आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 106
सगर के साठ हजार पुत्र और यज्ञ-अश्व की खोज
आकाशवाणी के अनुसार सगर घी के घड़ों में रखे बीजों से साठ हजार पुत्र प्राप्त करते हैं। वे अभिमानी और उपद्रवी वीर बनकर देवताओं और सब प्राणियों को सताने लगते हैं, और ब्रह्मा देवताओं को आश्वासन देते हैं कि वे शीघ्र ही अपने कर्मों से नष्ट होंगे। सगर के अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा सूखे समुद्र के पास अदृश्य हो जाता है; उसके बिना न लौटने की आज्ञा पाकर पुत्र असंख्य प्राणियों को मारते हुए समुद्र-तल खोद डालते हैं, और अन्त में ईशान कोण में पाताल तक पहुँचकर तेज से दीप्त कपिल मुनि के पास घोड़े को विचरते देखते हैं।
लोमश उवाच
श्लोक 1 (3.106.1)
एतच्छ्रुत्वान्तरिक्षाच्च स राजा राजसत्तमः । यथोक्तं तच्चकाराथ श्रद्दधद्भरतर्षभ ॥
etacchrutvāntarikṣācca sa rājā rājasattamaḥ | yathoktaṃ taccakārātha śraddadhadbharatarṣabha
हे भरतश्रेष्ठ, आकाश से यह सुनकर उस राजश्रेष्ठ ने श्रद्धापूर्वक ठीक वैसा ही किया जैसा कहा गया था।
श्लोक 2 (3.106.2)
एकैकशस्ततः कृत्वा बीजं बीजं नराधिपः । घृतपूर्णेषु कुम्भेषु तान्भागान्विदधे ततः ॥
ekaikaśastataḥ kṛtvā bījaṃ bījaṃ narādhipaḥ | ghṛtapūrṇeṣu kumbheṣu tānbhāgānvidadhe tataḥ
फिर राजा ने एक-एक बीज को अलग करके उन भागों को घी से भरे घड़ों में रख दिया।
श्लोक 3 (3.106.3)
धात्रीश्चैकैकशः प्रादात्पुत्ररक्षणतत्परः । ततः कालेन महता समुत्तस्थुर्महाबलाः ॥
dhātrīścaikaikaśaḥ prādātputrarakṣaṇatatparaḥ | tataḥ kālena mahatā samuttasthurmahābalāḥ
पुत्रों की रक्षा में तत्पर होकर उसने एक-एक के लिए एक-एक धाय नियुक्त की। फिर बहुत समय बीतने पर वे महाबली उठ खड़े हुए।
श्लोक 4 (3.106.4)
षष्टिः पुत्रसहस्राणि तस्याप्रतिमतेजसः । रुद्रप्रसादाद्राजर्षेः समजायन्त पार्थिव ॥
ṣaṣṭiḥ putrasahasrāṇi tasyāpratimatejasaḥ | rudraprasādādrājarṣeḥ samajāyanta pārthiva
हे राजन्, रुद्र की कृपा से उस अतुलित तेजस्वी राजर्षि के साठ हजार पुत्र उत्पन्न हुए।
श्लोक 5 (3.106.5)
ते घोराः क्रूरकर्माण आकाशपरिसर्पिणः । बहुत्वाच्चावजानन्तः सर्वाँल्लोकान्सहामरान् ॥
te ghorāḥ krūrakarmāṇa ākāśaparisarpiṇaḥ | bahutvāccāvajānantaḥ sarvām̐llokānsahāmarān
वे भयंकर और क्रूर कर्म करने वाले थे और आकाश में विचरते थे; संख्या में बहुत होने के कारण वे देवताओं सहित सब लोकों की अवहेलना करते थे।
श्लोक 6 (3.106.6)
त्रिदशांश्चाप्यबाधन्त तथा गन्धर्वराक्षसान् । सर्वाणि चैव भूतानि शूराः समरशालिनः ॥
tridaśāṃścāpyabādhanta tathā gandharvarākṣasān | sarvāṇi caiva bhūtāni śūrāḥ samaraśālinaḥ
युद्ध में शोभा पाने वाले वे शूरवीर देवताओं को, गन्धर्वों और राक्षसों को तथा सभी प्राणियों को सताने लगे।
श्लोक 7 (3.106.7)
