आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 99
दधीच का अस्थिदान और वज्र का निर्माण
युधिष्ठिर अगस्त्य के बारे में और सुनना चाहते हैं, और लोमश कालकेयों की कथा आरम्भ करते हैं — कृतयुग के वे क्रूर दानव जिन्होंने वृत्र का आश्रय लेकर देवताओं पर आक्रमण किया। ब्रह्मा देवताओं से कहते हैं कि वे दधीच ऋषि से उनकी अस्थियाँ माँगें, जिनसे छह कोणों वाला वज्र बनाया जाए। देवता सरस्वती के पार दधीच के आश्रम में जाते हैं; दधीच प्रसन्नता से प्राण त्याग देते हैं, और त्वष्टा उनकी अस्थियों से वज्र बनाकर इन्द्र को देते हैं।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (3.99.1)
भूय एवाहमिच्छामि महर्षेस्तस्य धीमतः । कर्मणां विस्तरं श्रोतुमगस्त्यस्य द्विजोत्तम ॥
bhūya evāhamicchāmi maharṣestasya dhīmataḥ | karmaṇāṃ vistaraṃ śrotumagastyasya dvijottama
हे द्विजश्रेष्ठ, मैं उन बुद्धिमान महर्षि अगस्त्य के कर्मों को फिर से विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ।
लोमश उवाच
श्लोक 2 (3.99.2)
शृणु राजन्कथां दिव्यामद्भुतामतिमानुषीम् । अगस्त्यस्य महाराज प्रभावममितौजसः ॥
śṛṇu rājankathāṃ divyāmadbhutāmatimānuṣīm | agastyasya mahārāja prabhāvamamitaujasaḥ
हे राजन्, हे महाराज, अमित तेजस्वी अगस्त्य के प्रभाव की यह दिव्य, अद्भुत और अलौकिक कथा सुनो।
श्लोक 3 (3.99.3)
आसन्कृतयुगे घोरा दानवा युद्धदुर्मदाः । कालकेया इतिख्याता गणाः परमदारुणाः ॥
āsankṛtayuge ghorā dānavā yuddhadurmadāḥ | kālakeyā itikhyātā gaṇāḥ paramadāruṇāḥ
कृतयुग में युद्ध के उन्मादी, भयंकर दानव थे, जो कालकेय नाम से प्रसिद्ध थे; उनके दल अत्यन्त क्रूर थे।
श्लोक 4 (3.99.4)
ते तु वृत्रं समाश्रित्य नानाप्रहरणोद्यताः । समन्तात्पर्यधावन्त महेन्द्रप्रमुखान्सुरान् ॥
te tu vṛtraṃ samāśritya nānāpraharaṇodyatāḥ | samantātparyadhāvanta mahendrapramukhānsurān
वृत्र का आश्रय लेकर वे नाना प्रकार के शस्त्र उठाए महेन्द्र आदि देवताओं पर चारों ओर से टूट पड़े।
श्लोक 5 (3.99.5)
ततो वृत्रवधे यत्नमकुर्वंस्त्रिदशाः पुरा । पुरंदरं पुरस्कृत्य ब्रह्माणमुपतस्थिरे ॥
tato vṛtravadhe yatnamakurvaṃstridaśāḥ purā | puraṃdaraṃ puraskṛtya brahmāṇamupatasthire
तब प्राचीन काल में देवताओं ने वृत्र के वध का यत्न किया और इन्द्र को आगे करके वे ब्रह्मा के पास उपस्थित हुए।
श्लोक 6 (3.99.6)
कृताञ्जलींस्तु तान्सर्वान्परमेष्ठीत्युवाच ह । विदितं मे सुराः सर्वं यद्वः कार्यं चिकीर्षितम् ॥
