आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 110
हेमकूट पर्वत और क्रोधी ऋषभ
युधिष्ठिर आगे नन्दा और अपरनन्दा नदियों तक जाते हैं और हेमकूट पर्वत पर पहुँचते हैं, जहाँ अनोखे आश्चर्य हैं — ओले और आँधी, अदृश्य स्वरों का वेदपाठ, सुबह-शाम प्रकट होती अग्नि, और तप में बाधा डालने वाली डंक मारती मक्खियाँ। लोमश बताते हैं कि क्रोधी तपस्वी ऋषभ ने एक समय वहाँ बोलने का निषेध कर दिया था, और देवताओं ने इस पर्वत को दुर्गम बना दिया ताकि मनुष्य उनके पीछे न आ सकें; देवताओं के यज्ञों के चिह्न आज भी दिखते हैं। वे पाण्डवों से मौन रहकर नन्दा में स्नान करने को कहते हैं, और वे आगे कौशिकी नदी की ओर जाते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (3.110.1)
ततः प्रयातः कौन्तेयः क्रमेण भरतर्षभ । नन्दामपरनन्दां च नद्यौ पापभयापहे ॥
tataḥ prayātaḥ kaunteyaḥ krameṇa bharatarṣabha | nandāmaparanandāṃ ca nadyau pāpabhayāpahe
हे भरतश्रेष्ठ, तब कुन्तीपुत्र क्रम से आगे बढ़ते हुए पाप के भय को दूर करने वाली नन्दा और अपरनन्दा नामक दो नदियों तक पहुँचे।
श्लोक 2 (3.110.2)
पर्वतं स समासाद्य हेमकूटमनामयम् । अचिन्त्यानद्भुतान्भावान्ददर्श सुबहून्नृपः ॥
parvataṃ sa samāsādya hemakūṭamanāmayam | acintyānadbhutānbhāvāndadarśa subahūnnṛpaḥ
रोगरहित हेमकूट पर्वत पर पहुँचकर राजा ने अनेक अचिन्त्य और अद्भुत दृश्य देखे।
श्लोक 3 (3.110.3)
वर्षो यत्राभवद्घोर उपलाश्च सहस्रशः । नाशक्नुवंस्तमारोढुं विषण्णमनसो जनाः ॥
varṣo yatrābhavadghora upalāśca sahasraśaḥ | nāśaknuvaṃstamāroḍhuṃ viṣaṇṇamanaso janāḥ
वहाँ भयंकर वर्षा होती थी और हज़ारों ओले गिरते थे; लोग उस पर चढ़ नहीं पाते थे और निराश हो जाते थे।
श्लोक 4 (3.110.4)
वायुर्नित्यं ववौ तत्र नित्यं देवश्च वर्षति । स्वाध्यायघोषश्च तथा श्रूयते न च दृश्यते ॥
vāyurnityaṃ vavau tatra nityaṃ devaśca varṣati | svādhyāyaghoṣaśca tathā śrūyate na ca dṛśyate
वहाँ निरन्तर वायु बहती थी और वर्षा के देवता निरन्तर बरसते थे; वेदपाठ का स्वर सुनाई देता था, पर कोई दिखाई नहीं देता था।
श्लोक 5 (3.110.5)
सायं प्रातश्च भगवान्दृश्यते हव्यवाहनः । मक्षिकाश्चादशंस्तत्र तपसः प्रतिघातिकाः ॥
sāyaṃ prātaśca bhagavāndṛśyate havyavāhanaḥ | makṣikāścādaśaṃstatra tapasaḥ pratighātikāḥ
सायं और प्रातः भगवान अग्नि दिखाई देते थे; और वहाँ मक्खियाँ डंक मारती थीं, जो तपस्या में बाधा डालती थीं।
श्लोक 6 (3.110.6)
निर्वेदो जायते तत्र गृहाणि स्मरते जनः । एवं बहुविधान्भावानद्भुतान्वीक्ष्य पाण्डवः । लोमशं पुनरेवाथ पर्यपृच्छत्तदद्भुतम् ॥
nirvedo jāyate tatra gṛhāṇi smarate janaḥ | evaṃ bahuvidhānbhāvānadbhutānvīkṣya pāṇḍavaḥ | lomaśaṃ punarevātha paryapṛcchattadadbhutam
