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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 104

अगस्त्य का समुद्र-पान और कालेयों का वध

एकत्र देवताओं और ऋषियों के सामने अगस्त्य लोकहित के लिए सारा समुद्र पी जाते हैं, और उनकी स्तुति करते हुए देवता खुले पड़े दानवों पर टूट पड़ते हैं। कालेय कुछ समय तक घोर युद्ध करते हैं, पर मारे जाते हैं, और बचे हुए कुछ दानव धरती फाड़कर पाताल में भाग जाते हैं। जब देवता अगस्त्य से जल वापस छोड़ने को कहते हैं, तो वे बताते हैं कि वह जल पच चुका है और उन्हें कोई दूसरा उपाय खोजना होगा; निराश देवता विष्णु के साथ ब्रह्मा के पास जाकर समुद्र को फिर से भरने का उपाय पूछते हैं।

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लोमश उवाच

श्लोक 1 (3.104.1)

समुद्रं स समासाद्य वारुणिर्भगवानृषिः । उवाच सहितान्देवानृषींश्चैव समागतान् ॥

samudraṃ sa samāsādya vāruṇirbhagavānṛṣiḥ | uvāca sahitāndevānṛṣīṃścaiva samāgatān

समुद्र के पास पहुँचकर वरुणपुत्र भगवान् ऋषि अगस्त्य ने वहाँ एकत्र हुए देवताओं और ऋषियों से कहा —

अगस्त्य उवाच

श्लोक 2 (3.104.2)

एष लोकहितार्थं वै पिबामि वरुणालयम् । भवद्भिर्यदनुष्ठेयं तच्छीघ्रं संविधीयताम् ॥

eṣa lokahitārthaṃ vai pibāmi varuṇālayam | bhavadbhiryadanuṣṭheyaṃ tacchīghraṃ saṃvidhīyatām

"लोकों के हित के लिए मैं वरुण के निवास इस समुद्र को पी रहा हूँ। आप लोगों को जो करना है, उसकी शीघ्र तैयारी कर लीजिए।"

लोमश उवाच

श्लोक 3 (3.104.3)

एतावदुक्त्वा वचनं मैत्रावरुणिरच्युतः । समुद्रमपिबत्क्रुद्धः सर्वलोकस्य पश्यतः ॥

etāvaduktvā vacanaṃ maitrāvaruṇiracyutaḥ | samudramapibatkruddhaḥ sarvalokasya paśyataḥ

इतना ही कहकर अविचल मित्रावरुणपुत्र ने क्रोधपूर्वक सारे जगत् के देखते-देखते समुद्र को पी लिया।

श्लोक 4 (3.104.4)

पीयमानं समुद्रं तं दृष्ट्वा सेन्द्रास्तदाऽमराः । विस्मयं परमं जग्मुः स्तुतिभिश्चाप्यपूजयन् ॥

pīyamānaṃ samudraṃ taṃ dṛṣṭvā sendrāstadā'marāḥ | vismayaṃ paramaṃ jagmuḥ stutibhiścāpyapūjayan

समुद्र को पिया जाता देखकर इन्द्र सहित देवता अत्यन्त विस्मित हुए और स्तुतियों से उनकी पूजा करने लगे —

देवा ऊचुः

श्लोक 5 (3.104.5)

त्वं नस्त्राता विधाता च लोकानां लोकभावन । त्वत्प्रसादात्समुच्छेदं न गच्छेत्सामरं जगत् ॥

tvaṃ nastrātā vidhātā ca lokānāṃ lokabhāvana | tvatprasādātsamucchedaṃ na gacchetsāmaraṃ jagat

"हे लोकभावन, आप हमारे रक्षक और लोकों के विधाता हैं। आपकी कृपा से देवताओं सहित यह जगत् विनाश को प्राप्त नहीं होगा।"

लोमश उवाच

श्लोक 6 (3.104.6)

स पूज्यमानस्त्रिदशैर्महात्मा । गन्धर्वतूर्येषु नदत्सु सर्वशः । दिव्यैश्च पुष्पैरवकीर्यमाणो । महार्णवं निःसलिलं चकार ॥

sa pūjyamānastridaśairmahātmā | gandharvatūryeṣu nadatsu sarvaśaḥ | divyaiśca puṣpairavakīryamāṇo | mahārṇavaṃ niḥsalilaṃ cakāra

