आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 112
वेश्या का ऋश्यशृङ्ग के आश्रम में आगमन
वृद्धा एक नौका पर कृत्रिम वृक्षों और लताओं से सजा आश्रम बनाकर उसे विभाण्डक के आश्रम के पास बाँध देती है और मुनि की अनुपस्थिति में अपनी पुत्री को भेजती है। युवा वेश्या स्वयं को तपस्वी बताकर ऋश्यशृङ्ग से कुशल पूछती है, उनके दिए फल ठुकराकर उन्हें मिठाइयाँ, मालाएँ और पेय देती है, उनके साथ खेलती और आलिंगन करती है, फिर अग्निहोत्र का बहाना बनाकर चली जाती है। लौटकर विभाण्डक पुत्र को प्रेम से व्याकुल और खोया हुआ पाते हैं और पूछते हैं कि यहाँ कौन आया था।
लोमश उवाच
श्लोक 1 (3.112.1)
सा तु नाव्याश्रमं चक्रे राजकार्यार्थसिद्धये । संदेशाच्चैव नृपतेः स्वबुद्ध्या चैव भारत ॥
sā tu nāvyāśramaṃ cakre rājakāryārthasiddhaye | saṃdeśāccaiva nṛpateḥ svabuddhyā caiva bhārata
हे भारत, राजा का कार्य सिद्ध करने के लिए उसने राजा के निर्देश और अपनी बुद्धि दोनों से काम लेकर एक नौका पर आश्रम बनाया।
श्लोक 2 (3.112.2)
नानापुष्पफलैर्वृक्षैः कृत्रिमैरुपशोभितैः । नानागुल्मलतोपेतैः स्वादुकामफलप्रदैः ॥
nānāpuṣpaphalairvṛkṣaiḥ kṛtrimairupaśobhitaiḥ | nānāgulmalatopetaiḥ svādukāmaphalapradaiḥ
वह भाँति-भाँति के फूलों और फलों से लदे कृत्रिम वृक्षों से सुशोभित था, अनेक झाड़ियों और लताओं से भरा था, और उनसे मनचाहे स्वादिष्ट फल मिलते थे।
श्लोक 3 (3.112.3)
अतीव रमणीयं तदतीव च मनोहरम् । चक्रे नाव्याश्रमं रम्यमद्भुतोपमदर्शनम् ॥
atīva ramaṇīyaṃ tadatīva ca manoharam | cakre nāvyāśramaṃ ramyamadbhutopamadarśanam
उसने वह नौका-आश्रम अत्यन्त रमणीय, मनोहर, सुन्दर और देखने में अद्भुत बनाया।
श्लोक 4 (3.112.4)
ततो निबध्य सा नावमदूरे काश्यपाश्रमात् । चारयामास पुरुषैर्विहारं तस्य वै मुनेः ॥
tato nibadhya sā nāvamadūre kāśyapāśramāt | cārayāmāsa puruṣairvihāraṃ tasya vai muneḥ
फिर उसने नौका को काश्यप के आश्रम से थोड़ी दूर बाँध दिया और अपने आदमियों से उस मुनि के आने-जाने का पता लगवाया।
श्लोक 5 (3.112.5)
ततो दुहितरं वेश्यां समाधायेतिकार्यताम् । दृष्ट्वाऽन्तरं काश्यपस्य प्राहिणोद्बुद्धिसंमताम् ॥
tato duhitaraṃ veśyāṃ samādhāyetikāryatām | dṛṣṭvā'ntaraṃ kāśyapasya prāhiṇodbuddhisaṃmatām
तब उसने अपनी वेश्या पुत्री को समझा दिया कि क्या करना है, और काश्यप के अनुपस्थित होने का अवसर देखकर उस समझदार कन्या को भेजा।
श्लोक 6 (3.112.6)
सा तत्र गत्वा कुशला तपोनित्यस्य संनिधौ । आश्रमं तं समासाद्य ददर्श तमृषेः सुतम् ॥
sā tatra gatvā kuśalā taponityasya saṃnidhau | āśramaṃ taṃ samāsādya dadarśa tamṛṣeḥ sutam
वहाँ पहुँचकर वह चतुर कन्या उस आश्रम में, सदा तप में लगे रहने वाले मुनि के समीप गई और ऋषिपुत्र को देखा।
वेश्योवाच
श्लोक 7 (3.112.7)
कच्चिन्मुने कुशलं तापसानां । कच्चिच्च वो मूलफलं प्रभूतम् । कच्चिद्भवान्रमते चाश्रमेऽस्मिं- । स्त्वां वै द्रष्टुं सांप्रतमागतास्मि ॥
kaccinmune kuśalaṃ tāpasānāṃ | kaccicca vo mūlaphalaṃ prabhūtam | kaccidbhavānramate cāśrame'smiṃ- | stvāṃ vai draṣṭuṃ sāṃpratamāgatāsmi
हे मुनि, तपस्वियों का कुशल तो है? आपके पास कन्द-मूल और फल पर्याप्त तो हैं? इस आश्रम में आपका मन तो रमता है? मैं अभी आपके दर्शन करने आई हूँ।
श्लोक 8 (3.112.8)
कच्चित्तपो वर्धते तापसानां । पिता च ते कच्चिदहीनतेजाः । कच्चित्त्वया प्रीयतेचैव विप्र । कच्चित्स्वाध्यायः क्रियते चर्श्यशृङ्ग ॥
kaccittapo vardhate tāpasānāṃ | pitā ca te kaccidahīnatejāḥ | kaccittvayā prīyatecaiva vipra | kaccitsvādhyāyaḥ kriyate carśyaśṛṅga
तपस्वियों का तप बढ़ रहा है न? आपके पिता का तेज क्षीण तो नहीं हुआ? हे विप्र, वे आपसे प्रसन्न तो हैं? और हे ऋश्यशृङ्ग, स्वाध्याय तो होता रहता है?
