आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 101
कालेयों द्वारा आश्रमों का विनाश और देवताओं का नारायण की शरण में जाना
दिन में समुद्र में छिपे कालेय रात को बाहर निकलकर वसिष्ठ, च्यवन और भरद्वाज के आश्रमों में मुनियों को खा जाते हैं, यहाँ तक कि भूमि अस्थियों और टूटे यज्ञपात्रों से पट जाती है और स्वाध्याय तथा यज्ञ बन्द हो जाते हैं। मनुष्य भय से भागते हैं, और दानवों को खोजने वाले उन्हें पा नहीं सकते। दुःखी देवता इन्द्र के साथ नारायण के पास जाकर उन्हें स्रष्टा, पालक और संहारक कहकर उनकी स्तुति करते हैं, वराह, नृसिंह और वामन के रूप में किए उनके कर्मों तथा जम्भ के वध का स्मरण करते हैं, और लोकों की रक्षा की प्रार्थना करते हैं।
लोमश उवाच
श्लोक 1 (3.101.1)
समुद्रं ते समाश्रित्य वरुणं निधिमम्भसः । कालेयाः संप्रवर्तन्त त्रैलोक्यस्य विनाशने ॥
samudraṃ te samāśritya varuṇaṃ nidhimambhasaḥ | kāleyāḥ saṃpravartanta trailokyasya vināśane
जल के भण्डार वरुण (समुद्र) का आश्रय लेकर कालेय तीनों लोकों के विनाश में लग गए।
श्लोक 2 (3.101.2)
ते रात्रौ समभिक्रुद्धा भक्षयन्ति सदा मुनीन् । आश्रमेषु च ये सन्ति पुण्येष्वायतनेषु च ॥
te rātrau samabhikruddhā bhakṣayanti sadā munīn | āśrameṣu ca ye santi puṇyeṣvāyataneṣu ca
वे रात में अत्यन्त क्रुद्ध होकर उन मुनियों को खा जाते थे जो आश्रमों और पवित्र तीर्थस्थानों में रहते थे।
श्लोक 3 (3.101.3)
वसिष्ठस्याश्रमे विप्रा भक्षितास्तैर्दुरात्मभिः । अशीतिः शतमष्टौ च नव चान्ये तपस्विनः ॥
vasiṣṭhasyāśrame viprā bhakṣitāstairdurātmabhiḥ | aśītiḥ śatamaṣṭau ca nava cānye tapasvinaḥ
वसिष्ठ के आश्रम में उन दुरात्माओं ने एक सौ अठासी ब्राह्मणों और नौ अन्य तपस्वियों को खा डाला।
श्लोक 4 (3.101.4)
च्यवनस्याश्रमं गत्वा पुण्यं द्विजनिषेवितम् । फलमूलाशनानां हि मुनीनां भक्षितं शतम् ॥
cyavanasyāśramaṃ gatvā puṇyaṃ dvijaniṣevitam | phalamūlāśanānāṃ hi munīnāṃ bhakṣitaṃ śatam
द्विजों से सेवित च्यवन के पवित्र आश्रम में जाकर उन्होंने फल-मूल खाकर रहने वाले सौ मुनियों को खा लिया।
श्लोक 5 (3.101.5)
एवं रात्रौ स्म कुर्वन्ति विविशुश्चार्णवं दिवा । कालेयास्ते दुरात्मानो भक्षयन्तस्तपोधनान् ॥
evaṃ rātrau sma kurvanti viviśuścārṇavaṃ divā | kāleyāste durātmāno bhakṣayantastapodhanān
इस प्रकार वे रात में यह करते और दिन में समुद्र में घुस जाते — वे दुरात्मा कालेय, जो तपोधनों को खाते फिरते थे।
श्लोक 6 (3.101.6)
भरद्वाजाश्रमे चैव नियता ब्रह्मचारिणः । वाय्वाहाराम्बुभक्षाश्च विंशतिः संनिषूदिताः ॥
