आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 107
कपिल द्वारा सगरपुत्रों का भस्म होना और अंशुमान का अश्व लौटाना
लोमश सगर की कथा आगे सुनाते हैं। सगर के साठ हज़ार पुत्र यज्ञ के घोड़े को मुनि कपिल के पास पाते हैं, उनकी उपेक्षा करके घोड़े की ओर दौड़ते हैं, और कपिल अपने नेत्रों की अग्नि से उन्हें भस्म कर देते हैं। युधिष्ठिर के पूछने पर लोमश बताते हैं कि सगर ने अपने पुत्र असमञ्ज को क्यों निर्वासित किया था; फिर सगर असमञ्ज के पुत्र अंशुमान को भेजते हैं, जो कपिल को प्रसन्न करके घोड़ा लौटा लाते हैं और यह वर पाते हैं कि उनका पौत्र गंगा को स्वर्ग से उतारेगा। सगर अपना यज्ञ पूरा करते हैं; फिर अंशुमान और उनके बाद दिलीप राज्य करते हैं, दिलीप गंगा को उतारने में असफल रहते हैं, और उनके पुत्र भगीरथ राजा बनते हैं।
लोमश उवाच
श्लोक 1 (3.107.1)
ते तं दृष्ट्वा हयं राजन्संप्रहृष्टतनूरुहाः । अनादृत्य महात्मानं कपिलं कालचोदिताः ॥
te taṃ dṛṣṭvā hayaṃ rājansaṃprahṛṣṭatanūruhāḥ | anādṛtya mahātmānaṃ kapilaṃ kālacoditāḥ
हे राजन्, उस घोड़े को देखकर सगर के पुत्र हर्ष से पुलकित हो उठे। काल से प्रेरित होकर उन्होंने महात्मा कपिल की उपेक्षा की,
श्लोक 2 (3.107.2)
संक्रुद्धाः संप्रधावन्त वाजिग्रहणकाङ्क्षिणः । ततः क्रुद्धो महाराज कपिलो मुनिसत्तमः ॥
saṃkruddhāḥ saṃpradhāvanta vājigrahaṇakāṅkṣiṇaḥ | tataḥ kruddho mahārāja kapilo munisattamaḥ
और क्रोध में भरकर घोड़े को पकड़ने की इच्छा से दौड़ पड़े। तब, हे महाराज, मुनियों में श्रेष्ठ कपिल क्रुद्ध हो उठे —
श्लोक 3 (3.107.3)
वासुदेवेति यं प्राहुः कपिलं मुनिपुङ्गवम् । स चक्षुर्विवृतं कृत्वा तेजस्तेषु समुत्सृजन् ॥
vāsudeveti yaṃ prāhuḥ kapilaṃ munipuṅgavam | sa cakṣurvivṛtaṃ kṛtvā tejasteṣu samutsṛjan
वे मुनिश्रेष्ठ कपिल, जिन्हें वासुदेव कहा जाता है। उन्होंने अपनी आँखें खोलकर उन पर अपना तेज छोड़ा,
श्लोक 4 (3.107.4)
ददाह सुमहातेजा मन्दबुद्धीन्स सागरान् । षष्टिं तानि सहस्राणि युगपन्मुनिसत्तमः ॥
dadāha sumahātejā mandabuddhīnsa sāgarān | ṣaṣṭiṃ tāni sahasrāṇi yugapanmunisattamaḥ
और उन महातेजस्वी मुनिश्रेष्ठ ने उन मन्दबुद्धि सगरपुत्रों को — उन सभी साठ हज़ार को — एक साथ भस्म कर डाला।
श्लोक 5 (3.107.5)
तान्दृष्ट्वा भस्मसाद्भूतान्नारदः सुमहातपाः । सगरान्तिकमागत्य तच्च तस्मै न्यवेदयत् ॥
tāndṛṣṭvā bhasmasādbhūtānnāradaḥ sumahātapāḥ | sagarāntikamāgatya tacca tasmai nyavedayat
उन्हें भस्म हुआ देखकर महातपस्वी नारद सगर के पास आए और उन्हें सारा समाचार सुनाया।
श्लोक 6 (3.107.6)
स तच्छ्रुत्वा वचो घोरं राजा मुनिमुखोद्गतम् । मुहूर्तं विमना भूत्वा स्थाणोर्वाक्यमचिन्तयत् ॥
