आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 111
ऋश्यशृङ्ग का जन्म और अंगदेश का अकाल
कौशिकी नदी पर लोमश ऋश्यशृङ्ग के पिता काश्यप का आश्रम दिखाते हैं और युधिष्ठिर के पूछने पर उनकी कथा सुनाते हैं। उर्वशी को देखकर स्खलित हुआ महर्षि विभाण्डक का वीर्य एक हिरनी ने पी लिया, जिससे ऋश्यशृङ्ग जन्मे — सिर पर सींग वाले वह बालक, जिन्होंने पिता के सिवा कभी किसी मनुष्य को नहीं देखा था। अंगराज लोमपाद ने ब्राह्मणों से किया वचन तोड़ा और उनके राज्य में अकाल पड़ा; तब एक मुनि ने बताया कि ऋश्यशृङ्ग के राज्य में आने पर ही वर्षा होगी। राजा ने वेश्याओं को बुलाया, और उनमें से एक वृद्धा ने उस युवा तपस्वी को लाने का बीड़ा उठाकर कुछ युवतियों के साथ वन की ओर प्रस्थान किया।
लोमश उवाच
श्लोक 1 (3.111.1)
एषा देवनदी पुण्या कौशिकी भरतर्षभ । विश्वामित्राश्रमो रम्य एष चात्र प्रकाशते ॥
eṣā devanadī puṇyā kauśikī bharatarṣabha | viśvāmitrāśramo ramya eṣa cātra prakāśate
हे भरतश्रेष्ठ, यह पवित्र देवनदी कौशिकी है, और यहाँ विश्वामित्र का रमणीय आश्रम दिखाई दे रहा है।
श्लोक 2 (3.111.2)
आश्रमश्चैव पुण्याख्यः काश्यपस्य महात्मनः । ऋश्यशृङ्गः सुतो यस्य तपस्वी संयतेन्द्रियः ॥
āśramaścaiva puṇyākhyaḥ kāśyapasya mahātmanaḥ | ṛśyaśṛṅgaḥ suto yasya tapasvī saṃyatendriyaḥ
और यह महात्मा काश्यप का "पुण्य" नाम से प्रसिद्ध आश्रम है, जिनके पुत्र जितेन्द्रिय तपस्वी ऋश्यशृङ्ग थे।
श्लोक 3 (3.111.3)
तपसो यः प्रभावेन वर्षयामास वासवम् । अनावृष्ट्यां भयाद्यस्य ववर्ष बलवृत्रहा ॥
tapaso yaḥ prabhāvena varṣayāmāsa vāsavam | anāvṛṣṭyāṃ bhayādyasya vavarṣa balavṛtrahā
अपने तप के प्रभाव से उन्होंने इन्द्र से वर्षा करवाई; अनावृष्टि के समय उनके भय से बल और वृत्र को मारने वाले इन्द्र ने जल बरसाया।
श्लोक 4 (3.111.4)
मृग्यां जातः स तेजस्वी काश्यपस्य सुतः प्रभुः । विषये लोमपादस्य यश्चकाराद्भुतं महत् ॥
mṛgyāṃ jātaḥ sa tejasvī kāśyapasya sutaḥ prabhuḥ | viṣaye lomapādasya yaścakārādbhutaṃ mahat
हिरनी से जन्मे उस तेजस्वी और समर्थ काश्यप-पुत्र ने लोमपाद के राज्य में एक महान् अद्भुत कार्य किया।
श्लोक 5 (3.111.5)
निर्वर्तितेषु सस्येषु यस्मै शान्तां ददौ नृपः । लोमपादो दुहितरं सावित्रीं सविता यथा ॥
nirvartiteṣu sasyeṣu yasmai śāntāṃ dadau nṛpaḥ | lomapādo duhitaraṃ sāvitrīṃ savitā yathā
जब फसलें फिर से उग आईं, तब राजा लोमपाद ने अपनी पुत्री शान्ता उन्हें वैसे ही ब्याह दी, जैसे सूर्यदेव सविता ने अपनी पुत्री सावित्री दी थी।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 6 (3.111.6)
ऋश्यशृङ्गः कथं मृग्यामुत्पन्नः काश्यपात्मजः । विरुद्धयोनिसंसर्गः कथं च तपसा युतः ॥
ṛśyaśṛṅgaḥ kathaṃ mṛgyāmutpannaḥ kāśyapātmajaḥ | viruddhayonisaṃsargaḥ kathaṃ ca tapasā yutaḥ
काश्यप के पुत्र ऋश्यशृङ्ग हिरनी से कैसे उत्पन्न हुए? और ऐसे विपरीत योनियों के संयोग से जन्म लेकर भी वे तपस्वी कैसे हुए?