ऋश्यशृङ्ग उवाच
श्लोक 9 (3.112.9)
ऋद्ध्या भवाञ्ज्योतिरिव प्रकाशते । मन्ये चाहं त्वामभिवादनीयम् । पाद्यं वै ते संप्रदास्यामि कामा- । द्यथाधर्मं फलमूलानि चैव ॥
ṛddhyā bhavāñjyotiriva prakāśate | manye cāhaṃ tvāmabhivādanīyam | pādyaṃ vai te saṃpradāsyāmi kāmā- | dyathādharmaṃ phalamūlāni caiva
आप अपनी कान्ति से ज्योति के समान प्रकाशित हो रहे हैं; मुझे लगता है कि आप वन्दनीय हैं। मैं धर्म के अनुसार प्रसन्नतापूर्वक आपको पैर धोने का जल और फल-मूल दूँगा।
श्लोक 10 (3.112.10)
कौश्यां बृस्यामास्स्व यथोपजोषं । कृष्णाजिनेनावृतायां सुखाय । क्व चाश्रमस्तव किं नाम चेदं । व्रतंब्रह्मंश्चरसि हि देववत्त्वम् ॥
kauśyāṃ bṛsyāmāssva yathopajoṣaṃ | kṛṣṇājinenāvṛtāyāṃ sukhāya | kva cāśramastava kiṃ nāma cedaṃ | vrataṃbrahmaṃścarasi hi devavattvam
काले मृगचर्म से ढके इस कुशासन पर सुखपूर्वक इच्छानुसार बैठिए। हे ब्रह्मन्, आपका आश्रम कहाँ है, और देवता के समान आप जो यह व्रत करते हैं, उसका नाम क्या है?
वेश्योवाच
श्लोक 11 (3.112.11)
ममाश्रमः काश्यपपुत्र रम्य- । स्त्रियोजनं शैलमिमं परेण । तत्रस्वधर्मोऽनभिवादनं नो । न चोदकं पाद्यमुपस्पृशामः ॥
mamāśramaḥ kāśyapaputra ramya- | striyojanaṃ śailamimaṃ pareṇa | tatrasvadharmo'nabhivādanaṃ no | na codakaṃ pādyamupaspṛśāmaḥ
हे काश्यपपुत्र, मेरा रमणीय आश्रम इस पर्वत के उस पार तीन योजन दूर है। वहाँ हमारा अपना धर्म है कि हम प्रणाम स्वीकार नहीं करते और पैर धोने के जल को छूते तक नहीं।
श्लोक 12 (3.112.12)
भवता नाभिवाद्योऽहमभिवाद्यो भवान्मया । व्रतमेतादृशं ब्रह्मन्परिष्वज्यो भवान्मया ॥
bhavatā nābhivādyo'hamabhivādyo bhavānmayā | vratametādṛśaṃ brahmanpariṣvajyo bhavānmayā
आपको मुझे प्रणाम नहीं करना है, मुझे ही आपको प्रणाम करना है। हे ब्रह्मन्, मेरा व्रत ऐसा ही है — मुझे आपका आलिंगन करना है।
ऋश्यशृङ्ग उवाच
श्लोक 13 (3.112.13)
फलानि पक्वानि ददानि तेऽहं । भल्लातकान्यामलकानि चैव । परूषकानीङ्गुदधन्वनानि । प्रियालानां काङ्क्षितं वै कुरुष्व ॥
phalāni pakvāni dadāni te'haṃ | bhallātakānyāmalakāni caiva | parūṣakānīṅgudadhanvanāni | priyālānāṃ kāṅkṣitaṃ vai kuruṣva
मैं आपको पके फल देता हूँ — भिलावे और आँवले, फालसे, इंगुदी और धन्वन के फल; और प्रियाल के फल भी जितने चाहें लीजिए।
लोमश उवाच
श्लोक 14 (3.112.14)
सा तानि सर्वाणि विसर्जयित्वा । भक्ष्याण्यनर्हाणि ददौ ततोऽस्मै । तान्यृश्यशृङ्गाय महारसानि । भृशं सुरूपाणि च मोदकानि ॥