sa tacchrutvā vaco ghoraṃ rājā munimukhodgatam | muhūrtaṃ vimanā bhūtvā sthāṇorvākyamacintayat
मुनि के मुख से निकले वे भयानक वचन सुनकर राजा क्षण भर के लिए उदास हो गए, फिर उन्हें स्थाणु (शिव) का कहा हुआ वचन स्मरण हो आया।
श्लोक 7 (3.107.7)
स पुत्रनिधनोत्थेन दुःखेन समभिप्लुतः । आत्मानमात्मनाऽऽश्वास्य हयमेवान्वचिन्तयत् ॥
sa putranidhanotthena duḥkhena samabhiplutaḥ | ātmānamātmanā''śvāsya hayamevānvacintayat
पुत्रों की मृत्यु से उपजे दुःख में डूबे हुए भी उन्होंने स्वयं ही अपने मन को ढाढ़स बँधाया और केवल घोड़े के विषय में सोचने लगे।
श्लोक 8 (3.107.8)
अंशुमन्तं समाहूय असमञ्जसुतं तदा । पौत्रं भरतशार्दूल इदं वचनमब्रवीत् ॥
aṃśumantaṃ samāhūya asamañjasutaṃ tadā | pautraṃ bharataśārdūla idaṃ vacanamabravīt
तब, हे भरतसिंह, उन्होंने असमञ्ज के पुत्र, अपने पौत्र अंशुमान को बुलाया और यह वचन कहा —
सगर उवाच
श्लोक 9 (3.107.9)
षष्टिस्तात सहस्राणि पुत्राणाममितौजसाम् । कापिलं तेज आसाद्य मत्कृते निधनं गताः ॥
ṣaṣṭistāta sahasrāṇi putrāṇāmamitaujasām | kāpilaṃ teja āsādya matkṛte nidhanaṃ gatāḥ
तात, मेरे अपार बलशाली साठ हज़ार पुत्र कपिल के तेज से टकराकर मेरे ही कारण मृत्यु को प्राप्त हुए।
श्लोक 10 (3.107.10)
तव चापि पिता तात परित्यक्तो मयाऽनघ । धर्मं संरक्षमाणेन पौराणां हितमिच्छता ॥
tava cāpi pitā tāta parityakto mayā'nagha | dharmaṃ saṃrakṣamāṇena paurāṇāṃ hitamicchatā
और हे निष्पाप तात, तुम्हारे पिता को भी मैंने धर्म की रक्षा करते हुए और नगरवासियों का हित चाहते हुए त्याग दिया था।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 11 (3.107.11)
किमर्थं राजशार्दूलः सगरः पुत्रमात्मजम् । त्यक्तवान्दुस्त्यजं वीरं तन्मे ब्रूहि तपोधन ॥
kimarthaṃ rājaśārdūlaḥ sagaraḥ putramātmajam | tyaktavāndustyajaṃ vīraṃ tanme brūhi tapodhana
हे तपोधन, राजाओं में सिंह के समान सगर ने अपने ही वीर पुत्र को, जिसे त्यागना इतना कठिन था, क्यों त्याग दिया? यह मुझे बताइए।
लोमश उवाच
श्लोक 12 (3.107.12)
असमञ्ज इति ख्यातः सगरस्य सुतो ह्यभूत् । यं शैव्या जनयामास पौराणां स हि दारकान् ॥
asamañja iti khyātaḥ sagarasya suto hyabhūt | yaṃ śaivyā janayāmāsa paurāṇāṃ sa hi dārakān
सगर का असमञ्ज नाम से प्रसिद्ध एक पुत्र था, जिसे शैब्या ने जन्म दिया था। वह नगरवासियों के बालकों को —
श्लोक 13 (3.107.13)
क्रीडतः सहसाऽऽसाद्य तत्रतत्र महीपते । चूडासु क्रोशतो गृह्य नद्यां चिक्षेप दुर्बलान् ॥
krīḍataḥ sahasā''sādya tatratatra mahīpate | cūḍāsu krośato gṛhya nadyāṃ cikṣepa durbalān
हे राजन्, जहाँ-तहाँ खेलते हुए उन बालकों पर वह सहसा झपटता और उन चीखते हुए दुर्बल बालकों को चोटी से पकड़कर नदी में फेंक देता था।
