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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 161

भीम का कुबेर के शिखर पर धावा और मणिमान् का वध

जनमेजय पूछते हैं कि पाण्डव गन्धमादन पर कैसे रहे, और वैशम्पायन आर्ष्टिषेण के आश्रम में उनके वर्षों का वर्णन करते हैं, जब तक गरुड़ के पंखों की वायु दिव्य फूल उनके पास नहीं ले आती। द्रौपदी भीम से कहती हैं कि वे शिखर से राक्षसों को भगा दें, ताकि वह और उनके सुहृद् उसे देख सकें और ऐसे फूल पा सकें। भीम कुबेर की नगरी तक चढ़कर शंख बजाते हैं और अपनी ओर दौड़े यक्षों-राक्षसों को खदेड़ देते हैं; कुबेर का मित्र मणिमान् उन्हें फिर जुटाता है और शक्ति से भीम को घायल करता है, पर भीम गदा से उसका वध कर देते हैं और बचे हुए राक्षस पूर्व की ओर भाग जाते हैं।

अध्याय 160अध्याय-सूचीअध्याय 162

जनमेजय उवाच

श्लोक 1 (3.161.1)

आर्ष्टिषेणाश्रमे तस्मिन्मम पूर्वपितामहाः । पाण्डोः पुत्रा महात्मानः सर्वे दिव्यपराक्रमाः ॥

ārṣṭiṣeṇāśrame tasminmama pūrvapitāmahāḥ | pāṇḍoḥ putrā mahātmānaḥ sarve divyaparākramāḥ

आर्ष्टिषेण के उस आश्रम में मेरे पूर्वपितामह, पाण्डु के महात्मा पुत्र, जो सभी दिव्य पराक्रम वाले थे —

श्लोक 2 (3.161.2)

कियन्तं कालमवसन्पर्वते गन्धमादने । किंच चक्रुर्महावीर्याः सर्वेऽतिबलपौरुषाः ॥

kiyantaṃ kālamavasanparvate gandhamādane | kiṃca cakrurmahāvīryāḥ sarve'tibalapauruṣāḥ

वे गन्धमादन पर्वत पर कितने समय तक रहे? और अपार बल और पौरुष वाले उन सब महावीरों ने वहाँ क्या-क्या किया?

श्लोक 3 (3.161.3)

कानि चाभ्यवहार्याणि तत्र तेषां महात्मनाम् । वसतां लोकवीराणामासंस्तद्ब्रूहि सत्तम ॥

kāni cābhyavahāryāṇi tatra teṣāṃ mahātmanām | vasatāṃ lokavīrāṇāmāsaṃstadbrūhi sattama

वहाँ रहते हुए उन लोकवीर महात्माओं का आहार क्या था? हे सत्तम, यह मुझे बताइए।

श्लोक 4 (3.161.4)

विस्तरेण च मे शंस भीमसेनपराक्रमम् । यद्यच्चक्रे महाबाहुस्तस्मिन्हैमवते गिरौ ॥

vistareṇa ca me śaṃsa bhīmasenaparākramam | yadyaccakre mahābāhustasminhaimavate girau

और भीमसेन के पराक्रम का भी मुझसे विस्तार से वर्णन कीजिए — उस हिमालय के पर्वत पर उस महाबाहु ने जो-जो किया।

श्लोक 5 (3.161.5)

न खल्वासीत्पुनर्युद्धं तस्य यक्षैर्द्विजोत्तम । धनदाध्युषिते नित्यं वसतस्तत्र पर्वते ॥

na khalvāsītpunaryuddhaṃ tasya yakṣairdvijottama | dhanadādhyuṣite nityaṃ vasatastatra parvate

हे द्विजश्रेष्ठ, धनपति कुबेर के नित्य निवास वाले उस पर्वत पर रहते हुए क्या सचमुच यक्षों से उसका फिर कोई युद्ध नहीं हुआ?

श्लोक 6 (3.161.6)

कच्चित्समागमस्तेषामासीद्वैश्रवणस्य च । तत्र ह्यायाति धनद आर्ष्टिषेणो यथाऽब्रवीत् ॥

kaccitsamāgamasteṣāmāsīdvaiśravaṇasya ca | tatra hyāyāti dhanada ārṣṭiṣeṇo yathā'bravīt

क्या उनकी वैश्रवण (कुबेर) से भेंट हुई? क्योंकि जैसा आर्ष्टिषेण ने कहा था, धनपति वहाँ आते हैं।

श्लोक 7 (3.161.7)

एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं विस्तरेण तपोधन । न हि मे शृण्वतस्तृप्तिरस्ति तेषां विचेष्टितम् ॥

etadicchāmyahaṃ śrotuṃ vistareṇa tapodhana | na hi me śṛṇvatastṛptirasti teṣāṃ viceṣṭitam

हे तपोधन, यह सब मैं विस्तार से सुनना चाहता हूँ, क्योंकि उनके कार्यों को सुनते हुए मेरी तृप्ति ही नहीं होती।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 8 (3.161.8)

एतदात्महितं श्रुत्वा तस्याप्रतिमतेजसः । शासनं सततं चक्रुस्तथैव भरतर्षभाः ॥

etadātmahitaṃ śrutvā tasyāpratimatejasaḥ | śāsanaṃ satataṃ cakrustathaiva bharatarṣabhāḥ

उस अतुलनीय तेजस्वी मुनि से अपने हित की यह बात सुनकर भरतश्रेष्ठ पाण्डव सदा ठीक उसी प्रकार उनकी आज्ञा का पालन करते रहे।

श्लोक 9 (3.161.9)

भुञ्जाना मुनिभोज्यानि रसवन्ति फलानि च । शुद्धबाणहतानां च मृगाणां पिशितान्यपि ॥

bhuñjānā munibhojyāni rasavanti phalāni ca | śuddhabāṇahatānāṃ ca mṛgāṇāṃ piśitānyapi

वे मुनियों के योग्य भोजन, रसीले फल और शुद्ध बाणों से मारे गए मृगों का मांस खाते थे,

श्लोक 10 (3.161.10)

