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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 98

परशुराम का राम से सामना और तेज की हानि

लोमश युधिष्ठिर को भृगुतीर्थ दिखाते हैं, जहाँ पाण्डव स्नान करते हैं, और युधिष्ठिर के पूछने पर बताते हैं कि परशुराम का तेज एक बार क्यों छिन गया था। विष्णु के अवतार दशरथपुत्र राम के बारे में सुनकर परशुराम उनकी परीक्षा लेने धनुष लेकर अयोध्या गए; राम ने धनुष चढ़ाया, अपने शरीर में सारा विश्व दिखाया और परशुराम के ही बाण से उनका तेज हर लिया। एक वर्ष बाद पितरों ने दुःखी परशुराम को वधूसरा नदी के दीप्तोद तीर्थ में स्नान करने भेजा, जहाँ उन्होंने तेज फिर पाया। यह पूरा प्रसंग समीक्षित संस्करण के मूल पाठ में नहीं है; वह इसे परिशिष्ट I में देता है।

अध्याय 97अध्याय-सूचीअध्याय 99

लोमश उवाच

श्लोक 1 (3.98.1)

युधिष्ठिर निबोधेदं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् । भृगोस्तीर्थं महाराज महर्षिगणसेवितम् ॥

yudhiṣṭhira nibodhedaṃ triṣu lokeṣu viśrutam | bhṛgostīrthaṃ mahārāja maharṣigaṇasevitam

युधिष्ठिर, तीनों लोकों में विख्यात इस भृगुतीर्थ के विषय में जानो, महाराज; महर्षियों के समूह इसका सेवन करते हैं।

श्लोक 2 (3.98.2)

यत्रोपस्पृष्टवान्रामो हृतंतेजस्तदाप्तवान् । अत्र त्वंभ्रातृभिः सार्धं कृष्णया चैव पाण्डव ॥

yatropaspṛṣṭavānrāmo hṛtaṃtejastadāptavān | atra tvaṃbhrātṛbhiḥ sārdhaṃ kṛṣṇayā caiva pāṇḍava

यहीं स्नान-आचमन करके राम ने अपना छीना हुआ तेज फिर से प्राप्त किया था। हे पाण्डुनन्दन, यहाँ तुम अपने भाइयों और कृष्णा के साथ

श्लोक 3 (3.98.3)

दुर्योधनहृतंतेजः पुनरादातुमर्हसि । कृतवैरेण रामेण यथा चोपहृतं पुनः ॥

duryodhanahṛtaṃtejaḥ punarādātumarhasi | kṛtavaireṇa rāmeṇa yathā copahṛtaṃ punaḥ

दुर्योधन द्वारा हरे गए अपने तेज को फिर से प्राप्त कर सकते हो, जैसे वैर ठानने वाले राम ने अपना तेज फिर पा लिया था।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 4 (3.98.4)

स तत्रभ्रातृभिश्चैव कृष्णया चैव पाण्डवः । स्नात्वा देवान्पितॄंश्चैव तर्पयामास भारत ॥

sa tatrabhrātṛbhiścaiva kṛṣṇayā caiva pāṇḍavaḥ | snātvā devānpitṝṃścaiva tarpayāmāsa bhārata

हे भारत, वहाँ पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर ने अपने भाइयों और कृष्णा के साथ स्नान करके देवताओं और पितरों का तर्पण किया।

श्लोक 5 (3.98.5)

तस्य तीर्थस्य रूपं वै दीप्ताद्दीप्ततरं बभौ । अप्रधृष्यतरश्चासीच्छात्रवाणां नरर्षभ ॥

tasya tīrthasya rūpaṃ vai dīptāddīptataraṃ babhau | apradhṛṣyataraścāsīcchātravāṇāṃ nararṣabha

उस तीर्थ में स्नान करने वाले युधिष्ठिर का रूप पहले से भी अधिक दीप्त हो उठा, हे नरश्रेष्ठ, और वे शत्रुओं के लिए और भी अजेय हो गए।

श्लोक 6 (3.98.6)

अपृच्छच्चैव राजेन्द्र लोमशं पाण्डुनन्दनः । भगवन्किमर्थं रामस्य हृतमासीद्वपुः प्रभो । कथं प्रत्याहृतंचैव एतदाचक्ष्व पृच्छतः ॥

apṛcchaccaiva rājendra lomaśaṃ pāṇḍunandanaḥ | bhagavankimarthaṃ rāmasya hṛtamāsīdvapuḥ prabho | kathaṃ pratyāhṛtaṃcaiva etadācakṣva pṛcchataḥ