श्लोक 14 (3.107.14)
ततः पौराः समाजग्मुर्भयशोकपरिप्लुताः । सगरं चाभ्यभाषन्त सर्वे प्राञ्जलयः स्थिताः ॥
tataḥ paurāḥ samājagmurbhayaśokapariplutāḥ | sagaraṃ cābhyabhāṣanta sarve prāñjalayaḥ sthitāḥ
तब भय और शोक से व्याकुल नगरवासी इकट्ठे हुए और सब हाथ जोड़कर खड़े हो सगर से बोले —
पौरा ऊचुः
श्लोक 15 (3.107.15)
त्वं नस्त्राता महाराज परचक्रादिभिर्भयात् । असमञ्जभयाद्धोरात्ततो नस्त्रातुमर्हसि ॥
tvaṃ nastrātā mahārāja paracakrādibhirbhayāt | asamañjabhayāddhorāttato nastrātumarhasi
महाराज, शत्रु-सेनाओं आदि के भय से आप ही हमारे रक्षक हैं। अतः असमञ्ज के घोर भय से भी आप हमारी रक्षा करें।
लोमश उवाच
श्लोक 16 (3.107.16)
पौराणां वचनं श्रुत्वा घोरं नृपतिसत्तमः । मुहूर्तं विमना भूत्वा सचिवानिदमब्रवीत् ॥
paurāṇāṃ vacanaṃ śrutvā ghoraṃ nṛpatisattamaḥ | muhūrtaṃ vimanā bhūtvā sacivānidamabravīt
नगरवासियों के ये दारुण वचन सुनकर नृपश्रेष्ठ क्षण भर उदास रहे, फिर उन्होंने अपने मन्त्रियों से यह कहा —
सगर उवाच
श्लोक 17 (3.107.17)
असमञ्जः पुरादद्य सुतो मे विप्रवास्यताम् । यदि वो मत्प्रियं कार्यमेतच्छीघ्रं विधीयताम् ॥
asamañjaḥ purādadya suto me vipravāsyatām | yadi vo matpriyaṃ kāryametacchīghraṃ vidhīyatām
मेरे पुत्र असमञ्ज को आज ही नगर से निर्वासित कर दिया जाए। यदि तुम मेरा प्रिय करना चाहते हो, तो यह काम शीघ्र किया जाए।
लोमश उवाच
श्लोक 18 (3.107.18)
एवमुक्ता नरेन्द्रेण सचिवास्ते नराधिप । यथोक्तं त्वरिताश्चक्रुर्यथाऽऽज्ञापितवान्नृपः ॥
evamuktā narendreṇa sacivāste narādhipa | yathoktaṃ tvaritāścakruryathā''jñāpitavānnṛpaḥ
हे नरेश, राजा के ऐसा कहने पर मन्त्रियों ने तुरन्त वैसा ही किया जैसी राजा ने आज्ञा दी थी।
श्लोक 19 (3.107.19)
एतत्ते सर्वमाख्यातं यथा पुत्रो महात्मना । पौराणां हितकामेन सगरेण विवासितः ॥
etatte sarvamākhyātaṃ yathā putro mahātmanā | paurāṇāṃ hitakāmena sagareṇa vivāsitaḥ
महात्मा सगर ने नगरवासियों के हित की कामना से अपने पुत्र को किस प्रकार निर्वासित किया, यह सब मैंने तुम्हें बता दिया।
श्लोक 20 (3.107.20)
अंशुमांस्तु महेष्वासो यदुक्तः सगरेण हि । तत्ते सर्वं प्रवक्ष्यामि कीर्त्यमानं निबोध मे ॥
aṃśumāṃstu maheṣvāso yaduktaḥ sagareṇa hi | tatte sarvaṃ pravakṣyāmi kīrtyamānaṃ nibodha me
अब महाधनुर्धर अंशुमान से सगर ने जो कुछ कहा, वह सब मैं तुम्हें बताता हूँ; मेरे कहे हुए को ध्यान से सुनो।
सगर उवाच
श्लोक 21 (3.107.21)
पितुश्च तेऽहं त्यागेन पुत्राणां निधनेन च । अलाभेन तथाऽश्वस्य परितप्यामि पुत्रक ॥
pituśca te'haṃ tyāgena putrāṇāṃ nidhanena ca | alābhena tathā'śvasya paritapyāmi putraka
