आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 108
गंगा के लिए भगीरथ का तप
यह जानकर कि उनके पूर्वज, सगर के पुत्र, कपिल के द्वारा मारे गए और स्वर्ग से वंचित रह गए, राजा भगीरथ राज्य मन्त्री को सौंपकर हिमालय जाते हैं, जिसके शिखरों, पक्षियों, पशुओं और दिव्य निवासियों का लोमश वर्णन करते हैं। एक हज़ार वर्षों के तप के बाद गंगा उन्हें दर्शन देती हैं, और वे उनसे अपने पितरों की भस्म को अपने जल से पवित्र करने की प्रार्थना करते हैं। गंगा मान जाती हैं, पर बताती हैं कि उनके गिरने का वेग केवल शिव ही सह सकते हैं; भगीरथ कैलास जाकर शिव को प्रसन्न करते हैं और यह वर पाते हैं कि वे गंगा को धारण करेंगे।
लोमश उवाच
श्लोक 1 (3.108.1)
स तु राजा महेष्वासश्चक्रवर्ती महारथः । बभूव सर्वलोकस्य मनोनयननन्दनः ॥
sa tu rājā maheṣvāsaścakravartī mahārathaḥ | babhūva sarvalokasya manonayananandanaḥ
वे राजा महाधनुर्धर, चक्रवर्ती और महारथी थे; वे समस्त लोक के मन और नेत्रों को आनन्द देने वाले हुए।
श्लोक 2 (3.108.2)
स शुश्राव महाबाहुः कपिलेन महात्मना । पितॄणां निधनं घोरमप्राप्तिं त्रिदिवस्य च ॥
sa śuśrāva mahābāhuḥ kapilena mahātmanā | pitṝṇāṃ nidhanaṃ ghoramaprāptiṃ tridivasya ca
उन महाबाहु ने सुना कि महात्मा कपिल के द्वारा उनके पितरों की भयानक मृत्यु हुई थी और उन्हें स्वर्ग प्राप्त नहीं हुआ था।
श्लोक 3 (3.108.3)
स राज्यं सचिवे न्यस्य हृदयेन विदूयता । जगाम हिमवत्पार्श्वं तपस्तप्तुं नरेश्वरः ॥
sa rājyaṃ sacive nyasya hṛdayena vidūyatā | jagāma himavatpārśvaṃ tapastaptuṃ nareśvaraḥ
व्यथित हृदय से उन नरेश्वर ने राज्य एक मन्त्री को सौंप दिया और तप करने के लिए हिमालय के पार्श्व में चले गए।
श्लोक 4 (3.108.4)
आरिराधयिषुर्गङ्गां तपसा दग्धकिल्विषः । सोऽपश्यत नरश्रेष्ठ हिमवन्तं नगोत्तमम् ॥
ārirādhayiṣurgaṅgāṃ tapasā dagdhakilviṣaḥ | so'paśyata naraśreṣṭha himavantaṃ nagottamam
गंगा की आराधना करने की इच्छा से, तप के द्वारा अपने पाप भस्म कर चुके उन्होंने, हे नरश्रेष्ठ, पर्वतों में श्रेष्ठ हिमालय को देखा —
श्लोक 5 (3.108.5)
शृङ्गैर्बहुविधाकारैर्धातुमद्भिरलंकृतम् । पवनालम्बिभिर्मेघैः परिषिक्तं समन्ततः ॥
śṛṅgairbahuvidhākārairdhātumadbhiralaṃkṛtam | pavanālambibhirmeghaiḥ pariṣiktaṃ samantataḥ
जो अनेक आकारों के धातुमय शिखरों से सुशोभित था और चारों ओर पवन पर टिके मेघों से सिंचित था;
श्लोक 6 (3.108.6)
नदीकुञ्जनितम्बैश्च सोदकैरुपशोभितम् । गुहाकन्दरसंलीनसिंहव्याघ्रनिषेवितम् ॥
nadīkuñjanitambaiśca sodakairupaśobhitam | guhākandarasaṃlīnasiṃhavyāghraniṣevitam