sā tāni sarvāṇi visarjayitvā | bhakṣyāṇyanarhāṇi dadau tato'smai | tānyṛśyaśṛṅgāya mahārasāni | bhṛśaṃ surūpāṇi ca modakāni
उसने वे सब फल अलग रख दिए और बदले में ऋश्यशृङ्ग को अमूल्य खाद्य पदार्थ दिए — अत्यन्त स्वादिष्ट और देखने में बड़े सुन्दर लड्डू।
श्लोक 15 (3.112.15)
ददौ च माल्यानि सुगन्धवन्ति । चित्राणि वासांसि च भानुमन्ति । पेयानि चाग्र्याणि ततो मुमोद । चिक्रीड चैव प्रजहास चैव ॥
dadau ca mālyāni sugandhavanti | citrāṇi vāsāṃsi ca bhānumanti | peyāni cāgryāṇi tato mumoda | cikrīḍa caiva prajahāsa caiva
उसने उन्हें सुगन्धित मालाएँ, चमकीले रंग-बिरंगे वस्त्र और उत्तम पेय दिए; तब वे आनन्दित हुए, खेलने लगे और हँसने लगे।
श्लोक 16 (3.112.16)
सा कन्दुकेनारमतास्य मूले । विभज्यमाना फलिता लतेव । गात्रैश्च गात्राणि निषेवमाणा । समाश्लिषच्चासकृदृश्यशृङ्गम् ॥
sā kandukenāramatāsya mūle | vibhajyamānā phalitā lateva | gātraiśca gātrāṇi niṣevamāṇā | samāśliṣaccāsakṛdṛśyaśṛṅgam
वह उनके पास गेंद से खेलने लगी, फलों से लदी लता की तरह झुकती-लचकती हुई; और अपने अंगों से उनके अंगों का स्पर्श करती हुई बार-बार ऋश्यशृङ्ग का आलिंगन करने लगी।
श्लोक 17 (3.112.17)
सर्जानशोकांस्तिलकांश्च वृक्षा- । न्सुपुष्पितानवनाम्यावभज्य । विलज्जमानेव मदाभिभूता । प्रलोभयामास सुतं महर्षेः ॥
sarjānaśokāṃstilakāṃśca vṛkṣā- | nsupuṣpitānavanāmyāvabhajya | vilajjamāneva madābhibhūtā | pralobhayāmāsa sutaṃ maharṣeḥ
साल, अशोक और तिलक के फूलों से लदे वृक्षों की डालियाँ झुकाकर तोड़ती हुई, मानो लजाती पर मद से विह्वल, वह महर्षि के पुत्र को लुभाने लगी।
श्लोक 18 (3.112.18)
अथर्श्यशृङ्गं विकृतंसमीक्ष्य । पुनः पुनः पीड्य च कायमस्य । अवेक्ष्यमाणा शनकैर्जगाम । कृत्वाऽग्निहोत्रस्य तदाऽपदेशम् ॥
atharśyaśṛṅgaṃ vikṛtaṃsamīkṣya | punaḥ punaḥ pīḍya ca kāyamasya | avekṣyamāṇā śanakairjagāma | kṛtvā'gnihotrasya tadā'padeśam
तब ऋश्यशृङ्ग में विकार आया देखकर उसने बार-बार उनके शरीर को आलिंगन में भींचा, और अग्निहोत्र का बहाना बनाकर, उनके देखते-देखते, धीरे-धीरे चली गई।
श्लोक 19 (3.112.19)
तस्यां गतायां मदनेन मत्तो । विचेतनश्चाभवदृश्यशृङ्गः । तामेव भावेन गतेन शून्ये । विनिःश्वसन्नार्तरूपो बभूव ॥
tasyāṃ gatāyāṃ madanena matto | vicetanaścābhavadṛśyaśṛṅgaḥ | tāmeva bhāvena gatena śūnye | viniḥśvasannārtarūpo babhūva
उसके चले जाने पर ऋश्यशृङ्ग काम से उन्मत्त होकर सुध-बुध खो बैठे; उनका मन उसी के पीछे चला गया, और उस सूने स्थान में वे लम्बी साँसें भरते हुए व्याकुल हो उठे।
श्लोक 20 (3.112.20)
