गोपतिस्तालकेतुश्च त्वया विनिहतावुभौ ॥
evamete yudhi hatā bhūyaścānyāñśṛṇuṣva ha | irāvatyāṃ hato bhojaḥ kārtavīryasamo yudhi | gopatistālaketuśca tvayā vinihatāvubhau
इस प्रकार ये सब युद्ध में मारे गए; अब और भी सुनिए — इरावती के तट पर युद्ध में कार्तवीर्य के समान भोज मारा गया, और गोपति तथा तालकेतु — इन दोनों का भी आपने वध किया।
श्लोक 35 (3.12.35)
तां च भोगवतीं पुण्यामृषिकान्तां जनार्दन । द्वारकामात्मसात्कृत्वा समुद्रं गमयिष्यसि ॥
tāṃ ca bhogavatīṃ puṇyāmṛṣikāntāṃ janārdana | dvārakāmātmasātkṛtvā samudraṃ gamayiṣyasi
हे जनार्दन, भोगों से सम्पन्न, ऋषियों को प्रिय उस पवित्र द्वारका को अपना बनाकर आप अन्त में उसे समुद्र में समा देंगे।
श्लोक 36 (3.12.36)
न क्रोधो न च मात्सर्यं नानृतं मधुसूदन । त्वयि तिष्ठति दाशार्ह न नृशंस्यं कुतोऽनृजु ॥
na krodho na ca mātsaryaṃ nānṛtaṃ madhusūdana | tvayi tiṣṭhati dāśārha na nṛśaṃsyaṃ kuto'nṛju
हे मधुसूदन, आपमें न क्रोध है, न मत्सर, न असत्य; हे दाशार्ह, आपमें क्रूरता नहीं है, फिर कुटिलता कहाँ से होगी?
श्लोक 37 (3.12.37)
आसीनं चैत्यमध्ये त्वां दीप्यमानं स्वतेजसा । आगम्य ऋषयः सर्वेऽयाचन्ताभयमच्युत ॥
āsīnaṃ caityamadhye tvāṃ dīpyamānaṃ svatejasā | āgamya ṛṣayaḥ sarve'yācantābhayamacyuta
हे अच्युत, जब आप चैत्य के भीतर अपने तेज से देदीप्यमान होकर विराजमान थे, तब सब ऋषियों ने आकर आपसे अभय की याचना की।
श्लोक 38 (3.12.38)
युगान्ते सर्वभूतानि संक्षिप्य मधुसूदन । आत्मनैवात्मसात्कृत्वा जगदासीः परंतप ॥
yugānte sarvabhūtāni saṃkṣipya madhusūdana | ātmanaivātmasātkṛtvā jagadāsīḥ paraṃtapa
हे मधुसूदन, युग के अन्त में आप समस्त प्राणियों को समेटकर, उन्हें अपने में ही लीन करके, स्वयं जगत्-रूप होकर स्थित रहते हैं, हे परंतप।
श्लोक 39 (3.12.39)
युगादौ तव वार्ष्णेय नाभिपद्मादजायत । ब्रह्मा चराचरगुरुर्यस्येदं सकलं जगत् । तं हन्तुमुद्यतौ घोरौ दानवौ मधुकैटभौ ॥
yugādau tava vārṣṇeya nābhipadmādajāyata | brahmā carācaragururyasyedaṃ sakalaṃ jagat | taṃ hantumudyatau ghorau dānavau madhukaiṭabhau
हे वार्ष्णेय, युग के आरम्भ में आपकी नाभि के कमल से चराचर के गुरु ब्रह्मा उत्पन्न हुए, जिनका यह समस्त जगत् है। उन्हें मारने के लिए मधु और कैटभ नाम के दो भयंकर दानव उद्यत हुए।
श्लोक 40 (3.12.40)
तयोर्व्यतिक्रमं दृष्ट्वा क्रुद्धस्य भवतो हरेः । ललाटाज्जातवाञ्शंभुः शूलपाणिस्त्रिलोचनः ॥
tayorvyatikramaṃ dṛṣṭvā kruddhasya bhavato hareḥ | lalāṭājjātavāñśaṃbhuḥ śūlapāṇistrilocanaḥ
उनका अत्याचार देखकर आप हरि क्रुद्ध हुए, और आपके ललाट से त्रिशूलधारी, त्रिनेत्र शम्भु उत्पन्न हुए।
श्लोक 41 (3.12.41)
इत्थं तावपि देवेशौ त्वच्छरीरसमुद्भवौ । त्वन्नियोगकरावेताविति मे नारदोऽब्रवीत् ॥
itthaṃ tāvapi deveśau tvaccharīrasamudbhavau | tvanniyogakarāvetāviti me nārado'bravīt
इस प्रकार ये दोनों देवेश्वर भी आपके ही शरीर से उत्पन्न हुए हैं और आपकी आज्ञा का पालन करते हैं — यह मुझसे नारद ने कहा।
श्लोक 42 (3.12.42)
तथा नारायण पुरा क्रतुभिर्भूरिदक्षिणैः । इष्टवांस्त्वं महासत्रं कृष्ण चैत्ररथे वने ॥
tathā nārāyaṇa purā kratubhirbhūridakṣiṇaiḥ | iṣṭavāṃstvaṃ mahāsatraṃ kṛṣṇa caitrarathe vane
इसी प्रकार, हे नारायण कृष्ण, पूर्वकाल में आपने चैत्ररथ वन में प्रचुर दक्षिणा वाले यज्ञों के साथ एक महासत्र किया।
श्लोक 43 (3.12.43)
नैवं परे नापरे वा करिष्यन्ति कृतानि वा । यानि कर्माणि देव त्वं बाल एव महाबलः ॥
naivaṃ pare nāpare vā kariṣyanti kṛtāni vā | yāni karmāṇi deva tvaṃ bāla eva mahābalaḥ
हे देव, हे महाबली, आपने बालक रहते हुए ही जो कर्म किए, वैसे कर्म न पहले वाले कर सके, न बाद वाले करेंगे —
श्लोक 44 (3.12.44)
कृतवान्पुण्डरीकाक्ष बलदेवसहायवान् । वैराजभवने चापि ब्रह्मणा न्यवसः सह ॥
kṛtavānpuṇḍarīkākṣa baladevasahāyavān | vairājabhavane cāpi brahmaṇā nyavasaḥ saha
हे कमलनयन, बलदेव को साथ लेकर (आपने वे कर्म किए); और आप वैराज-भवन में ब्रह्मा के साथ भी निवास कर चुके हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 45 (3.12.45)
एवमुक्त्वा महात्मानमात्मा कृष्णस्य पाण्डवः । तूष्णीमासीत्ततः पार्थमित्युवाच जनार्दनः ॥
evamuktvā mahātmānamātmā kṛṣṇasya pāṇḍavaḥ | tūṣṇīmāsīttataḥ pārthamityuvāca janārdanaḥ
कृष्ण के ही आत्मस्वरूप पाण्डव (अर्जुन) उन महात्मा से ऐसा कहकर मौन हो गए। तब जनार्दन ने पार्थ से इस प्रकार कहा —
वासुदेव उवाच
श्लोक 46 (3.12.46)
ममैव त्वं तवैवाहं ये मदीयास्तवैव ते । यस्त्वां द्वेष्टि स मां द्वेष्टि यस्त्वामनु स मामनु ॥
mamaiva tvaṃ tavaivāhaṃ ye madīyāstavaiva te | yastvāṃ dveṣṭi sa māṃ dveṣṭi yastvāmanu sa māmanu