bharadvājāśrame caiva niyatā brahmacāriṇaḥ | vāyvāhārāmbubhakṣāśca viṃśatiḥ saṃniṣūditāḥ
भरद्वाज के आश्रम में भी वायु और जल पर रहने वाले बीस संयमी ब्रह्मचारी मार डाले गए।
श्लोक 7 (3.101.7)
एवं क्रमेण सर्वांस्तानाश्रमान्दानवास्तदा । निशायां परिबाधन्ते समुद्राम्बुबलाश्रयात् । कालोपसृष्टाः कालेया घ्नन्तो द्विजगणान्बहून् ॥
evaṃ krameṇa sarvāṃstānāśramāndānavāstadā | niśāyāṃ paribādhante samudrāmbubalāśrayāt | kālopasṛṣṭāḥ kāleyā ghnanto dvijagaṇānbahūn
इस प्रकार दानव समुद्र के जल के बल के भरोसे रात में एक-एक करके उन सब आश्रमों को सताते रहे; काल के वश हुए कालेय बहुत-से द्विजों का संहार करते रहे।
श्लोक 8 (3.101.8)
न चैनानन्वबुध्यन्त मनुजा मनुजोत्तम । एवं प्रवृत्तान्दैत्यांस्तांस्तापसेषु तपस्विषु ॥
na cainānanvabudhyanta manujā manujottama | evaṃ pravṛttāndaityāṃstāṃstāpaseṣu tapasviṣu
हे मनुष्यों में श्रेष्ठ, तपस्वियों और मुनियों के बीच इस प्रकार विचरने वाले उन दैत्यों का मनुष्यों को पता न चल सका।
श्लोक 9 (3.101.9)
क्षयाय जगतः क्रूराः पर्यटन्ति स्म मेदिनीम् ॥
kṣayāya jagataḥ krūrāḥ paryaṭanti sma medinīm
वे क्रूर दानव जगत का विनाश करने के लिए पृथ्वी पर घूमते रहते थे।
श्लोक 10 (3.101.10)
प्रभाते समदृश्यन्त नियताहारकर्शिताः । महीतलस्था मुनयः शरीरैर्गतजीवितैः ॥
prabhāte samadṛśyanta niyatāhārakarśitāḥ | mahītalasthā munayaḥ śarīrairgatajīvitaiḥ
प्रातःकाल नियमित आहार से कृश हुए मुनि निर्जीव शरीरों के साथ भूमि पर पड़े दिखाई देते थे।
श्लोक 11 (3.101.11)
क्षीणमांसैर्विरुधिरैर्विमज्जान्त्रैर्विसन्धिभिः । आकीर्णैराचिता भूमिः शङ्खानामिव राशिभिः ॥
kṣīṇamāṃsairvirudhirairvimajjāntrairvisandhibhiḥ | ākīrṇairācitā bhūmiḥ śaṅkhānāmiva rāśibhiḥ
मांस-रहित, रक्त-रहित, मज्जा और आँतों से रहित, जोड़ों से टूटे बिखरे शरीरों से धरती ऐसी पट गई मानो शंखों के ढेर लगे हों।
श्लोक 12 (3.101.12)
कलशैर्विप्रविद्धैश्च स्रुवैर्भग्नैस्तथैव च । विकीर्णैरग्निहोत्रैश्च भूर्बभूव समावृता ॥
kalaśairvipraviddhaiśca sruvairbhagnaistathaiva ca | vikīrṇairagnihotraiśca bhūrbabhūva samāvṛtā
इधर-उधर फेंके गए कलशों, टूटे स्रुवों और बिखरे अग्निहोत्रों से भूमि ढक गई।
श्लोक 13 (3.101.13)
निःस्वाध्यायवषट्कारं नष्टयज्ञोत्सवक्रियम् । जगदासीन्निरुत्साहं कालेयभयपीडितम् ॥
niḥsvādhyāyavaṣaṭkāraṃ naṣṭayajñotsavakriyam | jagadāsīnnirutsāhaṃ kāleyabhayapīḍitam
न स्वाध्याय रहा, न वषट्कार; यज्ञ और उत्सवों की क्रियाएँ नष्ट हो गईं; कालेयों के भय से पीड़ित जगत उत्साहहीन हो गया।
