आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 97
अगस्त्य द्वारा वातापि का पाचन; दृढस्यु का जन्म
इल्वल मुनि और राजाओं का स्वागत करके उन्हें मेढ़ा बने वातापि का मांस परोसता है। अगस्त्य उसे पूरा खा जाते हैं, और जब इल्वल भाई को पुकारता है तो केवल वायु निकलती है, क्योंकि वातापि पच चुका है। फिर अगस्त्य बताते हैं कि इल्वल क्या देना चाहता है — हर राजा को गौएँ और सोना, और स्वयं उन्हें उससे दुगुना तथा एक स्वर्णरथ। भयभीत असुर धन दे देता है, पर जब वह मुनि को मारने उनके पीछे जाता है तो भस्म कर दिया जाता है। उस धन से अगस्त्य लोपामुद्रा की इच्छा पूरी करते हैं; हजार पुत्रों या हजार के बराबर एक पुत्र में से वह एक को चुनती है, और सात वर्ष गर्भ में रहकर दृढस्यु जन्म लेता है, जो आगे इध्मवाह कहलाया। अंत में लोमश पाण्डवों को अगस्त्य का आश्रम और पवित्र भागीरथी दिखाते हैं।
लोमश उवाच
श्लोक 1 (3.97.1)
इल्वलस्तान्विदित्वा तु महर्षिसहितान्नृपान् । उपस्थितान्सहामात्यो विषयान्ते ह्यपूजयत् ॥
ilvalastānviditvā tu maharṣisahitānnṛpān | upasthitānsahāmātyo viṣayānte hyapūjayat
महर्षि के साथ राजाओं को आया जानकर इल्वल अपने मन्त्रियों सहित राज्य की सीमा पर गया और उनका सत्कार किया।
श्लोक 2 (3.97.2)
तेषां ततोऽसुरश्रेष्ठस्त्वातिथ्यमकरोत्तदा । सुसंस्कृतेन कौरव्य भ्रात्रा वातापिना तदा ॥
teṣāṃ tato'suraśreṣṭhastvātithyamakarottadā | susaṃskṛtena kauravya bhrātrā vātāpinā tadā
हे कौरव्य, तब उस असुरश्रेष्ठ ने भली-भाँति पकाए हुए अपने भाई वातापि से उनका आतिथ्य किया।
श्लोक 3 (3.97.3)
ततो राजर्षयः सर्वे विषण्णा गतचेतसः । वातापिं संस्कृतं दृष्ट्वा मेषभूतं महासुरम् ॥
tato rājarṣayaḥ sarve viṣaṇṇā gatacetasaḥ | vātāpiṃ saṃskṛtaṃ dṛṣṭvā meṣabhūtaṃ mahāsuram
मेढ़ा बने महान असुर वातापि को पका हुआ देखकर सब राजर्षि उदास और हतप्रभ हो गए।
श्लोक 4 (3.97.4)
अथाब्रवीदगस्त्यस्तान्राजर्षीनृषिसत्तमः । विषादो वो न कर्तव्यो ह्यहं भोक्ष्ये महासुरम् ॥
athābravīdagastyastānrājarṣīnṛṣisattamaḥ | viṣādo vo na kartavyo hyahaṃ bhokṣye mahāsuram
तब ऋषिश्रेष्ठ अगस्त्य ने उन राजर्षियों से कहा — "विषाद मत कीजिए, उस महान असुर को मैं खाऊँगा।"
श्लोक 5 (3.97.5)
धुर्यासनमथासाद्य निषसाद महानृषिः । तं पर्यवेषद्दैत्येन्द्र इल्वलः प्रहसन्निव ॥
dhuryāsanamathāsādya niṣasāda mahānṛṣiḥ | taṃ paryaveṣaddaityendra ilvalaḥ prahasanniva
फिर महर्षि प्रमुख आसन पर जा बैठे, और दैत्यराज इल्वल मानो मुस्कराता हुआ उन्हें परोसने लगा।
श्लोक 6 (3.97.6)
अगस्त्य एव कृत्स्नं तु वातापिं बुभुजे ततः । बह्वन्नाशापि ते मेऽस्तीत्यवदद्भक्षयन्स्वयम् ॥
agastya eva kṛtsnaṃ tu vātāpiṃ bubhuje tataḥ | bahvannāśāpi te me'stītyavadadbhakṣayansvayam
तब अकेले अगस्त्य ने ही पूरा वातापि खा लिया, और खाते-खाते बोले — "मुझे बहुत अन्न की भूख है, तुम्हारे अन्न की भी।"
श्लोक 7 (3.97.7)
भुक्तवत्यसुरोऽह्वानमकरोत्तस्य चेल्वलः । वातापे प्रतिबुध्यस्व दर्शयन्बलतेजसी । तपसा दुर्जयो यावदेष त्वां नातिवर्तते ॥
bhuktavatyasuro'hvānamakarottasya celvalaḥ | vātāpe pratibudhyasva darśayanbalatejasī | tapasā durjayo yāvadeṣa tvāṃ nātivartate
उनके भोजन कर लेने पर असुर इल्वल ने पुकारा — "वातापि, जागो और अपना बल और तेज दिखाओ, इससे पहले कि तप के कारण दुर्जय यह मुनि तुम पर हावी हो जाए!"