मेध्यानि हिमवत्पृष्ठे मधूनि विविधानि च । एवं ते न्यवसंस्तत्र पाण्डवा भरतर्षभाः ॥

medhyāni himavatpṛṣṭhe madhūni vividhāni ca | evaṃ te nyavasaṃstatra pāṇḍavā bharatarṣabhāḥ

और हिमालय के शिखरों के अनेक प्रकार के पवित्र मधु भी। इस प्रकार भरतश्रेष्ठ पाण्डव वहाँ निवास करते रहे।

श्लोक 11 (3.161.11)

तथा निवसतां तेषां पञ्चमं वर्षमभ्यगात् । शृण्वतां लोमशोक्तानि वाक्यानि विविधान्युत ॥

tathā nivasatāṃ teṣāṃ pañcamaṃ varṣamabhyagāt | śṛṇvatāṃ lomaśoktāni vākyāni vividhānyuta

इस प्रकार रहते हुए और लोमश के कहे अनेक प्रकार के वचन सुनते हुए उनका पाँचवाँ वर्ष आ पहुँचा।

श्लोक 12 (3.161.12)

कृत्यकाल उपस्थास्य इति चोक्त्वा घटोत्कचः । राक्षसैः सह सर्वैश्च पूर्वमेव गतः प्रभो ॥

kṛtyakāla upasthāsya iti coktvā ghaṭotkacaḥ | rākṣasaiḥ saha sarvaiśca pūrvameva gataḥ prabho

"काम पड़ने पर मैं उपस्थित हो जाऊँगा" — यह कहकर घटोत्कच सब राक्षसों के साथ पहले ही चला गया था, हे प्रभो।

श्लोक 13 (3.161.13)

आर्ष्टिषेणाश्रमे तेषां वसतां वै महात्मनाम् । अगच्छन्बहवो मासाः पश्यतां महदद्भुतम् ॥

ārṣṭiṣeṇāśrame teṣāṃ vasatāṃ vai mahātmanām | agacchanbahavo māsāḥ paśyatāṃ mahadadbhutam

आर्ष्टिषेण के आश्रम में रहते हुए उन महात्माओं के बहुत-से महीने बड़े-बड़े आश्चर्य देखते हुए बीत गए।

श्लोक 14 (3.161.14)

तैस्तत्रविहरद्भिश्च रममाणैश्च पाण्डवैः । प्रीतिमन्तो महाभागा मुनयश्चारणास्तथा ॥

taistatraviharadbhiśca ramamāṇaiśca pāṇḍavaiḥ | prītimanto mahābhāgā munayaścāraṇāstathā

वहाँ विहार करते और आनन्द मनाते पाण्डवों के पास प्रसन्नचित्त महाभाग मुनि और चारण,

श्लोक 15 (3.161.15)

आजग्मुः पाण्डवान्द्रष्टुं शुद्धात्मानो यतव्रताः । ते तैः सह कथां चक्रुर्दिव्यां भरतसत्तमाः ॥

ājagmuḥ pāṇḍavāndraṣṭuṃ śuddhātmāno yatavratāḥ | te taiḥ saha kathāṃ cakrurdivyāṃ bharatasattamāḥ

जो शुद्धात्मा और व्रतनिष्ठ थे, उनके दर्शन के लिए आए; और भरतश्रेष्ठों ने उनके साथ दिव्य कथाएँ कीं।

श्लोक 16 (3.161.16)

ततः कतिपयाहस्सु महाह्रदनिवासिनम् । ऋद्धिमन्तं महानागं सुपर्णः सहसाऽहरत् ॥

tataḥ katipayāhassu mahāhradanivāsinam | ṛddhimantaṃ mahānāgaṃ suparṇaḥ sahasā'harat

फिर कुछ दिनों के बाद सुपर्ण (गरुड़) ने एक विशाल सरोवर में रहने वाले एक ऐश्वर्यशाली महानाग को सहसा उठा लिया।

श्लोक 17 (3.161.17)

प्राकम्पत महाशैलः प्रामृद्यन्त महाद्रुमाः । ददृशुः सर्वभूतानि पाण्डवाश्च तदद्भुतम् ॥

prākampata mahāśailaḥ prāmṛdyanta mahādrumāḥ | dadṛśuḥ sarvabhūtāni pāṇḍavāśca tadadbhutam

वह महापर्वत काँप उठा और बड़े-बड़े वृक्ष कुचल गए; सब प्राणियों ने और पाण्डवों ने भी वह आश्चर्य देखा।

श्लोक 18 (3.161.18)

ततः शैलोत्तमस्याग्रात्पाण्डवान्प्रति मारुतः । अवहत्सर्वमाल्यानि गन्धवन्ति शुभानि च ॥

tataḥ śailottamasyāgrātpāṇḍavānprati mārutaḥ | avahatsarvamālyāni gandhavanti śubhāni ca

तब उस श्रेष्ठ पर्वत के शिखर से वायु पाण्डवों की ओर सब प्रकार के सुगन्धित और सुन्दर फूल उड़ा लाई।

श्लोक 19 (3.161.19)

तत्रपुष्पाणि दिव्यानि सुहृद्भिः सह पाण्डवाः । ददृशुः पञ्चवर्णानि द्रौपदी च यशस्विनी ॥

tatrapuṣpāṇi divyāni suhṛdbhiḥ saha pāṇḍavāḥ | dadṛśuḥ pañcavarṇāni draupadī ca yaśasvinī

वहाँ मित्रों के साथ पाण्डवों ने और यशस्विनी द्रौपदी ने पाँच रंगों के दिव्य फूल देखे।

श्लोक 20 (3.161.20)

भीमसेनं ततः कृष्णा काले वचनमब्रवीत् । विविक्ते पर्वतोद्देशे सुखासीनं महाभुजम् ॥

bhīmasenaṃ tataḥ kṛṣṇā kāle vacanamabravīt | vivikte parvatoddeśe sukhāsīnaṃ mahābhujam

तब कृष्णा (द्रौपदी) ने उचित अवसर देखकर पर्वत के एकान्त स्थान में सुख से बैठे महाबाहु भीमसेन से यह बात कही —