पुत्र, तुम्हारे पिता के त्याग से, अपने पुत्रों की मृत्यु से और घोड़े के न मिलने से मैं संतप्त हूँ।
श्लोक 22 (3.107.22)
तस्माद्दुःखाभिसंतप्तं यज्ञविघ्नाच्च मोहितम् । हयस्यानयनात्पौत्र नरकान्मां समुद्धर ॥
tasmādduḥkhābhisaṃtaptaṃ yajñavighnācca mohitam | hayasyānayanātpautra narakānmāṃ samuddhara
इसलिए, हे पौत्र, दुःख से संतप्त और यज्ञ में विघ्न पड़ने से मोहग्रस्त मुझको घोड़ा लौटाकर नरक से उबार लो।
लोमश उवाच
श्लोक 23 (3.107.23)
अंशुमानेवमुक्तस्तु सगरेण महात्मना । जगाम दुःखात्तं देशं यत्र वै दारिता मही ॥
aṃśumānevamuktastu sagareṇa mahātmanā | jagāma duḥkhāttaṃ deśaṃ yatra vai dāritā mahī
महात्मा सगर के ऐसा कहने पर अंशुमान दुःखी मन से उस स्थान पर गए जहाँ पृथ्वी खोदी गई थी।
श्लोक 24 (3.107.24)
स तु तेनैव मार्गेण समुद्रं प्रविवेश ह । अपश्यच्च महात्मानं कपिलं तुरगं च तम् ॥
sa tu tenaiva mārgeṇa samudraṃ praviveśa ha | apaśyacca mahātmānaṃ kapilaṃ turagaṃ ca tam
उसी मार्ग से वे समुद्र में प्रविष्ट हुए और वहाँ उन्होंने महात्मा कपिल तथा उस घोड़े को देखा।
श्लोक 25 (3.107.25)
स दृष्ट्वा तेजसो राशिं पुराणमृषिसत्तमम् । प्रणम्य शिरसा भूमौ कार्यमस्मै न्यवेदयत् ॥
sa dṛṣṭvā tejaso rāśiṃ purāṇamṛṣisattamam | praṇamya śirasā bhūmau kāryamasmai nyavedayat
तेज के पुंज उन प्राचीन ऋषिश्रेष्ठ को देखकर उन्होंने भूमि पर सिर टेककर प्रणाम किया और अपना प्रयोजन निवेदन किया।
श्लोक 26 (3.107.26)
ततः प्रीतो महाराज कपिलोंऽशुमतोऽभवत् । उवाच चैनं धर्मात्मा वरदोस्मीति भारत ॥
tataḥ prīto mahārāja kapiloṃ'śumato'bhavat | uvāca cainaṃ dharmātmā varadosmīti bhārata
तब, हे महाराज, कपिल अंशुमान पर प्रसन्न हुए, और हे भारत, उन धर्मात्मा ने उनसे कहा — "मैं तुम्हें वर देता हूँ।"
श्लोक 27 (3.107.27)
स वव्रे तुरगं तत्र प्रथमं यज्ञकारणात् । द्वितीयमुदकं वव्रे पितॄणां पावनेच्छया ॥
sa vavre turagaṃ tatra prathamaṃ yajñakāraṇāt | dvitīyamudakaṃ vavre pitṝṇāṃ pāvanecchayā
उन्होंने पहले वर में यज्ञ के लिए घोड़ा माँगा, और दूसरे वर में पितरों को पवित्र करने की इच्छा से जल माँगा।
श्लोक 28 (3.107.28)
तमुवाच महातेजाः कपिलो मुनिपुङ्गवः । ददानि तव भद्रं ते यद्यत्प्रार्थयसेऽनघ ॥
tamuvāca mahātejāḥ kapilo munipuṅgavaḥ | dadāni tava bhadraṃ te yadyatprārthayase'nagha
महातेजस्वी मुनिश्रेष्ठ कपिल ने उनसे कहा — "हे निष्पाप, तुम्हारा कल्याण हो; तुम जो-जो माँगते हो, वह मैं तुम्हें देता हूँ।"
कपिल उवाच
श्लोक 29 (3.107.29)
त्वयि क्षमा च धर्मश्च सत्यं चापि प्रतिष्ठितम् । त्वया कृतार्थः सगरः पुत्रवांश्च त्वया पिता ॥
tvayi kṣamā ca dharmaśca satyaṃ cāpi pratiṣṭhitam | tvayā kṛtārthaḥ sagaraḥ putravāṃśca tvayā pitā