kṛtāñjalīṃstu tānsarvānparameṣṭhītyuvāca ha | viditaṃ me surāḥ sarvaṃ yadvaḥ kāryaṃ cikīrṣitam
हाथ जोड़े खड़े उन सबसे परमेष्ठी ब्रह्मा ने कहा — 'देवताओ, तुम जो कार्य करना चाहते हो, वह सब मुझे विदित है।
ब्रह्मोवाच
श्लोक 7 (3.99.7)
तमुपायं प्रवक्ष्यामि यथा वृत्रं वधिष्यथ । दधीच इतिविख्यातो महानृषिरुदारधीः ॥
tamupāyaṃ pravakṣyāmi yathā vṛtraṃ vadhiṣyatha | dadhīca itivikhyāto mahānṛṣirudāradhīḥ
मैं तुम्हें वह उपाय बताता हूँ जिससे तुम वृत्र का वध करोगे। दधीच नाम से विख्यात एक उदार बुद्धि वाले महान ऋषि हैं।
श्लोक 8 (3.99.8)
तं गत्वा सहिताः सर्वेवरं वै संप्रयाचत । स वो दास्यति धर्मात्मा सुप्रीतेनान्तरात्मना ॥
taṃ gatvā sahitāḥ sarvevaraṃ vai saṃprayācata | sa vo dāsyati dharmātmā suprītenāntarātmanā
तुम सब मिलकर उनके पास जाओ और उनसे वर माँगो। वे धर्मात्मा प्रसन्न मन से तुम्हें वह वर देंगे।
श्लोक 9 (3.99.9)
स वाच्यः सहितैः सर्वैर्भवद्भिर्जयकाङ्क्षिभिः । स्वान्यस्थीनि प्रयच्छेति त्रैलोक्यस्य हिताय वै ॥
sa vācyaḥ sahitaiḥ sarvairbhavadbhirjayakāṅkṣibhiḥ | svānyasthīni prayaccheti trailokyasya hitāya vai
विजय चाहने वाले तुम सब मिलकर उनसे कहना — 'तीनों लोकों के हित के लिए अपनी अस्थियाँ हमें दे दीजिए।'
श्लोक 10 (3.99.10)
स शरीरं समुत्सृज्य स्वान्यस्थीनि प्रदास्यति । तस्यास्थिभिर्महाघोरं वज्रं संस्क्रियतां दृढम् ॥
sa śarīraṃ samutsṛjya svānyasthīni pradāsyati | tasyāsthibhirmahāghoraṃ vajraṃ saṃskriyatāṃ dṛḍham
वे अपना शरीर त्यागकर तुम्हें अपनी अस्थियाँ दे देंगे। उनकी अस्थियों से एक अत्यन्त भयंकर, दृढ़ वज्र बनाया जाए,
श्लोक 11 (3.99.11)
महच्छत्रुहणं घोरं षडश्रं भीमनिःस्वनम् । तेन वज्रेण वै वृत्रं वधिष्यति शतक्रतुः ॥
mahacchatruhaṇaṃ ghoraṃ ṣaḍaśraṃ bhīmaniḥsvanam | tena vajreṇa vai vṛtraṃ vadhiṣyati śatakratuḥ
जो महान, घोर, शत्रुनाशक, छह कोणों वाला और भीषण गर्जन करने वाला हो। उसी वज्र से शतक्रतु इन्द्र वृत्र का वध करेंगे।
लोमश उवाच
श्लोक 12 (3.99.12)
एतद्वः सर्वमाख्यातं तस्माच्छीघ्रं विधीयताम् । एवमुक्तास्ततो देवा अनुज्ञाप्य पितामहम् ॥
etadvaḥ sarvamākhyātaṃ tasmācchīghraṃ vidhīyatām | evamuktāstato devā anujñāpya pitāmaham
मैंने तुम्हें यह सब बता दिया; इसलिए इसे शीघ्र किया जाए।' ऐसा कहे जाने पर देवता पितामह से आज्ञा लेकर
श्लोक 13 (3.99.13)
नारायणं पुरस्कृत्य दधीचस्याश्रमं ययुः । सरस्वत्याः परे पारे नानाद्रुमलतावृतम् ॥
nārāyaṇaṃ puraskṛtya dadhīcasyāśramaṃ yayuḥ | sarasvatyāḥ pare pāre nānādrumalatāvṛtam