श्लोक 7 (3.111.7)
किमर्थं च भयाच्छक्रस्तस्य बालस्य धीमतः । अनावृष्ट्यां प्रवृत्तायां ववर्ष बलवृत्रहा ॥
kimarthaṃ ca bhayācchakrastasya bālasya dhīmataḥ | anāvṛṣṭyāṃ pravṛttāyāṃ vavarṣa balavṛtrahā
और अनावृष्टि फैल जाने पर बल और वृत्र के संहारक इन्द्र ने उस बुद्धिमान् बालक के भय से वर्षा क्यों की?
श्लोक 8 (3.111.8)
कथंरूपा च सा शान्ता राजपुत्री पतिव्रता । लोभयामास या चेतो मृगभूतस्य तस्य वै ॥
kathaṃrūpā ca sā śāntā rājaputrī pativratā | lobhayāmāsa yā ceto mṛgabhūtasya tasya vai
वह पतिव्रता राजकुमारी शान्ता कैसी थी, जिसने हिरनी से जन्मे उस मुनि का मन मोह लिया?
श्लोक 9 (3.111.9)
लोमपादश्च राजर्षिर्यदाऽश्रूयत धार्मिकः । कथं वै विषये तस्य नावर्षत्पाकशासनः ॥
lomapādaśca rājarṣiryadā'śrūyata dhārmikaḥ | kathaṃ vai viṣaye tasya nāvarṣatpākaśāsanaḥ
और जब राजर्षि लोमपाद धर्मात्मा प्रसिद्ध थे, तब पाकशासन इन्द्र ने उनके राज्य में वर्षा क्यों नहीं की?
श्लोक 10 (3.111.10)
एतन्मे भगवन्सर्वं विस्तरेण यथातथम् । वक्तुमर्हसि शुश्रूषोर्ऋश्यशृङ्गस्य चेष्टितम् ॥
etanme bhagavansarvaṃ vistareṇa yathātatham | vaktumarhasi śuśrūṣorṛśyaśṛṅgasya ceṣṭitam
भगवन्, मैं सुनने को उत्सुक हूँ; ऋश्यशृङ्ग का यह सारा चरित्र मुझे विस्तार से और यथार्थ रूप में सुनाइए।
लोमश उवाच
श्लोक 11 (3.111.11)
विभाण्डकस्य ब्रह्मर्षेस्तपसा भावितात्मनः । अमोघवीर्यस्य सतः प्रजापतिसमद्युतेः ॥
vibhāṇḍakasya brahmarṣestapasā bhāvitātmanaḥ | amoghavīryasya sataḥ prajāpatisamadyuteḥ
तप से पवित्र अन्तःकरण वाले, अमोघ वीर्य वाले, प्रजापति के समान तेजस्वी सत्पुरुष ब्रह्मर्षि विभाण्डक के —
श्लोक 12 (3.111.12)
शृणु पुत्रो यथा जात ऋश्यशृङ्गः प्रतापवान् । महाह्रदे महातेजा बालः स्थविरसंमतः ॥
śṛṇu putro yathā jāta ṛśyaśṛṅgaḥ pratāpavān | mahāhrade mahātejā bālaḥ sthavirasaṃmataḥ
— पुत्र, प्रतापी ऋश्यशृङ्ग, का जन्म कैसे हुआ, यह सुनो; वह महातेजस्वी बालक उस महान् सरोवर पर जन्मा और बालक होते हुए भी वृद्धों के समान सम्मानित था।
श्लोक 13 (3.111.13)
महाह्रदं समासाद्य काश्यपस्तपसि स्थितः । दीर्घकालं परिश्रान्त ऋषिर्देवर्षिसंमितः ॥
mahāhradaṃ samāsādya kāśyapastapasi sthitaḥ | dīrghakālaṃ pariśrānta ṛṣirdevarṣisaṃmitaḥ