देवताओं से पूजित होते हुए, चारों ओर गन्धर्वों के वाद्य बजते हुए और दिव्य पुष्पों की वर्षा के बीच, उन महात्मा ने महासागर को जलहीन कर दिया।

श्लोक 7 (3.104.7)

दृष्ट्वा कृतं निःसलिलं महार्णवं । सुराः समस्ताः परमप्रहृष्टाः । प्रगृह्य दिव्यानि वरायुधानि । तान्दानवाञ्जघ्नुरदीनसत्वाः ॥

dṛṣṭvā kṛtaṃ niḥsalilaṃ mahārṇavaṃ | surāḥ samastāḥ paramaprahṛṣṭāḥ | pragṛhya divyāni varāyudhāni | tāndānavāñjaghnuradīnasatvāḥ

महासागर को जलहीन हुआ देखकर सब देवता अत्यन्त हर्षित हुए और निर्भीक मन से उत्तम दिव्य अस्त्र लेकर उन दानवों पर प्रहार करने लगे।

श्लोक 8 (3.104.8)

ते वध्यमानास्त्रिदशैर्महात्मभि- । र्महाबलैर्वेगिभिरुन्नदद्भिः । न सेहिरे वेगवतां महात्मनां । वेगं तदा धारयितुं दिवौकसाम् ॥

te vadhyamānāstridaśairmahātmabhi- | rmahābalairvegibhirunnadadbhiḥ | na sehire vegavatāṃ mahātmanāṃ | vegaṃ tadā dhārayituṃ divaukasām

महाबली, वेगवान और गर्जना करते महात्मा देवताओं की मार खाते हुए वे दानव उन स्वर्गवासियों के वेग को सह न सके।

श्लोक 9 (3.104.9)

ते वध्यमानास्त्रिदशैर्दानवा भीमनिःस्वनाः । चक्रुः सुतुमुलं युद्धं मुहूर्तमिव भारत ॥

te vadhyamānāstridaśairdānavā bhīmaniḥsvanāḥ | cakruḥ sutumulaṃ yuddhaṃ muhūrtamiva bhārata

हे भारत, देवताओं की मार खाते हुए भी भयानक गर्जना करने वाले दानवों ने कुछ देर तक बड़ा घमासान युद्ध किया।

श्लोक 10 (3.104.10)

ते पूर्वं तपसा दग्धा मुनिभिर्भावितात्मभिः । यतमानाः परं शक्त्या त्रिदशैर्विनिषूदिताः ॥

te pūrvaṃ tapasā dagdhā munibhirbhāvitātmabhiḥ | yatamānāḥ paraṃ śaktyā tridaśairviniṣūditāḥ

शुद्ध अन्तःकरण वाले मुनियों के तप से वे पहले ही दग्ध हो चुके थे; इसलिए पूरी शक्ति से प्रयत्न करते हुए भी वे देवताओं द्वारा मारे गए।

श्लोक 11 (3.104.11)

ते हेमनिष्काभरणाः कुण्डलाङ्गदधारिणः । निहता बह्वशोभन्त पुष्पिता इव किंशुकाः ॥

te hemaniṣkābharaṇāḥ kuṇḍalāṅgadadhāriṇaḥ | nihatā bahvaśobhanta puṣpitā iva kiṃśukāḥ

सोने के हार पहने और कुण्डल-बाजूबन्द धारण किए वे मारे जाकर भी फूले हुए पलाश के वृक्षों की भाँति बहुत शोभा पा रहे थे।

श्लोक 12 (3.104.12)

हतशेषास्ततः केचित्कालेया मनुजोत्तम । विदार्य वसुधां देवीं पातालतलमास्थिताः ॥

hataśeṣāstataḥ kecitkāleyā manujottama | vidārya vasudhāṃ devīṃ pātālatalamāsthitāḥ

हे नरश्रेष्ठ, तब मरने से बचे हुए कुछ कालेय देवी पृथ्वी को फाड़कर पाताल में जा छिपे।

श्लोक 13 (3.104.13)

निहतान्दानवान्दृष्ट्वा त्रिदशा मुनिपुङ्गवम् । तुष्टुवुर्विविधैर्वाक्यैरिदं वचनमब्रुवन् ॥

nihatāndānavāndṛṣṭvā tridaśā munipuṅgavam | tuṣṭuvurvividhairvākyairidaṃ vacanamabruvan

दानवों को मरा देखकर देवताओं ने नाना प्रकार के वचनों से उन मुनिश्रेष्ठ की स्तुति की और यह कहा —