हे राजेन्द्र, तब पाण्डुनन्दन ने लोमश से पूछा — 'भगवन्, प्रभो, राम का तेज क्यों हर लिया गया था? और वह फिर कैसे प्राप्त हुआ? मैं पूछ रहा हूँ, यह मुझे बताइए।'

लोमश उवाच

श्लोक 7 (3.98.7)

शृणु रामस्य राजेन्द्र भार्गवस्य च धीमतः । जातो दशरथस्यासीत्पुत्रो रामो महात्मनः ॥

śṛṇu rāmasya rājendra bhārgavasya ca dhīmataḥ | jāto daśarathasyāsītputro rāmo mahātmanaḥ

हे राजेन्द्र, राम और बुद्धिमान भार्गव (परशुराम) की कथा सुनो। महात्मा दशरथ के यहाँ राम नामक पुत्र उत्पन्न हुए थे,

श्लोक 8 (3.98.8)

विष्णुः स्वेन शरीरेण रावणस्य वधाय वै । पश्यामस्तमयोध्यायां जातं दाशरथिं ततः ॥

viṣṇuḥ svena śarīreṇa rāvaṇasya vadhāya vai | paśyāmastamayodhyāyāṃ jātaṃ dāśarathiṃ tataḥ

जो रावण के वध के लिए अपने ही शरीर से अवतरित स्वयं विष्णु थे। हमने उन दशरथनन्दन को अयोध्या में जन्मा देखा।

श्लोक 9 (3.98.9)

ऋचीकनन्दनो रामो भार्गवो रेणुकासुतः । तस्य दाशरथेः श्रुत्वा रामस्याक्लिष्टकर्मणः ॥

ṛcīkanandano rāmo bhārgavo reṇukāsutaḥ | tasya dāśaratheḥ śrutvā rāmasyākliṣṭakarmaṇaḥ

ऋचीक के वंशज, रेणुका के पुत्र भार्गव राम ने अनायास महान कर्म करने वाले दशरथपुत्र राम के विषय में सुना,

श्लोक 10 (3.98.10)

कौतूहलान्वितो रामस्त्वयोध्यामगमत्पुनः । जिज्ञासमानो रामस्य वीर्यं दाशरथेस्तदा ॥

kautūhalānvito rāmastvayodhyāmagamatpunaḥ | jijñāsamāno rāmasya vīryaṃ dāśarathestadā

तो कौतूहल से भरकर वे अयोध्या गए; वे दशरथनन्दन राम के पराक्रम को परखना चाहते थे।

श्लोक 11 (3.98.11)

तं वै दशरथः श्रुत्वा विषयान्तमुपागतम् । प्रेषयामास रामस्य रामं पुत्रं पुरस्कृतम् ॥

taṃ vai daśarathaḥ śrutvā viṣayāntamupāgatam | preṣayāmāsa rāmasya rāmaṃ putraṃ puraskṛtam

दशरथ ने जब सुना कि वे राज्य की सीमा तक आ पहुँचे हैं, तो उन्होंने अपने पुत्र राम को आगे करके उनके पास भेजा।

श्लोक 12 (3.98.12)

स तमभ्यागतं दृष्ट्वा उद्यतास्त्रमवस्थितम् । प्रहसन्निव कौन्तेय रामो वचनमब्रवीत् ॥

sa tamabhyāgataṃ dṛṣṭvā udyatāstramavasthitam | prahasanniva kaunteya rāmo vacanamabravīt

हे कुन्तीनन्दन, उन्हें आया हुआ और अस्त्र उठाए खड़ा देखकर भार्गव राम मानो हँसते हुए बोले —

राम उवाच

श्लोक 13 (3.98.13)

कृतकालं हि राजेन्द्र धनुरेतन्मया विभो । समारोपय यत्नेन यदि शक्नोषि पार्थिव ॥

kṛtakālaṃ hi rājendra dhanuretanmayā vibho | samāropaya yatnena yadi śaknoṣi pārthiva

'हे राजेन्द्र, हे विभो, मेरा यह धनुष साक्षात् काल है। हे राजकुमार, यदि तुम समर्थ हो तो यत्नपूर्वक इस पर प्रत्यंचा चढ़ाओ।'

लोमश उवाच

श्लोक 14 (3.98.14)

इत्युक्तस्त्वाह भगवंस्त्वं नाधिक्षेप्तुमर्हसि । नाहमप्यधमो धर्मे क्षत्रियाणां द्विजातिषु । इक्ष्वाकूणां विशेषेण बाहुवीर्ये न कत्थनम् ॥

ityuktastvāha bhagavaṃstvaṃ nādhikṣeptumarhasi | nāhamapyadhamo dharme kṣatriyāṇāṃ dvijātiṣu | ikṣvākūṇāṃ viśeṣeṇa bāhuvīrye na katthanam