श्लोक 8 (3.97.8)
ततस्तस्योदरं भेत्तुं वातापिर्वेगमाहरत् । तमबुध्यत तेजस्वी कुम्भयोनिर्महातपाः ॥
tatastasyodaraṃ bhettuṃ vātāpirvegamāharat | tamabudhyata tejasvī kumbhayonirmahātapāḥ
तब वातापि ने मुनि का पेट फाड़ने के लिए जोर लगाया, पर महातपस्वी तेजस्वी कुम्भयोनि ने यह जान लिया।
श्लोक 9 (3.97.9)
स वीर्यात्तपसोग्रस्तु ननर्द भगवानृषिः । एष जीर्णोसि वातापे मया लोकस्य शान्तये ॥
sa vīryāttapasograstu nanarda bhagavānṛṣiḥ | eṣa jīrṇosi vātāpe mayā lokasya śāntaye
तप के बल से उग्र भगवान ऋषि गरज उठे — "वातापि, लोक की शान्ति के लिए मैंने तुम्हें पचा डाला है!"
श्लोक 10 (3.97.10)
इत्युक्त्वा स्वकराग्रेण उदरं समताडयत् । त्रिरेवं प्रतिसंरब्धस्तेजसा प्रज्वलन्निव ॥
ityuktvā svakarāgreṇa udaraṃ samatāḍayat | trirevaṃ pratisaṃrabdhastejasā prajvalanniva
ऐसा कहकर उन्होंने क्रोध में भरकर, मानो अपने तेज से जलते हुए, हाथ के अग्रभाग से तीन बार अपने पेट को थपथपाया।
श्लोक 11 (3.97.11)
ततो वायुः प्रादुरभूदधस्तस्य महात्मनः । शब्देन महता तात गर्जन्निव यथा घनः ॥
tato vāyuḥ prādurabhūdadhastasya mahātmanaḥ | śabdena mahatā tāta garjanniva yathā ghanaḥ
तब उन महात्मा के नीचे से बड़े शब्द के साथ वायु निकली, हे तात, मानो गरजता हुआ बादल हो।
श्लोक 12 (3.97.12)
वातापे निष्क्रमस्वेति पुनः पुनरुवाच ह । तं प्रहस्याब्रवीद्राजन्नगस्त्यो मुनिसत्तमः । कुतो निष्क्रमितुं शक्तो मया जीर्णस्तु सोसुरः ॥
vātāpe niṣkramasveti punaḥ punaruvāca ha | taṃ prahasyābravīdrājannagastyo munisattamaḥ | kuto niṣkramituṃ śakto mayā jīrṇastu sosuraḥ
"वातापि, बाहर निकलो!" — इल्वल बार-बार पुकारता रहा। तब मुनिश्रेष्ठ अगस्त्य ने हँसकर कहा — "हे राजन्, वह कैसे निकल सकता है? वह असुर तो मुझसे पच चुका है।"
श्लोक 13 (3.97.13)
इल्वलस्तु विषण्णोऽभूद्दृष्ट्वा जीर्णं महासुरम् । प्राञ्जलिश्च सहामात्यैरिदं वचनमब्रवीत् । किमर्थमुपयाताः स्थ ब्रूत किं करवाणि वः ॥
ilvalastu viṣaṇṇo'bhūddṛṣṭvā jīrṇaṃ mahāsuram | prāñjaliśca sahāmātyairidaṃ vacanamabravīt | kimarthamupayātāḥ stha brūta kiṃ karavāṇi vaḥ
महान असुर को पचा हुआ देखकर इल्वल उदास हो गया, और मन्त्रियों सहित हाथ जोड़कर यह बोला — "आप लोग किस प्रयोजन से आए हैं? बताइए, मैं आपकी क्या सेवा करूँ?"
