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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 102

विष्णु और ब्रह्मा द्वारा देवताओं को अगस्त्य के पास भेजना

देवता विष्णु से कहते हैं कि रात में अज्ञात हाथों से ब्राह्मण मारे जा रहे हैं, और उनके साथ पृथ्वी और स्वर्ग भी नष्ट हो जाएँगे। विष्णु बताते हैं कि वृत्र की मृत्यु के बाद से समुद्र में छिपे कालेय ही हत्यारे हैं, और समुद्र को सुखाना होगा। ब्रह्मा इसकी पुष्टि करते हैं और कहते हैं कि मित्रावरुण के पुत्र अगस्त्य ही समुद्र को पी सकते हैं। देवता अगस्त्य के आश्रम में जाकर नहुष को गिराने, विन्ध्य को रोकने और प्रजा को सुख देने के लिए उनकी स्तुति करते हैं और उनसे एक वर माँगते हैं।

अध्याय 101अध्याय-सूचीअध्याय 103

देवा ऊचुः

श्लोक 1 (3.102.1)

तव प्रसादाद्वर्धन्ते प्रजाः सर्वाश्चतुर्विधाः । ता भाविता भावयन्ति हव्यकव्यैर्दिवौकसः ॥

tava prasādādvardhante prajāḥ sarvāścaturvidhāḥ | tā bhāvitā bhāvayanti havyakavyairdivaukasaḥ

'आपकी कृपा से चारों प्रकार की सारी प्रजा बढ़ती है; पोषित होकर वह हव्य और कव्य से स्वर्गवासियों का पोषण करती है।

श्लोक 2 (3.102.2)

लोका ह्येवं विवर्धन्ते ह्यन्योन्यं समुपाश्रिताः । त्वत्प्रसादान्निरुद्विग्नास्त्वयैव परिरक्षिताः ॥

lokā hyevaṃ vivardhante hyanyonyaṃ samupāśritāḥ | tvatprasādānnirudvignāstvayaiva parirakṣitāḥ

इस प्रकार एक-दूसरे पर आश्रित होकर लोक बढ़ते हैं — आपकी कृपा से निर्भय, और आप ही से सुरक्षित।

श्लोक 3 (3.102.3)

इदं च समनुप्राप्तं लोकानां भयमुत्तमम् । न च जानीम केनेति रात्रौ वध्यन्ति ब्राह्मणाः ॥

idaṃ ca samanuprāptaṃ lokānāṃ bhayamuttamam | na ca jānīma keneti rātrau vadhyanti brāhmaṇāḥ

और अब लोकों पर यह घोर भय आ पड़ा है: हम नहीं जानते कि रात में ब्राह्मणों का वध कौन कर रहा है।

श्लोक 4 (3.102.4)

क्षीणेषु च ब्राह्मणेषु पृथिवी क्षयमेष्यति । ततः पृथिव्यां क्षीणायां त्रिदिवं क्षयमेष्यति ॥

kṣīṇeṣu ca brāhmaṇeṣu pṛthivī kṣayameṣyati | tataḥ pṛthivyāṃ kṣīṇāyāṃ tridivaṃ kṣayameṣyati

ब्राह्मणों के नष्ट होने पर पृथ्वी नष्ट हो जाएगी, और पृथ्वी के नष्ट होने पर स्वर्ग भी नष्ट हो जाएगा।

श्लोक 5 (3.102.5)

त्वत्प्रसादान्महाबाहो लोकाः सर्वे जगत्पते । विनाशं नाधिगच्छेयुस्त्वया वै परिरक्षिताः ॥

tvatprasādānmahābāho lokāḥ sarve jagatpate | vināśaṃ nādhigaccheyustvayā vai parirakṣitāḥ

हे महाबाहु जगत्पति, आपकी कृपा से आपके द्वारा सुरक्षित सब लोक विनाश को प्राप्त न हों।'

विष्णुरुवाच

श्लोक 6 (3.102.6)