श्लोक 14 (3.101.14)
एवं संक्षीयमाणाश्च मानवा मनुजेश्वर । आत्मत्राणपरा भीताः प्राद्रवन्त दिशो भयात् ॥
evaṃ saṃkṣīyamāṇāśca mānavā manujeśvara | ātmatrāṇaparā bhītāḥ prādravanta diśo bhayāt
हे नरेश्वर, इस प्रकार नष्ट होते मनुष्य केवल अपनी रक्षा की चिन्ता में भयभीत होकर सब दिशाओं में भाग गए।
श्लोक 15 (3.101.15)
केचिद्गुहाः प्रविविशुर्निर्झरांश्चापरे श्रिताः । अपरे मरणोद्विग्ना भयात्प्राणान्समुत्सृजन् ॥
kecidguhāḥ praviviśurnirjharāṃścāpare śritāḥ | apare maraṇodvignā bhayātprāṇānsamutsṛjan
कुछ गुफाओं में घुस गए, कुछ ने झरनों का आश्रय लिया, और कुछ ने मृत्यु से घबराकर भय के मारे ही प्राण त्याग दिए।
श्लोक 16 (3.101.16)
केचिदत्रमहेष्वासाः शूराः परमहर्षिताः । मार्गमाणाः परं यत्नं दानवानां प्रचक्रिरे ॥
kecidatramaheṣvāsāḥ śūrāḥ paramaharṣitāḥ | mārgamāṇāḥ paraṃ yatnaṃ dānavānāṃ pracakrire
यहाँ कुछ महाधनुर्धर, अत्यन्त उत्साही शूरवीरों ने दानवों को खोजते हुए बड़ा प्रयत्न किया।
श्लोक 17 (3.101.17)
न चैतानधिजग्मुस्ते समुद्रं समुपाश्रितान् । श्रमं जग्मुश्च परममाजग्मुः क्षयमेव च ॥
na caitānadhijagmuste samudraṃ samupāśritān | śramaṃ jagmuśca paramamājagmuḥ kṣayameva ca
परन्तु समुद्र में छिपे होने के कारण वे उन्हें पा न सके; वे बहुत थक गए और नष्ट हो गए।
श्लोक 18 (3.101.18)
जगत्युपशमं याते नष्टयज्ञोत्सवक्रिये । आजग्मुः परमामार्तिं त्रिदशा मनुजेश्वर ॥
jagatyupaśamaṃ yāte naṣṭayajñotsavakriye | ājagmuḥ paramāmārtiṃ tridaśā manujeśvara
हे मनुजेश्वर, जब जगत शान्त पड़ गया और यज्ञ तथा उत्सवों की क्रियाएँ नष्ट हो गईं, तब देवता अत्यन्त दुःख में पड़ गए।
श्लोक 19 (3.101.19)
समेत्य समहेन्द्राश्च भयान्मन्त्रं प्रचक्रिरे ॥
sametya samahendrāśca bhayānmantraṃ pracakrire
महेन्द्र के साथ एकत्र होकर उन्होंने भय के कारण मन्त्रणा की।
श्लोक 20 (3.101.20)
शरण्यं शरणं देवं नारायणमजं विभुम् । तेऽभिगम्य नमस्कृत्य वैकुण्ठमपराजितम् । ततो देवाः समस्तास्ते तदोचुर्मधुसूदनम् ॥
śaraṇyaṃ śaraṇaṃ devaṃ nārāyaṇamajaṃ vibhum | te'bhigamya namaskṛtya vaikuṇṭhamaparājitam | tato devāḥ samastāste tadocurmadhusūdanam
सबको शरण देने वाले, अजन्मा, सर्वव्यापी, अपराजित वैकुण्ठ नारायण देव के पास जाकर उन्होंने उन्हें नमस्कार किया; तब सब देवताओं ने मिलकर मधुसूदन से कहा —
देवा ऊचुः
श्लोक 21 (3.101.21)
त्वंनः स्रष्टा च भर्ता च हर्ता च जगतः प्रभो । त्वया सृष्टमिदं विश्वं यच्चेङ्गं यच्च नेङ्गति । त्वय्येव पुण्डरीकाक्ष पुनस्तत्प्रविलीयते ॥