ततो मुहूर्ताद्धरिपिङ्गलाक्षः । प्रवेष्टितो रोमभिरानखाग्रात् । स्वाध्यायवान्वृत्तसमाधियुक्तो । विभाण्डकः काश्यपः प्रादुरासीत् ॥
tato muhūrtāddharipiṅgalākṣaḥ | praveṣṭito romabhirānakhāgrāt | svādhyāyavānvṛttasamādhiyukto | vibhāṇḍakaḥ kāśyapaḥ prādurāsīt
तब थोड़ी ही देर में विभाण्डक काश्यप वहाँ आ पहुँचे — पीली-भूरी आँखों वाले, नखों के सिरों तक रोमों से ढके, स्वाध्यायी, सदाचारी और समाधि में लीन रहने वाले।
श्लोक 21 (3.112.21)
सोऽपश्यदासीनमुपेत्य पुत्रं । ध्यायन्तमेकं विपरीतचित्तम् । विनिःश्वसन्तं मुहुरूर्ध्वदृष्टिं । विभाण्डकः पुत्रमुवाच दीनम् ॥
so'paśyadāsīnamupetya putraṃ | dhyāyantamekaṃ viparītacittam | viniḥśvasantaṃ muhurūrdhvadṛṣṭiṃ | vibhāṇḍakaḥ putramuvāca dīnam
पास आकर उन्होंने देखा कि पुत्र अकेला बैठा सोच में डूबा है, उसका चित्त उलट गया है, वह बार-बार ऊपर देखता हुआ लम्बी साँसें ले रहा है; तब विभाण्डक ने अपने दुःखी पुत्र से कहा —
विभाण्डक उवाच
श्लोक 22 (3.112.22)
न कल्पिताः समिधः किंनु तात । कच्चिद्धुतं चाग्निहोत्रं त्वयाऽद्य । न संसृष्टं क्रियते द्वारभागे । सुवृक्षाणां खण्डने कः प्रवृत्तः ॥
na kalpitāḥ samidhaḥ kiṃnu tāta | kacciddhutaṃ cāgnihotraṃ tvayā'dya | na saṃsṛṣṭaṃ kriyate dvārabhāge | suvṛkṣāṇāṃ khaṇḍane kaḥ pravṛttaḥ
बेटा, समिधाएँ क्यों तैयार नहीं की गईं? क्या आज तुमने अग्निहोत्र किया? द्वार पर झाड़ू तक नहीं लगी है। इन सुन्दर वृक्षों को तोड़ने में कौन लगा था?
श्लोक 23 (3.112.23)
सुनिर्णिक्तं स्रुक्स्रुवं होमधेनुः । कच्चित्सवत्साद्यकृता त्वया च । कोप्यागतः शुश्रूषणायेह पुत्र । कुतश्चित्रं माल्यमिदं प्रवृद्धम् ॥
sunirṇiktaṃ sruksruvaṃ homadhenuḥ | kaccitsavatsādyakṛtā tvayā ca | kopyāgataḥ śuśrūṣaṇāyeha putra | kutaścitraṃ mālyamidaṃ pravṛddham
क्या स्रुक् और स्रुवा भली-भाँति धोए गए हैं? क्या आज तुमने होम की गाय को बछड़े के पास लगाया? बेटा, क्या कोई यहाँ तुम्हारी सेवा करने आया था? यह रंग-बिरंगी बड़ी-सी माला कहाँ से आई?
श्लोक 24 (3.112.24)
न वै यथापूर्वमिवासि पुत्र । चिन्तापरश्चासि विचेतनश्च । दीनोतिमात्रं किमिवाद्य खिन्नः । पृच्छामि त्वां क इहाद्यागतोऽभूत् ॥
na vai yathāpūrvamivāsi putra | cintāparaścāsi vicetanaśca | dīnotimātraṃ kimivādya khinnaḥ | pṛcchāmi tvāṃ ka ihādyāgato'bhūt
बेटा, तुम पहले जैसे नहीं रहे; चिन्ता में डूबे हो और सुध-बुध खोए हुए हो। आज तुम इतने अधिक दीन और खिन्न क्यों हो? मैं तुमसे पूछता हूँ — आज यहाँ कौन आया था?