नारायण को आगे करके सरस्वती के उस पार दधीच के आश्रम में गए, जो अनेक प्रकार के वृक्षों और लताओं से घिरा था,
श्लोक 14 (3.99.14)
षट्पदोद्गीतनिनदैर्विघुष्टं सामगैरिव । पुंस्कोकिलरवोन्मिश्रं जीवंजीवकनादितम् ॥
ṣaṭpadodgītaninadairvighuṣṭaṃ sāmagairiva | puṃskokilaravonmiśraṃ jīvaṃjīvakanāditam
जो भौंरों के गुंजन से ऐसा गूँज रहा था मानो सामगान करने वाले गा रहे हों; जहाँ नर कोयलों की कूक के साथ जीवंजीवक पक्षियों का कलरव मिला हुआ था;
श्लोक 15 (3.99.15)
महिषैश्च वराहैश्च सृमरैश्चमरैरपि । तत्र तत्रानुचरितं शार्दूलभयवर्जितैः ॥
mahiṣaiśca varāhaiśca sṛmaraiścamarairapi | tatra tatrānucaritaṃ śārdūlabhayavarjitaiḥ
जहाँ भैंसे, सूअर, सृमर मृग और चमरी गायें बाघ के भय से मुक्त होकर इधर-उधर विचरते थे;
श्लोक 16 (3.99.16)
करेणुभिर्वारणैश्च प्रभिन्नकरटामुखैः । सरोवगाढैः क्रीडद्भिः समन्तादनुनादितम् ॥
kareṇubhirvāraṇaiśca prabhinnakaraṭāmukhaiḥ | sarovagāḍhaiḥ krīḍadbhiḥ samantādanunāditam
जो सरोवरों में उतरकर क्रीड़ा करते, मद बहाते गण्डस्थलों वाले हाथियों और हथिनियों से चारों ओर गूँजता रहता था;
श्लोक 17 (3.99.17)
सिंहव्याघ्रैर्महानादान्नदद्भिरनुनादितम् । अपरैश्चापि संलीनैर्गुहाकन्दरशायिभिः ॥
siṃhavyāghrairmahānādānnadadbhiranunāditam | aparaiścāpi saṃlīnairguhākandaraśāyibhiḥ
जो जोर से दहाड़ते सिंहों और बाघों से, तथा गुफाओं और कन्दराओं में छिपकर सोए अन्य पशुओं से निनादित था।
श्लोक 18 (3.99.18)
तेषु तेष्ववकाशेषु शोभितं सुमनोरमम् । त्रिविष्टपसमप्रख्यं दधीचाश्रममागमन् ॥
teṣu teṣvavakāśeṣu śobhitaṃ sumanoramam | triviṣṭapasamaprakhyaṃ dadhīcāśramamāgaman
उन-उन स्थानों से सुशोभित, अत्यन्त मनोरम और स्वर्ग के समान कान्तिमान दधीच के उस आश्रम में वे पहुँचे।
श्लोक 19 (3.99.19)
तत्रापश्यन्दधीचं ते दिवाकरसमद्युतिम् । जाज्वल्यमानं वपुषा यथा साक्षात्पितामहम् ॥
tatrāpaśyandadhīcaṃ te divākarasamadyutim | jājvalyamānaṃ vapuṣā yathā sākṣātpitāmaham
वहाँ उन्होंने सूर्य के समान कान्तिमान दधीच को देखा, जो अपने शरीर से ऐसे दमक रहे थे मानो साक्षात् पितामह ब्रह्मा हों।
श्लोक 20 (3.99.20)
तस्य पादौ सुरा राजन्नभिवाद्य प्रणम्य च । अयाचन्त वरं सर्वे यथोक्तं परमेष्ठिना ॥
tasya pādau surā rājannabhivādya praṇamya ca | ayācanta varaṃ sarve yathoktaṃ parameṣṭhinā
हे राजन्, देवताओं ने उनके चरणों में अभिवादन और प्रणाम किया, और सबने परमेष्ठी के बताए अनुसार उनसे वर माँगा।