श्लोक 14 (3.97.14)
प्रत्युवाच ततोऽगस्त्यः प्रहसन्निल्वलं तदा । ईशोस्यसुर विद्मस्त्वां वयं सर्वे धनेश्वरम् ॥
pratyuvāca tato'gastyaḥ prahasannilvalaṃ tadā | īśosyasura vidmastvāṃ vayaṃ sarve dhaneśvaram
तब अगस्त्य ने हँसते हुए इल्वल को उत्तर दिया — "असुर, तुम समर्थ हो; हम सब तुम्हें धन का स्वामी जानते हैं।
अगस्त्य उवाच
श्लोक 15 (3.97.15)
एते च नातिधनिनो धनाशा महती मम । यथाशक्त्यविहिंस्यान्यान्संविभागं प्रयच्छ नः ॥
ete ca nātidhanino dhanāśā mahatī mama | yathāśaktyavihiṃsyānyānsaṃvibhāgaṃ prayaccha naḥ
ये राजा बहुत धनी नहीं हैं, और मुझे धन की बड़ी आवश्यकता है। दूसरों को कष्ट दिए बिना, यथाशक्ति हमें कुछ भाग दो।"
लोमश उवाच
श्लोक 16 (3.97.16)
ततोऽवमत्य तमृषिमिल्वलो वाक्यमब्रवीत् । दित्सितं यदि वेत्सि त्वंततो दास्यामि ते वसु ॥
tato'vamatya tamṛṣimilvalo vākyamabravīt | ditsitaṃ yadi vetsi tvaṃtato dāsyāmi te vasu
तब ऋषि की उपेक्षा करते हुए इल्वल ने कहा — "यदि तुम जान लो कि मैं क्या देना चाहता हूँ, तो मैं तुम्हें धन दूँगा।"
अगस्त्य उवाच
श्लोक 17 (3.97.17)
गवां दशसहस्राणि राज्ञामेकैकशोऽसुर । तावदेव सुवर्णस्य दित्सितं ते महासुर ॥
gavāṃ daśasahasrāṇi rājñāmekaikaśo'sura | tāvadeva suvarṇasya ditsitaṃ te mahāsura
"हे असुर, प्रत्येक राजा को दस-दस हजार गौएँ और उतना ही सोना — यही तुम देना चाहते हो, हे महासुर।
श्लोक 18 (3.97.18)
मह्यं ततो वै द्विगुणं रथश्चैव हिरण्मयः । मनोजवौ वाजिनौ च दित्सितं ते महासुर ॥
mahyaṃ tato vai dviguṇaṃ rathaścaiva hiraṇmayaḥ | manojavau vājinau ca ditsitaṃ te mahāsura
और मुझे उससे दुगुना, साथ में एक सोने का रथ और मन के समान वेग वाले दो घोड़े — यही तुम देना चाहते हो, हे महासुर।"
लोमश उवाच
श्लोक 19 (3.97.19)
इल्वलस्तु मुनिं प्राह सर्वमस्ति यथाऽऽत्थ माम् । सर्वमेतत्प्रदास्यामि हिरण्यं गाश्च यद्धनम् । रथं तु यदवोचो मां नैतं विद्म हिरण्मयम् ॥
ilvalastu muniṃ prāha sarvamasti yathā''ttha mām | sarvametatpradāsyāmi hiraṇyaṃ gāśca yaddhanam | rathaṃ tu yadavoco māṃ naitaṃ vidma hiraṇmayam
इल्वल ने मुनि से कहा — "जैसा आप कहते हैं, सब वैसा ही है। मैं यह सब दूँगा — सोना, गौएँ और धन। पर जिस रथ की आपने बात कही, उसे हम सोने का नहीं जानते।"
अगस्त्य उवाच
श्लोक 20 (3.97.20)
न मे वागनृता काचिदुक्तपूर्वा महाऽसुर । विज्ञायतां रथः साधु व्यक्तमस्ति हिरण्मयः ॥
na me vāganṛtā kāciduktapūrvā mahā'sura | vijñāyatāṃ rathaḥ sādhu vyaktamasti hiraṇmayaḥ
"हे महासुर, मैंने पहले कभी कोई झूठी बात नहीं कही। रथ की भली-भाँति जाँच कर लो; वह स्पष्ट ही सोने का है।"