तुम मेरे ही हो और मैं तुम्हारा ही हूँ; जो मेरे हैं, वे तुम्हारे ही हैं। जो तुमसे द्वेष करता है, वह मुझसे द्वेष करता है; जो तुम्हारे साथ है, वह मेरे साथ है।
श्लोक 47 (3.12.47)
नरस्त्वमसि दुर्धर्ष हरिर्नारायणो ह्यहम् । काले लोकमिमं प्राप्तौ नरनारायणावृषी ॥
narastvamasi durdharṣa harirnārāyaṇo hyaham | kāle lokamimaṃ prāptau naranārāyaṇāvṛṣī
हे दुर्धर्ष, तुम नर हो और मैं हरि नारायण हूँ। हम दोनों नर-नारायण ऋषि समय आने पर इस लोक में आए हैं।
श्लोक 48 (3.12.48)
अनन्यः पार्थ मत्तस्त्वं त्वत्तश्चाहं तथैव च । नावयोरन्तरं शक्यं वेदितुं भरतर्षभ ॥
ananyaḥ pārtha mattastvaṃ tvattaścāhaṃ tathaiva ca | nāvayorantaraṃ śakyaṃ vedituṃ bharatarṣabha
हे पार्थ, तुम मुझसे भिन्न नहीं हो और न मैं तुमसे भिन्न हूँ। हे भरतश्रेष्ठ, हम दोनों में कोई अन्तर जाना नहीं जा सकता।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 49 (3.12.49)
इत्युक्त्वा पुण्डरीकाक्षः पाण्डवं सुप्रियं वचः । प्रीयमाणो हृषीकेशस्तूष्णीं तत्र बभूव सः ॥
ityuktvā puṇḍarīkākṣaḥ pāṇḍavaṃ supriyaṃ vacaḥ | prīyamāṇo hṛṣīkeśastūṣṇīṃ tatra babhūva saḥ
पाण्डव से ये अत्यन्त प्रिय वचन कहकर कमलनयन हृषीकेश प्रसन्न मन से वहाँ मौन हो गए।
श्लोक 50 (3.12.50)
एवमुक्ते तु वचने केशवेन महात्मना । तस्मिन्वीरसमावाये संरब्धेष्वथ राजसु ॥
evamukte tu vacane keśavena mahātmanā | tasminvīrasamāvāye saṃrabdheṣvatha rājasu
महात्मा केशव के ये वचन कह चुकने पर, वीरों के उस समूह में, जब राजा लोग क्रोध से उत्तेजित थे,
श्लोक 51 (3.12.51)
धृष्टद्युम्नमुखैर्वीरैर्भ्रातृभिः परिवारिता । पाञ्चाली पुण्डरीकाक्षमासीनं यादवैः सह । अभिगम्याब्रवीत्कृष्णा शरण्यं शरणैषिणी ॥
dhṛṣṭadyumnamukhairvīrairbhrātṛbhiḥ parivāritā | pāñcālī puṇḍarīkākṣamāsīnaṃ yādavaiḥ saha | abhigamyābravītkṛṣṇā śaraṇyaṃ śaraṇaiṣiṇī
तब धृष्टद्युम्न आदि वीर भाइयों से घिरी पाञ्चाली कृष्णा (द्रौपदी) यादवों के साथ बैठे हुए शरणदाता कमलनयन के पास गई और शरण चाहती हुई बोली —
द्रौपद्युवाच
श्लोक 52 (3.12.52)
वासुदेव हृषीकेश वासवावरजाच्युत । देवदेवोऽसि देवानामिति द्वैपायनोऽब्रवीत् ॥
vāsudeva hṛṣīkeśa vāsavāvarajācyuta | devadevo'si devānāmiti dvaipāyano'bravīt
हे वासुदेव, हे हृषीकेश, हे इन्द्र के छोटे भाई अच्युत! आप देवताओं में देवाधिदेव हैं — ऐसा द्वैपायन (व्यास) ने कहा है।
श्लोक 53 (3.12.53)
पूर्वे प्रजाभिसर्गे त्वामाहुरेकं प्रजापतिम् । स्रष्टारं सर्वलोकानामसितो देवलोऽब्रवीत् ॥
pūrve prajābhisarge tvāmāhurekaṃ prajāpatim | sraṣṭāraṃ sarvalokānāmasito devalo'bravīt
प्रजा की प्रथम सृष्टि के समय आप ही एकमात्र प्रजापति थे, समस्त लोकों के स्रष्टा — ऐसा असित देवल ने कहा है।
श्लोक 54 (3.12.54)
विष्णुस्त्वमसि दुर्धर्ष त्वं यज्ञो मधुसूदन । यष्टा त्वमसि यष्टव्यो जामदग्न्यो यथाऽब्रवीत् ॥
viṣṇustvamasi durdharṣa tvaṃ yajño madhusūdana | yaṣṭā tvamasi yaṣṭavyo jāmadagnyo yathā'bravīt
हे दुर्धर्ष, आप विष्णु हैं; हे मधुसूदन, आप यज्ञ हैं। आप ही यज्ञ करने वाले हैं और आप ही यज्ञ द्वारा पूजनीय हैं — जैसा जमदग्निपुत्र (परशुराम) ने कहा है।
श्लोक 55 (3.12.55)
ऋषयस्त्वां क्षमामाहुः सत्यं च पुरुषोत्तम । सत्याद्यज्ञोऽसि संभूतः कश्यपस्त्वां यथाऽब्रवीत् ॥
ṛṣayastvāṃ kṣamāmāhuḥ satyaṃ ca puruṣottama | satyādyajño'si saṃbhūtaḥ kaśyapastvāṃ yathā'bravīt
हे पुरुषोत्तम, ऋषि आपको क्षमा और सत्य कहते हैं; आप सत्य से उत्पन्न यज्ञ हैं — जैसा कश्यप ने आपके विषय में कहा है।
श्लोक 56 (3.12.56)
साध्यानामपि देवानां शिवानामीश्वरेश्वर । लोकभावन लोकेश यथा त्वां नारदोऽब्रवीत् ॥
sādhyānāmapi devānāṃ śivānāmīśvareśvara | lokabhāvana lokeśa yathā tvāṃ nārado'bravīt
आप साध्य देवताओं और शिवगणों के ईश्वरों के भी ईश्वर हैं, लोकों के रचयिता और लोकेश्वर हैं — जैसा नारद ने आपके विषय में कहा है।
श्लोक 57 (3.12.57)
ब्रह्मशंकरशक्राद्यैर्देववृन्दैः पुनः पुनः । क्रीडसे त्वं नरव्याघ्र बालः क्रीडनकैरिव ॥
brahmaśaṃkaraśakrādyairdevavṛndaiḥ punaḥ punaḥ | krīḍase tvaṃ naravyāghra bālaḥ krīḍanakairiva
हे नरश्रेष्ठ, ब्रह्मा, शंकर, इन्द्र आदि देवसमूहों के साथ आप बार-बार वैसे ही क्रीड़ा करते हैं जैसे बालक खिलौनों से खेलता है।
श्लोक 58 (3.12.58)
द्यौश्च ते शिरसा व्याप्ता पद्भ्यां च पृथिवीप्रभो । जठरे खमिमे लोकाः पुरुषोऽसि सनातनः ॥
dyauśca te śirasā vyāptā padbhyāṃ ca pṛthivīprabho | jaṭhare khamime lokāḥ puruṣo'si sanātanaḥ
हे प्रभो, स्वर्ग आपके सिर से और पृथ्वी आपके चरणों से व्याप्त है; आकाश और ये सब लोक आपके उदर में हैं; आप सनातन पुरुष हैं।