विदितं मे सुराः सर्वं प्रजानां क्षयकारणम् । भवतां चापि वक्ष्यामि शृणुध्वं विगतज्वराः ॥

viditaṃ me surāḥ sarvaṃ prajānāṃ kṣayakāraṇam | bhavatāṃ cāpi vakṣyāmi śṛṇudhvaṃ vigatajvarāḥ

'देवताओ, प्रजा के विनाश का सारा कारण मुझे ज्ञात है। मैं तुम्हें भी बताता हूँ; निश्चिन्त होकर सुनो।

श्लोक 7 (3.102.7)

कालेया इति विख्याता गणाः परमदारुणाः । तैश्च वृत्रं समाश्रित्य जगत्सर्वं प्रमाथितम् ॥

kāleyā iti vikhyātā gaṇāḥ paramadāruṇāḥ | taiśca vṛtraṃ samāśritya jagatsarvaṃ pramāthitam

कालेय नाम से विख्यात अत्यन्त क्रूर दानवों के दल हैं। उन्होंने वृत्र का आश्रय लेकर सारे जगत को मथ डाला था।

श्लोक 8 (3.102.8)

ते वृत्रं निहतं दृष्ट्वा सहस्राक्षेण धीमता । जीवितं परिरक्षन्तः प्रविष्टा वरुणालयम् ॥

te vṛtraṃ nihataṃ dṛṣṭvā sahasrākṣeṇa dhīmatā | jīvitaṃ parirakṣantaḥ praviṣṭā varuṇālayam

बुद्धिमान सहस्राक्ष इन्द्र द्वारा वृत्र को मारा गया देखकर वे अपने प्राण बचाने के लिए वरुणालय (समुद्र) में घुस गए।

श्लोक 9 (3.102.9)

ते प्रविश्योदधिं घोरं नक्रग्राहसमाकुलम् । उत्सादनार्थं लोकानां रात्रौ घ्नन्ति ऋषीनिह ॥

te praviśyodadhiṃ ghoraṃ nakragrāhasamākulam | utsādanārthaṃ lokānāṃ rātrau ghnanti ṛṣīniha

नाकों और ग्राहों से भरे उस भयंकर समुद्र में प्रवेश करके वे लोकों को उजाड़ने के लिए रात में यहाँ ऋषियों को मारते हैं।

श्लोक 10 (3.102.10)

न तु शक्याः क्षयं नेतुं समुद्राश्रयिणो हि ते । समुद्रस्य क्षये बुद्धिर्भवद्भिः संप्रधार्यताम् ॥

na tu śakyāḥ kṣayaṃ netuṃ samudrāśrayiṇo hi te | samudrasya kṣaye buddhirbhavadbhiḥ saṃpradhāryatām

परन्तु उन्हें नष्ट नहीं किया जा सकता, क्योंकि वे समुद्र के आश्रय में हैं। तुम्हें समुद्र को सुखाने का उपाय सोचना चाहिए।'

लोमश उवाच

श्लोक 11 (3.102.11)

एतच्छ्रुत्वा वचो देवा विष्णुना समुदीरितम् । विष्णुमेव पुरस्कृत्यब्रह्माणं समुपस्थिताः ॥

etacchrutvā vaco devā viṣṇunā samudīritam | viṣṇumeva puraskṛtyabrahmāṇaṃ samupasthitāḥ

विष्णु के कहे ये वचन सुनकर देवता विष्णु को ही आगे करके ब्रह्मा के पास उपस्थित हुए।

श्लोक 12 (3.102.12)

ततस्ते प्रणता भूत्वा तमेवार्थं न्यवेदयन् । सर्वलोकविनाशार्थं कालेयाः कृतनिश्चयाः ॥

tataste praṇatā bhūtvā tamevārthaṃ nyavedayan | sarvalokavināśārthaṃ kāleyāḥ kṛtaniścayāḥ