वध्यमानास्तदा लोकाः सागरैर्मन्दबुद्धिभिः । ब्रह्माणं शरणं जग्मुः सहिताः सर्वदैवतैः ॥
vadhyamānāstadā lokāḥ sāgarairmandabuddhibhiḥ | brahmāṇaṃ śaraṇaṃ jagmuḥ sahitāḥ sarvadaivataiḥ
उन मन्दबुद्धि सगरपुत्रों से पीड़ित होकर सब लोक समस्त देवताओं के साथ ब्रह्मा की शरण में गए।
श्लोक 8 (3.106.8)
तानुवाच महाभागः सर्वलोकपितामहः । गच्छध्वं त्रिदशाः सर्वे लोकैः सार्धं यथागतम् ॥
tānuvāca mahābhāgaḥ sarvalokapitāmahaḥ | gacchadhvaṃ tridaśāḥ sarve lokaiḥ sārdhaṃ yathāgatam
सब लोकों के पितामह महाभाग ब्रह्मा ने उनसे कहा — "हे देवताओ, तुम सब लोकों के साथ जैसे आए हो वैसे ही लौट जाओ।
ब्रह्मोवाच
श्लोक 9 (3.106.9)
नातिदीर्घेण कालेन सागराणां क्षयो महान् । भविष्यति महाघोरः स्वकृतैः कर्मभिः सुराः ॥
nātidīrgheṇa kālena sāgarāṇāṃ kṣayo mahān | bhaviṣyati mahāghoraḥ svakṛtaiḥ karmabhiḥ surāḥ
हे देवताओ, थोड़े ही समय में सगरपुत्रों का अपने ही कर्मों के कारण महाभयंकर विनाश होगा।"
लोमश उवाच
श्लोक 10 (3.106.10)
एवमुक्तास्तु ते देवा लोकाश्च मनुजेश्वर । पितामहमनुज्ञाप्य विप्रजग्मुर्यथागतम् ॥
evamuktāstu te devā lokāśca manujeśvara | pitāmahamanujñāpya viprajagmuryathāgatam
हे मनुजेश्वर, ऐसा कहे जाने पर देवता और सब लोक पितामह से आज्ञा लेकर जैसे आए थे वैसे ही लौट गए।
श्लोक 11 (3.106.11)
ततः काले बहुतिथे व्यतीते भरतर्षभ । दीक्षितः सगरो राजा हयमेधेन वीर्यवान् ॥
tataḥ kāle bahutithe vyatīte bharatarṣabha | dīkṣitaḥ sagaro rājā hayamedhena vīryavān
हे भरतश्रेष्ठ, फिर बहुत समय बीत जाने पर पराक्रमी राजा सगर ने अश्वमेध यज्ञ की दीक्षा ली।
श्लोक 12 (3.106.12)
तस्याश्वो व्यचरद्भूमिं पुत्रैः सुपरिरक्षितः । सर्वैरेव महोत्साहैः स्वच्छन्दप्रचरो नृप ॥
tasyāśvo vyacaradbhūmiṃ putraiḥ suparirakṣitaḥ | sarvaireva mahotsāhaiḥ svacchandapracaro nṛpa
हे राजन्, उसका घोड़ा, जिसकी रक्षा उसके सब उत्साही पुत्र भली-भाँति कर रहे थे, स्वच्छन्द होकर पृथ्वी पर विचरने लगा।
श्लोक 13 (3.106.13)
समुद्रं स समासाद्य निस्तोयं भीमदर्शनम् । रक्ष्यमाणः प्रयत्नेन तत्रैवान्तरधीयत ॥
samudraṃ sa samāsādya nistoyaṃ bhīmadarśanam | rakṣyamāṇaḥ prayatnena tatraivāntaradhīyata
जलहीन और भयानक दिखने वाले समुद्र के पास पहुँचकर वह घोड़ा, यत्नपूर्वक रक्षा किए जाने पर भी, वहीं अदृश्य हो गया।
श्लोक 14 (3.106.14)
ततस्ते सागरास्तात हृतं मत्वा हयोत्तमम् । आगम्य पितुराचख्युरदृश्यं तुरगं हृतम् । तेनोक्ता दिक्षु सर्वासु पुत्रा मार्गत वाजिनम् ॥
tataste sāgarāstāta hṛtaṃ matvā hayottamam | āgamya piturācakhyuradṛśyaṃ turagaṃ hṛtam | tenoktā dikṣu sarvāsu putrā mārgata vājinam
तब हे तात, सगरपुत्रों ने उस उत्तम अश्व को चुराया गया समझकर पिता के पास आकर बताया कि घोड़ा चुरा लिया गया है और कहीं दिखाई नहीं देता। उसने उनसे कहा — "पुत्रो, सब दिशाओं में घोड़े को खोजो।"
