आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 105
ब्रह्मा का आश्वासन, सगर को शिव का वरदान और तुम्बी का जन्म
ब्रह्मा देवताओं को आश्वासन देते हैं कि समय आने पर राजा भगीरथ अपने कुटुम्बियों के निमित्त समुद्र को फिर से भर देंगे। युधिष्ठिर के पूछने पर लोमश इक्ष्वाकु वंश के निःसन्तान राजा सगर की कथा आरम्भ करते हैं, जो अपनी दोनों पत्नियों — वैदर्भी और शैब्या — के साथ कैलास पर तप करते हैं। शिव वर देते हैं कि एक पत्नी से साठ हजार अभिमानी पुत्र होंगे जो एक साथ नष्ट होंगे, और दूसरी से वंश चलाने वाला एक पुत्र। शैब्या पुत्र को जन्म देती है और वैदर्भी एक तुम्बी को; सगर उसे फेंकने ही वाले थे कि आकाशवाणी उन्हें उसके बीजों को घी से भरे गरम पात्रों में रखने को कहती है, जिनसे उनके साठ हजार पुत्र उत्पन्न होंगे।
लोमश उवाच
श्लोक 1 (3.105.1)
तानुवाच समेतांस्तु ब्रह्मा लोकपितामहः । निर्ह्रादिन्या गिरा राजन्देवानाश्वासयंस्तदा ॥
tānuvāca sametāṃstu brahmā lokapitāmahaḥ | nirhrādinyā girā rājandevānāśvāsayaṃstadā
हे राजन्, लोकपितामह ब्रह्मा ने वहाँ एकत्र देवताओं को गम्भीर, गूँजती वाणी से आश्वासन देते हुए कहा —
ब्रह्मोवाच
श्लोक 2 (3.105.2)
गच्छध्वं विबुधाः सर्वे यथाकामं यथेप्सितम् । महता कालयोगेन प्रकृतिं यास्यतेऽर्णवः ॥
gacchadhvaṃ vibudhāḥ sarve yathākāmaṃ yathepsitam | mahatā kālayogena prakṛtiṃ yāsyate'rṇavaḥ
"हे देवताओ, तुम सब अपनी इच्छा के अनुसार जहाँ चाहो जाओ। दीर्घ काल बीतने पर समुद्र फिर अपनी स्वाभाविक अवस्था में आ जाएगा।
श्लोक 3 (3.105.3)
ज्ञातींश्च कारणं कृत्वा महाराजो भगीरथः । पूरयिष्यति तोयौघैः समुद्रं निधिमम्भसाम् ॥
jñātīṃśca kāraṇaṃ kṛtvā mahārājo bhagīrathaḥ | pūrayiṣyati toyaughaiḥ samudraṃ nidhimambhasām
अपने कुटुम्बियों को निमित्त बनाकर महाराज भगीरथ जल के भण्डार समुद्र को जल-प्रवाहों से फिर भर देंगे।"
लोमश उवाच
श्लोक 4 (3.105.4)
पितामहवचः श्रुत्वा सर्वे विबुधसत्तमाः । कालयोगं प्रतीक्षन्तो जग्मुश्चापि यथागतम् ॥
pitāmahavacaḥ śrutvā sarve vibudhasattamāḥ | kālayogaṃ pratīkṣanto jagmuścāpi yathāgatam
पितामह के वचन सुनकर सब श्रेष्ठ देवता उस समय के आने की प्रतीक्षा करते हुए जैसे आए थे वैसे ही लौट गए।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 5 (3.105.5)
कथं वै ज्ञातयो ब्रह्मन्कारणं चात्र किं मुने । कथं समुद्रः पूर्णश्च भगीरथपरिश्रमात् ॥
kathaṃ vai jñātayo brahmankāraṇaṃ cātra kiṃ mune | kathaṃ samudraḥ pūrṇaśca bhagīrathapariśramāt
हे ब्रह्मन्, उसके कुटुम्बी किस प्रकार कारण बने और इसमें क्या हेतु था, हे मुने? और भगीरथ के परिश्रम से समुद्र कैसे भरा?