एक महान् सरोवर पर पहुँचकर काश्यप तपस्या में लग गए; देवर्षियों के समान माने जाने वाले उस ऋषि ने वहाँ दीर्घकाल तक कठोर परिश्रम किया।
श्लोक 14 (3.111.14)
तस्य रेतः प्रचस्कन्द दृष्ट्वाऽप्सरसमुर्वशीम् । अप्सूपस्पृशतो राजन्मृगी तच्चापिबत्तदा । सह तोयेन तृषिता गर्भिणी चाभवत्ततः ॥
tasya retaḥ pracaskanda dṛṣṭvā'psarasamurvaśīm | apsūpaspṛśato rājanmṛgī taccāpibattadā | saha toyena tṛṣitā garbhiṇī cābhavattataḥ
हे राजन्, जल का आचमन करते समय अप्सरा उर्वशी को देखकर उनका वीर्य स्खलित हो गया; प्यासी एक हिरनी ने उसे जल के साथ पी लिया और वह गर्भवती हो गई।
श्लोक 15 (3.111.15)
सा पुरोक्ता भगवता ब्रह्मणा लोककर्तृणा । देवकन्या मृगी भूत्वा मुनिं सूय विमोक्ष्यसे ॥
sā puroktā bhagavatā brahmaṇā lokakartṛṇā | devakanyā mṛgī bhūtvā muniṃ sūya vimokṣyase
लोकों के रचयिता भगवान् ब्रह्मा ने उससे पहले ही कहा था — "तुम देवकन्या हो; हिरनी बनकर जब तुम एक मुनि को जन्म दोगी, तब शाप से छूट जाओगी।"
श्लोक 16 (3.111.16)
अमोघत्वाद्विधेश्चैव भावित्वाद्दैवनिर्मितात् । तस्यां मृग्यां समभवत्तस्य पुत्रो महानृषिः । ऋश्यशृङ्गस्तपोनित्यो वन एवाभ्यवर्धत ॥
amoghatvādvidheścaiva bhāvitvāddaivanirmitāt | tasyāṃ mṛgyāṃ samabhavattasya putro mahānṛṣiḥ | ṛśyaśṛṅgastaponityo vana evābhyavardhata
विधान अमोघ होने से और दैव का रचा अवश्य घटित होने से उस हिरनी से उनका पुत्र, महान् ऋषि ऋश्यशृङ्ग, उत्पन्न हुआ; वह सदा तप में लगा रहता था और वन में ही बड़ा हुआ।
श्लोक 17 (3.111.17)
तस्य शृङ्गं शिरसि वै राजन्नासीन्महात्मनः । तेनर्श्यशृङ्ग इत्येवं तदा स प्रथितोऽभवत् ॥
tasya śṛṅgaṃ śirasi vai rājannāsīnmahātmanaḥ | tenarśyaśṛṅga ityevaṃ tadā sa prathito'bhavat
हे राजन्, उन महात्मा के सिर पर एक सींग था; इसी कारण वे ऋश्यशृङ्ग ("हिरन-सींग") नाम से प्रसिद्ध हुए।
श्लोक 18 (3.111.18)
न तेन दृष्टपूर्वोऽन्यः पितुरन्यत्रमानुषः । तस्मात्तस्य मनो नित्यं ब्रह्मचर्येऽभवन्नृप ॥
na tena dṛṣṭapūrvo'nyaḥ pituranyatramānuṣaḥ | tasmāttasya mano nityaṃ brahmacarye'bhavannṛpa
उन्होंने पिता के अतिरिक्त कभी कोई दूसरा मनुष्य नहीं देखा था; इसलिए, हे राजन्, उनका मन सदा ब्रह्मचर्य में ही लगा रहता था।