तुममें क्षमा, धर्म और सत्य प्रतिष्ठित हैं। तुम्हारे कारण सगर कृतार्थ हुए हैं, और तुम्हारे कारण ही तुम्हारे पिता सच्चे अर्थ में पुत्रवान हैं।
श्लोक 30 (3.107.30)
तव चैव प्रभावेन स्वर्गं यास्यन्ति सागराः । शलभत्वं गता ये ते मम क्रोधहुताशने ॥
tava caiva prabhāvena svargaṃ yāsyanti sāgarāḥ | śalabhatvaṃ gatā ye te mama krodhahutāśane
तुम्हारे ही प्रभाव से वे सगरपुत्र, जो मेरी क्रोधाग्नि में पतंगों की भाँति जल गए, स्वर्ग को जाएँगे।
श्लोक 31 (3.107.31)
पौत्रश्च ते त्रिपथगां त्रिदिवादानयिष्यति । पावनार्थं सागराणां तोषयित्वा महेश्वरम् ॥
pautraśca te tripathagāṃ tridivādānayiṣyati | pāvanārthaṃ sāgarāṇāṃ toṣayitvā maheśvaram
और तुम्हारा पौत्र महेश्वर को प्रसन्न करके सगरपुत्रों को पवित्र करने के लिए त्रिपथगा गंगा को स्वर्ग से उतार लाएगा।
श्लोक 32 (3.107.32)
हयं नयस्व भद्रं ते यज्ञियं नरपुङ्गव । यज्ञः समाप्यतां तात सगरस्य महात्मनः ॥
hayaṃ nayasva bhadraṃ te yajñiyaṃ narapuṅgava | yajñaḥ samāpyatāṃ tāta sagarasya mahātmanaḥ
हे नरश्रेष्ठ, तुम्हारा कल्याण हो; यज्ञ के इस घोड़े को ले जाओ। तात, महात्मा सगर का यज्ञ पूर्ण हो।
लोमश उवाच
श्लोक 33 (3.107.33)
अंशुमानेवमुक्तस्तु कपिलेन महात्मना । आजगाम हयं गृह्य यज्ञवाटं महात्मनः ॥
aṃśumānevamuktastu kapilena mahātmanā | ājagāma hayaṃ gṛhya yajñavāṭaṃ mahātmanaḥ
महात्मा कपिल के ऐसा कहने पर अंशुमान घोड़ा लेकर महात्मा सगर की यज्ञशाला में आए।
श्लोक 34 (3.107.34)
सोभिवाद्य ततः पादौ सगरस्य महात्मनः । मूर्ध्नि तेनाप्युपाघ्रातस्तस्मै सर्वं न्यवेदयत् ॥
sobhivādya tataḥ pādau sagarasya mahātmanaḥ | mūrdhni tenāpyupāghrātastasmai sarvaṃ nyavedayat
उन्होंने महात्मा सगर के चरणों में प्रणाम किया, और राजा ने उनका मस्तक सूँघा। तब उन्होंने उन्हें सब कुछ बताया —
श्लोक 35 (3.107.35)
यथा दृष्टं श्रुतं चापि सागराणां क्षयं तथा । तं चास्मै हयमाचष्ट यज्ञवाटमुपागतम् ॥
yathā dṛṣṭaṃ śrutaṃ cāpi sāgarāṇāṃ kṣayaṃ tathā | taṃ cāsmai hayamācaṣṭa yajñavāṭamupāgatam
सगरपुत्रों का विनाश, जैसा उन्होंने देखा और सुना था; और यह भी बताया कि घोड़ा यज्ञशाला में आ पहुँचा है।
श्लोक 36 (3.107.36)
तच्छ्रुत्वा सगरो राजा पुत्रजं दुःखमत्यजत् । अंशुमन्तं च संपूज्य समापयत तं क्रतुम् ॥
tacchrutvā sagaro rājā putrajaṃ duḥkhamatyajat | aṃśumantaṃ ca saṃpūjya samāpayata taṃ kratum
यह सुनकर राजा सगर ने पुत्रों का शोक त्याग दिया, और अंशुमान का सम्मान करके उस यज्ञ को पूर्ण किया।
श्लोक 37 (3.107.37)
समाप्तयज्ञः सगरो देवैः सर्वैः सभाजितः । पुत्रत्वे कल्पयामास समुद्रं वरुणालयम् ॥