लोमश उवाच
श्लोक 21 (3.97.21)
विज्ञायमानः स रथः कौन्तेयासीद्धिरण्मयः । ततः प्रव्यथितो दैत्यो ददावभ्यधिकं वसु ॥
vijñāyamānaḥ sa rathaḥ kaunteyāsīddhiraṇmayaḥ | tataḥ pravyathito daityo dadāvabhyadhikaṃ vasu
हे कुन्तीनन्दन, जाँचने पर वह रथ सोने का ही निकला। तब अत्यन्त व्यथित उस दैत्य ने माँगे गए से भी अधिक धन दे दिया।
श्लोक 22 (3.97.22)
विवाजी च सुवाजी च तस्मिन्युक्तौ रथे हयौ । ऊहतुः स वसूनाशु तावगस्त्याश्रमं प्रति । सर्वान्राज्ञः सहागस्त्यान्निमेषादिव भारत ॥
vivājī ca suvājī ca tasminyuktau rathe hayau | ūhatuḥ sa vasūnāśu tāvagastyāśramaṃ prati | sarvānrājñaḥ sahāgastyānnimeṣādiva bhārata
उस रथ में जुते विवाजी और सुवाजी नाम के दोनों घोड़े वह धन, और अगस्त्य सहित सब राजाओं को भी, मानो पलक झपकते ही अगस्त्य के आश्रम तक ले गए, हे भारत।
श्लोक 23 (3.97.23)
इल्वलस्त्वनुगम्यैनमगस्त्यं हन्तुमैच्छत । भस्म चक्रे महातेजा हुङ्कारेण महाऽसुरम् ॥
ilvalastvanugamyainamagastyaṃ hantumaicchata | bhasma cakre mahātejā huṅkāreṇa mahā'suram
इल्वल ने अगस्त्य का पीछा करके उन्हें मारना चाहा, पर महातेजस्वी मुनि ने हुंकार से ही उस महान असुर को भस्म कर दिया।
श्लोक 24 (3.97.24)
अगस्त्येनाभ्यनुज्ञाता जग्मू राजर्षयस्तदा । कृतवांश्च मुनिः सर्वं लोपामुद्राचिकीर्षितम् ॥
agastyenābhyanujñātā jagmū rājarṣayastadā | kṛtavāṃśca muniḥ sarvaṃ lopāmudrācikīrṣitam
अगस्त्य से अनुमति पाकर वे राजर्षि तब चले गए, और मुनि ने लोपामुद्रा की इच्छा के अनुसार सब कुछ कर दिया।
लोपामुद्रोवाच
श्लोक 25 (3.97.25)
कृतवानसि तत्सर्वं भगवन्मम काङ्क्षितम् । उत्पादय सकृन्मह्यमपत्यं वीर्यवत्तरम् ॥
kṛtavānasi tatsarvaṃ bhagavanmama kāṅkṣitam | utpādaya sakṛnmahyamapatyaṃ vīryavattaram
"भगवन्, आपने मेरी चाही हुई सब बातें पूरी कर दीं। अब मुझसे एक बार अत्यन्त पराक्रमी संतान उत्पन्न कीजिए।"
अगस्त्य उवाच
श्लोक 26 (3.97.26)
तुष्टोऽहमस्मि कल्याणि तव वृत्तेन शोभने । विचारणामपत्ये तु तव वक्ष्यामि तां शृणु ॥
tuṣṭo'hamasmi kalyāṇi tava vṛttena śobhane | vicāraṇāmapatye tu tava vakṣyāmi tāṃ śṛṇu
"हे कल्याणी, हे शोभने, मैं तुम्हारे आचरण से संतुष्ट हूँ। संतान के विषय में मैं तुम्हारे सामने एक विकल्प रखता हूँ, सुनो।
श्लोक 27 (3.97.27)
सहस्रं तेऽस्तु पुत्राणां शतं वा तत्समं तव । दश वा शततुल्याः स्युरेको वाऽपि सहस्रजित् ॥
sahasraṃ te'stu putrāṇāṃ śataṃ vā tatsamaṃ tava | daśa vā śatatulyāḥ syureko vā'pi sahasrajit
तुम्हारे हजार पुत्र हों, या उनके बराबर सौ, या सौ-सौ के बराबर दस, या फिर हजार को जीतने वाला एक ही पुत्र?"