यह सुनकर उन्होंने कहा — 'भगवन्, आपको मेरा तिरस्कार नहीं करना चाहिए। क्षत्रियों में मैं भी द्विजों के प्रति अपने धर्म में किसी से कम नहीं हूँ; और विशेषकर इक्ष्वाकुवंशी अपने बाहुबल की डींग नहीं हाँकते।'

श्लोक 15 (3.98.15)

तमेवं वादिनं तत्र रामो वचनमब्रवीत् । अलं वै व्यपदेशेन धनुरायच्छ राघव ॥

tamevaṃ vādinaṃ tatra rāmo vacanamabravīt | alaṃ vai vyapadeśena dhanurāyaccha rāghava

ऐसा कहने वाले राघव से भार्गव राम बोले — 'बातें बहुत हुईं; हे राघव, धनुष चढ़ाओ।'

श्लोक 16 (3.98.16)

ततो जग्राह रोषेण क्षत्रियर्षभसूदनम् । रामो दाशरथिर्दिव्यं हस्ताद्रामस्य कार्मुकम् ॥

tato jagrāha roṣeṇa kṣatriyarṣabhasūdanam | rāmo dāśarathirdivyaṃ hastādrāmasya kārmukam

तब दशरथनन्दन राम ने रोषपूर्वक भार्गव राम के हाथ से श्रेष्ठ क्षत्रियों का संहार करने वाला वह दिव्य धनुष ले लिया।

श्लोक 17 (3.98.17)

धनुरारोपयामास सलील इव भारत । ज्याशब्दमकरोच्चैव स्मयमानः स वीर्यवान् । तस्य शब्दस्य भूतानि वित्रसन्त्यशनेरिव ॥

dhanurāropayāmāsa salīla iva bhārata | jyāśabdamakaroccaiva smayamānaḥ sa vīryavān | tasya śabdasya bhūtāni vitrasantyaśaneriva

हे भारत, उन्होंने मानो खेल-खेल में धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ा दी और उस पराक्रमी ने मुस्कुराते हुए उसकी टंकार की; उस शब्द से सब प्राणी ऐसे काँप उठे मानो वज्रपात हुआ हो।

श्लोक 18 (3.98.18)

अथाब्रवीत्तदा रामो रामं दाशरथिस्तदा । इदमारोपितं ब्रह्मन्किमन्यत्करवाणि ते ॥

athābravīttadā rāmo rāmaṃ dāśarathistadā | idamāropitaṃ brahmankimanyatkaravāṇi te

तब दशरथनन्दन राम ने भार्गव राम से कहा — 'ब्रह्मन्, लीजिए, धनुष चढ़ गया। अब मैं आपके लिए और क्या करूँ?'

श्लोक 19 (3.98.19)

तस्य रामो ददौ दिव्यं जामदग्न्यो महात्मनः । शरमाकर्णदेशान्तमयमाकृष्यतामिति ॥

tasya rāmo dadau divyaṃ jāmadagnyo mahātmanaḥ | śaramākarṇadeśāntamayamākṛṣyatāmiti

तब महात्मा जमदग्निपुत्र राम ने उन्हें एक दिव्य बाण दिया और कहा — 'इसे कान तक खींचो।'

श्लोक 20 (3.98.20)

एतच्छ्रुत्वाऽब्रवीद्रामः प्रदीप्त इव मन्युना । श्रूयते क्षम्यते चैव दर्पपूर्णोऽसि भार्गव ॥

etacchrutvā'bravīdrāmaḥ pradīpta iva manyunā | śrūyate kṣamyate caiva darpapūrṇo'si bhārgava

यह सुनकर राम मानो क्रोध से जल उठे और बोले — 'हे भार्गव, मैं सुन भी रहा हूँ और सह भी रहा हूँ; तुम दर्प से भरे हुए हो।

राम उवाच

श्लोक 21 (3.98.21)

त्वया ह्यधिगतं तेजः क्षत्रियेभ्यो विशेषतः । पितामहप्रसादेन तेन मां क्षिपसि ध्रुवम् । पश्य मां स्वेन रूपेण चक्षुस्ते वितराम्यहम् ॥

tvayā hyadhigataṃ tejaḥ kṣatriyebhyo viśeṣataḥ | pitāmahaprasādena tena māṃ kṣipasi dhruvam | paśya māṃ svena rūpeṇa cakṣuste vitarāmyaham

