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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 100

इन्द्र द्वारा वृत्र-वध और कालेयों का समुद्र में छिपना

वज्र लेकर इन्द्र देवताओं के साथ वृत्र और उसके रक्षक कालकेयों पर चढ़ाई करते हैं, परन्तु देवता पराजित होकर भागते हैं और इन्द्र मूर्च्छित हो जाते हैं। विष्णु, देवता और ऋषि अपना तेज उनमें भरते हैं; वृत्र के गर्जन करने पर इन्द्र वज्र छोड़कर उसे मार डालते हैं, फिर भी भय से सरोवर में जा छिपते हैं, क्योंकि उन्हें वृत्र के मरने का विश्वास नहीं होता। देवता बचे हुए दैत्यों को मारते हैं; वे समुद्र में भाग जाते हैं और निश्चय करते हैं कि लोकों का नाश करने के लिए पहले सब तपस्वियों को मारेंगे, क्योंकि लोक तप से ही टिके हैं।

अध्याय 99अध्याय-सूचीअध्याय 101

लोमश उवाच

श्लोक 1 (3.100.1)

ततः स वज्री बलभिद्दैवतैरभिरक्षितः । आससाद ततो वृत्रं स्थितमावृत्य रोदसी ॥

tataḥ sa vajrī balabhiddaivatairabhirakṣitaḥ | āsasāda tato vṛtraṃ sthitamāvṛtya rodasī

तब बल नामक असुर का संहार करने वाले वज्रधारी इन्द्र देवताओं से सुरक्षित होकर वृत्र के सामने पहुँचे, जो स्वर्ग और पृथ्वी को घेरकर खड़ा था,

श्लोक 2 (3.100.2)

कालकेयैर्महाकायैः समन्तादभिरक्षितम् । समुद्यतप्रहरणैः सशृङ्गैरिव पर्वतैः ॥

kālakeyairmahākāyaiḥ samantādabhirakṣitam | samudyatapraharaṇaiḥ saśṛṅgairiva parvataiḥ

और जिसकी रक्षा विशाल शरीर वाले कालकेय शस्त्र उठाए चारों ओर से कर रहे थे, मानो शिखरों वाले पर्वत हों।

श्लोक 3 (3.100.3)

ततो युद्धं समभवद्देवानां दानवैः सह । मुहूर्तं भरतश्रेष्ठ लोकत्रासकरं महत् ॥

tato yuddhaṃ samabhavaddevānāṃ dānavaiḥ saha | muhūrtaṃ bharataśreṣṭha lokatrāsakaraṃ mahat

हे भरतश्रेष्ठ, तब देवताओं और दानवों के बीच कुछ समय तक लोकों को भयभीत करने वाला महान युद्ध हुआ।

श्लोक 4 (3.100.4)

उद्यतप्रतिविद्धानां खड्गानां वीरबाहुभिः । आसीत्सुतुमुलः शब्दः शरीरेष्वभिपात्यताम् ॥

udyatapratividdhānāṃ khaḍgānāṃ vīrabāhubhiḥ | āsītsutumulaḥ śabdaḥ śarīreṣvabhipātyatām

वीरों की भुजाओं से उठाकर शरीरों पर गिराई जाती और आपस में टकराती तलवारों का बड़ा तुमुल शब्द होने लगा।

श्लोक 5 (3.100.5)

शिरोभिः प्रपतद्भिश्चाप्यन्तरिक्षान्महीतलम् । तालैरिव महाराज वृन्ताद्भ्रष्टैरदृश्यत ॥

śirobhiḥ prapatadbhiścāpyantarikṣānmahītalam | tālairiva mahārāja vṛntādbhraṣṭairadṛśyata

हे महाराज, आकाश से पृथ्वी पर गिरते सिरों से ऐसा दिखाई देता था मानो डंठलों से टूटकर ताड़ के फल गिर रहे हों।

श्लोक 6 (3.100.6)

ते हेमकवचा भूत्वा कालेयाः परिघायुधाः । त्रिदशानभ्यवर्तन्त दावदग्धा इवाद्रयः ॥

te hemakavacā bhūtvā kāleyāḥ parighāyudhāḥ | tridaśānabhyavartanta dāvadagdhā ivādrayaḥ