वहाँ मन उचट जाता है और मनुष्य को घर की याद आने लगती है। इस प्रकार के अनेक अद्भुत दृश्य देखकर पाण्डुपुत्र ने फिर लोमश से उस आश्चर्य के विषय में पूछा।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 7 (3.110.7)
यदेतद्भगवंश्चित्रं पर्वतेऽस्मिन्महौजसि । एतन्मे सर्वमाचक्ष्व विस्तरेण महाद्युते ॥
yadetadbhagavaṃścitraṃ parvate'sminmahaujasi | etanme sarvamācakṣva vistareṇa mahādyute
भगवन्, इस महातेजस्वी पर्वत पर जो यह आश्चर्य है, हे महाद्युति, वह सब मुझे विस्तार से बताइए।
लोमश उवाच
श्लोक 8 (3.110.8)
यथाश्रुतमिदं पूर्वमस्माभिररिकर्शन । तदेकाग्रमना राजन्निबोध गदतो मम ॥
yathāśrutamidaṃ pūrvamasmābhirarikarśana | tadekāgramanā rājannibodha gadato mama
हे शत्रुदमन राजन्, हमने पहले जैसा सुना है, वह एकाग्रचित्त होकर मुझसे सुनो।
श्लोक 9 (3.110.9)
अस्मिन्नृषभकूटेऽभूदृषभो नाम तापसः । अनेकशतवर्षायुस्तपस्वी कोपनो भृशम् ॥
asminnṛṣabhakūṭe'bhūdṛṣabho nāma tāpasaḥ | anekaśatavarṣāyustapasvī kopano bhṛśam
इस ऋषभकूट पर ऋषभ नाम के एक तापस रहते थे, जिनकी आयु कई सौ वर्षों की थी; वे तपस्वी थे और अत्यन्त क्रोधी थे।
श्लोक 10 (3.110.10)
स वै संभाष्यमाणोऽन्यैः कोपाद्गिरिमुवाच ह । य इह व्याहरेत्कश्चिदुपलानुत्सृजेत वा ॥
sa vai saṃbhāṣyamāṇo'nyaiḥ kopādgirimuvāca ha | ya iha vyāharetkaścidupalānutsṛjeta vā
जब दूसरे लोग उनसे बार-बार बातें करने लगे, तो उन्होंने क्रोध में पर्वत से कहा — "यहाँ जो कोई भी बोले, उस पर पत्थर बरसाओ।"
श्लोक 11 (3.110.11)
वातं चाहूय मा शब्दमित्युवाच स तापसः । व्याहरंश्चेह पुरुषो मेघशब्देन वार्यते ॥
vātaṃ cāhūya mā śabdamityuvāca sa tāpasaḥ | vyāharaṃśceha puruṣo meghaśabdena vāryate
और वायु को बुलाकर उस तपस्वी ने कहा — "कोई शब्द न हो।" इसीलिए यहाँ बोलने वाले मनुष्य को मेघों का गर्जन रोक देता है।
श्लोक 12 (3.110.12)
एवमेतानि कर्माणि राजंस्तेन महर्षिणा । कृतानि कानिचित्क्रोधात्प्रतिषिद्धानि कानिचित् ॥
evametāni karmāṇi rājaṃstena maharṣiṇā | kṛtāni kānicitkrodhātpratiṣiddhāni kānicit
हे राजन्, इस प्रकार उन महर्षि ने क्रोध में आकर इनमें से कुछ बातें कीं और कुछ का निषेध किया।
श्लोक 13 (3.110.13)
नन्दां त्वभिगता देवाः पुरा राजन्निति श्रुतिः । अन्वपद्यन्त सहसा पुरुषा देवदर्शिनः ॥
nandāṃ tvabhigatā devāḥ purā rājanniti śrutiḥ | anvapadyanta sahasā puruṣā devadarśinaḥ
हे राजन्, ऐसी श्रुति है कि प्राचीन काल में देवता नन्दा के तट पर आए थे, और देवताओं के दर्शन के इच्छुक मनुष्य सहसा उनके पीछे-पीछे आ पहुँचे।
श्लोक 14 (3.110.14)
तेनादर्शनमिच्छन्तो देवाः शक्रपुरोगमाः । दुर्गं चक्रुरिमं देशं गिरिं प्रत्यूहरूपकम् ॥
tenādarśanamicchanto devāḥ śakrapurogamāḥ | durgaṃ cakrurimaṃ deśaṃ giriṃ pratyūharūpakam
इसलिए दर्शन न देना चाहते हुए इन्द्र आदि देवताओं ने इस प्रदेश को दुर्गम बना दिया और इस पर्वत को बाधा के रूप में खड़ा कर दिया।