लोपामुद्रोवाच
श्लोक 28 (3.97.28)
सहस्रसंमितः पुत्र एकोप्यस्तु तपोधन । एको हि बहुभिः श्रेयान्विद्वान्साधुरसाधुभिः ॥
sahasrasaṃmitaḥ putra ekopyastu tapodhana | eko hi bahubhiḥ śreyānvidvānsādhurasādhubhiḥ
"हे तपोधन, हजार के बराबर एक ही पुत्र हो; क्योंकि बहुत-से दुष्टों से एक विद्वान और सज्जन पुत्र श्रेष्ठ है।"
लोमश उवाच
श्लोक 29 (3.97.29)
स तथेति प्रतिज्ञाय तया समगमन्मुनिः । समये समशीलिन्या श्रद्धावान्श्रद्दधानया ॥
sa tatheti pratijñāya tayā samagamanmuniḥ | samaye samaśīlinyā śraddhāvānśraddadhānayā
"ऐसा ही हो" कहकर श्रद्धावान मुनि ने उचित समय पर अपने ही समान शील वाली उस श्रद्धालु पत्नी के साथ समागम किया।
श्लोक 30 (3.97.30)
तत आधाय गर्भं तमगमद्वनमेव सः । तस्मिन्वनगते गर्भो ववृधे सप्त शारदान् ॥
tata ādhāya garbhaṃ tamagamadvanameva saḥ | tasminvanagate garbho vavṛdhe sapta śāradān
गर्भाधान करके वे वन को चले गए, और उनके वन में रहते हुए वह गर्भ सात वर्ष तक बढ़ता रहा।
श्लोक 31 (3.97.31)
सप्तमेऽब्दे गते चापि प्राच्यवत्स महाकविः । ज्वलन्निव प्रभावेन दृढस्युर्नाम भारत ॥
saptame'bde gate cāpi prācyavatsa mahākaviḥ | jvalanniva prabhāvena dṛḍhasyurnāma bhārata
हे भारत, सातवाँ वर्ष बीतने पर वह महाकवि गर्भ से बाहर आया, जो अपने प्रभाव से मानो जल रहा था और जिसका नाम दृढस्यु था।
श्लोक 32 (3.97.32)
साङ्गोपनिषदान्वेदाञ्जपन्नेव महातपाः । तस्य पुत्रोऽभवदृषेः स तेजस्वी महानृषिः ॥
sāṅgopaniṣadānvedāñjapanneva mahātapāḥ | tasya putro'bhavadṛṣeḥ sa tejasvī mahānṛṣiḥ
वह महातपस्वी अंगों और उपनिषदों सहित वेदों का जप करता हुआ ही आया। ऋषि का वह पुत्र तेजस्वी और स्वयं महान ऋषि हुआ।
श्लोक 33 (3.97.33)
स बाल एवतेजस्वी पितुस्तस्य निवेशने । इध्मानां भारमाजह्रे इध्मवाहस्ततोऽभवत् ॥
sa bāla evatejasvī pitustasya niveśane | idhmānāṃ bhāramājahre idhmavāhastato'bhavat
बचपन में ही वह तेजस्वी बालक पिता के आश्रम में समिधाओं का भार ढोकर लाता था, इसलिए उसका नाम इध्मवाह पड़ा।
श्लोक 34 (3.97.34)
तथायुक्तं तु तं दृष्ट्वा मुमुदे स मुनिस्तदा । एवं स जनयामास भारतापत्यमुत्तमम् । लेभिरे पितरश्चास्य लोकान्राजन्यथेप्सितान् ॥
tathāyuktaṃ tu taṃ dṛṣṭvā mumude sa munistadā | evaṃ sa janayāmāsa bhāratāpatyamuttamam | lebhire pitaraścāsya lokānrājanyathepsitān