सोने के कवच पहने, परिघ धारण किए कालेय दावानल से जलते पर्वतों के समान देवताओं पर टूट पड़े।

श्लोक 7 (3.100.7)

तेषां वेगवतां वेगं सहितानां प्रधावताम् । न शेकुस्त्रिदशाः सोढुं ते भग्नाः प्राद्रवन्भयात् ॥

teṣāṃ vegavatāṃ vegaṃ sahitānāṃ pradhāvatām | na śekustridaśāḥ soḍhuṃ te bhagnāḥ prādravanbhayāt

एक साथ धावा बोलने वाले उन वेगवान दानवों का वेग देवता सह न सके; वे टूटकर भय से भाग खड़े हुए।

श्लोक 8 (3.100.8)

तान्दृष्ट्वा द्रवतो भीतान्सहस्राक्षः पुरंदरः । वृत्रे विवर्धमाने च कश्मलं महदाविशत् ॥

tāndṛṣṭvā dravato bhītānsahasrākṣaḥ puraṃdaraḥ | vṛtre vivardhamāne ca kaśmalaṃ mahadāviśat

उन्हें भयभीत होकर भागते देखकर और वृत्र को बढ़ता हुआ देखकर सहस्राक्ष इन्द्र पर भारी मूर्च्छा छा गई।

श्लोक 9 (3.100.9)

कालेयभयसंत्रस्तो देवः साक्षात्पुरंदरः । जगाम शरणं शीघ्रं तं तु नारायणं प्रभुम् ॥

kāleyabhayasaṃtrasto devaḥ sākṣātpuraṃdaraḥ | jagāma śaraṇaṃ śīghraṃ taṃ tu nārāyaṇaṃ prabhum

कालेयों के भय से त्रस्त होकर स्वयं देवराज इन्द्र शीघ्र ही प्रभु नारायण की शरण में गए।

श्लोक 10 (3.100.10)

तं शक्रं कश्मलाविष्टं दृष्ट्वा विष्णुः सनातनः । स्वतेजो व्यदधच्छक्रे बलमस्य विवर्धयन् ॥

taṃ śakraṃ kaśmalāviṣṭaṃ dṛṣṭvā viṣṇuḥ sanātanaḥ | svatejo vyadadhacchakre balamasya vivardhayan

इन्द्र को मूर्च्छा से ग्रस्त देखकर सनातन विष्णु ने अपना तेज इन्द्र में स्थापित कर दिया और उनका बल बढ़ा दिया।

श्लोक 11 (3.100.11)

विष्णुना गोपितं शक्रं दृष्ट्वादेवगणास्ततः । स्वं स्वंतेजः समादध्युस्तथा ब्रह्मर्षयोऽमलाः ॥

viṣṇunā gopitaṃ śakraṃ dṛṣṭvādevagaṇāstataḥ | svaṃ svaṃtejaḥ samādadhyustathā brahmarṣayo'malāḥ

विष्णु द्वारा रक्षित इन्द्र को देखकर देवगणों ने भी अपना-अपना तेज उनमें स्थापित किया, और वैसे ही निर्मल ब्रह्मर्षियों ने भी।

श्लोक 12 (3.100.12)

स समाप्यायितः शक्रो विष्णुना दैवतैः सह । ऋषिभिश्च महाभागैर्बलवान्समपद्यत ॥

sa samāpyāyitaḥ śakro viṣṇunā daivataiḥ saha | ṛṣibhiśca mahābhāgairbalavānsamapadyata

इस प्रकार विष्णु, देवताओं और महाभाग ऋषियों से बल पाकर इन्द्र बलवान हो गए।

श्लोक 13 (3.100.13)

ज्ञात्वा बलस्थं त्रिदशाधिपं तु । ननाद वृत्रो महतो निनादान् । तस्य प्रणादेन धरा दिशश्च । खं द्यौर्नगाश्चापि चचाल सर्वम् ॥

jñātvā balasthaṃ tridaśādhipaṃ tu | nanāda vṛtro mahato ninādān | tasya praṇādena dharā diśaśca | khaṃ dyaurnagāścāpi cacāla sarvam