तब उन्होंने प्रणाम करके वही बात उनसे निवेदन की कि कालेयों ने सब लोकों का विनाश करने का निश्चय कर लिया है।

श्लोक 13 (3.102.13)

एषां तद्वचनं श्रुत्वा पद्मयोनिः सनातनः । उवाच परमप्रीतस्त्रिदशानर्थवद्वचः ॥

eṣāṃ tadvacanaṃ śrutvā padmayoniḥ sanātanaḥ | uvāca paramaprītastridaśānarthavadvacaḥ

उनकी बात सुनकर सनातन पद्मयोनि ब्रह्मा अत्यन्त प्रसन्न होकर देवताओं से यह सार्थक वचन बोले —

ब्रह्मोवाच

श्लोक 14 (3.102.14)

विदितं मे सुराः सर्वे दानवानां विचेष्टितम् । मनुष्यादेश्च निधनं कालेयैः कालचोदितैः ॥

viditaṃ me surāḥ sarve dānavānāṃ viceṣṭitam | manuṣyādeśca nidhanaṃ kāleyaiḥ kālacoditaiḥ

'देवताओ, दानवों की सारी करतूत मुझे ज्ञात है, और काल से प्रेरित कालेयों द्वारा मनुष्य आदि का वध भी।

श्लोक 15 (3.102.15)

क्षयस्तेषामनुप्राप्तः कालेनोपहताश्च ये । उपायं संप्रवक्ष्यामि समुद्रस्य विशोषणे ॥

kṣayasteṣāmanuprāptaḥ kālenopahatāśca ye | upāyaṃ saṃpravakṣyāmi samudrasya viśoṣaṇe

उनका विनाश आ पहुँचा है; वे काल के मारे हुए हैं। मैं तुम्हें समुद्र को सुखाने का उपाय बताता हूँ।

श्लोक 16 (3.102.16)

अगस्त्य इतिविख्यातो वारुणिः सुसमाहितः । तमुपागम्य सहिता इममर्थं प्रयाचत ॥

agastya itivikhyāto vāruṇiḥ susamāhitaḥ | tamupāgamya sahitā imamarthaṃ prayācata

मित्रावरुण के पुत्र अगस्त्य नाम से विख्यात एक अत्यन्त एकाग्रचित्त मुनि हैं। तुम सब मिलकर उनके पास जाओ और उनसे यह प्रार्थना करो।

श्लोक 17 (3.102.17)

स हि शक्तो महातेजाः क्षणात्पातुं महोदधिम् । अगस्त्येन विना को हि शक्तोऽन्योऽर्णवशोषणे ॥

sa hi śakto mahātejāḥ kṣaṇātpātuṃ mahodadhim | agastyena vinā ko hi śakto'nyo'rṇavaśoṣaṇe

क्योंकि वह महातेजस्वी मुनि क्षणभर में महासागर को पी सकता है। अगस्त्य के बिना और कौन समुद्र को सुखाने में समर्थ है?

श्लोक 18 (3.102.18)

अन्यथा हि न शक्यास्ते विना सागरशोषणम् । समुद्रे च क्षयं नीते कालेयान्निहनिष्यथ ॥

anyathā hi na śakyāste vinā sāgaraśoṣaṇam | samudre ca kṣayaṃ nīte kāleyānnihaniṣyatha

समुद्र को सुखाए बिना और किसी प्रकार उन्हें वश में नहीं किया जा सकता। समुद्र के सूख जाने पर तुम कालेयों को मार डालोगे।'

लोमश उवाच

श्लोक 19 (3.102.19)

एवं श्रुत्वा वचो देवा ब्रह्मणः परमेष्ठिनः । परमेष्ठिनमाज्ञाप्यअगस्त्यस्याश्रमं ययुः ॥

evaṃ śrutvā vaco devā brahmaṇaḥ parameṣṭhinaḥ | parameṣṭhinamājñāpyaagastyasyāśramaṃ yayuḥ