द्रौपद्युवाच

श्लोक 21 (3.161.21)

सुपर्णानिलवेगेन श्वसनेन महाबलात् । पञ्चवर्णानि पात्यन्ते पुष्पाणि भरतर्षभ ॥

suparṇānilavegena śvasanena mahābalāt | pañcavarṇāni pātyante puṣpāṇi bharatarṣabha

हे भरतश्रेष्ठ, सुपर्ण के पंखों से उठी वायु के प्रबल झोंके से पाँच रंगों के फूल गिराए जा रहे हैं —

श्लोक 22 (3.161.22)

दिव्यवर्णानि दिव्यानि दिव्यगन्धवहानि च । मदयन्तीव गन्धेन मनो मे भरतर्षभ ॥

divyavarṇāni divyāni divyagandhavahāni ca | madayantīva gandhena mano me bharatarṣabha

दिव्य रंग वाले, दिव्य और दिव्य सुगन्ध से भरे ये फूल अपनी गन्ध से मानो मेरे मन को मतवाला कर रहे हैं, हे भरतश्रेष्ठ।

श्लोक 23 (3.161.23)

येषां तु दर्शनात्स्पर्शान्सौरभ्याच्च तथैव च । नश्यतीव मनोदुःखं ममेदं शत्रुतापन ॥

yeṣāṃ tu darśanātsparśānsaurabhyācca tathaiva ca | naśyatīva manoduḥkhaṃ mamedaṃ śatrutāpana

हे शत्रुओं को तपाने वाले, इन्हें देखने से, छूने से और इनकी सुगन्ध से मेरे मन का यह दुःख मानो मिटता-सा जा रहा है।

श्लोक 24 (3.161.24)

ईदृशैः कुसुमैर्दिव्यैर्दिव्यगन्धवहैः शुभैः । देवतान्यर्चयित्वाऽहमिच्छेयं सङ्गमं त्वया ॥

īdṛśaiḥ kusumairdivyairdivyagandhavahaiḥ śubhaiḥ | devatānyarcayitvā'hamiccheyaṃ saṅgamaṃ tvayā

ऐसे दिव्य, शुभ और दिव्य सुगन्ध वाले फूलों से देवताओं की पूजा करके मैं तुम्हारा संग पाना चाहूँगी।

श्लोक 25 (3.161.25)

इदं तु पुरुषव्याघ्र विशेषेणाम्बुजं शुभम् । गन्धसंस्थानसंपन्नं मम मानसवर्धनम् ॥

idaṃ tu puruṣavyāghra viśeṣeṇāmbujaṃ śubham | gandhasaṃsthānasaṃpannaṃ mama mānasavardhanam

और हे पुरुषसिंह, यह सुन्दर कमल तो विशेष रूप से — जो सुगन्ध और आकार दोनों में परिपूर्ण है — मेरे मन को आनन्द से भर देता है।

श्लोक 26 (3.161.26)

प्रत्यक्षं सर्वलोकस्य नदीमश्वरथां प्रति ॥

pratyakṣaṃ sarvalokasya nadīmaśvarathāṃ prati

— सारे लोक की आँखों के सामने, अश्वरथा नदी की ओर।

श्लोक 27 (3.161.27)

वासुदेवसहायेन वासुदेवप्रियेण च । खाण्डवे सत्यसन्धेन भ्रात्रा तव महात्मना ॥

vāsudevasahāyena vāsudevapriyeṇa ca | khāṇḍave satyasandhena bhrātrā tava mahātmanā

खाण्डव वन में तुम्हारे भाई ने — उस सत्यप्रतिज्ञ महात्मा ने, जिसके सहायक और प्रिय मित्र वासुदेव हैं —

श्लोक 28 (3.161.28)

गन्धर्वोरगरक्षांसि वासवश्च पराजितः । हता मायाविनश्चोग्रा धनुः प्राप्तं च गाण्डिवं ॥

gandharvoragarakṣāṃsi vāsavaśca parājitaḥ | hatā māyāvinaścogrā dhanuḥ prāptaṃ ca gāṇḍivaṃ

गन्धर्वों, नागों और राक्षसों को तथा इन्द्र को भी पराजित किया था; भयंकर मायावी मारे गए थे और गाण्डीव धनुष प्राप्त हुआ था।

श्लोक 29 (3.161.29)

तवापि सुमहत्तेजो महद्बाहुबलं च ते । अविषह्यमनाधृष्यं शक्रतुल्यपराक्रम ॥

tavāpi sumahattejo mahadbāhubalaṃ ca te | aviṣahyamanādhṛṣyaṃ śakratulyaparākrama

तुम्हारा तेज भी अत्यन्त महान है और तुम्हारी भुजाओं का बल भी महान है — असह्य और अजेय, हे इन्द्र के समान पराक्रमी।

श्लोक 30 (3.161.30)

त्वद्बाहुबलवेगेन त्रासिताः सर्वराक्षसाः । हित्वा शैलं प्रपद्यन्तां भीमसेन दिशो दश ॥

tvadbāhubalavegena trāsitāḥ sarvarākṣasāḥ | hitvā śailaṃ prapadyantāṃ bhīmasena diśo daśa

हे भीमसेन, तुम्हारी भुजाओं के बल के वेग से डरकर सब राक्षस पर्वत छोड़कर दसों दिशाओं में भाग जाएँ।

श्लोक 31 (3.161.31)

ततः शैलोत्तमस्याग्रं चित्रमाल्यधरं शिवम् । व्यपेतभयसंमोहाः पश्यन्तु सुहृदस्तव ॥

tataḥ śailottamasyāgraṃ citramālyadharaṃ śivam | vyapetabhayasaṃmohāḥ paśyantu suhṛdastava

तब तुम्हारे सुहृद् भय और मोह से मुक्त होकर उस श्रेष्ठ पर्वत के रंग-बिरंगे फूलों से सजे मंगलमय शिखर को देखें।

श्लोक 32 (3.161.32)