श्लोक 59 (3.12.59)
विद्यातपोभितप्तानां तपसा भावितात्मनाम् । आत्मदर्शनतृप्तानामृषीणामसि सत्तमः ॥
vidyātapobhitaptānāṃ tapasā bhāvitātmanām | ātmadarśanatṛptānāmṛṣīṇāmasi sattamaḥ
विद्या और तप से तपे हुए, तपस्या से शुद्ध अन्तःकरण वाले, आत्मदर्शन से तृप्त ऋषियों में आप सर्वश्रेष्ठ हैं।
श्लोक 60 (3.12.60)
राजर्षीणां पुण्यकृतामाहवेष्वनिवर्तिनाम् । सर्वधर्मोपपन्नानां त्वं गतिः पुरुषर्षभ । त्वं प्रभुस्त्वं विभुश्च त्वं भूतात्मा त्वं विचेष्टसे ॥
rājarṣīṇāṃ puṇyakṛtāmāhaveṣvanivartinām | sarvadharmopapannānāṃ tvaṃ gatiḥ puruṣarṣabha | tvaṃ prabhustvaṃ vibhuśca tvaṃ bhūtātmā tvaṃ viceṣṭase
हे पुरुषश्रेष्ठ, पुण्यकर्मा, युद्ध में कभी पीठ न दिखाने वाले, सर्वधर्मसम्पन्न राजर्षियों की गति आप ही हैं। आप प्रभु हैं, आप विभु हैं, आप भूतात्मा हैं; आप ही सब में चेष्टा करते हैं।
श्लोक 61 (3.12.61)
लोकपालाश्च लोकाश्च नक्षत्राणि दिशो दश । नभश्चन्द्रश्च सूर्यश्च त्वयि सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥
lokapālāśca lokāśca nakṣatrāṇi diśo daśa | nabhaścandraśca sūryaśca tvayi sarvaṃ pratiṣṭhitam
लोकपाल और लोक, नक्षत्र, दसों दिशाएँ, आकाश, चन्द्रमा और सूर्य — सब कुछ आपमें ही प्रतिष्ठित है।
श्लोक 62 (3.12.62)
मर्त्यता चैव भूतानाममरत्वं दिवौकसाम् । त्वयि सर्वं महाबाहो लोककार्यं प्रतिष्ठितम् ॥
martyatā caiva bhūtānāmamaratvaṃ divaukasām | tvayi sarvaṃ mahābāho lokakāryaṃ pratiṣṭhitam
हे महाबाहु, प्राणियों की मरणशीलता और स्वर्गवासियों का अमरत्व — लोक का सारा कार्य आपमें ही प्रतिष्ठित है।
श्लोक 63 (3.12.63)
सा तेऽहं दुःखमाख्यास्ये प्रणयान्मधुसूदन । ईशस्त्वं सर्वभूतानां ये दिव्या ये च मानुषाः ॥
sā te'haṃ duḥkhamākhyāsye praṇayānmadhusūdana | īśastvaṃ sarvabhūtānāṃ ye divyā ye ca mānuṣāḥ
इसलिए, हे मधुसूदन, मैं प्रेमवश आपसे अपना दुःख कहूँगी; क्योंकि आप सब प्राणियों के ईश्वर हैं, चाहे वे दिव्य हों या मनुष्य।
श्लोक 64 (3.12.64)
कथं नु भार्या पार्थानां तव कृष्ण सखी विभो । धृष्टद्युम्नस्य भगिनी सभां कृष्येत मादृशी ॥
kathaṃ nu bhāryā pārthānāṃ tava kṛṣṇa sakhī vibho | dhṛṣṭadyumnasya bhaginī sabhāṃ kṛṣyeta mādṛśī
हे प्रभो कृष्ण, मैं पार्थों की पत्नी, आपकी सखी और धृष्टद्युम्न की बहन हूँ — मुझ जैसी स्त्री को सभा में कैसे घसीटा जा सकता था?
श्लोक 65 (3.12.65)
स्त्रीधर्मिणी वेपमाना शोणितेन समुक्षिता । एकवस्त्रा विकृष्टाऽस्मि दुःखिता कुरुसंसदि ॥
strīdharmiṇī vepamānā śoṇitena samukṣitā | ekavastrā vikṛṣṭā'smi duḥkhitā kurusaṃsadi
रजस्वला अवस्था में, काँपती हुई, रक्त से सनी, एक ही वस्त्र में, दुःखी मैं कुरुओं की सभा में घसीटी गई।
श्लोक 66 (3.12.66)
राज्ञां मध्ये सभायां तु रजसाऽतिपरिप्लुता । दृष्ट्वा च मां धार्तराष्ट्राः प्राहसन्पापचेतसः ॥
rājñāṃ madhye sabhāyāṃ tu rajasā'tipariplutā | dṛṣṭvā ca māṃ dhārtarāṣṭrāḥ prāhasanpāpacetasaḥ
और वहाँ सभा में राजाओं के बीच मुझे रज से भीगी हुई देखकर पापबुद्धि धृतराष्ट्रपुत्र हँसने लगे।
श्लोक 67 (3.12.67)
दासीभावेन मां भोक्तुमीषुस्ते मधुसूदन । जीवत्सु पाण्डुपुत्रेषु पाञ्चालेषु च वृष्णिषु ॥
dāsībhāvena māṃ bhoktumīṣuste madhusūdana | jīvatsu pāṇḍuputreṣu pāñcāleṣu ca vṛṣṇiṣu
हे मधुसूदन, पाण्डुपुत्रों, पाञ्चालों और वृष्णियों के जीवित रहते हुए भी वे मुझे दासी बनाकर भोगना चाहते थे।
श्लोक 68 (3.12.68)
नन्वहं कृष्ण भीष्मस्य धृतराष्ट्रस्य चोभयोः । स्नुषा भवामि धर्मेण साऽहं दासीकृता बलात् ॥
nanvahaṃ kṛṣṇa bhīṣmasya dhṛtarāṣṭrasya cobhayoḥ | snuṣā bhavāmi dharmeṇa sā'haṃ dāsīkṛtā balāt
हे कृष्ण, क्या मैं धर्म से भीष्म और धृतराष्ट्र दोनों की पुत्रवधू नहीं हूँ? फिर भी मुझे बलपूर्वक दासी बना दिया गया।
श्लोक 69 (3.12.69)
गर्हये पाण्डवांस्त्वेव युधि श्रेष्ठान्महाबलान् । यत्क्लिश्यमानां प्रेक्षन्ते धर्मपत्नीं यशस्विनीम् ॥
garhaye pāṇḍavāṃstveva yudhi śreṣṭhānmahābalān | yatkliśyamānāṃ prekṣante dharmapatnīṃ yaśasvinīm
मैं युद्ध में श्रेष्ठ, महाबली पाण्डवों की ही निन्दा करती हूँ, क्योंकि उन्होंने अपनी यशस्विनी धर्मपत्नी को क्लेश पाते हुए देखा और कुछ न किया।
श्लोक 70 (3.12.70)
धिग्बलं भीमसेनस्य धिक्पार्थस्य च गाण्डिवम् । यौ मां विप्रकृतां क्षुद्रैर्मर्षयेतां जनार्दन ॥
dhigbalaṃ bhīmasenasya dhikpārthasya ca gāṇḍivam | yau māṃ viprakṛtāṃ kṣudrairmarṣayetāṃ janārdana
धिक्कार है भीमसेन के बल को, धिक्कार है पार्थ के गाण्डीव को, हे जनार्दन, कि नीचों द्वारा मेरा अपमान होते हुए भी उन दोनों ने उसे सह लिया!