देवा ऊचुः

श्लोक 14 (3.104.14)

त्वत्प्रसादान्महाबाहो लोकैः प्राप्तं महत्सुखम् । त्वत्तेजसा च निहताः कालेयाः क्रूरविक्रमाः ॥

tvatprasādānmahābāho lokaiḥ prāptaṃ mahatsukham | tvattejasā ca nihatāḥ kāleyāḥ krūravikramāḥ

"हे महाबाहो, आपकी कृपा से लोकों को महान सुख मिला है और आपके तेज से क्रूर पराक्रम वाले कालेय मारे गए हैं।

श्लोक 15 (3.104.15)

पूरयस्व महाबाहो समुद्रं लोकभावन । यत्त्वया सलिलं पीतं तदस्मिन्पुनरुत्सृज ॥

pūrayasva mahābāho samudraṃ lokabhāvana | yattvayā salilaṃ pītaṃ tadasminpunarutsṛja

हे महाबाहो, हे लोकभावन, अब समुद्र को फिर से भर दीजिए। जो जल आपने पिया है, उसे इसमें पुनः छोड़ दीजिए।"

लोमश उवाच

श्लोक 16 (3.104.16)

एवमुक्तः प्रत्युवाच भगवान्मुनिपुङ्गवः । तांस्तदा सहितान्देवानगस्त्यः सपुरन्दरान् ॥

evamuktaḥ pratyuvāca bhagavānmunipuṅgavaḥ | tāṃstadā sahitāndevānagastyaḥ sapurandarān

ऐसा कहे जाने पर मुनिश्रेष्ठ भगवान् अगस्त्य ने इन्द्र सहित वहाँ एकत्र सब देवताओं को उत्तर दिया —

अगस्त्य उवाच

श्लोक 17 (3.104.17)

जीर्णं तद्धि मया तोयमुपायोऽन्यः प्रचिन्त्यताम् । पूरणार्थं समुद्रस्य भवद्भिर्यत्नमास्थितैः ॥

jīrṇaṃ taddhi mayā toyamupāyo'nyaḥ pracintyatām | pūraṇārthaṃ samudrasya bhavadbhiryatnamāsthitaiḥ

"वह जल तो मैंने पचा लिया है। समुद्र को भरने के प्रयत्न में लगे आप लोग कोई दूसरा उपाय सोचिए।"

लोमश उवाच

श्लोक 18 (3.104.18)

एतच्छ्रुत्वा तु वचनं महर्षेर्भावितात्मनः । विस्मिताश्च विषण्णाश्च बभूवुः सहिताः सुराः ॥

etacchrutvā tu vacanaṃ maharṣerbhāvitātmanaḥ | vismitāśca viṣaṇṇāśca babhūvuḥ sahitāḥ surāḥ

शुद्धात्मा महर्षि का यह वचन सुनकर सब देवता चकित और उदास हो गए।

श्लोक 19 (3.104.19)

परस्परमनुज्ञाप्य प्रणम्य मुनिपुङ्गवम् । प्रजाः सर्वा महाराज विप्रजग्मुर्यथागतम् ॥

parasparamanujñāpya praṇamya munipuṅgavam | prajāḥ sarvā mahārāja viprajagmuryathāgatam

हे महाराज, एक-दूसरे से विदा लेकर और मुनिश्रेष्ठ को प्रणाम करके सब प्राणी जैसे आए थे वैसे ही लौट गए।

श्लोक 20 (3.104.20)

त्रिदशा विष्णुना सार्धमुपजग्मुः पितामहम् । पूरणार्थं समुद्रस्य मन्त्रयित्वा पुनः पुनः ॥

tridaśā viṣṇunā sārdhamupajagmuḥ pitāmaham | pūraṇārthaṃ samudrasya mantrayitvā punaḥ punaḥ

समुद्र को भरने के विषय में बार-बार विचार करके देवता विष्णु के साथ पितामह ब्रह्मा के पास गए।

श्लोक 21 (3.104.21)

ते धातारमुपागम्य त्रिदशाः सह विष्णुना । ऊचुः प्राञ्जलयः सर्वे सागरस्याभिपूरणम् ॥

te dhātāramupāgamya tridaśāḥ saha viṣṇunā | ūcuḥ prāñjalayaḥ sarve sāgarasyābhipūraṇam

विधाता के पास पहुँचकर विष्णु सहित सब देवताओं ने हाथ जोड़कर उनसे समुद्र को फिर से भरने की बात कही।

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