एवं प्रणिहितं भीम चिरात्प्रभृतिमे मनः । द्रष्टुमिच्छामि शैलाग्रं त्वद्बाहुबलमाश्रिता ॥

evaṃ praṇihitaṃ bhīma cirātprabhṛtime manaḥ | draṣṭumicchāmi śailāgraṃ tvadbāhubalamāśritā

हे भीम, बहुत समय से मेरा मन इसी पर लगा है; तुम्हारी भुजाओं के बल का सहारा लेकर मैं उस पर्वत-शिखर को देखना चाहती हूँ।

श्लोक 33 (3.161.33)

इच्छामि च नरव्याघ्र पुष्पं प्रत्यक्षमीदृशम् । आनीयमानं क्षिप्रं वै त्वया भरतसत्तम ॥

icchāmi ca naravyāghra puṣpaṃ pratyakṣamīdṛśam | ānīyamānaṃ kṣipraṃ vai tvayā bharatasattama

और हे पुरुषसिंह, हे भरतश्रेष्ठ, मैं चाहती हूँ कि ऐसा फूल तुम शीघ्र लाकर मेरी आँखों के सामने रखो।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 34 (3.161.34)

ततः क्षिप्तमिवात्मानं द्रौपद्या स परंतपः । नामृष्यत महाबाहुः प्रहारमिवसद्गजः ॥

tataḥ kṣiptamivātmānaṃ draupadyā sa paraṃtapaḥ | nāmṛṣyata mahābāhuḥ prahāramivasadgajaḥ

तब द्रौपदी की बात से स्वयं को मानो ताना दिया गया समझकर वह शत्रुतापन महाबाहु उसे सह न सका, जैसे उत्तम हाथी प्रहार को नहीं सहता।

श्लोक 35 (3.161.35)

सिंहर्षभगतिः श्रीमानुदारः कनकप्रभः । मनस्वी बलवान्दृप्तो मानी शूरश्च पाण्डवः ॥

siṃharṣabhagatiḥ śrīmānudāraḥ kanakaprabhaḥ | manasvī balavāndṛpto mānī śūraśca pāṇḍavaḥ

सिंह और वृषभ जैसी चाल वाला, श्रीमान्, उदार, सोने-सी कान्ति वाला, मनस्वी, बलवान्, दर्पयुक्त, मानी और शूरवीर वह पाण्डव —

श्लोक 36 (3.161.36)

लोहिताक्षः पृथुव्यंसो मत्तवारणविक्रमः । सिंहदंष्ट्रो वृषस्कन्धः सालपोत इवोद्गतः ॥

lohitākṣaḥ pṛthuvyaṃso mattavāraṇavikramaḥ | siṃhadaṃṣṭro vṛṣaskandhaḥ sālapota ivodgataḥ

लाल आँखों वाला, चौड़े कंधों वाला, मतवाले हाथी जैसे विक्रम वाला, सिंह जैसे दाँतों वाला, बैल जैसे कंधों वाला और ऊँचे उठे साल के नए वृक्ष-सा;

श्लोक 37 (3.161.37)

महात्मा चारुसर्वाङ्गः कम्बुग्रीवो महाहनुः । रुक्मपृष्ठं धनुः खड्गं तूणांश्चापि परामृशन् ॥

mahātmā cārusarvāṅgaḥ kambugrīvo mahāhanuḥ | rukmapṛṣṭhaṃ dhanuḥ khaḍgaṃ tūṇāṃścāpi parāmṛśan

वह महात्मा, सर्वांगसुन्दर, शंख जैसी ग्रीवा और विशाल ठोड़ी वाला था। उसने सोने की पीठ वाला धनुष, खड्ग और तूणीर उठा लिए।

श्लोक 38 (3.161.38)

सकेसरीव चोत्सिक्तः प्रभिन्न इव वारणः । व्यपेतभयसंमोहः शैलमभ्यपतद्बली ॥

sakesarīva cotsiktaḥ prabhinna iva vāraṇaḥ | vyapetabhayasaṃmohaḥ śailamabhyapatadbalī

अभिमानी सिंह के समान और मदमत्त हाथी के समान, भय और मोह से रहित वह बलवान् पर्वत की ओर दौड़ पड़ा।

श्लोक 39 (3.161.39)

तं मृगेन्द्रमिवायान्तं प्रभिन्नमिव वारणम् । ददृशुः सर्वभूतानि पार्थं खड्गधनुर्धरम् ॥

taṃ mṛgendramivāyāntaṃ prabhinnamiva vāraṇam | dadṛśuḥ sarvabhūtāni pārthaṃ khaḍgadhanurdharam

सिंह के समान और मदमत्त हाथी के समान आते हुए, खड्ग और धनुष धारण किए उस पार्थ को सब प्राणियों ने देखा।

श्लोक 40 (3.161.40)

द्रौपद्या वर्धयन्हर्षं गदामादाय पाण्डवः । व्यपेतभयसंमोहः शैलराजं समाविशत् ॥

draupadyā vardhayanharṣaṃ gadāmādāya pāṇḍavaḥ | vyapetabhayasaṃmohaḥ śailarājaṃ samāviśat

द्रौपदी का हर्ष बढ़ाते हुए वह पाण्डव गदा लेकर, भय और मोह से रहित होकर, उस पर्वतराज में प्रविष्ट हुआ।

श्लोक 41 (3.161.41)

न ग्लानिर्न च कातर्यं न वैक्लव्यं न मत्सरः । कदाचिज्जुषते पार्थमात्मजं मातरिश्वनः ॥

na glānirna ca kātaryaṃ na vaiklavyaṃ na matsaraḥ | kadācijjuṣate pārthamātmajaṃ mātariśvanaḥ

वायु के पुत्र उस पार्थ को थकान, कायरता, उत्साहहीनता या ईर्ष्या कभी छू भी नहीं पाती।

श्लोक 42 (3.161.42)

तदेकायनमासाद्य विषमं भीमदर्शनम् । बहुतालोच्छ्रयं शृङ्गमारुरोह महाबलः ॥

tadekāyanamāsādya viṣamaṃ bhīmadarśanam | bahutālocchrayaṃ śṛṅgamāruroha mahābalaḥ