श्लोक 71 (3.12.71)
शाश्वतोऽयं धर्मपथः सद्भिराचरितः सदा । यद्भार्यां परिरक्षन्ति भर्तारोऽल्पबला अपि ॥
śāśvato'yaṃ dharmapathaḥ sadbhirācaritaḥ sadā | yadbhāryāṃ parirakṣanti bhartāro'lpabalā api
यह सनातन धर्ममार्ग है, जिस पर सत्पुरुष सदा चलते आए हैं — कि पति, चाहे दुर्बल ही क्यों न हों, अपनी पत्नी की रक्षा करते हैं।
श्लोक 72 (3.12.72)
भार्यायां रक्ष्यमाणायां प्रजा भवति रक्षिता । प्रजायां रक्ष्यमाणायामात्मा भवति रक्षितः ॥
bhāryāyāṃ rakṣyamāṇāyāṃ prajā bhavati rakṣitā | prajāyāṃ rakṣyamāṇāyāmātmā bhavati rakṣitaḥ
पत्नी की रक्षा होने पर सन्तान की रक्षा होती है, और सन्तान की रक्षा होने पर अपनी ही रक्षा होती है।
श्लोक 73 (3.12.73)
आत्मा हि जायेत तस्यां तस्माज्जाया भवत्युत । भर्ता च भार्यया रक्ष्यः कथं जायान्ममोदरे ॥
ātmā hi jāyeta tasyāṃ tasmājjāyā bhavatyuta | bhartā ca bhāryayā rakṣyaḥ kathaṃ jāyānmamodare
क्योंकि पुरुष स्वयं पत्नी में जन्म लेता है, इसी कारण वह 'जाया' कहलाती है। पति की रक्षा भी पत्नी से होती है — (यदि मेरी रक्षा न हो) तो वह मेरे गर्भ से फिर कैसे जन्म लेगा?
श्लोक 74 (3.12.74)
नन्विमे शरणं प्राप्तं न त्यजन्ति कदाचन । ते मां शरणमापन्नां नान्वपद्यन्त पाण्डवाः ॥
nanvime śaraṇaṃ prāptaṃ na tyajanti kadācana | te māṃ śaraṇamāpannāṃ nānvapadyanta pāṇḍavāḥ
ये तो कभी शरण में आए हुए का त्याग नहीं करते; फिर भी जब मैं इनकी शरण में आई, तो पाण्डवों ने मेरा साथ नहीं दिया।
श्लोक 75 (3.12.75)
पञ्चभिः पतिभिर्जाताः कुमारा मे महौजसः । एतेषामप्यवेक्षार्थं त्रातव्याऽस्मि जनार्दन ॥
pañcabhiḥ patibhirjātāḥ kumārā me mahaujasaḥ | eteṣāmapyavekṣārthaṃ trātavyā'smi janārdana
हे जनार्दन, मेरे पाँच पतियों से मेरे महातेजस्वी पुत्र उत्पन्न हुए हैं; उनकी देखभाल के लिए भी मेरी रक्षा होनी चाहिए।
श्लोक 76 (3.12.76)
प्रतिविन्ध्यो युधिष्ठिरात्सुतसोमो वृकोदरात् । अर्जुनाच्छ्रुतकीर्तिश्च शतानीकस्तु नाकुलिः ॥
prativindhyo yudhiṣṭhirātsutasomo vṛkodarāt | arjunācchrutakīrtiśca śatānīkastu nākuliḥ
युधिष्ठिर से प्रतिविन्ध्य, वृकोदर से सुतसोम, अर्जुन से श्रुतकीर्ति, नकुल से शतानीक,
श्लोक 77 (3.12.77)
कनिष्ठाच्छ्रुतकर्मा च सर्वे सत्यपराक्रमाः । प्रद्युम्नो यादृशः कृष्ण तादृशास्ते महारथाः ॥
kaniṣṭhācchrutakarmā ca sarve satyaparākramāḥ | pradyumno yādṛśaḥ kṛṣṇa tādṛśāste mahārathāḥ
और सबसे छोटे (सहदेव) से श्रुतकर्मा — ये सब सच्चे पराक्रम वाले हैं। हे कृष्ण, जैसा प्रद्युम्न है, वैसे ही ये महारथी हैं।
श्लोक 78 (3.12.78)
नन्विमे धनुषि श्रेष्ठा अजेया युधि शात्रवैः । किमर्थं धार्तराष्ट्राणां सहन्ते दुर्बलीयसाम् ॥
nanvime dhanuṣi śreṣṭhā ajeyā yudhi śātravaiḥ | kimarthaṃ dhārtarāṣṭrāṇāṃ sahante durbalīyasām
ये तो धनुर्धरों में श्रेष्ठ हैं और युद्ध में शत्रुओं से अजेय हैं; फिर ये अपने से कहीं दुर्बल धृतराष्ट्रपुत्रों को क्यों सहन करते हैं?
श्लोक 79 (3.12.79)
अधर्मेण हृतं राज्यं सर्वे दासाः कृतास्तथा । सभायां परिकृष्टाऽहमेकवस्त्रा रजस्वला ॥
adharmeṇa hṛtaṃ rājyaṃ sarve dāsāḥ kṛtāstathā | sabhāyāṃ parikṛṣṭā'hamekavastrā rajasvalā
अधर्म से राज्य छीन लिया गया, सबको दास बना दिया गया, और मुझ रजस्वला को एक वस्त्र में सभा में घसीटा गया।
श्लोक 80 (3.12.80)
नाधिज्यमपि यच्छक्यं कर्तुमन्येन गाण्डिवम् । अन्यत्रार्जुनभीमाभ्यां त्वया वा मधुसूदन ॥
nādhijyamapi yacchakyaṃ kartumanyena gāṇḍivam | anyatrārjunabhīmābhyāṃ tvayā vā madhusūdana
हे मधुसूदन, अर्जुन, भीम या आपके सिवा कोई दूसरा तो गाण्डीव पर डोरी भी नहीं चढ़ा सकता।
श्लोक 81 (3.12.81)
धिग्बलं भीमसेनस्य धिक्पार्थस्य च पौरुषम् । यत्र दुर्योधनः कृष्ण मुहूर्तमपि जीवति ॥
dhigbalaṃ bhīmasenasya dhikpārthasya ca pauruṣam | yatra duryodhanaḥ kṛṣṇa muhūrtamapi jīvati
धिक्कार है भीमसेन के बल को, धिक्कार है पार्थ के पौरुष को, कि हे कृष्ण, दुर्योधन एक क्षण भी जीवित है!