देवराज को बलवान जानकर वृत्र ने बड़े भारी गर्जन किए; उसके गर्जन से पृथ्वी, दिशाएँ, अन्तरिक्ष, द्युलोक और पर्वत — सब काँप उठे।

श्लोक 14 (3.100.14)

ततो महेन्द्रः परमाभितप्तः । श्रुत्वा रवं घोररूपं महान्तम् । भये निमग्नस्त्वरितो मुमोच । वज्रं महत्तस्य वधाय राजन् ॥

tato mahendraḥ paramābhitaptaḥ | śrutvā ravaṃ ghorarūpaṃ mahāntam | bhaye nimagnastvarito mumoca | vajraṃ mahattasya vadhāya rājan

हे राजन्, तब उस भयंकर और विशाल गर्जन को सुनकर अत्यन्त सन्तप्त और भय में डूबे महेन्द्र ने तुरन्त उसके वध के लिए अपना महान वज्र छोड़ा।

श्लोक 15 (3.100.15)

स शक्रवज्राभिहतः पपात । महासुरः काञ्चनमाल्यधारी । यथा महाशैलवरः पुरस्ता- । त्स मन्दरो विष्णुकराद्विमुक्तः ॥

sa śakravajrābhihataḥ papāta | mahāsuraḥ kāñcanamālyadhārī | yathā mahāśailavaraḥ purastā- | tsa mandaro viṣṇukarādvimuktaḥ

इन्द्र के वज्र से आहत होकर सोने की माला धारण करने वाला वह महान असुर गिर पड़ा, जैसे प्राचीन काल में विष्णु के हाथ से छूटकर महान पर्वत मन्दराचल गिरा था।

श्लोक 16 (3.100.16)

तस्मिन्हते दैत्यवरे भयार्तः । शक्रः प्रदुद्राव सरः प्रवेष्टुम् । वज्रं न मेने स्वकराद्विमुक्तं । वृत्रं भयाच्चापि हतं न मेने ॥

tasminhate daityavare bhayārtaḥ | śakraḥ pradudrāva saraḥ praveṣṭum | vajraṃ na mene svakarādvimuktaṃ | vṛtraṃ bhayāccāpi hataṃ na mene

उस दैत्यश्रेष्ठ के मारे जाने पर भय से व्याकुल इन्द्र सरोवर में छिपने के लिए दौड़ पड़े। उन्हें यह भी विश्वास न हुआ कि वज्र उनके हाथ से छूट चुका है, और भय के कारण वे यह भी न मान सके कि वृत्र मारा गया।

श्लोक 17 (3.100.17)

सर्वे च देवा मुदिताः प्रहृष्टा । महर्षयश्चन्द्रमभिष्टुवन्तः । वृत्रं हतं संददृशुः पृथिव्यां । वज्राहतं शैलमिवावदीर्णम् ॥

sarve ca devā muditāḥ prahṛṣṭā | maharṣayaścandramabhiṣṭuvantaḥ | vṛtraṃ hataṃ saṃdadṛśuḥ pṛthivyāṃ | vajrāhataṃ śailamivāvadīrṇam

सब देवता आनन्दित और हर्षित हुए, और महर्षि इन्द्र की स्तुति करने लगे। उन्होंने वृत्र को पृथ्वी पर मरा पड़ा देखा, मानो वज्र से फटा हुआ पर्वत हो।

श्लोक 18 (3.100.18)

सर्वांश्च दैत्यांस्त्वरिताः समेत्य । जघ्नुः सुरा वृत्रवधाभितप्तान् । ते वध्यमानास्त्रिदशैः समेतैः । समुद्रमेवाविविशुर्भयार्ताः ॥

sarvāṃśca daityāṃstvaritāḥ sametya | jaghnuḥ surā vṛtravadhābhitaptān | te vadhyamānāstridaśaiḥ sametaiḥ | samudramevāviviśurbhayārtāḥ