श्लोक 15 (3.106.15)
ततस्ते पितुराज्ञाय दिक्षु सर्वासु तं हयम् । अमार्गन्त महाराज सर्वं च पृथिवीतलम् ॥
tataste piturājñāya dikṣu sarvāsu taṃ hayam | amārganta mahārāja sarvaṃ ca pṛthivītalam
हे महाराज, तब पिता की आज्ञा से वे सब दिशाओं में और सारी पृथ्वी पर उस घोड़े को खोजने लगे।
श्लोक 16 (3.106.16)
ततस्ते सागराः सर्वे समुपेत्य परस्परम् । नाध्यगच्छन्त तुरगमश्वहर्तारमेव च ॥
tataste sāgarāḥ sarve samupetya parasparam | nādhyagacchanta turagamaśvahartārameva ca
फिर सब सगरपुत्र आपस में मिले, परन्तु उन्हें न घोड़ा मिला था, न उसे चुराने वाला।
श्लोक 17 (3.106.17)
आगम्य पितरं चोचुस्ततः प्राञ्जलयोऽग्रतः ॥
āgamya pitaraṃ cocustataḥ prāñjalayo'grataḥ
तब वे पिता के पास आकर उनके सामने हाथ जोड़कर बोले —
सगरात्मजा ऊचुः
श्लोक 18 (3.106.18)
ससमुद्रवनद्वीपा सनदीनदकन्दरा । सपर्वतवनोद्देशा निखिलेन मही नृप ॥
sasamudravanadvīpā sanadīnadakandarā | saparvatavanoddeśā nikhilena mahī nṛpa
"हे राजन्, समुद्रों, वनों और द्वीपों सहित, नदियों, नदों और कन्दराओं सहित, पर्वतों और वन-प्रदेशों सहित यह सारी पृथ्वी
श्लोक 19 (3.106.19)
अस्माभिर्विचिता राजञ्शासनात्तव पार्थिव । न चाश्वमधिगच्छामो नाश्वहर्तारमेव च ॥
asmābhirvicitā rājañśāsanāttava pārthiva | na cāśvamadhigacchāmo nāśvahartārameva ca
हमने आपकी आज्ञा से छान डाली है, हे पार्थिव, फिर भी न हमें घोड़ा मिल रहा है, न उसे चुराने वाला।"
लोमश उवाच
श्लोक 20 (3.106.20)
श्रुत्वा तु वचनं तेषां स राजा क्रोधमूर्छितः । उवाच वचनं सर्वांस्तदा दैववशान्नृप ॥
śrutvā tu vacanaṃ teṣāṃ sa rājā krodhamūrchitaḥ | uvāca vacanaṃ sarvāṃstadā daivavaśānnṛpa
हे राजन्, उनकी बात सुनकर राजा क्रोध से भर गया और तब दैववश उसने उन सबसे कहा —
सगर उवाच
श्लोक 21 (3.106.21)
अनागमाय गच्छध्वं भूयो मार्गत वाजिनम् । यज्ञियं तं विना ह्यश्वं नागन्तव्यं हि पुत्रकाः ॥
anāgamāya gacchadhvaṃ bhūyo mārgata vājinam | yajñiyaṃ taṃ vinā hyaśvaṃ nāgantavyaṃ hi putrakāḥ
"जाओ, और लौटकर मत आना! फिर से घोड़े को खोजो। पुत्रो, उस यज्ञ के घोड़े के बिना तुम्हें लौटना नहीं है।"
लोमश उवाच
श्लोक 22 (3.106.22)
प्रतिगृह्य तु संदेशं पितुस्ते सगरात्मजाः । भूय एव महीं कृत्स्नां विचेतुमुपचक्रमुः ॥
pratigṛhya tu saṃdeśaṃ pituste sagarātmajāḥ | bhūya eva mahīṃ kṛtsnāṃ vicetumupacakramuḥ
पिता का आदेश स्वीकार करके सगरपुत्रों ने फिर से सारी पृथ्वी को खोजना आरम्भ किया।
श्लोक 23 (3.106.23)
अथापश्यन्त ते वीराः पृथिवीमवदारिताम् । समुद्रे पृथिवीपाल पदं मार्गं च वाजिनः ॥
athāpaśyanta te vīrāḥ pṛthivīmavadāritām | samudre pṛthivīpāla padaṃ mārgaṃ ca vājinaḥ