केवल एक व्यक्ति के जाने योग्य, ऊबड़-खाबड़ और देखने में भयानक मार्ग पर पहुँचकर वह महाबली अनेक ताड़ों जितनी ऊँची चोटी पर चढ़ गया।

श्लोक 43 (3.161.43)

स किन्नरमहानागमुनिगन्धर्वराक्षसान् । हर्षयन्पर्वतस्याग्रमारुरोह महाबलः ॥

sa kinnaramahānāgamunigandharvarākṣasān | harṣayanparvatasyāgramāruroha mahābalaḥ

किन्नरों, महानागों, मुनियों, गन्धर्वों और राक्षसों को हर्षित करता हुआ वह महाबली पर्वत के शिखर पर चढ़ गया।

श्लोक 44 (3.161.44)

ततो वैश्रवणावासं ददर्श भरतर्षभः । काञ्चनैः स्फाटिकैश्चैव वेश्मभिः समलंकृतम् ॥

tato vaiśravaṇāvāsaṃ dadarśa bharatarṣabhaḥ | kāñcanaiḥ sphāṭikaiścaiva veśmabhiḥ samalaṃkṛtam

तब उस भरतश्रेष्ठ ने वैश्रवण (कुबेर) का निवास देखा, जो सोने और स्फटिक के भवनों से सुशोभित था,

श्लोक 45 (3.161.45)

प्राकारेण परिक्षिप्तं सौवर्णेन समन्ततः । सर्वरत्नद्युतिमता सर्वोद्यानवता तथा ॥

prākāreṇa parikṣiptaṃ sauvarṇena samantataḥ | sarvaratnadyutimatā sarvodyānavatā tathā

जो चारों ओर से ऐसे स्वर्ण-प्राकार से घिरा था जो सब रत्नों की कान्ति से दमकता था और सब प्रकार के उद्यानों से युक्त था —

श्लोक 46 (3.161.46)

शैलादभ्युच्छ्रयवता चयाट्टालकशोभिना । द्वारतोरणनिर्व्यूहध्वजसंवाहशोभिना ॥

śailādabhyucchrayavatā cayāṭṭālakaśobhinā | dvāratoraṇanirvyūhadhvajasaṃvāhaśobhinā

वह प्राकार पर्वत से भी ऊँचा था, बुर्जों और अटारियों से शोभित तथा द्वारों, तोरणों, छज्जों और ध्वजों की पंक्तियों से सुशोभित था;

श्लोक 47 (3.161.47)

विलासिनीभिरत्यर्थं नृत्यन्तीभिः समन्ततः । वायुना धूयमानाभिः पताकाभिरलंकृतम् ॥

vilāsinībhiratyarthaṃ nṛtyantībhiḥ samantataḥ | vāyunā dhūyamānābhiḥ patākābhiralaṃkṛtam

और वह वायु से लहराती, विलासिनी स्त्रियों की भाँति चारों ओर खूब नाचती पताकाओं से अलंकृत था।

श्लोक 48 (3.161.48)

धनुष्कोटिमवष्टभ्य वक्रभावेन बाहुना । पश्यमानः सखेदेन द्रविणाधिपतेः पुरम् ॥

dhanuṣkoṭimavaṣṭabhya vakrabhāvena bāhunā | paśyamānaḥ sakhedena draviṇādhipateḥ puram

धनुष की नोक पर टिककर, भुजा को मोड़े हुए, वह खेद के साथ धनपति की उस नगरी को देखता रहा।

श्लोक 49 (3.161.49)

मोदयन्सर्वभूतानि गन्धमादनसंभवः । सर्वगन्धवहस्तत्र मारुतः सुसुखो ववौ ॥

modayansarvabhūtāni gandhamādanasaṃbhavaḥ | sarvagandhavahastatra mārutaḥ susukho vavau

सब प्राणियों को आनन्दित करती हुई, गन्धमादन से उठी, सब प्रकार की सुगन्ध लिए हुए अत्यन्त सुखद वायु वहाँ बह रही थी।

श्लोक 50 (3.161.50)

चित्रा विविधवर्णाभाश्चित्रमञ्जरिधारिणः । अचिन्त्या विविधास्तत्र द्रुमाः परमशोभिनः ॥

citrā vividhavarṇābhāścitramañjaridhāriṇaḥ | acintyā vividhāstatra drumāḥ paramaśobhinaḥ

वहाँ अनेक प्रकार के अकल्पनीय वृक्ष थे — अद्भुत, विविध रंगों से चमकते, रंग-बिरंगी मंजरियाँ धारण किए हुए और अत्यन्त शोभायमान।

श्लोक 51 (3.161.51)

रत्नजालपरिक्षिप्तं चित्रमाल्यविभूषितम् । राक्षसाधिपतेः स्थानं ददृशे भरतर्षभः ॥

ratnajālaparikṣiptaṃ citramālyavibhūṣitam | rākṣasādhipateḥ sthānaṃ dadṛśe bharatarṣabhaḥ

उस भरतश्रेष्ठ ने राक्षसों के स्वामी का वह स्थान देखा, जो रत्नों की जालियों से घिरा और रंग-बिरंगी मालाओं से सजा था।

श्लोक 52 (3.161.52)

गदाखड्गधनुष्पाणिः समभित्यक्तजीवितः । भीमसेनो महाबाहुस्तस्थौ गिरिरिवाचलः ॥

gadākhaḍgadhanuṣpāṇiḥ samabhityaktajīvitaḥ | bhīmaseno mahābāhustasthau giririvācalaḥ

हाथों में गदा, खड्ग और धनुष लिए, प्राणों का मोह पूरी तरह छोड़कर महाबाहु भीमसेन पर्वत के समान अचल खड़ा हो गया।

श्लोक 53 (3.161.53)

ततः शङ्खमुपाध्माय द्विषतां रोमहर्षणम् । ज्याघोषं तलशब्दं च कृत्वा भूतान्यमोहयत् ॥

tataḥ śaṅkhamupādhmāya dviṣatāṃ romaharṣaṇam | jyāghoṣaṃ talaśabdaṃ ca kṛtvā bhūtānyamohayat