श्लोक 82 (3.12.82)
य एतानाक्षिपद्राष्ट्रात्सह मात्राऽविहिंसकान् । अधीयानान्पुरा बालान्व्रतस्थान्मधुसूदन ॥
ya etānākṣipadrāṣṭrātsaha mātrā'vihiṃsakān | adhīyānānpurā bālānvratasthānmadhusūdana
हे मधुसूदन, यह वही है जिसने पहले इन्हें इनकी माता सहित राज्य से निकाल दिया था, जब ये निरपराध बालक थे, विद्या पढ़ते थे और व्रतों का पालन करते थे।
श्लोक 83 (3.12.83)
भोजने भीमसेनस्य पापः प्राक्षेपयद्विषम् । कालकूटं नवं तीक्ष्णं संभृतं रोमहर्षणम् ॥
bhojane bhīmasenasya pāpaḥ prākṣepayadviṣam | kālakūṭaṃ navaṃ tīkṣṇaṃ saṃbhṛtaṃ romaharṣaṇam
उस पापी ने भीमसेन के भोजन में विष डलवाया — ताज़ा, तीखा कालकूट, जो सावधानी से तैयार किया गया था और जिससे रोंगटे खड़े हो जाएँ।
श्लोक 84 (3.12.84)
तज्जीर्णमविकारेण सहान्नेन जनार्दन । सशेषत्वान्महाबाहो भीमस्य पुरुषोत्तम ॥
tajjīrṇamavikāreṇa sahānnena janārdana | saśeṣatvānmahābāho bhīmasya puruṣottama
हे जनार्दन, हे पुरुषोत्तम, वह विष अन्न के साथ बिना कोई विकार किए पच गया, क्योंकि महाबाहु भीम की आयु अभी शेष थी।
श्लोक 85 (3.12.85)
प्रमाणकोट्यां विश्वस्तं तथा सुप्तं वृकोदरम् । बद्ध्वैनं कृष्ण गङ्गायां प्रक्षिप्य पुरमाव्रजत् ॥
pramāṇakoṭyāṃ viśvastaṃ tathā suptaṃ vṛkodaram | baddhvainaṃ kṛṣṇa gaṅgāyāṃ prakṣipya puramāvrajat
हे कृष्ण, प्रमाणकोटि में विश्वासपूर्वक सोए हुए वृकोदर को बाँधकर उसने गंगा में फेंक दिया और नगर लौट आया।
श्लोक 86 (3.12.86)
यदा विबुद्धः कौन्तेयस्तदा संछिद्य बन्धनम् । उदतिष्ठन्महाबाहुर्भीमसेनो महाबलः ॥
yadā vibuddhaḥ kaunteyastadā saṃchidya bandhanam | udatiṣṭhanmahābāhurbhīmaseno mahābalaḥ
जब कुन्तीपुत्र जागे, तो बन्धन तोड़कर महाबली महाबाहु भीमसेन उठ खड़े हुए।
श्लोक 87 (3.12.87)
आशीविषैः कृष्णसर्पैः सुप्तं चैनमदंशयत् । सर्वेष्वेवाङ्गदेशेषु न ममार च शत्रुहा ॥
āśīviṣaiḥ kṛṣṇasarpaiḥ suptaṃ cainamadaṃśayat | sarveṣvevāṅgadeśeṣu na mamāra ca śatruhā
उसने सोते हुए भीम को उनके सारे अंगों पर विषैले काले सर्पों से डँसवाया, फिर भी वे शत्रुहन्ता नहीं मरे।
श्लोक 88 (3.12.88)
प्रतिबुद्धस्तु कौन्तेयः सर्वान्सर्पानपोथयत् । सारथिं चास्य दयितमपहस्तेन जघ्निवान् ॥
pratibuddhastu kaunteyaḥ sarvānsarpānapothayat | sārathiṃ cāsya dayitamapahastena jaghnivān
जागकर कुन्तीपुत्र ने सब सर्पों को कुचल डाला और उसके प्रिय सारथि को उल्टे हाथ से मार डाला।
श्लोक 89 (3.12.89)
पुनः सुप्तानुपाधाक्षीद्बालकान्वारणावते । शयानानार्यया सार्धं को नु तत्कर्तुमर्हति ॥
punaḥ suptānupādhākṣīdbālakānvāraṇāvate | śayānānāryayā sārdhaṃ ko nu tatkartumarhati
फिर वारणावत में उसने अपनी आर्या माता के साथ सोए हुए उन बालकों को जला डालने का प्रयास किया। भला ऐसा काम कौन कर सकता है?
श्लोक 90 (3.12.90)
यत्रार्या रुदती भीता पाण्डवानिदमब्रवीत् । महद्व्यसनमापन्ना शिखिना परिवारिता ॥
yatrāryā rudatī bhītā pāṇḍavānidamabravīt | mahadvyasanamāpannā śikhinā parivāritā
वहाँ भारी विपत्ति में पड़ी, आग से घिरी, रोती और डरी हुई आर्या माता ने पाण्डवों से यह कहा —
कुन्त्युवाच
श्लोक 91 (3.12.91)
हा हतास्मि कुतो न्वद्य भवेच्छान्तिरिहानलात् । अनाथा विनशिष्यामि बालकैः पुत्रकैः सह ॥
hā hatāsmi kuto nvadya bhavecchāntirihānalāt | anāthā vinaśiṣyāmi bālakaiḥ putrakaiḥ saha
हाय, मैं मारी गई! अब इस आग से छुटकारा कैसे होगा? मैं अनाथ अपने नन्हे पुत्रों के साथ नष्ट हो जाऊँगी।
द्रौपद्युवाच
श्लोक 92 (3.12.92)
तत्र भीमो महाबाहुर्वायुवेगपराक्रमः । आर्यामाश्वासयामास भ्रातॄंश्चापि वृकोदरः ॥
tatra bhīmo mahābāhurvāyuvegaparākramaḥ | āryāmāśvāsayāmāsa bhrātṝṃścāpi vṛkodaraḥ
तब वायु के समान वेग और पराक्रम वाले महाबाहु भीम वृकोदर ने आर्या माता को और भाइयों को भी ढाढ़स बँधाया —
भीम उवाच
श्लोक 93 (3.12.93)
वैनतेयो यथा पक्षी गरुत्मान्पततां वरः । तथैवाभिपतिष्यामि भयं वो नेह विद्यते ॥
vainateyo yathā pakṣī garutmānpatatāṃ varaḥ | tathaivābhipatiṣyāmi bhayaṃ vo neha vidyate
जैसे विनतापुत्र पक्षिश्रेष्ठ गरुड़ झपटकर उड़ते हैं, वैसे ही मैं भी (तुम सबको लेकर) छलाँग लगाऊँगा; यहाँ तुम्हें कोई भय नहीं है।
द्रौपद्युवाच
श्लोक 94 (3.12.94)
आर्यामङ्केन वामेन राजानं दक्षिणेन च । अंसयोश्च यमौ कृत्वा पृष्ठे बीभत्सुमेव च ॥
āryāmaṅkena vāmena rājānaṃ dakṣiṇena ca | aṃsayośca yamau kṛtvā pṛṣṭhe bībhatsumeva ca
आर्या माता को बाईं गोद में, राजा युधिष्ठिर को दाहिनी ओर, दोनों जुड़वाँ भाइयों को कंधों पर और बीभत्सु (अर्जुन) को पीठ पर लेकर —
श्लोक 95 (3.12.95)
सहसोत्पत्य वेगेन सर्वानादाय वीर्यवान् । भ्रातॄनार्यां च बलवान्मोक्षयामास पावकात् ॥
sahasotpatya vegena sarvānādāya vīryavān | bhrātṝnāryāṃ ca balavānmokṣayāmāsa pāvakāt
उस बलवान वीर ने सबको उठाकर सहसा वेग से छलाँग लगाई और भाइयों तथा माता को आग से बचा लिया।
श्लोक 96 (3.12.96)
ते रात्रौ प्रस्थिताः सर्वे सह मात्रा यशस्विनः । अभ्यगच्छन्महारण्ये हिडिम्बवनमन्तिकात् ॥
te rātrau prasthitāḥ sarve saha mātrā yaśasvinaḥ | abhyagacchanmahāraṇye hiḍimbavanamantikāt
वे सब यशस्वी रात में माता के साथ चल पड़े और हिडिम्ब वन के निकट के विशाल वन में पहुँचे।
श्लोक 97 (3.12.97)
श्रान्ताः प्रसुप्तास्तत्रेमे मात्रा सह सुदुःखिताः । सुप्तांश्चैनानभ्यगच्छद्धिडिम्बा नाम राक्षसी ॥
śrāntāḥ prasuptāstatreme mātrā saha suduḥkhitāḥ | suptāṃścainānabhyagacchaddhiḍimbā nāma rākṣasī
वहाँ थके हुए और अत्यन्त दुःखी ये सब माता के साथ सो गए; और सोते समय हिडिम्बा नाम की एक राक्षसी उनके पास आई।
श्लोक 98 (3.12.98)
सा दृष्ट्वा पाण्डवांस्तत्र सुप्तान्मात्रा सह क्षितौ । हृच्छयेनाभिभूतात्मा भीमसेनमकामयत् ॥
sā dṛṣṭvā pāṇḍavāṃstatra suptānmātrā saha kṣitau | hṛcchayenābhibhūtātmā bhīmasenamakāmayat
वहाँ माता के साथ भूमि पर सोए हुए पाण्डवों को देखकर वह कामभाव से अभिभूत हो गई और भीमसेन को चाहने लगी।
श्लोक 99 (3.12.99)
भीमस्य पादौ कृत्वा तु स्व उत्सङ्गे ततोऽबला । पर्यमर्दत संहृष्टा कल्याणी मृदुपाणिना ॥
bhīmasya pādau kṛtvā tu sva utsaṅge tato'balā | paryamardata saṃhṛṣṭā kalyāṇī mṛdupāṇinā
तब उस नारी ने भीम के चरणों को अपनी गोद में रख लिया और प्रसन्न होकर वह सुन्दरी अपने कोमल हाथों से उन्हें दबाने लगी।
श्लोक 100 (3.12.100)
तामबुध्यदमेयात्मा बलवान्सत्यविक्रमः । पर्यपृच्छत तां भीमः किमिहेच्छस्यनिन्दिते ॥
tāmabudhyadameyātmā balavānsatyavikramaḥ | paryapṛcchata tāṃ bhīmaḥ kimihecchasyanindite
अप्रमेय आत्मबल वाले, बलवान और सत्यपराक्रमी भीम को उसका आभास हुआ और उन्होंने उससे पूछा — "हे अनिन्दिते, तुम यहाँ क्या चाहती हो?"