हे पृथ्वीपाल, तब उन वीरों ने समुद्र में पृथ्वी को फटा हुआ देखा, और साथ ही घोड़े के पैरों के चिह्न तथा उसका मार्ग भी।
श्लोक 24 (3.106.24)
समासाद्य बिलं तच्चाप्यखनन्सगरात्मजाः । कुद्दालैर्मुसलैश्चैव समुद्रं यत्नमास्थिताः ॥
samāsādya bilaṃ taccāpyakhanansagarātmajāḥ | kuddālairmusalaiścaiva samudraṃ yatnamāsthitāḥ
उस बिल के पास पहुँचकर सगरपुत्रों ने उसे खोदना आरम्भ किया, और कुदालों तथा मूसलों से यत्नपूर्वक समुद्र को खोदने लगे।
श्लोक 25 (3.106.25)
स खन्यमानः सहितैः सागरैर्वरुणालयः । अगच्छत्परमामार्तिं दीर्यमाणः समन्ततः ॥
sa khanyamānaḥ sahitaiḥ sāgarairvaruṇālayaḥ | agacchatparamāmārtiṃ dīryamāṇaḥ samantataḥ
सगरपुत्रों द्वारा मिलकर खोदा जाता हुआ वरुणालय समुद्र चारों ओर से विदीर्ण होकर अत्यन्त पीड़ा में पड़ गया।
श्लोक 26 (3.106.26)
असुरोरगरक्षांसि सत्वानि विविधानि च । आर्तनादमकुर्वन्त वध्यमानानि सागरैः ॥
asuroragarakṣāṃsi satvāni vividhāni ca | ārtanādamakurvanta vadhyamānāni sāgaraiḥ
असुर, नाग, राक्षस और नाना प्रकार के जीव सगरपुत्रों के हाथों मारे जाते हुए आर्तनाद करने लगे।
श्लोक 27 (3.106.27)
छिन्नशीर्षा विदेहाश्च भिन्नजान्वस्थिमस्तकाः । प्राणिनः समदृश्यन्त शतशोऽथ सहस्रशः ॥
chinnaśīrṣā videhāśca bhinnajānvasthimastakāḥ | prāṇinaḥ samadṛśyanta śataśo'tha sahasraśaḥ
सैकड़ों और हजारों प्राणी दिखाई देने लगे, जिनके सिर कट गए थे, शरीर छिन्न-भिन्न हो गए थे और घुटने, हड्डियाँ तथा मस्तक टूट गए थे।
श्लोक 28 (3.106.28)
एवं हि खनतां तेषां समुद्रं वरुणालयम् । व्यतीतः सुमहान्कालो न चाश्वः समदृश्यत ॥
evaṃ hi khanatāṃ teṣāṃ samudraṃ varuṇālayam | vyatītaḥ sumahānkālo na cāśvaḥ samadṛśyata
इस प्रकार वरुणालय समुद्र को खोदते हुए उन्हें बहुत लम्बा समय बीत गया, फिर भी घोड़ा दिखाई नहीं दिया।
श्लोक 29 (3.106.29)
ततः पूर्वोत्तरे देशे समुद्रस्य महीपते । विदार्य पातालमथ संक्रुद्धाः सगरात्मजाः ॥
tataḥ pūrvottare deśe samudrasya mahīpate | vidārya pātālamatha saṃkruddhāḥ sagarātmajāḥ
हे महीपते, तब समुद्र के ईशान कोण में क्रोध से भरे सगरपुत्रों ने पाताल तक धरती को फाड़ डाला,
श्लोक 30 (3.106.30)
अपश्यन्त हयं यत्र विचरन्तं महीतले । कपिलं च महात्मानं तेजोराशिमनुत्तमम् ॥
apaśyanta hayaṃ yatra vicarantaṃ mahītale | kapilaṃ ca mahātmānaṃ tejorāśimanuttamam
और वहाँ उन्होंने घोड़े को धरती पर विचरते देखा, और साथ ही तेज के अनुपम पुंज महात्मा कपिल को भी,
श्लोक 31 (3.106.31)
तेजसा दीप्यमानं तु ज्वालाभिरिव पावकम् । दृष्ट्वा हि विस्मिताः सर्वे बभूवुः सगरात्मजाः ॥
tejasā dīpyamānaṃ tu jvālābhiriva pāvakam | dṛṣṭvā hi vismitāḥ sarve babhūvuḥ sagarātmajāḥ
जो ज्वालाओं से घिरी अग्नि के समान तेज से दीप्त हो रहे थे। उन्हें देखकर सब सगरपुत्र विस्मित हो गए।