जो नदियों के कुंजों और जल से भरे ढलानों से शोभित था, और जिसकी गुफाओं और कन्दराओं में छिपे सिंह और बाघ रहते थे;
श्लोक 7 (3.108.7)
शकुनैश्च विचित्राङ्गैः कूजद्भिर्विविधा गिरः । भृङ्गराजैस्तथा हंसैर्दात्यूहैर्जलकुक्कुटैः ॥
śakunaiśca vicitrāṅgaiḥ kūjadbhirvividhā giraḥ | bhṛṅgarājaistathā haṃsairdātyūhairjalakukkuṭaiḥ
जहाँ रंग-बिरंगे पंखों वाले पक्षी नाना प्रकार की बोलियाँ बोलते थे — भृंगराज, हंस, दात्यूह और जलकुक्कुट,
श्लोक 8 (3.108.8)
मयूरैः शतपत्रैश्च जीवंजीवककोकिलैः । चकोरैरसितापाङ्गैस्तथा पुत्रप्रियैरपि ॥
mayūraiḥ śatapatraiśca jīvaṃjīvakakokilaiḥ | cakorairasitāpāṅgaistathā putrapriyairapi
मोर, शतपत्र, जीवंजीवक और कोयल, काले नेत्र-कोरों वाले चकोर तथा पुत्रप्रिय पक्षी भी;
श्लोक 9 (3.108.9)
जलस्थानेषु रम्येषु पद्मिनीभिश्च संकुलम् । सारसानां च मधुरैर्व्याहृतैः समलंकृतम् ॥
jalasthāneṣu ramyeṣu padminībhiśca saṃkulam | sārasānāṃ ca madhurairvyāhṛtaiḥ samalaṃkṛtam
जिसके सुन्दर जलाशय कमलिनियों से भरे थे और जो सारसों के मधुर कलरव से अलंकृत था;
श्लोक 10 (3.108.10)
किन्नरैरप्सरोभिश्च निषेवितशिलातलम् । दिग्वारणविषाणाग्रैः समन्ताद्घृष्टपादपम् ॥
kinnarairapsarobhiśca niṣevitaśilātalam | digvāraṇaviṣāṇāgraiḥ samantādghṛṣṭapādapam
जिसकी शिलाओं पर किन्नर और अप्सराएँ विचरती थीं, और जिसके वृक्ष चारों ओर दिग्गजों के दाँतों की नोकों से रगड़े हुए थे;
श्लोक 11 (3.108.11)
विद्याधरानुचरितं नानारत्नसमाकुलम् । विषोल्वणैर्भुजङ्गैश्च दीप्तजिह्वैर्निषेवितम् ॥
vidyādharānucaritaṃ nānāratnasamākulam | viṣolvaṇairbhujaṅgaiśca dīptajihvairniṣevitam
जहाँ विद्याधर विचरते थे, जो नाना प्रकार के रत्नों से भरा था, और जहाँ प्रचण्ड विष वाले, दहकती जीभों वाले सर्प रहते थे।
श्लोक 12 (3.108.12)
क्वचित्कनकसंकाशं क्वचिद्रजतसंनिभम् । क्वचिदञ्जनपुञ्जाभं हिमवन्तमुपागमत् ॥
kvacitkanakasaṃkāśaṃ kvacidrajatasaṃnibham | kvacidañjanapuñjābhaṃ himavantamupāgamat
कहीं वह सोने के समान चमकता था, कहीं चाँदी के समान, कहीं काजल के ढेर के समान — ऐसे हिमालय पर वे पहुँचे।
श्लोक 13 (3.108.13)
स तु तत्र नरश्रेष्ठस्तपो घोरं समाश्रितः । फलमूलाम्बुसंभक्षः सहस्रपरिवत्सरान् ॥
sa tu tatra naraśreṣṭhastapo ghoraṃ samāśritaḥ | phalamūlāmbusaṃbhakṣaḥ sahasraparivatsarān
वहाँ उन नरश्रेष्ठ ने घोर तपस्या का आश्रय लिया और एक हज़ार वर्षों तक फल, मूल और जल पर ही निर्वाह किया।
श्लोक 14 (3.108.14)