श्लोक 101 (3.12.101)
एवमुक्ता तु भीमेन राक्षसी कामरूपिणी । भीमसेनं महात्मानमाह चैवमनिन्दिता ॥
evamuktā tu bhīmena rākṣasī kāmarūpiṇī | bhīmasenaṃ mahātmānamāha caivamaninditā
भीम के ऐसा पूछने पर इच्छानुसार रूप धारण करने वाली उस अनिन्दिता राक्षसी ने महात्मा भीमसेन से कहा —
हिडिम्बोवाच
श्लोक 102 (3.12.102)
पलायध्वमितः क्षिप्रं मम भ्रातैष वीर्यवान् । आगमिष्यति वो हन्तुं तस्माद्गच्छत माचिरम् ॥
palāyadhvamitaḥ kṣipraṃ mama bhrātaiṣa vīryavān | āgamiṣyati vo hantuṃ tasmādgacchata māciram
यहाँ से तुरंत भाग जाओ! मेरा यह पराक्रमी भाई तुम्हें मारने आएगा, इसलिए बिना देर किए चले जाओ।
द्रौपद्युवाच
श्लोक 103 (3.12.103)
अथ भीमोऽभ्युवाचैनां साभिमानमिदं वचः । नोद्विजेयमहं तस्मान्निहनिष्येऽहमागतम् ॥
atha bhīmo'bhyuvācaināṃ sābhimānamidaṃ vacaḥ | nodvijeyamahaṃ tasmānnihaniṣye'hamāgatam
तब भीम ने अभिमानपूर्वक उससे यह कहा — "मैं उससे नहीं डरता। वह आया तो मैं उसे मार डालूँगा।"
श्लोक 104 (3.12.104)
तयोः श्रुत्वा तु संजल्पमागच्छद्राक्षसाधमः । भीमरूपो महानादान्विसृजन्भीमदर्शनः ॥
tayoḥ śrutvā tu saṃjalpamāgacchadrākṣasādhamaḥ | bhīmarūpo mahānādānvisṛjanbhīmadarśanaḥ
उन दोनों की बातचीत सुनकर वह अधम राक्षस आया — भयंकर रूप वाला, देखने में डरावना, और ज़ोर-ज़ोर से गरजता हुआ।
राक्षस उवाच
श्लोक 105 (3.12.105)
केन सार्धं कथयसि आनयैनं ममान्तिकम् । हिडिम्बे भक्षयिष्यामो न चिरं कर्तुमर्हसि ॥
kena sārdhaṃ kathayasi ānayainaṃ mamāntikam | hiḍimbe bhakṣayiṣyāmo na ciraṃ kartumarhasi
तू किससे बातें कर रही है? उसे मेरे पास ले आ। हिडिम्बा, हम उसे खाएँगे। देर मत कर।
द्रौपद्युवाच
श्लोक 106 (3.12.106)
सा कृपासंगृहीतेन हृदयेन मनस्विनी । नैनमैच्छत्तदा कर्तुमनुक्रोशादनिन्दिता ॥
sā kṛpāsaṃgṛhītena hṛdayena manasvinī | nainamaicchattadā kartumanukrośādaninditā
परन्तु करुणा से भरे हृदय वाली उस मनस्विनी, अनिन्दिता राक्षसी ने दयावश वैसा करना नहीं चाहा।
श्लोक 107 (3.12.107)
स नादान्विनदन्घोरान्राक्षसः पुरुषादकः । अभ्यद्रवत वेगेन भीमसेनं तदा किल ॥
sa nādānvinadanghorānrākṣasaḥ puruṣādakaḥ | abhyadravata vegena bhīmasenaṃ tadā kila
तब भयंकर गर्जना करता हुआ वह नरभक्षी राक्षस बड़े वेग से भीमसेन पर टूट पड़ा।
श्लोक 108 (3.12.108)
तमभिद्रुत्य संक्रुद्धो वेगेन महता बली । अगृह्णात्पाणिना पाणिं भीमसेनस्य राक्षसः ॥
tamabhidrutya saṃkruddho vegena mahatā balī | agṛhṇātpāṇinā pāṇiṃ bhīmasenasya rākṣasaḥ
अत्यन्त क्रोध में बड़े वेग से झपटकर उस बलवान राक्षस ने अपने हाथ से भीमसेन का हाथ पकड़ लिया।
श्लोक 109 (3.12.109)
इन्द्राशनिसमस्पर्शं वज्रसंहननं दृढम् । संहत्य भीमसेनाय व्याक्षिपत्सहसा करम् ॥
indrāśanisamasparśaṃ vajrasaṃhananaṃ dṛḍham | saṃhatya bhīmasenāya vyākṣipatsahasā karam
फिर वज्र के समान कठोर और दृढ़, इन्द्र के वज्र के समान स्पर्श वाले अपने हाथ को भींचकर उसने सहसा भीमसेन पर चलाया।
श्लोक 110 (3.12.110)
गृहीतं पाणिना पाणिं भीमसेनस्य रक्षसा । नामृष्यत महाबाहुस्तत्राक्रुध्यद्वृकोदरः ॥
gṛhītaṃ pāṇinā pāṇiṃ bhīmasenasya rakṣasā | nāmṛṣyata mahābāhustatrākrudhyadvṛkodaraḥ
राक्षस द्वारा अपना हाथ पकड़ा जाना महाबाहु वृकोदर सहन न कर सके और क्रुद्ध हो उठे।
श्लोक 111 (3.12.111)
तदासीत्तुमुलं युद्धं भीमसेनहिडिम्बयोः । सर्वास्त्रविदुषोर्घोरं वृत्रवासवयोरिव ॥
tadāsīttumulaṃ yuddhaṃ bhīmasenahiḍimbayoḥ | sarvāstraviduṣorghoraṃ vṛtravāsavayoriva
तब समस्त अस्त्रों के ज्ञाता भीमसेन और हिडिम्ब के बीच वृत्र और इन्द्र के युद्ध के समान भयंकर, घमासान युद्ध हुआ।
श्लोक 112 (3.12.112)
विक्रीड्य सुचिरं भीमो राक्षसेन सहानघ । निजघान महावीर्यस्तं तदा निर्बलं बली ॥
vikrīḍya suciraṃ bhīmo rākṣasena sahānagha | nijaghāna mahāvīryastaṃ tadā nirbalaṃ balī
हे निष्पाप, बहुत देर तक राक्षस के साथ खिलवाड़ करके महापराक्रमी बलवान भीम ने उसके शक्तिहीन हो जाने पर उसे मार डाला।
श्लोक 113 (3.12.113)
हत्वा हिडिम्बं भीमोऽथ प्रस्थितो भ्रातृभिः सह । हिडिम्बामग्रतः कृत्वा यस्यां जातो घटोत्कचः ॥