तब उसने शत्रुओं के रोंगटे खड़े कर देने वाला शंख बजाया, और धनुष की डोरी की टंकार तथा हथेलियों की थाप से वहाँ के प्राणियों को स्तब्ध कर दिया।

श्लोक 54 (3.161.54)

ततः प्रहृष्टरोमाणस्तं शब्दमभिदुद्रुवुः । यक्षराक्षसगन्धर्वाः पाण्डवस्य समीपतः ॥

tataḥ prahṛṣṭaromāṇastaṃ śabdamabhidudruvuḥ | yakṣarākṣasagandharvāḥ pāṇḍavasya samīpataḥ

तब रोमांचित होकर यक्ष, राक्षस और गन्धर्व उस शब्द की ओर पाण्डव के निकट दौड़े आए।

श्लोक 55 (3.161.55)

गदापरिघनिस्त्रिंशशूलशक्तिपरश्वथाः । प्रगृहीता व्यरोचन्त यक्षराक्षसबाहुभिः ॥

gadāparighanistriṃśaśūlaśaktiparaśvathāḥ | pragṛhītā vyarocanta yakṣarākṣasabāhubhiḥ

यक्षों और राक्षसों की भुजाओं में थमी गदाएँ, परिघ, तलवारें, शूल, शक्तियाँ और फरसे चमक उठे।

श्लोक 56 (3.161.56)

ततः प्रववृते युद्धं तेषां तस्य च भारत ॥

tataḥ pravavṛte yuddhaṃ teṣāṃ tasya ca bhārata

हे भारत, तब उनके और उसके बीच युद्ध छिड़ गया।

श्लोक 57 (3.161.57)

तैः प्रयुक्तान्महामायैः शूलशक्तिपरश्वथान् । भल्लैर्भीमः प्रचिच्छेद भीमवेगतरैस्ततः ॥

taiḥ prayuktānmahāmāyaiḥ śūlaśaktiparaśvathān | bhallairbhīmaḥ praciccheda bhīmavegataraistataḥ

तब भीम ने अत्यन्त भीषण वेग वाले भल्ल बाणों से उन महामायावियों द्वारा चलाए गए शूलों, शक्तियों और फरसों को काट डाला।

श्लोक 58 (3.161.58)

अन्तरिक्षगतानां च भूमिष्ठानां च गर्जताम् । शरैर्विव्याध गात्राणि राक्षसानां महाबलः ॥

antarikṣagatānāṃ ca bhūmiṣṭhānāṃ ca garjatām | śarairvivyādha gātrāṇi rākṣasānāṃ mahābalaḥ

उस महाबली ने गरजते हुए राक्षसों के — आकाश में स्थित और भूमि पर खड़े, दोनों के — अंगों को बाणों से बींध डाला।

श्लोक 59 (3.161.59)

शोणितस्य ततः पेतुर्घनानामिव भारत । गात्रेभ्यः प्रच्युता धारा राक्षसानां समन्ततः । स लोहितमहावृष्टिमभ्यवर्षन्महाबलः ॥

śoṇitasya tataḥ peturghanānāmiva bhārata | gātrebhyaḥ pracyutā dhārā rākṣasānāṃ samantataḥ | sa lohitamahāvṛṣṭimabhyavarṣanmahābalaḥ

हे भारत, तब बादलों की वर्षा की भाँति राक्षसों के अंगों से चारों ओर रक्त की धाराएँ गिरने लगीं; उस महाबली ने रक्त की भारी वर्षा करा दी।

श्लोक 60 (3.161.60)

गदापरिघपाणीनां रक्षसां कायसंभवा । कायेभ्यः प्रच्युता धारा राक्षसानां समन्ततः ॥

gadāparighapāṇīnāṃ rakṣasāṃ kāyasaṃbhavā | kāyebhyaḥ pracyutā dhārā rākṣasānāṃ samantataḥ

गदा और परिघ धारण करने वाले राक्षसों के शरीरों से उत्पन्न वे धाराएँ उनके शरीरों से चारों ओर बह निकलीं।

श्लोक 61 (3.161.61)

भीमबाहुबलोत्सृष्टैरायुधैर्यक्षरक्षसाम् । विनिकृत्तानि दृश्यन्ते शरीराणि शिरांसि च ॥

bhīmabāhubalotsṛṣṭairāyudhairyakṣarakṣasām | vinikṛttāni dṛśyante śarīrāṇi śirāṃsi ca

भीम की भुजाओं के बल से छोड़े गए अस्त्रों से कटे हुए यक्षों और राक्षसों के शरीर और सिर दिखाई देने लगे।

श्लोक 62 (3.161.62)

प्रच्छाद्यमानं रक्षोभिः पाण्डवं प्रियदर्शनम् । ददृशुः सर्वभूतानि सूर्यमभ्रगणैरिव ॥

pracchādyamānaṃ rakṣobhiḥ pāṇḍavaṃ priyadarśanam | dadṛśuḥ sarvabhūtāni sūryamabhragaṇairiva

सब प्राणियों ने देखा कि वह प्रियदर्शन पाण्डव राक्षसों से ऐसे ढक गया है जैसे सूर्य बादलों के समूहों से।

श्लोक 63 (3.161.63)

स रश्मिभिरिवादित्यः शरैररिनिपातिभिः । सर्वानार्च्छन्महाबाहुर्बलवान्सत्यविक्रमः ॥

sa raśmibhirivādityaḥ śarairarinipātibhiḥ | sarvānārcchanmahābāhurbalavānsatyavikramaḥ

जैसे सूर्य अपनी किरणों से, वैसे ही उस बलवान्, सत्यपराक्रमी महाबाहु ने शत्रुओं को गिराने वाले बाणों से उन सबको घायल कर दिया।

श्लोक 64 (3.161.64)

अभितर्जयमानाश्च रुवन्तश्च महारवान् । सन्नाहं भीमसेनस्य ददृशुः सर्वराक्षसाः ॥

abhitarjayamānāśca ruvantaśca mahāravān | sannāhaṃ bhīmasenasya dadṛśuḥ sarvarākṣasāḥ