श्लोक 6 (3.105.6)
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं विस्तरेण तपोधन । कथ्यमानं त्वया विप्र राज्ञां चरितमुत्तमम् ॥
etadicchāmyahaṃ śrotuṃ vistareṇa tapodhana | kathyamānaṃ tvayā vipra rājñāṃ caritamuttamam
हे तपोधन, हे विप्र, राजाओं का यह उत्तम चरित मैं आपके मुख से विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 7 (3.105.7)
एवमुक्तस्तु विप्रेन्द्रो धर्मराज्ञा महात्मना । कथयामास माहात्म्यं सगरस्य महात्मनः ॥
evamuktastu viprendro dharmarājñā mahātmanā | kathayāmāsa māhātmyaṃ sagarasya mahātmanaḥ
महात्मा धर्मराज के ऐसा पूछने पर उन ब्राह्मणश्रेष्ठ ने महात्मा सगर की महिमा का वर्णन किया।
लोमश उवाच
श्लोक 8 (3.105.8)
इक्ष्वाकूणां कुले जातः सगरो नाम पार्थिवः । रूपसत्वबलोपेतः स चापुत्रः प्रतापवान् ॥
ikṣvākūṇāṃ kule jātaḥ sagaro nāma pārthivaḥ | rūpasatvabalopetaḥ sa cāputraḥ pratāpavān
इक्ष्वाकुओं के कुल में सगर नाम के एक राजा उत्पन्न हुए, जो रूप, धैर्य और बल से सम्पन्न तथा प्रतापी थे, परन्तु उनके कोई पुत्र नहीं था।
श्लोक 9 (3.105.9)
स हैहयान्समुत्साद्य तालजङ्घांश्च भारत । वशे च कृत्वा राजन्यान्स्वराज्यमनुशिष्टवान् ॥
sa haihayānsamutsādya tālajaṅghāṃśca bhārata | vaśe ca kṛtvā rājanyānsvarājyamanuśiṣṭavān
हे भारत, उन्होंने हैहयों और तालजंघों का संहार किया, अन्य क्षत्रियों को अपने वश में किया और अपने राज्य का शासन किया।
श्लोक 10 (3.105.10)
तस्य भार्ये त्वभवतां रूपयौवनदर्पिते । वैदर्भी भरतश्रेष्ठ शैव्या च भरतर्षभ ॥
tasya bhārye tvabhavatāṃ rūpayauvanadarpite | vaidarbhī bharataśreṣṭha śaivyā ca bharatarṣabha
हे भरतश्रेष्ठ, उनकी दो पत्नियाँ थीं, जिन्हें अपने रूप और यौवन का गर्व था — विदर्भ की राजकुमारी वैदर्भी और शैब्या।
श्लोक 11 (3.105.11)
स पुत्रकामो नृपतिस्तप्यते स्म महत्तपः । पत्नीभ्यां सह राजेन्द्र कैलासं गिरिमाश्रितः ॥
sa putrakāmo nṛpatistapyate sma mahattapaḥ | patnībhyāṃ saha rājendra kailāsaṃ girimāśritaḥ
हे राजेन्द्र, पुत्र की कामना से राजा ने अपनी दोनों पत्नियों के साथ कैलास पर्वत पर रहकर महान तप किया।
श्लोक 12 (3.105.12)
स तप्यमानः सुमहत्तपोयोगसमन्वितः । आससाद महात्मानं त्र्यक्षं त्रिपुरमर्दनम् ॥
sa tapyamānaḥ sumahattapoyogasamanvitaḥ | āsasāda mahātmānaṃ tryakṣaṃ tripuramardanam
योगयुक्त होकर अत्यन्त कठोर तप करते हुए वे तीन नेत्रों वाले, त्रिपुर का विनाश करने वाले महात्मा के समीप पहुँचे —
श्लोक 13 (3.105.13)
शंकरं भवमीशानं पिनाकिं शूलपाणिनम् । त्र्यम्बकं शिवमुग्रेशं बहुरूपमुमापतिम् ॥
śaṃkaraṃ bhavamīśānaṃ pinākiṃ śūlapāṇinam | tryambakaṃ śivamugreśaṃ bahurūpamumāpatim
शंकर, भव, ईशान, पिनाकधारी, शूलपाणि, त्र्यम्बक, शिव, उग्रेश, बहुरूप और उमापति।
श्लोक 14 (3.105.14)
स तं दृष्ट्वैव वरदं पत्नीभ्यां सहितो नृपः । प्रणिपत्य महाबाहुः पुत्रार्थे समयाचत ॥
sa taṃ dṛṣṭvaiva varadaṃ patnībhyāṃ sahito nṛpaḥ | praṇipatya mahābāhuḥ putrārthe samayācata
उन वरदाता को देखते ही महाबाहु राजा ने अपनी दोनों पत्नियों के साथ प्रणाम किया और पुत्र के लिए याचना की।
श्लोक 15 (3.105.15)
तं प्रीतिमान्हरः प्राह सभार्यं नृपसत्तमम् । यस्मिन्वृतो मुहूर्तेऽहं त्वयेह नृपते वरम् ॥
taṃ prītimānharaḥ prāha sabhāryaṃ nṛpasattamam | yasminvṛto muhūrte'haṃ tvayeha nṛpate varam
प्रसन्न होकर हर ने पत्नियों सहित उस श्रेष्ठ राजा से कहा — "हे नृपते, जिस मुहूर्त में तुमने यहाँ मुझसे वर माँगा है, उसके कारण