hatvā hiḍimbaṃ bhīmo'tha prasthito bhrātṛbhiḥ saha | hiḍimbāmagrataḥ kṛtvā yasyāṃ jāto ghaṭotkacaḥ
हिडिम्ब को मारकर भीम उसकी बहन हिडिम्बा को आगे करके भाइयों के साथ चल पड़े; उसी हिडिम्बा से घटोत्कच का जन्म हुआ।
श्लोक 114 (3.12.114)
ततः संप्राद्रवन्सर्वे सह मात्रा परंतपाः । एकचक्रामभिमुखाः संवृता ब्राह्मणव्रजैः ॥
tataḥ saṃprādravansarve saha mātrā paraṃtapāḥ | ekacakrāmabhimukhāḥ saṃvṛtā brāhmaṇavrajaiḥ
फिर शत्रुओं को तपाने वाले वे सब माता के साथ, ब्राह्मणों के समूहों से घिरे हुए, एकचक्रा की ओर चल पड़े।
श्लोक 115 (3.12.115)
प्रस्थाने व्यास एषां च मन्त्री प्रियहिते रतः । ततोऽगच्छन्नेकचक्रां पाण्डवाः संशितव्रताः ॥
prasthāne vyāsa eṣāṃ ca mantrī priyahite rataḥ | tato'gacchannekacakrāṃ pāṇḍavāḥ saṃśitavratāḥ
यात्रा में व्यास जी उनके मन्त्री थे, जो उनके प्रिय और हित में लगे रहते थे। तब कठोर व्रत वाले पाण्डव एकचक्रा पहुँचे।
श्लोक 116 (3.12.116)
तत्राप्यासादयामासुर्बकं नाम महाबलम् । पुरुषादं प्रतिभयं हिडिम्बेनैव संमितम् ॥
tatrāpyāsādayāmāsurbakaṃ nāma mahābalam | puruṣādaṃ pratibhayaṃ hiḍimbenaiva saṃmitam
वहाँ भी उनका सामना बक नामक महाबली नरभक्षी से हुआ, जो भयानक था और हिडिम्ब के ही समान था।
श्लोक 117 (3.12.117)
तं चापि विनिहत्योग्रं भीमः प्रहरतां वरः । सहितो भ्रातृभिः सर्वैर्द्रुपदस्य पुरं ययौ ॥
taṃ cāpi vinihatyograṃ bhīmaḥ praharatāṃ varaḥ | sahito bhrātṛbhiḥ sarvairdrupadasya puraṃ yayau
उस भयंकर राक्षस को भी मारकर योद्धाओं में श्रेष्ठ भीम अपने सब भाइयों के साथ द्रुपद के नगर गए।
श्लोक 118 (3.12.118)
लब्धाऽहमपि तत्रैव वसता सव्यसाचिना । यथा त्वया जिता कृष्ण रुक्मिणी भीष्मकात्मजा ॥
labdhā'hamapi tatraiva vasatā savyasācinā | yathā tvayā jitā kṛṣṇa rukmiṇī bhīṣmakātmajā
वहीं रहते हुए सव्यसाची अर्जुन ने मुझे प्राप्त किया, हे कृष्ण, जैसे आपने भीष्मक की पुत्री रुक्मिणी को जीता था।
श्लोक 119 (3.12.119)
एवं सुयुद्धे पार्थेन जिताऽहं मधुसूदन । स्वयंवरे महत्कर्म कृत्वा न सुकरं परैः ॥
evaṃ suyuddhe pārthena jitā'haṃ madhusūdana | svayaṃvare mahatkarma kṛtvā na sukaraṃ paraiḥ
हे मधुसूदन, इस प्रकार स्वयंवर में, दूसरों के लिए कठिन महान पराक्रम करके, पार्थ ने मुझे उत्तम प्रतियोगिता में जीता।
श्लोक 120 (3.12.120)
एवं क्लेशैः सुबहुभिः क्लिश्यमाना सुदुःखिता । निवसाम्यार्यया हीना कृष्ण धौम्यपुरःसरा ॥
evaṃ kleśaiḥ subahubhiḥ kliśyamānā suduḥkhitā | nivasāmyāryayā hīnā kṛṣṇa dhaumyapuraḥsarā
इस प्रकार अनेक क्लेशों से पीड़ित और अत्यन्त दुःखी मैं, हे कृष्ण, आर्या (सास कुन्ती) से बिछुड़कर धौम्य को आगे रखकर रह रही हूँ।
श्लोक 121 (3.12.121)
त इमे सिंहविक्रान्ता वीर्येणाभ्यधिकाः परैः । निहीनैः परिक्लिश्यन्ति समुपेक्षन्ति मां कथं ॥
ta ime siṃhavikrāntā vīryeṇābhyadhikāḥ paraiḥ | nihīnaiḥ parikliśyanti samupekṣanti māṃ kathaṃ
ये सिंह के समान पराक्रमी, बल में दूसरों से बढ़कर होते हुए भी हीन लोगों से सताए जा रहे हैं; फिर ये मेरी उपेक्षा कैसे कर रहे हैं?
श्लोक 122 (3.12.122)
एतादृशानि दुःखानि सहन्ती दुर्बलीयसाम् । दीर्घकालं प्रदीप्ताऽस्मि पापानां पापकर्मणाम् ॥
etādṛśāni duḥkhāni sahantī durbalīyasām | dīrghakālaṃ pradīptā'smi pāpānāṃ pāpakarmaṇām
अपने से दुर्बल, पापकर्म करने वाले पापियों के दिए ऐसे दुःख सहती हुई मैं बहुत समय से जल रही हूँ।
श्लोक 123 (3.12.123)
कुले महति जाताऽस्मि दिव्येन विधिना किल । पाण्डवानां प्रिया भार्या स्नुषा पाण्डोर्महात्मनः ॥
kule mahati jātā'smi divyena vidhinā kila | pāṇḍavānāṃ priyā bhāryā snuṣā pāṇḍormahātmanaḥ
मैं दैवी विधान से महान कुल में उत्पन्न हुई हूँ; मैं पाण्डवों की प्रिय पत्नी और महात्मा पाण्डु की पुत्रवधू हूँ।
श्लोक 124 (3.12.124)
केशग्रहमनुप्राप्ता का नु जीवेत मादृशी । पञ्चानामिन्द्रकल्पानां प्रेक्षतां मधुसूदन ॥
keśagrahamanuprāptā kā nu jīveta mādṛśī | pañcānāmindrakalpānāṃ prekṣatāṃ madhusūdana
हे मधुसूदन, इन्द्र के समान पाँच वीरों के देखते-देखते मेरे केश पकड़े गए — मुझ जैसी कौन स्त्री फिर भी जीवित रह सकती है?