पितामह ब्रह्मा की कृपा से तुमने क्षत्रियों से बढ़कर तेज पाया है, इसी कारण निश्चय ही तुम मेरा तिरस्कार कर रहे हो। मेरे निज रूप को देखो; मैं तुम्हें उसे देखने की दृष्टि देता हूँ।'

लोमश उवाच

श्लोक 22 (3.98.22)

ततो रामशरीरे वै रामः पश्यति भार्गवः । आदित्यान्सवसून्रुद्रान्साध्यांश्च समरुद्गणान् ॥

tato rāmaśarīre vai rāmaḥ paśyati bhārgavaḥ | ādityānsavasūnrudrānsādhyāṃśca samarudgaṇān

तब भार्गव राम ने राम के शरीर में आदित्यों को, वसुओं को, रुद्रों को, तथा मरुद्गणों सहित साध्यों को देखा;

श्लोक 23 (3.98.23)

पितरो हुताशनश्चैव नक्षत्राणि ग्रहास्तथा । गन्धर्वा राक्षसा यक्षा नद्यस्तीर्थानि यानि च ॥

pitaro hutāśanaścaiva nakṣatrāṇi grahāstathā | gandharvā rākṣasā yakṣā nadyastīrthāni yāni ca

पितरों को, अग्निदेव को, नक्षत्रों और ग्रहों को; गन्धर्वों, राक्षसों और यक्षों को, नदियों को और जितने भी तीर्थ हैं, उन सबको;

श्लोक 24 (3.98.24)

ऋषयो वालखिल्याश्च ब्रह्मभूताः सनातनाः । देवर्षयश्च कार्त्स्न्येन समुद्राः पर्वतास्तथा ॥

ṛṣayo vālakhilyāśca brahmabhūtāḥ sanātanāḥ | devarṣayaśca kārtsnyena samudrāḥ parvatāstathā

ऋषियों को, ब्रह्मस्वरूप सनातन वालखिल्यों को, सम्पूर्ण देवर्षियों को, समुद्रों और पर्वतों को;

श्लोक 25 (3.98.25)

वेदाश्च सोपनिषदो वषट्कारैः सहाध्वरैः । चेतोमन्ति च सामानि धनुर्वेदश्च भारत । मेघवृन्दानि वर्षाणि विद्युतश्च युधिष्ठिर ॥

vedāśca sopaniṣado vaṣaṭkāraiḥ sahādhvaraiḥ | cetomanti ca sāmāni dhanurvedaśca bhārata | meghavṛndāni varṣāṇi vidyutaśca yudhiṣṭhira

उपनिषदों सहित वेदों को, वषट्कार सहित यज्ञों को, चेतन रूप में सामगानों को और धनुर्वेद को, हे भारत; मेघसमूहों, वर्षा और बिजलियों को भी, हे युधिष्ठिर।

श्लोक 26 (3.98.26)

ततः स भगवान्विष्णुस्तं वै बाणं मुमोच ह । शुष्काशनिसमाकीर्णं महोल्काभिश्च भारत ॥

tataḥ sa bhagavānviṣṇustaṃ vai bāṇaṃ mumoca ha | śuṣkāśanisamākīrṇaṃ maholkābhiśca bhārata

तब उन भगवान विष्णु ने वह बाण छोड़ा, हे भारत; उस समय बिना वर्षा के वज्र गिरे और बड़ी-बड़ी उल्काएँ गिरने लगीं;

श्लोक 27 (3.98.27)

पांसुवर्षेण महता मेघवर्षैश्च भूतलम् । भूमिकम्पैश्च निर्घातैर्नादैश्च विपुलैरपि ॥

pāṃsuvarṣeṇa mahatā meghavarṣaiśca bhūtalam | bhūmikampaiśca nirghātairnādaiśca vipulairapi

पृथ्वी पर धूल की भारी वर्षा और मेघों की वर्षा हुई; भूकम्प आए, वज्र के कड़ाके हुए और प्रचण्ड नाद होने लगे।

श्लोक 28 (3.98.28)

स रामं विह्वलं कृत्वा तेजश्चाक्षिप्य केवलम् । आगच्छज्ज्वलितो बाणो रामबाहुप्रचोदितः ॥

sa rāmaṃ vihvalaṃ kṛtvā tejaścākṣipya kevalam | āgacchajjvalito bāṇo rāmabāhupracoditaḥ

राम की भुजा से छोड़ा गया वह प्रज्वलित बाण भार्गव राम को व्याकुल करके और उनका सारा तेज हरकर लौट आया।

श्लोक 29 (3.98.29)