रुद्र उवाच
श्लोक 16 (3.105.16)
षष्टिः पुत्रसहस्राणि शूराः परमदर्पिताः । एकस्यां संभविष्यन्ति पत्न्यां नरवरोत्तम ॥
ṣaṣṭiḥ putrasahasrāṇi śūrāḥ paramadarpitāḥ | ekasyāṃ saṃbhaviṣyanti patnyāṃ naravarottama
हे नरश्रेष्ठ, तुम्हारी एक पत्नी से साठ हजार अत्यन्त अभिमानी शूरवीर पुत्र उत्पन्न होंगे।
श्लोक 17 (3.105.17)
ते चैव सर्वे सहिताः क्षयं यास्यन्ति पार्थिव । एको वंशधरः शूर एकस्यां संभविष्यति ॥
te caiva sarve sahitāḥ kṣayaṃ yāsyanti pārthiva | eko vaṃśadharaḥ śūra ekasyāṃ saṃbhaviṣyati
परन्तु हे राजन्, वे सब एक साथ नष्ट हो जाएँगे। दूसरी पत्नी से एक ही शूरवीर पुत्र होगा, जो तुम्हारा वंश चलाएगा।"
लोमश उवाच
श्लोक 18 (3.105.18)
एवमुक्त्वा तु तं रुद्रस्तत्रैवान्तरधीयत । स चापि सगरो राजा जगाम स्वं निवेशनम् ॥
evamuktvā tu taṃ rudrastatraivāntaradhīyata | sa cāpi sagaro rājā jagāma svaṃ niveśanam
उनसे ऐसा कहकर रुद्र वहीं अन्तर्धान हो गए, और राजा सगर भी अपने घर लौट आए —
श्लोक 19 (3.105.19)
पत्नीभ्यां सहितस्तत्र सोऽतिहृष्टमनास्तदा । कालं शंभुवरप्राप्तं प्रतीक्षन्सगरोऽनयत् ॥
patnībhyāṃ sahitastatra so'tihṛṣṭamanāstadā | kālaṃ śaṃbhuvaraprāptaṃ pratīkṣansagaro'nayat
अपनी पत्नियों के साथ, अत्यन्त प्रसन्न मन से। वहाँ सगर शम्भु से मिले वरदान के फलने की प्रतीक्षा करते हुए समय बिताने लगे।
श्लोक 20 (3.105.20)
तस्य ते मनुजश्रेष्ठ भार्ये कमललोचने । वैदर्भी चैव शैब्या च गर्भिण्यौ संबभूवतुः ॥
tasya te manujaśreṣṭha bhārye kamalalocane | vaidarbhī caiva śaibyā ca garbhiṇyau saṃbabhūvatuḥ
हे मनुजश्रेष्ठ, फिर उनकी दोनों कमलनयनी पत्नियाँ, वैदर्भी और शैब्या, गर्भवती हुईं।
श्लोक 21 (3.105.21)
ततः कालेन वैदर्भी गर्भालाबुं व्यजायत । शैव्या च सुषुवे पुत्रं कुमारं देवरूपिणम् ॥
tataḥ kālena vaidarbhī garbhālābuṃ vyajāyata | śaivyā ca suṣuve putraṃ kumāraṃ devarūpiṇam
समय आने पर वैदर्भी ने एक तुम्बी को जन्म दिया, और शैब्या ने देवताओं जैसे रूप वाले एक बालक को।
श्लोक 22 (3.105.22)
तदाऽलाबुं समुत्स्रष्टुं मनश्चक्रे स पार्थिवः । अथान्तरिक्षाच्छुश्राव वाचं गंभीरनिःस्वनाम् ॥
tadā'lābuṃ samutsraṣṭuṃ manaścakre sa pārthivaḥ | athāntarikṣācchuśrāva vācaṃ gaṃbhīraniḥsvanām
तब राजा ने उस तुम्बी को फेंक देने का मन बनाया; उसी समय उन्हें आकाश से गम्भीर स्वर वाली एक वाणी सुनाई दी —
वागुवाच
श्लोक 23 (3.105.23)
राजन्मा साहसं कार्षीः पुत्रान्न त्यक्तुमर्हसि । अलाबुमध्यान्निष्कृष्य वीजं यत्नेन गोप्यताम् ॥
rājanmā sāhasaṃ kārṣīḥ putrānna tyaktumarhasi | alābumadhyānniṣkṛṣya vījaṃ yatnena gopyatām
"हे राजन्, ऐसा दुस्साहस मत करो। तुम्हें अपने पुत्रों को त्यागना नहीं चाहिए। तुम्बी के भीतर से बीज निकालकर उन्हें यत्न से सुरक्षित रखो —
श्लोक 24 (3.105.24)
सोपस्वेदेषु पात्रेषु घृतपूर्णेषु भागशः । ततः पुत्रसहस्राणि षष्टिं प्राप्स्यसि पार्थिव ॥
sopasvedeṣu pātreṣu ghṛtapūrṇeṣu bhāgaśaḥ | tataḥ putrasahasrāṇi ṣaṣṭiṃ prāpsyasi pārthiva
घी से भरे, हल्के गरम किए हुए पात्रों में अलग-अलग भाग करके। तब, हे राजन्, तुम्हें साठ हजार पुत्र प्राप्त होंगे।
श्लोक 25 (3.105.25)
महादेवेन दिष्टं ते पुत्रजन्म नराधिप । अनेन क्रमयोगेन मा ते बुद्धिरतोऽन्यथा ॥
mahādevena diṣṭaṃ te putrajanma narādhipa | anena kramayogena mā te buddhirato'nyathā
हे नराधिप, महादेव ने इसी क्रम से तुम्हारे पुत्रों के जन्म का विधान किया है; इसके विपरीत कुछ मत सोचो।"