फिर देवताओं ने शीघ्र एकत्र होकर वृत्र-वध से सन्तप्त सब दैत्यों को मारना आरम्भ किया। एकत्र देवताओं की मार से भयभीत होकर वे समुद्र में ही जा घुसे।

श्लोक 19 (3.100.19)

प्रविश्य चैवोदधिमप्रमेयं । झषाकुलं नक्रसमाकुलं च । तदा स्म मन्त्रं सहिताः प्रचक्रु- । स्त्रैलोक्यनाशार्थमभिप्रयत्नात् ॥

praviśya caivodadhimaprameyaṃ | jhaṣākulaṃ nakrasamākulaṃ ca | tadā sma mantraṃ sahitāḥ pracakru- | strailokyanāśārthamabhiprayatnāt

मछलियों और मगरमच्छों से भरे उस अथाह समुद्र में प्रवेश करके उन्होंने मिलकर बड़े यत्न से तीनों लोकों के विनाश के लिए मन्त्रणा की।

श्लोक 20 (3.100.20)

तत्रस्म केचिन्मतिनिश्चयज्ञा- । स्तांस्तानुपायानुपवर्णयन्ति । तेषां तु तत्रक्रमकालयोगा- । द्धोरा मतिश्चिन्तयतां बभूव ॥

tatrasma kecinmatiniścayajñā- | stāṃstānupāyānupavarṇayanti | teṣāṃ tu tatrakramakālayogā- | ddhorā matiścintayatāṃ babhūva

वहाँ निश्चय करने में कुशल कुछ दानव तरह-तरह के उपाय बताने लगे। विचार करते-करते समय के क्रम से उनमें एक भयंकर विचार उत्पन्न हुआ —

कालेया ऊचुः

श्लोक 21 (3.100.21)

ये सन्ति विद्यातपसोपपन्ना- । स्तेषां विनाशः प्रथमं तु कार्यः । लोका हि सर्वे तपसा ध्रियन्ते । तस्मात्त्वरध्वं तपसः क्षयाय ॥

ye santi vidyātapasopapannā- | steṣāṃ vināśaḥ prathamaṃ tu kāryaḥ | lokā hi sarve tapasā dhriyante | tasmāttvaradhvaṃ tapasaḥ kṣayāya

'जो विद्या और तप से सम्पन्न हैं, पहले उनका विनाश करना चाहिए। क्योंकि सब लोक तप से ही टिके हुए हैं; इसलिए तप का नाश करने में शीघ्रता करो।

श्लोक 22 (3.100.22)

येसन्ति केचिच्च वसुंधरायां । तपस्विनो धर्मविदश्च तज्ज्ञाः । तेषां वधः क्रियतां क्षिप्रमेव । तेषु प्रनष्टेषु जगत्प्रनष्टम् ॥

yesanti kecicca vasuṃdharāyāṃ | tapasvino dharmavidaśca tajjñāḥ | teṣāṃ vadhaḥ kriyatāṃ kṣiprameva | teṣu pranaṣṭeṣu jagatpranaṣṭam

पृथ्वी पर जो भी तपस्वी, धर्मज्ञ और ब्रह्मज्ञानी हैं, उनका तुरन्त वध किया जाए। उनके नष्ट होने पर जगत नष्ट हो जाएगा।'

लोमश उवाच

श्लोक 23 (3.100.23)

एवं हि सर्वे गतबुद्धिभावा । जगद्विनाशे परमप्रहृष्टाः । दुर्गं समाश्रित्य महोर्मिमन्तं । रत्नाकरं वरुणस्यालयं स्म ॥

evaṃ hi sarve gatabuddhibhāvā | jagadvināśe paramaprahṛṣṭāḥ | durgaṃ samāśritya mahormimantaṃ | ratnākaraṃ varuṇasyālayaṃ sma

इस प्रकार वे सब, अपना निश्चय कर लेने पर, जगत के विनाश की बात से अत्यन्त प्रसन्न होकर, ऊँची लहरों वाले, रत्नों की खान, वरुण के निवास समुद्र रूपी दुर्ग का आश्रय लेकर रहने लगे।

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