संवत्सरसहस्रे तु गते दिव्ये महानदी । दर्शयामास तं गङ्गा तदा मूर्तिमती स्वयम् ॥
saṃvatsarasahasre tu gate divye mahānadī | darśayāmāsa taṃ gaṅgā tadā mūrtimatī svayam
देवताओं के एक हज़ार वर्ष बीत जाने पर महानदी गंगा ने स्वयं साकार रूप में उन्हें दर्शन दिए।
गङ्गोवाच
श्लोक 15 (3.108.15)
किमिच्छसि महाराज मत्तः किंच ददानि ते । तद्ब्रवीहि नरश्रेष्ठ करिष्यामि वचस्तव ॥
kimicchasi mahārāja mattaḥ kiṃca dadāni te | tadbravīhi naraśreṣṭha kariṣyāmi vacastava
महाराज, तुम मुझसे क्या चाहते हो, और मैं तुम्हें क्या दूँ? हे नरश्रेष्ठ, बताओ; मैं तुम्हारा कहा करूँगी।
लोमश उवाच
श्लोक 16 (3.108.16)
एवमुक्तः प्रत्युवाच राजा हैमवतीं नदीम् । तदा भगीरथो राजन्प्रणिपत्य कृताञ्जलिः । पितामहा मे वरदे कपिलेन महानदि ॥
evamuktaḥ pratyuvāca rājā haimavatīṃ nadīm | tadā bhagīratho rājanpraṇipatya kṛtāñjaliḥ | pitāmahā me varade kapilena mahānadi
ऐसा कहे जाने पर, हे राजन्, राजा भगीरथ ने हाथ जोड़कर प्रणाम किया और हिमालय की पुत्री उस नदी को उत्तर दिया — हे वरदायिनी महानदी, मेरे पितामह कपिल के द्वारा,
भगीरथ उवाच
श्लोक 17 (3.108.17)
अन्वेषमाणास्तुरगं नीता वैवस्वतक्षयम् । षष्टिस्तानि सहस्राणि सागराणां महात्मनाम् ॥
anveṣamāṇāsturagaṃ nītā vaivasvatakṣayam | ṣaṣṭistāni sahasrāṇi sāgarāṇāṃ mahātmanām
घोड़े को खोजते हुए यमलोक भेज दिए गए — वे साठ हज़ार महात्मा सगरपुत्र।
श्लोक 18 (3.108.18)
कपिलं देवमासाद्य क्षणेन निधनं गताः । तेषामेवं विनष्टानां स्वर्गे वासो न विद्यते ॥
kapilaṃ devamāsādya kṣaṇena nidhanaṃ gatāḥ | teṣāmevaṃ vinaṣṭānāṃ svarge vāso na vidyate
दिव्य कपिल के सामने पहुँचकर वे क्षण भर में मृत्यु को प्राप्त हुए। इस प्रकार नष्ट हुए उन लोगों को स्वर्ग में स्थान नहीं मिला है।
श्लोक 19 (3.108.19)
यावत्तानि शरीराणि त्वं जलैर्नाभिषिञ्चसि । तावत्तेषां गतिर्नास्ति सागराणां महानदि ॥
yāvattāni śarīrāṇi tvaṃ jalairnābhiṣiñcasi | tāvatteṣāṃ gatirnāsti sāgarāṇāṃ mahānadi
हे महानदी, जब तक तुम उन शरीरों को अपने जल से नहीं सींचतीं, तब तक उन सगरपुत्रों की सद्गति नहीं हो सकती।
श्लोक 20 (3.108.20)
स्वर्गं नय महाभागे मत्पितॄन्सगरात्मजान् । तेषामर्थेऽभियाचामि त्वामहं वै महानदि ॥
svargaṃ naya mahābhāge matpitṝnsagarātmajān | teṣāmarthe'bhiyācāmi tvāmahaṃ vai mahānadi
हे महाभागे, मेरे पितरों, सगरपुत्रों को स्वर्ग पहुँचाओ। हे महानदी, उन्हीं के लिए मैं तुमसे याचना करता हूँ।
लोमश उवाच
श्लोक 21 (3.108.21)
एतच्छ्रुत्वा वचो राज्ञो गङ्गा लोकनमस्कृता । भगीरथमिदं वाक्यं सुप्रीता समभाषत ॥