tvaṃnaḥ sraṣṭā ca bhartā ca hartā ca jagataḥ prabho | tvayā sṛṣṭamidaṃ viśvaṃ yacceṅgaṃ yacca neṅgati | tvayyeva puṇḍarīkākṣa punastatpravilīyate
'प्रभो, आप ही जगत के स्रष्टा, पालनकर्ता और संहारकर्ता हैं। यह सारा विश्व — जो चलता है और जो नहीं चलता — आपने ही रचा है, और हे कमलनयन, फिर आप में ही यह लीन हो जाता है।
श्लोक 22 (3.101.22)
त्वया भूमिः पुरा नष्टा समुद्रात्पुष्करेक्षण । वाराहं वपुराश्रित्यजगदर्थे समुद्धृता ॥
tvayā bhūmiḥ purā naṣṭā samudrātpuṣkarekṣaṇa | vārāhaṃ vapurāśrityajagadarthe samuddhṛtā
हे पुष्करेक्षण, प्राचीन काल में जब पृथ्वी समुद्र में डूब गई थी, तब आपने वराह का शरीर धारण करके जगत के हित के लिए उसका उद्धार किया था।
श्लोक 23 (3.101.23)
आदिदैत्यो महावीर्यो हिरण्यकशिपुः पुरा । नारसिंहं वपुः कृत्वा सूदितः पुरुषोत्तम ॥
ādidaityo mahāvīryo hiraṇyakaśipuḥ purā | nārasiṃhaṃ vapuḥ kṛtvā sūditaḥ puruṣottama
हे पुरुषोत्तम, पहले आदि दैत्य महापराक्रमी हिरण्यकशिपु को आपने नृसिंह का शरीर धारण करके मारा था।
श्लोक 24 (3.101.24)
अवध्यः सर्वभूतानां बलिश्चापि महासुरः । वामनं वपुराश्रित्य त्रैलोक्याद्भ्रंशितस्त्वया ॥
avadhyaḥ sarvabhūtānāṃ baliścāpi mahāsuraḥ | vāmanaṃ vapurāśritya trailokyādbhraṃśitastvayā
और महान असुर बलि को, जिसे कोई भी प्राणी मार नहीं सकता था, आपने वामन का शरीर धारण करके तीनों लोकों से च्युत कर दिया।
श्लोक 25 (3.101.25)
असुरश्च महेष्वासो जम्भ इत्यभिविश्रुतः । यज्ञक्षोभकरः क्रूरस्त्वयैव विनिपातितः ॥
asuraśca maheṣvāso jambha ityabhiviśrutaḥ | yajñakṣobhakaraḥ krūrastvayaiva vinipātitaḥ
और जम्भ नाम से विख्यात, यज्ञों में विघ्न डालने वाला क्रूर महाधनुर्धर असुर भी आपके ही हाथों मारा गया।
श्लोक 26 (3.101.26)
एवमादीनि कर्माणि येषां संख्या न विद्यते । अस्माकं भयभीतानां त्वं गतिर्मधुसूदन ॥
evamādīni karmāṇi yeṣāṃ saṃkhyā na vidyate | asmākaṃ bhayabhītānāṃ tvaṃ gatirmadhusūdana
आपके ऐसे-ऐसे कर्म हैं जिनकी कोई गिनती नहीं। हे मधुसूदन, हम भयभीतों के आप ही आश्रय हैं।
श्लोक 27 (3.101.27)
तस्मात्त्वां देवदेवेश लोकार्थं ज्ञापयामहे । रक्ष लोकांश्च देवांश्च शक्रं च महतो भयात् । शरणागतसंत्राणे त्वमेकोऽसि दृढव्रतः ॥
tasmāttvāṃ devadeveśa lokārthaṃ jñāpayāmahe | rakṣa lokāṃśca devāṃśca śakraṃ ca mahato bhayāt | śaraṇāgatasaṃtrāṇe tvameko'si dṛḍhavrataḥ
इसलिए हे देवदेवेश, लोकों के हित के लिए हम आपसे निवेदन करते हैं — लोकों की, देवताओं की और इन्द्र की इस महान भय से रक्षा कीजिए। शरणागतों की रक्षा में आप ही एकमात्र दृढ़व्रती हैं।'