श्लोक 21 (3.99.21)
ततो दधीचः परमप्रतीतः । सुरोत्तमांस्तानिदमभ्युवाच । करोमि यद्वो हितमद्य देवाः । स्वं चापि देहंस्वयमुत्सृजामि ॥
tato dadhīcaḥ paramapratītaḥ | surottamāṃstānidamabhyuvāca | karomi yadvo hitamadya devāḥ | svaṃ cāpi dehaṃsvayamutsṛjāmi
तब दधीच ने अत्यन्त प्रसन्न होकर उन श्रेष्ठ देवताओं से यह कहा — 'देवताओ, आज मैं वही करूँगा जिसमें तुम्हारा हित है; मैं स्वयं अपना शरीर भी त्याग देता हूँ।'
श्लोक 22 (3.99.22)
स एवमुक्त्वा द्विपदांवरिष्ठः । प्राणान्वशी स्वान्सहसोत्ससर्ज । ततः सुरास्ते जगृहुः परासो- । रस्थीनि तस्याथ यथोपदेशम् ॥
sa evamuktvā dvipadāṃvariṣṭhaḥ | prāṇānvaśī svānsahasotsasarja | tataḥ surāste jagṛhuḥ parāso- | rasthīni tasyātha yathopadeśam
यह कहकर मनुष्यों में श्रेष्ठ उस जितेन्द्रिय मुनि ने सहसा अपने प्राण त्याग दिए। तब देवताओं ने बताए हुए विधान के अनुसार उस प्राणहीन मुनि की अस्थियाँ ले लीं।
श्लोक 23 (3.99.23)
प्रहृष्टरूपाश्च जयाय देवा- । स्त्वष्टारमागम्य तमर्थमूचुः । त्वष्टा तु तेषां वचनं निशम्य । प्रहृष्टरूपः प्रयतः प्रयत्नात् ॥
prahṛṣṭarūpāśca jayāya devā- | stvaṣṭāramāgamya tamarthamūcuḥ | tvaṣṭā tu teṣāṃ vacanaṃ niśamya | prahṛṣṭarūpaḥ prayataḥ prayatnāt
विजय की कामना से प्रसन्न होकर देवता त्वष्टा के पास गए और उन्हें सारी बात बताई। त्वष्टा ने उनकी बात सुनी और प्रसन्न होकर, एकाग्र मन से, बड़े यत्न से
श्लोक 24 (3.99.24)
चकार वज्रं भृशमुग्ररूपं । कृत्वा च शक्रं स उवाच हृष्टः । अनेन वज्रप्रवरेण देव । भस्मीकुरुष्वाद्य सुरारिमुग्रम् ॥
cakāra vajraṃ bhṛśamugrarūpaṃ | kṛtvā ca śakraṃ sa uvāca hṛṣṭaḥ | anena vajrapravareṇa deva | bhasmīkuruṣvādya surārimugram
अत्यन्त उग्र रूप वाला वज्र बनाया। उसे बनाकर उन्होंने प्रसन्न होकर इन्द्र से कहा — 'देव, इस श्रेष्ठ वज्र से आज देवताओं के उस उग्र शत्रु को भस्म कर डालो।
श्लोक 25 (3.99.25)
ततो हतारिः सगणः सुखं वै । प्रशाधिकृत्स्नं त्रिदिवं दिविष्ठः । त्वष्ट्रा तथोक्तस्तु पुरंदरस्त- । द्वज्रं प्रहृष्टः प्रयतो ह्यगृह्णात् ॥
tato hatāriḥ sagaṇaḥ sukhaṃ vai | praśādhikṛtsnaṃ tridivaṃ diviṣṭhaḥ | tvaṣṭrā tathoktastu puraṃdarasta- | dvajraṃ prahṛṣṭaḥ prayato hyagṛhṇāt
फिर शत्रु के मारे जाने पर अपने गणों सहित स्वर्ग में रहते हुए सुखपूर्वक सम्पूर्ण त्रिदिव पर शासन करो।' त्वष्टा के ऐसा कहने पर इन्द्र ने प्रसन्न और संयत होकर वह वज्र ग्रहण किया।