धमकियाँ देते और भारी गर्जना करते हुए सब राक्षसों ने भीमसेन को युद्ध के लिए पूरी तरह सन्नद्ध देखा।

श्लोक 65 (3.161.65)

ते हि विक्षतसर्वाङ्गा भीमसेनभयार्दिताः । भीममार्तस्वरं चक्रुर्विप्रकीर्णमहायुधाः ॥

te hi vikṣatasarvāṅgā bhīmasenabhayārditāḥ | bhīmamārtasvaraṃ cakrurviprakīrṇamahāyudhāḥ

सारे अंगों में घायल और भीमसेन के भय से पीड़ित होकर, अपने बड़े-बड़े शस्त्र बिखेरे हुए, वे भयानक आर्तनाद करने लगे।

श्लोक 66 (3.161.66)

उत्सृज्य ते गदाशूलानसिशक्तिपरश्वथान् । दक्षिणां दिशमाजग्मुस्त्रासिता दृढधन्वना ॥

utsṛjya te gadāśūlānasiśaktiparaśvathān | dakṣiṇāṃ diśamājagmustrāsitā dṛḍhadhanvanā

अपनी गदाएँ, शूल, तलवारें, शक्तियाँ और फरसे फेंककर, उस दृढ़ धनुर्धारी से भयभीत होकर वे दक्षिण दिशा की ओर भाग गए।

श्लोक 67 (3.161.67)

तत्र शूलगदापाणिर्व्यूढोरस्को महाभुजः । सखा वैश्रवणस्यासीन्मणिमान्नाम राक्षसः ॥

tatra śūlagadāpāṇirvyūḍhorasko mahābhujaḥ | sakhā vaiśravaṇasyāsīnmaṇimānnāma rākṣasaḥ

वहाँ मणिमान् नाम का एक राक्षस था, जो वैश्रवण का मित्र था — चौड़ी छाती वाला, महाबाहु, हाथों में शूल और गदा लिए हुए।

श्लोक 68 (3.161.68)

दर्शयन्स प्रतीकारं पौरुषं च महाबलः । स तान्दृष्ट्वा परावृत्तान्स्मयमान इवाब्रवीत् ॥

darśayansa pratīkāraṃ pauruṣaṃ ca mahābalaḥ | sa tāndṛṣṭvā parāvṛttānsmayamāna ivābravīt

अपनी प्रतिकार की शक्ति और पौरुष दिखाते हुए उस महाबली ने उन्हें पीठ फेरकर भागते देखा और मानो मुस्कराते हुए कहा —

मणिमानुवाच

श्लोक 69 (3.161.69)

एकेन बहवः सङ्ख्ये मानुषेण पराजिताः । प्राप्य वैश्रवणावासं किं वक्ष्यथ धनेश्वरम् ॥

ekena bahavaḥ saṅkhye mānuṣeṇa parājitāḥ | prāpya vaiśravaṇāvāsaṃ kiṃ vakṣyatha dhaneśvaram

एक अकेले मनुष्य से तुम इतने सारे युद्ध में हार गए! वैश्रवण के निवास पर पहुँचकर धनपति से क्या कहोगे?

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 70 (3.161.70)

एवमाभाष्य तान्सर्वानभ्यवर्तत राक्षसः । शक्तिशूलगदापाणिरभ्यधावत्स पाण्डवम् ॥

evamābhāṣya tānsarvānabhyavartata rākṣasaḥ | śaktiśūlagadāpāṇirabhyadhāvatsa pāṇḍavam

उन सबसे ऐसा कहकर वह राक्षस लौट पड़ा और हाथों में शक्ति, शूल और गदा लिए पाण्डव पर टूट पड़ा।

श्लोक 71 (3.161.71)

तमापतन्तं वेगेन प्रभिन्नमिव वारणम् । वत्सदन्तैस्त्रिभिः पार्श्वे भीमसेनः समार्दयत् ॥

tamāpatantaṃ vegena prabhinnamiva vāraṇam | vatsadantaistribhiḥ pārśve bhīmasenaḥ samārdayat

मदमत्त हाथी की तरह वेग से आते हुए उस राक्षस की पसली में भीमसेन ने तीन वत्सदन्त बाण मारे।

श्लोक 72 (3.161.72)

मणिमानपि संक्रुद्धः प्रगृह्य महतीं गदाम् । प्राहिणोद्भीमसेनाय परिगृह्य महाबलः ॥

maṇimānapi saṃkruddhaḥ pragṛhya mahatīṃ gadām | prāhiṇodbhīmasenāya parigṛhya mahābalaḥ

मणिमान् ने भी क्रुद्ध होकर एक विशाल गदा उठाई और उस महाबली ने उसे कसकर पकड़कर भीमसेन पर फेंक दिया।

श्लोक 73 (3.161.73)

विद्युद्रूपां महाघोरामाकाशे महतीं गदाम् । शरैर्बहुभिरानर्छद्भीमसेनः शिलाशितैः ॥

vidyudrūpāṃ mahāghorāmākāśe mahatīṃ gadām | śarairbahubhirānarchadbhīmasenaḥ śilāśitaiḥ

आकाश में बिजली-सी चमकती उस अत्यन्त भयानक विशाल गदा पर भीमसेन ने पत्थर पर तेज किए अनेक बाण चलाए।

श्लोक 74 (3.161.74)

प्रत्यहन्यन्त ते सर्वेगदामासाद्य सायकाः । न वेगं धारयामासुर्गदावेगस्य वेगिताः ॥

pratyahanyanta te sarvegadāmāsādya sāyakāḥ | na vegaṃ dhārayāmāsurgadāvegasya vegitāḥ

वे सारे बाण गदा से टकराकर लौट गए; वेगवान् होते हुए भी वे गदा चलाने में अभ्यस्त उस राक्षस के वेग को रोक न सके।

श्लोक 75 (3.161.75)