etacchrutvā vaco rājño gaṅgā lokanamaskṛtā | bhagīrathamidaṃ vākyaṃ suprītā samabhāṣata
राजा के ये वचन सुनकर लोकवन्दिता गंगा अत्यन्त प्रसन्न हुईं और भगीरथ से यह बोलीं —
गङ्गोवाच
श्लोक 22 (3.108.22)
करिष्यामि महाराज वचस्ते नात्र संशयः । वेगं तु मम दुर्धार्यं पतन्त्या गगनाच्च्युतम् ॥
kariṣyāmi mahārāja vacaste nātra saṃśayaḥ | vegaṃ tu mama durdhāryaṃ patantyā gaganāccyutam
महाराज, मैं तुम्हारा कहा करूँगी, इसमें कोई संशय नहीं। परन्तु आकाश से गिरते समय मेरा वेग सहना कठिन है।
श्लोक 23 (3.108.23)
न शक्तस्त्रिषु लोकेषु कश्चिद्धारयितुं नृप । अन्यत्र विबुधश्रेष्ठान्नीलकण्ठान्महेश्वरात् ॥
na śaktastriṣu lokeṣu kaściddhārayituṃ nṛpa | anyatra vibudhaśreṣṭhānnīlakaṇṭhānmaheśvarāt
हे राजन्, देवताओं में श्रेष्ठ नीलकण्ठ महेश्वर को छोड़कर तीनों लोकों में कोई उसे धारण नहीं कर सकता।
श्लोक 24 (3.108.24)
तं तोषय महाबाहो तपसा वरदं हरम् । स तु मां प्रच्युतां देवः शिरसा धारयिष्यति ॥
taṃ toṣaya mahābāho tapasā varadaṃ haram | sa tu māṃ pracyutāṃ devaḥ śirasā dhārayiṣyati
हे महाबाहु, वरदाता हर को तप से प्रसन्न करो। वे देव गिरती हुई मुझको अपने सिर पर धारण करेंगे,
श्लोक 25 (3.108.25)
स करिष्यति ते कामं पितॄणां हितकाम्यया । तपसाऽऽराधितः शंभुर्भगवाँल्लोकभावनः ॥
sa kariṣyati te kāmaṃ pitṝṇāṃ hitakāmyayā | tapasā''rādhitaḥ śaṃbhurbhagavām̐llokabhāvanaḥ
और तप से आराधित होने पर लोकों के पालनहार भगवान शम्भु तुम्हारे पितरों के हित की कामना से तुम्हारी इच्छा पूरी करेंगे।
लोमश उवाच
श्लोक 26 (3.108.26)
एतच्छ्रुत्वा ततो राजन्महाराजो भगीरथः । कैलासं पर्वतं गत्वा तोषयामास शंकरम् ॥
etacchrutvā tato rājanmahārājo bhagīrathaḥ | kailāsaṃ parvataṃ gatvā toṣayāmāsa śaṃkaram
हे राजन्, यह सुनकर महाराज भगीरथ कैलास पर्वत पर गए और उन्होंने शंकर को प्रसन्न किया।
श्लोक 27 (3.108.27)
ततस्तेन समागम्य कालयोगेन केनचित् । गङ्गावतरणं राजन्नयाचत महीपतिः ॥
tatastena samāgamya kālayogena kenacit | gaṅgāvataraṇaṃ rājannayācata mahīpatiḥ
फिर कुछ समय बीतने पर उनसे भेंट करके, हे राजन्, उन पृथ्वीपति ने गंगा के अवतरण की याचना की।
श्लोक 28 (3.108.28)
अगृह्णाच्च वरं तस्माद्गङ्गाया धारणे नृप । स्वर्गे वासं समुद्दिश्य पितॄणां स नरोत्तमः ॥
agṛhṇācca varaṃ tasmādgaṅgāyā dhāraṇe nṛpa | svarge vāsaṃ samuddiśya pitṝṇāṃ sa narottamaḥ
और हे राजन्, उन नरश्रेष्ठ ने अपने पितरों के स्वर्गवास के उद्देश्य से उनसे गंगा को धारण करने का वर प्राप्त किया।