श्लोक 19 (3.111.19)
एतस्मिन्नेव काले तु सखा दशरथस्य वै । लोमपाद इतिख्यातो ह्यङ्गानामीश्वरोऽभवत् ॥
etasminneva kāle tu sakhā daśarathasya vai | lomapāda itikhyāto hyaṅgānāmīśvaro'bhavat
उसी समय दशरथ के मित्र, लोमपाद नाम से विख्यात राजा, अंगदेश के स्वामी थे।
श्लोक 20 (3.111.20)
तेन कामः कृतो मिथ्या ब्राह्मणेभ्य इति श्रुतिः । दैवोपहतसत्त्वेन धर्मज्ञेनापि भारत । स ब्राह्मणैः परित्यक्तस्तदा भरतसत्तम ॥
tena kāmaḥ kṛto mithyā brāhmaṇebhya iti śrutiḥ | daivopahatasattvena dharmajñenāpi bhārata | sa brāhmaṇaiḥ parityaktastadā bharatasattama
सुना जाता है कि उसने ब्राह्मणों को दिया वचन झूठा कर दिया; हे भारत, धर्मज्ञ होते हुए भी दैव ने उसकी बुद्धि हर ली थी, और हे भरतश्रेष्ठ, तब ब्राह्मणों ने उसे त्याग दिया।
श्लोक 21 (3.111.21)
पुरोहितापचाराच्च तस्य राज्ञो यदृच्छया । न ववर्ष सहस्राक्षस्ततोऽपीड्यन्त वै प्रजाः ॥
purohitāpacārācca tasya rājño yadṛcchayā | na vavarṣa sahasrākṣastato'pīḍyanta vai prajāḥ
उस राजा ने अपने पुरोहित का अपमान किया था, इसलिए संयोगवश सहस्राक्ष इन्द्र ने वर्षा नहीं की और प्रजा पीड़ित होने लगी।
श्लोक 22 (3.111.22)
स ब्राह्मणान्पर्यपृच्छत्तपोयुक्तान्मनीषिणः । प्रवर्षणे सुरेन्द्रस्य समर्थान्पृथिवीपते ॥
sa brāhmaṇānparyapṛcchattapoyuktānmanīṣiṇaḥ | pravarṣaṇe surendrasya samarthānpṛthivīpate
उस पृथ्वीपति ने तपस्वी, मनीषी और देवराज से वर्षा करवाने में समर्थ ब्राह्मणों से पूछा —
श्लोक 23 (3.111.23)
कथं प्रवर्षेत्पर्जन्य उपायः परिमृश्यताम् । तमूचुश्चोदितास्ते तु स्वमतानि मनीषिणः ॥
kathaṃ pravarṣetparjanya upāyaḥ parimṛśyatām | tamūcuścoditāste tu svamatāni manīṣiṇaḥ
"मेघ कैसे बरसें? कोई उपाय खोजा जाए।" इस प्रकार प्रेरित किए जाने पर उन मनीषियों ने उसे अपने-अपने मत बताए।
श्लोक 24 (3.111.24)
तत्र त्वेको मुनिवरस्तं राजानमुवाच ह । कुपितास्तव राजेन्द्र ब्राह्मणा निष्कृतिं चर ॥
tatra tveko munivarastaṃ rājānamuvāca ha | kupitāstava rājendra brāhmaṇā niṣkṛtiṃ cara
उनमें से एक श्रेष्ठ मुनि ने राजा से कहा — "हे राजेन्द्र, ब्राह्मण तुमसे रुष्ट हैं; प्रायश्चित्त करो।