श्लोक 15 (3.110.15)
तदाप्रभृति कौन्तेय नरा गिरिमिमं सदा । नाशक्नुवन्नभिद्रष्टुं कुत एवाधिरोहितुम् ॥
tadāprabhṛti kaunteya narā girimimaṃ sadā | nāśaknuvannabhidraṣṭuṃ kuta evādhirohitum
हे कुन्तीपुत्र, तब से मनुष्य इस पर्वत को देख भी नहीं पाते, उस पर चढ़ना तो दूर की बात है।
श्लोक 16 (3.110.16)
नातप्ततपसा शक्यो द्रष्टुमेष महागिरिः । आरोढुं वाऽपि कौन्तेय तस्मान्नियतवागभव ॥
nātaptatapasā śakyo draṣṭumeṣa mahāgiriḥ | āroḍhuṃ vā'pi kaunteya tasmānniyatavāgabhava
हे कुन्तीपुत्र, जिसने तप न किया हो, वह इस महान पर्वत को न देख सकता है, न उस पर चढ़ सकता है; इसलिए वाणी को संयम में रखो।
श्लोक 17 (3.110.17)
इह देवास्तदा सर्वे यज्ञानाजह्रुरुत्तमान् । तेषामेतानि लिङ्गानि दृश्यन्तेऽद्यापि भारत ॥
iha devāstadā sarve yajñānājahruruttamān | teṣāmetāni liṅgāni dṛśyante'dyāpi bhārata
हे भारत, यहाँ एक समय सभी देवताओं ने उत्तम यज्ञ किए थे; उनके चिह्न आज भी दिखाई देते हैं।
श्लोक 18 (3.110.18)
कुशाकारेव दूर्वेयं संस्तीर्णेव च भूरियम् । यूपप्रकारा बहवो वृक्षाश्चेमे विशांपते ॥
kuśākāreva dūrveyaṃ saṃstīrṇeva ca bhūriyam | yūpaprakārā bahavo vṛkṣāśceme viśāṃpate
हे प्रजानाथ, यह दूब कुश के आकार की है, यह भूमि मानो यज्ञ के लिए बिछाई हुई है, और ये बहुत-से वृक्ष यूपों (यज्ञ-स्तम्भों) के आकार के हैं।
श्लोक 19 (3.110.19)
देवाश्च ऋषयश्चैव वसन्त्यद्यापि भारत । तेषां सायं तथा प्रातर्दृश्यते हव्यवाहनः ॥
devāśca ṛṣayaścaiva vasantyadyāpi bhārata | teṣāṃ sāyaṃ tathā prātardṛśyate havyavāhanaḥ
हे भारत, देवता और ऋषि आज भी यहाँ निवास करते हैं; सायं और प्रातः उनकी अग्नि दिखाई देती है।
श्लोक 20 (3.110.20)
इहाप्लुतानां कौन्तेय सद्यः पाप्माऽभिहन्यते । कुरुश्रेष्ठाभिषेकं वै तस्मात्कुरु सहानुजः ॥
ihāplutānāṃ kaunteya sadyaḥ pāpmā'bhihanyate | kuruśreṣṭhābhiṣekaṃ vai tasmātkuru sahānujaḥ
हे कुन्तीपुत्र, यहाँ स्नान करने वालों का पाप तत्काल नष्ट हो जाता है। इसलिए हे कुरुश्रेष्ठ, अपने छोटे भाइयों के साथ यहाँ स्नान करो।
श्लोक 21 (3.110.21)
ततो नन्दाप्लुताङ्गस्त्वं कौशिकीमभियास्यसि । विश्वामित्रेण यत्रोग्रं तपस्तप्तमनुत्तमम् ॥
tato nandāplutāṅgastvaṃ kauśikīmabhiyāsyasi | viśvāmitreṇa yatrograṃ tapastaptamanuttamam
फिर नन्दा में स्नान करके तुम कौशिकी की ओर जाओगे, जहाँ विश्वामित्र ने उग्र और अनुपम तप किया था।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 22 (3.110.22)
ततस्तत्र समाप्लुत्य गात्राणि सगणो नृपः । जगाम कौशिकीं पुण्यां रम्यां शीतजलां शुभां ॥
tatastatra samāplutya gātrāṇi sagaṇo nṛpaḥ | jagāma kauśikīṃ puṇyāṃ ramyāṃ śītajalāṃ śubhāṃ
तब राजा ने अपने साथियों सहित वहाँ स्नान किया और पवित्र, रमणीय, शीतल जल वाली, मंगलमयी कौशिकी नदी की ओर चल पड़े।