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 125 (3.12.125)
इत्युक्त्वा प्रारुदत्कृष्णा मुखं प्रच्छाद्य पाणिना । पद्मकोशप्रकाशेन मृदुना मृदुभाषिणी ॥
ityuktvā prārudatkṛṣṇā mukhaṃ pracchādya pāṇinā | padmakośaprakāśena mṛdunā mṛdubhāṣiṇī
ऐसा कहकर मधुरभाषिणी कृष्णा ने कमल-कोश के समान कान्तिमान अपने कोमल हाथ से मुख ढक लिया और रोने लगी।
श्लोक 126 (3.12.126)
स्तनावपतितौ पीनौ सुजातौ शुभलक्षणौ । अभ्यवर्षत पाञ्चाली दुःखजैरश्रुबिन्दुभिः ॥
stanāvapatitau pīnau sujātau śubhalakṣaṇau | abhyavarṣata pāñcālī duḥkhajairaśrubindubhiḥ
पाञ्चाली ने दुःख से उपजे गिरते हुए आँसुओं से अपने पुष्ट, सुडौल और शुभ लक्षणों वाले स्तनों को भिगो दिया।
श्लोक 127 (3.12.127)
चक्षुषी परिमार्जन्ती निःश्वसन्ती पुनः पुनः । बाष्पपूर्णेन कण्ठेन क्रुद्धा वचनमब्रवीत् ॥
cakṣuṣī parimārjantī niḥśvasantī punaḥ punaḥ | bāṣpapūrṇena kaṇṭhena kruddhā vacanamabravīt
बार-बार आँखें पोंछती और लम्बी साँसें लेती हुई वह आँसुओं से रुँधे कण्ठ से क्रोधपूर्वक बोली —
द्रौपद्युवाच
श्लोक 128 (3.12.128)
नैव मे पतयः सन्ति न पुत्रा न च बान्धवाः । न भ्रातरो न च पिता नैव त्वं मधुसूदन ॥
naiva me patayaḥ santi na putrā na ca bāndhavāḥ | na bhrātaro na ca pitā naiva tvaṃ madhusūdana
मेरे न पति हैं, न पुत्र, न बन्धु-बान्धव; न भाई हैं, न पिता, और हे मधुसूदन, न आप ही हैं —
श्लोक 129 (3.12.129)
ये मां विप्रकृतां क्षुद्रैरुपेक्षध्वं विशोकवत् । न च मे शाम्यते दुःखं कर्णो यत्प्राहसत्तदा ॥
ye māṃ viprakṛtāṃ kṣudrairupekṣadhvaṃ viśokavat | na ca me śāmyate duḥkhaṃ karṇo yatprāhasattadā
आप सबने नीचों द्वारा मेरा अपमान होते देख ऐसे उपेक्षा की मानो आपको कोई शोक ही न हो। और कर्ण ने उस समय जो मेरी हँसी उड़ाई, उसका दुःख मेरे मन से शान्त नहीं होता।
श्लोक 130 (3.12.130)
चतुर्भिः कारणैः कृष्ण त्वया रक्ष्याऽस्मि नित्यशः । संबन्धाद्गौरवात्सख्यात्प्रभुत्वेनैव केशव ॥
caturbhiḥ kāraṇaiḥ kṛṣṇa tvayā rakṣyā'smi nityaśaḥ | saṃbandhādgauravātsakhyātprabhutvenaiva keśava
हे कृष्ण, चार कारणों से आपको सदा मेरी रक्षा करनी चाहिए — सम्बन्ध के कारण, गौरव के कारण, सख्य के कारण और सामर्थ्य के कारण, हे केशव।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 131 (3.12.131)
अथ तामब्रवीत्कृष्णस्तस्मिन्वीरसमागमे । रोदिष्यन्ति स्त्रियो ह्येवं येषां क्रुद्धासि भामिनि ॥
atha tāmabravītkṛṣṇastasminvīrasamāgame | rodiṣyanti striyo hyevaṃ yeṣāṃ kruddhāsi bhāmini
तब वीरों के उस समागम में श्रीकृष्ण ने उससे कहा — "हे भामिनि, जिन पर तुम क्रुद्ध हो, उनकी स्त्रियाँ भी इसी प्रकार रोएँगी,
वासुदेव उवाच
श्लोक 132 (3.12.132)
बीभत्सुशरसंछन्नाञ्शोणितौघपरिप्लुतान् । निहतान्वल्लभान्वीक्ष्य शयानान्वसुधातले ॥
bībhatsuśarasaṃchannāñśoṇitaughapariplutān | nihatānvallabhānvīkṣya śayānānvasudhātale
जब वे अपने प्रियजनों को बीभत्सु (अर्जुन) के बाणों से ढके, रक्त की धाराओं में डूबे, मरकर भूमि पर पड़े देखेंगी।
श्लोक 133 (3.12.133)
यत्समर्थं पाण्डवानां तत्करिष्यामि मा शुचः । सत्यं ते प्रतिजानामि राज्ञां राज्ञी भविष्यसि ॥
yatsamarthaṃ pāṇḍavānāṃ tatkariṣyāmi mā śucaḥ | satyaṃ te pratijānāmi rājñāṃ rājñī bhaviṣyasi
पाण्डवों के लिए जो उचित होगा, वह मैं करूँगा; शोक मत करो। मैं तुमसे सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ — तुम राजाओं की रानी बनोगी।
श्लोक 134 (3.12.134)
पतेद्द्यौर्हिमवाञ्शीर्येत्पृथिवी शकली भवेत् । शुष्येत्तोयनिधिः कृष्णे न मे मोघं वचो भवेत् ॥
pateddyaurhimavāñśīryetpṛthivī śakalī bhavet | śuṣyettoyanidhiḥ kṛṣṇe na me moghaṃ vaco bhavet
चाहे आकाश गिर पड़े, हिमालय फट जाए, पृथ्वी टुकड़े-टुकड़े हो जाए, समुद्र सूख जाए — पर हे कृष्णे, मेरा वचन व्यर्थ नहीं होगा।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 135 (3.12.135)
तच्छ्रुत्वा द्रौपदी वाक्यं प्रतिवाक्यमथाच्युतात् । साचीकृतमवैक्षत्सा पाञ्चाली मध्यमं पतिम् ॥
tacchrutvā draupadī vākyaṃ prativākyamathācyutāt | sācīkṛtamavaikṣatsā pāñcālī madhyamaṃ patim
अच्युत का यह प्रत्युत्तर सुनकर पाञ्चाली द्रौपदी ने तिरछी दृष्टि से अपने मझले पति (अर्जुन) की ओर देखा।
श्लोक 136 (3.12.136)
आबभाषे महाराज द्रौपदीमर्जुनस्तदा । मा रोदीः शुभताम्राक्षि यदाह मधुसूदनः । तथा तद्भविता देवि नान्यथा वरवर्णिनि ॥
ābabhāṣe mahārāja draupadīmarjunastadā | mā rodīḥ śubhatāmrākṣi yadāha madhusūdanaḥ | tathā tadbhavitā devi nānyathā varavarṇini
हे महाराज, तब अर्जुन ने द्रौपदी से कहा — "हे सुन्दर ताम्रवर्ण नेत्रों वाली, रोओ मत। हे देवि, हे वरवर्णिनि, मधुसूदन ने जो कहा है, वह वैसा ही होगा, अन्यथा नहीं।"
धृष्टद्युम्न उवाच
श्लोक 137 (3.12.137)
अहं द्रोणं हनिष्यामि शिखण्डी तु पितामहम् । दुर्योधनं भीमसेनः कर्णं हन्ता धनंजयः ॥
ahaṃ droṇaṃ haniṣyāmi śikhaṇḍī tu pitāmaham | duryodhanaṃ bhīmasenaḥ karṇaṃ hantā dhanaṃjayaḥ
मैं द्रोण को मारूँगा, शिखण्डी पितामह (भीष्म) को, भीमसेन दुर्योधन को, और धनंजय कर्ण को मारेंगे।
श्लोक 138 (3.12.138)
रामकृष्णौ व्यपाश्रित्य अजेयाः स्म रणे स्वसः । अपि वृत्रहणा युद्धे किं पुनर्धृतराष्ट्रजैः ॥
rāmakṛṣṇau vyapāśritya ajeyāḥ sma raṇe svasaḥ | api vṛtrahaṇā yuddhe kiṃ punardhṛtarāṣṭrajaiḥ
बहन, बलराम और कृष्ण का आश्रय लेकर हम युद्ध में वृत्रहन्ता इन्द्र से भी अजेय हैं, फिर धृतराष्ट्र के पुत्रों की तो बात ही क्या?
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 139 (3.12.139)
इत्युक्तेऽभिमुखा वीरा वासुदेवमुपस्थिताः । तेषां मध्ये महाबाहुः केशवो वाक्यमब्रवीत् ॥
ityukte'bhimukhā vīrā vāsudevamupasthitāḥ | teṣāṃ madhye mahābāhuḥ keśavo vākyamabravīt
यह कहे जाने पर सब वीर वासुदेव की ओर मुख करके उनके पास आ खड़े हुए, और उनके बीच महाबाहु केशव ने ये वचन कहे।