मुनिरुवाच
श्लोक 25 (3.111.25)
ऋश्यशृङ्गं मुनिसुतमानयस्व च पार्थिव । ऐणेयमनभिज्ञं च नारीणामार्जवे रतम् ॥
ṛśyaśṛṅgaṃ munisutamānayasva ca pārthiva | aiṇeyamanabhijñaṃ ca nārīṇāmārjave ratam
"और हे राजन्, मुनिपुत्र ऋश्यशृङ्ग को यहाँ ले आओ — हिरनी से जन्मे उस सरल-स्वभाव मुनि को, जो स्त्रियों को जानता तक नहीं।
श्लोक 26 (3.111.26)
स चेदवतरेद्राजन्विषयं ते महातपाः । सद्यः प्रवर्षेत्पर्जन्य इति मे नास्ति संशयः ॥
sa cedavataredrājanviṣayaṃ te mahātapāḥ | sadyaḥ pravarṣetparjanya iti me nāsti saṃśayaḥ
"हे राजन्, यदि वह महातपस्वी तुम्हारे राज्य में आ जाए, तो मेघ तत्काल बरसेंगे; इसमें मुझे कोई संदेह नहीं।"
लोमश उवाच
श्लोक 27 (3.111.27)
एतच्छ्रुत्वा वचो राजन्कृत्वा निष्कृतिमात्मनः । स गत्वा पुनरागच्छत्प्रसन्नेषु द्विजातिषु ॥
etacchrutvā vaco rājankṛtvā niṣkṛtimātmanaḥ | sa gatvā punarāgacchatprasanneṣu dvijātiṣu
हे राजन्, यह बात सुनकर उसने अपने लिए प्रायश्चित्त किया; वह ब्राह्मणों के पास गया और उनके प्रसन्न हो जाने पर लौट आया।
श्लोक 28 (3.111.28)
राजानमागतं ज्ञात्वा प्रतिसंजगृहुः प्रजाः । स च ताः प्रतिजग्राह पितेव हितकृत्सदा ॥
rājānamāgataṃ jñātvā pratisaṃjagṛhuḥ prajāḥ | sa ca tāḥ pratijagrāha piteva hitakṛtsadā
राजा को लौटा हुआ जानकर प्रजा ने उसका स्वागत किया; और वह भी पिता की भाँति सदा उनका हित करता हुआ उन्हें अपनाता रहा।
श्लोक 29 (3.111.29)
ततोऽङ्गपतिराहूय सचिवान्मन्त्रकोविदान् । ऋश्यशृङ्गागमे यत्नमकरोन्मन्त्रनिश्चये ॥
tato'ṅgapatirāhūya sacivānmantrakovidān | ṛśyaśṛṅgāgame yatnamakaronmantraniścaye
तब अंगराज ने मन्त्रणा में कुशल सचिवों को बुलाया और विचार-विमर्श के द्वारा ऋश्यशृङ्ग को लाने का यत्न आरम्भ किया।
श्लोक 30 (3.111.30)
सोऽध्यगच्छदुपायं तु तैरमात्यैः सहाच्युतः । शास्त्रज्ञैरलमर्थज्ञैर्नीत्यां च परिनिष्ठितैः ॥
so'dhyagacchadupāyaṃ tu tairamātyaiḥ sahācyutaḥ | śāstrajñairalamarthajñairnītyāṃ ca pariniṣṭhitaiḥ
शास्त्रों के ज्ञाता, अर्थ-व्यवहार में निपुण और नीति में पारंगत उन मन्त्रियों के साथ उस दृढ़ राजा ने एक उपाय खोज निकाला।
श्लोक 31 (3.111.31)
ततश्चानाययामास वारमुख्या महीपतिः । वेश्याः सर्वत्रनिष्णातास्ता उवाच स पार्थिवः ॥