स तु विह्वलतां गत्वा प्रतिलभ्य च चेतनाम् । रामः प्रत्यागतप्राणः प्राणमद्विष्णुतेजसम् ॥

sa tu vihvalatāṃ gatvā pratilabhya ca cetanām | rāmaḥ pratyāgataprāṇaḥ prāṇamadviṣṇutejasam

भार्गव राम मूर्च्छित हो गए; फिर होश आने पर, जब उनके प्राण लौटे, तो उन्होंने विष्णु के तेज को प्रणाम किया।

श्लोक 30 (3.98.30)

विष्णुना सोऽभ्यनुज्ञातो महेन्द्रमगमत्पुनः । भीतस्तु तत्रन्यवसद्ब्रीडितस्तु महातपाः ॥

viṣṇunā so'bhyanujñāto mahendramagamatpunaḥ | bhītastu tatranyavasadbrīḍitastu mahātapāḥ

विष्णु से आज्ञा पाकर वे फिर महेन्द्र पर्वत पर चले गए, और वहाँ वह महातपस्वी भयभीत और लज्जित होकर रहने लगा।

श्लोक 31 (3.98.31)

ततः संवत्सरेऽतीते हृतौजसमवस्थितम् । निर्मदं दुःखितं दृष्ट्वा पितरो राममब्रुवन् ॥

tataḥ saṃvatsare'tīte hṛtaujasamavasthitam | nirmadaṃ duḥkhitaṃ dṛṣṭvā pitaro rāmamabruvan

फिर एक वर्ष बीतने पर पितरों ने राम को तेजहीन, मदरहित और दुःखी देखा, तो उनसे कहा —

पितर ऊचुः

श्लोक 32 (3.98.32)

न वै सम्यगिदं पुत्र विष्णुमासाद्य वैकृतम् । स हि पूज्यश्च मान्यश्च त्रिषु लोकेषु सर्वदा ॥

na vai samyagidaṃ putra viṣṇumāsādya vaikṛtam | sa hi pūjyaśca mānyaśca triṣu lokeṣu sarvadā

'पुत्र, विष्णु से भिड़कर तुमने जो अनुचित कर्म किया, वह ठीक नहीं था; क्योंकि वे तीनों लोकों में सदा पूजनीय और माननीय हैं।

श्लोक 33 (3.98.33)

गच्छ पुत्रनदीं पुण्यां वधूसरकृताह्वयाम् । तत्रोपस्पृश्य तीर्थेषु पुनर्वपुरवाप्स्यसि ॥

gaccha putranadīṃ puṇyāṃ vadhūsarakṛtāhvayām | tatropaspṛśya tīrtheṣu punarvapuravāpsyasi

पुत्र, वधूसरा नामक पवित्र नदी पर जाओ। उसके तीर्थों में स्नान-आचमन करके तुम अपना तेज फिर पा लोगे।

श्लोक 34 (3.98.34)

दीप्तोदं नाम तत्तीर्थं यत्रते प्रपितामहः । भृगुर्देवयुगे राम तप्तवानुत्तमं तपः ॥

dīptodaṃ nāma tattīrthaṃ yatrate prapitāmahaḥ | bhṛgurdevayuge rāma taptavānuttamaṃ tapaḥ

हे राम, वह तीर्थ दीप्तोद कहलाता है, जहाँ तुम्हारे प्रपितामह भृगु ने देवयुग में उत्तम तप किया था।'

लोमश उवाच

श्लोक 35 (3.98.35)

तत्तथा कृतवान्रामः कौन्तेय वचनात्पितुः । प्राप्तवांश्च पुनस्तेजस्तीर्थेऽस्मिन्पाण्डुनन्दन ॥

tattathā kṛtavānrāmaḥ kaunteya vacanātpituḥ | prāptavāṃśca punastejastīrthe'sminpāṇḍunandana

हे कौन्तेय, राम ने पिता के कहने पर वैसा ही किया, और हे पाण्डुनन्दन, इसी तीर्थ में उन्होंने अपना तेज फिर प्राप्त किया।

श्लोक 36 (3.98.36)

एतदीदृशकं तात रामेणाक्लिष्टकर्मणा । प्राप्तमासीन्महाराज विष्णुमासाद्य वै पुरा ॥

etadīdṛśakaṃ tāta rāmeṇākliṣṭakarmaṇā | prāptamāsīnmahārāja viṣṇumāsādya vai purā

हे तात, हे महाराज, अनायास महान कर्म करने वाले राम के साथ प्राचीन काल में विष्णु से भिड़ने पर ऐसा ही घटित हुआ था।

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