परमेष्ठी ब्रह्मा के ये वचन सुनकर देवता उनसे विदा लेकर अगस्त्य के आश्रम में गए।

श्लोक 20 (3.102.20)

तत्रापश्यन्महात्मानं वारुणिं दीप्ततेजसम् । उपास्यमानमृषिभिर्देवैरिव पितामहम् ॥

tatrāpaśyanmahātmānaṃ vāruṇiṃ dīptatejasam | upāsyamānamṛṣibhirdevairiva pitāmaham

वहाँ उन्होंने देदीप्यमान तेज वाले महात्मा वारुणि (अगस्त्य) को देखा, जिनकी सेवा ऋषि वैसे ही कर रहे थे जैसे देवता पितामह की करते हैं।

श्लोक 21 (3.102.21)

तेऽभिगम्य महात्मानं मैत्रावरुणिमच्युतम् । आश्रमस्थं तपोराशिं कर्मभिः स्वैस्तु तुष्टुवुः ॥

te'bhigamya mahātmānaṃ maitrāvaruṇimacyutam | āśramasthaṃ taporāśiṃ karmabhiḥ svaistu tuṣṭuvuḥ

आश्रम में विराजमान, तप के भण्डार, अच्युत, महात्मा मैत्रावरुणि के पास जाकर देवताओं ने उनके अपने ही कर्मों का बखान करते हुए उनकी स्तुति की।

देवा ऊचुः

श्लोक 22 (3.102.22)

नहुषेणाभितप्तानां त्वं लोकानां गतिः पुरा । भ्रंशितश्च सुरैश्वर्याल्लोकार्थं लोककण्टकः ॥

nahuṣeṇābhitaptānāṃ tvaṃ lokānāṃ gatiḥ purā | bhraṃśitaśca suraiśvaryāllokārthaṃ lokakaṇṭakaḥ

'प्राचीन काल में जब नहुष से लोक संतप्त थे, तब आप ही उनके आश्रय बने थे; और लोकों के उस काँटे को आपने लोकहित के लिए देवताओं के ऐश्वर्य से च्युत कर दिया था।

श्लोक 23 (3.102.23)

क्रोधात्प्रवृद्धस्तरणं भास्करस्य नभोगतः । वचस्तवानतिक्रामन्विन्ध्यः शैलो न वर्धते ॥

krodhātpravṛddhastaraṇaṃ bhāskarasya nabhogataḥ | vacastavānatikrāmanvindhyaḥ śailo na vardhate

क्रोध से बढ़कर सूर्य के मार्ग को लाँघता हुआ आकाश तक उठ गया विन्ध्य पर्वत आपके वचन का उल्लंघन न करने के कारण अब नहीं बढ़ता।

श्लोक 24 (3.102.24)

तमसा चावृतेलोके मृत्युनाऽभ्यर्दिताः प्रजाः । त्वामेव नाथमासाद्य निर्वृतिं परमां गताः ॥

tamasā cāvṛteloke mṛtyunā'bhyarditāḥ prajāḥ | tvāmeva nāthamāsādya nirvṛtiṃ paramāṃ gatāḥ

जब लोक अन्धकार से ढक गया था और प्रजा मृत्यु से पीड़ित थी, तब आपको ही रक्षक पाकर उसे परम शान्ति मिली थी।

श्लोक 25 (3.102.25)

अस्माकं भयभीतानां नित्यशो भगवान्गतिः । ततस्त्वार्ताः प्रयाचामो वरं त्वां वरदो ह्यसि ॥

asmākaṃ bhayabhītānāṃ nityaśo bhagavāngatiḥ | tatastvārtāḥ prayācāmo varaṃ tvāṃ varado hyasi

हम भयभीतों के आप भगवान ही सदा आश्रय हैं। इसलिए दुःखी होकर हम आपसे एक वर माँगते हैं, क्योंकि आप वर देने वाले हैं।'

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