tataścānāyayāmāsa vāramukhyā mahīpatiḥ | veśyāḥ sarvatraniṣṇātāstā uvāca sa pārthivaḥ
तब पृथ्वीपति ने प्रमुख वेश्याओं को बुलवाया, जो हर कला में निपुण थीं, और राजा ने उनसे कहा —
लोमपाद उवाच
श्लोक 32 (3.111.32)
ऋश्यशृङ्गमृषेः पुत्रमानयध्वमुपायतः । लोभयित्वाऽभिविश्वास्य विषयं मम शोभनाः ॥
ṛśyaśṛṅgamṛṣeḥ putramānayadhvamupāyataḥ | lobhayitvā'bhiviśvāsya viṣayaṃ mama śobhanāḥ
"हे सुन्दरियो, किसी उपाय से ऋषिपुत्र ऋश्यशृङ्ग को लुभाकर और उसका विश्वास जीतकर मेरे राज्य में ले आओ।"
लोमश उवाच
श्लोक 33 (3.111.33)
ता राजभयभीताश्च शापभीताश्च योषितः । अशक्यमूचुस्तत्कार्यं विषण्णा गतचेतसः ॥
tā rājabhayabhītāśca śāpabhītāśca yoṣitaḥ | aśakyamūcustatkāryaṃ viṣaṇṇā gatacetasaḥ
राजा के भय और शाप के भय से डरी हुई वे स्त्रियाँ उदास और हतप्रभ होकर बोलीं कि यह कार्य असम्भव है।
श्लोक 34 (3.111.34)
तत्र त्वेका जरद्योषा राजानमिदमब्रवीत् । प्रयतिष्ये महाराज तमानेतुं तपोधनम् ॥
tatra tvekā jaradyoṣā rājānamidamabravīt | prayatiṣye mahārāja tamānetuṃ tapodhanam
पर उनमें से एक वृद्धा ने राजा से यह कहा — "महाराज, मैं उस तपोधन को लाने का प्रयत्न करूँगी।
जरद्योषोवाच
श्लोक 35 (3.111.35)
अभिप्रेतांस्तु मे कामांस्त्वमनुज्ञातुमर्हसि । ततः शक्ष्याम्यानयितुमृश्यशृङ्गमृषेः सुतम् ॥
abhipretāṃstu me kāmāṃstvamanujñātumarhasi | tataḥ śakṣyāmyānayitumṛśyaśṛṅgamṛṣeḥ sutam
"किन्तु आप मेरी मनचाही वस्तुएँ देने की अनुमति दें; तब मैं ऋषिपुत्र ऋश्यशृङ्ग को ला सकूँगी।"
लोमश उवाच
श्लोक 36 (3.111.36)
तस्याः सर्वमभिप्रेतमन्वजानात्स पार्थिवः । धनं च प्रददौ भूरि रत्नानि विविधानि च ॥
tasyāḥ sarvamabhipretamanvajānātsa pārthivaḥ | dhanaṃ ca pradadau bhūri ratnāni vividhāni ca
राजा ने उसकी सारी इच्छाएँ स्वीकार कर लीं और उसे प्रचुर धन तथा भाँति-भाँति के रत्न दिए।
श्लोक 37 (3.111.37)
ततो रूपेण संपन्ना वयसा च महीपते । स्त्रिय आदाय काश्चित्सा जगाम वनमञ्जसा ॥
tato rūpeṇa saṃpannā vayasā ca mahīpate | striya ādāya kāścitsā jagāma vanamañjasā
हे पृथ्वीपति, तब वह रूप और यौवन से सम्पन्न कुछ स्त्रियों को साथ लेकर शीघ्र ही वन की ओर चल पड़ी।