उसे ऐसा कर्तव्यपरायण देखकर मुनि प्रसन्न हुए। हे भारत, इस प्रकार उन्होंने उत्तम संतान उत्पन्न की, और हे राजन्, उनके पितरों को मनचाहे लोक प्राप्त हुए।
श्लोक 35 (3.97.35)
अगस्त्यस्याश्रमश्चायमत ऊर्ध्वं विशांपते । ख्यातो भुवि महाराज तेजसा तस्य धीमतः ॥
agastyasyāśramaścāyamata ūrdhvaṃ viśāṃpate | khyāto bhuvi mahārāja tejasā tasya dhīmataḥ
हे प्रजानाथ, हे महाराज, तब से अगस्त्य का यह आश्रम उस बुद्धिमान मुनि के तेज के कारण पृथ्वी पर प्रसिद्ध है।
श्लोक 36 (3.97.36)
प्राह्लादिरेवं वातापिर्ब्रह्मघ्नो दुष्टचेतनः । एवं विनाशितो राजन्नगस्त्येन महात्मना । तस्यायमाश्रमो राजन्रमणीयैर्गुणैर्युतः ॥
prāhlādirevaṃ vātāpirbrahmaghno duṣṭacetanaḥ | evaṃ vināśito rājannagastyena mahātmanā | tasyāyamāśramo rājanramaṇīyairguṇairyutaḥ
हे राजन्, इस प्रकार प्रह्लाद के वंश में उत्पन्न, ब्रह्मघाती, दुष्टबुद्धि वातापि महात्मा अगस्त्य के हाथों नष्ट हुआ। हे राजन्, यह उन्हीं का मनोरम गुणों से युक्त आश्रम है।
श्लोक 37 (3.97.37)
एषा भागीरथी पुण्या देवगन्धर्वसेविता । वातेरिता पताकेव विराजति नभस्तले ॥
eṣā bhāgīrathī puṇyā devagandharvasevitā | vāteritā patākeva virājati nabhastale
यह देवताओं और गन्धर्वों से सेवित पवित्र भागीरथी है, जो वायु से फहराती पताका के समान आकाश में शोभा पा रही है।
श्लोक 38 (3.97.38)
प्रतार्यमाणा कूटेषु यथा निम्नेषु नित्यशः । शिलातलेषु संत्रस्ता पन्नगेन्द्रवधूरिव ॥
pratāryamāṇā kūṭeṣu yathā nimneṣu nityaśaḥ | śilātaleṣu saṃtrastā pannagendravadhūriva
शिखरों पर से और सदा निचले स्थानों में बहती हुई वह चट्टानों पर ऐसी लगती है मानो कोई डरी हुई नागराज की पत्नी हो।
श्लोक 39 (3.97.39)
दक्षिणां वै दिशं सर्वां प्लावयन्ती च मातृवत् । पूर्वं शंभोर्जटाभ्रष्टा समुद्रमहिषी प्रिया । अस्यां नद्यां सुपुण्यायां यथेष्टमवगाह्यताम् ॥
dakṣiṇāṃ vai diśaṃ sarvāṃ plāvayantī ca mātṛvat | pūrvaṃ śaṃbhorjaṭābhraṣṭā samudramahiṣī priyā | asyāṃ nadyāṃ supuṇyāyāṃ yatheṣṭamavagāhyatām
माता के समान वह समस्त दक्षिण दिशा को सींचती है; पूर्वकाल में शम्भु की जटाओं से गिरी वह समुद्र की प्रिय रानी है। इस परम पवित्र नदी में इच्छानुसार स्नान कीजिए।