गदायुद्धसमाचारं बुध्यमानः स वीर्यवान् । व्यंसयामास तं तस्य प्रहारं भीमविक्रमः ॥

gadāyuddhasamācāraṃ budhyamānaḥ sa vīryavān | vyaṃsayāmāsa taṃ tasya prahāraṃ bhīmavikramaḥ

किन्तु गदायुद्ध की रीति जानने वाले उस भीषण पराक्रमी वीर (भीम) ने उसके उस प्रहार को विफल कर दिया।

श्लोक 76 (3.161.76)

ततः शक्तिं महाघोरां रुक्मदण्डामयस्मयीम् । तस्मिन्नेवान्तरे धीमान्प्रचिक्षेप स राक्षसः ॥

tataḥ śaktiṃ mahāghorāṃ rukmadaṇḍāmayasmayīm | tasminnevāntare dhīmānpracikṣepa sa rākṣasaḥ

तब उसी क्षण उस चतुर राक्षस ने सोने के दण्ड वाली, लोहे की बनी एक अत्यन्त भयानक शक्ति चलाई।

श्लोक 77 (3.161.77)

सा भुजं भीमनिर्ह्रादा भित्त्वा भीमस्य दक्षिणम् । साग्निज्वाला महारौद्रा पपात सहसा भुवि ॥

sā bhujaṃ bhīmanirhrādā bhittvā bhīmasya dakṣiṇam | sāgnijvālā mahāraudrā papāta sahasā bhuvi

भयंकर गर्जना करती, आग की लपटों से घिरी वह अत्यन्त रौद्र शक्ति भीम की दाहिनी भुजा को भेदकर सहसा भूमि पर गिर पड़ी।

श्लोक 78 (3.161.78)

सोऽतिविद्धो महेष्वासः शक्त्याऽमितपराक्रमः । गदां जग्राह कौन्तेयो गदायुद्धविशारदः ॥

so'tividdho maheṣvāsaḥ śaktyā'mitaparākramaḥ | gadāṃ jagrāha kaunteyo gadāyuddhaviśāradaḥ

शक्ति से गहरे बिंधे हुए उस अपार पराक्रमी महाधनुर्धर, गदायुद्ध में निपुण कुन्तीपुत्र ने अपनी गदा उठा ली।

श्लोक 79 (3.161.79)

तां प्रगृह्योन्नदन्भीमः सर्वशैक्यायसीं गदाम् । तरसा सोऽभिदुद्राव मणिमन्तं महाबलम् ॥

tāṃ pragṛhyonnadanbhīmaḥ sarvaśaikyāyasīṃ gadām | tarasā so'bhidudrāva maṇimantaṃ mahābalam

पूरी तरह शैक्य लोहे की बनी उस गदा को उठाकर भीम ने गर्जना की और वेग से महाबली मणिमान् पर टूट पड़ा।

श्लोक 80 (3.161.80)

दीप्यमानं महाशूलं प्रगृह्य मणिमानपि । प्राहिणोद्भीमसेनाय वेगेन महता नदन् ॥

dīpyamānaṃ mahāśūlaṃ pragṛhya maṇimānapi | prāhiṇodbhīmasenāya vegena mahatā nadan

मणिमान् ने भी एक दहकता हुआ महाशूल उठाया और गरजते हुए बड़े वेग से भीमसेन पर फेंका।

श्लोक 81 (3.161.81)

भङ्क्त्वा शूलं गदाग्रेण गदायुद्धविभागवित् । अभिदुद्राव तं तूर्णं गरुत्मानिव पन्नगम् ॥

bhaṅktvā śūlaṃ gadāgreṇa gadāyuddhavibhāgavit | abhidudrāva taṃ tūrṇaṃ garutmāniva pannagam

गदा के अगले भाग से उस शूल को तोड़कर, गदायुद्ध के सारे दाँव-पेंच जानने वाला भीम तुरन्त उस पर ऐसे झपटा जैसे गरुड़ साँप पर।

श्लोक 82 (3.161.82)

सोऽन्तरिक्षमवप्लुत्य विधूय सहसा गदाम् । प्रचिक्षेप महाबाहुर्विनद्य रणमूर्धनि ॥

so'ntarikṣamavaplutya vidhūya sahasā gadām | pracikṣepa mahābāhurvinadya raṇamūrdhani

आकाश में उछलकर और सहसा गदा घुमाकर उस महाबाहु ने रणभूमि के अग्रभाग में गर्जना करते हुए उसे फेंका।

श्लोक 83 (3.161.83)

सेन्द्राशनिरिवेन्द्रेण विसृष्टा वातरंहसा । हत्वा रक्षः क्षितिं प्राप्य कृत्येव निपपात ह ॥

sendrāśanirivendreṇa visṛṣṭā vātaraṃhasā | hatvā rakṣaḥ kṣitiṃ prāpya kṛtyeva nipapāta ha

इन्द्र द्वारा छोड़े गए वज्र के समान, वायु के वेग से चलती वह गदा उस राक्षस को मारकर धरती पर पहुँची और कृत्या की भाँति गिर पड़ी।

श्लोक 84 (3.161.84)

तं राक्षसं भीमबलं भीमसेनबलाहतम् । ददृशुः सर्वभूतानि सिंहेनेव गवांपतिम् ॥

taṃ rākṣasaṃ bhīmabalaṃ bhīmasenabalāhatam | dadṛśuḥ sarvabhūtāni siṃheneva gavāṃpatim

सब प्राणियों ने भीषण बल वाले उस राक्षस को भीमसेन के बल से मारा गया देखा, जैसे सिंह द्वारा गिराया गया साँड़।

श्लोक 85 (3.161.85)

तं प्रेक्ष्य निहतं भूमौ हतशेषा निशाचराः । भीममार्तस्वरं कृत्वा जग्मुः प्राचीं दिशं प्रति ॥

taṃ prekṣya nihataṃ bhūmau hataśeṣā niśācarāḥ | bhīmamārtasvaraṃ kṛtvā jagmuḥ prācīṃ diśaṃ prati

उसे भूमि पर मरा देखकर बचे हुए निशाचर भयानक आर्तनाद करते हुए पूर्व दिशा की ओर भाग गए।

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