samāptayajñaḥ sagaro devaiḥ sarvaiḥ sabhājitaḥ | putratve kalpayāmāsa samudraṃ varuṇālayam
यज्ञ पूर्ण होने पर सब देवताओं ने सगर का सत्कार किया, और उन्होंने वरुण के निवास समुद्र को अपना पुत्र मान लिया।
श्लोक 38 (3.107.38)
प्रशास्य सुचिरं कालं राज्यं राजीवलोचनः । पौत्रे भारं समवेश्य जगाम त्रिदिवं तदा ॥
praśāsya suciraṃ kālaṃ rājyaṃ rājīvalocanaḥ | pautre bhāraṃ samaveśya jagāma tridivaṃ tadā
कमलनयन राजा ने बहुत समय तक राज्य का शासन किया, फिर पौत्र पर राज्य का भार सौंपकर स्वर्ग को चले गए।
श्लोक 39 (3.107.39)
अंशुमानपि धर्मात्मा महीं सागरमेखलाम् । प्रशशास महाराज यथैवास्य पितामहः ॥
aṃśumānapi dharmātmā mahīṃ sāgaramekhalām | praśaśāsa mahārāja yathaivāsya pitāmahaḥ
हे महाराज, धर्मात्मा अंशुमान ने भी समुद्र से घिरी पृथ्वी का वैसा ही शासन किया जैसा उनके पितामह ने किया था।
श्लोक 40 (3.107.40)
तस्य पुत्रः समभवद्दिलीपो नाम धर्मवित् । तस्मिन्राज्यं समाधाय अंशुमानपि संस्थितः ॥
tasya putraḥ samabhavaddilīpo nāma dharmavit | tasminrājyaṃ samādhāya aṃśumānapi saṃsthitaḥ
उनके दिलीप नाम का धर्मज्ञ पुत्र हुआ। उसे राज्य सौंपकर अंशुमान भी परलोक सिधार गए।
श्लोक 41 (3.107.41)
दिलीपस्तु ततः श्रुत्वा पितॄणां निधनं महत् । पर्यतप्यत दुःखेन तेषां गतिमचिन्तयत् ॥
dilīpastu tataḥ śrutvā pitṝṇāṃ nidhanaṃ mahat | paryatapyata duḥkhena teṣāṃ gatimacintayat
दिलीप ने जब अपने पितरों के महाविनाश के विषय में सुना, तो वे दुःख से संतप्त हो उठे और उनकी सद्गति की चिन्ता करने लगे।
श्लोक 42 (3.107.42)
गङ्गावतरणे यत्नं सुमहच्चाकरोन्नृपः । न चावतारयामास चेष्टमानो यथाबलम् ॥
gaṅgāvataraṇe yatnaṃ sumahaccākaronnṛpaḥ | na cāvatārayāmāsa ceṣṭamāno yathābalam
राजा ने गंगा को उतारने का बहुत बड़ा प्रयत्न किया, किन्तु पूरी शक्ति से चेष्टा करने पर भी वे उन्हें नहीं उतार सके।
श्लोक 43 (3.107.43)
तस्य पुत्रः समभवच्छ्रीमान्धर्मपरायणः । भगीरथ इति ख्यातः सत्यवागनसूयकः ॥
tasya putraḥ samabhavacchrīmāndharmaparāyaṇaḥ | bhagīratha iti khyātaḥ satyavāganasūyakaḥ
उनके एक श्रीसम्पन्न, धर्मपरायण पुत्र हुए, जो भगीरथ नाम से प्रसिद्ध थे — सत्यवादी और ईर्ष्या से रहित।
श्लोक 44 (3.107.44)
अभिषिच्य तु तं राज्ये दिलीपो वनमाश्रितः ॥
abhiṣicya tu taṃ rājye dilīpo vanamāśritaḥ
दिलीप उनका राज्याभिषेक करके वन में चले गए।
श्लोक 45 (3.107.45)
तपः सिद्धिसमायोगात्स राजा भरतर्षभ । वनाज्जगाम त्रिदिवं कालयोगेन भारत ॥
tapaḥ siddhisamāyogātsa rājā bharatarṣabha | vanājjagāma tridivaṃ kālayogena bhārata
हे भरतश्रेष्ठ, तप की सिद्धि के योग से वे राजा समय आने पर वन से स्वर्ग को चले गए।